तोड़ डाले मैंने हर इक शीशे,
कर दिया आइनों का काम तमाम.
बचा गया फिर भी,
तालाब, नदियों और कुंओं में पानी,
सूरत मेरी देख कर,
मांगने लगा मुझ से हिसाब !
कीर्तिनाथक आत्मालाप, आत्ममंथनक क्षणमें हमर मनक दर्पण थिक. 'Kirtinathak aatmalap' mirrors my mind in moments of reflection.
तोड़ डाले मैंने हर इक शीशे,
कर दिया आइनों का काम तमाम.
बचा गया फिर भी,
तालाब, नदियों और कुंओं में पानी,
सूरत मेरी देख कर,
मांगने लगा मुझ से हिसाब !
1
दम ने मारय, थम्हय न कखनो
पिरथी, सूर्य, आ चान
शत योजन ओ भागय क्षणमे
जड़केँ से नहि भान।
नापि अबै छथि वायुयानसँ,
धरती पर नहि छनि जोर,
मन-विचार पर सक्क ने ककरो,
तकरा करता थोड़!
2
कान्ह कोदारि आ भूखल पेटेँ
जे तामय भरि दिन खेत,
लगने भूख जँ माङय भोजन,
असली नक्सल भेल!
झिंगुर
आन्हर सबकेँ चश्मा देलक,
नान्हि-नान्हि टा झिंगुर,
युग भरिसँ दुबकल समाज ले'
अयना किनलक झिंगुर ।
आँखिक सोझाँ दिन-देखारमे
किछुओ नहि सूझै छल,
किछुए दिन केर व्रत-उपाससँ
जोश बढ़ौलक झिंगुर।
कोना कहबै, ककर सुनत के?
ठकमूड़ी छल लागल,
हाथेँ-हाथेँ सुदुक मोबाइलसँ,
अलख जगौलक झिंगुर!
"चित्त जेथा भयशून्य"क अनुवाद
जतय चित्तमे भय नहि कोनो,
तानल सोझाँ माथ;
बुद्धि-विवेक पर रोध ने कोनो,
ने बांटल जग, ने संकीर्ण देबाल;
वाणी जतय उठय सत्यसँ प्रेरित,
दक्षता हेतुक, अथक उठय हमर नित हाथ;
जतय जड़ स्वभावक कारण,
निर्मल स्वच्छ तर्क केर धारा,
नहि मरुभूमहिमे बहि जाय;
अहिंक प्रेरणेँ, हे नाथ,
व्यापक हमर विचार आ कृतिसँ,
एहने स्वतंत्र स्वर्गमे जागय,
उठय, हमर ई देश।
अनुवाद: कीर्तिनाथ झा
When you don't fear the fear, you're the winner
जेहने विविध माटि अछि अप्पन
तेहने विविध अछि लोक,
भाषा मधुर, अनेको
बोली
माटिओक रंग अनेक।
शोणित सभक एक रंग जहिना
श्वासो एके थीक,
आगि-पानि विभेद ने मानय
संशय तखन कथीक?
सूर्य-चान बसै छथि ऊपर
एके ताप आ छाया,
तखन मनुख जे भेद कराबय
बेचय स्वार्थ, ओ
माया।
गाछ-वृक्ष नहि भेद करै अछि,
मेघ ने बाँटय पानि
मनुखक तखन बाँट-बखराकेँ,
लेबै कोना मानि!
मूर्ख रहौ, कपड़ा
नहि तन पर,
धन नहि दैछ विवेक
आगि-पानि आ झूठ-साँच केर
लक्षण होइछ अनेक।

Courtsey: The Statesman
पुल नया
है, जरा संभल कर चलिये।
सरकार अपनी है, खुल कर कहिये ।
रेत और मिट्टी से बना है पुल, फौलाद नहीं है!
पुल गिरते हैं, पल भर में सरकारें भी गिरती हैं,
आप की है सरकार, आप इसके मोहताज नहीं हैं।
नहीं बनते हैं अस्पताल तो बोलिये,
चले बेवजह बुलडोजर तो रोकिये।
बंद है आवाज, तो साफ कीजिये गला,
सीने को बनाइये फौलादी
इस में ही है सबका भला।
कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म लेख मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...