Friday, October 7, 2022

बौद्धिक संपदा एवं कॉपीराइट, आ मैथिली

 

सन्दर्भ मैथिली

बौद्धिक संपदा एवं कॉपीराइट, आ मैथिली

विद्या धन थिक से शास्त्र-सम्मत थिक, सर्वसम्मत थिक. स्वरचित साहित्य वा अविष्कार पर लेखक/ अविष्कारक विद्वानक स्वामित्व होइत छनि, से सदाएसँ चल अबैत रहल अछि. प्रागऐतिहासिक गुरु लोकनि सेहो विद्यादानक प्रतिरूप स्वरूपें गुरुदक्षिणाक मांग करैत रहथि, गुरु दक्षिणा पबितो रहथि. किछु गुरुलोकनि कदाच् छात्रकें विद्या देब अस्वीकार सेहो करैत रहथिन. एकर उदहारण सब ततेक सुपरिचित अछि, जे एतय ओकर पुनरावृत्तिक अवश्यकता नहि. किन्तु, ओहि युग मे श्रष्टा केओ होथि, कालक्रमे ज्ञान समाजक सामूहिक संपत्ति भए जाइत छलैक. जाहि ज्ञानकें गुणी लोकनि अपने परिवार धरि सीमित राखथि, वा तेहन सूत्र मे लिखि  देथिन जे अनका बुझबा योग्य नहि होइक से ज्ञान सार्वजनिक तं नहिए भए पबैक, कदाचित् विलुप्त सेहो भए जाइक. मुदा, से बड्ड पुरान गप्प भेल.

प्राचीन काल वा मध्य युग मे बौद्धिक संपदाक स्वामित्वक अवधारणा नहि रहैक. नहि तं फाहियान, चुआन हुआंग, रिनजिंग जान्गपो, आ गुरुपद्मसंभव आ आओर अनेक परवर्ती विद्वान, आ  यात्री लोकनि एतेक ग्रन्थ सब कोना श्री लंका, चीन, जापान, कोरिया, अरब देश, आ  यूरोप धरि लए जैतथि, वा लए अनितथि. ततबे नहि तहिया व्यक्तिगत स्तर पर ज्ञान संबंध मे ‘ व्ययतो वृद्धिमायाति, क्षयमायाति  संचयात’क अवधारणा स्वीकृत छल.

यूरोप मे पोथीक छपाई मशीनक आविष्कार आ औद्योगीकरणसँ सब किछु बदलि गेल. फलतः, पहिने कॉपीराइट कानून बनल आ छपल पोथीक स्वामित्वकें  कानूनी संरक्षण भेटलैक. ई नियम पहिले-पहिल अठारहम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे ब्रिटेन मे लागू भेल. तहिया कॉपीराइट नियमक अधीन कला, साहित्य आ विज्ञानक क्षेत्र मे रचनात्मकता (creativity) कें प्रोत्साहन देब मूलभूत अवधारणा रहैक. मुदा, तहिया लेखकक ‘कॉपीराइट’क छपल पोथीकें, लेखकक अतिरिक्त आन कोनो व्यक्तिक द्वारा पुनः छापि वितरित करबाक निषेध धरि सीमित रहैक. मुदा, जखन क्रमशः समाज मे उपार्जित ज्ञानकें किनबा-बेचबाक वस्तु बनाएब (commodification)क अवधारणा अयलैक, तखन बौद्धिक संपदा शब्द आयल. फलतः, सृजनकें उत्पादक स्वरुप भेटलासँ  साहित्यकार-कलाकार-वैज्ञानिककें आर्थिक लाभक बाट खुजलनि. अस्तु, एहि अवधारणाक अनुकूल साहित्यकार-सर्जक-वैज्ञानिकक अधिकारकें कॉपीराइट आ बौद्धिक संपदा कानूनक अंतर्गत परिभाषित आ निर्धारित कयल गेल.

 

विकिपीडियाक अनुसार बौद्धिक सम्पदा (Intellectual property) कोनो व्यक्ति या संस्था द्वारा विकसित कोनो  संगीत, साहित्य, कला, खोज, प्रतीक, नाम, चित्र, डिजाइन, कापीराइट, ट्रेडमार्कपेटेन्ट आदि  थिक. जहिना कोनो स्थूल संपत्तिक स्वामित्व व्यक्ति वा समूहक होइछ, तहिना बौद्धिक सम्पदाक सेहो स्वामी नामांकित होइछ.

कॉपीराइट सेहो बौद्धिक संपदाक एक प्रकार थिक, जे कॉपीराइटक स्वामीकें एक नियत समय सीमाक अंतर्गत (रचना) सामग्रीक नकल, वितरण, रूपान्तरण, प्रदर्शन, एवं अभिनयक एकाधिकार प्रदान करैछ. अस्तु, , एहि अवधारणाक अनुकूल आब  बौद्धिक संपदा 1 स्वामीक संपत्ति थिकैक, आ एहि स्वामित्वकें कानूनी संरक्षण प्राप्त छैक. फलतः, जे व्यक्ति, समूह, वा संस्था कोनो नव बौद्धिक संपदाक आविष्कार वा विकास करैत अछि, ओकरा बौद्धिक संपदाक स्वामित्वक उपयोगक कानूनी एकाधिकार होइछ.  अर्थात् बौद्धिक संपदाक स्वामी अपन कृतिकें बेच बिकिनि अपन परिश्रमक फल उपभोग कए सकैछ.

बौद्धिक संपदाक आयाम आ प्रकार                                                                                                         बौद्धिक संपदा कानून जहिना-जहिना विकसित भेल, बौद्धिक संपदाक परिभाषा बदलैत गेलैक; बौद्धिक संपदाक क्षेत्र में नव-नव संपदाक समावेश होइत गेल. फलतः, जे ‘कॉपीराइट कानून’ पहिने केवल छपल सामग्रीक पुनर्मुद्रणक निषेध, आ पाछाँ विकसित मशीन आ उपकरण धरिक नकल करबाक निषेध सीमित छल से पछाति गीत-संगीत, दृश्य-श्रव्य कला आ चित्रकला, कम्पूटर प्रोग्राम, भौगोलिक नक्शा, तकनीकी रेखाचित्र, प्रचार-सामग्रीक स्वामित्व धरिकें समेटि लेलक.

कॉपीराइट कानूनक मूल विन्दु

कॉपीराइट कानून बौद्धिक संपदाक जनककें  स्वामित्व तं दैछ, मुदा, स्वामित्वक अपवाद सेहो परिभाषित छैक. एहि कानूनी बिन्दु सब मे एक अछि, उचित उपयोग (fair use and fair dealing)क प्रावधान. सही उपयोग की थिक तकरा विस्तारसँ प्रस्तुत करब एतय संभव नहि. मुदा, एहि शब्दक पाछूक भावना, व्यवसायिक आ आर्थिक लाभक हेतु संपदाक वितरणकें वर्जित करैत, ज्ञानक व्यक्तिगत उपयोगक अपवादकें परिभाषित करैछ. जेना, पुस्तकालय मे पैघ समूह, उपलब्ध कॉपीराइट संरक्षित पुस्तक सबहक दीर्घ  काल धरि उपयोग करैछ. मुदा, एहिसँ पाठकक पैघ समुदाय आ समाज लाभान्वित होइछ. तें ई सदुपयोग (fair use) भेल. तहिना, पुरान पोथीकें दोसर छात्र वा पाठककें बेचि देब गैरकानूनी नहि थिक. ततबे नहि, दृष्टि-बाधित लोकनिक हेतु पोथीक ब्रेल संस्करण वा मोटा टाइप मे कॉपीराइट द्वारा निषेधित पोथीक पुनर्मुद्रण कॉपीराइट अधिकारक अतिक्रमण नहि थिक; ई कॉपीराइटक अपवाद थिक. धार्मिक क्रिया-कलाप मे पोथीक उपयोग सेहो कॉपीराइटक परिधिसँ बाहरक विषय थिक.

बौद्धिक संपदाक भौगोलिक आ समय सीमा

आरंभ मे कॉपीराइट संरक्षण ओही देशक सीमा धरि सीमित छल, जतय पोथी छ्पैत रहैक. फलतः, इंग्लैंड मे छपल पोथीकें अमेरिका मे पुनः छापि बेचबा पर कोनो कानूनी प्रतिबंध नहि रहैक. प्रकाशित पोथीकें एहि कानूनी संरक्षणक समय सीमा सेहो मात्र चौदह वर्ष धरि सीमित छल, जे आओर चौदह वर्ष बढ़ाओल जा सकैत छल. क्रमशः, कॉपीराइट संरक्षणक भौगोलिक सीमा आ  अवधि बढ़ल. अस्तु, अंतर्राष्ट्रीय सहमति, बर्न कन्वेंशन १८८६, 2   अन्तर्गत आइ १७९ संप्रभुता  संपन्न  देश कॉपीराइट संबंधी अंतर्राष्ट्रीय कानूनक पालनक संकल्प केने अछि.

कॉपीराइटक अतिक्रमणक परिदृश्य

अधिकार दावा केला पर भेटैत छैक. क़ानूनक पालन, कानून-व्यवस्थाक नियामक लोकनिक कानूनक अतिक्रमणक निरोधक व्यवस्थाक तत्परता पर निर्भर होइछ. अन्यथा कानून आ अधिकार केवल संहिता धरि में बन्न पड़ल रहि जाइछ, आ कानून तोड़ब निर्बाध चलैत रहैछ. कॉपीराइटक कानून एकर अपवाद नहि. फलतः, कॉपीराइट कानूनक अतिक्रमण विश्वभरि मे आम अछि. विश्वभरिक साहित्यक नव-नव छपल गैरकानूनी प्रति दिल्ली, बंगलोर आ मुंबईक फुटपाथ पर कोन पाठक नहि किनने हेताह. लतामंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे प्रभृति अनेक कलाकारक गीत पुनः गाबि कतेक ने कैसेट आ सीडी बेचि करोड़पति भए गेलाह. विश्व भरिक फिल्मक सीडी शहर सबमे धड़ल्ले बिकाइत देखनहि हेबैक. ई सब कॉपीराइटक उल्लंघन थिक.

इन्टरनेट युग मे कॉपीराइट

इन्टरनेटक आविष्कार ज्ञानक वितरणक सीमाकें तोड़ि देलक. तें, बौद्धिक संपदाक अधिकारक नियम जं एक दिस क्रमशः  जहिना दृढ़सँ दृढ़तर होइतो गेल, तं तहिना ज्ञानक वितरण सुलभ होइत गेल, वितरण क्षेत्रक परिधि बढ़ैत चल गेल. ज्ञानक वितरण सुलभ भेल तं ज्ञान-विज्ञान आ साहित्यक चोरि सेहो सुलभ भए गेल. आइ स्थिति एहन अछि जे घर बैसल केओ ‘उद्यमी’ विश्वक कोनो भागसँ कोनो सहित्य वा विज्ञानक चोरि कए ओकरा अपन सृजन जकाँ राताराती परसि सकैत छथि. आ ई चोरि केवल ‘गृहचोरा’ नहि, प्रतिष्ठित विद्वान आ प्रसिद्ध वैज्ञानिक धरि करितो छथि आ पकड़लो गेलाहे. हेबनि मे व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम प्रभृत्तिक सोशल मीडिया कॉपीराइट उल्लंघनके नव आयाम देलक. आइ मेडिकल, टेक्निकल वा कला विषयक एहन कोनो पोथी  नहि जकर कॉपी इन्टरनेट पर लोक अदला-बदली नहि करैछ ! ई समस्या विश्व भरि मे अछि. थोड़ जनसंख्या, समृद्धि आ  सख्त कानून व्यवस्थाक कारण विकसित देश सबमे ई समस्या थोड़ अछि, मुदा, नहि अछि, से नहि. विकासशील देशमे लोककें स्मरणों नहिं होइछ जे एहन कोनो नियम-कानून छैक.    मुदा,ओ भिन्न विषय भेल. आब पुनः विषय पर आबी.

जनसामान्य  आ अध्येता ले तं इन्टरनेट ज्ञान-विज्ञानक आदान-प्रदानक नव अवसर आ  बाट खोललक. कारण, इन्टरनेटक युगमे कोर्ट केर अनेक आदेश कॉपीराइटक सीमा-रेखाकें पुनः-पुनः परिभाषित कयलक अछि. कारण भिन्न छलैक. विज्ञान, तकनीकी, मेडिकल आ अन्य क्षेत्रक पोथीक अधिक मूल्यक कारण सामान्य पाठक ले पोथी किनब संभव नहि होइत रहैक. फलतः, लोक चोरा-छिपा कए ओकर फोटोकॉपी करैत छल. कानूनी दायराक बाहर हेबाक कारणें कखनो काल ओहि पर केस-मोकदमा सेहो होइत छलैक. फलतः, कोर्ट सबहक अनेक निर्णय आयल. ओहि निर्णयक फलस्वरूप छात्र समुदाय द्वारा फोटोकॉपी कयल  पोथीक व्यक्तिगत कॉपीक उपयोग आब अनेक देश मे गैरकानूनी नहि मानल जाइछ. तथापि, नियम मे परिवर्तनक पछातिओ विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका मे प्रकाशित लेख सब आम पाठकक पहुँचसँ  दूरे छल. तें, किछु वर्ष पूर्व अमेरिका मे निर्णय भेल जे सरकारी अनुदानसँ संचालित अनुसन्धानक रिपोर्ट सार्वजानिक संपत्ति थिक. मुद्रक ओकर सार्वजानिक प्रयोग आ वितरणकें नियंत्रित नहि कए सकैत छथि. समकालीन ज्ञान-विज्ञानक वितरणक दिशा मे ई बड़का डेग छल. कॉपीराइट नियम मे एहि परिवर्तनसँ विश्वभरिक वैज्ञानिक आ अध्येता लाभान्वित भेलाह. ततबे नहि विश्व भरिक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय सबहक ऑनलाइन लाइब्रेरी, archive.org 3 Project Gutenberg 4  क माध्यमसँ   आइ घर बैसल हम आ अहाँ  पर उपलब्ध करोड़ों पुस्तक, सिनेमा, गीत-नादक उपयोग कए सकैत छी, पछुआड़क पुस्तकालय जकाँ ओकर निःशुल्क सदस्यतासँ  पोथी उधार  लए सकैत छी ! सेहो कानूनक परिधिक भीतर.

मैथिली आ कॉपीराइट

मैथिलीक बाज़ार छोट छैक, वा मैथिलीकें बाजारे नहि छैक. फलतः, जें मैथिलीक पोथीक बाज़ार अत्यंत सीमित छैक, तें, मैथिली साहित्य आ बौद्धिक संपदासँ उपार्जन कए जे गुजर करैत छथि तनिक संख्या थोड़ अछि. पहिनहु, मूलतः, एकर लाभ ओही लेखक लोकनिकें होइत छलनि जे आइ पोथी लिखथि, आ काल्हि ओकरा स्कूल-कालेजक कोर्स मे सम्मिलित करबा लैत छलाह. तथापि, एहन घटना सुनल अछि जे हुनको लोकनिक पोथीक अनाधिकार मुद्रण आ बिक्री होइत छलनि आ ओ लोकनि शिष्टाचार आ सामाजिक संबंधक कारण किछु नहि बाजथि.

आब स्थिति एहन अछि जे कॉपीराइट नामक कोनो कानून छैको से मैथिलीक मुद्रक प्रकाशक बिसरि गेल छथि. फलतः, कॉपीराइट कानूनक प्रत्येक प्रावधानक खुला उल्लंघन आम अछि. दिवंगत लोकप्रिय लेखक जनिकर पोथी हुनका लोकनिक जीवन काल मे खूब बिकाइत छल, हुनकर लोकनिक रचनाक तं गप्पे नहि हो. एखन केओ दिन-देखार अनकर लेख अपना नामे छापि लैत छथि, तं केओ फेसबुक/ व्हात्सएप्पसँ अनकर लेख उतारि ओकरा तोड़ि, काटि-छाँटि अपन पत्रिका-समाचार पत्रक हेतु संकलित करैत छथि. बाँकी नवसिखा उद्यमी-प्रकाशक लोकनि एकटा दू टा आओर लेख कतहुसँ ऊपर केलनि, लूटि लाउ, कूटि खाउक रीतिसँ किछु लेख जमा केलनि  आ पत्रिका/ स्मारिका छपि गेल. ओहुना अनकर सामग्रीक  अनाधिकार प्रयोगक परंपरा आब एतेक सामान्य भए गेले जे एहन काज कॉपीराइट नियमक अतिक्रमण थिक से संकलन कयनिहारक चेतना धरि किएक पहुँचतनि! एहि मे ने कोनो संकोच, ने कोनो आभार4, ने कोनो शिष्टाचार5. ऊपरसँ, गूगल (‘बाबा’) आ गूगल अनुवाद आब चोरिक अवसरकें तेना अनेक गुणा बढ़ा देने अछि, जे कॉपीराइट सामग्री चोरिक  गतिकें चोर लोकनि पवन समान नहि, प्रकाशक गतिक समान कए देने छथि. तें, ने सामग्रीक कमी, ने देरी हेबाक भय. एहना स्थिति मे बेचारे (मौलिक) लेखक, जे किछुओ लिखबा मे एखनो ‘ नौ डिबिया तेल’ जरबैत छथि, से कतय जाथु ? हँ,‘नकल करबाक हेतु अक्किल चाही, अन्यथा शक्ल बदलि सकैछ’ ! मुदा, तकर भय ककरा. कारण, लिखल वस्तुकें केओ पढ़त तकर विश्वास कतेक गोटेकें होइत छनि. तथापि, एखनो गंभीर लेखन होइत तं अछि. मुदा, लिखल सामग्रीक अनाधिकार प्रयोगक स्थिति मे तत्काल सुधारक कोनो संभावना देखबा मे नहि अबैछ. मुदा, एकर समाधान कोना हो ताहि पर मैथिलीक प्रतिष्ठित लेखक-विद्वान आ प्रकाशक मंथन करथु आ समाधान बहार करथु, अनुशासनक संहिता बनाबथु. सहमतिक वातावरण बनय से सर्वथा वांछित थिक.

सन्दर्भ:

1.  https://en.wikipedia.org/wiki/Intellectual_property

2. https://en.wikipedia.org/wiki/Berne_Convention

3. https://archive.org/

4. https://en.wikipedia.org/wiki/Project_Gutenberg

5 . पारंपरिक मैथिली में ‘धन्यवाद’क समावेश नहिं !

https://kirtinath.blogspot.com/2022/03/blog-post.html

6 . साहित्य आ शिष्टाचार https://kirtinath.blogspot.com/2019/12/blog-post_29.html

 

  

Tuesday, September 13, 2022

द्वंद के संधान में

कश्मीर से कन्याकुमारी तक
द्वारका से इम्फाल तक
पड़े हैं कितने विग्रह
अपूज्य।
किसी को कहते नहीं
सपने में
मैं पड़ा हूं विस्मृत
अकेला, अपूज्य !
हमारे पूर्वजों ने
हर पत्थर
पेड़
नदियों,
पर्वतों में देखे थे
अपने इष्ट !
आज
आखें हमारी
अब देख नहीं पाती
अपने इष्ट,
इन्सानों में भी,
देखती नहीं प्रकृति में
अपने पूज्य।
क्योंकि,
अब हमें देव नहीं
दंभ चाहिए,
पड़ोसी नहीं,
प्रतिद्वंदी चाहिए,
जिससे
हमारी पुरुषार्थ,
पड़ोसी के हित से नहीं,
उसकी हानि से
करना है
प्रमाणित I
देवता का
नम्रता से नहीं,
दंभ से करना है
आवाहन ।
तभी तो,
नये युग में
बनाए हैं हमने
मनुष्य को
अपने
अहंकार का वाहन !

Thursday, August 18, 2022

आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय दास व्यापारक एक भुक्तभोगी श्रमिकसँ साक्षात्कार

The Nutmeg’s Crisis ( Parables from Planet in Crisis) नामक अपन पुस्तक मे लेखक अमिताभ घोष एहि युगक logistic revolution नामक शब्द दिस ध्यान आकृष्ट करैत छथि, जकर केन्द्र मे अछि logistic city. Logistic city सबहक स्थापना एखुनक विश्व व्यापारमे समुद्री मार्गसँ कच्चा आ तैयार मालक यातायातमे आयल अपूर्व वृद्धिसँ संबंधित अछि. मुदा, हमर एहि लेखकें मालक अंतर्राष्ट्रीय यातायातसँ कोन संबंध ? एकर उत्तर क्रमशः भेटत. मुदा, पहिने किछु गप्प सुनू:

सितम्बर २०२१. एकटा मित्रक कन्याक विवाहक नोत पुरबा लेल हम बंगलोरसँ टैक्सीसँ  कडलूर (तमिलनाडु) जाइत रही. व्यापार पर कोविड महामारीक प्रभाव समाप्त नहि भेल रहैक. रोजगारक अभाव मे ओ लाखो आओर युवक जकाँ घर बैसल रहथि. अतः हमर टैक्सी-ड्राइवर पार्ट-टाइम ड्राइवर रहथि. ई युवक कैटरिंग टेक्नोलॉजी मे डिप्लोमा रहथि.कहैत छैक, बैसलसँ बेगार भला. अस्तु, जखन सवारी भेटनि, टैक्सी चला लैत छलाह.

ट्रेन, टैक्सी, बस मे- हवाई जहाज नहि- सहयात्रीसँ परिचय करबा ले आ समय बितयबाक हेतु नीक अवसर आ पर्याप्त समय भेटैछ जाहि बीच गप्प–सप्प  सब कतेक बेर अनेक नव गप्प भेटि जायत. हमहू ओहि दिनुक ड्राइवरसँ परिचय पात कयल आ गप्प करय लगलहुँ. किन्तु, गप्प मे जं किछु नव होइक आ अहाँकें सूचना एकत्र करबाक हो, तँ अपने कम बजबाक चाही. सुनी बेसी. केवल वक्ता कें बीच-बीच मे उत्साहित करियनि, जाहिसँ गप्प चलैत रहैक. मुदा, एहि हेतु एहन संगी चाही जनिका गप्प करब नीक लगैत होइनि.

हमर ड्राइवर युवक निर्विवाद अनुभवी रहथि. गप्प करब पसिन्न रहनि. आ अपन भाव नीक जकाँ अंग्रेजी हिन्दी में व्यक्त करबा मे सक्षम छलाह. एहिसँ बेसी चाही की.

गप्प हमरा ले नव छल. समयक अभाव नहि; हमरा लोकनि यात्रा दू दिनक छल. अस्तु, ओ अपन अनुभव खूब विस्तारसँ कहैत गेलाह. किन्तु, गप्प हमरा ले तेहन नव छल जे हमरा रुचि तँ खूब भेल, मुदा, ओहि सूचना पर सोझे विश्वास हयब कठिन छल.

आब गप्प सुनू. अथ ड्राइवर सिदप्पा उवाच:

‘वर्ष २००३. हम नौकरी तकैत रही. मनोरथ छल, विदेशमे नौकरी भेटय तँ आओर नीक. संयोगसँ तखने बंगलोरक समाचार पत्रमे केरल केर एक कंपनीक विज्ञापन बहरयलैक. विज्ञापनमे सब प्रकारक नौकरी- कैटरिंग मेनेजर, ड्राइवर, भनसिया, लेबर(श्रमिक)क रिक्ति बहराएल रहैक. संयोग एहन जे इंटरव्यूक एकटा केन्द्र बंगलोरहु मे रहैक. हमरा सुविधा भेल. हम तुरत आवेदन पठा देलियैक. हम एतुका ताज होटल मे कैटरिंग सुपरवाइजर केर रूप मे काज करबाक अनुभव छल. अस्तु, इंटरव्यू भेलैक आ हमर चुनाव भए गेल. मुदा, समय नहि रहैक. ओही हफ्ता मे कुवैत जेबाक आदेश रहैक. हमरा लोकनि तँ नीक आमदनीक लोभें ‘गल्फ’ देशक हेतु मुँह बओनहि रही. जयबाक खर्च भेटिते रहैक. बस विदा भए गेलहुँ. सोझे कुवैत.’

‘वाह ! बढ़िया.’ – हम कहलियनि

‘ एखन सुनू ने.’ सिदप्पा हमरा दूरेसँ हाथ देखबैत कहलनि आ पुनः शुरू भए गेलाह:

‘कुवैत पहुँचलहुँ. दोसरे दिन फेर आगूक यात्रा रहैक. मुदा, अगिला यात्राक हमरा लोकनिकें कोनो अनुमान नहि छल. ओतय पासपोर्ट जमा कय लेलक. दोसर हवाई जहाज पर सवार भेलहुँ आ सोझे इराक. आब अहाँ पूछब कतय गेल रही तँ हम एतबे कहब: इराक. बड़का मरुभूमि. अमरीकी सेनाक छावनी. चौबीस घंटा कड़ा  पहरा.  भीतर गेलहुँ. हमर काज भीतरे छल. काज शुरू क’ देलहुँ. बाहर खन-खन गोलाबारी होइक. हमरा सबहक संग आयल बाँकी के कए कतय गेल की जानि! बाहर कतहु जयबाक कोनो सवाल नहि. बाहरसँ कोनो संपर्क नहि. जे बाहर गेल तकरा की भेलैक, कहब मोसकिल. डेढ़ बरस ओही जहलमे बीति गेल.’

‘तँ, तखन बंगलोर आबि गेलहुँ ?’

सिदप्पा हँसय लगलाह. कहलनि: ‘ बंगलोर कतय ? इराकसँ सोझे ऑस्ट्रेलिया ! ओतहु ओएह खेल. अमरीकी मिलिटरी छावनी. घेराबंदी. सब किछु भीतर. आओर डेढ़ वर्षक पछाति फेर कुवैत आपस. तखन बंगलोर आपस भेलहुँ.’

हमर आश्चर्यक ठेकान नहि. मुदा, आश्चर्य छिपबैत सिदप्पा कए उत्साहित करैत कहलियनि:

‘तखन तँ अहाँ तीन टा देश देखि लेल. अमरीकी मिलिटरी सेहो देखल.’ हम कहलियैक.

सिदप्पा पुनः हँसय लगलाह: ‘ हम कुवैत छोड़ि कतहु नहि गेलहुँ !’

‘माने ?’

‘पासपोर्ट ठीकेदार लग छल. ओहि पर बंगलोर, दिल्ली आ कुवैतक ठप्पा छल. इराक आ ऑस्ट्रेलिया कहितियैक तँ गिरफ्तार नहि भए जैतहुँ ! हमरा कि कोनो वीसा छल, कि नियुक्ति पत्र. ’

‘अच्छा ?’

‘तखन की ? पासपोर्ट पर कोनो लिखा-पढ़ी नहि. भारत सरकारक अनुमति नहि. तखन हम सब भेलहुँ गैरकानूनी मजदूर. कतहु कोनो सुनवाइ नहि. जे मरिओ-खपि गेल ओकरो कोन गिनती.’

‘ टाका तँ कमएहुँ, ने ?’

‘हं. आधा-छीधा! ठीकेदार अपन कमीशन तँ काटिए लैत छैक ने.’

‘आ अनुभवक सर्टिफिकेट ? से  तँ भेटल हएत ?’

‘ अछि ने. कुवैत केर अमेरिकी छावनीक केटरिंग ठीकेदार सर्टिफिकेट देलक ने’ कहैत ओ टैक्सीक डैशबोर्डसँ लैमिनेटेड कार्ड निकालि हमरा दिस बढ़ओलनि.

हमरा ओहि दिन सिदप्पाक गप्प जं पूर्णतः मनगढ़ंत नहिओ लागल तँ ओहि पर ओहि दिन सोझे विश्वासो नहि भेल. आब अनेक मासक पछाति जखन अमिताभ घोषक उपरोक्त पोथी पढ़ि रहल छी तँ आधुनिक दास-व्यापारक कटु सत्य आँखिक सोझाँ मूर्त भए रहल अछि. सैनिक अभियान वा नागरिक आपूर्तिक हेतु वर्तमान युगक उपस्कर(logistic)क भंडारण आ वितरण आ एहि मे निहित ‘बंधुआ’ श्रमिकक संबंध मे लेखक अमिताभ घोष लिखैत छथि:               

‘साधारणतया ‘logistic city’ पूर्णतः नियंत्रित श्रमिक बलसँ संचालित अत्यन्त सुरक्षित वितरण केन्द्र थिक जकर माध्यमसँ विश्वव्यापारमे वा सैनिक अभियानमे उत्पादनक स्थान आ उपभोक्ताक बीच माल-असबाबक निर्बाध यातायात सुनिश्चित कयल जाइछ.’

अस्तु, जहिना विश्व भरि मे नागरिक उपभोक्ता वस्तुक वितरणक हेतु Amazon, Ikea, Walmart, Nestlé, and Target सन संस्थाक वस्तु जातक वितरण हेतु logistic कंपनी सब तत्पर अछि, तहिना सामरिक अभियानक हेतु सेहो विभिन्न पक्ष अंतर्राष्ट्रीय अभियानक संचालन ले logistic केन्द्रक स्थापना करैत अछि. उदहारणक हेतु, ‘अफगानिस्तानमे अमरीकी आक्रमणक आरंभक तुरत बाद अमेरिकी सेनाक हेतु आवश्यक वस्तुजातक आपूर्तिक हेतु दुबई मे logistic city क स्थापना भेल छल. एहने logistic city इराक केर बसरा नगर आ अमेरिकाक ओकलैंड आ वैंकुओवर शहर मे सेहो अछि.’

एहि logistic city सब मे श्रमिक लोकनि अत्यंत कठिन सुरक्षाक बीच रहैत छथि. चूकिं, एहि सब logistic hub मे प्रवेशसँ पूर्व श्रमिक लोकनिके अनेक करार पर हस्ताक्षर करय पड़ैत छनि, तें ओ लोकनि स्वेच्छया अपन अनेक मूलभूत अधिकारसँ समझौता तँ करिते छथि, एतुका सब गतिविधि मानवाधिकार आ कानूनक अधिकारक परिधिसँ बाहर होइछ.

अमिताभ घोष कहैत छथि: ‘ ई logistic city वा hub प्रथम दृष्टया भले भिन्न बुझाइत हो, मुदा, थिक तँ ई बीतल युगक दास-किला, दास-व्यापार बंदरगाह आ कंपनी नगरे, जकर स्थापना डच आ ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी ( अपन व्यापार ले ) कयने छल.’1

अमिताभ घोषक एहि पोथी पढ़लाक पछाति हमरा ड्राइवर सिदप्पाक गप्प, गप्प नहि यथार्थ थिक, से विश्वास भए गेल.

हं, भारतवर्ष इराक युद्ध मे प्रत्यक्षतः सम्मिलित नहि भेल छल. मुदा, अनाधिकार रूपें भारतीय बेरोजगार ठेकेदारक माध्यमसँ ‘गल्फ-देश’ जाइत छलाह तकर आओर दू गोट प्रमाण समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ आ दिल्लीसँ प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ मे प्रकाशित समाचारसँ भेटल जाहि मे भारतक तत्कालीन विदेशमंत्री यशवंत सिंहसँ इराक मे फंसल भारतीय श्रमिक लोकनिक उद्धारक हेतु अपीलक समाचार छपल छल. 2,3 संयोगवश सिदप्पा इराक वा ऑस्ट्रेलिया मे कोनो प्रकारक प्रताड़ना वा अमानवीय व्यवहारक गप्प नहि कहलनि. मुदा, जतेक वेतनक आश्वासन भेटल रहनि से तँ नहिए भेटलनि. ऊपरसँ नियत अवधि धरिक सेवाक प्रतिबंध तँ भोगबे केलनि. मुदा, आर्थिक लाभक कारण लोक सब किछु सहि लैछ.   

ततबे नहि, गत १७ अगस्त २०२२क ब्रिटेनक प्रमुख समाचार पत्र ‘द गार्डियन’ मे जॉर्ज मोनबियो नामक लेखकक, एक दोसर प्रकारक प्रतिष्ठान-  ब्रिटेन में अवस्थित स्पेशल इकनोमिक ज़ोन वा फ्रीपोर्टक- संबंध मे एक विचार  छपल अछि. एहि लेख मे मोनबियो लिखैत छथि, ‘ वस्तुतः, स्पेशल इकनोमिक ज़ोन वा free पोर्टक भीतरक कार्यकलाप सबसँ एना प्रतीत होइछ जेना ई क्षेत्र सब देशक सीमा (आ कानूनसँ ) बाहर हो, जेना मध्यकालीन इंग्लैंडक जंगली क्षेत्र सब छल, जतय राजाक व्यक्तिगत अधिकार नागरिक अधिकारसँ ऊपर छल. एहि लेख केर सारांश में लेखक कहैत छथि: ‘ फ्रीपोर्ट संगठित अपराध, मनी laundering, अवैध ड्रग trafficking कें बढ़ावा दैछ. मुदा, एहि सबसँ देशकें न्यूनतम लाभ होइछ. केवल पूंजीकें परश्रय भेटैछ.’4

एहि सबसँ एतबा तँ स्पष्ट अछि, दासता आ दास-व्यापार भले प्रतिबंधित भए गेल हो, दास-किला, दास-व्यापार बंदरगाह आ कंपनी नगर प्रतिबंधित भए गेल हो, किन्तु, भिन्न-भिन्न नामसँ, आ विकसित आ विकासशील देश मे कानूनक क्षत्रछाया मे एखनो दास-व्यापार-सन गतिविधि जारी अछि, आ कानूनक आ मानवाधिकारक निरंतर हनन चलि रहल अछि.

गोपनीयताक निर्वाह ले व्यक्तिक नाम बदलि देल गेल अछि.  

सन्दर्भ: 

1.Ghosh Amitabh. The Nutmeg’s curse (Parables for a planet in crisis) 2021. Penguin Allen.

2. George Monbiot.Welcome to the Freeport, where turbocapitalism tramples over British democracy. The Guardian 17 August 2022.

3. Indian workers escape from US army camp in Iraq .The Hindustan Times May 06, 2004.

4. Rohde David: The  struggle for Iraq: foreign labor ; Indians Who Worked in Iraq Complain of Exploitation. The New York Times. May 07, 2004.

Monday, August 15, 2022

संकल्प

 संकल्प

ने कोनो मसीहा, ने कोनो संत

संविधान देने अछि संभावना अनंत

तें, ने ककरो आगाँ ठेहुनिया

ने कतहु पेटकुनिया I

करब अपना संकल्पें 

हम अपन मनोरथ पूर 

थिक स्वतंत्रता, समता, आ भाईचारा

सब किछु ले अनुकूल I

स्वतंत्रता दिवसक दिन

करी सब गोटे

अपन सोचकें स्वतंत्र

आ ढाही संकीर्ण विचारक देवाल I

जुनि बिसरी 

सदासँ करैत रहलहुँ

हमरा लोकनि भिन्न-भिन्न मत

आ विचारक स्वागत

तें कहबैत अछि महान भारत !

Thursday, August 11, 2022

धुत्तोरी के ! एतबे गप्प ?

 

धुत्तोरी के ! एतबे गप्प ?

प्रायः १९७९क गप्प थिकैक. हाथीनगर मे सत्तासीन राष्ट्रीय पार्टीक स्वर्ण जयन्ती समारोहक आयोजन बहुत धूमधामसँ भेल छल. पार्टीक सत्ताक चौदह वर्ष पूर हेबा पर रहैक. चारू कात सरकारी तंत्र  दासो दास छल. लाखो लोक जमा भेल छल. सैकड़ों करोड़ टाका खर्च भेल. सम्पूर्ण शहर लाल-लाल भए गेल छल. सब ठाम सब तरहक सजावट. मुदा, चेहरा आ  कटआउट केवल मुख्यमंत्री आ प्रधानमंत्रीक रहनि. आयोजन खूब सफल भेल. राष्ट्रीय पार्टीक स्वर्णजयन्तीक समाचार, बाँकी समाचारकें समाचार पत्र सबसँ ओहिना धकेलि देने छल जेना, सत्ताधारी पार्टी विपक्षकें संसद आ विधान सभासँ.

समारोह समाप्त भेल आ ओकर दोसरे दिन एकटा अजगुत घटनाक कारण तेलीरामक फोटो दैनिक समाचारपत्र सबहक मुखपृष्ठ पर छल. बेचाराकें बड्ड मारि लागल रहैक. नौकरीसँ निलंबित भेल से फूटे. तेलीरामक कुटाईक विडियो टीवी चैनल सब पर सेहो आयल. यद्यपि एहि विषय पर कोनो चैनल वाद विवादक आयोजनक हिम्मत नहि केलक.

बेचारा तेलीराम. मुनिसिपैलिटीक कचरा उठओनिहार सरकारी कर्मचारी. ओकर काजे ओकर अपराध भए गेलैक. एक तं स्वर्णजयन्तीक कारण पसरल कचराक ढेरक भार, आ दोसर दिस पिटाई आ सस्पेंशन. साँझुक पहर बेचारा मुँह बिधुऔने अपन दलान पर बैसल छल. आ कि  बहु आबि कए फज्झति करए लगलैक: ‘एकरा अक्किल छै. मार बाढ़नि, कहिया अक्किल अओतै एहि मनसाकें !’

जखन बहु फज्झति कए चल गेलैक, तं ओसराक दोसर कात केथरी मे मोटरी बनि पड़ल, तेलीरामक बाप, बेनीराम पुछलकैक, ‘ की कहै छौ ? की भेलै ? ओना, ...... जनि जातिक गप्प कान देब कोन बुधियारी ? मुदा, तो केलही कोन अपराध, जे एतेक मारलकौ आ  सस्पेन क’ देलकौ? हमहू तं निस्पैल्टीए मे चालीस साल खटलौं.’

तेलीराम भोकारि फाड़ि कानए लागल. कहलकै, ‘ हम कोन अपराध करबै, बाबू ? हम तं भरि जनम कचरा उठौलहुँ. आइओ सैह केलहुँ . तोहों सैह केलह. मुदा, आइ काल्हि  किछो होइ छै, अलेल माला टंगै छै, गेट बनै छै, फोटो लगा दै छै. पाछू, काज खतम भेल, फेर सबटा समेटि कए कचराक ढेर क’ दै जाइ छै. कचराक ढेर मे हम की जानए गेलिऐ, के, कोन मुनिस्टर छियै, कए कोन बड़का नेता छियैक. हमर दोख एतबे जे, बलू, हमर ठेला पर, कचरा मे सबसँ बड़का मंत्री आ मुख्यमंत्रीजीक फोटो छलनि. हम तं ओहिसँ पहिने कतेक खेप ओहन-ओहन फोटो  सब गदौस मे फेकि आएल रही. मुदा, ओहि काल मे वाड कमिशनर जाइ छलै. ओकर नजरि हमर ठेला पर पड़ि गेलैक. आ ओकरा हरलै ने फुरलैक, हमरा लतियाबए लागल. कि त, बलू, फोटो को कचरा मे फेकेगा! हम की करबै, बाबू. कचरा हम बनबै छियै हौ ? हमरा तं जे आगा पड़ैए उठा लै छी. हमर एतबे अपराध. आब तोहीं कहह?’

तेलीरामक गप्प सुनि बुढ़बा बेनीराम ठहाका द’ कए हँसय लागल. कहलकै, धुत्तोरी के ! एतबे गप्प ? वाड कमिशनर. एखन, बंहि, नेना अछि. जनमिए क त ठाढ़ भेले. आइ ने काल्हि सार अपने बूझि जेथिन. तों दुःख नहि कर. ओकरा एखन बुझल कहाँ छै ने, आइ ने काल्हि, सब नेताके लोक कचरा मे फेकिए दै छै !  हमहू तं भरि जीवन कचरे उठौलहुँ.                

Tuesday, August 9, 2022

कबीर पर केस हो !

 

कबीर पर केस हो !

पण्डित बटेश मिश्रकें काल्हि साँझुक पहर बड्ड तामस चढ़लनि. हुनक पौत्र, बंभोला बहरी ओसारा पर बैसल हिन्दीक दोहा सब रटि रहल छलनि. पहिने तँ पण्डित जी व्यस्त रहथि. एहि बेर खेतक धान द्वारि तक कोना आबय तकर चिन्ता रहनि. अंगना मे दाउन-दोगाउन कहिया ने बन्न भए गेलैक. आब थ्रेसर आयल. ओहो चटसँ उपलब्ध नहि. तखन जा धरि खेत मे जाकल, काटल धान अंगना नहि आयल, कोन किसानकें चिन्ता नहि हेतैक. पण्डित जी तकरे व्यवस्था मे सियाराम साहुसँ मोल भाव करैत रहथि. एतेक टा गाँओ आ एकेटा थ्रेसर. तथापि, अपन गामक मशीन आ अनगौआं मे तँअन्तर हेबे करतैक. जे किछु. सियाराम साहु तँ गेल. मुदा, बंभोलाक पाठ अभ्यास हएब एखनो जारी छल. ओ फेर शुरू भेल:

पाहन पूजे हरि मिले, तौं मैं पूजूं पहाड़

ताते ये चक्की भली पीसि खाय संसार

आब बटेश मिश्रकें बुझबा मे किछु भांगठ नहि रहलनि. दमसि कए पौत्रकें पुछलखिन: की अंट-संट पढ़ैत छह?

 - बाबा हिन्दीक पोथी थिकैक.

- पोथी. आइ काल्हि पोथी मे इएह सब लिखल छैक !

- जी. सर सबटा याद क’ कए काल्हि स्कूल आबय कहने छथिन. पाठ याद नहि भेने, बड्ड कान जोरसँ कान ऐंठि दैत छथिन. हमरा आँखि मे नोर आबि जाइए.

जहिया पण्डित बटेश मिश्रक धियापुता स्कूल जाइत रहथिन, हुनका एहि सब पर ध्यान देबाक अवसर कहाँ भेटलनि. तहियाक गृहस्थी सुलभ नहि रहैक. मुदा, आब तँगृहस्थी नामे ले बचल छैक. तैओ जकरा बचल छैक, ओ परम पहपटि मे अछि. तखन, जथा अछि, तँ किछु तँ करहि पड़तैक. आइ-काल्हि पण्डित बटेश मिश्र खेती-बारीक सब किछु दरबज्जा पर बैसले-बैसल निबटबैत छथि.

मुदा, अजुका दोहा सुनि कए हिनकर मन विचलित होबए लगलनिए. मनहि मन सोचए लगलाह, शास्त्री तँ हमहू सम्पन्न केलहुँ. मुदा, पाठशाला मे केओ एना बजैत, से साधंश होइतैक. मुदा, गप्प ककरासँ करताह. गाम पर आब ने बेटा लोकनि छथिन, आ ने टोल पर गप्प करैवला छैक. दरबज्जा पर केओ आओत ? केहन गप्प करैत छी ! अस्तु, पण्डित बटेश मिश्र मनहि मन भरि राति गुम्हरैत रहलाह.

दोसर दिन रवि छलैक. रवि दिन पण्डित बटेश मिश्रकें  बिदेश्वर बाबाक दर्शन करब वृत्त छलनि. ई हिस्सक ओ तहिएसँ लगौने रहथि जहिया ओ लोहना पाठशाला मे पढ़ैत रहथि. तें दोसर प्रात ओ अहल भोरे उठि नित्यक्रियासँ निवृत्त भेलाह. एक हाथ मे लोटा, दोसर हाथ में लाठी लेलनि. काँख तर कोंचियाओल धोती लेलनि. आ विदा भए गेलाह. दरबज्जा परहक पोखरिक पानि आब नहयबा जोग नहि. मुदा, बिदेश्वर बाबाक पोखरिक पानि एखनो टुटैत छैक. रवि  दिन सौ-दू सौ भक्त नहाइते अछि. ताहू मे भोरे-भोरे पूब मुँहे डूब देला पर ओतय सबसँ सूर्यक लाल चक्काक सोझे दर्शन हएत. पण्डित जीकें से नीक लगैत छनि.

आइ बिदेश्वर धाम आबि ओ सोझे पोखरिक घाट पर अयलाह. पक्का घाटक एक कातक सिमेंट झाड़ि, धोती-लोटा-सोंटा नीचा रखलनि आ पानि मे डूब देबा ले पोखरिक पानि मे धसि गेलाह.

अगहनक मास. जाड़ तँरहैक. मुदा, भोरुका सूर्य देखि पण्डित जीक मोन प्रसन्न भए गेलनि. ओ स्नान कए सूर्यकें जल चढ़ौलनि आ  घाट पर आबि धोती फेरलनि. धोती फेरि लोटा मे जल लए बाबाक दरबार दिस बिदा भेलाह तँबाटक कात बैसल बालदेव दासके हिनका पर नजरि पड़लनि. ओ ओतय घूड़ लग बैसल छलाह. ओ पण्डित जीकें देखि दुनू हाथ जोड़ि माथ मे सटबैत दूरेसँ, ‘ बाबा परनाम. कनेक आगि तापि लियअ. बड्ड जाड़ छै.’

पण्डित बटेश मिश्रकें लोकक लग बैसि मनक भड़ास निकालबाक विचार नहि छलनि, से नहि. मुदा, सोचलनि, पहिने बाबाकें हाज़री बजाइए ली. तें, ‘कनेक थम्हह. बाबा लगसँ  भेल अबैत छी’ कहैत ओ  झटकारनहि, बाबाक मंदिर दिस बढ़ि गेलाह. मुदा, जाड़ तँहोइते रहनि. सोचलनि, गप्प तँ बालदेव कोनो बेजाय नहि कहैए. मुदा, घुरैत छी तखन बैसब.

पण्डित जी बिदेश्वर बाबा लग जल चढ़ौलनि, पूजा केलनि. मुदा, आइ धरि कहिओ बाबाकें शिवपंचाक्षर, शिवमहिम्न आ शिवताण्डव स्तोत्र बिना सुनओने ओ मंदिर नहि छोड़लनिए. से चाहे मकरे केर मेला किएक नहि होउक. बाबा हिनका ओहि अवसरसँ कहिओ वंचित नहि केलखिन-ए. हिनक तकर संतोष आ बाबा पर असीम श्रद्धा छनि.

आइ जखन पूजा-पाठ कए पण्डित बटेश मिश्र बहरएलाह तँरौद उगि गेल रहैक. मुदा, जाड़ तँ रहैक. अस्तु, घूड़क लगहि चबूतरा पर बैसि गेलाह. ओतय आनो कतेक गोटे बैसल छल. मौक़ा नीक रहैक. बस शुरू भए गेलाह: ‘भगवानक एहन अपमान. अनर्थ ! एहन नास्तिक !! बाबाकें की, शालिग्राम-नर्मदेश्वर धरिकें नहि छोड़लक. आ से दोहा हमरा लोकनिक नेना स्कूल मे रटैत अछि. कलियुग समर्थ भए गेल ! कहि पण्डित जी अपन अंतिम वाक्यकें जोर दैत पुनः दोहरौलनि: ‘ कलियुग समर्थ भए गेल !!’

पण्डित जीक अंतिम वाक्यक श्रोता पर समुचित प्रभाव भेलैक. बालदेव पुछलकनि,’ की भेलै, बाबा ? किए तमसैल छिऐक ?’

बालदेव दासक प्रश्न सुनि पण्डित जीकें संतोष भेलनि. मुदा, ओ क्षण भरि ले थम्हि चारू कात नजरि घुमौलनि. हुनका भेलनि जे बालदेवक प्रश्न पर आनो बहुत लोक आकृष्ट भेले. बस ओ पुनः जोर-जोरसँ शुरू भए गेलाह: ‘बाबाक अपमान ! चोरी आ सीना जोरी !! सेहो स्कूल मे !!!’

ताबत अओरो लोक ओतय जमा भए गेल. किछु गोटे पण्डित बटेश मिश्रक वाक्यकें पुनः पकड़लक: ‘एं ? बाबाक अपमान ? के अछि एहन पापी ? बज्जर खसतैन !’

‘ हं हौ. अपमान नहि तँकी ?  सेहो धिया पुता पढ़ैए. अनर्थ !’ अनर्थ शब्दक संग स्वर ऊँच आ वाक्य कनेक आओर दीर्घ भेल. आ तकर पछाति, पण्डित जीक चारू कात ओतय एकटा छोट-छीन मेला लागि गेल. संगहि शुरू भए गेल तरह-तरहक  प्रश्न, पण्डित जीक उत्तर, आ श्रोता सबहक टीका टिप्पणी आ संकल्प सेहो.

जखनि बेस लोक जमा भए गेलैक तँ पण्डित जी विस्तारसँ अपन चिन्ताक मीमांसा शुरू केलनि. काल्हि बंभोला कोना दोहा रटैत छल. ओहि मे कोना पाथरक भगवानक तुलना पहाड़ आ जाँतसँ कयल गेल छलनि. सेहो, जे पहाड़े आ जाँते बाबासँ पैघ थिक, नीक थिक !

एहन धर्म विरोधी गप्प ककरो नीक नहि लगलैक. एक गोटे आगू आयल : ‘बाबा के थिक एहन डपोरशंख !’

‘कहै छल, केओ कबीर थिक. कबीरे नाम थिकैक. हम तँ सएह बुझलिऐक.’

ओही समय अब्दुल रहीम अपन दोकान ल’ कए बिदेश्वर स्थान आयल छल. भगवान जानथि, ओकर परिवार कहियासँ, बेंगक चामसँ बनल, माटि आ बाँसक कमचीक, डिगडिगिया गाड़ी बिदेश्वरक मेलामे बेचैत आबि रहल अछि. जहां आब आन कतेक ठाम  हिन्दू धार्मिक स्थल मे हिन्दुए टा कें दोकान-दौड़ी करबाक अनुमतिक गप्प चलि रहल छैक, बिदेश्वर बाबा एखनो धरि टेक रखने छथि. एतय ककरो पर कोनो प्रतिबन्ध नहि छैक. ओहुना अब्दुल रहीमक परिवारक कतेक पुश्त,  पण्डित बटेश मिश्रक दुबौलीक खेत जोतैत आबि रहल अछि. हुनका उत्तेजित होइत देखि अब्दुल रहीम अपन बेटा मजीदकें दोकान पर बैसा देलकैक आ सहटि कए, पण्डित जीक चारू कात जमा मेला लग आयल. फेर ओएह प्रश्न. फेर ओएह उत्तर. मुदा, पण्डित जीकें आशा नहि रहनि, भगवान-भगवती चर्चा आ अपमान मे केओ मुसलमान एना भए क संग देत. तें, जखन ओ अब्दुल रहीमकें सहमति मे मूड़ी डोलबैत देखलखिन, तँ हुनका आश्चर्य भेलनि. मुदा, अब्दुल रहीम ओतबे पर नहि थम्हल. ओ बाजए लागल: ‘बाबा वाजिवे न बोललखिन. कल त हमहू लड़िका के एक तमाचा दिया. साला, कुफ्र करता रहे. बलू किताब मे लिखिस है, ‘मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खोदा ! जुलूम करता रहे छोकरा. थप्पड़ मारली त ओहे बात: कि त हिन्दी किताब मे लिखा रहा. हम डांटे, ‘ ऐ, मरदूद, ये कोन सा तालीम है, रे,  जो अल्ला मियाँ को भला-बुरा बोलता है ? त बोला, कोई ....... कबीरबा रहे !! हम चुप हो गये. अभी बाबा बोलते रहे तो, बात मिल गया !’

ताबते दोसर दिससँ फटफटिया पर हलुमान जादब आबि कए, बाबाक मंदिरक गेट लग अपन मोटर साईकिल ठाढ़ केलक. मुदा, पीपरक गाछक चबूतरा लग ठाढ़ भीड़ देखि ओकरा रहि नहि भेलैक. नवका नेता. पछिला लोकसभा चुनावक समय कालेज छोड़ि जे लीडरी मे लागल, से कतबो माए बाप कहलकैक घूरि कए कालेज नहिए गेल. बाप बड्ड बुझेबाक कोशिश केलकैक. मुदा, हलुमान ओकरा तेहन ने पट्टी पढ़ौलक जे ओहो चुप्प भए गेलैक. कहलकैक, तोरा ने होइ छह हम कॉलेज छोड़ने छी. ओतय तँ पाँचो टा विद्यार्थी अबिते ने छै. तखन परीक्षा बेर मे हमरा के रोकत. आ परीक्षा देबै, त, फेल के करत !’ बाप  गुम्म भए गेलैक.

आइ मौका देखि हलुमान जादब मेला मे सन्हियायल आ लोक सबकें धकियबैत आगू आयल. पण्डितजीकें दूरेसँ हाथ जोड़लकनि. मुदा, यावत् ओ आगू आबए, जियालाल सेहो कबीरबाक विरोध मे ठाढ़ भए चुकल छलाह. मिडिल स्कूल तक पढ़ल जियालालकें तखने मन पड़ि एलनि. बाजए लगला, ‘ ई कबीरबा ढीठ अछि, बाबा. वयस मे तँ आब अहाँसँ कम नहिए हएत. ओकर दोहा तँ हमरो लोकनि किताब मे पढ़ने रही. ओ तँ..... राजा राम धरि के नहि छोड़लक ! बंभोला बाबा सुधंग. हुनकासँ  की  डेरायत ओ. हेहर अइ, कहै छैक, कि तँ: जँ कबीर कासी मे मरिहों, रामक कोन निहोरा

‘एतेक हहंकाल !’ कहैत जिया लाल अपन कपार पीटि अपन अपन दुनू हाथ ऊपर कए आकाश दिस तकलनि.

हलुमान जादब ले ई असली मौका छलनि. ओ उपरेसँ गप्प लोकि लेलनि: ‘एं ? भगवान रामक अपमान. छोड़बनि नहि. केस क’ देबनि.  जमानत नहि भेटतनि ! जमानत ले ओकील नहि भेटतनि !!’

सब जोरसँ  हलुमानक समर्थन केलक: ‘छोड़बनि नहि !! केस क’ देबनि !!’

पण्डित जीक असंतोष, धार्मिक सद्भावक हेतु एहि इलाका मे एहन अचूक औषधि बनत से अजुका युग मे आश्चर्यजनक छल. मुदा, हलुमान जादब ई बीड़ा उठा लेने छलाह. धर्मक रक्षाक गप्प रहैक. ओ दौड़ धूप शुरू कए  देलनि. दोसरे दिन भोरे ओ थाना पर गेलाह. प्राथमिकी दर्ज करेबा मे पांचो मिनट नहि लगलनि. हलुमानकें के नहि चिन्हैत छलनि. ताहि परसँ  नेता जीक ओहि ठाम हुनका रहरहां सब देखिते रहनि. मामिला संगीन रहैक. धार्मिक भावनाक ठेसक गप्प रहैक. ततबे नहि एके टा उपद्रवी, तीन तरहें, धार्मिक सद्भाव पर चौतरफा चोट कए रहल छल. सामाजिक सद्भावकें ठेस पहुँचला पर अनर्थ हेबाक भय रहैक. मामलाक गंभीरता कें देखैत कोर्ट सेहो एहि केसक अविलंब संज्ञान लेलक. तें, तेसरे दिन केसक सुनबाई शुरू भए गेल. सुनवाई शुरू भेल.

सरकारी ओकील सरकार दिससँ ठाढ़ भेलाह आ एके श्वास मे संपूर्ण आरोप पत्र पढ़ि गेलाह.

कबीरक बचाव मे ककरो नहि आयल देखि, कोर्ट प्रश्न उठौलक:

-  आरोपी ?

- कबीर हजूर ! फरार है !!

- बाप का नाम ?

- नामालूम, हजूर.

- बासिन्दा ?

- बनारस बोलता रहा, कोई . ऐसा लोक का कोई ठिकाना होता है, हजूर.

- कोई बात नही. कहीं का भी हो. धार्मिक भावना को ठेस ! न्ना !! केस कहीं भी दायर हो सकता है. पुलिस कहीं भी जा कर जांच करे, छूट है !

कोर्टक उक्तिसँ दरोगाक हौसला बढ़लनि. आगू प्रश्न जारी छल: 

- उमर कितना होगा ?

 - पता नही, सरकार. का पता मर-मरा गया हो. लेकिन, बात वो नहीं है, हजूर !

- क्या बात नही है ?

‘गौर कीजिये हजूर’, ओकील अपन दुनू हाथें, बेल्टकें दू दिससँ पकड़ि, धोधि परसँ ससरैत पैन्टकें ऊपर घिचैत बाजब शुरू केलनि, ‘ सरकार जो सौ साल पहले मर गये उनको पुरस्कार तो मिलता ही है. सजा भी मिलता है. और ई कबीरबा मरते-मरते भोला बाबा, खोदा और, रामजी, सब को भला बुरा कह गया. हमरे भावना को ठेस लगा गया. तो, आप ही कहिए इसको छोड़ देना मोनासिब होगा ?

जज साहेब आँखि परसँ पढ़बाक चश्मा उतारि प्रशंसाक दृष्टिसँ ओकील दिस देखि प्रभावकारी आ रौबदार शब्द में घोषणा केलनि: ‘नहीं छोड़ेंगे !’

एकाएक तालीक गड़गड़ाहटसँ कोर्टक कमरा गूंजि उठल.

अपन दहिना हाथक लकड़ीक हथौड़ी टेबुल पर जो-जोरसँ पटकैत जज साहेब चेतावनीक स्वर मे घोषणा केलनि: आर्डर ! आर्डर !!                        

    

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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