Tuesday, September 22, 2020

वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में विद्यापतिक प्रासंगिकता

वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में विद्यापतिक प्रासंगिकता

समान सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य पयबाले समाजमें वैचारिक भिन्नता जनतंत्रक रीति थिकैक. किन्तु, प्रत्येक परिस्थितिमें सर्वसम्मत उद्देश्यकें पयबाले सामाजिक सौहार्द्र आवश्यक छैक. एहन समाज जाहिमें सब सुरक्षित अनुभव करय, आ सबकें होइक जे ई समाज अपने थिक, देश अपने थिक, आदर्श समाज थिक. किन्तु, तात्कालिक राजनैतिक वा व्यक्तिगत लाभ ले व्यक्ति, व्यक्तिसमूह, वा राजनितिक दल अनेको बेर एहन कृत्य करैत छथि वा एहन कृत्यकें  बढ़ावा दैत छथि जाहि सं सामाजिक सद्भावकें ठेस पहुँचैत छैक. अपना प्रति भेल नव वा पुरान अन्यायक बोध कतेक बेर एहि गतिविधिक औचित्य-जकां प्रस्तुत कयल जाइछ. मुदा, समाजमें समरसताक अभावसं भेल समाजक तात्कालिक आ दूरगामी अहित तं सब कें देखबा में अबिते छैक.

इतिहास विदित अछि, यूनानी-तुर्क-मंगोल-अफगान आक्रमणकारी पहिने आर्थिक लाभ, आ पछाति धर्मप्रचार ले भारत आयल छल. भारतक समाजपर ओकर प्रभाव सर्वविदित अछि. इतिहासक ओही कालखंडमें मिथिला सेहो गयासुद्दीन तुग़लक आक्रमणक शिकार भेल. राजा हरि सिंह देवकें सेहो मिथिला छोडि नेपाल भागि जाय पड़लनि. पछाति, मिथिलाक राजा आ विद्यापति ठाकुरक आश्रयदाता  राजा शिव सिंह सेहो दिल्लीक सुल्तानक हाथें पराजित भेलाह. सुल्तान शिव सिंह के पकडि दिल्लीओ ल’ गेल छल. अर्थात् विद्यापति आश्रय दाता आ हुनक आस्थाक ‘ रूप नारायण’ मुसलमान सुल्तानक हाथें अन्यायक  शिकार भेल रहथि. ई सब इतिहास विदित अछि. तथापि,  कालजयी कवि आ शास्त्रकारक रूप में जखन विद्यापति पुरुष-परीक्षा लिखय बैसैत छथि, तखन शास्त्रकारक रूप में जखन ओ मनुष्यकें मात्र मनुष्य बूझैत छथि, तखन हुनक निरपेक्षता देखबा योग्य अछि. एतय हम विद्यापति ठाकुरक पुरुष-परीक्षाक तेसर कथा दयावीरक कथाक चर्चा करैत छी.


 ‘दयावीरक कथा’ पुरुष-परीक्षाक तेसर कथा थिक. एही कथामें  राजा हम्मिर देव आ यवन सुल्तान अलावदीन आ ओकर प्रधान सेनापति महिमा साहीक कथा अछि. ई कथा आब कविकोकिल विद्यापतिए मुँहसं सुनू :

यमुनाक किनेर पर योगिनीपुर नामक स्थानमें अलावदीन नामक एकटा मुसलमान सुल्तान रहैत छल. ओकर  प्रधान सेनापतिक नाम महिमा साही रहैक. एक दिन कोनो कारण सं अलावदीन अपन प्रधान सेनापति महिमा साही सं असंतुष्ट भ’ गेल. सुल्तानक स्वभावसं परिचित महिमा साही सोचलक जे गुप्तचर, साँप आ राजा व्यवहारक कोनो ठेकान नहिं. कारण, राजा बिनु सोच-विचारहुक अचानक प्राण हरि सकैछ. अस्तु, महिमा साही प्राण रक्षाक हेतु सपरिवार समीपक राजा हम्मिर देवक शरणमें अयलाह आ प्रार्थना केलनि, जे सुल्तान अलावदीन अकारण प्राण लेबाक हेतु आतुर छथि. अस्तु, हम अहाँक शरणमें आयल छी. जं, अपने हमरा हमलोकनिकें  प्राण रक्षाक वचन दी, तं, बेस, अन्यथा हम कतहु अंतय चल जाइ. महिमा साहीक एहि प्रार्थना पर दयालु राजा हम्मिर देव कहलथिन, ‘ अहाँ शरणागत छी. अतः, तें, निर्भय भ’ एतय रहू. हम वचन दैत छी, जा धरि अहाँ हमर शरण में रहब, सुल्तानक कोन कथा यमराजहु अहाँक कोनो अहित नहिं क’ सकताह. ’ आ महिमा साही सपरिवार  निर्भय राजाक शरण में रहय लगलाह. किन्तु, शीघ्रे जखन सुल्तान अलावदीनकें महिमा साहीक राजा हम्मिर देवक शरणमें हयबाक सूचना भेटलैक तं  ओ क्रोधमें सोझे राजा हम्बिर देवक  किला पर आक्रमण क’ देलक. किन्तु, राजा हम्मिर देवक किला एहन दुर्भेद्य रहनि जे निरंतर तीन वर्षक अवधि तक युद्धक पर्यन्त  अलावदीन राजा हम्मिर देवकें पराजित करबामें सफल तं नहिंए  भ’ सकल, एतेक  लम्बा अवधिमें अलावदीन सेना मरैत-खपैत आधा भ’ गेलैक. एहिसं अंततः ओकर ओकर मनोबल टूटि गेलैक आ  अन्ततः सुल्तानक निराश भय आपस हेबाक निर्णय क लेलक. किन्तु, एही समयमें राजाक विरुद्ध  एकटा नव गप्प भ’ गेलनि: राजा हम्बिर देवक दू गोट असंतुष्ट मंत्री, रायमल्ल आ रामपाल, राजाक शत्रु सुल्तान अलावदीन लग गेलाह आ ओकरा सं हम्मिर  देवक किलाक गोपनीय वस्तुस्थितिक सूचना देबाक निवेदन करैत कहलथिन, ‘अहाँ निरर्थक आपस जेबाक गप्प करैत छी. हमरा लोकनि वस्तुस्थिति सं परिचित छी. दुर्गक स्थिति नीक नहिं छैक. ओतय शीघ्रे अन्न-पानिक भयानक अभाव हेबापर छैक. अस्तु, अहाँ आपस जेबाक विचार छोडि, हम्मिर देवक किलापर पुनः आक्रमण करी.  अहाँक  विजय निश्चित अछि.’ एहि पर अलावदीन खूब संतुष्ट भेल आ मंत्री लोकनिकें उचित पारितोषिक द’ बिदा केलक. बढ़ल मनोबलक स्थिति में अलावदीन,  चेतावनीक संग, तुरत अपन दूतकें सेहो हम्मिर देवक दरबारमें  पठौलक. सारांश ई जे ‘ एखनहुँ,  जं, अहाँ महिमा साहीकें हमरा हाथ सुपुर्द क दी, तं, हम आक्रमणक विचार छोडि देब. अन्यथा, महिमा शाही तं मरबे करत, काल्हि भोरे अहाँक किला सेहो भूमिसात भ’ जायत !’ मुदा, राजा अपन संकल्प पर दृढ़ छलाह.  तथापि, दूत कें अबध्य  बूझि ओकरा तं कोनो दण्ड नहिं देलखिन, किन्तु, शरणागत महिमा साहीके शत्रुक हाथ देब अस्वीकार करैत, ओही दूतक माध्यमसं सुल्तानअलावदीनकें अगिला दिन भोरे युद्धक हेतु  प्रस्तुत रहबाक हेतु चेतावनी सेहो पठा देलखिन. ई घटना विदेशी मुसलमान आ हम्मिर देवक शत्रुक पूर्व सेनापति, महिमा साही ले विस्मयकारी छलैक तं छलैके, सम्भव छल, राजाक विचित्र संकल्पसं राजाक मंत्री लोकनि सेहो असहमत होथि. अस्तु, राजा  अपन मंत्री आ सेनापति लोकनिकें एकत्र कय अपन सेनापति यज देव कें कहलथिन, ‘ हम शरणागतक रक्षाक हेतु कृतसंकल्प छी, आ काल्हि भोरे सुलतान पर आक्रमण करबे करब. किन्तु, अहाँ लोकनि म सं जं केओ एहि युद्धकें निरर्थक बूझैत होइ, तं, युद्धसं पहिनहिं एतयसं अंतय छल जाइ.’ किन्तु, मंत्री आ सेनापति लोकनिकें राजाक निर्णय पर कोनो शंका नहिं रहनि, तें,  ओ लोकनि  राजाए-जकां कृतसंकल्प रहथि . अस्तु, ओलोकनि एके स्वर में रजाक समर्थन करैत कहलथिन, अपने जखन एकटा  यवनक प्रति केवल दयाभावें रणमें अपन प्राण उत्सर्ग करय चाहैत छी, तखन शंका कोन ?  अपने निर्दोष छी. हमरा लोकनि अपनहि सं पालित छी. प्राणक भय सं अपनेकें रणमें  एसगर छोडि, हमरा लोकनि कोना कय कापुरुष कहायब ! अस्तु, काल्हि भोरे, अपनेक संग हमरा लोकनि सब गोटे एकभय शत्रुपर प्रहार करबैक. किन्तु, अपने जकर रक्षा करय चाहैत छियैक, युद्धक कारण जं तकरे रक्षा नहिं भ’ सकतैक तं युद्ध निरर्थक भ’ जायत. तें, अपने एहि यवनक सुरक्षाक हेतुहिनका लोकनिकें  कतहु अंतय पठा दिअनि.’ एहि पर  यवन सेनापति महिमा साही बजलाह, ‘हे राजा, अपने हमर-सन विदेशी ले एहन हानि किएक सहब. अपने हमरा सबकें अलावदीनक हाथें सौंपि दी आ  अपन स्त्री-पुत्र आ राज्यक नाशसं बंची.’ एही पर राजा हम्मिर देव विचारलनि , शरीर नाशवान थिक. तें, जं कोनो अमर कीर्ति एहि शरीर सं संभव छैक, शरीरके बंचा कय कोन पुरुष तकर त्याग करत.’ तथापि, ओ महिमा साही कें कहलथिन, ‘हं, जं अहाँ चाही, तं अहाँकें अपना हेतु जे स्थान सुरक्षित प्रतीत हो, अहाँके सपरिवार हम ओतय पठा दी.’ मुसलमान महिमा साही बाजल, ‘ हे राजा, हमरा कोनो दुविधा नहिं. देखबैक, काल्हि भोर युद्धमें  अहाँक संग शत्रुक समक्ष सबसं आगाँ हमही रहब. मुदा, हमर परिवारकें चाही तं अपने कतहु सुरक्षित स्थान पर पठा सकैत छियनि. किन्तु, महिमा साहीक परिवारक केओ अंतय जायब स्वीकार नहिं केलनि. अंततः, दोसर दिन सुल्तान अलावदीन आ राजा हम्मिर देवक बीच  घमासान युद्ध भेल. आ अंततः, दयालु राजा हम्बिर देव शरणागत यवन, महिमा साहीक प्रति दयालुताक कारण सर्वस्व सहित अपन प्राण न्यौछावर कय अमर-कीर्ति अर्जित केलनि.[1]

हमरा जनैत, जाहि में कथा में, विद्यापति ठाकुर, हिन्दू राजा द्वारा शरणागत आक्रमणकारी मुसलमानकें आश्रय द’  अपन राज्य आ प्राणक आहूति देबाक घटनाकें राजाक ‘पुरुषार्थ’क प्रमाणक रूप में प्रस्तुत  कयने छथि, ओहि कथामें  सन्निहित संदेशकें स्पष्ट करबाक हेतु आओर कोनो व्याख्याक आवश्यकता नहिं. कारण, अजुका विखंडित होइत समाजक  हेतु एहि कथामें निहित विद्यापतिक कालजयी संदेश स्पष्ट अछि. 

1. Grierson GA.  The Test of A Man being the Purusha-Pariksha of Vidyapati Thakkura, 1935; London: The Royal Asiatic Society pp 9-12.

Saturday, September 12, 2020

हमर गाम-अवाम, आ आम

                               हमर गाम-अवाम, आ आम

हमर गाम- अवाम गामक नाम अवाम किएक पड़लैक से कहब मोसकिल.किन्तु, एहि तीन अक्षरक शब्दम सं जं ‘व’ हंटा दिऐक तं ‘आम’ बंचतैक. आम माने फलक राजा. सत्यतः, जं अवाम गामक नाम आमक गाम रहितैक तं कोनो बेजाय नहिं. तकर कारणों छैक; हमरा लोकनिक ज्ञान-प्राणमें जेमहर देखिऐक सर्वत्र गाछीए आ कलम-बाग़. बस्तीक नाम पर घोदा-माली घर केर छोट-छोट टोल आ चारू कात आमक बाग़. अवाम गाममें जतय बस्ती आ गाछी कलम नहिं रहैक, ततय पोखरि सब रहैक. बस्तीक उत्तर नासी रहैक. नासी माने, नदीक छाड़न व वाहा, जकर संपर्क कमलाक मुख्य धारसं कटि गेल होइक. बरसातमें इएह नासी पानि सं भरि जाइत छलैक आ पछाति, ऋतुक अनुकूल ई अजस्र भेंटक फूलक सरोवर, माछक आ धानक श्रोत छल. सत्यतः, जं अवाम कोनो राजाक गढ़ होइतनि तं राजाकें उत्तर भर सीमाक चिन्ता किछु कम अवश्य होइतनि ! मुदा, एखन अवामक आमक गप्प करी.

पछिला शताब्दीक मध्यमें अवाममें आमक जे गाछी, कलम आ नरै रहैक, ताहि म सं कोनो, गाछक आकार-प्रकारक अनुमानसं सौ सालसं कम आयुक कदाचिते छलैक. हमरा लोकनिक माता-पिताओक जीवन कालमें रोपल गाछी कलम सेहो थोड़े रहैक. जतय  गाछी-कलमक गाछ कटि गेल रहैक लोक नव गाछ रोपैत छल. ओना गाछी-कलमकेर नाम किछु भू-स्वामीक नाम पर रहनि, तं, किछुकें लोक रखबारक नाम सं चिन्हैत छल. किन्तु, हमरा गामक सबसँ  विशाल बड़का आमक बगीचा छल, बड़की नरै. ताहि सं छोट, किन्तु, किन्तु, चारि सौ गाछक कलम छल, किशोरी झाक कलम, जे एखन धरि बंचल तं अछि, किन्तु, जमीन पर जनसंख्याक दवाबक कारण आम गाछक नीचा मालिक लोकनि जजात उपजबैत छथि. एहि सं आमक फड़ब पर की असरि पड़लैक अछि, से कहब कठिन. आन  पैघ कलम-गाछी सबमें छल- इंद्रनाथ बाबूक कलम, बौअन ठाकुरक बीजू, आ छोट सब में  ठेंगी झा गाछी, आदि. कटलाहा गाछी, भोली बाबू गाछी, आ बोनही गाछी- तहियाक श्मसान- निरंतर कटैत आ विलुप्त होइत गाछी सबहक इतिहास आ साक्षी छल जाहि में गाछ तं रहैक नहि, किन्तु, ओतुका न-खेतीक नाम गाछीक नामकें जोगाकय रखने छल. किन्तु, एहि सब नामित बगीचाक अतिरिक्त अनेक पैघ-पैघ अनामा गाछी कलम गाओं के बड़का आम्रकुञ्जक बीचक बस्तीक पर्याय बनाकय रखने छल.

अब अवाम गामक गाछी-कलम-नरैक आमक गप्प करी. गाछी-कलम में कलमी आ सरही दुनू आमक गाछ रहैक. बम्मै, सपेता, जर्दालू. कृष्णभोग, लडूब्बा, कलकतिया मिथिलाक प्रचलित आम थिक, जाहि म सं जं किछु केर नाम वर्ण पर- सपेता सफेदाक अपभ्रंश छल, तं किछु स्थान सं जुड़ल, जेना बम्मै, कलकतिया, किछु मनुष्यक नाम सं , जेना कृष्णभोग आ फज़ली आ किछुक नाम आकार पर आधारित छल, जेना, आ लडूब्बा आ सजमनिया. तथापि, कलमी आममें संख्यामें आ लोकप्रियतामें सपेता आ कलकतियाक गाछ बेसी रहैक . सपेता अत्यंत मधुर, गुदगर, पातर खोंइचा आ सोन( fibre) सं मुक्त. कलकतिया रंगमें गाढ़ हरियर, आकारमें पांच इंच धरि आ स्वादमें बेस, अर्थात् साधारण. मुदा, कलकतिया क गुण ई जे कलकतियक गाछ प्रतिवर्ष थोड़बो फड़बे करत. आन आमक गाछमें तकर गारंटी नहि.  तें, जनिका गाछ लगेबाक भूमिक अभाव होइनि से बेसी कलकतिया रोपथि आ ‘ पाल परहक कलकतिया सपेताक बाप होइछ’* से कहि चुप करथि.  बल्कि,जं पानि-बिहाडिक प्रकोप के छोडिओ दी तं आमक नीक फसल साधारणतया प्रत्येक तेसरे वर्ष पर देखल जाइछ. अवाम गाम में जर्दालूक गाछ कम रहैक,  बेतिया इलाकाक विशिष्ट आम ज़र्दा एकदम एकदम नहिं.  तथापि, सुपरिचित आमक अलावा किछु गोटे आवेशें अपन गाछी-कलममें कतिकी, दोफसिला, राढ़ि, चौरबी- काँचेमें मधुर स्वाद बला- गुलाबखाश, हाफुस- प्रायः अलफोंसो, सेहो लगौने रहथि. मुदा, जहाँ धरि मन पड़ैत अछि हमर गाममें सिपिया आ शुकुल-सन अंतमें पकबाबला आम कतहु नहि रहैक. तथापि, ई सब भेल कलमी- grafted – आम भेल. मुदा, हमरा अनुमान अछि अवाममें कलमी सं बेसी सरहीए  वा बीजू ,अर्थात् बीज वा आंठी सं जनमल, आमक गाछ बगीचा-  अनुपातमें बेसी रहैक. कारण, बूझब असंभव नहिं. कलमी आम लगेबा ले आमक कलम कीनू. आ सरही ले तकर आवश्यकता नहिं, जे आम पसिन्न पड़ल तकर आंठी रोपि दिऔक. सरही आम वर्णसंकर भेलाक कारण काफी pest-resistant होइत छैक आ फड़इत बेसी छैक. स्वादमें सेहो विविधता. तकर चर्चा पुनः हयत.

एहि सबहक बावजूद धनिक सं गरीब धरि जकरा जतबे भूमि रहनि, दसो गाछ नवगछुली अवश्य रोपैत रहथि. भूमि नहिं रहैक तं बास भूमिएमें, घरक आगूए-पाछू गौआं लोकनि गाछ रोपथि. हमर माता कहथि, ‘गाछ लगयबाकें लोक धर्म बूझैत छल; खास कय आमक गाछ रोपबकें’ . कहथिन, ‘वर्षा-ऋतुमें अपन लगाओल गाछक पात परसं खसैत पानिक बुन्न, रोपनिहारकें स्वर्गमें मधुक रूपमें भेटैत छनि ! तें, जखन भगवान दत्त** बाबूक बीजू जखनि रोपल जाइत रहनि, तं हुनकर परिवारक बौअसिन लोकनि कहार-सवारी पर चढ़ि कय गाछी धरि आबथि आ खूनल दरी ( गड्ढा ) में कनरी (माटि) सहित काटल गाछ द’  कय आपस जाइत जाथि’. हमरा जनैत, प्रायः उपादेयताक कारण,  गाछ रोपब कें आमक गाछ रोपबसं, आ प्रकृति-प्रेमक कारण, समाज गाछ रोपबकें धर्म-पुण्यसं जोडि देने रहैक.आखिर तकर आवश्यकताओ रहैक. जाहि युगमें जतय लोककें नगदी आमदनी कम रहैक, लोक जे उपजबैत छल, सएह खाइत छल. सब आदिम समाजहुमें इएह गति रहैक. तें, देहाती जीवन में जखन परिवारक समृद्धिक लेखा-जोखा होइत रहैक तं लोक डीह-डाबर, खेत-पथारक संग गाछी-कलम, बाँस-खड़होरि, जलकर आ पोखरिक गणना अवश्य करथि. कारण, गुजर-बसर ले जे किछु चाही, से वस्तु जतेक कम किनय पड़य, परिवार ओतेक समृद्ध भेल.  सतत ( sustainable ) अस्तित्व ले ई आवश्यको.

आब आमक स्वादक गप्प करी. भिन्न-भिन्न आमक स्वाद जं बुझबाक, बुझयबाक एकेटा तरीका छैक- आम गुदगर होइक तं आमक कतरा मुँह में दिऔक,  आ रसगर होइक तं मारू चोभा ! विश्वास नहिं हो तं आम में चोभा लगबैत नेनाक मुँह पर संतुष्टि देखिऔक. ओना जतेक, आम ततेक स्वाद. समान नामक कलमी आमक आकार, रंग आ स्वादमें लगभग सबतरि एकरूपता होइछ. ओना गाछ पुरान भेलासं वा गाछक जडिमें बरसात में पानि जमा भेलासं आम में सोन( fibre) भ’ जायब स्वाभाविक बूझल जाइछ. तथापि, किछु स्वाद परिचित आ वर्णन योग्य होइछ, जेना, सुरसुरहा- खयलासं कंठमें सुरसुरी लागत, धुमनाहा, माने धूमनक सुगंधिबला. मुदा, ई सब नाम सरही और बीजूए आम ले प्रयुक्त होइत छल. असलमें जेना पहिने कहने छी, स्वादक आ नामक विविधता बीजूए में भेटत. कारण, स्वाद जं वर्णसंकरताक कारण, जेनेटिक संरचना, आ प्रकृति- जलवायु- निर्धारित करैछ, तं नाम मनुष्यक कल्पना, आमक आकार, स्वाद, रंग आ पकबाक मासक सहयोग सं देल जाइछ. उदाहरणक हेतु आकारक अनुसार नाम- सजमनिया, केरबी ( केरा –सन ); बरबरिया- सुपडिया आकारमें छोट ; रंगसं सिनुरिया, पीरी- पियर; स्वाद पर मिश्री भोग, पकबाक मास पर भदैबा, आदि . एकर अतिरिक्त आमक नाम में नारायण भोग, आ ह्रदयजुड़ओना सेहो सुनबैक. संभव छैक बड़का बाग़ सब में कोन परहक गाछ कोनैला , दू टा मुख्य शाखा बला वृक्ष दूफेंडा सदृश आ किछु अनामा फल सेहो अभडय. ओना समाजमें प्रचलित धारणा रहैक जे मनुष्यक, आमक, धानक आ गामक नामक गणना नहिं भ’ सकैछ.

संयोग सं हमरा लोकनिक जीवन कालमें जनसंख्या आ खेत-खरिहानक बंटवाराक असरि गाछी-कलम आ बगीचा पर सेहो पड़लैए. ई सर्वविदित अछि. एहि में बंटवाराक अतिरिक्त गाछक काटब आ रोपबमें कमीक योगदान तं छैके, एहि सबमें गाम सं युवा वर्गक पलायनक योगदान सेहो छैक. कारण, मनुखे-जकां गाछ-वृक्षके सेहो सेवा आ देखभाल सेहो चाहियैक. यद्यपि, ई सत्य थिक, आमक गाछ एकबेर पैघ भेलापर बेसी सेवाक मांग नहिं करैछ. तथापि, एखनुक युगमें देहातमें बहुतो फड़ैत गाछ कीड़ा- गड़ाड सं, आ दिबाड ( दीमक ) क कारण सुखा रहल अछि, से हमर अपन अनुभव कहैत अछि. तें, देखभाल चाहबो करी.  मुदा, जखन आब नेना-भुटका आ युवक वर्ग आमक उपभोग धरि ले गाम नहिं आबि पबैत अछि, तहना स्थितिमें गाछी-कलमक सेवाले समय निकालब तं असंभवे. तें, परिस्थितिवश गाम आ गाछी–कलमसं लोकक अपनापन थोड़ भेलैये. पहिलुक युग में नेना-भुटका आ चेतन आम पकबाक मासक प्रतीक्षा तं करिते छल, आमसं संबंधित पूरा ऋतुक अनेक गतिविधि आमक गाछ पर टिकुला अबिते आरंभ भ’ जाइत रहैक. जं चटनी ले लोक  टिकुला बिछैत छल तं महिला लोकनि  कांच आमक आमिल-अचार-खटमिट्ठी बनबैत छलीह. एखनो ओहि विन्यासक जं अलग इतिहास आ वर्तमान छैक, तं आमक गाछीमें कांच-पाकल आम बिछ्बाक, आ चोराकय आम बिछबाक रोमांच , आ गाछसं लटकैत झूलापर झुलबाक धिया-पुताक आनंद हमर पीढ़ीक अनेको व्यक्तिक हेतु बाल्यकालक स्मरणक मधुर धरोहर थिक. ततबे नहिं, आमक गाछी, रखबारक मचान, बगबारक खोपड़ी कतेको ऐतिहासिक सम्बन्ध, बाल-मनक गोपनीय आनंदक साक्षी बनैत छल, नहिं तं ‘आम खयबाक मुँह’ आ ‘आमक जलखरी’-सन पोथीक रचना कोना होइत. मुदा, एखनो गाछी-कलम तं छैके.लोक आम खाइतो अछि. तथापि, प्रायः गामक आमक बेसी खपत गाम सं बाहरे होइछ. हमरो लोकनि के खयबा जोकर जे गाछ अछि, मन नहिं पड़ैत अछि कहिया खेने रही.

आब तं मिथिला सं बाहर रहबाबला परवर्ती मैथिल पीढ़ीकें मिथिलाक आमक विविधताक  संस्कृति सं जोड़ब एकटा कठिन काज थिक. भ’ सकैत अछि, गाम सबमें  सुधरैत आधारभूत संरचना, शिक्षा आ स्वास्थ्यक सुविधामें सुधार, यातायातक सुविधा, आ शहरी जीवनक कष्टक कारण फेर लोक गाम दिस आबय आ परिस्थिति बदलैक. किन्तु, निकट भविष्यमें एकर आशा कम. संभव इहो छैक, उत्तर प्रदेश आ आन राज्य-जकां जं पैघ बगीचाबला किसान जं आमक गाछी-कलम में फार्म हाउस-सन सुविधाक व्यवस्था करथि, आ मैंगो-टूरिज्मक विकास हो तं स्थिति बदलय. एहि सं आर्थिक लाभक आशा तं छैक, किन्तु, बिना सोच आ आर्थिक निवेश के ई असम्भव. एखन तं एहिना प्रतीत होइत अछि, रॉकेटक गति सं उड़इत मनुष्यक जीवन में क्षण भरि बिलमि कय जीवनक सुलभ आनंदक उपभोग ले समय कतय ! तें, हमरा अपन गाम अवामक आम मन पड़ैत अछि आ एकरा हम लीखि लेल. मिथिलाक आम पर किछु लिखबाक प्रेरणा हमरा स्व. मिहिर कुमार झा, जे स्वतंत्र भारतमें पहिल मैथिल आइ.पी. एस. अफसर रहथि, सं भेटल छल. तें, ई संस्मरण हुनक प्रति हमर श्रद्धांजलि थिक.

 ज्ञातव्य थिक, सदासं मिथिलाक जलवायु आमक हेतु अनुकूल अछि. इतिहास विदित अछि, मुगल बादशाह अकबर दरभंगा इलाकामें एक लाख आम गाछक ‘लाख बाग़’ लगबओने रहथि. इहो विदित अछि, आमक बागवानी पुर्तगाली लोकनि भारतहिंसं दक्षिण अमेरिका, आ मुगल लोकनि पर्सिया धरि ल’ गेल छलाह.

* हमर स्वर्गीय अग्रज उदयनाथ झाक अनुसार ई उक्ति स्व. डाक्टर सुभद्र झा क थिकनि.

** भगवान दत्त झा, अवाम, दरभंगाक अंतिम महाराज सर कामेश्वर सिंहक माम लोकनि म सं एक रहथिन.

         

   

 

  

Wednesday, September 9, 2020

मुँह बान्हल भगवती: चिदंबरम्, तमिलनाडुक तिल्लै काली

 

मुँह बान्हल भगवती: चिदंबरम्, तमिलनाडुक  तिल्लै काली

उत्तर भारतमें काली पूजक आ शाक्त लोकनिक बीच कालीक छवि अनचिन्हार नहि; एक हाथ में खड्ग,दोसर हाथ में नरमुण्ड, गरदनि में मुण्डमाल, आ डांडक नीचा,  काटल बाँहि सबकें गाँथिकय बनाओल घघरीक अतिरिक्त नग्न शरीर. तथापि, कतहु कालीक मुँह बान्हल नहि देखबनि. किन्तु, भयानक कालीक संहारक भयसं कतहु कालीक मुँह कपड़ासं कसि कय बान्हल होइनि तं से अजगुत लागत कि नहि ? अवश्य. किन्तु,एहन अजगुत देखबाक हो तं आइ चलू हमरा संग, तमिलनाडुक  चिदंबरम् नगरक तिल्लै काली अम्मन- काली कें देखि आबी. ज्ञातव्य थिक, चेन्नई सं करीब सवा दू सौ किलोमीटर, समुद्रक पूर्वी तटक समीपे बसल चिदंबरम् शहर नटराजक मन्दिर ले विश्वप्रसिद्द अछि. एहि ठाम समुद्रक तट दिस पानिमें सदाबहार जंगल छैक जकर गाछसबकें तमिल भाषामें तिल्लै कहैत छैक. कहल जाइछ, पहिने एहि शहरमें एहि गाछक बहुलता रहैक. आ एखनो एहि शहरक समीपक पिच्चावरम mangrove forest लोकप्रिय पर्यटन स्थल थिक. एहि हेतु एतुका प्रसिद्द शिव मन्दिर तिल्लै नटराज मन्दिर आ काली मन्दिर तिल्लै काली मन्दिरक नाम सं जानल जाइछ. आब शहरक गप्प छोडि एतुका कालीक गप्प करी आ सुनी हिनकर मुँह किएक एतेक निर्ममतासं बान्हल छनि.


किंवदंति छैक एक बेर शिव आ पार्वती (शक्ति) में बजरि गेलनि जे दुनू म सं के पैघ. मन राखी, मनुखे-जकां, सर्वगुण संपन्न देवता लोकनि इर्ष्या, द्वेष, अहंकार-सन मानवीय अवगुणसं परे नहि छथि. अस्तु, निर्णय भेल जे, शिव आ पार्वतीक बीच के पैघ तकर निर्णय, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता लोकनिक समक्ष, तमिलनाडुक चिदंबरम् नगर स्थित नटराज शिवक मन्दिरक परिसर में आयोजित शिव आ शक्तिक बीच नृत्य-स्पर्धा सं हो. जे हारल से नगर छोडि नगरक बाहर बास करथि. धारणा छैक, एहि नृत्य-स्पर्धामें नटराजक नामसं विभूषित, नृत्यमें पारंगत शिवक पराजय लगभग निश्चित भ’ चुकल रहनि. अपन आसन्न पराजयकें देखैत शिव स्पर्धाक नियमक प्रतिकूल एकाएक उर्ध्व-तांडव नृत्य, जाहिमें एक पयरकें माथ धरि उठयबाक  मुद्रा ग्रहण करय पड़ैत छैक, आरम्भ क’ देलनि.


नारि सुलभ अनुशासनक अनुकूल, पार्वतीकें उर्ध्व तांडवक नृत्यक ई मुद्रा अवांछनीय बूझि ओ क्रोधमें हारि मानि लेलनि. फलतः, पूर्व निर्धारित निर्णयक अनुकूल पार्वतीकें नगर त्यागि नगरक बाहर जाय पड़लनि. किन्तु, शिव द्वारा कयल छद्म हुनका हेतु असहनीय भ' गेलनि आ रोषमें पार्वती एहन विनाशकारी  विकराल स्वरुप धारण केलनि जे सब भयभीत भय गेल. अंततः, ब्रह्मा कहुना वेद पाठ  आ प्रशस्ति गानसं हुनका संतुष्ट तं केलिन, किन्तु, हुनक एहन भयानक स्वरुप कारण विनाशक भय सं भयभीत भक्त लोकनि हुनक मुँहकें साड़ीक अन्नेक भत्तासं नीक-जकां निमुन्नक कय बान्हि देलकनि. चिदंबरम् नगरमें प्रसिद्द नटराज मन्दिर सं थोड़बे दूर, ओही शहरक  एक भाग स्थित तिल्लै काली मन्दिर में शक्तिक चारि टा स्वरुप म सं एक टा स्वरुप-काली-पार्वतीक  कुपित  स्वरुप थिक. कहल जाइछ शिव आ शक्तिक बीचक स्पर्धामें शक्तिक पराजय शिव-भक्त तमिलनाडुमें शक्ति-पूजा, जे तमिलनाडु में कहिओ गौड़ प्रदेशसं आयल छल,  केर सांकेतिक पराजय आ तमिलनाडु सं शक्ति-पूजाक निष्कासनक प्रतीक थिक.                    

संयोगसं लेह, लद्दाखमें हवाई अड्डा लग स्पितुक गोम्पाक कालीक छवि सेहो साल भरि झाँपल तं रहैत छनि, किन्तु, साल में केवल दू-तीन दिन भक्त लोकनिक दर्शनले हुनकर मुँह उघाडल अवश्य जाइ छनि.स्पितुक गोम्पा बौद्ध धर्मक तांत्रिक सम्प्रदायक मन्दिर थिक. ई रोचक थिक जे एक दोसरासं करीब तीन हज़ार किलोमीटर दूर बसलि ई दुनू काली भक्तमें  समान रूपें आस्था आ भय जगबैत छथि.

Thursday, August 27, 2020

कर्फ्यू

 

कर्फ्यू

मैथिली साहित्यकार लोकनिक सोशल मीडिया पेज - ‘गोनू झाक चौपाड़ि’ पर आइ कत्तहु केओ नहिं. ने भोर सं प्रणाम-नमस्कार, ने ककरो कोनो हाल-चाल. आइ केओ अपन पोथी, गीत, वा कविता धरिक चर्चा तं नहिंए केलनि, कोनो ‘ फोरवार्ड’ धरि नदारद. करबो कोना करितथि. सवाले एहन रहैक. अंततः जखन सांझक छौ बाजि गेल आ एहि ‘गोनू झाक चौपाड़ि’ नामक सोशल मीडिया पेज दिस केओ घूरि कय तकबो नहिं केलक, तं निर्बाहक (administrator) कें नहिं रहि भेलनि.पेजहिं पर पूछि देलखिन, ‘ आइ एहि पेज पर एना कर्फ्यू  किएक लागल अछि ? मुदा, कथी ले केओ  'चूं' धरि करताह. अंततः, निर्बाहक महोदय, सहायक निर्बाहककें फ़ोन केलखिन. की औ कवि जी ? आइ ‘चौपाड़ि’ पर एना कर्फ्यू किएक लागल अछि ? बिहारी कवि जनिका दोस्त मित्र लोकनि हिनक कविता पढ़बाक शैली दुआरे ‘बिहाड़ि’ कहैत छथिन, गोंगिआय लगलाह. निर्बाहक महोदय कें तामस चढ़ि गेलनि, कहलखिन एना की गोंगियाइ छी ! शुद्ध भ’ क' बाजू ने.

-की बाजू ?

- की  बाजू ! जे बूझल अछि, जे कहय चाहैत छी, बाजू. कंठमें बिदेसर अंटकल छथि !! सहायक निर्बाहक गुरुक पी. एच-डी.क छात्र छलखिन.

-‘असल में बाते तेहन भ’ गेलैक.

-की भ’ गेलैक ?

-ओहि दिन ओ हुनका खूब जोश द’ देलखिन, आ ओ काल्हि रातिए  ....

आहि रे  ब्बा ! ‘ओ’ , ‘ओहि दिन’,’हुनका’ ! के ? ककरा ? कतय ? की क’ देलखिन ? कोन बज्र खसि पड़ल, जे आइ बिभूति जी 'बाबाक बिभूत'क दोहा धरि नहिं बिलहलनि !

कवि 'बिहाड़ि' खूब जोर सं खखास केलनि. कात में राखल लोटा उठा भरि छाक पानि पीलनि, आ बाजब शुरू केलनि,  ‘आब एतेक बनियबैत छी, तं, सुनू,सर. शनि दिन लालबाग़क कवि गोष्ठीक पछाति, घुरबाकाल टावर पर सब गोटे पान खाइत रही. ओही समय में पच्छिम भर सं प्रोफेसर साहेब प्रेससं किताबक बंडल नेने डेरा दिस जाइत रहथि. रहथि ओ जल्दीमें. किन्तु, नव किताबक बंडल देखि साहित्यकारकें कतहु रहल जाइ ! सब  रोकि लेलकनि. छिटकबाक तं कोशिश खूब केलनि, कहय लगलखिन, व्हाट्सएप पर पी डी एफ प्रति पठा देब. किन्तु, ओ की बुझथिन जे लड्डू आ लड्डूक फोटोक एक स्वाद नहिं होइत छैक. अंततः, प्रोफेसर साहेब रिक्शासँ उतरलाह. नव किताबक बंडल सेहो खूजल आ दस बीस टा किताब तं बिनु विमोचनेके, तत्काले, हाथे-हाथ बिलहय पड़लनि. उत्साहमें एक गोटे मोबाइल पर फोटो घीचि ,तुरते व्हाट्सएप तुरते सबकें पठाइओ देलखिन. परफेसर साहेब, नव लेखक, लोकक सौजन्य देखि द्रवित भ' गेलाह. हमरा सबसँ पूछय लगलाह, किताब बिकेतैक, कि  ने ? ताहि पर कतेको गोटे जोश देबय लगलनि, कि तं अहाँकेंं के नहिं चिन्हइए, किताब हाथो हाथ बिका जायत. निसाभाग राति, रविक भोर, बीच दुपहरिया, समय ताकि कय सोशल मीडियापर, फेसबुुुक पर सबटा डिटेल दिऔक. प्रोफेसर साहेब एहि  टिटकारी पर आबि गेलाह: हुनका की बूझल रहनि जे हमरा लोकनि सबकें एहिना टिटकारी दैत छियैक. ओ जिनगी भरि गौहाटीमें परफेसरी केलनि. ओ की बुझथिन, दरभंगाक फुटपाथ पर बाबा नागार्जुनो अपन पोथीक पन्नाक पुड़ियामें फुटहा फँकने छथि ! सर, अहाँ ध्यान नै दैत छियैक. अहाँ जकरा कल्हुका पोस्ट बूझिकय आइ भोर में अनदेखा क’ देलियैक सबटा गुड़ गोबर सैह केलक. ई बूडिराज काल्हि रातिए साढ़े एगारह बजे पोथी परिचयक संग अपन बैंक खाता आ मूल्य धरिक सूचना ‘गोनू झाक चौपाड़ि’ पर पोस्ट क देने छ्लखिने. आब लियअ हडहडी बज्र अहाँक कपार पर खसल, गोनू झाक चौपाड़िए चौपट्ट भ' गेल. पेज पर कर्फ्यूए लागि गेल !! ई सबटा ‘स्वतंत्र’क चालि थिक,परफेसर साहेबकें जोश दियबै में सब सं आगू ओएह छल. ओ अहाँसं ओहिना जरैए, सर ! हम कहैत छी, ओ एक दिन एहि चौपाडि कें बंद नहिं कराबय,, तं हमरा कहब.’

निर्बाहक माथा हाथ द’  कय  ठामहिं बैसि गेलाह. कहलखिन , ‘छोड़बनि नहिं सार कें !”

 

Sunday, August 23, 2020

नव विधान

 नव विधान 

गप्प जे पहिने घंटों चलैत छल,

से भ गेल 😊😍👍👏👏!

संवाद आ विवाद

जाहि सँ पचैत छल अन्न 

भ' गेल मूक .

माथ घूमैछ, चक्कर अबैछ ?

चाही नहिं औषधि,

चाही परिवारक समूह.

मुदा, कतय पाबी ?

नेना दिल्ली, नाति देहरादून

पुत्र जापान, आ पोता पेरिस,

तखन जं होअय मथदुःखी,

बिसरि जाउ सासु-बहु सीरियल

वा नवयुवक कर्णकटु गान.

मन होअय तँ

पढ़ गीता, पढ़ू विष्णु-पुराण, वा उपन्यास.

पड़ोसिया अओता नहिं, 

छै सामाजिक दूरीक विधान,

अहां कतहु जायब नहिं,

छी कोरोना सँ समधान,

तखन, मनहिं मन करू अपने विचार,

अपने थिकहुँ,

मित्र, दोस्त, पड़ोसिया,

बेटा-बेटी-नाति,

सासु-पुतहु-आ समधिन,

करू एसगरे एसगरे अपन निमहता

अपने अपन  उद्योग,

छै ने केहन समीचीन,

सब किछु अपने अधिन !

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नव विधान कविकुलगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुरक एकटा उपन्यासक नाम सेहो थिक 

Saturday, August 22, 2020

मैथिलीक माध्यमसं उत्तर आ दक्षिणक बीच भाषिक सेतुक निर्माण : परिप्रेक्ष्य आ प्रस्ताव

 

मैथिलीक माध्यमसं उत्तर आ दक्षिणक बीच भाषिक सेतुक निर्माण : परिप्रेक्ष्य आ प्रस्ताव

राष्ट्रक अनेक भाग, भाषा आ धर्मक बीच सहमति आ संपर्क एकताक सेतु थिकै. अन्यथा, तमिलनाडुक वेदारण्यम आ गुजरातक दांडीमें एके दिन नमक-सत्याग्रह कोना होइत, काशी आ रामेश्वरम् एक सूत्र में कोना बान्हल जाइत. तथापि, एहि सूत्रक अनेक आयाम एखन धरि तन्नुक अछि, जकरा दृढ़ करबाक आवश्यकता छैक. निचला एके टा उदाहरण एहि आवश्यकताक औचित्यक प्रतिपादन करत.ई उदाहरण उत्तर आ दक्षिणक बीच भाषा सबहक सम्पर्क सं संबंधित अछि.

इतिहास विदित अछि, वैदिक संस्कृत सँ अभिज्ञ जनताक हेतु, ‘मुक्ति’क मार्ग सुलभ करबाले भक्त-संत लोकनि भक्तिक बाट तकलनि. दक्षिण भारतमे वैष्णव-संत आड़वार लोकनि, आ शैव-संत नयनार लोकनि एकर प्रवर्तक रहथि. पछाति भक्ति-परंपरा उत्तरमें सेहो पुष्पित-पल्लवित भेल. जयदेव-तुलसी-सूर-रसखान-विद्यापति-चैतन्य-कबीर, सब, एही परंपराक सूत्र मे गांथल मालाक फूल थिकाह. किन्तु, उत्तर आ दक्षिणक  सब संत एक दोसरासँ सुदूर आ संपर्कहीन.

ज्ञातव्य थिक, जाहि विष्णु-कृष्णक भक्ति गीत अड़बार संत लोकनि नेपालक मुक्तिनाथसं तमिलनाडुक श्रीरंगम् आ मथुरा सँ द्वारिका धरि गओलनि, जाहि शिव भक्तिक गीत नयनार संत लोकनि रामेश्वरम-कांञ्ची सं काशी-सोमनाथ-मल्लिकार्जुन धरि गओलनि, ओही विष्णु-कृष्ण-शिवक भक्तिमें तँ विद्यापति आ चंदा झा सेहो गीत लिखलनि, रामायण रचलनि. किन्तु, ने उत्तरमें वैष्णव अड़बार प्रणीत दिव्य-प्रबंधक स्तुति लोक गबैत अछि, ने शैव लोकनि तिरुवाचकम् गबैत छथि. दोसर दिस, ने दक्षिणमें भक्त लोकनि विद्यापतिक भक्ति गीत गबैत छथि ने चंदा झाक रामायण पढ़ैत छथि. सत्य थिक, तमिल कवि कंबन् केर रामायणक मैथिली अनुवाद उपलब्ध अछि. किन्तु, ई कोनो एक व्यक्तिक अपन प्रेरणाक परिणाम आ परिश्रमक फल थिक. पैघ स्तर पर मैथिली आ तमिल वा दक्षिणक आन भाषा-साहित्य कें एक दोसराक हेतु बुझबा योग्य करबाक हेतु सरकारी सहायता आ वृहत् दीर्घकालिक योजना एखन नहिं अछि. किन्तु, तकर आवश्यकता छैक.

अस्तु, हमरा विचारें, आरम्भमें केंद्र सरकारक योजनाक अंतर्गत Central University of Bihar आ तमिलनाडुक Central Institute Classical Tamil क बीच एकटा एहन दीर्घकालिक संकल्प-पत्र (Moratorium of Understanding) क आदान प्रदान हेबाक चाही जाहि सं चुनल, प्रतिभाशाली आ रुचि-संपन्न तमिल- आ मैथिल-भाषी छात्र मैथिली आ तमिल केर परस्पर अध्ययन कय एहि दुनू भाषाक बीच सुदृढ़ सेतुक निर्माण करथि, एक दोसराक साहित्यक अनुवाद करथि, आ राष्ट्रीय- भाषिक, आ सांस्कृतिक सूत्रकें  निरंतर दृढ़ करैत रहथि. आगू जं ई योजना सफल भेल, तं ई प्रयोग उत्तर आ दक्षिणक आन-आन भाषाक बीच सेहो सेतु निर्माणम सहायक सिद्ध हयत. एहि पहलसं  भारतक राष्ट्रीय  एकता दृढ़ हयत, से हमर विश्वास अछि.  

Friday, August 14, 2020

भूमिका लिखबाक दिन

 

                                                        भूमिका लिखबाक दिन

जे नित्य प्रति किछु लिखैत छथि, हमरा जनैत, ओ लिखबाले दिन-बेरागन/ मुहूर्त नहिं तकैत छथि. किन्तु, जं प्रकाशित पोथी सबहक भूमिका देखबैक तं लागत लेखक लोकनि सब भूमिका कोनो-ने-कोनो नीके दिन ताकि कय लिखलनि-ए; हेमंती पूर्णिमा, विजयादशमी, गंगा दशहरा, आदि. ई हमरा रोचक लगैत अछि. तें, हमरा मन में प्रश्न उठय लागल, की नीक दिन ताकि भूमिका लिखबाक कोनो स्थापित परिपाटी छैक आ कि केवल भूमिका लिखबाक दिन कें एकटा सार्थकता वा विशिष्टता देबा ले लेखक लोकनि ओकरा स्मरणीय दिन सं जोड़ैत आयल छथि. हम व्यवसायें मूलतः लेखकक श्रेणीमें नहिं छी.किन्तु, व्यवसायतः लेखक लोकनि, भूमिका लिखबा ले नीक दिन तकैत छथि, वा नहिं, वा नीके दिन  किएक तकैत छथि ? चलू आइ एकरे कारण ताकी.

प्रोफेसर भीमनाथ झा कहलनि, ‘पहिने भूमिकाक परिपाटी नहिं रहैक’. से हमरा अपनो देखबामें आयल. हमरा लग जे पोथी सब अछि ओहि म सं बहुतो पुरान पोथी में तं भूमिका छैहे नहिं. जेना, म.म. बालकृष्ण मिश्रक विद्यापति पदावली (१९३७), प्रोफेसर तंत्रनाथ झाक कीचक बध. ततबे नहिं, किछु पोथी जाहि में भूमिका छैको ताहू में भूमिका लिखबाक दिन आ मुहूर्त में एकरूपता नहिं भेटल. महावैयाकरण दीनबंधु झाक ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ एकर प्रमाण थिक. जतय महावैयाकरण अपन भूमिकामें दिन वा स्थानक चर्चा नहिं केने छथि, ओही ‘मिथिला भाषा विद्योतन’क प्रथम खंड- व्याकरण- क प्रकाशकीय वक्तव्यक दिन आचार्य रमानाथ झा जं वसन्त पंचमी १९५३ लिखैत छथि, तं दोसर खंड- धातु-पाठ-क प्रकाशकीय लिखबाक दिन कें कांचीनाथ झा ‘किरण’ जी जानकी नवमी, १३५७ साल अंकित करैत छथि.   प्रश्न उठैछ नीक दिनमें भूमिका लिखबाकक परिपाटी कोना आरम्भ भेलैक. प्रोफेसर भीमनाथ झाक कहब छनि, ‘समाजमें  शुभ कार्य नीक दिनमें करबाक परम्परा छैक. अस्तु, भूमिका लिखबाले सेहो लोक दिन नियारैत छल’. किन्तु, हमरा तं लगैत अछि, लिखबाक हेतु ओ मुहूर्त सबसँ शुभ थिक जखन लिखबाले किछु फुरैत हो ! आ तकरा दिन आ मुहूर्तसं कोन सरोकार !! तथापि, चली आ देखियैक मैथिलीक शीर्ष, आ सामान्य, पुरातन आ अधुनातन, वैज्ञानिक, आ नास्तिक लेखक लोकनि भूमिका लिखबाक कोन- कोन दिन चुनलनि-ए. ओहि म सं जे साहित्यकार जे जीवित छथि, ओ भूमिका लिखबाक दिनक चुनाव पर प्रकाश द’ सकैत छथि. दिवंगत साहित्यकार लोकनिक सम्बन्धमें केवल अनुमान सम्भव अछि.

आचार्य सुमन जी आधुनिक मैथिली  युगक सर्वप्रसिद्ध साहित्यकार म सं एक छथि. तें आरम्भ हुनके सं करी. सुमन जीक ‘ साओन भादव’ काव्य में कुमार गंगानन्द सिंह क लिखल आमुख छनि, दिन थिकैक श्रावणी, फजली १३५६ साल (माने १९४६-४७). कहि ने, श्रावणी कोनो पर्व थिकैक वा नहिं. किन्तु, कतेक वर्षक पछाति १९७१ में प्रकाशित सुमन जीक ‘पयस्विनी’ में कविक अपन लिखल भूमिका- ‘भाव-भूमि’- लिखबाक दिन थिक, ‘अषाढ़स्य प्रथम दिवसे, १९७१, जे नियारल नहिं, संयोगवश बूझि पड़ैछ. वएह सुमनजी अपन संस्मरण ‘ मन पड़ैत अछि’ क भूमिका लिखैत ‘स्मृति-विस्मृतिक गति-यति’ लिखबाक दिन चैत्र प्रतिपदा २००० वर्ष देने छथिन, जाहि में तिथि जं संयोगवश अछि, तं साल अंग्रेजी. १९७० में प्रकाशित हुनके ‘अंतर्नाद’ कविता संग्रहक भूमिका ‘बिंदु-विसर्ग’ लिखबाक दिन, सुमनजीक अपन सुपरिचित राजनेताक प्रयाण दिवस- उपाध्याय  बलिदान दिवस, ११ जनवरी १९७० थिक. स्पष्टतः, एहि तिथिसं कविक भावनात्मक जुड़ाव छनि, किन्तु, जनसामान्यमें ने ई अवकाशक दिन थिकैक, ने सुपरिचित ऐतिहासिक दिन. तखन सम्भव अछि, सुमन जी अपन श्रद्धेयक मृत्युकें स्मरणीय बनयबाक भवना सं ओहि दिन कें ‘उपाध्याय  बलिदान दिवस’ क नाम देने होथिन. तथापि, करीब अठारह वर्ष बाद वएह सुमन जी , किरण जीक ‘पराशर’ क भूमिकाक दिन आश्विन शुक्ल पंचमी, १९८८ लिखैत छथि. ई भूमिका लिखबाक दिनक आकस्मिकताक द्योतक थिक.  पुनः, स्व. बबुआ जी झा ‘अज्ञात’क खंड-काव्य ‘प्रतिज्ञा पाण्डव’क भूमिका- ‘अभिज्ञप्ति: कवि ओ काव्य’क भूमिका लिखैत, महाकवि सुमन ओहि दिनकें ‘संस्कृत दिवस’ दिन लिखैत छथि, जे  हमरा जनैत, महज संयोग वा  संस्कृतक प्रति सुमन जी ममत्वे सं प्रेरित बूझि पड़ैछ. कारण, भूमिका लिखबा ले सुमन जी ‘संस्कृत दिवस’क प्रतीक्षा कयने हेताह, से असंगत लगैछ. रोचक थिक, ओही ‘प्रतिज्ञा पाण्डव’क में कवि अज्ञात ‘ हमर जीवन यात्रा’ नामक लेख २१.४ .९१- सन कोनो तेहने दिन लिखने छथि जहिया ओ पलखति में रहल होथि. ई तिथि दिन ताकि नीक दिनमें लेख लिखबाक संकेत नहिं दैछ.

एकर विपरीत गोविन्द झा भाषाशास्त्र प्रवेशिकाक प्राक्कथन लिखबाक दिन १३ मई २०११ लिखैत छथि.दोसर दिस जं एकदम भिन्न आ क्रांतिकारी लेखक केर गप्प करी तं १९५७ ई. में प्रकाशित शेक्सपियरक As You Like It क ‘राजमणि’ क नाम सं प्रकाशित अनुवादमें अनुवादक राजेन्द्र झा ‘स्वतन्त्र’ स्थान आ दिन क चर्चा केनहिं नहिं छथि. रोचक थिक, सुमने जीक शिष्यक परिपाटीमें अमर जी अपन काव्य संकलन ‘ऋतु-प्रिया’ क भूमिका ‘ प्रस्तुत संकलन तथा .....’ क लिखबाक दिन सुमने जीक जन्म दिन, ‘श्री सुमन जयंती’ १९६३ लिखैत छथि, जाहि सं सोझे तिथि आ तारीख निकालब श्रमसाध्य तं अवश्य लगैछ, किन्तु, एहि दिनक चुनाव कारण सुमन जी प्रति अमरजी श्रद्धा थिक, से के नहिं मानताह. यद्यपि, ई दिन अमर जी कोना चुनलनि से कहबा ले, भाग्यवश एखन अमर जी छथिए. एहि सबहक विपरीत केदार कानन कहैत छथि, ओ भूमिका लिखबा ले कोनो विशिष्ट दिन नहिं तकैत छथि. ‘जखन मौका भेटल एके बैसक में लीखि गेलहुँ. पछाति आवश्यकता भेलैक तं कनेक मनेक देखि लेलियैक.’ किन्तु, नीचा देल उदाहरण किछु भिन्ने कथा कहैत अछि. अस्तु, आब विभिन्न विधा आ वयसक लेखकक भूमिका  लिखबाक दिनक उदहारण निचला टेबुल में देखी :

लेखक/ कवि

ग्रन्थ

शीर्षक

स्थान / दिन

भीमनाथ झा

कविता धन

प्रयोजन

स्वतंत्रता दिवस २०१३

 

काल-पात्र

 

दशकान्त ३१.१२. २०१०

सुभाष चन्द्र यादव

रमता योगी

दू टप्पी

५.३.२०१९

केदार कानन

लीखि पठाओल आखर

प्रकाशकीय

मणिपद्म आ राजकमल स्मृति दिवस १९.६.२०१६

योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’

किछु तीत मधुर

 

वसन्त पंचमी, २०१४

विद्यानाथ झा

विज्ञान, पर्यावरण, आ समाज

लेखकीय

-

ले.कर्नल मायानाथ झा

इजोत

 

मकर संक्रांति १४.१.२०११

हीरेन्द्र कुमार झा

सोनाक खोप

हमर मनक खोप

-

कुमार मनीष अरविंद

मिच्छामी दुक्कड़म

-

१५.१.२०१९

 आब मैथिली सं दूर हिन्दी, बांगला आ तमिल दिस आँखि फेरी. ‘वैशाली की  नगर वधू’ आ ‘वयं रक्षामः’ -सन प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासक प्रणेता, आचार्य चतुरसेन एहि दुनू पोथीक भूमिकाक दिन क्रमशः १/१/१९४९ आ २६/१/१९५५ अंकित कयने छथि. एही म सं जं एक टा वर्षक पहिल दिन थिक तं दोसर भारतक गणतन्त्र दिवस. अस्तु, दुनू दिन  ऐतिहासिक भेल, स्मरणीय भेल. किन्तु, ओही पीढ़ीक बंगला उपन्यासकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्यायक उपन्यास ‘आरण्यक’ क प्रस्तावना में स्थान आ दिन चर्चा नहिं छैक.  तहिना निरद चौधुरीक Autobiography of An Unknown Indian क भूमिका में दिन आ स्थान क चर्चा नहिं अछि. किन्तु, इतिहासकार राजमोहन गाँधी अपन Modern South India क भूमिका लिखबाक दिन ०४ अक्टूबर २०१८ मात्र अंकित कयने छथि.

आब एक दू टा उदाहरण हिंदी सं ली. जतय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी क ‘बाणभट्ट की ‘आत्म कथा’ नामक ग्रन्थ क निवेदन में ज्योतिषाचार्य आचार्य द्विवेदी २९.११.४६क दिन अंकित कयने छथि ओतहि   मिथिला गौरव आ हिन्दी साहित्यकार स्व. फणीश्वरनाथ  ‘रेणु’, ‘मैला आंचल’ संक्षिप्त भूमिका ०९ अगस्त १९५४ क लिखल छनि, जे ‘शहीद दिवस’ थिक.

आब जं तमिल दिस देखी तं सबसँ पहिने राजाजीक नाम सं प्रसिद्द, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी पर दृष्टि टिकैत अछि. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ‘कुरल’ केर अंग्रेजी अनुवादक प्रथम संस्करणक भूमिकाक काल दिसम्बर १९४७, आ दोसर संस्करणक दिन ४ सितम्बर १९६९  अंकित करैत छथि, जे महज संयोग-जकां लगैछ. किन्तु, कुरल केर परवर्ती संस्करणक भूमिकाक दिन स्व. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी मकर-संक्रांति, १४ जनवरी १९६५ अंकित करैत छथि. वर्तमान समयक जं गप्प करी तं प्रसिद्द नाभिकीय वैज्ञानिक आ सुपरिचित  मैथिली साहित्यकार योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ अपन अद्यतन कृति ‘ त्रिनाताटकम’ केर प्रस्तावना विजय दसमी २०१९ क दिन लिखलनि, तं श्रीश चौधरी कहैत छथि ‘ हमर अमुक पोथी जे विजय दसमीए  दिन लिखब समाप्त भेल छल, उचिते ओकर भूमिकाक  दिन विजया दसमी भेलैक.’  

उपरोक्त संक्षिप्त उदहारण सं एतबा धरि अवश्य प्रतीत होइछ जे भूमिका लिखबाक दिन चुनबाक कोनो सर्वमान्य परिपाटी नहिं छैक. जं पुरान पीढ़ीक किछु मूर्धन्य साहित्यकार भूमिका लिखबाक दिनकें सुपरिचित दिन सं जोडि कय स्मरणीय बनाइओ देने छथिन तं ओहू पीढ़ीमें ई परिपाटी सार्वलौकिक नहिं छल. एखुनको पीढ़ीमें जं वैज्ञानिको भूमिका लिखबाले पर्व त्यौहारक दिन चुनलनि तं आन वैज्ञानिक भूमिकामें  दिन-तारीखक चर्चा धरि नहिं केने छथि. किछु नव युवक साहित्यकार जं परम्परा कें पकड़नहु छथि, तं किछु गोटे अपन सुविधाओ सं दिन चुनने छथि.   जं हम अपन गप्प करी, तं, हम जखन सोचि कय किछु लिखय बैसैत छी, हमरा छुट्टीक दिन- रवि वा राष्ट्रीय छुट्टी वा अवकाश- क दिन सब सं सुभितगर बूझि पड़ैत अछि. छुट्टी आ पलखतिक दिनक अतिरिक्त जखन हम अर्द्धनिद्रामें रहैत छी हमर चिंतन सहजतासं जागि उठैत अछि. ओहन स्थिति में जं चिंतन पर नींद भारी पड़ल, तं चिंतन अवचेतन में घोर मट्ठा भ’ सब कय किछु बिसरि जाइत अछि. किन्तु, जं नींद पर चिंतन भारी पड़ल, तं, उठि बैसैत छी, आ लिखय लागि जाइत छी. कखनो काल लिखबाक विचार आ लेख सबहक विचार-विन्दु  हमरा भोरुका वा संझुका टहलानक काल फुरैत अछि. अस्तु, टहलानक बाद जखने लिखबाक फुरसति भेटैत अछि विचार-विन्दु कें टीपि लैत छी. किन्तु, कोनो लेख वा भूमिका एके बैसाड में लिखा जेतैक वा एके बैसाड़में ‘फाइनल कॉपी’ बनि जेतैक से कहब हमरा ले असम्भव अछि. हम ओहुना स्वभाव सं अपना कें ‘compulsive editor’- जनिका एके लेखकें अनेक बेर पढ़ब अनिवार्य बूझि पड़ैत छनि-  क कोटि में रखैत छ. उपर सं, अनेक बेर हम अपन लेखकें, प्रकाशन सं पूर्व, मित्र-बन्धु लग peer-review ले सेहो पठबैत छियनि ; एहि सं लेख केर परिमार्जन भ’ जाइछ . एहना स्थितिमें हम भूमिका वा लेख लिखबाले मुहूर्त वा दिन कोना तका सकैत छी !  

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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