अवामक डायरी, मार्च, २०२६
मार्च १८, २०२६. करीब साल भरिक
बाद गाम आयल छी. स्वास्थ्यकर जलवायु आ अनुकूल ऋतु; रातिमे बढ़िया जाड़क अनुभव भेल.
अनुमान नहि छल मध्य मार्चक बाद गाममे एतेक ठंडा हेतैक. जीन्स आ टी-शर्ट पहिरिकए आयल रही. गरम कपड़ा घरमे अछिओ कि नहि, से सोचब आवश्यक
नहि बूझि पड़ल छल. आब रातिमे खिड़की-केबाड़ निमुन्न कए बन्न कए दैत छियैक, तँ निन्न
भए जाइछ. तथापि इच्छा होइए कंबल जँ रहितैक! पंकज हमर भातिज गाम अयलाह आ एकटा कंबल
आ एकटा स्वेटर दए गेलाह. रातिमे कंबलक ऊष्मा सुखद लागल.
सुनल, एतय दू दिन पहिने धरि नवाह कीर्तन होइत रहैक. एक-एक टा गाछ पर
चारि-चारि, छौ-छौ टा स्पीकर. एहि दुखद ध्वनिसँ भगवान कतेक प्रसन्न होइत छथि, ओएह
जानथि. मुदा, जे गौआँलोकनि बेहरी देने
छथिन, तनिका घर धरि जँ कीर्तनक स्वर नहि पहुँचलनि तँ अगिला वर्ष ओ बेहरी किएक
देथिन. आब लाउडस्पीकरक आवाजसँ किनको निन्न नहि होइनि तँ गाममे भाङ आ दवाईक दोकानक
अभाव छैक! मुदा, नवाह कीर्तनक समाप्तिसँ जे शान्ति प्रतीत भेल से एकटा बोनस भेल.
भोरमे उठलहुँ तँ अपन बाड़ीमे तीन घौड़ कर फूटल देखलियैक. अङनाक समाङ, गुलाबख़ास
आमक सन्तति सेनुरिया आमक गाछक डारि घरक छत धरि ओलरि आयल अछि. सुखायल मज्जरक
बीच-बीचमे मसुरी आ मटर केर दानाक आकारक टिकुला देखि आश्वस्त भेलहुँ, एहि बेरुका
आमक फसिल भलहि पछिला साल-सन नहिओ होइक, तैओ जँ गाममे रहि गेलहुँ तँ खयबा जोगर आमक
अभाव नहि होयत.
अङनाक एक कोनमे नव पल्लव सबसँ लदल नान्हि
टा लीचीक गाछ प्रसन्नचित्त लागल. अपन लगाओल नेबोक गाछ एक वर्षमे आकारमे ततेक पैघ
नहि भेले, मुदा पात हरियर छैक. शीबू भाईक सोगाति, हौरसा/फालसा (Grevia asiatica)क नान्हि टा गाछकेँ स्वस्थ आ मुसुकाइत देखि संतोष भेल जे एहि गाछ-वृक्षक
हेतु हमर परिसर अनुकूल अछि. मूलतः माल- जालक अवर्यात नहि छैक.
हमर माता-पिता रहितथि तँ दोसरे बात रहितैक.माताकेँ गाछ-वृक्ष, लता-कंद-मूलक
ततेक परिचय आ ओकर सबहक औषधीय गुणक ततेक ज्ञान रहनि जे हमरालोकनिक आलयक कोनो कोनो
भैषज्य हुनका अपरिचित नहि रहनि. तकर कारणो छलैक; हुनकर दू सोदर- किरणजी एवं अनुज
कामिनीनाथ झा- सुयोग्य वैद्य रहथिन. अग्रज पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थकेँ सेहो
वैदागरीमे रुचि रहनि, आ ई सब भाई बाड़ीमे गाछ-वृक्ष आ जड़ी-बूटी लगबथिन. हमर पिताकेँ
फूल-पत्ती आ फुलवारीक बड्ड शौख. ओ खुरपी-कोदारि पकड़ि अपन बाड़ी-झाड़ीमे घंटो परिश्रम
करथि.
कचोट होइछ जे हमर बाड़ीसँ गाछ-वृक्ष,लताम-बड़हर-आँता-शरीफा-अनार-करोना-जामुन-जिलेबी
तथा अनेक प्रकार नेबो सब विलुप्त भए गेल. किछु बेर-बेर बाढ़िक दुष्प्रभाव आ दोसर
ताकुतक अभाव. गाछो-वृक्षकेँ मनुखे-जकाँ ताक-हेर चाहियैक, अन्यथा चाहे तँ दुर्द्धर्ष
पड़ोसी-जकाँ जंगल-झाड़ दाबि कए फुलबाड़ीकेँ नष्ट कय दैत छैक, छोट गाछ फूल-पत्तीकेँ माल-जाल
नष्ट कए दैत छैक, वा कखनो-काल, मनुखक हेतु गाछ-वृक्षक उपादेयतासँ अभिज्ञ घरबैया
सेहो गाछ-वृक्षकेँ काटि अपन परिसरकेँ चिक्कन-चुनमुन बना लैत छथि!
तैओ अपन हाथें नव-नव लगाओल गाछ सबकेँ स्वस्थ देखि हमरा एतबा विश्वास भेल जे आइ ने
काल्हि अपन बाड़ी पहिनहि-जकाँ विभिन्न फल-फूल अवश्य सजि जायत. हँ, आरंभमे जँ
दुइओ-चारि टा शरीफा, लताम, करोनाक गाछ लागि गेल तँ अपन परिसर चिन्हार-जकाँ लागय
लागत. आम, जामुन, बेल, कटहर, केरा तँ अछिए.
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गाम अबिते भोरुका टहलान शुरू कयल. सबसँ पहिने बाटक कातहि ‘पाँतरक पीपर’क हरियर-लाल
सुकोमल पात आकृष्ट केलक. हम गाममे जेम्हर देने जाइत छी, गाछ-वृक्ष, मनुख,
नेना-भुटका, युवक, कन्या, सांढ़ आ कुकुर धरिसँ गप्प करैत चलैत छी. सबसँ दोस्ती भले
नहि हो, संवाद तँ होइते अछि. भाषा भिन्न भले होइक, मुदा ज्ञान तँ सब प्राणीकेँ
होइछ. कुकुरक ज्ञानक तँ गपे नहि हो.
हमर सङबे शीबू भाई कहैत छथि: ‘हमरालोकनि माउगि-मेहरकेँ नहि टोकैत छियैक. अहाँक
दादा सेहो बाट-बटोहीकेँ टोकैत छलखिन.हम कहैत छियनि, ‘हम डाक्टर छी. आजीवन मनुखसँ
संवाद कयल-ए. सफल चिकित्सा लेल रोगीक संग निर्बाध संवाद ओतबे आवश्यक होइछ, जतेक सैनिक
अभियानक हेतु लेल सड़क. ऊपरसँ चिकित्सककेँ मनुखक नाड़ी परीक्षा करबाक हिस्सक होइछ. आ
मनुखे तँ थिक गामक नाड़ी. ओकरासँ गप नहि करबैक तँ गामक ह्रदयक स्पंदनक बोध कोना हयत!
स्वभावें गंभीर शीबू भाई चुप भए मुसुकी देबय लगैत छथि: माने, आब करू हमर नाड़ी
परीक्षा. कहू हम की सोचि रहल छी ?
हम सोचैत छी, शीबू भाई अहूँक गप-सप तँ हमरा गामक धुक-धुकी सुनबिते अछि.
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स्वच्छ वायु आ शान्त वातावरणक अतिरिक्त भोरुका टहलानक आओर अनेक लाभ छैक. किछु
गोटे फूल तोड़ैत हरि-स्मरण करैत छथि, तँ केओ सोझे ग्राम-देवता लक्ष्मीनारायणक
द्वारि पर पहुँचैत छथि. किछु युवक-युवतीलोकनि जनशून्य सड़क पर निर्बाध दौड़ैत छथि,
तँ, किछु गोटे सड़कहि पर छोट समूहमे योगासन सेहो करैत छथि. किछु खेतिहरलोकनि खेतक
आरि दिस जाइछ छथि, तँ किछु नेना-भुटका सूर्योदय-समकालहि ट्यूशन आ कोचिंग क्लास दिस
विदा होइत छथि.
अन्हारमे निकलैत काल मनुखक आवागमनसँ कुकुरक निन्न कामहि होइत छैक. कोनो-कोनो
कुकुर गुम्हरितो अछि. हमर स्टिक बक्सामे नहि भेटल. कहिओ काल हम बाटक कातसँ कोनो
कड़ची वा लकड़ीक ठहुरी उठा लैत छी. ओना एतय मोती नामक एकटा कुकुरसँ परिचयो अछि. एकरा पछिला दू यात्रासँ बाटक कातमे
बान्हल देखैत छियैक; बतर रुग्ण आ दुखी. भोरुका पहर जखन सब जीव-जन्तु उन्मुक्त रहैत
अछि, भोरुका वायुमे बौआय चाहैत अछि, तखन ई बान्हल रहैए. एहना स्थितिमे एहि नेना (कुकुरक)
मन दुखी हएब उचिते. हम लग जाइत छियैक, नाम कहि सोर पाड़ैत छियैक. सब दिन लग जा कए
हाल-चाल पुछैत छियैक. पुछैत छियैक: सुतल छें? सुतले रहबे?
हमरा रबीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता स्मरण भए अबैत अछि:
अर्र...र बकरी घास खो
छोड़ि गोठुल्ला बाहर जो
..........................
आँखि-पाँखि जकरा छै जगमे
भूख मरल की कहियो !
एतेक दिनमे एहि यात्रामे केवल एक दिन भोरमे मोती हमरा खूजल भेटल. मोन प्रसन्न
रहैक. हमरा देखिते हमर देह पर छरपय लागल. माने, आब मोती हमरा चिन्हैत अछि. हमहू
कनेक दुलार कए देलियैक.एतबो परिचयसँ पनुगल ई सामाजिकताक कोनो कम भेलैक. जखन मनुख
एकाकी रहैत अछि, तखन कुकुरो-बिलाड़िक संगति लोककेँ बताह हेबासँ बचबैत छैक!
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अवाम एवं पोखरभिंडा गामक बीचक बड़का बाधमे प्रवेश कयलासँ पूर्व लोक ग्राम-देवता
लक्ष्मीनारायणकेँ दूरहिसँ प्रणाम कए टहलान लेल आगू बढ़ैत अछि. किछु गोटे घुरतीमे
आरतीमे सेहो सम्मिलित होइत छथि.
एखन बिहार सरकार द्वारा एहि मन्दिर परिसरमे निर्माणक बड़का परियोजना चलि रहल छैक.
हमरा प्रसन्नता अछि जीर्णोद्धारक एहि परियोजनासँ एतुका दुनू वृद्ध पीपरक गाछक कोनो
अविघात नहि भेलैए: ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’.
हमरा हेतु इएह दुनू गाछ, चिन्हार थिकाह, चुम्बक थिकाह.
लक्ष्मीनारायण मन्दिरक ठीक उत्तर धनवती संस्कृत पाठशालाक बादक पुरान पीपरक गाछ लग
जे दुचारी स्कूल रहैक ताहीमे १९६० ई.भाईजी( स्व. रघुनाथ झा) हमर नाम लिखओने रहथि.
बोर्ड अपर प्राइमरी स्कूल, अवाम आ पाठशालाक पश्चिमक मखनाही पोखरि-विष्णुपोखरि-
एखनहु छैके. संस्कृत पाठशालाक आगूक इनारक कोनो अवशेष आब नहि छैक.
एक वर्ष एही संस्कृत विद्यालयक अंगनैमे वसंत पंचमी दिन प्रसिद्ध ध्रुपद गायक
पण्डित रामचतुर मल्लिक हारमोनियम बजबैत कविकोकिलक अमर गीत ‘आयल ऋतुपतिराज वसंत’ गओने रहथि. ने कोनो दरी,
ने कोनो जाजिम, ने कोनो संगत कयनिहार वादक, आ ने पैघ दर्शक समुदाय. हमरालोकनि-
नेना-भुटका- ओहिना जंहि-तंहि दौड़ैत-भगैत रही आ मल्लिक जी हारमोनियम बजबैत गबैत
रहथि. कोन ठेकान ओ महान कलाकार वाग्देवी आ लक्ष्मीनारायणक परिसरमे वीणावादिनीक वरदानकेँ
हुनकहि समर्पित करबाक भावसँ ओतय सीमित साज आ बिनु सभाकेँ अपन स्वरहिकेँ वाणी आ लक्ष्मीनारायणकेँ
समर्पण करबाक भावसँ ओतय ई गीत गओने होथि. ओहि दिनुका हुनक गायन आ भंगिमामे किछु एहन अवश्य रहैक जे ओ दिन आ ओहि दिनुका हुनक गायन,
गीत एहि तत्कालीन पाँच-छौ वर्षक नेनाकेँ- हमरा- एखनो स्मरण छैक.
जखन हमर स्कूलक दुचारी भवन जखन खसि पड़लैक, तखन क्लास लक्ष्मीनारायणक मन्दिर
सोझाँमे ठाढ़ दोसर विशाल गाछ त’र शुरू भेलैक.पीपरक शीतल छाहरि. चारू कात करबीर,
अड़हूल, कनैल, कटहरिया इत्यादि फूल गाछ. गाछ त’र अजस्र कनैलक बीया. तथापि, तकर मोल
रहैक, ओहि ले’ झगड़ा होइक. गाछक डारिक आदर रहैक.
चटिया- छात्र- सब भूंइये पर, बोरा-सपटा-खजूरक चटिया पर बैसय. मास्टर साहेबलोकनि
बेंचपर. प्रायः एकटा कुर्सीओ रहैक.
जटही पोखरिसँ छात्र सबकेँ अनेरे डर होइक. जटही पोखरिक दछिनबरिया मोहार पर श्मसान
रहैक. भूत-प्रेत सबसँ डर कोना नहि होइतैक. ऊपरसँ धारणा रहैक जे जटही पोखरिमे गोहि छैक,
नेना सबहक टाङ घीचि लैत छैक. दोसर पोखरि, मखनाही पोखरि रहैक गहींड़. मखानक पातसँ
पाटल. कतहु पक्का घाट नहि. मुदा, गेनहि कुशल. कतहु शौचालयक नाम नहि. विद्यार्थी वा
शिक्षक, खोलू ढेका उतरू पार!
हमर जेठि बहिनि, शीला दाई हमर गार्जियन रहथि. हम स्वभावसँ चंचल रही, गछचढ़ा सेहो.
उकठ-अपराधक कनेको संदेह भेने, लाल बहिन कहथि,’ मायकेँ कहि देबैक. हम सटक सीताराम!
सत्ये, डरबुक आ अनुशासित बच्चा लेल ई कोनो छोट धमकी भेलैक! मुदा, कन्या रहथि ने,
पाँचवाँ वर्गक परीक्षा पास भेलीह, बियाह भेलनि, सासुर बसय लगलीह आ ओतहि माटिमे
मिलि गेलीह.
क्रमशः
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