Wednesday, January 21, 2026

फकड़ा संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी

                                                                             फकड़ा

संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी



पाण्डुलिपिक एक पृष्ठक छायाप्रति 

पण्डित काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क अनुसारें ‘फकड़ा काव्यक एक प्रकार आ लोक-साहित्यक प्रमुख अंग’  एवं ‘आडम्बरहीना, निर्मल हृदया, सत्यमयी,बाट-घाट, जंगल-झाड़ आदि प्रकृतिक विशाल क्षेत्रक अनुभवसँ भरलि मुनि-कन्या थिक’।1 हुनक कहब छनि, ‘पण्डितक काव्य पाँच प्रतिशत लोकक चित्र दैछ त’ फकड़ा पनचानवे प्रतिशत लोकक’। अस्तु, स्वयं किरण जी करीब ‘सय छबेक (फकड़ा) संग्रह’ कयने रहथि. मुदा, ओ संकलन अनुपलब्ध अछि. किन्तु, अक्टूबर १९६१ केर ‘वैदेही’ पत्रिकामे प्रकाशित हुनक ‘फकड़ा’ नामक लंबा लेखमे ओहि संकलनसँ करीब सत्तरि-पचहत्तरि टा फकड़ा उद्धृत छैक. किछु फकड़ा हुनक कृतिमे आनो ठाम यत्र-तत्र छिड़ियायल सेहो भेटत. लोक साहित्यक संकलन कयनिहारक कृतिमे आनहु ठाम फकड़ा भेटबे करत.
एतय प्रस्तुत अछि, हमर माता, स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा जीवनक नवम दशकमे टिपल किछु फकड़ा आ एक आध टा गीत जकर हमरा जनैत समाजशास्त्रीय महत्व छैक. स्मरणीय थिक, स्व. बिन्देश्वरी देवी पं. काशीनाथ झा काव्यतीर्थ एवं किरणजीक छोटि बहिनि रहथि जनिक मृत्यु ०६ अगस्त २००३ क भए गेलनि. हुनक हाथें संकलित फकड़ा आ गीतक चारि-पाँच पृष्ठ जे हमरा हुनक मृत्युक बाद घरमे भेटल  अछि सएह एतय प्रस्तुत अछि.        

फकड़ा

1
आबेसे केलौं खेती दुलारे भेल बेटी
छोडू सैंया खेती खेलाउ हमर बेटी
2
लाड़ करू सैंआ तोरा पर
पोटा पोछू तोरा मोछा पर
3
एके बाँस बसेला, कोइ चालनि कोइ पैला
4
उखरिमे धान त ककबा आन
5
पलङ्ग पर चिलका रोबैए
मनसा सुतल मौगी ठहकैए
6
वरक मुहमे जाल त बरिआतीक कोन हाल
7
कनियाके आँखिमे नोरे ने लोकनिया भोकारि मारैए
8
बाहरक ठीक ठाक देख रे नौआ
भीतरी महलमे हगै छै कौआ
9
कुकुर कौआ भंडारी त घरमे गुहे गुहटार
10
घरमे पकैए कुरथीक रोटी / बाहर सुखाइए जोड़ धोती
11
बाप के गरा घोंघा/ बेटा के गरा रुद्राक्ष
12
थोड़ कनै छी बाबा ले ? बहुत कनै छी टाका ले
13
आँखिमे नोर त / दाँत निपोड़

14
घरमे टाट नै देहरिमे सरकी
मुहमे नाक नै कानमे तड़की
15
अन्हराकए गाय बिएलै / चालनिमे दुहै जो
16
वरक माय निरधोंछी सांठल नै चतुर्थी
कनियाक माय न(नौ) लगरा
हुनको बेटाके नै देबनि कोजगरा
17
अबिते एली चुल्ही फुटौली (नि)
 अरिपन पोछि क लिटी लगौलनि
18
अपन गाम भम्ह पड़ए/ पाही पट्टी नोत पड़ए
गाम नोते ने बेलाही नोत पड़ए
19
मुखसुद्धिक नै वेवहार/ अड़िआतैक बड़ चमत्कार
20
नवक धन भेल त बेङ्ग महाजन भेल
21
सब गेल हाट धान के  कूटत
सब दंतरंगा चुल्हि के फुकत
22
मैगर ने बपगर ठेसगर बड़/ नोनगर ने तेलगर चहटगर बड़
23
माय बहु रहै नै, जेठकी बहु / चुमाबे नै त कोना बने
24
किए धोबिनिया बाढ़ि, किए तेलिनिया घाटि
ओ लेतै मुङरी, हम लेब जाठि
25
बेटिया स बुढ़िया भेलौ सोनसन पाकल केस
एहेन चरित्र कहिओ नै देखलौ जे गोइठा एल सनेस
26
चालनि दुसलनि बाढ़निके जिनका अपन सहस्र टा छेद
27
जे बाजय से बड़ बजन्ता जे नै बाजै से गोंग
जे खाय से बड़ खाधुर जे नै खाय से सोम
28
जावे पांडे दोना लगौता तावे पंडीआनि सुरुकि बैसती
29
खोना बेटा खेलनि पान
माय हसथिन बहु होथि झमान
30
वरक जैतुक जखने देखलौ कनिआक नाम निरासी
31
वर कनिया कए भेटे ने ओठङर ले मारि



32
निरलज के नै लाज नै अपमान
सहन कथा एक मरन समान

33  
वरक बरनन कते करब वर एक नजरी
कनियाक बरनन कते करब कनिया गरमे गगरी
34
वर बीसे बीसे बीस
बर ताकथि एके दिस
35
बड़े-बड़े के  लाइ ने
लड़िकन के मिठाई
36
बाबरीवला वर करबै कोठावला घर
लगेमे पैखाना आँगनेमे कल

37  
सैंया दर रे देवानी बहु छुछुनरि रानी
सैंया नित नहाथि बहु ढकनेमे खाथि
38  
मर जाइ त रासि गाबी
देह दशा अछि पूरा मुहसँ उड़ैए धुरा
39  
अंधे देखलनि बड़ियारक गाछ
त कहलनि जे लंका इएह छिऐ
40  
जैसाके तैसा मिले, मिले चोंच मे चोंच
दाढ़ीमे दाढ़ी मिले, मेले मोंछ मे मोंछ
41  
पेट जरैए त मलार गबै छी

42   
पेट कहकह करए जुड़ा महमह करए
42

त’र कान तड़की ऊपर कान खुटी
दांत मिसी कोचा सीटी
तखन चिन्हबनि जे कटकाक छिका
43      
छटाक भरि सोन तकर कने छनगर कने फनगर
कने सोतिआम तखन ने धिआ जेती सोतिआम
43  
एहन चुड़ा कूटब जे धान बिछि कए खाएब
एहन नैहर जे अपने जायब
44
आन्हर गुरु बहिर चेला
माङथि गुड़ त देथि भेला
45

लजैली ने कठेली सवेरे चलि एली



गीत
परम अभाग कपारक लिखल जनिका घरमे फुहरि नारि
मस-मस दिन पर आङन बहारथि बैसथि टाङ्ग पसारि।। परम अभाग ..  
धियापुताके ठोकि सुताबथि अपने बैसथि कोन दाबि
बासन धो के कोनटा फेकथि आङन पड़ि गेल हील
गालमे जे मांड़ी बहकल केसमे पसरल ढील।। परम अभाग..
ओलती झीकि क चुल्हा पजारथि झिकथि कोनटाक बाती
साँझ राति मे दीआ नै बारथि लेसथि दुपहर आ राती।। परम अभाग ..

 

बिकौआ सोति
सुध समै उपगत भेल सखी चमकल फिरे बिकौआ
कम्बल लोटा मोटा बन्हलनि झाड़ी ओ पनबट्टा
किओ बिकौआ धोती सिटै छथि केओ थकड़ै छथि टीक
किओ बिकौआ चानन करै छथि ई सब सुधक रीत
घोड़ा पीठी जे कसल सवारी ताहि पर अपने असवारी
चमकै पाग जड़ीकोर धोती रेसमी केर दोपटा
दुइ चारि जे हर बहै छैन चारि चलै छैन लहना
अहाँक कनिआ हिनक घर जेती तुरन्त गढ़ा देथिन कगना

लगनी
पनिआँ के गेलीऐ हे स्वामी ओही रे जमुनमा रे की
उमतल भैसुरवा बटिआ रोकल रे की
घाट छोडू बाट छोडू उमतल भैसुरवा
कनिए कनिए चुनरी भिजल रे की
भीज दियौ भीज दियौ अपनी चुनरी
हमर दोपटा तोहर पालट रे की
तोहर दोपटा अगियाके धाधर
अपन चुनरी सीतल बसात रे की
जांघ घुन लगिहै बाँहि घुन लगिहै
हे स्वामी तोहरे अछैत भैसुर परेखल रे की
हुअ दे प्रात रे धनी पसराक हटिआ
छुरिआ बेसाहि भैआ जीव हतबै रे की
भैआ जीव हतबै हे स्वामी एसकर हेबै
तिरिआ मुइने तिरी वध लागत रे की ।।

स्व. बिन्देश्वरी देवीके पढ़बाक रूचि रहनि. मुदा, हम जहियासँ देखलियनि, काजक तेहन व्यस्तता रहनि जे कहथिन, ‘होइए दिन राति मे चौबिसे घंटा किएक, पच्चीस-छब्बीस घंटा होइतैक.’ मुदा, करीब अठासी वर्षक जीवनक अंतिम तीस वर्षमे हुनक अधिक समय पूजा-पाठ आ पढ़बामे बितनि. तथापि, हुनका कहियो हमरालोकनि  कथा, कविता वा गीत लिखैत देखने नहि रहियनि. जखनि समय भेटनि मौनी-चङेरी-सितलपाटी बिनथि. अंचार, मुड़ौरी, कुम्हड़ौरी, निमकी बनबथि. मुदा, टोल-पडोसक स्त्रीगण लोकनिक आ अपन चिट्ठीक अतिरिक्त किछु लिखथि नहि. एक बेर करीब 2000 ई. मे, मृत्युसँ दू-अढ़ाई वर्ष पूर्व, एकटा गीत लिखने रहथि. ओ गीत बंगलोर डेरा पर हमरा देखय देने रहथि. मुदा, हम तहिया ध्यान नहि देलिऐक. बादमे ओ किएक भेटत. तथापि, जीवनक अंतिम चरणमे ओ कोन प्रेरणासँ किछु फकड़ा लिखिकए घरमे राखि गेलीह, से कहब असंभव. संयोगवश हालहिमे हमर ममिऔत आ किरणजीक तेसर पुत्र, केशरीनाथ झा  कहलनि, जे ‘बाबू (किरण जी) कहने रहथि जे मझिली पिसिया (स्व. बिन्देश्वरी देवी) हमरा सब भाई बहिनिमे सबसँ बेसी प्रतिभावान रहथि.’ मुदा, आब तकर कोनो महत्व नहि. तथापि, संकलित फकड़ा आ गीतक महत्व भए सकैत छैक.
उपरोक्त फकड़ा सबमे बहुतो एखनो प्रचलन मे छैक. बहुतो आब नहि सुनबैक. किछु फकड़ा आ गीत संकलित उपरोक्त गीतक समाजशास्त्रीय महत्व छैक. तकर विवेचनाक अवश्यकता नहि, कारण, संदर्भ आ उक्ति अपने सब किछु स्पष्ट कए दैछ. एतबा अवश्य जे हमरा आङन वा आन ठाम लगनि सुनबामे आबय किन्तु कहिओ ध्यान नहि देलिऐक. उपरोक्त लगनीमे स्पष्ट छैक जे नारि गीतमे हर्ष-विषादक संग ओकर अपनहि परिवारजनक द्वारा शोषणक व्यथाक वर्णन सेहो रहैत छलैक. मुदा, बहिर समाज सुनिओ कए किछु नहि सुनैत छल.
एकटा गप आओर. स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा संकलित उपरोक्त फकड़ाक वर्तनी ओहिना राखल गेल अछि जेना ओ लिखने रहथिन. हुनक जन्म पण्डित परिवारमे भेल रहनि. मुदा, हुनक औपचारिक शिक्षाक अवसर नहि भेटल रहनि. कहने रहथि, “भाई ( पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थ) जखन भौजी (पत्नी जमुना देवी) कें पढ़बथिन, तँ, लगमे बैसि हम देखैत रहियनि. पछाति, नुनू भाई (किरणजी) कोइला पिसिकए सरबामे मोसि बना देलनि आ कड़चीक कलम बनाक देलनि. ओहीसँ लिखब सिखलहुँ. एगारहम वर्षमे तं एतहि (सासुर) आबि गेलहुँ.”         
  

संदर्भ
झा, काञ्चीनाथ ‘किरण’. फकड़ा. वैदेही अक्टूबर १९६१.   

     

  
      


Wednesday, January 14, 2026

प्रश्न

 प्रश्न 

ऊँची उठती मूर्तियाँ

ठिगने होते लोग

कचरे चुनती कुमुदिनी

नयन भरे हैं नोर।

गली-गली में भक्त हैं

करते अत्याचार

चौराहे पर प्रश्न खड़ा

प्रभु, कब लोगे अवतार ?


Wednesday, January 7, 2026

नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025

 

                                                 नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025 

जंगल, वृक्ष, हरीतिमा आओर नदी केर गीत
यायावर मन हमर, स्वर्गे तँ ई थीक!

एहि बेर 24 दिसंबरक दिन ओ दिन ओ साँझ फेर आयल : हम कावेरीक कछेर पर एसगर बैसल रही. घाट लग बाँसक कमचीसँ बनल नाओ सब रहैक. दू गोट नाविक सब सेहो रहथि. कहैत गेलाह, पंदरह मिनटक नौकायन आ मात्र दू सौ टाका. हमरा समय नहि छल. नहि गेलहुँ. एहि बेर करीब पचीस वर्षक पछाति श्रीरंगापत्तिनम् आयल छी. फेर कहिया आयब, कहब कठिन. हमर अनुभव कहैत अछि, अवसर हठे अबैत नहि छैक.
कावेरीकेँ उद्गमसँ समुद्र धरि टा नहि, हिनका हम लगभग संपूर्ण लंबाई धरि देखने छियनि; कोडागुक तलकावेरीक विन्दु-विन्दु जल प्रपातसँ लए कए श्रीरंगम्, तरंगमवाड़ी-पूम्पूहार धरि. एहि नदीक प्रशस्ति तँ संगम कालसँ शिलापत्तिकारम् – सन महाकाव्यसँ लए कए अनगणित काव्य आ गद्य साहित्यमे लिखल गेल छनि.'शिलापत्तिकारम्' केर हमर मैथिली अनुवाद 'कन्नगीक काड़ाक कथा' मे सेहो कावेरी गीत अछि; ई मूल कावेरी गीतक भावानुवाद थिक:


धवल पुष्प-सन कार्तिक तोहर हे
गतिओ पवन समान,
कारी आँखि पावन मनभावन
रूपक नहि उपमान ।
बूलय मयूर कोइली गाबय

हरिअर आँचर धान,

सबतरि भूमि पानिए पूरित

विपुल अन्न वरदान।

मुदा, एहि बेरुक कावेरी दर्शन विशिष्ट छल. श्रीरंगापत्तिनम् ऐतिहासिक आ पवित्र तीर्थस्थल थिक. ई स्थान धार्मिक भावें टा पवित्र नहि. पवित्र भूमि, पवित्र वायु आ पवित्र जल. ई स्थान एहि सबहक समुच्चय थिक. बहुत दिन बाद आयल छी. बहुत लगसँ, जल-परिपूरित, कल-कल बहैत, हरियर कचोर कावेरीक तट पर वृक्षक सघन छायामे आँखि मूनि बैसबाक क्षण, अनुभूतिक विषय थिक, वर्णन अनावश्यक आ निरर्थक प्रतीत होइछ. एतय कावेरीक स्वच्छ, चंचल धार लग ऊर्जाक स्वतः अनुभूति हमरा लेल स्वाभाविक थिक.

भूमि प्रदूषणसँ कोसी अंचलमे अनेक ठाम भूमिक नीचाक पानि पीबा योग्य नहि छैक, किछु वर्ष पूर्व से देखि मन कोनादन भए गेल छल: सुपौलमे बोतलबंद पानि पीने रही. यमुनाक जल आ वायुक प्रदूषणसँ दिल्लीक जनस्वास्थ्य प्रभावित अछि. किन्तु, श्रीरंगापत्तिनम् एहिसँ मुक्त अछि. दिसंबरक मास, मृदु सुखद रौद. जाड़ तँ एहि क्षेत्रमे होइते नहि छैक. एखन बरखा सेहो नहि.
हम एहि बेर एतय ‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क आयोजक दीपा मिश्रक निमंत्रण पर आयल छी. दीपा मिश्र अपन माता स्व. नीरा मिश्रक बरखी एक अभिनव रीतिऍ- साहित्य संगम आ साहित्यकारकेँ पुरस्कृत कए - मनबैत छथि. एहि प्रकारक बरखीक हम समर्थन करैत छी. दीपा अपन माता आ नारि समुदायक प्रति अत्यन्त भावुक छथि. सम्मेलनक बीच ओ एहि विषयकेँ अनेक प्रकारे अनेक बेर अभिव्यक्त केलनि. अपन भाषणमे दीपा कहलनि, जे ‘माताक मृत्युक पछाति, एसगरिए नदीक कछेर पर बैसलि नदीमे हुनका अपन माताक (प्रतिच्छविक) दर्शन भेल रहनि. अतः पछिला वर्ष ओ माताक बरखी सिप्रा नदीक कछेर पर मनओने रहथि. एहि बेर ई आयोजन कावेरी तट पर केलनि.
दीपा अपन भाषणमे मिथिला, आ अपन परिवारक महिलालोकनिक जीवनक अनेक अनुभव अभिव्यक्त केलनि, जकर विस्तृत व्याख्या, हमरा लगैत अछि ओ अपन कृतिमे लिखनहि हेतीह, आ लिखतीह. उर्जावान, रचनाशील आ मुखर छथि. अपन भाव स्पष्टतः व्यक्त करैत छथि.
हम आ हमर पत्नी रूपम करीब चारि बजे श्रीरंगापत्तिनम् पहुँचल रही. क्रमशः अओरो गोटे- साहित्यकार नीता झा, उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डाक्टर रमानन्द झा ‘रमण’, कथाकार रोमिशा, लेखक-पत्रकार  पंकज मिश्र, दिनेश एवं श्रीमती कल्पना मिश्र अइलीह. बेसी गोटे सपरिवार आयल रहथि. सबसँ भेट भेल. भोजनक पछाति तीन बजे दिनसँ साँझ सात बजे धरि चारि घंटाक कार्यक्रम. अनेक सारगर्भित भाषण-चर्चा, पुस्तक-‘सुखी मीन जो नीर अगाधा’ कविता-संग्रह एवं अन्य पोथीक – लोकार्पण, आ पुरस्कार- रोमिशाकेँ हुनक कथा संग्रहक हेतु पुरस्कार देल गेलनि- एवं सम्मान समारोह. कथाकार अशोक एवं तारानन्द वियोगीक अबैया रहनि. मुदा, नहि अयलाह. भेट नहि भेल.
‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क अवसर पर आयल विभिन्न वयसक प्रतिभागी लोकनिसँ भेट सेहो एकटा नीक उपलब्धिए भेल. कार्यक्रममे विचार विनिमयक अतिरिक्त नचिकेताजी, रमणजी, नीता झा, पंकज मिश्र, दीपा मिश्र, एवं रोमिशाकेँ सुनबाक अवसर भेटल. छोट ग्रुपमे साहित्य-संगम हमरा पसिन्न पड़ैछ.
25 दिसंबर 2025, क्रिसमसक दिन
हमरा भोरहि उठि टहलबाक हिस्सक अछि. भोरुक टहलानमे स्थानक स्पन्दन सोझे कान धरि पहुँचैछ, जेन कानमे स्टेथोस्कोप लगा ककरो हृदयक धड़कन आ श्वास-उच्छ्वास सुनैत होइ. स्थानीय जनसामान्यक दैनिक गतिविधि सेहो देखबाक अवसर भेटैछ आ कदाचित् अनचिन्हार लोकसँ परिचय भए जाइछ. शान्त मनें मनुखसँ भेट आ अनचिन्हारसँ  निःस्वार्थ गप-सप अजुका जिनगीमे बोनस थिक. मुदा, आइ ने कोट्टयम्-जकाँ धनखेतीक बीच सुखद भ्रमणक अवसर भेटल, ने उत्तरांचलक अरण्य, ने बनारसक गली. मुदा, घूरि कए आपस एलहुँ, तँ हमरा हेतु दोसर बोनस प्रतीक्षारत छल; सुजनै सह संगमः ; रमणजी, नचिकेता जी एवं दीपा रेस्टोरेंटमे चाहक कप संग ‘(बेडसँ दूर) भोरुका चाह सेवन करैत रहथि’. हमहूँ संग बैसि गेलहुँ. ओतय ‘
जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार, वहीं रात हो गुलज़ार’ बला बैसाड़ तँ नहि भेलैक, मुदा, चाहक अनेक कपक बीच बहुतरास गप भेलैक. ताहि प्रकारक गप-सप जाहिमे रूचि अछि, आ मन लगैत अछि. क्रिसमसक छुट्टीक दिन आ समानधर्मा लोकक संग. घड़ी पर नजरि गेल तँ साढ़े आठ बाजि गेल रहैक. किछु कालक बाद मैसूर विदा हेबाक छल. अस्तु, बैसाड़ विसर्जित भेल.   
जँ शहरक भीड़सँ मन अकच्छ भए गेल हो, आ  एसगर वा परिवारक संग स्वच्छ शान्त-शीतल स्थानमे किछु दिन रहब, पोथी पढ़ब आ गप-सप करब नीक लगैत हो, तँ जाड़क ऋतुमे श्रीरंगापत्तिनम् क कर्नाटक पर्यटन विभागक होटल ‘मौर्या रिवर व्यू’ नीक विकल्प थिक.


Monday, January 5, 2026

कावेरीक कछेर पर

 निर्मल वायु, स्वच्छ शीतल जल

आओर गाछ केर छाहरि

धरती कोर माइक थिक, अपन 

कावेरी केर आँचर।

हमर जनम कमला कोसी लग

सिंधु- सियाङ् धरि धाङल, 

कमला आइ क्षीण दुर्बल छथि

चारू कातेँ बान्हल।

केहन मन जमुनाकेँ हेतनि,

भेली फेनसँ म्लान,

कारी कांति मोहक दूषित छनि,

कोना कए बचबथु प्राण!

मनुख जाति सोदर संतति थिक

जेहने नदी, समीर 

प्राण सभक एके संग बान्हल

जोड़ने तंतु महीन ।

Saturday, January 3, 2026

गार्जियन

 

गार्जियन


भौजीक अचानक एना चल जायब बौआभाईकेँ भीतरसँ तोड़ि देलकनि. सरि भ’ कए चिकित्साक अवसरे नहि भेटलनि. तथापि, जे डाक्टर कहलखिन, से उपचार भेलनि. मुदा, जे हेबाक छलैक, भेलैक. ओहुना उचित-विहितक विचारमे बौआभाईकेँ फुसिएक बड़प्पनक हिस्सक नहि रहनि. आ ने देखयबाक लेल हुनका कर्मकांडहिमे विश्वास रहनि. अपने जे सोचथि, ओएह बाट धेने चलैत चलल चल जाथि. मुदा, भौजीक श्राद्धक पसार हुनक मन विरक्त कए देलकनि. तैओ, ककरहु किछु कहलखिन नहि; रहिमन निजमन की व्यथा मनहि राखिए गोय.

जखन सब काज बीति गेलैक, एक दिन छोटकी बेटी, सरिता, दरबज्जा पर आबि लगमे बैसि गेलखिन. बौआ भाई आराम कुरसी पर ओलरल विचारमग्न छलाह; बुढ़ारीमे जीवन संगी चल जाएबसँ पति-पत्नीसँ बेसी आओर आन के प्रभावित हएत.

पिताकेँ विचारमग्न देखि, सरिताए मौन तोडलनि: कहलखिन, ‘माँ तँ चल गेल. सब काजो नीक जकाँ भए गेल. बड़का संतोष. बौआ सम्हारि लेलनि.’
‘हँ. हमरा सब दिन अपने बल काज देलक. एखन धरि लाठीक काज नहि पड़ल. अपनहि पयर पर ठाढ़ छी. आगुओ तकरे भरोस.’

बेटी गुम्म भए गेलखिन. बौआ भाई फेर बाजब शुरू केलनि: ‘तोहर माय वा हमरा अपने जहिया कहियो किछु रोग-व्याधि भेल. कहियो अनठाओल नहि.’ कहि ओ कनेक कालक लेल चुप भए गेलाह. सरिता बापक मुँह दिस ताकय लगलीह. बापक मुँह देखि हुनका भेलनि, जेना, कोनो ज्वालामुखी फ़ुटबा लेल तैयार छल. बौआ भाई फेर शुरू भेलाह: ‘आगू जेना विचार भेलनि, केलनि. अपना दरबज्जा पर पछिला वर्ष बच्छा तरेँ बियाइलि गाई छल. पशु आब धन नहि गराक घेघ थिक. गोंत-गोबर-सफाई-सेवा लेल लोक नहि भेटैत छैक. अगत्या बेचय पड़ल. पछाति, काजमे फेर तीस हज़ारमे गाई-बच्छा किनलनि. ओएह गाई-बच्छा पोखरिक घाटहि पर पात्र लगले एगारह हज़ारमे बेचलनि. अंगनामे जे गाई दान केलनि, से अगत्या गाड़ी पर लादि कए ओझाक दरबजा धरि पहुँचाबय पड़लनि.’ कहैत बौआ भाईक भौंह ऊपर चढ़ि गेलनि. हुनक भावमे विचार मंगबाक वा सहमतिक याचना नहि रहनि. पिताक भाव देखि बेटीकेँ पिताक मनोभाव बुझबामे भाङठ नहि भेलनि. सरिता कहलखिन, ‘पहिने वैतरणी पार करबाक हेतु लोक सवा टाका वा गाईक संग गोदान करबैत छल. आब शय्यादानमे पलंग-सोफा आ ओछाओन-बिछाओनक संग टॉर्च-मोबाइल, टेबलेट-टीवी आ ए सी सेहो दान होइत छैक.’ कहैत सरिताकेँ मुसुकी छूटि गेलनि. मुदा,बौआ भाईकें एहि नव रियाए पर हँसी नहि लगलनि.

परसू बौआ भाई अकस्मात् क’ल पर पिछड़ि गेलाह. खसलाक बाद अपनेसँ उठि कए ठाढ़ो नहि भेल भेलनि. दू दिनसँ बौआभाई बिछाओन धेने छथि. किछु दर्दनिवारक दवाई चलैत छनि. डाक्टर ऑपरेशनक सलाह देने छनि. बेटा डेरायल छथिन, गुनधुनमे छथिन. कहैत छथिन, केओ-केओ कहैत अछि, अस्सी बरखक बाद ऑपरेशनसँ खतरा रहैत छैक.
बौआ भाई पुछैत छथिन,’ डाक्टरसँ पुछबनि बिछाओन धेने खतरा नहि छैक.’ बेटा कपिलेश्वर गुम्म भए गेलखिन.

दर्द रहितो बौआ भाईक ठोर पर मुसुकी पसरि जाइछ छनि. बेटाकेँ कहैत छथिन, ‘बौआ, डराउ जुनि. हमरा चिकित्सासँ भय नहि. भय बिनु मांगल सलाहसँ होइछ. हम मरिओ जायब तँ छार-भार हमरे कपार; कोनो एहन औषधि नहि, करा किछु दुष्प्रभाव नहि होइछ, कोनो एहन ऑपरेशन नहि जाहिमे खतरा नहि. हमर अपन तर्कबुद्धि काज करैछ. दायित्वबोध सेहो अछि. संगहि, यावत् जीबैत छी, अपन गार्जियन हम अपनहि छी. रहल क्रिया-कर्म. हमरा तकर चिंता नहि. हम अपन शरीर-दान करबाक करार दरभंगा मेडिकल कालेजक शरीर रचना विभागमे दाखिल कए आयल छी. जखन अवसर अओतेक, तँ समीपस्थ संबंधीक रूपमे अहाँलोकनि केओ अपन सहमति पत्र पर हस्ताक्षर क’ कए देबैक. हमर शरीरक जे कोनो अंग कोनो आन मनुखक शरीरमे लागि सकतैक से बुझू समाजक उपकार भेलैक, हमरा हेतु संतुष्टि. बाँकी शरीर पर विद्यार्थीलोकनि मानव शरीरक संरचना पढ़त. हमरा जनैत, मानव शरीरक एहिसँ नीक अओरो कोनो उपयोग नहि भए सकैछ. रहल समाज, से गाँओ भरिमे सबकेँ बुझले छैक, हमरा श्राद्ध, भोज आ दानमे विश्वास नहि, ओ आवश्यको नहि. ई विचार हम कतेको बेर विष्णु भवन मन्दिर आ दुर्गा स्थानक बैसाड़मे सार्वजिनक रूपें व्यक्त कए चुकल छी. जखन हमर शरीर नष्ट भए जायत, तँ भूख-पियास ककरा लगतैक.
अहाँलोकनि सेवामे कोनो कसरि नहि रखैत छी, से हमहूँ देखिते छी आ समाजो देखिते अछि. तखन कथीक परबाहि! रहल हमर चिकित्साक खर्चा. सरकार पेंशनक ऊपर बैंक मोटरकार- मोटर साईकिल वा घर बनयबाक हेतु कर्ज दैत छैक. हमर चिकित्साक हेतु लोन तँ भेटत नहि. हमरा तकर आवश्यकताओ नहि. अपन अरजल जमीन अछि. से तँ हम बेचिए सकैत छी. बैंकमे जमा पूँजी अछि. सेहो खर्च कय सकैत छी. हमर इलाज कराउ.’ कहैत, बौआ भाई अपन दस्तखत कयल दू-तीन गोट सादा चेक कपिलेश्वरक हाथमे दए देलखिन आ कहलखिन, काल्हि हमरा दरभंगा लए चलू. आब बिलम्ब नहि हो. आ हँ जखन जे खर्च होअय, टाका बैंकसँ निकालि लेब. चेकबुक संगहि रहत, आ हम छीहे. कहैत बौआ भाईक ठोर पर मुसुकी पसरि अयलनि.     
कपिलेश्वर अवाक् भए गेलाह.       

Sunday, December 28, 2025

Lawlessness Must End

Today's ( Dec 28) The Times of India carried a disturbing piece of news. A twenty-four-year old MBA student, a victim of racial abuse and murderous attack died to day at a hospital in Dehradun after fighting for life for fourteen days. The incident occured on December 9 when Anjel and his brother Michael Chakama objected to being called as Chinese,etc. They were allegedly brutally attacked by a group of six men in which Anjel was fatally wounded. 
The incident, disturbing as it is, raises serious questions wanton attack by hooligans on people who do no offence. This lawlessness justifiable on no account need to be curbed. But when that doesn't happen lumpen elements feel encouraged and bring shame to the whole country.
Th authorities need to act quckly and devicively to send a strong message and prevent such horrific incidents. 

समकालीन मैथिली कथामे बदलैत स्वर

 

समकालीन मैथिली कथामे बदलैत स्वर

एखन समकालीन मैथिली कथामे बदलैत स्वर हमर चर्चाक विषय थिक. समकालीनसँ हमर तात्पर्य एकैसम शताब्दीक रचनासँ अछि. ओहि विषयसँ अछि, जे एखन केन्द्रमे अछि, जे प्रासंगिक अछि. स्वर शब्दसँ हमर अभिप्राय लेखकक विभिन्न वर्ग, विषय वस्तु, कथाक विभिन्न प्रकारसँ अछि.
एहिमे दू मत नहि जे पछिला पचीस वर्षमे कथा लेखनक परिदृश्य बदल अछि. संख्या थोड़ नहि. प्रिंट आ सोशल मीडिया पर जतेक किछु लिखल जा रहल अछि, से ने सबटा उपलब्ध होइछ, ने सबहक ठेकान राखबे संभव. ‘धूमकेतु’क गप्प मन पड़ैत अछि
. ओ कहैत छथि, ‘खिस्सा जीबैत-भोगैत तँ सब अछि, मुदा, ओकरा पढ़बाक दृष्टि सबकेँ नहि होइत छैक.’ संगहि ओ इहो कहैत छथि, ‘बोधक विभिन्न-स्तरीय अन्तर्धारा एक्के संगे प्रवाहित होइत रहित छैक. सभ खिस्सा सभ लेल ने लिखल जाइछ आ ने सभकेँ नीके लगैत छैक.’ तेँ, एके कालखण्डमे लिखल दू-चारि-पाँच रचनाकारक नाम प्रत्येक समीक्षा आ संकलनमे भेटत. बाँकी रचनाकारक संज्ञान लोक नहि लैत छैक. संगहि, कथाक विवेचनामे व्यक्ति सापेक्षताक दोष सेहो संभव छैक. साहित्य अकादेमी द्वारा 2010मे प्रकाशित ‘मैथिली कथा शताब्दी संचयन’क भूमिकामे रामदेव झा एहि बातकेँस्वीकार करैत छथि: ‘वर्त्तमान कथा संग्रहक उद्देश्य अछि विगत सय वर्षमे भेल मैथिली कथाक विकासक एक सामान्य परिचयक हेतु उपयुक्त सामग्रीक संकलन. एहि संग्रहमे ई कदापि सम्भव नहि जे समस्त उत्कृष्ट कथा अथवा समस्त रचनाकारक कथाकेँ संकलित कयल जाय.’    

एखनि नव बात ई जे एखनुक रचनामे रचनाकारक नव, पुरान सब वर्ग छथि.  रचनाकारमे ओहो वर्गक प्रतिनिधित्व अछि, जाहि वर्गपर केन्द्रित कथा, पहिने बतर ‘उपकार’ बूझल जाइत छल. मुदा,कथाक विषय होएब भिन्न बात थिक. अपन कथा अपन दृष्टिसँ अपने शब्दमे व्यक्त करब कथाकेँ सहजता, विश्वसनीयता आ भिन्न स्वादे टा नहि, ओ गुण सेहो दैत छैक, जे घटनाक वर्णनकेँकथा बनबैत अछि. ततबे नहि, एखन कथा-लेखनमे एहन अनेक स्वर सोझाँ आयल छथि, जे नवे टा नहि, अपन प्रतिभा आ कथ्यक बलें रचनाकारक रूपमे प्रतिष्ठाक अधिकारी छथि. मुदा, मैथिलीमे पेरूमल मुरुगन तँ आयब बाँकिए छथि. जे किछु.
तथापि, कथाक वर्त्तमान स्वरपर दृष्टिसँ पूर्व, कनेक ओहि सामाजिक परिवर्तनक चर्चा करी जाहिसँ एहि युगमे मानवीय जीवन प्रभावित भेले. जनसंख्याक वृद्धि समस्या थिक. शिक्षाक प्रसार विकासक अंग थिक. जीवन-स्तरमे सुधारक आकांक्षा उचित थिक. रोजगारक थोड़ अवसर अजुका कटु सत्य थिक. पलायन आ विस्थापनक एहि सभक संगीओ थिक आ परिवारक विखण्डन कारणो थिक. दोसर दिस, समाजिक न्याय, आ लिंग-भेदक उन्मूलन, नागरिक अधिकार थिक. एहि सबहक बीच मानवीय मूल्यक ह्रास, आ धार्मिक असहिष्णुताक सत्यकेँके नकारि सकैछ. मुदा, एहू विषय पर मतभेद सामजिक यथार्थ थिक. ततबे नहि, इहो विडंबना थिक, जे एहि ‘ग्लोबल विलेज’मे भूमण्डलीकरणक अछैतो देश-देशक बीच उठैत नव-नव देबाल ठाढ़ भए रहल अछि. ई नव चुनैती थिक. एहि सभक बीच इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी आ सोशल मीडियाक अभूतपूर्व क्रांतिक संग-संग नव-नव रोजगारक उदय भेले, जाहिमे नारि आ पुरुष दुनू समान रूपें सहभागी छथि. एहिसँ मनुखक जीवन पद्धतिए नहि दैनिक जीवन सेहो अभूतपूर्व रूपें प्रभावित भेले. एहि परिवर्तनक प्रभाव दूरगामी भेले. एहि सब परिवर्तनक स्वर अनेक दिशासँ प्रतिध्वनित होइछ. एहि ब्रेक-नेक (जनमारा) जीवनक पहिया तर मनुख अपनाकेँ तेहन दाबल अनुभव करैछ, जे समीपक मनुखक हाक तँ दूर, ओ हाहाकारो सूनि, ‘तानि कमरिआ पड़ल’ रहबे नीक बूझैछ. एहि परिवर्तनक बीच कथाकारलोकनि नजरि मनुष्यक ‘शोर्ट अटेंशन स्पैन’ पर नहि पड़लनि से नहि. प्रायः, ‘बिहनि कथा’-सन विधा एही पारिस्थितिक उपज थिक. 
एहि सब परिवर्तनक बीच जखन हमरालोकनि वर्तमान कथाक स्वरुप देखैत छी, तँ, कथाक स्वरुप मोटा-मोटी अपरिवर्तित लगैत अछि. वर्तनीक विभिन्नता अछि. उपभाषामे कथा लेखन आरंभ भेले; ई नव आ स्वागतयोग्य थिक. उपभाषाक गप भेले तँ एकटा रोचक संदर्भ स्मरण भए आयल. एक दिन मैथिली-हिन्दीक प्रतिष्ठित हस्ती भाषा-उपभाषा पर फेसबुक पर किछु लिखने रहथि. भाषाक एकरूपताक गप रहैक. हम लिखि देलियनि, ‘
Gone with the Wind सन कालजयी रचनामे समाजक विभिन्न वर्ग भिन्न-भिन्न अंग्रेजी बजैत छल.’ नहि जानि, किएक, ओ बमकि गेलाह.’
आब पुनः विषय पर आबी.  

मैथिली कथा आ कथ्यक आयाममे परिवर्तन अवश्य भेले. मुदा, कथाक विषय आ वस्तुस्थितिमे किछु विरोधाभास सेहो छैक. उदारहणक लेल हमरालोकनिक बूढ़-पुरान  आ हमरालोकनिक पीढ़ी सेहो गामसँ कमासुत युवाक पलायन आ खाली होइत गाममे दया नहिओ, तँ पीड़ा आ नास्टैल्जियाक भावसँ देखैत अछि. मुदा, ई सत्य थिक, हमरालोकनिक अपने पीढ़ी शिक्षा आ रोजगार लेल गाम छोड़ने छल. ततबे नहि, हमरा सबकेँभले किछु दिन लेल गाम लेल सुन्न लागल हो, मुदा, गामसँ बहरायब हमरालोकनिक सफलता आ समृद्धिक द्वारिए टा नहि खोललक, आब हमरालोकनिकेँगाम घूरि जायब संभवो नहि हएत. एखनहु महानगरमे बसैत अधिकतर युवकक शहरी जीवन, जँ पहिल प्रवासी पीढ़ीक हेतु रोजगारक द्वारि खोलैछ, तँ विस्थापन अगिला पीढ़ीक हेतु शिक्षा-समृद्धि- आ upward mobility क द्वारि खोलैछ. ई सब अवसर गाममे उपलब्ध नहि छैक. पलायनक ई पहलू, मनुखक जीवनक सत्य केर ई  फलक ग्राम्य जीवनक काल्पनिक रोमांटिक व्यूमे देखबामे नहि अबैछ, आ ने गामसँ बहराइत युवाक स्वरमे ई व्यक्त होइत अछि. कारण, पलायन अनेक अर्थमे मुक्ति थिकैक. 
आब एही परिप्रेक्ष्यमे हमरालोकनि समकालीन मैथिली कथामे बदलैत स्वरकेँ अकानी. एहि बीचमे विभिन्न लेखकक जे कथा हमरा पढ़बाक अवसर भेटल, ओही पर हमर वक्तव्य आधारित अछि. सामग्रीक उपलब्धता, रूचि, आ अध्यन हमर सीमा थिक. ततबे नहि, हम एहू हेतु सजग छी, जे हम निविष्ट विद्वान, प्रसिद्ध साहित्यकार आ सुधी श्रोताक बीच छी.

हमरा लोकनिक समाज पारंपरिक अछि. परंपरामे किछु जड़ता रहैत छैक. मुदा, सामाजिक परिवर्तन ओ शक्ति थिक, जकर सोझाँ मनुष्य आ समाज अपनाकेँ अशक्त पबैछ. फलतः, लोककेँ बेमोनहु परिवर्तन अंगेजय पड़ैत छैक. मुदा, ओकर मन भूतसँ अपनाकेँ पूर्णतः तोड़ि नहि पबैछ. फलतः, विभिन्न वर्गक मैथिल युवक भले अपन भूमिसँ दूर रहथु, भूमिक माया सतत्  ह्रदयकेँ सालैत रहैत छनि. ई विषय अनेक मैथिली कथाक केन्द्रमे देखबामे अबैछ. तहिना, गाममे एसगर पड़ल वृद्धलोकनिक एकाकी जीवनक चित्रण बेर-बेर सोझाँ अबैत अछि. जे वृद्ध धिया-पुता लोकनिक दवाबें, वा धिया-पुताक लग रहबाक लोभें शहरमे जा कए रहब स्वीकार करैत छथि, हुनका लोकनिक हेतु शहरी जीवन चाहे तँ जहल प्रतीत होइत छनि, वा सब सुविधाक अछैतो ‘सोनाक खोप’ भए जाइछ छनि. मुदा, एकर बीच मज़दूर वर्गक विपन्न वृद्धलोकनिक सेहो एकाकीपनाक दंस ओहो तँ भोगिते छथि. हिनकालोकनिक एकाकी जीवन समाजक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ पर पड़ल रहि जाइछ.
गामक परिदृश्य पर आधारित अनेक कथा नजरि पर अबैत छि. हालमे एही विषय पर डाक्टर शंभु शंकर झाक पोथी ‘नोर भरल आँखि’ नजरि पर आयल छल.

एक दोसर विषय जे मैथिली कथामे बेर-बेर आ अनेक ठाम अभरैछ ओ थिक रिटायर्ड नागरिक लोकनिक उपर, घर-द्वार बेचि शहर जा कए बसि जयबाक दवाब. अनेक बेर जखन लोक एहन प्रस्तावकेँ अंततः स्वीकार कइओ लैछ तँ कदाचित् एहन अघातक शिकार होइछ जकर चर्चा श्याम दरिहरेक ‘कोखजाया’मे भेल छल. काल्पनिक हो वा सामाजिक सत्य, मुदा, ई समसामयिक समस्या तँ थिके.

आब किछु आओर रचना बानगीक रूपें देखी:

पहिने हम महिला रचनाकारलोकनिसँ आरम्भ करैत छी, यद्यपि, पुरुष आ महिलामे रचनाकारक वर्गीकरण कतेक उचित एहि पर मतक भिन्नता संभव. ओना ई रोचक थिक, मैथिली कथा साहित्यमे भले थोड़, मुदा, नारि सहभागिता बीसम शताब्दी तीसरे चारिम दशक सबसँ आरम्भ भए गेल छल. शाम्भवी देवीक चर्चा होइत रहल अछि. मुदा, दोसर रचनाकार- अन्नपूर्णा देवी- जनिक कथा, ‘सासुक स्नेह’ 1934 ई.मे ‘मिथिला मोद’क एक अंकमे छपल छल तनिक चर्चा, हमर जनैत, केवल ‘किरण’ जी केने छथि.
आब वर्त्तमान रचनाकारक रचना पर एक संक्षिप्त दृष्टि फेरी.

एकठाम विभिन्न रचनाकारक कथाक संकलन वा पोथी-पत्रिकाक उपलाब्धताक समस्या सर्वविदित अछि. तेँ, हमरा लग मे ‘मिथिला दर्शन’क जतेक अंक उपलब्ध छल. पहिने ओकरे उनटाओल. ओहिमे प्रत्येक सुपरिचित महिला आ पुरुष रचनाकारक कथा भेटल.
पहिल नजरि नीरजा रेणुक ‘बीआ’ आ ‘अम्मा’ पर पड़ल. दुनूक समस्या ओएह: पहिलमे अपरिचित नेनाकेँपोसपूत बनएबाक दंस आ दोसरमे अपने सफल बेटासँ अपमान; दुनूमे माइक अवहेलना. माता-पिताक अवहेलना एहि युगक कथाक आम ‘थीम’ थिक. ‘लांछित के ?’ शेफालिका वर्माक पुरुष आ नारि सहकर्मीक संबंधक अंतर्द्वंद आकृष्ट केलक. मुदा, ‘पुरुष ओहीठाम ख़राब होइछ, जतय महिला लिफ्ट दैत छैक’ आजुक युगक कामकाजी महिलाकेँ प्रायः विडंबना पूर्ण लगतनि. तथापि, पात्रक बीचक उहापोहक वर्णन आ एहि कथाक अंत आकर्षित केलक. शेफालिका वर्माक ‘क्षणक आवेग’मे कामकाजी नारिक जीवनक ‘पारंपरिक सत्य’क पुरानावृत्ति होइछ. समस्या अजुको होइत दृष्टि, ‘ नारि जीबैत अछि खंड-खंड भए. ओ संपूर्ण अंतिम श्वासमे होइत अछि’, पूर्णतामे हमरा नहि अरघल.
पन्ना झाक कथा दोसराइतमे समाजक ओहि वर्ग -नाबालिग नौकर- क चर्चा अछि जे प्रायः कथाक विषय नहि होइछ. समय अओतैक जखन शहरी बालमज़दूर ‘
Slumdog millionaire’-जकाँ वा आन प्रकारें कथाक दोसर पक्ष- अपन अनुभूतिकेँ - कथा-जकाँ प्रस्तुत करत.
महिलालोकनिमे एक रचनामे सर्वथा नव कथाकारक कथा भेटल: ‘कोरियन बहुआसिन’ लेखिका, सरिता मिश्र थिकीह. कथाक विषय
globalized world मे समान्य मध्यवित्त दंपति जे अपन चारि कन्याक विवाह दहेज़ द’ कए केने छथि, हुनक बालक कोरियन कन्या चुनि लैत छथिन. एहन अप्रत्याशित दुर्घटनाक कारण मानसिक रूपें उद्विग्न मातासँ लेखकक भेट ट्रेनमे होइत छनि. दिल्लीसँ पटनाक भरि रातुक यात्राक
First person अकाउंट रोचक तँ छैके, ई भूमंडलीकरण आ परंपरागत समाजक अपेक्षाक बीच सामाजिक द्वन्दक रोचक आयामक उत्तम चित्रण थिक.

रेणु झाक ‘ऐंठ’ समाजक एक असम्मानजनक परिपाटी- नारिक पतिक ऐंठ खयबाक प्रथाक अस्वीकृति थिक. कथाकार अभिलाषाक ‘लगलै जेना’ मे भूमिसँ हुलकी दैत नवांकुरकेँ देखि एक प्रौढ़ाक मनमे जीवनक नव राग अंकुरित होइत छनि. आ ओ अपन दूरस्थ पतिसँ मोबाइल पर विडियो कॉल कय एक नव स्फूर्तिक अनुभव करैत छथि. कथाक विषय आ नव बिंब आकर्षक लागल. विभा कुमारीक ‘हनीमून पैकेज’ मे समलैंगिकता आ वाइफ-शेयरिंग-सन सामाजिक सत्य जे एखन धरि झाँपनक तर छल, से उजागर भेल अछि. ततबे नहि, परिस्थिति देखि पतिक चुनावक तुरत बदलि जयबाक निर्णय, व्यवहारमे  युगानुकूल परिवर्तनक संकेत दैछ.
कथा सबहक बीच कथाकार अभिलाषाक आओरो कथा पढ़लहुँ. कथाकारक मुहे कथासँ भिन्न कोनो कथ्य कखनो काल विचलित कए दैत छैक. तहिना लागल ‘उतरी’ पढ़िकय. समाजमे एहनो परिवार अछि ‘जतय बेटीकेँ गरा महक उतरी टा बूझल जाइत छैक.’ आ दोसर गप आओर पैघ सत्य : ‘नैहरक लोक दहेज़मे किछु देअय, नहि देअय, मुदा, एकटा नाक जरूर दैत अछि. ओहि नाककेँ बचयबाक लेल, चाहे जतेक पीड़ा पीब पड़ै, आक्रामक आक्रोशक तीत अर्क कंठगत कर’ पड़ै, मुदा, नाक तँ बचा क’ राखै टा पड़ै छै.’
अभिलाषा अपन कथामे दाम्पत्य जीवनक अतिरिक्त अनेक आओर सामाजिक विषय अनने छथि, जे एखन धरि कथाक विषय नहि छल. मुदा, एकटा गप्प जे कलाकार-कथाकारकेँ कहिओ नहि बिसरबाक चाही, जे कथा मनोरंजनक साधन सेहो थिकैक. भाषा आ शिल्पक अभिव्यक्ति सेहो थिकैक. तेँ, केवल ‘साउंड बाईट आ ‘डायलाग’ कतेक बेर कथाकेँ नारा बना कए छोड़ि दैत छैक, ओकर कथाक गुण समाप्त कए दैत छैक.
रोमिशाक ‘भावनाक लोभ’ सेहो समसामयिक जीवनक कथा थिक. नव गप ई जे अनेक माता-पिताक जीवन संध्यामे, बेटीलोकनि माता-पिताक भावनात्मक शून्यताक खाधि भरैत छथिन, देखभाल करैत छथिन. एकर संबंध नारिक आर्थिक स्वतँत्रता-समृद्धिक अतिरिक्त वैचारिक परिवर्तनसँ सेहो छैक. बहुत दिन पूर्व बरेली मिलिट्री अस्पतालक लेबर रूमक द्वारिक ऊपर एकटा स्लोगन पढ़ने रही, से स्मरण भए आयल. स्लोगन रहैक:
Son is a son till he gets his wife, daughter is a daughter all her life.
समाजमे माय-बाप प्रति बेटी सभक मनमे दायित्वबोध बढ़ि रहल छैक. ई दायित्वबोध मजदूर वर्गमे सेहो भेलैए. ई गप कमला चौधरीक कथा ‘दृष्टि’मे बरख दसेक भिखारि छौड़ीक शब्द ’मायकेँ हमही हतियइ’ सेहो सुनैत छी. आ ओएह शब्द अमृताक मन बदलि दैत छनि. ओ निर्णय करैत छथि, जे आब ओ मायक तर्क-वितर्क- जमायबाबूक संग रहब हमरा सभक संस्कार नहि अछि- नहि मानतीह. ई सोचि ओ मायकेँअपना संग ल जयबा लेल स्टेशनसँ आपस भए जाइत छथि

मेनका मल्लिकक ‘थोपड़ी माने ..’ मे LGTBQ क विषय पर ‘थोपड़ी’क नव अर्थ उपस्थित करैत छथि.
बिभा कुमारी ‘बाबूजी नीके ना छथि’, जाहिमे तिरस्कृत माता-पिता ओहि घरकेँजाहिमे बेटा-पुतहु रहैत छलखिन, केँबेचि, अपन अपमानक प्रतिशोध लैत छथि. ई बदलैत समयक दस्तक थिक.      

नीता झाक दू गोट कथा नजरि पर आयल. पहिल, ‘पैतालीस मिनट’. कारण, संपूर्ण कथा रिक्शावाला मोनोलॉग-जकाँ छैक, जाहिमे कथाकारक उक्ति जे समाजक सब गारि ,माय आ बहिनिए पर केन्द्रित किएक छैक!, एक क्षण ठमकि किछु सोचबाक हेतु बाध्य करैछ. दोसर कथा, मिथिलाक बेटी एक नारिक कथा थिक, जकर विवाह (सीता माता-जकाँ) अवधमे भेल रहैक. मुदा, शराबी पतिसँ आजिज भए ओ धिया-पुताकेँ ल’ कए बिहार आबि रहबाक समाधान चुनलक. कारण, मिथिला, नैहरक अलावा नशा-मुक्त क्षेत्र छैक. कथा एतबे. मुदा, एहि विषय पर एक गोट रोचक गप मन पड़ल. पछिला फरबरीमे हमरालोकनिक DMCH एम बी बी एस 1973 बैचक सम्मेलन रहैक. अबितीमे ड्राईवर एकटा रोचक गप कहलनि: ‘सर, बिहारमे शराब भगवान हो गया है.’ ‘अच्छा?’ ‘जी सर. दिखता कहीं नहीं, पर, है सब जगह. और याद कीजिए, तो, कहीं भी तुरत प्रकट हो जाता है!’ प्रायः ‘मिथिलाक बेटी’क पति हाल-सालमे बिहार नहि आयल छलाह. आ सेहो नीके. नहि, तँ एतहु आबि, सीताक जिनगीक आफद बनि जइतथि!

समाज अनेक अर्थमे बदलि रहल अछि. समाज बदलैत छैक तँ देर-सबेर साहित्यमे ओकर प्रतिध्वनि सहज आ स्वाभाविक थिक. जँ साहित्य परिवर्तनकेँ नहि अकानैछ, तँ से भिन्न बात. साहित्यमे बदलैत स्वरक एक आओर विडंबना छैक. बदलैत स्वरकेँ सुनिओ कए अनठायब, अबैत लोकक पदचापकेँ सुनिओ कए नहि सुनब. कारण अनेक छैक, मुदा, ई तँ देखिते हेबैक जे समालोचना वा संकलनमे नव लोक, नव स्वर आ असहमतिक ध्वनिक समावेश कदाचिते भेटत. संभव छैक, सहजतासँ उपलब्ध, वा उपलब्ध कराओल वस्तु पढ़ब जतबे कठिन छैक, ततबे सहज आ सुगम छैक गओले गीत गायब, उद्धरणकेँ सोझे उतारि देब.

आब किछु गप नव आ आओर नव स्वरक गप करी.  मिथिला दर्शनमे हमरा दू गोट रोचक कथा पढ़बालेल भेटल. पहिल केर लेखक थिकाह, फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण. कथा थिक ‘परिवर्तित स्वर’. एहि कथामे नौकरी बचयबाक हेतु कलकत्तामे एक माड़वारी व्यापारीक ओतय नौकरी करैत  गोविन्द, केवल नौकरी बंचयबाक लेल, मृत पित्तीकेँ कोठलीमे छोड़ि बाहरसँ ताला बन्न कय दिन भरिक ड्यूटी चल जाइत छथिन. साँझमे जखन ओ काजसँ आपस अबैत छथि, तँ, स्थानीय समाज आ मैथिल बंधुलोकनिक हुनक घोर भर्त्सना करैत छथिन. एहन विषम परिस्थितिमे चारूकात सबसँ धकियाओल गोविन्द, यथार्थक हथियार उठा सोझे समाजपर प्रहार करैत कहैत छथिन, ‘तँ की हम अपन परिवारक चिंता नहि कए लाशक पूजा करय लगितहुँ! जकर ने तँ कोनो वर्त्तमान छैक आ ने भविष्य !’
एहन सत्य संभव छैक. एहि वाध्यताक कोनो इलाज नहि.

दोसर कथा थिक, ‘एकटा कलाकारक आत्महत्या’. लेखक थिकाह, वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार नाटककार सुशील. एहि एके कथामे, कथाक अनेक लेयर छैक; विस्थापनक वाध्यता, आ एकाकी जीवन. अछूत नारिकेँनोकर रखबाक वाध्यता आ  मैथिल संस्कारक दुविधा. आ एहि सबहक बीच बहैत अछि कथाक मनोवैज्ञानिक अंतर्धारा. पात्र थिक शिखा नामक बांग्लादेशी मुसलमान खबासिन, जनिका मलिकाइनि हिन्दू बूझि रखने छथिन, आ कलकत्ता निवासी मैथिल, सेवा-निवृत्त जग्गू बाबू, जे मुंबईमे बेटीक फ्लैटमे किछु दिन बिता रहल छथि. निम्नवर्गीय आवासक देबालक  क्षतविक्षत छैक. ओहि प्लास्टरकेँ जग्गू बाबू निरंतर तेना देखैत रहैत छथि, जे अंततः पत्नी आ बेटी हुनका विक्षिप्त बूझि मनोचिकित्सक लग ल’ जेबाक विचार करैत छथिन. ओही बीच पत्नी आ बेटी जखन किछु दिन लेल कलकत्ता जाइत छथिन. तेँ, जग्गू बाबूकेँपरिस्थितिवश बंबईएमे रहय पड़लनि; घरक ढेउरेनाइ परम आवश्यक रहनि. आश्रममे केवल जग्गू बाबू आ पार्ट-टाइम खबासिन शिखा रहि जाइत छनि. एहन निर्जनमे हुनका निचेनसँ देवाल देखबाक आ मनन-चिंतन करबाक अवसर भेटैत छनि, यद्यपि, शिखा हिनका बीच-बीचमे देबालक पोचारा लेल चड़ियबैत रहैत छनि. अचानक एक दिन हुनका देबालक टूटल-फूटल प्लास्टरक विचित्र आकृतिमे किछु प्रेरक छवि देखबामे अबैत छनि, जकरा ओ रातिए भरिमे रंग-टीप कए देखनुक कलाकृतिमे बदलि दैत छथिन. दोसर दिन, आकृति नव स्वरुप पर शिखाक प्रश्न, हिनक उत्तर आ शिखाक प्रत्युत्तरसँ जग्गू बाबूक मनमे चिंता आ लज्जाक एहन भावक उदय होइत छनि, जे अगिला रातिए जग्गू बाबू ओहि चित्रकलाकेँ पोतिकए नष्ट कए दैत छथिन.’ दोसर दिन कलाकृतिक एहन दशा देखि शिखा चकित रहि जाइछ. ओ कहैत छनि, ‘ अहाँ कलाकारक हत्या कए देल.’

एहि कथा सभक बीच किछु सिद्ध-प्रसिद्ध कथाकारक एहनो कथा देखबामे आयल जे ने तर्कसंगत छैक, ने मनोरंजक. लंबा-लंबा कथा आ उबाऊ कथोपकथन. एकेटा प्रासंगिकता- कथाकारक प्रसिद्ध नाम. मुदा, एतय ओ चर्चाक विषय नहि. कतहु-कतहु हमर अपनो कथा सबहक अभरल, मुदा, ओहो एतय चर्चा विषय नहि.

अकानल स्वरमे किछु सुपरिचित कथाकार छथि. विषय समसामयिक आ प्रासंगिक अछि. शिक्षा, प्रतिभा, आ श्रमसँ अर्जित अपन सामाजिक ओहदाक बलें अपन इच्छाक अनुकूल नारिक जीवन-पद्धतिक चर्चा एहि कथा सबमे भेल अछि. अन्य कथामे एखन धरि झाँपन देल सामाजिक सत्यकेँ उघारि, जीवनक सार्थकताक हेतु लोक मनोनुकूल निर्णय लए रहल अछि सेहो कथा सबमे स्पष्ट अछि.

मुदा, मैथिली कथामे एखनो ओहि अभिव्यक्ति अभाव अछि जे समाजक भूमंडलीकरणक संग कथामे आबि रहल अछि. एकटा गप आओर. अधिकतर रचनामे घटनाक वर्णन भेटल. अपन गप कहबाक हेतु हम पुनः धूमकेतुक शब्दक दोहरबैत, हुनके शब्दमे कहब, ‘रचनाक ओ भावभूमि’, जकरा धूमकेतु  ‘जीवनक निस्तार’ कहैत छथि, आ हुनके शब्दमे, ‘जत’ निरंतर गहनतम संघर्ष चलैत रहैत छैक’, ‘मनुक्खक’ ओहि  ‘संघर्षपूर्ण अंतस स्वयं सँ लड़बाक सनातन युद्धक्षेत्र’क कथा कदाचित्  एखनो कम आबि रहल अछि.

अंतमे ई अवश्य कहब, जे मैथिली कथाक स्वरुपमे भले बहुत अंतर नहि भए रहल अछि, कथ्यमे परिवर्तन देखार अछि. बिभा कुमारीक ‘बाबूजी नीके ना छथि’,कमलेश प्रेमेन्द्रक ‘निर्णय’ तथा ‘जितेंद्र नाथ ‘जीतू’क ‘सरप्राइज गिफ्ट’ आकृष्ट केलक’.  तथापि, मैथिली कथा समकालीन भारतीय कथा साहित्यक बीच कतेक समकालीन अछि, ई विवेचनाक विषय थिक. मुदा, एहन कथा जे एकाएक सूतलमे जगा दियए, बंदूकक गोली-जकाँ लागय, निर्भीकतासँ अप्रिय सत्यकेँ अभिव्यक्त करय, सामाजिक विसंगतिकेँ ठाई-पठाई व्यंगक संग प्रस्तुत करय तकर अभाव छैक. ऊपरसँ एहन कथा जकर अंत twist in the tale-जकाँ चमत्कृत कए दियअ, हमरा तेहनो  कथाक दर्शन नहि भेल. हमरा लोकनिक कथामे एखनो ग्रामीण विपन्न-वृद्ध-परित्यक्त आ अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यकेक कोटिमे छथि. तथापि, ओकर चर्चा नहि छैक से नहि: रोमिशाक कथा ‘भय’मे भागलपुर दंगामे एकटा हिन्दू बच्चा अपन गराक हनुमानी, आफताबक गरदनिमे पहिरा अपना अंगनामे आनि ओकर जान बचओने रहैक. ‘भय’ कथासँ हमर अपन कथा ‘शिवचंद’ जे भारतक विभाजनक समयक कथा थिक, स्मरण भए आयल.
समाजिक न्यायक चर्चा होइत रहैए. किन्तु, एखनहु बहुत किछु बदलबी बाँकी छैक. एहि विन्दुकेँ कनेक स्पष्ट करैत छी. हम सालमे एक-दू बेर गाम जाइत छी. ओतय किछु दिन रहैत छी. गामक प्रवासमे भोरुका टहलानमे हम गाम नाड़ीक स्पन्दन अनुभव करबाक प्रयास करैत छी. वर्ष 2024 यात्रामे एक दिन निकलल रही. हमरा गाममे टोल परसँ कोम्हरो विदा हएब बाट आमक गाछीए-कलम बाटें छैक. आमक मास रहैक. देखल,
बाटक कातमे आमक गाछ सब आमसँ लदल. कलममे एकटा छोट खोपड़ी. खोपड़ीक लगहि, पीच सड़कक कातहि एक मध्यवयसाहु व्यक्ति कुर्सी पर बैसल रहथि. लगमे एकटा कुर्सी आओर राखल. हम बाटक पूब दिसक गाछ दिस लक्ष्य कए पुछलियनि,’ ई आम किनकर थिकनि ?’
मोदाइ मालिकक’. आ ई? अहाँक थिक?हम बाटक पछबारि कात नव गछुली, जे आमक झाबा सबसँ लुधकल रहैक, तकरा लक्ष्य करैत पुछलियनि. नै मालिक. हम तँ किछु नहि छी. बुझू हम तँ सुगरक गूह थिकहुँ.’
ग्रामीणक एहन उक्ति पर हमर मोन विरक्त भए गेल. हम कहलिअनि,’एना जुनि कहिऔक’. जी, ठीके कहल-ए.’ ओ अपन गपक समर्थन करैत कहलनि.
हम हुनका लग राखल खाली कुर्सी पर बैसि गेलहुँ. कनेक परिचय पात कयल. मजदूर-किसान. नाम-जाति दूर रहओ. हम पुछलियनि. ‘घर कोन ठाम अछि?’ओ आंगुरसँ कनिएक दूर पर निर्माणाधीन पक्का मकान दिस संकेत केलनि.
हम कहलिअनि,अपन घर अछि. गुजर अपने करैत छी. तखन एना किएक कहैत छियैक ?’
जवाबमे ओ अनेक गप कहलनि, जाहिमे ग्रामीण जीवनमे होइत अनेक परिवर्तन, जेना, ध्वस्त होइत पुरान, ऊँच घर-परिवारक धन-संपत्तिक ह्रास आ ओही संपत्तिक बलें नव स्वामी सबहक उदय, सरकारी सुविधाक सत्य, आ माता-पिताक प्रति शहर दिस जीविका लेल जाइत अनेक युवक लोकनिक उदासीनताक अनेक झलक भेटल. मुदा, एकटा आश्चर्यजनक विषय सुनब एखन बाँकीए छल. ओ कहलनि,’ की कहब सरकार. डीह ले’ फल्लां मालिकक नाति पैसा नेने रहथिन. रजिस्ट्री नहि भेल रहैक. बाटा-बाटीमे कएक बरिस बीति गेलैक. दोसर भाई एलखिन तँ कहलियनि. तँ कहलखिन, ‘हमरा नहि बुझल अछि.’ फेन पूरा पाई देलियनि. आब घर बनबै छिऐक.’

दोसर विषय, जेना सर्वविदित अछि, गामसँ सब वर्गक पलायन आम थिक. अशिक्षित मज़दूरक बीच पलायनसँ हिन्दू आ मुसलमान दुनू समान रूपें प्रभावित अछि.  तथापि, हमरा अपन गामक छोट मुस्लिम समुदायक आर्थिक स्थिति हिन्दू मज़दूर वर्गक वनिस्बत बहुत बेसी कमजोर लागल. स्कूलहुमे मुसलमान नेना सबहक उपस्थिति नहिए-जकाँ. हिनका लोकनिकेँइंदिरा आवास योजनाक लाभ सेहो कदाचिते भेटलनि-ए, से अनेको गोटे गपक क्रममे कहलनि. प्रमाण आँखिक सोझाँए देखलिऐक. माने, गाममे अर्थ, आवास आ शिक्षाक दृष्टिए मुसलमान समुदाय आन वर्गसँ निश्चय पछुआयल अछि. यद्यपि सब किछु पंचायतक हाथमे छैक. ज ई समस्या आम थिक, तं, समाजक ई पक्ष एखनो मैथिली कथाक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ पर अछि. परिवर्तनक स्वरमे ई कतहु देखार नहि आओत. ओहुना, साहित्यक मुख्यधाराक दृष्टि समाजक प्रत्येक समुदाय पर नहि पड़ैछ, ओ सबहक कथा नहि कहि पबैए. कर्नाटकक मुस्लिम समुदायक कथा हमरा लोकनि ओही समुदायक बानु मुश्ताककहि स्वरमे सुनल.

सारांशमे, मैथिली कथा बदलि रहल अछि. एहिमे कामकाजी युवालोकनि आगू छथि. समकालीन समस्या कथाक मूल स्वर अछि. फिक्शन, आ प्रयोगक अभाव अछि. राष्ट्रीय स्तर पर पाठककेँआकृष्ट करबा योग्य कतेक मैथिली कथा आबि रहल अछि, वा नहि, हमरालोकनि स्वयं अनुमान करी.

तथापि, एतबा तँ अवश्य जे, बदलाव गति आओर बढ़बाक चाही. भिन्न विषयक, विविधताक, स्वाद आ स्वर, शैली आ उपभाषाक कथा चाही. मुदा, पाठक तँ  होअय. हमरा जनैत, जखन गामक नव शिक्षितवर्ग मनोरंजनक लेल मैथिली कथा पढ़य लगताह, वा जखन हुनकालोकनिक मनोरंजनक अनुकूल कथा उपलब्ध हएत तँ संभव अछि, कथाक गाछ नव-नव पल्लव दियय. मुदा, लगैत नहि अछि?, व्हाट्सएप आ फेसबुकक युगमे ई मनोरथ ‘मुंगेरी लालक हसीन सपना’ थिक? ओना कोन ठेकान, संभव अछि, सोशल मीडियाक इएह विधा सब अंततः कथा-साहित्यक संजीवनी साबित होअए, ओकर माध्यम बनय, ओकरा गतिशील बनाबय. 

(एहि लेखक किछु अंश श्रीरंगापत्तनम् मे 24 दिसंबरक दिन आयोजित 'नीर कथाकार सम्मेलन 2025' मे अपन संक्षिप्त वक्तव्य-जकाँ हम प्रस्तुत केने रही.)       






 

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