संस्मरण-सन
रक्त-संबंधसँ दूर
कीर्तिनाथ झा
kirtinath.jha@gmail.com
बहुत दिन पहिने गाममे अनेक परंपरा रहैक. एहिमे इहो रहैक जे गामसँ दूरस्थ बाहर रहनिहार
जखन साल-छौ मास पर गाम आबथि, तँ सर-संबंधी, हित-मित्र आ श्रेष्ठलोकनिक भेट करथि, कुशल-क्षेम
पुछथिन, आ आशीर्वाद लेथि. यद्यपि, आइ समाज आ लोकसब, सब बदलि गेल छथि, हमरालोकनि
सेहो युवकसँ सीनियर सिटीजन भए चुकल छी, तथापि, हमरालोकनि एखनहुँ ओ रिवाज धेनहि छी:
गाम अबैत छी तँ कतेको गोटेसँ भेट करैत छियनि, जाहिमे भौजीलोकनि सेहो छथि. आइ
सुन्दरपुरवाली भौजीक भेट करय गेलहुँ.
हुनक ओसारा पर चढ़िते हम सोर केलियनि: ‘भौजी!’
“के, डाक्टर सेहेब?’ ई कहैत भौजी मसहरीक त’रसँ
बहार भए कोठलीसँ तेहन गतिएँ बाहर भेलीह, जेना ओ तिरानबे बरखक नहि, तिरसठिक होथि. दुब्बरि,
गोरि नारि आ नमतीमे औसतसँ बेसी होइतो, ने हुनकर डांडमे कोनो लोच, ने आँखिमे
अशक्तताक भाव. ओहिना खल-खल हँसैत, जेना हम हुनका छौ दशकसँ बेसी पूर्व देखैत
रहियनि. भौजी हमरा एखनो ओहने लगैत छथि.
हमरा जहियाक स्मरण अछि, हम पाँच-छौ वर्षक रहल हएब. आब जोड़ैत छी, तँ, तहिया भौजी करीब
पच्चीस बरखसँ कम केर नहि छल हेतीह. हुनकर जेठि बेटी हमरासँ अवश्य जेठि छल हेतीह;
हुनका हमर जेठि बहिनिक संग ‘पिरीत’ लागल छलनि. भौजी तैओ छोट दियर बूझि हमरासँ मौका-बे-मौका
हँसी-विनोद कइए लेथि.ओहि युगमे गामक संबंध-बंध रक्त संबंधे धरि सीमित नहि रहैक. तेँ,
अपन भौजीलोकनि तँ सहजहि, आनो आङनक भौजीलोकनि,
जनिकासँ केवल सामाजिक संबंध छल दुलारो
करथि, आ मौका पड़ला पर हँटिओ-दबाड़िओ देथि.
समयक प्रहार आ जीविकाक हेतु पलायन, ई रोग जन-मज़दूरक संग हमरोलोकनिकेँ कहाँ छोड़लक.
फलतः, लोककेँ घर-आङन छूटि गेलैक. गामक-गाम खाली भए गेलैक. तैओ किछु गोटे गामकेँ ओहिना
पकड़ने रहि गेलाह जेना बड़-पीपर-पाकड़ि भूमिकेँ धेने रहि जाइछ. एहने एक परिवारक दू
दियादिनी छथि भौजीलोकनि. दुनूक लगभग एके वयस, एके काया-कलेवर, एके अङोट, एके भाषा,
एके रंग स्वभाव. गप-सप एहन जे अपन गपसँ ककरो अपना दिसि झीकि लैत जेतीह. एहिमे सँ जेठि मखौलिया बेसी. ओ आङीक
जेबीमे गूआ राखथि. छोटि कनेक गंभीर-मनस्वी, पोथी आ पढ़बाक हिस्सक
रहनि. कोठिक कान्ह पर पोथी राखथि. हुनक पिता महान पण्डित रहथिन आ माता लेखक.
दुनू दियादिनीक बीच वसंत लागल रहनि.
पछाति, जखन हम लिखब आरंभ केलहुँ, आ हमर पोथी प्रकाशित होमय लागल तँ जखन हम गाम
आबी तँ छोटकी भौजीकेँ हम अपन प्रत्येक पोथीक एक प्रति अवश्य दए अबियनि आ ओ
प्रत्येक पोथी रूचिसँ पढ़थि.
बहुत दिनक बाद एक बेर जखन गाम एलहुँ, आ हुनकर भेट करी गेलियनि, तेँ, छोटकी भौजी पुछलनि,
यउ, छोटे वयसमे पढ़ल, भारतेन्दु
हरिश्चंदक एकटा कविताक किछु पाँति हमरा मन पड़ैत अछि. मुदा, पूरा कविता कतेको मोन पाड़ैत
छी, मन नहि पड़ैत अछि. फल्लाँकेँ पुछलियनि, कहलनि नहि बूझल अछि. अहाँकेँ बूझल अछि? सुनूँ. आ ओ ओहि कविताक पहिल दू
पाँतिक पाठ केलखिन:
नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी सोहति ।
बिच-बिच छहरति बूंद मद्य मुक्ता मनि पोहति ।।
हम कहलियनि, ‘ई तँ सुनबामे मैथिली-सन लगैत अछि.
भौजी अस्वीकृतिमे हाथ डोलबैत कहलनि, ‘नहि.’
हम ओत्तहि हुनकर सोझहि गूगल बाबाकेँ पुछ्लियनि. हाज़िरजवाब गूगल बाबा तुरत संपूर्ण
कविता सोझाँ राखि देलनि. हम कविता पाठ कए भौजीकेँ सुना देलियनि. सुनि कए ओ प्रसन्न
भए गेलीह. ठीके भारतेन्दुक ‘गंगा-वर्णन’1 नामक ई कविता ब्रज-भाषामे छैक.
2
बड़कीभौजीक आँखि आ कान दुनूसँ अशक्त छथि. मुदा, प्रखर बुद्धिक कारण आँखि आ कानक
दोषक कमीकेँ पराजित कए दैत छथिन. तेँ, ककरो आहट पबिते कान ठाढ़ भए जाइत छनि. ठेहुनमे
कष्ट छनि, मुदा, लोकक आवेश तेहन जे लोकक आहट सुनीते सोझे बहरा जाइत छथिन.
एहि बेर हम भौजी लग बैसलहुँ तँ ओ बेरा-बेरी सबहक हाल-चाल पुछलनि. आँखि आ कानक
कमजोरीक अछैतो, टोल-पड़ोसक सब गप बड़की भौजीकेँ बुझल छनि. ककरा कतेक दरमाहा भेटैत
छैक, ककरा घरमे के अस्वस्थ छैक, कोन परिवारमे क़ेहन दुःखद घटना भेलैए, ओ सबहक खबरि
आ सबहक प्रति सहानुभूति रखैत छथि, सबहक संग सहृदयताक भाव छनि.
हम चाह नहि पिबैत छी, पान नहि खाइत छी, से भौजीकेँ नहि बिसरल छनि. अस्तु, हम जखन
हुनकर सब सत्कारक प्रयासक आगाँ हाथ जोड़ि हुनका बैसा दैत छियनि, तैओ ओ हारि नहि
मानैत छथि. कहैत छथि, ‘थम्हू,
अहाँकेँ लवंग दैत छी.
लगहिमे भौजीक सहायक, गामक सुआसिनि सीता बैसलि छलीह. कहलनि, ‘बौआसिन ले’
समाधियाउरसँ फूट कए मेवा-मिसरी-लौंग-अणाची अबैत छनि. भौजीक ठोर पर चिरपरिचित
मुसुकी पसरि जाइत छनि. ओ गरदनिक मोतिक मालाक बीचसँ कुंजी हथोड़ि छोटका बक्कस खोलि लबंग
निकालि हमर तरहत्थी पर सबटा लबंग राखि दैत छथि.
‘एतेक रास!’ हम प्रतिवाद करैत छियनि.
ओ हमर कुर्त्ताक जेबी दिस संकेत करैत, कहैत छथि, ‘राखि लियअ’.
हमर भौजी एहन आवेश कोना टारि सकैत छियनि.
हम उठिकए विदा होमय लगलहुँ तँ भौजी फेरि बैसा लेलनि. कहलनि, कनियाँ आ धियापुता? ओ सबहक
कुशल-समाचार पुछय चाहैत छथि. सबहक हालचाल इशारा आ जोरसँ कहला पर सूनि ओ आश्वस्त
भेलीह.
हम सोचैत छी, ई गाम केवल एकटा भूखण्ड, एकटा चौहद्दी, खरिहान,
पोखरि-नदी-गाछी-कलमबाग़- कमला-कोसीक धारक समुच्चय नहि थिक. एतुका मनुखक ह्रदय, ओकर
स्पंदन, ओहि स्पंदनक बलसँ बहैत अनुराग-प्रेम-राग-द्वेष सब किछु एहि गामक
अन्तःसलिला धार थिकैक. हमरालोकिन ओही धारमे नहयबा लेल गाम अबैत छी. लगैए भौजीलोकनि
एहि गामक मोहार परहक सिंगारहारक गाछ छथि. हम अबैत छी, ओहि गाछक नीचासँ भरि आँजुर
फूल बिछैत छी. सिंगरहारक फूलक श्वेत पंखुड़ी जँ भौजीलोकनि छथि तँ फूलक डंटीक नारंगी रंग हुनकालोकनिक
प्रेम थिक.
नौकरीक कारण हम कतय-कतय ने गेलहुँ. पहिल बेर छौ मासक नौकरी लेल दिल्ली गेलहुँ,
दादा चलि गेलाह. लेहमे रही, तँ, माता अपन अंतिम गंतव्य दिसि विदा भए गेलीह. आब तँ
अपन परिवार क्रमशः सुन्न-जकाँ भए गेल अछि. ततबे नहि, एहि लंबा अवधिमे कतेक बेर
घर-आङन कमलाक बाढ़िमे भासिओ गेल, आ फेरि कए बनबो कयल. तैओ गामक जाहि माटि-पानिसँ देह
पुष्ट भेल अछि, तकर आकर्षण हमरा यदा-कदा
गाम दिस झिकैत रहल अछि. गामक माटिक गंध किताबक पन्नाक बीच जोगाओल सुखायल गुलाबक फूल-सन
सुगन्धि-सन मादक, आ मधुर थिक, ऊर्जाक श्रोत थिक. अपन आङनक क’ल केर मधुर पानि-सन मधुर पानि आन ठाम कहाँ
भेटल. ओकर मोह कहाँ छूटल.
अस्तु, एहि बेर कोनो व्याजें जूड़शितल दिन गाममे छी. पानि-पनिशाला, सतुआइनि,
जौ-टिकुला- जलसँ भरल घैलक दानमे सँ बहुत किछु बँचलो छैक, किछु विलुप्तो भए गेलैए.
बासि पाबनि दिन हमर पड़ोसिन हमरा लेल बड़ी-भात-तिलकोड़क पातक तरुआ आ आओर अनेक वस्तु
ल’ कए अइलीह. तखन स्मरण भेल, आब तँ ने माता छथि, ने पितियाइनिलोकनि. ने अपन
भाउजिलोकनि केओ गाममे छथि. भगवतीक सीरमे राखल पानि के माथ पर देतीह? के कहती
जुड़ाएल रहू?
एकाएक गामक बड़की भौजी स्मरण भए एलीह. हुनकर आङन हमर आङनसँ करीब चौथाई किलोमीटर दूर
छनि. जलखई-पनिपियाईक पछाति हम बडकी भौजीक ओतय पहुँचि गेलहुँ. बाहरेसँ हाक देलियनि.
हुनकर पुतहु हमर सोझाँ नहि अओतीह. भौजीक कोठलीक पुबरिया आ पछबरिया, दुनू केबाड़क
चारू पट्टा खुजल रहनि. पुरिबा हवामे पर्दा सब उड़ि रहल छलैक. कोठलीमे आओर ककरो नहि
देखि हम सोझे कोठलीमे प्रवेश केलहुँ.
हमरा अबैत देखि भौजी धड़फड़ा कए मसहरीक त’रसँ बहरइलीह: ‘डाक्टर
साहेब?’
‘आइ अहाँसँ माथ पर पानि लेबय आयल छी, भौजी.’ हम प्रणाम करैत कहलियनि, ‘आब हमरासँ
जेठि-श्रेष्ठ एतय आओर के छथि?
भौजी भरि पाँज कए पकड़ि लेलनि. कहलनि, ‘हँ, एहि बेर तँ वसंत सेहो पटना धेने
छथि.’
ओ झुकि कए बामा हाथें बिछाओनक कातमे राखल लोटा उठओलनि. दाहिना हाथमे आमक पल्लव
लेलनि आ लोटाक पानिसँ हमर माथ शिक्त करैत कहलनि, ‘जुड़ायल रहू. अहाँ तँ हमर छोटका
दियर छी.’
हमरा दाई स्मरण भए एलीह आ आँखिमे नोर आबि गेल. हम हुनका प्रणाम केलियनि आ झटकारनहि
आपस आबि गेलहुँ.
संदर्भ:
1. भारतेन्दु हरिश्चंद: गंगा-वर्णन
https://www.anhadkriti.com/bhartendu-harishchandra-poem-ganga-varnan accessed 03 May 2026.
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अहाँक सम्मति चाही.Your valuable comments are welcome.