Thursday, October 15, 2026

विवर्त : पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

विवर्त1
(अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेख केर संकलन)


२०२३मे प्रकाशित डा. रमानन्द झा ‘रमण’क ‘विवर्त’ अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेखक संकलन थिक. एहि पुस्तकमे संकलित आलेखक पसार पैघ अछि; एहिमे पत्र-पत्रिका (मिथिला मोद एवं अन्य), उपन्यास(जिजीविषा: लिली रे; चन्द्रग्रहण: किरण), साहित्यकार (जीबछ मिश्र, जयधारी सिंह, शेफालिका वर्मा), लोकनायक आ लोकगाथा (राजा सलहेस, दीनाभद्री), शोक-काव्यमे राजनेता (ललितनारायण मिश्र) एवं मैथिली कथा-कविता-उपन्यासक विधाक किछु पक्ष धरि पर लेख संकलित अछि. किछु लेख विशेष अवसर पर देल बीज-भाषण लेल लिखल गेल अछि, बाँकी स्वतंत्र अनुसन्धान, एवं पोथीक भूमिका थिक.
मुदा समीक्षासँ पहिने लेखकीय वक्तव्यक चर्चा, जाहिसँ पोथीक पृष्ठभूमि, एवं लेखकक भावना आ समालोचना दृष्टिक पाछाँक निहित दर्शन फड़िच्छ होइछ. पछाति, ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक लेख पर वस्तुनिष्ठ विचार प्रस्तुत करब हमर अभीष्ट अछि.
मैथिलीमे आलोचनाक स्थितिपर चिंता व्यक्त करैत,वक्तव्यमे लेखक कहैत छथि, ‘बिना साक्ष्य आ बिना तर्कक पूर्व पीढ़ीक साहित्यकारक अवदानकेँ मूल्यहीन, वर्णवादी, गोत्रवादी प्रचारित करबाक प्रवृत्ति एमहर सघन आ प्रबल भेल अछि’,... ‘ई नहि बिसरबाक थिक जे मैथिलीक सभ लेखक अपन साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्पराक अग्रिम कड़ी थिकहुँ’. आगाँ, पुरान पीढ़ीक साहित्यकारक सीमित साधन दिस संकेत करैत, ओ हुनकालोनिक योगदानक महत्वकेँ रेखांकित तँ करिते छथि, ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकार द्वारा बनाओल भाषा साहित्यक विकासक ओही सोपान पर छओ’ मारबाक प्रवृत्तिक दुखद परिणामक दिस सेहो सचेत करैत कहैत छथि: ‘कोन ठेकान जे एहन लेखक(समालोचकक) स्थिति कालान्तरमे ओहने होनि, जेहन(दुर्गति) रूसमे लेनिनक शवक संग’ परवर्ती पीढ़ी’ केलक.
तेँ, आजुक साधन-संपन्न पीढ़ीकेँ ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकारलोकनिक छूटल काजकेँ उत्कर्ष धरि पहुँचाय अपन पताका फहरयबाक’ प्रेरणा दैत छथिन.’
आब समीक्षाक आरंभ ‘मैथिलीक तत्कालीन पत्र-पत्रिका आ स्वाधीनता आन्दोलन’ नामक लेखसँ करी. 
एहि लेखमे ‘तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित स्वाधीनता आन्दोलन सम्बन्धी गतिविधि, समाचार एवं ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित विविध विधामे सृजित मैथिली साहित्य आ भारतक स्वाधीनता आन्दोलनमे तकर सकारात्मक प्रभावक’ विवेचना अछि.
सर्वविदित अछि,
1947ई. सँ पूर्व मैथिली पत्र-पत्रिकाक संख्या आंगुर पर गनबा योग्य छल. लेखक सेहो कुल नौ गोट पत्रिकाक चर्चा कयने छथि, जाहि मे मुख्य दुइए टा – मिथिला मोद आ मिथिला मिहिर –दीर्घजीवी भेल, आ बीच-बीचमे प्रकाशन बन्न होइतो अनेक स्वरुपमे पाठकक सोझाँ अबैत रहल.
आलेखक अनुसार तहियाक पत्र-पत्रिका सभक संपादकीय नीति स्पष्ट रहैक. कोनो पत्रिका (मैथिल हित साधन) विभिन्न (दार्शनिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा अन्यान्य आवश्यक) विषयक संग मनोरंजक विषयक सामग्रीक प्रकाशनक नीति रखने छल, तँ कोनो( मिथिला मिहिर) स्पष्ट रूपें ‘राजनीतिक लेख नहि छ्पबाक’ संकल्प केने छल. ‘मिथिला मोद’ सेहो ‘राजनियम-विरुद्ध’ लेखकेँ अस्पृश्य घोषित कयने रहय2. लेखक कहैत छथि, जाहि पत्रिका(मिथिला-मित्र)मे प्रकाशन नियमावलीक बंधन नहिओ रहैक ओहूमे राजनीति वा स्वतंत्रता आन्दोलन पर केन्द्रित कोनो लेख नहि छपल छल. अर्थात् मोटामोटी सभ पत्र-पत्रिका स्वेच्छासँ सरकारक विरोध आ स्वतंत्रता आन्दोलनक समाचारसँ दूरे रहैत छल. तथापि, लेखकक विचारेँ ‘बिना अनुसन्धान एवं तत्कालीन पारिस्थितिक’ ज्ञानक बिना ई धारणा बनाएब जे ‘मैथिली  पत्रिकाक प्रकाशक आ सम्पादक देशक स्वाधीनता आन्दोलनक प्रति संवेदनशील नहि छलाह, अंग्रेज सरकारक अंधभक्त भए शासन-सत्ताक विरोधमे ने किछु बाजि सकैत छलाह आ ने किछु लिखि सकैत छलाह’ अनैतिहासिक धारणा थिक. हुनक विचारेँ, ‘एहन लेख जाहिसँ लोक चेतना विकास हो, जाहिमे विलुप्त गौरव आ उत्कर्षक जनतब हो, तथा तत्कालीन शासन-व्यवस्थाक प्रति घृणा होइक’ सेहो राष्ट्रीय स्वतंत्रतामे योगदान थिक, स्वतंत्रता आन्दोलनक समर्थन थिक’.
हमरा जनैत एहि विषय पर मतभेद संभव. हँ, घरेलू उत्पादनक समर्थन अवश्य असहयोगक समर्थन भेल.
1929मे ‘मिथिला नामक पत्रमे ‘हम दरिद्र किएक भेलहुँ’ नाम आलेख मे भारतक दरिद्रताक ऐतिहासिक कारणक निर्भीक विश्लेषण अवश्य अप्रत्यक्ष रूपें भारतीय स्वतंत्रताक पक्षधर मानल जायत. एहि प्रकारें आन पत्र सबमे सेहो स्वदेशी उद्योग आ उत्पादनक समर्थनमे लेख; महगाईक चर्चा, स्वराज्यक प्राप्तिक हेतु प्रेरणा, अंग्रेजी पढ़बाक लाभ, एवं  दरभंगा महाराजसँ परोक्ष रूपें  मिथिलामे उच्च शिक्षा संस्थानक स्थापनाक आग्रह इत्यादि विषयक लेख छपबाक चर्चा अछि.
‘मैथिली पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचनामे स्वाधीनता आन्दोलनक अनुगूंज’ एहि अनुसन्धानक दोसर विन्दु थिक. ‘ई प्रभाव विभिन्न विधाक रचनामे प्रचुर मात्रामे अछि’ कहैत लेखक  एकर पर्याप्त उदाहरण दैत छथि.
सारांशमे अनुसन्धानक सार-स्वरुप लेखक कहैत छथि: ‘स्वाधीनता आन्दोलनमे सक्रिय सहभागिताक लेल सामान्य मैथिलमे जाहि प्रकारक मानसिकता अपेक्षित छलैक, तकर निर्माणक लेल मैथिली पत्र-पत्रिका पूर्ण  संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण छल.’ मुदा, ई विचार एहि विषय पर सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन.
ततबे नहि, अति सीमित संख्या, अल्पजीवी स्वभाव, आ थोड़ पहुँचक कारण, ई पत्र-पत्रिका सब स्वतंत्रता आन्दोलनक प्रति जनमानसकेँ प्रभावित करबामे कतेक प्रभावी आ सफल भेल छल, से स्वतंत्र अनुसन्धानक विषय थिक. एक गप आओर: मैथिली पत्रिकाक स्वर हिन्दी एवं बांग्ला पत्रक तुलनामे केहन छल
, तकर चर्चा एहि लेखमे नहि अछि, ई एहि लेखक विषयो नहि थिक.
मैथिली पत्र-पत्रिकाक विकासमे ‘मिथिला-मोद’ एहि संकलनक दोसर आलेख थिक.  ‘मिथिला-मोद’ बीसम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मैथिलीक प्रतिष्ठित पत्र छल. तेँ
, एहि विषयक ऐतिहासिक महत्व अछि; कारण, एकर चर्चाक बिना मैथिली पत्रिकाक विकासक चर्चा असंभव.
लेखक कहैत छथि: ‘मिथिला-मोद’ अपन सामजिक दायित्वक प्रति पूर्णतः साकांक्ष छल, से स्पष्ट अछि.’.. (ई) मानैत छल जे देश वर्ग वा वर्ण विशेषक नहि थिक’ आ मिथिलाक समस्त निवासीकेँ मैथिल मानि देशोन्नतिक अपन अवधारणा सुदृढ़ कयने छल; संस्कृत शिक्षाक स्थान पर आधुनिक शिक्षा-प्रणालीकेँ बेसी लाभकारी मानैत छल, एवं साधनसँ बेसी खर्च आ अपव्ययकेँ देशोन्नतिक मार्गमे प्रबल बाधक मानैत छल. तर्कक पक्षमे पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कयल गेल अछि.
एहि आलेखक आलोकमे ‘मिथिला-मोद’ संकीर्णता एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, कन्याक बेच-बिकिन-सन कुरीति, एवं मादक द्रव्यक सेवनक विरोधी छल. एहि पत्रमे समुद्र-यात्राक पक्षमे आलेख प्रकाशित भेले छल ई पत्र ‘सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक (सेहो) छल.’ यद्यपि, एहि पोथीक पहिल आलेखमे संकलित साक्ष्यसँ2, ‘मिथिला-मोद सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक छल’ उक्तिक पूर्ण समर्थन नहि होइछ.
लेख आगू कहैत अछि, ‘मोद’ हिन्दीक विरोधमे ठाढ़ होबयवला पहिल पत्र छल; मैथिलीमे बाल-शिक्षाक पक्षधर छल. मिथिलाक्षरक ह्राससँ ई चिंतित छल तँ छले, ई मैथिलीमे विभिन्न विधाक मूल लेखन, एवं अनुवादकेँ प्रोत्साहित करैत शोधपरक निबन्ध एवं साहित्यक धारावाहिक प्रकाशन सेहो करैत छल.
एहि विषयमे किरणजीक उक्ति: ‘स्व. बंकिम बाबू लोकनि जाहि दृष्टिसँ बंग साहित्यकेँ समृद्ध करब आरंभ कयल- ओएह दृष्टि पकड़ि लेने छल मिथिला-मोद’3, लेखकक उक्तिक समर्थन थिक. दुर्भाग्यवश, ‘मिथिला-मोद’क अधिकतर संस्करण अनुपलब्ध अछि. अतः ‘मिथिला-मोद’ एवं अन्य पत्रक
digital platform पर संग्रहक सामूहिक प्रयास हेबाक चाही.
आद्यउपन्यासकार पं. जीबछ मिश्रक समय, समाज आ साहित्य एहि संकलनक तेसर लेख थिक. जीबछ मिश्रक ‘पारिवारिक परिचय’, ‘सम्पर्क आ प्रेरणा’, ‘पं. जीबछ मिश्रक समय’, ‘पं. जीबछ मिश्रक साहित्य’, ‘विचारक, समसामयिक विषय पर टिप्पणीकार पं. जीबछ मिश्र’, एवं ‘पं. जीबछ मिश्रक समीक्षात्मक दृष्टि’ एहि लेखक मुख्य विन्दु थिक. प्रत्येक विन्दुपर लेख विस्तारसँ चर्चा कयने छथि. ज्ञातव्य थिक, आन अनेक अप्राप्य एवं अनुपलब्ध पोथीक संकलन सम्पादनक बीच डाक्टर रमण जी ‘जीबछ मिश्र रचनावली’क सम्पादन सेहो कयने छथि.
प्रसंगवश एतय ‘पं. जीबछ मिश्रक समय’मे
19म शताब्दीमे मिथिलाक राजनीतिक एवं समाजिक स्थिति, ओहि समयमे विदेशी शासकक शिक्षा नीति एवं दरभंगा राजक प्रशासनमे हिन्दी एवं देवनागरीक जानकारक बहुलता पर सेहो चर्चा अछि. एतहि इहो चर्चा भेल अछि जे ‘महाराज महेश्वर सिंह 1857क पहिल स्वतंत्रता संग्रामक अप्रत्यक्ष समर्थक छलाह’. ओना, Eighteen Fifty Seven नामक पुस्तक कहैत अछि जे ‘बिहारक जमींदार लोकनि निरंतर ब्रिटिशक पीठ पर
ठाढ़ रहथि.(यद्यपि) एक समयमे दरभंगा, डुमरांओ एवं हथुआक निष्ठा पर संदेह (व्यक्त)भेल छल, मुदा ओलोकनि एवं अन्य जमींदार-बंधु जन-धनसँ (कम्पनी) सरकारक सहायता केलनि.
4  तथापि, एहि प्रकरणक दोसरो विवरण छैक,.5    
संयोगवश, इएह समय पं. जीबछ मिश्रक उपन्यास ‘रामेश्वर’क रचनाकाल छल. एहि लेखमे ‘रामेश्वर’ उपन्यासहु पर संक्षिप्त, किन्तु, सम्पूर्णतामे चर्चा भेल अछि. अस्तु, एतय पं. जीबछ मिश्र पर संतुलित एवं संक्षेपमे संपूर्ण सामग्री भेटत.
          अगिला लेख, ‘समकालीन मैथिली उपन्यासमे विश्वदृष्टि’मे लेखक पहिने समकालीनताक अवधारणा पर चिंतन प्रस्तुत करैत, ‘जीवनक मूल्यबोध’केँ समकालीनताक पर्यायक हेतु ‘विशेष समीचीन एवं ग्राह्य मानि’ अपन विचार प्रस्तुत कयने छथि. यद्यपि, ओ स्वयं मानैत छथि जे,  ‘जीवन-मूल्यक सर्वसम्मत स्वरुप निर्धारित करब कबैई(माछ)केँ तराजू पर जोखब-जकाँ (कठिन) अछि.’ तैओ, ओ मैथिली उपन्यासकेँ मानव-मुक्तिक अभियानक समकालीन युग-दृष्टिक अनुकूल, एवं समाजकेँ विभिन्न चुनौतीक सोझाँ डेग रोपबाक साहसकेँ स्वर दैत पबैत छथि.’
ई एहन विषय थिक जाहि सम्पूर्ण उपन्यास-साहित्यपर एक संग विचार देब कनेक कठिन.

‘मिथिला भाषाक नापी: अमीनक खगता’नामक लेख, ‘Language Mapping: Beyond the Boundaries’ विषय पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे देल भाषण थिक. एहि लेखमे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली भाषाक भौगोलिक क्षेत्र, ‘भौगोलिक आ भाषिक स्तर पर ‘मिथिला भाषा’क छटपटाइत आरि’, भाषा पर आन पड़ोसी भाषाक अवघात एवं ‘मिथिला भाषा’क नापीक बाटमे बाधा-व्यवधान एवं निराकरणक विन्दु तथा मैथिली भाषाक वर्तनीक स्वरुप पर एकमतक अभाव पर  सोदाहरण विचार करैत, लेखक भाषाशास्त्रक ज्ञानक अभावहुमे, आ राजनीतिसँ प्रेरित भावनासँ भाषाक स्वरुपमे हस्तक्षेप पर क्षोभ व्यक्त कयने छथि.

‘मैथिली कथामे  बहुसांस्कृतिकता’ नामक लेखमे भारतक सांस्कृतिक समन्वयक इतिहास एवं मिथिलामे बहुसांस्कृतिकताक प्रवेश एवं प्रसारक परिप्रेक्ष्यमे विषयक प्रतिपादन भेल अछि. मैथिलीक पहिल कथा ‘चन्द्रप्रभा’सँ आरंभ होइत एहि ई विवेचना लिली रे एवं किछु साहित्य अकादेमी-पुरस्कृत अन्य कथाकारक कथा धरि आबि समाप्त भए जाइछ. वस्तुतः, विगत पचीस वर्षमे प्रवासी मैथिलक संख्यामे असाधारण वृद्धि भेले. मातृभाषाक प्रति आकर्षण एवं रचनाक संख्या दुनू बढ़ल अछि. फलतः, समाजक अनेक क्षेत्रसँ  नव-नव स्वर एवं अनुभव सोझाँ आयल अछि. एहि सबकेँ सेहो विचारक परिधिमे अनने मैथिली कथाक बहुसांस्कृतिताक यथार्थ स्वरुप सोझाँ अबैत.
‘राजाजी’क रूपमे सलहेसकेँ सामाजिक मान्यताक आधार’मे सलहेसक मूलतः वर्णित चरित्रक प्रतिकूल  सलहेसकेँ राजाजीक रूपमे अभिहित करबकेँ साक्ष्यक विपरीत मानल गेल अछि. एहिसँ असहमत हेबाक कोनो ठोस आधारो नहि. तथापि, सामजिक एकजुटताक हेतु राजा सलहेस-सन लोकनायकक उपादेयताकेँ लेखक उचिते स्वीकार करैत छथि. वस्तुतः, राजा सलहेस-सन लोकनायक सम्मानसँ  समाजक मुख्यधारासँ अद्यावधि वंचित एक पैघ वर्गकेँ आत्मसम्मानक बोध होइत छनि. ई कि वृहत्  समाजक लेल कोनो छोट उपलब्धि भेल.
अस्तु, एहि आलेखमे विभिन्न लेखक-कवि द्वारा लोकगाथाक स्वरुपमे कयल गेल परिवर्तनक, एवं मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यमे लोकनायक सलहेसमे राजत्व एवं ईश्वरत्व आरोपित करबाक तार्किक विश्लेषण भेल अछि.
‘गीत दीनाभद्री: गाथाक विकास एवं महत्व’क नामक आलेखक आधार एहि विषय पर जर्मन भाषामे जॉर्ज ग्रियर्सनक ‘गीत दीनाभद्री ओ गीत नेवारक’ नामक  पुरान लेख, जे वर्ष २०१०मे डा. रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा संपादित एवं पुनः प्रकाशित भेल तकर संग भारत एवं नेपालमे दीनाभद्रीक गाथाक अन्य संकलन विवेचना करैत लेखक एक दिस जँ पाठ-भेद एवं कथा-भेदक विषयमे लोकतंत्रमे तुष्टिकरणक राजनीतिक दिस लक्ष्य करैत छथि, तँ, दोसर दिस ओ अत्याचारक एवं शोषणक विरुद्ध निर्धन श्रमिकक प्रतिकार एवं समान लक्ष्यक प्राप्तिक हेतु सामाजिक सहयोगकेँ एहि गाथाक कालजयी तत्व मानैत एहि गाथामे निहित लोकसाहित्यक अनेक तत्वकेँ सेहो उजागर करैत छथि.
सारांशमे ई आलेख एहि विषय संतुलित एवं उपयोगी आलेख थिक.
‘महाभारत कथा आधारित मैथिली साहित्य’, एहि विषयक सर्वेक्षण, एवं संक्षिप्त परिचयात्मक आलेख थिक. सर्वविदित अछि, महाभारत-सन ग्रन्थ कथाक विशाल भंडार एवं नव-नव साहित्यक सृजनक अक्षय श्रोत थिक. तेँ, ई विषय भविष्यहुमे अध्ययनक हेतु खुजले रहत. हालहिमे, बहुत दिन पूर्व लिखल पं. काशीनाथ झाक ‘धृतराष्ट्र विलाप’
6  नामक दीर्घ कविता प्रकाशमे आयल-ए. एकरो श्रोत सेहो महाभारते थिक.

‘जयधारी सिंहक समालोचना-कर्म’मे  मैथिली, अंग्रेजी एवं तंत्र-साहित्यक एहि विद्वानक कुल-परिचय एवं कृतिक संग, समालोचनाक प्रकृति एवं लक्ष्य पर जयधारी सिंहक विचार, तथा हुनक समालोचना-वृत्तिक समीक्षा भेल अछि.
          लिली रेक ‘जिजीविषा’ नोर-झोर नहि, नामक आलेखक शीर्षकक पृष्ठभूमि थिक, जीवकांतक उक्ति: ‘लिली रेक उपन्यास ‘पटाक्षेप’ नोर-झोर नहि थिक’. वस्तुतः, आजुक युगमे नारि लेखनकेँ ‘नोर-झोर’ कहि कतिआएब पूर्वाग्रहपूर्ण एवं पुरुषक अहंकारे बूझल जाइत. मुदा, नारि लेखनक प्रति तहियाक उपेक्षापूर्ण उक्ति आइओ शीर्षक बनि आयल, से रोचक थिक. विचारणीय थिक, की नारि वेदना-नोर-झोर- हास्यास्पद थिक? वा संपूर्ण नारि लेखन नोरे-झोर थिक? वा गंभीरता आ नारि-लेखन परस्पर विरोधी थिक. मुदा, तकर उत्तर जीवकांतक लेखनमे प्रायः भेटय.
मुदा,‘जिजीविषा’ उपन्यासक एहि समीक्षाक मूल कथ्य ई जे, जीवकान्तक धारणा- नारि साहित्यकार लोकनिक केवल अपन नारीत्व, ओकर समर्पण भावनाक निरादर आ खण्डनक चित्र (प्रस्तुत करबाक) - क विपरीत लिली रेक साहित्यकेँ ‘बन्न आङनसँ बाहर’क समस्याकेँ नेबो-जकाँ गारि प्रस्तुत करबाक क्षमता छनि. ओना ई तथ्य लिली रेक कथा ‘रंगीन पर्दा’ १९५६हि मे प्रमाणित कय चुकल छल. तथापि, साहित्यमे लिंगभेदक मानसकिताकेँ परास्त करब आइओ कठिन.
7  
          हम ‘सरल शेफालिका छी’ डाक्टर जगदीश मिश्रक अभिनन्दन ग्रन्थक लेल शेफालिका वर्मा पर लिखल आलेख थिक. एहिमे मैथिली-हिन्दीक सुपरिचित लेखिका शेफालिका वर्माक व्यक्तित्व एवं साहित्य पर संक्षेपमे विचारक संग  

श्री मती शेफालिका वर्माक आत्मकथा ‘क़िस्त क़िस्त जीवन’ पर विस्तारसँ चर्चा भेल अछि, जाहिमे हुनक जीवनक किछु 
रोचक घटनाक वर्णन सेहो अछि.

‘चन्द्रग्रहण:खण्डग्रास-सर्वग्रास-उग्रास’ मैथिलीक बड्ड पुरान उपन्यास, चन्द्रग्रहण, पर छोट आलेख अछि. एहिमे पोथीक रचना पाछूक प्रेरणा- समाज सुधार-, तथा एहि विषयमे पाठक लोकनिक अटकरक चर्चाक अतिरिक्त ‘भारती’ पत्रिकामे प्रकाशित भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’क चन्द्रग्रहण’क समीक्षाक चर्चा सेहो भेल अछि.
मैथिली अनुवाद-साहित्यक संदर्भमे ‘एक भारतीय यात्री’ नामक लेख पं. अम्बिकानाथ मिश्र द्वारा सुभाषचन्द्र बोसक आत्मकथा ‘
An Indian Pilgrim: An Unfinished Autobiography’क मैथिली अनुवादक समीक्षा थिक. एहि समीक्षामे एहि अनुवादक पाछाँक प्रेरणा एवं अनुवादक इतिहासक संग, साहित्यमे अनुवादक व्यवहारिक एवं साहित्यिक प्रयोजन, अनुवादमे श्रोत, लक्ष्य भाषा एवं संस्कृतिसँ परिचयक महत्व, मैथिली अनुवाद साहित्यक विकास, तथा मैथिलीमे आत्मकथा-साहित्यक अनुवादक इतिहासक चर्चा सेहो भेल अछि, जाहिमे ओलिवर गोल्डस्मिथक दू अंग्रेजी उपन्यासक ‘मैथिली साहित्य-पत्र’मे प्रकाशन चर्चा अछि. ज्ञातव्य थिक, एहि संदर्भमे ‘मिथिला-मोद’क योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैछ: पं. काशीनाथ झा ‘काव्यतीर्थ’ द्वारा लेखक रमेशचन्द्र दत्तक उपन्यास ‘राजपूत जीवन संध्या’ क मैथिली अनुवादक किछु अंश 1923हि ई.मे ‘मिथिला-मोद’मे प्रकाशित भेल छल.8  ईहो ऐतिहासिक थिक.
आलेखमे ग्रन्थक (मूल)श्रोतभाषाक अतिरिक्त तेसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद एवं पुरस्कार प्राप्त करबाक प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त भेल अछि. अंतमे पं.अम्बिकानाथ मिश्रक ‘एक भारतीय यात्री’क समीक्षाक संग एहि पोथीकेँ ‘मैथिली अनुवाद साहित्यमे महत्वपूर्ण गुणात्मक’ योगदान मानल गेल अछि.
‘धर्मेन्द्र विह्वलक जापानी पञ्चपदी:टांका’ जापानी काव्यशैलीमे लिखित धर्मेन्द्र विह्वलक मैथिली कविता संग्रह ‘व्योमक ओहिपार’ क भूमिका थिक. एहि लेखमे विदेशी काव्य-शैलीक आयातक कारण पर एक संक्षिप्त दृष्टिपात करैत, लेखक जापानी काव्यशैली आ ताहूमे ‘टांका’ पर एक संक्षिप्त परिचयात्मक दृष्टि प्रस्तुत केने छथि. संगहि, एहि भूमिकामे ‘व्योमक ओहिपार’सँ ‘टांका’ प्रकारक कविताक उदाहरण सेहो उद्धृत् भेल अछि. उद्धृत् कविता हमरा क्षणिका-सन प्रतीत भेल.
समीक्षाक सार-संक्षेपक रूपमे लेखक कहैत छथि,’व्योमक ओहिपार’मे समसामयिक जीवनक एहन कोनो समस्या आ विषय-वस्तु नहि छैक, (जे) लघु आकारक टांकामे संघनित नहि भेल हो.....(एहि) शैलीमे काव्यक सर्जना कए धर्मेन्द्र विह्वलक बड़का काज कएल अछि.’ एहि समीक्षासँ हमरा ‘व्योमक ओहिपार’ पढ़बाक इच्छा अवश्य भेल.
‘मैथिली शोक-काव्यक परम्परामे ललितनारायण मिश्र’मे ‘धूर्तसमागम’क शोक-काव्य आ नेपालक ‘गीतपञ्चक’सँ ल’ कए मैथिलीक अनेक शोक-काव्यक चर्चाक पछाति, अन्ततः राजनेता ललितनारायण मिश्रपर केन्द्रित विपुल शोक-काव्यक अतिरिक्त, ललित स्मृति ग्रन्थ, १९७७क चर्चा सेहो भेल अछि. एहि समस्त काव्यकेँ रमणजी ‘एक व्यक्तिक शोकोद्गार नहि, समाजक शोकोद्गार, भारतीय राष्ट्रक शोकोद्गार’ मानैत छथि.         
सारांशमे ‘विवर्त’ अनेक मौलिक विषयपर, विशेषतः जाहि पर मौलिक सामग्रीक अभाव छैक, गंभीर अध्ययनक संकलन थिक. ज्ञातव्य थिक, तथ्य अनुसन्धानक बल थिकैक. ठोस तथ्यक आधार पर स्वतंत्र निष्कर्ष संभव छैक.
ताहि दृष्टिएँ ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक अनुसन्धान तथ्यक तराजू एवं समालोचनाक मापदण्ड पर संतुलित अछि. अस्तु,’विवर्त’ मैथिली समालोचना साहित्यमे महत्वपूर्ण योगदान थिक. एहि पोथीक स्वागत हेबाक चाही; ई पोथी पढ़ल जेबाक चाही.

संदर्भ:
1.‘विवर्त’ नामकरण:
पुल्लिंग संस्कृत शब्द ‘विवर्त’क व्युत्पत्ति, ‘वि’ उपसर्ग, ‘वृत्’ धातु एवं  ‘घञ्’ प्रत्यय थिक. ‘संस्कृत शब्दकल्पद्रुम्’ एकर अर्थ समुदायः, अपवर्त्तनम्, नृत्यम् इति विश्वः (प्रतिपक्षः; यथा, नैषेधे । ३। ६४।) क संग किछु उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि. यथा;
“ईशाणिमैश्वर्य्यविवर्त्तमध्ये
लोकेशलोकेशयोलोकमध्ये।”
समवायाधिकरणविसदृश् कार्योत्पत्तिः । यथा, “एकस्य सतो विवर्त्तः कार्य्यजातं नतु वस्तु सत् ।”- सांख्यकौमुदी.
अर्थात् विवर्त, आभास, वा परिवर्तनक अछैतो वस्तुक यथावत्
, किन्तु, भिन्न स्वरुप थिक. अर्थात्, समालोचक आलोच्य विषयकेँ यथावत् राखि ओहि पर आलोचना प्रस्तुत कयने छथि. हमरा ‘विवर्त’ शब्दक इएह अर्थ बोध भेल।
2. मिथिला मोद ,उद्गार -63
, वर्ष-६ पौष ,शाके 1833 ,सन 1319 साल.
3. झा काञ्चीनाथ. मैथिली साहित्यमे आधुनिकताक आरंभ. किरण समग्र खण्ड 1 कि.सा.शोध संस्थान, 2007 pp 128
4. Sen Surendra Nath . Eighteen fifty-seven. The Publication Division. Govt of India, May 1957. Pp 265-66.
5. Dutta KK. History of the Freedom Movement in Bihar. Vol.1, 1957. The Govt of Bihar. Pp 69
6. झा पं. काशीनाथ. काशीनाथ झा रचना संचयन. संकलन-सम्पादन कीर्तिनाथ झा, साहित्य अकादेमी दिल्ली,2025
7. झा कीर्तिनाथ. मैथिली साहित्यक विरल विभूति : लिली रे https://kirtinath.blogspot.com/2022/01/blog-post_24.html accessed 02 जुलाई 2026.  मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2021 क फेस्टिवल बुक ‘ अरिपन’ में प्रकाशित
8. झा काञ्चीनाथ. महाकवि प्रो. तन्त्रनाथ झा मैथिली आ हम. उद्यान किरण, अंक 7, 2019 पृष्ठ 10
विवर्त
(अनुसन्धान मूलक आलोचनात्मक लेख)
लेखक: डा. रमानन्द झा ‘रमण’
सिद्धिरस्तु, दिल्ली. प्रथम संस्करण
2023
मूल्य: रु. 400/- पृष्ठ संख्या 242 

Sunday, October 4, 2026

बौकाक बहु

 

बौकाक बहु

भुट-खाँट, आ सीकी-सन पातर देह. हाथमे लाठी, आ कनाह आँखिपर चश्मा. बामा हाथें पतिक गट्टा धेने एकटा नारि सोझाँ आबि ठाढ़ि भेलि: ‘देखथुन ने, बामा आँखिसँ कोना लोर बहै छै.’
हम दुनू गोटेकेँ ऊपर आबि कए बैसबा लेल कहलिऐक, आ अपने टॉर्च, पेन आ प्रेस्क्रिप्शन पैड अनबा लेल उठि कए भीतर विदा भेलहुँ. बाहर एलहुँ तँ एक गोटेकेँ आओरकेँ ठाढ़ देखलिऐक; करीब चौदह-पंद्रह बरखक छौड़ा. बगय-बानिसँ मंदबुद्धि-जकाँ लागल.
हम रोगी, बौकाकेँ अपनालग बैसाकए ओकर आँखि जाँचए लगलहुँ. आँखिमे घाओ रहैक; लागि कए चिकित्सा नहि भेने आँखि खराब हेबाक डर रहैक.
‘तकलीफ कोना शुरू भेलै?’ हम बौकाक बहुसँ  पुछलिऐक.
‘की कहियनि कोना भेलै. बौक छै. किछु पुछ्बो करबै, तँ सरि भ’ कए कहबो कोना करतै.’

बौका अपने हमरा किछु इशारासँ आ गोंगियाइत-जकाँ किछु कहलक. मुदा, हमरा किछु बुझबामे नहि आयल. 
‘आँखिमे घाओ छैक. लागि कए दवाई नहि हेतैक तँ आँखि मारलो जा सकैत छै.’ हम कहलिऐक आ दवाई लिखि कए पुर्जा दए देलिऐक आ कहलिऐक, ‘आँखिमे कोन बूंद कतेक बेर देबै, से दोकानदारसँ नीक-जकाँ बूझि लेब. आ हे, जा धरि घाव सुखेतैक नहि, सब दिन एक बेर भोरमे देखा जेबै अबस्से.

आ ई बच्चा अहाँक बेटा थिक?’ हम कनेक ठमकैत पुछलिऐक.
‘की कहबनि. हमरा धीया-पुता कहाँ भेलै. हमही दोसर बियाह करा देलिऐ.’
सुनिकए विश्वास नहि भेल; बहुए वियाह करा देलकैक!
‘अहीं बियाह करा देलियै?’
‘त्त! की करितहुँ? बौक मनुख. खेत-पथार छै. एकटा बेटो नहि रहै. लैड़िकी भेटि गेलै. बियाह करा देलिऐ.’
हमरा मन पड़ि आयल. बहुत दिन भेलै. एकरे परिवारक खीसा तँ रहै. ठाकुर, एही मौगीक पितम्हिया ससुर तँ रहैक, जे अपन भाबहु- नेतियाक स्त्रीसँ- घर-घराड़ी सहित सब जमीन-जथा लिखा लेने रहैक. नेतियाकेँ दुइए टा बेटी. ओकरा अपना चट जौंडिस भेलैक आ पट दरभंगेमे मरि गेल. मुदा, गामक पसारी, ठाकुर, अपन भतीजी सबकेँ नेतियाक डीह पर कोना बसय दितैक; सरो-समाज गबदी मारि लेलक.
हमरा ओहिना मोन अछि. एक दिन नेतियाक स्त्री बाटक कातमे बैसलि भोकारि पाड़ि कए कनैत रहैक. दुइए दिन पहिने, ओकरा ठकि फुसिया कए, भैसुर कोनो बहन्ने झंझारपुर रजिस्ट्री ऑफिस ल’ गेल रहैक आ कुल जमीन-जथा अपना नाम करा लेने रहैक. जखन रसे-रसे गाममे गप खुजलैक आ नेतियाक स्त्रीकेँ गप बुझबामे एलैक, तावत्  तँ ओ अपन हाथ काटि चुकल छल. गौंए सब ओकरा लूलू-थू-थू करए लागल रहै!
हम सोचलहुँ, जखन बौकाक अपनहि परिवारहिमे एक भाईक जमीन दोसरा भाई द्वारा हड़पबाक इतिहास छैक, तखन बौकाक बहु अपनहि अपन पतिक दोसर बियाह करा देलकैक, तँ कोन आश्चर्य. तैओ फेर हमरा मुहसँ निकलि गेल: ‘अहाँ अपनहि कनिया ताकि कए अपन घरबलाक दोसर वियाह करा देलिऐक?’
‘करा नहि दितिऐक तँ की करितहुँ. मुदा, बियाह ने भ’ गेलै, कपार के दितै? देखै नहि छथिन’ ओ कातमे ठाढ़ भेल छओड़ा दिस संकेत करैत कहलक ‘बेटा भेबो केलै तँ कोनो जोकरक!’
तखने गेट लगसँ कोनो कन्याक स्वर सूनि हम नजरि उठाकए आगू देखलिऐक, तँ देखलहुँ, एकटा छरहरि, गोर नारि, करीब बारह बरखक कन्या ठाढ़ि छलि. छऊँड़ी तेजगरि आ सुन्नरि लागलि.
‘ई के छी?’
‘नवकीएक बेटी छियै. छौड़ा परसँ भेलै.’
‘पढ़ैए ने ? इएह अहाँ दुनूक देखभाल करत.’ हमरा मुहसँ निकलि गेल.
बौकाक स्त्री दाहिना हाथें अपन कपार पिटैत बाजल, ‘ जखन छौड़े ने मनुख भेलै, तँ छौड़ीकेँ एहि डीह पर के बसय देतै!’ कहैत ओ बरामदासँ नीचा उतरि गेल आ ‘काल्हि एकरा ल’ कए फेर एबनि. कहुना एकर आँखि ठीक क
’ देथुन. बड़ गुन मानबनि’ कहैत ओ चलि गेलि.

Saturday, September 26, 2026

न्यूयॉर्क सिटी, अगस्त २०२४

 

न्यूयॉर्क सिटी, अगस्त २०२४

०९ अगस्त २०२४. अमेरिकन एयरलाइन्स बोइंग ७८७ ड्रीमलाइनर जखन न्यूयॉर्कक जे एफ के एअरपोर्ट पर उतरल रहैक, तँ भोरुका करीब साढ़े छौ बाजल रहैक. हवाई जहाजसँ इमीग्रेशन चेक इत्यादि करैत-करैत यावत् बाहर निकलबा लेल तैयार भेलहुँ, हमर बालक, अमिय, क्लीवलैंडक फ्लाइटसँ ओतय उतरि चुकल रहथि. हमरा सबकेँ प्रतीक्षा नहि करय पड़ल आ ओ हमरा सभक एअरपोर्टसँ बहरयबाक पहिनहि एअरपोर्टक टर्मिनलहिमे आबि गेलाह.
बाहर अयलहुँ तँ भोरुका रौद पसरि गेल रहैक, मुदा, एअरपोर्ट टर्मिनल एकदम सूनसान. अमिय, दिल्ली-बंगलोरहि-जकाँ उबर टैक्सी मंगओलनि आ हमरालोकनि होटल लेल विदा भेलहुँ. ड्राईवर, कमे उम्र महिला, रूसी नागरिक रहथि.

खाली सड़क. तैओ होटल पहुँचैत करीब एक घंटाक लागि गेल.

हमरा लोकनिक होटल मैनहैट्टनमे छल. मैनहैट्टन न्यूयॉर्क महानगरक हृदयस्थल थिक; ई न्यूयॉर्क शहरक प्रशासनिक केन्द्र तँ थिके, महानगरक ई भाग संसार भरिक आर्थिक, सांस्कृतिक, मनोरंजन, एवं मीडिया व्यवसायक केन्द्र सेहो मानल जाइछ. मैनहैट्टनमे डेरा देब बड़का सुविधा लागल. एहि इलाकाक आसपास अनेक विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल छैक. ततबे नहि, भोरुका समयमे मैनहैट्टन इलाकाक खाली सड़कपर पैदल घुमबा-फिरब, एतुका लोकप्रिय एवं ऐतिहासिक स्थलकेँबाहरसँ देखब सेहो एक नवे अनुभव छल.        

एहि बेरुक होटल मैनहैट्टनक केन्द्रमे छल. होटलक - क्लब क्वार्टर मैनहैट्टन - रूमसँ वन वर्ल्ड सेंटर एवं एवं मेमोरियल पूल आँखिक सोझाँ तँ छैके, ई होटल ‘ग्राउंड जीरो’क समीपस्थ होटल थिक. दोसर दिस, विश्वप्रसिद्ध वाल-स्ट्रीट. ततबे लग जे होटलसँ निकलू  आ पाँच मिनट टहलि, देखि कए आबि जाउ.
एही सुविधाक कारण, अगिला दू दिनमे हमरालोकनि टाइम्स स्क्वायर, वन वर्ल्ड सेंटर टावर, सेंट्रल पार्क, लिबर्टी आइलैंड, आ एलिस आइलैंड इत्यादि घुमलहुँ.

                                                                  वन वर्ल्ड सेंटर टावर

वन वर्ल्ड सेंटर टावर, मेमोरियल पूल एवं संग्रहालय
न्यूयॉर्क शहरमे ११ सितम्बर २००१ (९/११)क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला आतंकवादक इतिहासमे एक नव अध्याय जोड़लक. ओहि दिन अंतर्राष्ट्रीय आतँकी संगठन अल-कायदाक आतँकवादी सभक एकटा बड़का गिरोह, अमेरिकाक भीतरहिमे एके बेर अनेक हवाई जहाजक अपहरण कए, हवाई जहाजकेँअस्त्र-जकाँ प्रयोग कय अमेरिकामे अनेक ठाम हमला केने छल. एहि सबमे न्यूयॉर्क शहरमे वर्ल्ड ट्रेड़ सेंटर पर हमला जतबे भयानक छल, ततबे अविश्वसनीय सेहो. एहि आक्रमणमे मैनहैटन स्थित वर्ल्ड ट्रेड़ सेंटरक उत्तरी एवं दक्षिणी टावर तँ पूर्णतः ध्वस्त भइए गेल छल, ओहि हमलामे करीब तीन हज़ार व्यक्तिक हत्या भेल छल. ई घटना जेहने दारुण छल, तेहने भयानक आ अविश्वसनीय सेहो. ई आक्रमण संपूर्ण विश्वकेँ स्तब्ध कए देने छल.
हम ओहि समयमे बंगलोरमे पोस्टेड रही.

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला अनेक अर्थमे विश्व समुदायक एवं अमेरिकाक आँखि खोलि देलक.अमेरिकी जनमानस एवं न्यूयॉर्क शहरक नागरिकक मानसिकतामे एहि घटनाक दूरगामी असरि भेलैक; जे समाज अपनाकेँ सर्वथा सुरक्षित बूझैत छल, तकर मनमे असुरक्षाक भाव भरि गेलैक.
लोक चिंतित आ सतर्क रहय लागल. एहि घटनाक दोसरो पक्ष उजागर भेल. एहि घटनासँ एक दिस जं नागरिकक मनमे देशप्रेम भाव सेहो पुनर्जीवित भेलैक, तँलोकक मनमे विदेशी नागरिकक प्रति संदेह एवं पूर्वाग्रह सेहो भरि देलकैक. जँ एक दिस नागरिकक मनमे एहि राष्ट्रीय विपत्तिक समयमे सैनिक एवं असैनिक सहायक कर्मी समुदायक प्रति कृतज्ञता भावहुक उदय भेलैक, लोक दानक प्रति उदारो भेल, तँ दोसर दिस इस्लाम एवं मध्यपूर्वक नागरिक प्रति नागरिकक मनमे संदेहक भावक सेहो भरि गेलैक.
समाजक ई प्रतिक्रिया अनुचित नहि छल. एकर पाछाँ राष्ट्रक मानसिकता रहैक. अमेरिका सर्वशक्तिमान राष्ट्र थिक. अमेरिका अपन अकूत आर्थिक आ अजेय सामरिक शक्तिसँ विश्व भरिमे अपन वर्चस्व स्थापित करैत आयल अछि. एकर सीमा पर, कतहु शत्रुक गमन नहि छैक. शीतयुद्धक समय अमेरिका शतत् परमाणु बम धरिक आक्रमणसँ नागरिकक सुरक्षाक हेतु तैयार रहैत छल. ताहि अमेरिकाक हृदयस्थलमे विदेशी आतँकी संगठन सोझे आक्रमण कए करीब तीन हज़ार नागरिकक हत्याक कए देलक, नागरिकक ह्रदयमे तकर आघात आश्चर्यजनक नहि. कारण, ११ सितम्बर २००१क आक्रमणमे मृत नागरिकक संख्या, अमरीकी सामरिक इतिहासमे अद्वितीय, पर्ल हार्बरक आक्रमणहुमे मृत (सैनिक)क संख्याकेँ टपि गेल छल.

राष्ट्रीय क्षति एवं भयानक शोकक ओएह पृष्ठभूमि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसरक सोलह एकड़ क्षेत्रक भीतरहि राष्ट्रीय सितम्बर ११ स्मारक एवं संग्रहालयक निर्माणक प्रेरणा बनल. ई स्मारक सबल राष्ट्रक अविजेय संकल्प प्रतिमान बनल.
अस्तु, नव वन वर्ल्ड सेंटर टावर, मेमोरियल पूल एवं संग्रहालय आतंवादी हमलाक स्मारक थिक, मानवता सोझाँ आतंकवादक स्थायी खतराक मूर्तिमान स्मारक थिक; आतँकवादक गालपर दृढ़प्रतिज्ञ राष्ट्रक चमेटा थिक!
आब एहि स्मारकक भ्रमणक चर्चा करी. यात्राक गाइड अमिय, आ संगबे पत्नी रहथि.

                                                                       रेफ्लेक्टिंग पूल

एहि परिसरमे वर्ल्ड ट्रेड सेंटरक नव भवन, ऑब्जरवेशन डेक, बगीचा, दू गोट रेफ्लेक्टिंग पूल, एवं म्यूजियम नव निर्माण थिक.
आरंभ सड़क तल पर स्थित रेफ्लेक्टिंग पूलहिसँ करी. पहिलुका (धराशायी भेल) वर्ल्ड ट्रेड सेंटरक उत्तरी एवं दक्षिणी टावरक स्थान दू गोट चौकोर ‘रेफ्लेक्टिंग पूल’ वा रेफ्लेक्टिंग, ओही दुनू टावरक स्मारक थिक. एकरा ‘रेफ्लेक्टिंग पूल’ वा रेफ्लेक्टिंग एब्सेंस – विचारणीय शून्य / रिक्ति- कहल जाइछ. 
वर्ल्ड ट्रेड सेंटरक १७७६ फुट नव ऊँच गगनचुम्बी टावरक समीपहि, आ एहि परिसरमे लगाओल सैकड़ों नव ओक केर नवगछुली सभक बीच, ई शून्य जँ एक दिस विध्वंसक स्मारक थिक, तँ दोसर दिस ई दुनू पूल विनाशक पछातिक शांतिक प्रतीक सेहो थिक.
एक दोसरासँ किछुए दूरी पर बनल, एहि दुनू पूलकेर चारू कोरसँ तीस फुट नीचा धरि बहैत जलधार, पूलकेर तलहटी बाटें करीब बीस फुट आओर गहींड़ अन्हार आ निःशब्द शून्यमे विलीन भए जाइछ. ई सांकेतिक वास्तु एक तरहें, मनुष्यक जीवनक ओहि सत्यक संकेत थिक, जे एक बेर जँ चलि गेल ओ पुनःघूरि नहि अबैछ, ओकरा फेर नहि देखबैक.
एहि दुनू पूलक चारू कात सैकड़ों ओकक गाछ छैक. निःशब्द पूल, गाछ सभक छाहरि, भूतकालक संहारक आ भविष्यमे ओहिसँ आसन्न खतराक विचार, एहि परिसरमे एक गंभीर चिंतनीय वातावरणक सृजन करैछ.
दुनू मेमोरियल पूलक चारूक कातक लहराक उपरी फलक पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर वर्ष १९९३ ई., एवं वर्ष २००१ ई.क  आतँकी हमलामे न्यूयॉर्क एवं वाशिंगटन डी. सी. शहरमे मृत करीब ३००० व्यक्तिलोकनिक नाम अंकित अछि.

जखन संहारक प्रतिध्वनिसँ मन विरक्त होबय लागल, तँ एकटा गाछ पर नजरि गेल. एहि नव नाम थिक, survivor tree, पुनर्जीवित गाछ. मैथिलीमे एकरा मृत्यंजय गाछ सेहो कहि सकैत छियैक. कैलरी प्रजातिक एहि (अखाद्य) छोट-छोट आकारक नासपातीक गाछ (Callery Pear tree )क इतिहास सुनबा योग्य अछि.
ई गाछ, साविकक
world trade सेंटरक अनेको गाछक बीच एक छल. मुदा, ९/११/२००१ क आतंकी हमलाक कतेक दिन पछाति जखन परिसरक सफाई शुरू भेलैक, तखन ककरो नजरि मलबाक ढेरक नीचा दबल, एहि गाछ पर पड़लैक. गाछ दबल आ म्रियमाण छल. मुदा,जीवनक स्पन्दन बंचल रहैक, गाछक प्राण धुक-धुक करैत छलैक.अस्तु, कोनो सहृदयक निर्माणकर्मीक सदाशयतासँ ई वृक्ष बचल, आ पछाति ओही परिसरमे दानवीसंहारक साक्षी आ प्रतिकूलताक संग लड़ि विजयीक योद्धाक रूपमे एकरा दोसर ठाम रोपल गेल. ई वृक्ष सेहो ओहि आतंकी आक्रमणक साक्षी थिक.

जीवनक निरन्तरता आ प्राणी समाजक अजेय जिजीविषाक प्रतीक-जकाँ एहि गाछकेँदेखि, हमरा ‘जिजीविषा’ शीर्षकसँ वर्ष २००१ई. मे ‘वैदेही’ प्रकाशित हमर अपन कविताक स्मरण भए आयल. कविताक पृष्ठभूमि एहि कवितेमे भेटत:

सौ-डेढ़ सौ वर्षक जवान

कतेक युगक इतिहास जलवायुक प्रमाण

विशाल, दीर्घकाय

कतेको बीघामे पसरल अश्वत्थ-

पीपरक गाछ,

जखनि गेल छल काटल,

भूमिसँ, बस, दुइए फुट ऊपरसँ,

किएक तँ,

पीपरक गाछतऽर वा ल’ग नहि

ओहि धराशायी पीपरक समाधि पर,

उठतैक नव घर,

तँ, सरिपहुँ, भेल रहैक सबकेँ –

बस, गेलाह इहो बुढ़ा जवान !

किन्तु, ऋतु जहिना-जहिना बदललै-ए

तहिना-तहिना

पीपरक धड़ विहीन शाखा आ जड़िसँ,

पहिने बहरएलैक,

नान्हि-नान्हि टा टुस्सा,

फेर, छोट-छोट डारि

आब देखैत छिऐक,

बिहुँसैत पल्लव,

आ तखनि

बुढ़बा जवानक उठैत,

जोरगर बाँहि- नवका डारि,

तनने हवामे सक्कत-सन मुट्ठी,

मने क’ रहल हो उदघोष -

बाउ, उपाड़ने टा जड़ि,

आ कटने टा डारि,

के सकैत छह मारि ?

जँ छह, जिजीविषा !


वन वर्ल्ड सेंटर ऑब्जरवेशन डेक एवं न्यूयॉर्क सिटीक विहंगम दृश्य
न्यूयॉर्कमे अनेक ऊँच भवनसँ शहरक विहंगम दृश्य देखि सकैत छी. सब ठामसँ भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण भेटत.
पहिल बेर, शहरक बीचमे स्थित रॉकफेलर टावर वा ‘टॉप ऑफ़ द’ रॉक’ केर छत परसँ  हमरालोकनि चारूकात नजरि घुमौने रही. तकरा सोलह वर्ष भए गेलैक. ओ ऊँचाइओमे छोट.
 एहि बेर शहरक दछिनबरिया भाग आ आओर अधिक ऊँचाईसँ (१००म तल्लासँ) शहरकें पुनः देखल.
ओतेक ऊँच, तथापि लिफ्ट एक मिनटसँ कममे ऊपर धरि पहुँचि गेलैक. ओतबे कालमे बाटें-बाटें एल ई डी स्क्रीन पर पछिला ५०० वर्षक अवधिमे न्यूयॉर्क शहरकेर बदलैत स्वरूप सेहो देखैत गेलहुँ. क्षण मात्रक ओहि अनुभवमे कतेक स्मरण रहल, कहब कठिन.
                                                 

                                                     न्यूयॉर्क सिटीक विहंगम दृश्य

डेकसँ  हडसन नदी, न्यू जर्सी शहर आ स्टेचू ऑफ़ लिबर्टीक संग-संग महानगरक चारू कातक परिदृश्य पर नजरि घुमाओल, फोटो लेल. मुदा, कंक्रीटक गगनचुम्बी अट्टालिका सभक जंगलमे, सत्य पूछी, तँ सेंट्रल पार्कक गाछ-वृक्षक अतिरिक्त हरियरी अभावृत्तिए.
तथापि, एहि ऑब्जरवेशन डेकसँ न्यूयॉर्क देखब नीक लागल.

वन वर्ल्ड सेंटर म्यूजियम

वन वर्ल्ड सेंटर म्यूजियममे आम नागरिक, ९/११ हमलाक भुक्तभोगी, सहायता आ बचावकर्मी, एवं सुरक्षाकर्मीलोकनिक संपर्कमे तं रहिते अछि, ई संगठन पर्यटक, छात्र, एवं अध्येताक हेतु अनेक सूचना आ सामग्री सेहो उपलब्ध करबैछ.

लिबर्टी आइलैंड

                                                          

                                                        लिबर्टीक मूर्ति 

अमेरिकाक पछिला यात्रामे लिबर्टी आइलैंड एवं लिबर्टी माईकें मोटर बोटहि परसँ देखने रहियनि. एहि बेर मोटर बोटसँ आइलैंड धरि गेलहुँ आ लगसँ मूर्ति देखल. एहि मूर्तिक विषयमे विश्वभरिमे एतेक सूचना उपलब्ध छैक जे एकर वर्णन आवश्यक नहि.
मुदा, एकटा अजगुत दृश्य पर नजरि पड़ल: फेरीमे चढ़बाक हेतु जे जेट्टी बनल छैक, ताहि पर बाटक दुनू कातक संकीर्ण नालामे नहि जानि कोन-कोन देशक अजस्र सिक्का भरल देखलिऐक. स्मरण अछि, रोमकेर ट्रेवाई फब्बारामे लोककें सिक्का फेकैत देखने रहिऐक. मान्यता ई जे सिक्का फेकने पुनः अयबाक अवसर भेटत. मुदा, न्यू यॉर्कमे कोन भावनासँ पर्यटक समुद्रमे सिक्का फेकैत छथि, कहब कठिन. हँ, सिक्काक ढेर आ ततबा दूर जे स्मारकक रूपमे सेहो बीछि कए आनब कठिन.
                                 

                                                  जेट्टी पर सिक्काक ढेर 
मुदा, लिबर्टीकें देखि हमरा मनमे किछु भाव आयल, से सुनू.
 लिबर्टी एक युगमे दासताक भंजन- मूर्तिक पयरमे बान्हल कड़ी टूटल छैक- प्रतीक छलीह. हिनक हाथक ज्योति मुक्तिक अछि. कवि एमा लज़रस लिबर्टीकें ‘निष्कासित (लोकक) माता’ कहि संबोधित कयने छथिन.
तखन, की अमेरिकाक आजुक सामाजिक आ राजनीतिक परिस्थिति, ओहि परिकल्पना अनुकूल अछि? उत्तर कए देत?
तें, ई प्रश्न हम ऑनलाइन
AI विद्वान Chat GPTकें पुछलिऐक. जे जवाब आयल से सुनू.
Chat GPT कहलनि, ‘असलमे एहि मूर्तिक स्थापनाक पाछाँ एमा लज़रसक कवितामे अभिव्यक्त भाव रहबे नहि करैक. ततबे नहि, ई कविता-
The New Colossus - मूर्तिक स्थापनासँ तीन वर्ष पूर्वहि १८८३मे लिखल गेल छल. तैओ, ई सत्य थिक, जे १८८२ आ १९५४ ई. बीच केवल न्यूयॉर्क बन्दरगाह बाटें एक करोड़ बीस लाख आप्रवासी अमेरिकामे आयल छल. तथापि, मूर्तिक प्रतीकात्मकता आ यथार्थमे सदाएसँ तनावक भाव रहलैक अछि. ’
एहिमे दू मत नहि, अमेरिका सदाएसँ निष्कासित-बहिष्कृतक हेतु आसरा रहल अछि.आइओ विश्व भरिक आप्रवासी अमेरिका अबिते अछि. हँ, अमेरिकामे हेबनिमे प्रजातांत्रिक मूल्यमे किछु ह्रास भेलैए, आ गरीबी एतहु छैक.
अस्तु,
Chat GPT कहब जे ‘समयक संग लिबर्टी, मूर्तिक स्थापकलोकनिक उद्देश्यसँ भिन्न अर्थबोध ग्रहण कए लेने अछि, आ (क्रमशः)लिबर्टीक मूर्तिकें एतुका लोक ‘नैतिक दर्पण (moral mirror)’ बूझय लागल अछि. इएह एहि विश्वप्रसिद्ध मूर्तिक चिरस्थायी प्रासंगिकता आ शक्ति थिकैक’, तर्क संगते लागल.
एलिस आइलैंड : अमेरिकाक ऐतिहासिक प्रवेशद्वार आ आजुक संग्रहालय

                                              
एलिस आइलैंड राष्ट्रीय आप्रवासक संग्रहालय न्यूयॉर्क

न्यूयॉर्क बन्दरगाहक समीप स्थित एलिस आइलैंड लम्बा अवधि धरि अमेरिकाक प्रवेशद्वार छल. ई सर्वविदित थिक. एहि द्वारिकें अपन आँखिए देखल. विशेष गप सएह. तें दू पाँति एकरो विषयमे.
एलिस आइलैंड आब अमेरिकाक प्रवेशद्वार नहि थिक. मुदा, एतुका एलिस आइलैंड राष्ट्रीय आप्रवासक संग्रहालय न्यूयॉर्क शहरक अनेक पर्यटन स्थल सबमे एखनो प्रमुख अछि. जे पर्यटक लिबर्टी आइलैंड अबैत छथि, एलिस आइलैंड देखैत जाइते छथि, कारण, ई म्यूजियम स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी राष्ट्रीय स्मारक केर हिस्सा तं थिके, मोटर बोटसँ यात्रा कए दुनू स्मारक देखि सकैत छी.
लोअर मैनहैट्टनमे बैटरी पार्क लग जखन हमरालोकनि मोटर बोट पर चढ़बाक प्रतीक्षा करैत रही, तं लगमे एक गोटे एक कार्टनमे सेनुरिआ आम काटि-काटि बेचैत रहथि. मेक्सिकोक निवासी, मेक्सिकन आम- भीतर बोनायल, सक्कत आ मधुर. काँचे खाउ. मुदा, मिथिलाक आमक स्वाद कहाँ! एक आमक दाम पाँच डॉलर. सस्त नहि भेलैक. मुदा, पर्यटन स्थल पर दाम पुछ्बैक. खयबाक अछि, खाउ. नहि तं आओर किछु देखू.
हमरा जिज्ञासा भेल. मेक्सिकोमे आम अयलैक कतयसँ? पछाति, बुझबामे आयल, मेक्सिकोमे फिलीपिंससँ आम आयल छल. मेक्सिकोक जलवायु आमक गाछक हेतु अनुकूल छैक. अस्तु, आम ओतुका परिचित आ प्रिसिद्ध फल थिक. अमेरिका पड़ोसी देश थिकैक, तं एतय मेक्सिकोक नागरिक कानूनी  आ गैरकानूनी तरीकासँ एटी अबितो छथि, आ एटी मेक्सिकोक उत्पाद बिकाइतो अछि. आब एलिस द्वीपक गप करी.
एलिस द्वीपक ऐतिहासिक महत्व एतबे जे ई स्थान पहिने सामरिक अड्डा छल, तखन आप्रवासीक जाँच-पड़ताल एवं हिरासतक केन्द्र भेल. पछाति, बीच-बीचमे विश्वयुद्धक अवधिमे एतुका भवन सबमे शत्रु सैनिक सब सेहो राखल गेल.
किन्तु, आम पर्यटकक हेतु एतुका संग्रहालय प्रमुख आकर्षण थिक. जतय मुख्य भवनमे स्थित रजिस्ट्री हॉल, बहुत रास बक्सा-पेटी सामान, मेडिकल जाँचक उपकरण आ फोटो इत्यादि  प्रदर्शित अछि, जाहिसँ आप्रवासक युगमे आप्रवासी लोकनिक राष्ट्रीयता, स्वरुप, धर्म, परिवार आ संग-संग आनल वस्तु-जातक रोचक झाँकी भेटैछ.
भवनक आन कक्षमे घुमैत कतहु हाथसँ लिखल गद्य, पद्य वा चित्रमे आप्रवासक हर्ष आ देश छुटबाक पीड़ा तथा पलायनक परिस्थितिक मार्मिक वर्णन सेहो देखबामे आयल.

गप एतबे, मनुख कतहुक होअए, हर्ष-विषाद आ पीड़ा-सन संवेदना सब ठाम एके होइछ. भाषा वा शब्द भले भिन्न होइक, अभिव्यक्तिक स्वरुप भले भिन्न-भिन्न होइक भावमे समानता देखबे करबैक.

                                                                        रजिस्ट्री हॉल
                                 
                                                ग्राफिटी: हाथसँ लिखल संदेश  
तथापि, योरोपीय समुदायमे भारतक जनमानसक भावनासँ विपरीत, उद्यमसँ आ अपरिचित भूमिमे सफलताक अन्वेषणक प्रेरणा प्रबल रहलैक अछि. ई भाव ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’क अवधारणा विपरीत थिक. योरोपीय समुदाय द्वारा नव दुनिया-अमेरिका- एवं भारतक खोज ओही भावना आ उद्यमक परिणाम थिक.

सेंट्रल पार्क न्यूयॉर्क सिटी
नई दिल्ली हो वा न्यूयॉर्क नगर आ शहरमे भवन, म्यूजियम, पार्क, सिनेमा आ बाज़ार भेटबे करत. तखन लोक जतय रहैत  अछि, स्कूल-कालेज वा काज पर जयबाक समय बाट पर भले प्रतिदिन विश्वप्रसिद्ध स्मारक वा वस्तु पड़ैत हो, देखबाक फुरसति कहाँ! मुदा, नव शहरमे अयलासँ लोककें पर्यटनक हेतु समय सेहो रहैत छैक, आ नवीनताक अनुभव सेहो होइत छैक. अस्तु, लोक घुमैत-फिरैत अछि आ संस्मरण संग लए जाइत अछि.
न्यूयॉर्क सिटीक सेंट्रल पार्क एतुका पैघ उद्यान आ शहरक हृदयस्थलमे अवस्थित सुपरिचित सार्वजनिक पर्यटन स्थल थिक. एहि पार्कमे समय-समय पर अनेक स्थानीय आ विदेशी राजनेता लोकनि सेहो सार्वजनिक सभा करैत छथि; प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सेहो सितम्बर २०१४मे सेंट्रल पार्कमे एक पैघ सभाकें संबोधित कयने रहथि.

हमरो लोकनि सेंट्रल पार्क देखय गेलहुँ. टैक्सी पार्कक बाहरे छोड़ि, रिक्शा कयल आ भीतर गेलहुँ.
विशाल इलाका. अनेक प्रकारक वृक्ष आ फूल, वास्तु आ झरना. योरपकेर पार्क सब मन पड़ि आयल. किछु घुमलहुँ. कतहु-कतहु बैसलहुँ. एकठाम एक व्यक्ति गिटार लेने गीत गबैत रहथि. सोझाँमे पर्यटकक दू गोट नेना नचैत छल.
योरप एवं अमेरिकामे सड़कक कात, चौक-चौराहा आ पार्कमे गीत गायब, कलाकृति बनायब, राजनैतिक विचारधाराक प्रचार, वा विश्व स्तरक समस्या पर मुहिम चलायब आम थिक.
एहि सब कलाकारकें केओ केवल देखैत अछि. केओ प्रभावित भए टाका-पैसा सेहो दैत छैक. केओ सुदुक प्रशंसा करैछ आ चलि जाइछ. वस्तुतः, कतेको कलाकार केवल आत्मसंतुष्टिक लेल कला साधना करैत छथि. केओ गुजर करबा लेल सेहो. ई सब ठाम होइत छैक; अपनहुँ देशहुमे.

                                                                          बोल्टोक प्रतिमा 

सेंट्रल पार्कक वृत्तांत अंत एक स्मरणीय वास्तुसँ हो. ई वास्तु थिक ‘बाल्टो’ नाम कुकूरक. बोल्टोपर कतेक पोथी लिखल गेल अछि; हमर पौत्र, अग्निव, हमरा बोल्टोक लम्बा खीसा सुनओलनि. एहि कुकूरक अभियान पर सिनेमा सेहो छैक.

बाल्टो नामक ई साइबेरियन हस्की प्रजातिक कुकूर १९२५ ई. मे अमेरिकाक अलास्का प्रान्तमे कुकूर द्वारा घिचल जाइत गाड़ी- स्लेड- केर नेतृत्व कए, कठोर शीतकालमे, घातक संक्रामक रोग डिफ्थिरियाक टीका पहुँचयबामे अद्भुत सफलतासँ लोकसेवामे अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित कयने छल. ई कांस्य प्रतिमा ओकरे स्मारक थिक.
मुदा, अजगुत से नहि. अजगुत ई थिक जे जाहि दिन ओहि कुकूरक प्रतिमाक अनावरण भेलैक ओहि दिन बोल्टो अपन मालिकक संग ओतय उपस्थित छल.
ततबे नहि, बोल्टोक शरीरक ओहायो राज्यक
The Cleveland Museum of Natural Historyमे स्थायी रूपें प्रदर्शित अछि. चूंकि, एहि बेर हमरालोकनि कुल समय क्लीवलैंडहिमे बिताओल,तें, बोल्टोक पार्थिव शरीरकें सद्यः सेहो देखल.

Saturday, September 5, 2026

पिंजड़ा, चिड़ै, आ खीसा

 

पिंजड़ा, चिड़ै, आ खीसा

दीनानाथकेँ नवे वयससँ धिया-पुताक बड्ड आवेश रहनि. अनको धिया-पुताकेँ कतहु देखथिन, टोकि देथिन. कखनो समय देखि, होइनि तँ संगे खेलाइयो लागथि. अपन धिया-पुताक तँ कथे कोन.
मुदा, जखन अपन नाति-नातिन, पौत्र-पौत्रीक बेर एलनि, तँ ओलोकनि ततेक दूर चलि रहनि, जे केओ लग नहि रहनि. तखन जे लग, से अपने. मुदा, अपन, आ अपना समीपक, बीचमे अंतर कोना नहि हेतैक.
तैओ जाधरि ओ नौकरीमे रहलाह, समाजक संग जुड़ाओक कारणें, कखनो एहन प्रतीत नहि भेलनि, जे धिया-पुता लग नहि छथिन.
पछाति, जखन रिटायर भए महानगरवासी भए गेलाह, तखनो परिवारक कमीक अनुभव नहि भेलनि. सोशल मीडिया आ टेलीफोनक सुविधा एवं विडियो कॉलसँ अपन पौत्र-पौत्री-दौहित्र-दौहित्रीक संग खेला लेथि, समय बीति जाइनि. मुदा, मोन नहि भरनि.

पछाति मन भेलनि जे धिया-पुताक लेल कथा लिखी, कविता गाबी आ अपन परिवारक नेना सब ई सब सुनय, पढ़य आ आनन्द उठाबय. मुदा, समाजक प्रगति मनुखक सोचकेँ पाछाँ छोड़ैत, तेना निच्छोह भगैत चल गेलनि जे दीनानाथ हकमय लागथि. अपनहु सोचथि, एहि युगक बच्चा कतहु गुलाबछड़ी आ हवा मिठाई बुझै! हमर लिखल गीत आ कथा-कविता ओकरा सबकेँ कतहु रुचैक. मुदा, युग भले बदलि गेलैक, धिया-पुताक जीह भले आन रस ताकौ, बूढ़-पुरान कहिया धरि नव सुर-ताल पर गायब सिखैत रहत!

ई सब सोचि, दीनानाथकेँ अपन लिखब आ गायब निरर्थक लगनि, मुदा, मन हताश नहि होइनि. सोचथि, जँ पुरान लोकक गप पुरान नहि होइतैक, तँ पुरान कथा-पिहानीकेँ लोक दादी-नानीक कथा-कहिनी किएक कहितैक! अस्तु, ओ निरंतर अपन सृजनक अभिव्यक्तिक नव बाट तकबाक हेतु अपन कल्पनाकेँ प्रेरित करथि.
एक राति बड्ड जोर बिहाड़ि आयल रहैक. दीनानाथ भोरमे उठलाह तँ अपन फ्लैटक द्वारिक आगाँ एकटा चिड़ैक गेल्ह खसल देखलखिन. ओ ओहि गेल्हकेँ उठाकय भीतर अनलनि. घरक भीतर आश्रय आ किछुए दिनक कनिएक सेवासँ ओ गेल्ह स्वस्थ सूगाक रूप लए लेलक. घरक पोसा कुकुर सेहो छोटे रहनि. पहिने तँ किछु दिन ओहि कुकुरकेँ ओ सूगा खेलौना-जकाँ बूझि पड़ैक. ओ सूगाक संग खेल कएल करय. पछाति, कुकुरक बच्चा आ सूगाक बीचक नोक-झोकसँ  दीनानाथकेँ होइनि जे कदाचित ओहिसँ सूगाक हानि ने भए जाइक.
तथापि, किछु दिन धरि सूगा आ कुकुर एकहि घरमे संग-संग पलैत-बढ़ैत रहल. आ दीनानाथ एही दुनूकेँ परिवारक नेना बूझि, कविता आ कथा लिखैत जाथि.

आ दुनूकेँ संग लए बैसथि, कविता पाठ करथि, खीसा दुनूकेँ सुनबथिन. कुकुर कखनहु हुनक पयर लग बैसनि, कखनहु सोफा पर. सूगा सेहो कखनहु बैसय, कखनहु फुदकय, कखनहु ओ आबि कए दीनानाथक जांघ वा कान्ह पर सेहो बैसि जाइनि. एतावता, ई दुनू दीनानाथक अनमना बनल रहय.
चिड़ै आ कुकुर संग-संग रहैत संगी भए गेल छल. कखनहु सूगा कुकूरक पीठ पर बैसि सवारिओ करय. मुदा, सब दिन, मनक स्थिति कतहु एक रंग रहैक.
एकदिन एकटा बिलाड़ि कोम्हरोसँ बौआइत आयल आ दीनानाथक बालकोनीमे बैसल. कुकूर जखन बिलाड़िकेँ बालकोनीमे बैसल देखलकैक तँ ओकरा अनसोहाँत लगलैक. सूगा सेहो तत्पर छले. बालकोनीक खूजल केबाड़ बाटें कुकूर बिलाड़िपर झपटलक. सूगा सेहो किएक पाछू रहत. ओहो कुकूरक संगहि आगू गेल.  बिलाड़िकेँ सेहो मौका भेटलैक आ दुनू पक्षमे एक पक्कड़ हेबासँ पहिनहि दीनानाथ ओतय पहुँचि स्थितिकेँ नियंत्रणमे लेलनि. ककरहु कोनो नोकसान नहि भेलैक.
ओही दिन दीनानाथ सोचलनि जे सूगाकेँ कुकुरक संग आ सेहो खूजल राखब उचित नहि. ओ ओही दिन बाज़ार गेलाह आ एकटा पैघगर पिंजड़ा कीनि अनलनि आ ओही दिनसँ सूगा अपन नव घरमे रहब शुरू केलक. पिंजड़ाक दुआरि खूजल रहैत छलैक. तें, कुकूर आ सूगा जहिना संग-संग रहैत छल, तहिना रहय.
मुदा, दीनानाथकेँ नेना भुटकाक कमीक अनुभव जहिना होइत छलनि, होइते रहलनि. होइनि जे नाति-पोता-पोतीक हेतु लिखल कविता आ कथा ओ सब नहि तँ कोनो आनो बच्चा सब सुनय, खुशी होअय, थोपड़ी पाड़य, ठहक्का मारि हँसय. मुदा, से कोना होइतनि. तें, मनोरथ पूर नहि भेने, दीनानाथकेँ कखनो-काल उद्विग्नताक अनुभव होइनि.
कॉलोनीमे नेनाक कमी नहि रहैक. मुदा, शहर-बाजारक कॉलोनी आ गाँओक टोल-मोहल्लामे अंतर होइछ. शहरमे अनकर नेनाकेँ टोकबो अपराध श्रेणीमे आबि सकैछ. तखन ककरासँ परिचय कोना हो, आ संबंध कोना बनय वा बनाबी, से लाख टाकाक प्रश्न! ओहुना, जँ एक दोसरासँ काज नहि पड़ैत हो, तँ संबंधक कोन काज!  

एही गुनधुनमे एकदिन दीनानाथक मनमे एकटा नव विचार एलनि. आ ओही दिनसँ ओ सूगाकेँ पिंजड़ामे लए ओ कॉलोनीक पार्कक एक कोनमे जा कए किछु काल बैसब शुरू केलनि.

दीनानाथ पार्कमे जाथि, पिंजड़ा राखथि, पिंजड़ाक केबाड़ खोलि देथिन आ सूगाकेँ खीसा सुनायब शुरू करथि. सूगा कखनो पिंजड़ाक भीतर बैसय, कखनो बाहर आबि दीनानाथक जांघ पर, कखनो माथ पर बैसि जाइनि, वा कखनो फुदकि कए घास पर सेहो बैसि जाय. मुदा, दीनानाथ निर्विकार भावें कविता आ कथा पाठ करथि. सूगाकेँ अपन कृति सुना हुनका अपूर्व तृप्तिक बोध होइनि.
बहुत दिन एहिना बीति गेल. तकर बाद कोनो दिन एक छोट बच्चाक नजरि सूगा पर पड़लैक. सूगा आकृष्ट केलकैक. मुदा, अनचिन्हार वृद्धक लग अयबामे ओकरा भय सेहो भेलैक. मुदा, जिज्ञासा भेने, बच्चाक मनमे अनजान वस्तुसँ भय बेसी दिन नहि रहि पबैत छैक. संगहि, धखाइतो, जखन अपरिचय परिचयमे बदलि जाइछ, तखन सौहार्द्र भयक स्थान लए लैछ. अस्तु, क्रमशः नेना सब दीनानाथक लग आबय लगलनि. जे नेना सूगाक लोभें आबय, खीसा सुनय लागय. पछाति जे खीसाक लोभें आबय, सूगाक संग खेला कए आपस जाय. केओ आबय आ भागिओ जाय.

मुदा, दीनानाथ ने ककरो अपना लग शोर करथिन, ने ककरो बैसय कहथिन. हिनका पार्कमे बैसल सीनियर सिटीजनक अनेक ग्रुपसबसँ सेहो कोनो लगाओ नहि रहनि. कोनो ग्रुप समोसा जिलेबीक पार्टी करथि, केओ भजन-कीर्तन. कोनो ग्रुप जोर-जोरसँ हँसबाक प्रैक्टिस करय, तँ केओ छोट-मोट प्रवचन सेहो. मुदा, दीनानाथ आ हुनकर सूगा एकटा स्वतँत्र वक्ता आ श्रोताक ग्रुप छल. बच्चा सभक ओतय आयब दीनानाथक हेतु बोनस छलनि.

क्रमशः नेना सबहक संख्या बढ़य लगलैक. खीसाक लोभें कम, सूगाक लोभें बेसी. प्रश्नक भरमार:
बाबा, सूगाक नाम की थिकै ?

ओकरे पुछिऔ.
अहाँक सूगा गप करैए?
नहि, क’ कए देखियौक ने!
सूगा! सूगा!!  तोहर नाम की छौ ?

दोस्त ! दोस्त!!

बाबा, ई तँ दोस्त कहैए.
इएह तँ ओकर नाम छियैक!
बाबा, ई की सब खाइए?

देखिऔ ने ओएह तँ ओकर कटोरीमे राखले छैक.
ओ तँ पाकल लताम छै.
तँ मधुर लताम सूगाकेँ नीक नहि लगतैक!
आ आम?

खायत. मुदा, हम देबैक नहि.
किएक?
आम बारहो मास भेटतैक? पछाति नहि देबैक तँ हुज्जत करय तँ?

नेना सोचमे पड़ि माथ हँसोथय लागल.
अच्छा. हम अपन सेव दियैक ?

नहि.

किएक ?

ओ केवल अपने टा खाना खायत.

बुधियार छैक ने?
तेँ, ने हम एकरा रोज खीसा सुनबैत छियैक. बुडिबककेँ के खीसा सुनौतैक!

क्रमशः दीनानाथ आ सूगा पार्कमे सुपरिचित भए गेल छल. दीनानाथकेँ सेहो किछु नेना परिचित भए गेल रहनि. मुदा, प्रति दिन नव नेनाक आयब आ नव-नव प्रश्न पूछब दीनानाथकेँ नीक लगनि. सूगाक बहन्ने नेना सब हिनकर कथा-कविता सूनि लेनि, ताहिसँ हिनका बड़का संतोष होइनि.

दिन बितैत गेल. एक दिन एकटा बुधियर बच्चा दीनानाथक लग आबि बैसि गेलनि. हिनका एवं सूगाक संबंधमे ओकरा किछु बूझल तँ रहैक, मुदा, नेने छल. धखाइत आयल रहय. मुदा, हिम्मत केलक, आ ओ शुरू भेल:

बाबा, अहाँ केवल सूगे टा केँ खीसा सुनबैत छियैक.

नहि.

हमरा सुनायब ?

बैसि जाउ.
लेकिन, सूगाकेँ तामस नहि चढ़तै?

किएक ?

हम ओकर खीसा सुनबै, तेँ? अहाँ ओकरे बाबा छियैक ने?

दीनानाथ हँसैत कहलखिन: अहूँ तँ हमरा बाबा कहिते छी. अहूँ सुनू.

बच्चा कनेक काल संच भए बैसल. खीसा सुनलक आ भागि गेल.

दोसर दिन, एकटा कनेक छेटगर नेना आयल. ओकर प्रश्न बुधियारिक रहैक. मुदा, दीनानाथकेँ कोनो बच्चाक गप अनसोहाँत नहि लगनि. बच्चा शुरू भेल.

बाबा, सूगाक नाम की छियैक?

पुछियउ.

नाम की छी ?

दोस्त-दोस्त-दोस्त.
बाबा, ई तँ हमरा दोस्त कहैए. सूगा तँ हीरामन होइ छै, ने?

सब सूगाक अलग-अलग नाम होइ छैक.

अच्छा ? तँ एकटा प्रश्न पुछू बाबा?
हँ .

हमरा बाड़ीमे लतामक गाछ अछि. बहुत लताम छैक. बहुत सूगा अबैए. लतामो खाइए. मुदा, ई तँ बेचारा बन्न अछि. एकरा किएक बन्न केने छियैक, बाबा ? पनिशमेंट भेटल छैक. हम किछु गलत करैत छिऐक, तँ माँ कहैत छथि, बाथरूममे बंद कए देब.

दीनानाथकेँ हँसी लागि गेलनि. हँसी रोकैत कहलखिन:
ई कोनो अपराध नहि केने अछि. मुदा, हमरा घरमे कुकुर अछि. बिलाड़िओ आबि जाइछ. भय होइत अछि, बिलाड़ि एकरा झपटि ने लैक. तेँ एकरा अलग रखै छियै.

मुदा, एतय पार्कमे  तँ किछु नहि छैक. एकर केबाड़ खोलि दिऐक?
“खोलि दिऔक.” ई कहि दीनानाथ उठि कए पार्कक दोसर दिस विदा भए गेलाह. बच्चा सूगाक संग बैसि खेलाए लागल. ओ कनेक काल धरि उठल, बैसल
, घास पर घुड़मुड़िया मारलक. सूगाकेँ किछु पुछलकैक. सूगा किछु बजलैक, नेना सेहो किछु कहलकैक. सूगा एक बेर पिंजड़ाक खूजल खिड़की लग आबि मुड़ी बहार केलक.

“बाहर जेबे.”

“जरूर, जरूर”

फेर  पुछलकैक, ‘लताम नीक लगैत छौक?’
सूगा मुड़ी हिलौलक. नेना बुझलक ‘हँ’ कहैए. पिंजड़ामे आधा लताम तखनो रखले रहैक.
“हमरा ओतय जेबें. हमर गाछक लताम खेबें”

“जरूर. जरूर”

“उड़ल हेतौ?”
“जरूर, जरूर”
“चल.”
“चल दोस्त.”

बच्चाक मन ख़ुशी भए गेलैक. ताधरि सूगा पिंजड़ासँ बहरा कए बहार भए दूबि पर आबि बैसल छल. ओ ओतहि एक दू बेर फुदकल. आ उड़ि गेल. बच्चाकेँ विश्वास भए गेलैक, दोस्त लताम खयबालेल ओकरे गाछ दिस उड़ल अछि. ओहो पिंजड़ा लगसँ उठि विदा भेल.
साँझक समय छलैक. पार्क एकाएकी खाली भए गेल रहैक. जकरा जेम्हर जेबाक छल हेतैक गेल. मुदा, ओहि कॉलोनीक पार्कमे ओ खाली, खूजल पिंजड़ा, अनेक दिन धरि घास पर ओतहि पड़ल छल. दीनानाथकेँ ओतय फेर कहिओ केओ नहि देखलकनि.     

                   

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