Tuesday, March 24, 2026

कोकनल सोङर


गीताक पति अनबुमणि जहिया फाँसी लगा लेलकैक, गीता जेना बौक भए गेल छलि. ने आँखिमे नोर, ने मुहसँ बकार. लगैक जेना एकटा विशाल भूस्खलन अचानक नदीपर बान्ह बान्हि देने होइक; छोट-सन गप आ एहन परिणाम.
अनबुमणिक मारिसँ केओ नहि बचल छल, ने बेटा-बेटी आ ने स्त्री. तामस ओकर नाकहि पर रहैत छलैक. तखन जखन मन भेलैक, हाथमे जे रहैक ताहीसँ परिवारकेँ डेङा दैक. ओकर इएह बानि छलैक.
वयस चालीसक करीब. गीता छलि दुब्बर पातरि; ठाढ़ नाक, पैघ-पैघ आँखि. जमुनिया रंग. छलि काजुलि. फूसि-फटक, चोरि-छिनरपनक हिस्सक रहितैक तँ केओ घरमे पयर राखय दितैक ? काज तँ पैघे लोकक घरमे करैत छलि, मुदा कहिओ केओ कोनो शिकाइति नहि केलकैक. समय पर अबैत छलि, बरतन-बासन आ फ्लैट चमका देलक आ चलि गेल. भानस-भात ओकर बुत्ताक गप नहि. चाहक हिस्सक ओकरा रहैक. मुदा, अनकर बनाओल चाह ओकरा पसिन्न नहि; हमरा घरमे चाह ओ अपने हाथेँ बनबय- दुधगर आ मिठगर. जखन काज पूरा भए जाइक, ओ स्टीलक कपमे चाह लए बैसय. जँ पसिन्नक मिठगर ब्रेड भेटलैक, तँ खा लेलक. नहि तँ जे वस्तु ओकरा पसिन्न नहि, मुहमे नहि दैत. आन कोनो खयबाक वस्तु भेटैक, तँ खा लिअय. मुदा, जँ नीक नहि, लगैक तँ मुह खोलि कहि दैत. लगैक जेना, अनकर बनाओल वस्तुमे कमी बहार करबकेँ ओ अनका ऊपर उपकार बूझैत छलि. हँ
, खा तँ लैत छलि ओ हमरो घरक दक्षिण भारतीय भोजन, मुदा, प्रशंसा केवल ओ अपने बनाओल इडली-दोसाक करिते.
उत्तर हो या दक्षिण, भारत वा नेपाल, नारिक कपार फुटैत छैक तँ केवल क
ल पर खसलासँ. हाथ टुटैत छैक तँ बाट पर पिछड़िकय खसलासँ, देह दर्द होइत छैक काजक भारसँ आ माथ-कपार फुटैत छैक तँ केवल कोनो दुर्घटनासँ! साई-बहु एक दोसराकेँ छोड़ि जायत कतय? बड्ड हेतैक जहर-माहुर खा लेत, फाँसी लगा लेत, देहमे आगि लगा लेत, इनार-पोखरिमे डूबि मरि जायत! मुदा, अपन लोक-वेदक निंदा करत! नवका युगक रेआय एखन धरि नवे धरि सीमित छैक. पुलिस-दरोगा लग जायब तँ  कुकुर कौआसँ बचबालेल गीधकेँ नोतब भेल.

2

अनबुमणिक आत्महत्याक बाद तँ गीता काठे भए गेल छलि. ने बाजब ने भूकब. ने कोनो शिकाइति, ने हताशाक भाव. हित-मीत, जकरा जे फुरैक, कहैक: ‘दोसर बियाह कए ले’ तँ, कतेक गोटे कहलकैक. मुदा, गीता? ई विचार संभव थिक गीताक मनहुमे अबैत होइक. केओ पुरुख-पात्र सेहो दया देखयबाक बहाने ओकर मन टोबैत होइक, से संभव. मुदा,ने  गीताक मुहसँ जवाबमे एको शब्द सुनलकैक आ ने चेहरापर कोनो भाव-संकेत देखलकैक. अनबुमणिक जीविते एक बेर हित अपेक्षित इहो कहने रहैक, हमर एहन मर्द रहिते तँ हम तँ एके दिनमे सोझ कए दितिऐक. बजनिहारिकेँ दोसर उपहास करैत पुछलकैक: तों कालीमाता छियें?  
‘से तँ नहि छी, हमहू, सरला-जकाँ मिनटे, मे सोझ कए दितिऐक. बुझल नहि छौक?’ आ कनेक लग जा कए कानमे कहलकैक, ‘सरलाक आदमी हरसट्ठे ओकरा पीटि दैक. आजिज भ’ कए सरला एक दिन मौका ले’ ओ धपौने छलि. जहाँ आदमी हाथ उठौलकैक, ओ लग गेलि आ एके हाथे मनसाक आँड़ पकड़िकए, तेना कए मचोड़ि देलकैक जे मनसाकेँ ठामहि दांती लागि गेलैक. मुहझौंसाकेँ ओहि दिनसँ  हिस्सके छूटि गेल!’

गीताक बेटी, नन्दिनी, पन्द्रह-सोलह बरखक रहैक. बेटा तेरह-चौदह बरखक. घरक हालत देखि बेटी अस्पतालमे काज करब शुरू कए देने रहैक. गीताकेँ मनोरथ रहैक जे नन्दिनी नर्स बनय. मुदा, कालेजक फीस कतयसँ जुटितैक! बाप अकर्मण्य. गीता अपने नचार. भाई छोट. तखन गरीबक मनोरथ मेघक उड़ैत टिक्कर छी, आयल आ बिनु बरसनहि हवाक संग उड़ि गेल. तैओ गीताकेँ अनबुमणिक रहैत, समर्थ बेटीक लेल ओहन चिंता नहि रहैक, जेहने घरमे आन पुरुखकेँ रहने होइतैक.मनहि मन सोचय, नन्दिनी अपन बाट पकड़िये नेने अछि. जँ, बेटा, मारुती अपनो पेट पालबा जोकर कमाए लागल तखन कथिक चिंता. मुदा, मारुतीक संगति देखि कए ओकरासँ बेसी आस नहि होइक. होइक जे इहो जँ बापेक बाट धेलक, तँ इहो  घर बैसल खायत, आ दारू पियत. ऊपरसँ जँ कोनो छौड़ी-मौगीकेँ घर लए अनलक तँ हमर नरकक अंत नहि.
गीताक डरक कारण रहैक: घरमे नीक चालि-बानि धियापुता सिखय वा नहि, ख़राब किरादानीक लसेढ़ बड्ड ख़राब होइत छैक. धिया-पुता पर ओकर असरि बड्ड जल्दी पड़ैत छैक. गीताक दियर, मुरुगन रहैक ड्राईवर, मुदा दारूबाज; पछिले बरख देहमे आगि लगा प्राण हति लेने रहैक. एहि बेर जेठ भाई-अनबुमणि- सेहो फाँसीलगा सब किछुसँ मुक्त भए गेल. सेहो क़ेहन बात पर! अपन समर्थि बेटीकें अदना-सन बात पर कापर-फोड़ि देने रहैक. ताहि परसँ नहि जानि कोन उरमा उठलैक, गीता यावत् बेटीक कपारमे टांका लगबाकए अस्पतालसँ आपस अबैत, घरमे एसगर बैसल अनबुमणि उठल, आ फाँसी लगा लेलक. पाछू, गीताक माथ पर कतेक हुज्जति; पुलिस-दरोगा, बयान आ केस. अनबुमणिक ऊपर तँ ने कोनो थाना-पुलिस लग कहिओ शिकाइति भेल रहैक, ने गीता ओहि दिन गीताकेँ किछु कहबाक फुरसति रहैक. ओ तँ लत्ते-पत्ते नन्दिनीकेँ ल’ कए अस्पताल भागल छल. तखन अनबुमणिक मनमे की भेलैक, कोन ग्लानि आ कथिक भय, सएह गीताकेँ किछु ने फुरैक.

3

अनबुमणिक मृत्युक दूइए हप्ताक पछाति गीता काज पर आपस आइलि. एकदम गुम्म. जखन हित-मीत लग बैसैत छलि,तँ, लोक खोध-बेध करिते रहैक. एके गप: केहनो रहैक, मरद रहैक. एसगरि कोना रहति. सबहक अपने अनुभव, आ सुनले गप पर विश्वास. सब तकरे भय देखबैक. गीता  सोचय, सबकेँ एके चिंता: हम आब कोना रहब. मुदा, एतबे दिनमे सब बिसरि गेल, हम कोना रहैत छलहुँ! लाख दोष भेने पुरुख भेल पति, आ लाखो गुण भेने एसगरि माउगि भेल अनाथ !! ककरो मुहसँ कदाचित् इहो बहरा जाइक: धुर ! नीके भेलैक: गीताकेँ नरकसँ मुक्ति भेटि गेलैक. एहने गप आन केओ सुनैक, तँ जीहो कूचि लैक: एहनो गप केओ बाजय! चुप बैसल आन माउगि सब केओ एक बेर बजनिहारिक मुह दिस तकैक, आ फेर गीताक मुह दिस. मुदा, गीता ने ककरहु प्रतिवाद करैक, ने ककरो दिस नजरिए उठाकए देखय. माने, जकरा जे फुरौक, बाज>
गीताक परोक्षमे केओ इहो कहि बैसैक: धुर ! केहन पाथर भए गेलैक गीता! दैवक एहन डाङ आ आँखिसँ एक ठोप नोर धरि नहि खसलैक!! दोसर कहैक: आँखिमे नोर कतयसँ अओतैक; एकर आँखिक सबटा नोर तँ अनबुमणिक जीविते बहि गेलैक. कंस-काल! दुपहरियाक भोजन बैसाड़मे सबहक खायक सधि जाइक, सब अपन-अपन बाट धरय आ काज पर विदा होअय आ सभा उसरि जाइक.
गीताक माय ककरो फज्झतिओ कए दैक: गीता पर एहन वज्र खसलैए आ तोरा सबकेँ मनमे कोनो विचार नहि. मुदा, केओ गीताक माई, अंजलिओकेँ दबाड़ि दैक: कोनो अनुचित कहै छै? अनबुमणि अपने मरि गेल. मुदा, गीताक जिनगी छैक. ओ ककरा बलें जिनगी काटत? बेटी अपन घर जेतैक. बेटा आइ ने काल्हि कोनो मौगीकेँ बियाहि अनतैक. तखन तँ ई अपने घरमे सूपक भाटा भए जायत.
‘बड्ड बढ़िया.’ कहैत अंजलि सेहो अपन बाट धरय आ दोसरो सब विदा होअय.

4

अनबुमणिक मृत्यु करीब छौ मास भेल हेतैक. एक दिन बेरुक पहर हमर घंटी बाजल. हमर पत्नी केबाड़ खोललखिन. गीता ठाढ़ि छलि. हाथमे स्टीलक थारी. थारीमे एकटा नारिकेर, पाँच टा पानक पात, एक गद्दी सिनुर आ सबहक ऊपर तमिल भाषामे एक कार्ड.

मूड़ी झुकओने शान्त आ स्थिर स्वरमे गीता कहलकनि: ‘नन्दिनीक विवाह थिकैक. लड़का नेलिकुप्पम गामक अस्पतालमे काज करैत छैक. ओतहि नन्दिनी नर्सिंगक ट्रेनिंग करति.’

हमर पत्नी गीताकेँ भीतर आबय कहलखिन, तँ, ओ कहलकनि, ‘मैडम, एखन नहि. काल्हि भोरे तँ अयबे करब. एखन एही कोलोनीमे आओर दू-चारि घर जयबाक अछि. सबसँ पहिने अहींक ओतय आयल छी.’

गीता कनिएक थम्हल, आ कहलकनि, ‘मैडम, अयबैक अबस्स. सर सेहो अओथिन.’ एतबा कहैत गीताक आँखिसँ दू ठोप नोर खसि पड़लैक.  मुदा, अबिलंब बिनु सोझाँ तकनहि ओ झटकारनहि तेसर फ्लोरक सीढ़ीसँ नीचा उतरि गेल. 

Saturday, March 21, 2026

किएक?


सूर्योदय 

समस्त जीव जगत केर जीवनक आधार

अजस्र ऊर्जाक अक्षय भंडार

सुदूर अंतरिक्ष निवासी निरंतर गतिमान 

अहाँक अप्रतिम आभासँ होइछ इजोत

तथापि, किएक रहि जाइछ?

अहंकारी मनुखक हृदयक 

कतेक कोन वज्र अन्हार,

जे ओ शान्ति-सुरक्षाक नाम पर

करैत अछि एतेक नरसंहार 

दैछ इसकुलिया नेनाक बलि,

दूषित करैछ, जल, वायु, पृथ्वी

आ सब किछु,

जे थिक,

मानवताक अस्तित्वक आधार।

Friday, February 20, 2026

पाठकीय प्रतिक्रिया: प्रयोगशालाक जीवन

 

पाठकीय प्रतिक्रिया

प्रयोगशालाक जीवन
(राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चक संग किछु आत्मचर्चा)

2005 ई. मे प्रकाशित ‘पसरैत वृत्त: सँकुचैत बिन्दु’ नामक एक आलेखमे पण्डित गोविंद झा लिखने रहथि:
‘देखल जाइत अछि जे मैथिली मे केवल मध्यम स्तरक लोक कलम उठबैत अएलाह अछि. उच्च स्तरक प्रतिभा मिथिलासँ आ मैथिलीसँ पड़ाइत रहल अछि.......................................वर्त्तमान दशक मे मैथिलीक प्रतिष्ठा बढ़लैक अछि आ उच्च स्तरहुक  लोक मैथिली मे कलम उठबय लगलाह अछि.’
गोविन्द बाबूक ई उक्ति एक कथा संग्रह समीक्षामे लिखल गेल छल. मुदा,जँ उपन्यास-कथा-कविता आदिक विधासँ भिन्न विधाक गप करी तँ हेबनि धरि स्थिति उत्साहजनक नहि रहैक. तें, एहि स्थितिक चर्चा हमहू अपन ब्लॉग ‘मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक’ केने रही. मुदा, नाभिकीय भौतिकी(Nuclear Physics)क सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगीक विपुल लोकप्रिय विज्ञान लेखन (writings on Popular Science)एकर अपवाद थिक. कोलकातासँ प्रकाशित (आब बंद भेल) ‘मिथिला दर्शन’क पाठक मे विरले केओ हेताह जे डाक्टर पाठकक विज्ञान संबंधी विस्तृत प्रमाणिक लेख सबसँ अपरिचित हेताह. स्मरणीय थिक, ओहि लेख सबहक संकलन डाक्टर वियोगी जी ‘विज्ञानक बतकही’ नामक पोथीक भाग 1,2 एवं 3मे प्रकाशित भेल अछि.गत वर्ष, 2025 मे डाक्टर वियोगीक नव पोथी ‘प्रयोगशालाक जीवन’ प्रकाशित भेल अछि. प्रस्तुत लेखमे एही पोथीक चर्चा अछि.
डाक्टर वियोगी एहि पोथीकेँ ‘राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चाक संग किछु आत्मचर्चा’ कहैत छथि. अछियो ई सएह. मुदा, एहि पोथीमे अधिकतर एहन विषयक चर्चा छैक जे अंग्रेजी भाषाक वैज्ञानिक संस्मरणमे तँ भेटत, मुदा, मैथिलीमे हमरा देखबामे नहि आयल अछि.
‘प्रयोगशालाक जीवन’ करीब सवा दू सौ पृष्ठकेँ पाठक विषयक संदर्भक दृष्टिसँ तीन भागमे बाँटि सकैत छथि: पहिल भाग- पोथी पहिल पचास पृष्ठ- मे लेखकक बाल्यकालसँ ल’ कए प्रयोगशालाक जीवनमे प्रवेशसँ पूर्वक जीवनक चर्चा अछि. ई खण्ड भारतक स्वतंत्रतासँ ल’ कए साठिक दशककक अंत आ सत्तरिक दशकक आरंभ धरिक कालखण्डकेँ धङैत, ओहि समयक मिथिलाक सामाजिक आ शैक्षणिक जीवन पर संक्षिप्त, किन्तु, वस्तुनिष्ठ रूपेँ प्रकाश दैछ. पोथीक एहि खण्डमे लेखकक आन ठाम प्रकाशित एहन अओरो लेख सबहक संदर्भ भेटत जे पहिने हुनक भिन्न-भिन्न पोथीमे प्रकाशित भेल अछि, एवं प्रशंसित भेल अछि.
ज्ञातव्य अछि, विगत शताब्दीक पचासक दशक मिथिलामे विपन्नताक काल छल. तहिया मेहनती आ महत्वाकांक्षी छात्रसबकेँ केवल शिक्षासँ उन्नतिक आस छलैक. फलतः, अनेक गाममे समाज, शिक्षक आ छात्रक संकल्पसँ उत्कृष्ट परिणाम देखबामे अबैत छलैक. अजुका मधुबनी जिलाक मधेपुर गामक जवाहर उच्च विद्यालय शिक्षाक एहने केन्द्र छल जतयसँ डाक्टर वियोगीसँ पूर्व, वैज्ञानिक शचीनाथ झा, शिक्षाविद् डाक्टर लक्ष्मण झा एवं डाक्टर ब्रजकिशोर वर्मा सदृश मूर्धन्य साहित्यकार बहरायल छलाह. अस्तु, एहि पुस्तकमे ओहि युगक ग्रामीण जीवन अतिरिक्त स्कूली जीवनक संक्षिप्त वर्णन सेहो भेटत.
स्मरणीय थिक, अगिला दशक, साठिक दशक, सेहो बिहारमे विषम काल छल. साठिक दशकमे राजनेता लोकनिक अदूरदर्शिता आ महत्वाकांक्षा शिक्षाक अवनति जनक प्रमाणित भेल. तहिया ओलोकनि शिक्षाक क्षेत्रमे एहन बबूरबोनी  लगबैत गेलाह,जे शीघ्रे शिक्षण आ परीक्षा व्यवस्थाकेँ अस्तव्यस्त तँ कइए देलक, ओकर दुष्प्रभावसँ  बिहारक शिक्षा व्यवस्था आइओ धरि उबरि नहि सकल अछि. ‘प्रयोगशालाक जीवन’मे विश्वविद्यालयक जीवनक ओहि दुखद युगक एहन झाँकी भेटत, जाहिमे शिक्षाक अवनतिए टाक नहि, प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानक प्रति शिक्षक लोकनि अभिज्ञता आ उदासीनता छात्रक भविष्यकेँ कोना प्रभावित करैत छल, तकरो चर्चा अछि.
लेखकक प्रयोगशालाक जीवनक आख्यानक आरंभ वस्तुतः पोथीक अगिला भागमे तेसर अध्यायसँ होइछ, जखन लेखक अगस्त 1971मे भाभा नाभिकीय अनुसन्धान केन्द्र (
BARC), मे प्रशिक्षु वैज्ञानिक (Trainee scientist) रूपमे योगदान केलनि. ट्रेनिंग समाप्तिक पछाति लेखक भारतमे विज्ञानक स्वदेशीकरण अभियानक अंतर्गत कलकत्तामे प्रस्तावित VEC Project (Variable Energy Cyclotron Project) क निर्माणक संग जुड़लाह. वैज्ञानिक जीवनक आगूक यात्रा, शिक्षा, अनुसन्धान आ नव उपकरण एवं सॉफ्टवेयरक निर्माण एवं वैज्ञानिक आविष्कारक चुनौतीपूर्ण जीवन छल. ई यात्रा मुम्बई (तत्कालीन बंबई)सँ आरंभ होइत, हुनका अमेरिकाक लौरेन्स बर्कले राष्ट्रीय लेबोरेटरी, कैलिफोर्निया तथा फ्रान्सक गैनिल (प्रयोगशाला) होइत अंततः अगिला तीन दशकमे  स्विट्ज़रलैंड स्थित एल एच सी (Large Hydron Collider) धरि लए केवल लइए टा नहि गेलनि, बल्कि एहि दीर्घ अवधिमे हुनका विश्वभरिक अनेक विख्यात वैज्ञानिक सबहक संग काज करबाक अवसर देलकनि. ओहि अवधिमे ई भौतिकीक अनेक मूलभूत वैज्ञानिक अनुसन्धानक अतिरिक्त ब्रह्माण्डक उत्पत्ति सम्बन्धी अनुसन्धानक दुनू चरणक प्रयोगमे सहभागी भेलाह एवं अविष्कारमे योगदान एवं नेतृत्वक अवसर भेटलनि. जर्मनीक ‘हेमहोज हम्बोल्ट रिसर्च अवार्ड’ एवं ‘ब्रेकथ्रू लौरिएट’ सदृश प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारसँ सम्मान विज्ञानमे हिनक योगदानेक परिणाम थिक. अपन कार्य कालमे ई अनेक राष्ट्र्रीय योजना सबमे महवपूर्ण योगदान केलनि, जाहिमे छोट ग्रुपक स्तरसँ पैघ-सँ-पैघ विज्ञान आ पैघसँ पैघ सहयोग (mega collaboration) सँ संचालित वैज्ञानिक प्रयोगमे सहभागिता आ नेतृत्वक अवसर भेटलनि. एहि सबहक वर्णनक किछु अंश आम रूचिसँ बाहरक विषय थिक, तें, लेखक स्वयं एहि पोथीक किछु अंशकेँ तारांकित कए ओहि अंशकेँ बीछि-बेराकए पढ़बाक सुझाव देने छथि. मुदा, विज्ञानमे रूचि रखनिहार पाठक, आ छोट एवं पैघ स्तरक मूलभूत वैज्ञानिक प्रयोगक भीतरक गतिविधि आ समस्यामे रूचि रखनिहार विद्यार्थीक हेतु पोथीक एहि अंशमे आयल अनेक रोचक संस्मरण आ घटनाक चर्चा एहि पोथीक विशेष आकर्षण थिक. ओना एहि पोथीमे जाहि अनेक विषयक वैज्ञानिक पक्षक विस्तार वर्णन भेल अछि, ओकर सबहक रोचक संस्मरण 2014 मे प्रकाशित हिनक पोथी ‘किछु तीत मधुर’ मे सेहो भेल अछि.

पोथीक तेसर अंश, अंतिम तीन अध्यायमे लेखक प्रयोगशालाक जीवन पछातिक अनुभवक चर्चा कयने छथि. ओहि अवधिमे , स्थापक निदेशकक रूपमे ई भारत सरकारक परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) क अंतर्गत भुवनेश्वरमे नाइसर (NICER)-[National Institute of Science Education and Research]- क स्थापना केलनि. राष्ट्रीय स्तरक नव संस्थाक स्थापनामे अनेक प्रकारक प्रशासनिक चुनौती अबैत छैक; केन्द्र आ राज्य सरकारक अनेक स्तरसँ तालमेल बैसाबए पड़ैत छैक, एवं संस्थाक प्रमुखकेँअनेक आकस्मिक परिस्थितिसँ निबटय पड़ैत छैक. ‘भुवनेश्वरक प्रवास आ नाइसरक स्थापना’ नामक अध्यायमे ओहि सबहक  रोचक वृत्तांत भेटत.
नवम अध्याय- भारत-आधारित न्यूट्रिनो वेधशालाक सपना- मे न्यूट्रिनो वेधशालाक प्रोजेक्ट एवं राजनैतिक कारणसँ ओहि योजनाक अकालमृत्युक घटनाक चर्चा कयल गेल छैक. एहि वर्णनसँ ई देखल जा सकैछ, जे समाजमे पसारल भ्रान्ति कोना महत्वाकांक्षी अन्तर्राष्ट्रीय योजनाक भ्रूण ह्त्या कए दैछ.
अंतिम अध्यायमे लेखक ग्रामीण इलाकाक अपन आवासीय परिसरमे प्रयोगशाला खोलि कोना जिज्ञासु छात्र लोकनिक मार्गदर्शन करैत रहथि, तकर संक्षिप्त वर्णन अछि. ओहि प्रयोगशालाक माध्यमसँ लेखक अनेक मेधावी छात्रक मार्गदर्शन कयलनि. हिनक मार्गदर्शनसँ अनेक छात्र लाभान्वित आ विभिन्न क्षेत्रमे सफल भेलाह. छात्रलोकनिक सफलता हिनक व्यक्तिगत प्रयोगशालाक योगदानक सफल परिणामक प्रमाण थिक. 

सारांशमे ‘प्रयोगशालाक जीवन’, सरल बोधगम्य भाषामे लिखल मैथिलीक पहिल एहन पोथी थिक, जाहिमे स्थानीयसँ राष्ट्रीय, छोटसँ विशाल, तथा बेसिकसँ विराट् विज्ञानक क्षेत्रक अनुसन्धानक विहंगम दृश्य प्रस्तुत भेल अछि. एहि पोथीक केवल स्वागते टा नहि हेबाक चाही, ई पढ़ल जेबाक चाही. मैथिलीमे अपना तरहक ई पहिले पोथी थिक. लेखक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी एहि प्रकाशनक हेतु साधुवादक पात्र छथि.

संदर्भ:

1.झा, गोविन्द. पसरैत वृत्त: सँकुचैत बिन्दु, कर्णामृत, कोलकाता, 2005.

2. झा, कीर्तिनाथ. मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक. https://kirtinath.blogspot.com/2023/09/blog-post.html accessed 20 Feb 2026.  

प्रयोगशालाक जीवन
(राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चाक संग किछु आत्मचर्चा)
लेखक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी
प्रकाशक:
pothi.com प्रथम संस्करण 2025
पृष्ठ संख्या :224; मूल्य रु.400
प्रप्तिस्थान: प्रिंट एवं ई-बुक

https://pothi.com                        

Wednesday, January 21, 2026

फकड़ा संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी

                                                                             फकड़ा

संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी



पाण्डुलिपिक एक पृष्ठक छायाप्रति 

पण्डित काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क अनुसारें ‘फकड़ा काव्यक एक प्रकार आ लोक-साहित्यक प्रमुख अंग’  एवं ‘आडम्बरहीना, निर्मल हृदया, सत्यमयी,बाट-घाट, जंगल-झाड़ आदि प्रकृतिक विशाल क्षेत्रक अनुभवसँ भरलि मुनि-कन्या थिक’।1 हुनक कहब छनि, ‘पण्डितक काव्य पाँच प्रतिशत लोकक चित्र दैछ त’ फकड़ा पनचानवे प्रतिशत लोकक’। अस्तु, स्वयं किरण जी करीब ‘सय छबेक (फकड़ा) संग्रह’ कयने रहथि. मुदा, ओ संकलन अनुपलब्ध अछि. किन्तु, अक्टूबर १९६१ केर ‘वैदेही’ पत्रिकामे प्रकाशित हुनक ‘फकड़ा’ नामक लंबा लेखमे ओहि संकलनसँ करीब सत्तरि-पचहत्तरि टा फकड़ा उद्धृत छैक. किछु फकड़ा हुनक कृतिमे आनो ठाम यत्र-तत्र छिड़ियायल सेहो भेटत. लोक साहित्यक संकलन कयनिहारक कृतिमे आनहु ठाम फकड़ा भेटबे करत.
एतय प्रस्तुत अछि, हमर माता, स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा जीवनक नवम दशकमे टिपल किछु फकड़ा आ एक आध टा गीत जकर हमरा जनैत समाजशास्त्रीय महत्व छैक. स्मरणीय थिक, स्व. बिन्देश्वरी देवी पं. काशीनाथ झा काव्यतीर्थ एवं किरणजीक छोटि बहिनि रहथि जनिक मृत्यु ०६ अगस्त २००३ क भए गेलनि. हुनक हाथें संकलित फकड़ा आ गीतक चारि-पाँच पृष्ठ जे हमरा हुनक मृत्युक बाद घरमे भेटल  अछि सएह एतय प्रस्तुत अछि.        

फकड़ा

1
आबेसे केलौं खेती दुलारे भेल बेटी
छोडू सैंया खेती खेलाउ हमर बेटी
2
लाड़ करू सैंआ तोरा पर
पोटा पोछू तोरा मोछा पर
3
एके बाँस बसेला, कोइ चालनि कोइ पैला
4
उखरिमे धान त ककबा आन
5
पलङ्ग पर चिलका रोबैए
मनसा सुतल मौगी ठहकैए
6
वरक मुहमे जाल त बरिआतीक कोन हाल
7
कनियाके आँखिमे नोरे ने लोकनिया भोकारि मारैए
8
बाहरक ठीक ठाक देख रे नौआ
भीतरी महलमे हगै छै कौआ
9
कुकुर कौआ भंडारी त घरमे गुहे गुहटार
10
घरमे पकैए कुरथीक रोटी / बाहर सुखाइए जोड़ धोती
11
बाप के गरा घोंघा/ बेटा के गरा रुद्राक्ष
12
थोड़ कनै छी बाबा ले ? बहुत कनै छी टाका ले
13
आँखिमे नोर त / दाँत निपोड़

14
घरमे टाट नै देहरिमे सरकी
मुहमे नाक नै कानमे तड़की
15
अन्हराकए गाय बिएलै / चालनिमे दुहै जो
16
वरक माय निरधोंछी सांठल नै चतुर्थी
कनियाक माय न(नौ) लगरा
हुनको बेटाके नै देबनि कोजगरा
17
अबिते एली चुल्ही फुटौली (नि)
 अरिपन पोछि क लिटी लगौलनि
18
अपन गाम भम्ह पड़ए/ पाही पट्टी नोत पड़ए
गाम नोते ने बेलाही नोत पड़ए
19
मुखसुद्धिक नै वेवहार/ अड़िआतैक बड़ चमत्कार
20
नवक धन भेल त बेङ्ग महाजन भेल
21
सब गेल हाट धान के  कूटत
सब दंतरंगा चुल्हि के फुकत
22
मैगर ने बपगर ठेसगर बड़/ नोनगर ने तेलगर चहटगर बड़
23
माय बहु रहै नै, जेठकी बहु / चुमाबे नै त कोना बने
24
किए धोबिनिया बाढ़ि, किए तेलिनिया घाटि
ओ लेतै मुङरी, हम लेब जाठि
25
बेटिया स बुढ़िया भेलौ सोनसन पाकल केस
एहेन चरित्र कहिओ नै देखलौ जे गोइठा एल सनेस
26
चालनि दुसलनि बाढ़निके जिनका अपन सहस्र टा छेद
27
जे बाजय से बड़ बजन्ता जे नै बाजै से गोंग
जे खाय से बड़ खाधुर जे नै खाय से सोम
28
जावे पांडे दोना लगौता तावे पंडीआनि सुरुकि बैसती
29
खोना बेटा खेलनि पान
माय हसथिन बहु होथि झमान
30
वरक जैतुक जखने देखलौ कनिआक नाम निरासी
31
वर कनिया कए भेटे ने ओठङर ले मारि



32
निरलज के नै लाज नै अपमान
सहन कथा एक मरन समान

33  
वरक बरनन कते करब वर एक नजरी
कनियाक बरनन कते करब कनिया गरमे गगरी
34
वर बीसे बीसे बीस
बर ताकथि एके दिस
35
बड़े-बड़े के  लाइ ने
लड़िकन के मिठाई
36
बाबरीवला वर करबै कोठावला घर
लगेमे पैखाना आँगनेमे कल

37  
सैंया दर रे देवानी बहु छुछुनरि रानी
सैंया नित नहाथि बहु ढकनेमे खाथि
38  
मर जाइ त रासि गाबी
देह दशा अछि पूरा मुहसँ उड़ैए धुरा
39  
अंधे देखलनि बड़ियारक गाछ
त कहलनि जे लंका इएह छिऐ
40  
जैसाके तैसा मिले, मिले चोंच मे चोंच
दाढ़ीमे दाढ़ी मिले, मेले मोंछ मे मोंछ
41  
पेट जरैए त मलार गबै छी

42   
पेट कहकह करए जुड़ा महमह करए
42

त’र कान तड़की ऊपर कान खुटी
दांत मिसी कोचा सीटी
तखन चिन्हबनि जे कटकाक छिका
43      
छटाक भरि सोन तकर कने छनगर कने फनगर
कने सोतिआम तखन ने धिआ जेती सोतिआम
43  
एहन चुड़ा कूटब जे धान बिछि कए खाएब
एहन नैहर जे अपने जायब
44
आन्हर गुरु बहिर चेला
माङथि गुड़ त देथि भेला
45

लजैली ने कठेली सवेरे चलि एली



गीत
परम अभाग कपारक लिखल जनिका घरमे फुहरि नारि
मस-मस दिन पर आङन बहारथि बैसथि टाङ्ग पसारि।। परम अभाग ..  
धियापुताके ठोकि सुताबथि अपने बैसथि कोन दाबि
बासन धो के कोनटा फेकथि आङन पड़ि गेल हील
गालमे जे मांड़ी बहकल केसमे पसरल ढील।। परम अभाग..
ओलती झीकि क चुल्हा पजारथि झिकथि कोनटाक बाती
साँझ राति मे दीआ नै बारथि लेसथि दुपहर आ राती।। परम अभाग ..

 

बिकौआ सोति
सुध समै उपगत भेल सखी चमकल फिरे बिकौआ
कम्बल लोटा मोटा बन्हलनि झाड़ी ओ पनबट्टा
किओ बिकौआ धोती सिटै छथि केओ थकड़ै छथि टीक
किओ बिकौआ चानन करै छथि ई सब सुधक रीत
घोड़ा पीठी जे कसल सवारी ताहि पर अपने असवारी
चमकै पाग जड़ीकोर धोती रेसमी केर दोपटा
दुइ चारि जे हर बहै छैन चारि चलै छैन लहना
अहाँक कनिआ हिनक घर जेती तुरन्त गढ़ा देथिन कगना

लगनी
पनिआँ के गेलीऐ हे स्वामी ओही रे जमुनमा रे की
उमतल भैसुरवा बटिआ रोकल रे की
घाट छोडू बाट छोडू उमतल भैसुरवा
कनिए कनिए चुनरी भिजल रे की
भीज दियौ भीज दियौ अपनी चुनरी
हमर दोपटा तोहर पालट रे की
तोहर दोपटा अगियाके धाधर
अपन चुनरी सीतल बसात रे की
जांघ घुन लगिहै बाँहि घुन लगिहै
हे स्वामी तोहरे अछैत भैसुर परेखल रे की
हुअ दे प्रात रे धनी पसराक हटिआ
छुरिआ बेसाहि भैआ जीव हतबै रे की
भैआ जीव हतबै हे स्वामी एसकर हेबै
तिरिआ मुइने तिरी वध लागत रे की ।।

स्व. बिन्देश्वरी देवीके पढ़बाक रूचि रहनि. मुदा, हम जहियासँ देखलियनि, काजक तेहन व्यस्तता रहनि जे कहथिन, ‘होइए दिन राति मे चौबिसे घंटा किएक, पच्चीस-छब्बीस घंटा होइतैक.’ मुदा, करीब अठासी वर्षक जीवनक अंतिम तीस वर्षमे हुनक अधिक समय पूजा-पाठ आ पढ़बामे बितनि. तथापि, हुनका कहियो हमरालोकनि  कथा, कविता वा गीत लिखैत देखने नहि रहियनि. जखनि समय भेटनि मौनी-चङेरी-सितलपाटी बिनथि. अंचार, मुड़ौरी, कुम्हड़ौरी, निमकी बनबथि. मुदा, टोल-पडोसक स्त्रीगण लोकनिक आ अपन चिट्ठीक अतिरिक्त किछु लिखथि नहि. एक बेर करीब 2000 ई. मे, मृत्युसँ दू-अढ़ाई वर्ष पूर्व, एकटा गीत लिखने रहथि. ओ गीत बंगलोर डेरा पर हमरा देखय देने रहथि. मुदा, हम तहिया ध्यान नहि देलिऐक. बादमे ओ किएक भेटत. तथापि, जीवनक अंतिम चरणमे ओ कोन प्रेरणासँ किछु फकड़ा लिखिकए घरमे राखि गेलीह, से कहब असंभव. संयोगवश हालहिमे हमर ममिऔत आ किरणजीक तेसर पुत्र, केशरीनाथ झा  कहलनि, जे ‘बाबू (किरण जी) कहने रहथि जे मझिली पिसिया (स्व. बिन्देश्वरी देवी) हमरा सब भाई बहिनिमे सबसँ बेसी प्रतिभावान रहथि.’ मुदा, आब तकर कोनो महत्व नहि. तथापि, संकलित फकड़ा आ गीतक महत्व भए सकैत छैक.
उपरोक्त फकड़ा सबमे बहुतो एखनो प्रचलन मे छैक. बहुतो आब नहि सुनबैक. किछु फकड़ा आ गीत संकलित उपरोक्त गीतक समाजशास्त्रीय महत्व छैक. तकर विवेचनाक अवश्यकता नहि, कारण, संदर्भ आ उक्ति अपने सब किछु स्पष्ट कए दैछ. एतबा अवश्य जे हमरा आङन वा आन ठाम लगनि सुनबामे आबय किन्तु कहिओ ध्यान नहि देलिऐक. उपरोक्त लगनीमे स्पष्ट छैक जे नारि गीतमे हर्ष-विषादक संग ओकर अपनहि परिवारजनक द्वारा शोषणक व्यथाक वर्णन सेहो रहैत छलैक. मुदा, बहिर समाज सुनिओ कए किछु नहि सुनैत छल.
एकटा गप आओर. स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा संकलित उपरोक्त फकड़ाक वर्तनी ओहिना राखल गेल अछि जेना ओ लिखने रहथिन. हुनक जन्म पण्डित परिवारमे भेल रहनि. मुदा, हुनक औपचारिक शिक्षाक अवसर नहि भेटल रहनि. कहने रहथि, “भाई ( पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थ) जखन भौजी (पत्नी जमुना देवी) कें पढ़बथिन, तँ, लगमे बैसि हम देखैत रहियनि. पछाति, नुनू भाई (किरणजी) कोइला पिसिकए सरबामे मोसि बना देलनि आ कड़चीक कलम बनाक देलनि. ओहीसँ लिखब सिखलहुँ. एगारहम वर्षमे तं एतहि (सासुर) आबि गेलहुँ.”         
  

संदर्भ
झा, काञ्चीनाथ ‘किरण’. फकड़ा. वैदेही अक्टूबर १९६१.   

     

  
      


Wednesday, January 14, 2026

प्रश्न

 प्रश्न 

ऊँची उठती मूर्तियाँ

ठिगने होते लोग

कचरे चुनती कुमुदिनी

नयन भरे हैं नोर।

गली-गली में भक्त हैं

करते अत्याचार

चौराहे पर प्रश्न खड़ा

प्रभु, कब लोगे अवतार ?


Wednesday, January 7, 2026

नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025

 

                                                 नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025 

जंगल, वृक्ष, हरीतिमा आओर नदी केर गीत
यायावर मन हमर, स्वर्गे तँ ई थीक!

एहि बेर 24 दिसंबरक दिन ओ दिन ओ साँझ फेर आयल : हम कावेरीक कछेर पर एसगर बैसल रही. घाट लग बाँसक कमचीसँ बनल नाओ सब रहैक. दू गोट नाविक सब सेहो रहथि. कहैत गेलाह, पंदरह मिनटक नौकायन आ मात्र दू सौ टाका. हमरा समय नहि छल. नहि गेलहुँ. एहि बेर करीब पचीस वर्षक पछाति श्रीरंगापत्तिनम् आयल छी. फेर कहिया आयब, कहब कठिन. हमर अनुभव कहैत अछि, अवसर हठे अबैत नहि छैक.
कावेरीकेँ उद्गमसँ समुद्र धरि टा नहि, हिनका हम लगभग संपूर्ण लंबाई धरि देखने छियनि; कोडागुक तलकावेरीक विन्दु-विन्दु जल प्रपातसँ लए कए श्रीरंगम्, तरंगमवाड़ी-पूम्पूहार धरि. एहि नदीक प्रशस्ति तँ संगम कालसँ शिलापत्तिकारम् – सन महाकाव्यसँ लए कए अनगणित काव्य आ गद्य साहित्यमे लिखल गेल छनि.'शिलापत्तिकारम्' केर हमर मैथिली अनुवाद 'कन्नगीक काड़ाक कथा' मे सेहो कावेरी गीत अछि; ई मूल कावेरी गीतक भावानुवाद थिक:


धवल पुष्प-सन कार्तिक तोहर हे
गतिओ पवन समान,
कारी आँखि पावन मनभावन
रूपक नहि उपमान ।
बूलय मयूर कोइली गाबय

हरिअर आँचर धान,

सबतरि भूमि पानिए पूरित

विपुल अन्न वरदान।

मुदा, एहि बेरुक कावेरी दर्शन विशिष्ट छल. श्रीरंगापत्तिनम् ऐतिहासिक आ पवित्र तीर्थस्थल थिक. ई स्थान धार्मिक भावें टा पवित्र नहि. पवित्र भूमि, पवित्र वायु आ पवित्र जल. ई स्थान एहि सबहक समुच्चय थिक. बहुत दिन बाद आयल छी. बहुत लगसँ, जल-परिपूरित, कल-कल बहैत, हरियर कचोर कावेरीक तट पर वृक्षक सघन छायामे आँखि मूनि बैसबाक क्षण, अनुभूतिक विषय थिक, वर्णन अनावश्यक आ निरर्थक प्रतीत होइछ. एतय कावेरीक स्वच्छ, चंचल धार लग ऊर्जाक स्वतः अनुभूति हमरा लेल स्वाभाविक थिक.

भूमि प्रदूषणसँ कोसी अंचलमे अनेक ठाम भूमिक नीचाक पानि पीबा योग्य नहि छैक, किछु वर्ष पूर्व से देखि मन कोनादन भए गेल छल: सुपौलमे बोतलबंद पानि पीने रही. यमुनाक जल आ वायुक प्रदूषणसँ दिल्लीक जनस्वास्थ्य प्रभावित अछि. किन्तु, श्रीरंगापत्तिनम् एहिसँ मुक्त अछि. दिसंबरक मास, मृदु सुखद रौद. जाड़ तँ एहि क्षेत्रमे होइते नहि छैक. एखन बरखा सेहो नहि.
हम एहि बेर एतय ‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क आयोजक दीपा मिश्रक निमंत्रण पर आयल छी. दीपा मिश्र अपन माता स्व. नीरा मिश्रक बरखी एक अभिनव रीतिऍ- साहित्य संगम आ साहित्यकारकेँ पुरस्कृत कए - मनबैत छथि. एहि प्रकारक बरखीक हम समर्थन करैत छी. दीपा अपन माता आ नारि समुदायक प्रति अत्यन्त भावुक छथि. सम्मेलनक बीच ओ एहि विषयकेँ अनेक प्रकारे अनेक बेर अभिव्यक्त केलनि. अपन भाषणमे दीपा कहलनि, जे ‘माताक मृत्युक पछाति, एसगरिए नदीक कछेर पर बैसलि नदीमे हुनका अपन माताक (प्रतिच्छविक) दर्शन भेल रहनि. अतः पछिला वर्ष ओ माताक बरखी सिप्रा नदीक कछेर पर मनओने रहथि. एहि बेर ई आयोजन कावेरी तट पर केलनि.
दीपा अपन भाषणमे मिथिला, आ अपन परिवारक महिलालोकनिक जीवनक अनेक अनुभव अभिव्यक्त केलनि, जकर विस्तृत व्याख्या, हमरा लगैत अछि ओ अपन कृतिमे लिखनहि हेतीह, आ लिखतीह. उर्जावान, रचनाशील आ मुखर छथि. अपन भाव स्पष्टतः व्यक्त करैत छथि.
हम आ हमर पत्नी रूपम करीब चारि बजे श्रीरंगापत्तिनम् पहुँचल रही. क्रमशः अओरो गोटे- साहित्यकार नीता झा, उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डाक्टर रमानन्द झा ‘रमण’, कथाकार रोमिशा, लेखक-पत्रकार  पंकज मिश्र, दिनेश एवं श्रीमती कल्पना मिश्र अइलीह. बेसी गोटे सपरिवार आयल रहथि. सबसँ भेट भेल. भोजनक पछाति तीन बजे दिनसँ साँझ सात बजे धरि चारि घंटाक कार्यक्रम. अनेक सारगर्भित भाषण-चर्चा, पुस्तक-‘सुखी मीन जो नीर अगाधा’ कविता-संग्रह एवं अन्य पोथीक – लोकार्पण, आ पुरस्कार- रोमिशाकेँ हुनक कथा संग्रहक हेतु पुरस्कार देल गेलनि- एवं सम्मान समारोह. कथाकार अशोक एवं तारानन्द वियोगीक अबैया रहनि. मुदा, नहि अयलाह. भेट नहि भेल.
‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क अवसर पर आयल विभिन्न वयसक प्रतिभागी लोकनिसँ भेट सेहो एकटा नीक उपलब्धिए भेल. कार्यक्रममे विचार विनिमयक अतिरिक्त नचिकेताजी, रमणजी, नीता झा, पंकज मिश्र, दीपा मिश्र, एवं रोमिशाकेँ सुनबाक अवसर भेटल. छोट ग्रुपमे साहित्य-संगम हमरा पसिन्न पड़ैछ.
25 दिसंबर 2025, क्रिसमसक दिन
हमरा भोरहि उठि टहलबाक हिस्सक अछि. भोरुक टहलानमे स्थानक स्पन्दन सोझे कान धरि पहुँचैछ, जेन कानमे स्टेथोस्कोप लगा ककरो हृदयक धड़कन आ श्वास-उच्छ्वास सुनैत होइ. स्थानीय जनसामान्यक दैनिक गतिविधि सेहो देखबाक अवसर भेटैछ आ कदाचित् अनचिन्हार लोकसँ परिचय भए जाइछ. शान्त मनें मनुखसँ भेट आ अनचिन्हारसँ  निःस्वार्थ गप-सप अजुका जिनगीमे बोनस थिक. मुदा, आइ ने कोट्टयम्-जकाँ धनखेतीक बीच सुखद भ्रमणक अवसर भेटल, ने उत्तरांचलक अरण्य, ने बनारसक गली. मुदा, घूरि कए आपस एलहुँ, तँ हमरा हेतु दोसर बोनस प्रतीक्षारत छल; सुजनै सह संगमः ; रमणजी, नचिकेता जी एवं दीपा रेस्टोरेंटमे चाहक कप संग ‘(बेडसँ दूर) भोरुका चाह सेवन करैत रहथि’. हमहूँ संग बैसि गेलहुँ. ओतय ‘
जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार, वहीं रात हो गुलज़ार’ बला बैसाड़ तँ नहि भेलैक, मुदा, चाहक अनेक कपक बीच बहुतरास गप भेलैक. ताहि प्रकारक गप-सप जाहिमे रूचि अछि, आ मन लगैत अछि. क्रिसमसक छुट्टीक दिन आ समानधर्मा लोकक संग. घड़ी पर नजरि गेल तँ साढ़े आठ बाजि गेल रहैक. किछु कालक बाद मैसूर विदा हेबाक छल. अस्तु, बैसाड़ विसर्जित भेल.   
जँ शहरक भीड़सँ मन अकच्छ भए गेल हो, आ  एसगर वा परिवारक संग स्वच्छ शान्त-शीतल स्थानमे किछु दिन रहब, पोथी पढ़ब आ गप-सप करब नीक लगैत हो, तँ जाड़क ऋतुमे श्रीरंगापत्तिनम् क कर्नाटक पर्यटन विभागक होटल ‘मौर्या रिवर व्यू’ नीक विकल्प थिक.


Monday, January 5, 2026

कावेरीक कछेर पर

 निर्मल वायु, स्वच्छ शीतल जल

आओर गाछ केर छाहरि

धरती कोर माइक थिक, अपन 

कावेरी केर आँचर।

हमर जनम कमला कोसी लग

सिंधु- सियाङ् धरि धाङल, 

कमला आइ क्षीण दुर्बल छथि

चारू कातेँ बान्हल।

केहन मन जमुनाकेँ हेतनि,

भेली फेनसँ म्लान,

कारी कांति मोहक दूषित छनि,

कोना कए बचबथु प्राण!

मनुख जाति सोदर संतति थिक

जेहने नदी, समीर 

प्राण सभक एके संग बान्हल

जोड़ने तंतु महीन ।

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

हिन्दुस्तान का दिल देखो