Monday, July 27, 2026

When you don't fear the fear, you're the winner

 When you don't fear the fear, you're the winner

Innocence may be a bliss and experience a handicap. The recent agitation by the Gen Z  has shown it amply. 
Last twelve years in our National life has been a period of continuity and calm. It was first a calm of hope, and then of fear. People many times felt cheated, yet they didn't raise their voice. Since whether they raised voice or not, the outcome was the same; the govt, following its defined agenda, often bulldozing the parliament, remained unresponsive.
Those who pressed futher, faced persecution. The process often turned the punishment. Yet, the Press, the civil society, the urban  middle class in particular, and the Judiciary either could not help, or ignored popular distress. 
Recently, the war in the Middle East raising inflation increased people's distress. Then came repeated leaks of papers of the examinations, widespread errors in the evaluation of the class XII examination, etc. These resulted in restlessness among the youth facing unemployment and uncertain future.
Repeated postponement of qualifying examinations in various departments across the states added further to the woes of the unemployed. It was under such a volatile situation, that the Chief Justice of India with his insensitive remark, provided the proverbial the spark to the fuse.
Even then, if the Executive had accepted, there was a problem, they could have managed to convince people for some time. But the government which rose to power on the planks of wiping out corruption, did not fail to smell the coffee; actually, it was seen to be itself embroiled in widespread corruption.
Fear had so far proved a useful weapon against dissenters. Even the trusted weapons don't work every time. And it didn't work this time.
There are simple reasons. The Gen Z do not see manufactured debates on the so-called 'mainstream media'. They are not infected by the communal virus. They don't hesitate to speak truth. They know no fear.
And when you don't fear the fear, you're the winner! And the Gen Z won the argument.

Sunday, June 21, 2026

आगि-पानि आ झूठ-साँच केर लक्षण होइछ अनेक

जेहने विविध माटि अछि अप्पन

तेहने विविध अछि लोक,

भाषा मधुर, अनेको बोली

माटिओक रंग अनेक।

 

शोणित सभक एक रंग जहिना

श्वासो एके थीक,

आगि-पानि विभेद ने मानय

संशय तखन कथीक?

 

सूर्य-चान बसै छथि ऊपर

एके ताप आ छाया,

तखन मनुख जे भेद कराबय

बेचय स्वार्थ, ओ माया।

 

गाछ-वृक्ष नहि भेद करै अछि,

मेघ ने बाँटय पानि

मनुखक तखन बाँट-बखराकेँ,

लेबै कोना मानि!

 

मूर्ख रहौ, कपड़ा नहि तन पर,

धन नहि दैछ विवेक

आगि-पानि आ झूठ-साँच केर

लक्षण होइछ अनेक।


चलिये संभलकर, कहिये खुलकर


Courtsey: The Statesman

पुल नया है, जरा संभल कर चलिये।
सरकार अपनी है
, खुल कर कहिये ।
रेत और मिट्टी से बना है पुल
, फौलाद नहीं है!
पुल गिरते हैं
, पल भर में सरकारें भी गिरती हैं,
आप की है सरकार
, आप इसके मोहताज नहीं हैं।
नहीं बनते हैं अस्पताल तो बोलिये
,
चले बेवजह बुलडोजर तो रोकिये।
बंद है आवाज
, तो साफ कीजिये गला,
सीने को बनाइये फौलादी
इस में ही है सबका भला।


Monday, June 8, 2026

मृत्युक भयसँ छोड़य नहि ओ

मृत्युक भयसँ छोड़य नहि ओ
मोर्चा बूझय प्राण
मुदा, सत्य केर खातिर
केओ नहि अरपय जान।
एहन बसात कोम्हरसँ आयल
बना गेल ई क्लीव
ताल ठोकि कय चढ़थि मंच पर
बंध्या छैन्हि शरीर।
रहय ओ, एतहि छल जनमल
नाङट आधा आङ
लाठी हाथ चलै छल तैओ
निर्भय गेलै प्राण।
कीड़ा केओ रहय, वा बिढ़नी
ओकरो होइछ दंश
डांड़ सोझ कय होइऔ सोझाँ
सुमिरत देशक वंश ।    

Wednesday, May 6, 2026

चित वा पट, जीतत डाॅलर आ ट्रम्पहि सरकार!

सब किछु छल अनुकूल 

आ शांत छल बसात,

दूर सहस्र योजनाक पार

ट्रम्पकेँ उठलनि खौंत

आ कुड़ियाय लगलनि कपार,

आँखिमे असमान प्रजातंत्रक गेजड़

आ टेटर सन-सन धनकुबेरक अगुआई;

सत्य देखथिन कोना कनाह आँखिए!

तथापि, विदा भेलाह सरिआबय संसार,

लोकतंत्र (!)क जड़िमे देबय पानि,

जड़िसँ उखाड़ि, समूल नष्ट कए

मानवाधिकारहिकेँ!

बिसरि गेलनि कोरिया 

बिसरि गेलनि वियतनाम,

फुसिएक बल पर तँ

कयने रहथि, इराकहुक सत्यानाश!

समर्थ थिक अमेरिका,

समर्थ थिक रूस,

भेलैक जँ युद्ध-विराम 

तँ खजाना हेतनि झूस।

तेँ कोनहु पक्षसँ 

पमरियाक तेसर-जकाँ 

अड़ा देताह टाङ,

भले हो बांग्लादेशमे नरसंहार 

वा बलूचिस्तानमे 

पाकिस्तानी बमबारीक अभियान!

लगौक आगि, वा धधकौक देश,

जाओ जनता जहन्नुममे 

वा हुनकर पार्टीक सेनानी सब

करौक संसदक बलात्कार,

वा एक दिस चलबैत रहथु

इरानमे  नरसंहारक अभियान 

लैत रहथु

ओतुका सभ्यताकेँ भूमिसात्  

करबाक संकल्प,

मुदा, ओ करताह जनतंत्रहिक गुणगान। 

दोसर दिस छी हमरालोकनि:

जखन संप्रभुता-संपन्न राष्ट्रक 

भ' रहल छैक सामूहिक बलात्कार 

तखन कोन ठेकान के हएत 

मगरमच्छक अगिला शिकार!

मुदा, रीढ़मे चाहिऐक बल

आ कंठसँ फुटौक तँ बेकार!

कहथुन तँ कोनो मुहपुरुख:

खेल तँ थिकैक तेल केर,

तेँ, बन्न करह ई खेल!

किएक तँ

बहरा रहल अछि, 

हमरालोकनिक तेल!!

नठि गेल नाटो, नहि आयल चीन

ने फ्रांस, बिलेँत, ऑस्ट्रेलिया आ  जापान

मुदा, आब मोदी करताह कोन प्रतिकार?

कारण, चित हो वा पट

जीतत डाॅलर, अमेरिका आ ट्रम्पे सरकार!





Sunday, May 3, 2026

रक्त-संबंधसँ दूर

 

संस्मरण-सन

रक्त-संबंधसँ दूर  
कीर्तिनाथ झा
kirtinath.jha@gmail.com


बहुत दिन पहिने गाममे अनेक परंपरा रहैक. एहिमे इहो रहैक जे गामसँ दूरस्थ बाहर रहनिहार जखन साल-छौ मास पर गाम आबथि, तँ सर-संबंधी, हित-मित्र आ श्रेष्ठलोकनिक भेट करथि, कुशल-क्षेम पुछथिन, आ आशीर्वाद लेथि. यद्यपि, आइ समाज आ लोकसब, सब बदलि गेल छथि, हमरालोकनि सेहो युवकसँ सीनियर सिटीजन भए चुकल छी, तथापि, हमरालोकनि एखनहुँ ओ रिवाज धेनहि छी: गाम अबैत छी तँ कतेको गोटेसँ भेट करैत छियनि, जाहिमे भौजीलोकनि सेहो छथि. आइ सुन्दरपुरवाली भौजीक भेट करय गेलहुँ.         
हुनक ओसारा पर चढ़िते हम सोर केलियनि: ‘भौजी!’
“के, डाक्टर सेहेब?’ ई कहैत भौजी मसहरीक त’रसँ  बहार भए कोठलीसँ तेहन गतिएँ बाहर भेलीह
, जेना ओ तिरानबे बरखक नहि, तिरसठिक होथि. दुब्बरि, गोरि नारि आ नमतीमे औसतसँ बेसी होइतो, ने हुनकर डांडमे कोनो लोच, ने आँखिमे अशक्तताक भाव. ओहिना खल-खल हँसैत, जेना हम हुनका छौ दशकसँ बेसी पूर्व देखैत रहियनि. भौजी हमरा एखनो ओहने लगैत छथि.
हमरा जहियाक स्मरण अछि, हम पाँच-छौ वर्षक रहल हएब. आब जोड़ैत छी, तँ, तहिया भौजी करीब पच्चीस बरखसँ कम केर नहि छल हेतीह. हुनकर जेठि बेटी हमरासँ अवश्य जेठि छल हेतीह; हुनका हमर जेठि बहिनिक संग ‘पिरीत’ लागल छलनि. भौजी तैओ छोट दियर बूझि हमरासँ मौका-बे-मौका हँसी-विनोद कइए लेथि.ओहि युगमे गामक संबंध-बंध रक्त संबंधे धरि सीमित नहि रहैक. तेँ, अपन भौजीलोकनि  तँ सहजहि, आनो आङनक भौजीलोकनि, जनिकासँ केवल सामाजिक संबंध छल  दुलारो करथि, आ मौका पड़ला पर हँटिओ-दबाड़िओ देथि.
समयक प्रहार आ जीविकाक हेतु पलायन, ई रोग जन-मज़दूरक संग हमरोलोकनिकेँ कहाँ छोड़लक. फलतः, लोककेँ घर-आङन छूटि गेलैक. गामक-गाम खाली भए गेलैक. तैओ किछु गोटे गामकेँ ओहिना पकड़ने रहि गेलाह जेना बड़-पीपर-पाकड़ि भूमिकेँ धेने रहि जाइछ. एहने एक परिवारक दू दियादिनी छथि भौजीलोकनि. दुनूक लगभग एके वयस, एके काया-कलेवर, एके अङोट, एके भाषा, एके रंग स्वभाव. गप-सप एहन जे अपन गपसँ ककरो अपना दिसि झीकि लैत जेतीह. एहिमे सँ  जेठि मखौलिया बेसी
. ओ आङीक जेबीमे गूआ राखथि. छोटि कनेक गंभीर-मनस्वी, पोथी आ पढ़बाक हिस्सक रहनि. कोठिक कान्ह पर पोथी राखथि. हुनक पिता महान पण्डित रहथिन आ माता लेखक.
दुनू दियादिनीक बीच वसंत लागल रहनि.

पछाति, जखन हम लिखब आरंभ केलहुँ, आ हमर पोथी प्रकाशित होमय लागल तँ जखन हम गाम आबी तँ छोटकी भौजीकेँ हम अपन प्रत्येक पोथीक एक प्रति अवश्य दए अबियनि आ ओ प्रत्येक पोथी रूचिसँ पढ़थि.
बहुत दिनक बाद एक बेर जखन गाम एलहुँ, आ हुनकर भेट करी गेलियनि, तेँ, छोटकी भौजी पुछलनि, यउ, छोटे वयसमे पढ़ल
, भारतेन्दु हरिश्चंदक एकटा कविताक किछु पाँति हमरा मन पड़ैत अछि. मुदा, पूरा कविता कतेको मोन पाड़ैत छी, मन नहि पड़ैत अछि.  फल्लाँकेँ पुछलियनि, कहलनि नहि बूझल अछि. अहाँकेँ बूझल अछि? सुनूँ. आ ओ ओहि कविताक पहिल दू पाँतिक पाठ केलखिन:
नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी सोहति ।
बिच-बिच छहरति बूंद मद्य मुक्ता मनि पोहति ।।

हम कहलियनि, ‘ई तँ सुनबामे मैथिली-सन लगैत अछि.

भौजी अस्वीकृतिमे हाथ डोलबैत कहलनि, ‘नहि.’
हम ओत्तहि हुनकर सोझहि गूगल बाबाकेँ पुछ्लियनि. हाज़िरजवाब गूगल बाबा तुरत संपूर्ण कविता सोझाँ राखि देलनि. हम कविता पाठ कए भौजीकेँ सुना देलियनि. सुनि कए ओ प्रसन्न भए गेलीह. ठीके भारतेन्दुक ‘गंगा-वर्णन’1 नामक ई कविता ब्रज-भाषामे छैक.


2

बड़कीभौजीक आँखि आ कान दुनूसँ अशक्त छथि. मुदा, प्रखर बुद्धिक कारण आँखि आ कानक दोषक कमीकेँ पराजित कए दैत छथिन. तेँ, ककरो आहट पबिते कान ठाढ़ भए जाइत छनि. ठेहुनमे कष्ट छनि, मुदा, लोकक आवेश तेहन जे लोकक आहट सुनीते सोझे बहरा जाइत छथिन.
एहि बेर हम भौजी लग बैसलहुँ तँ ओ बेरा-बेरी सबहक हाल-चाल पुछलनि. आँखि आ कानक कमजोरीक अछैतो, टोल-पड़ोसक सब गप बड़की भौजीकेँ बुझल छनि. ककरा कतेक दरमाहा भेटैत छैक, ककरा घरमे के अस्वस्थ छैक, कोन परिवारमे क़ेहन दुःखद घटना भेलैए, ओ सबहक खबरि आ सबहक प्रति सहानुभूति रखैत छथि, सबहक संग सहृदयताक भाव छनि.
हम चाह नहि पिबैत छी, पान नहि खाइत छी, से भौजीकेँ नहि बिसरल छनि. अस्तु, हम जखन हुनकर सब सत्कारक प्रयासक आगाँ हाथ जोड़ि हुनका बैसा दैत छियनि, तैओ ओ हारि नहि मानैत छथि. कहैत छथि, ‘थम्हू
, अहाँकेँ लवंग दैत छी.

लगहिमे भौजीक सहायक, गामक सुआसिनि सीता बैसलि छलीह. कहलनि, ‘बौआसिन ले’ समाधियाउरसँ फूट कए मेवा-मिसरी-लौंग-अणाची अबैत छनि. भौजीक ठोर पर चिरपरिचित मुसुकी पसरि जाइत छनि. ओ गरदनिक मोतिक मालाक बीचसँ कुंजी हथोड़ि छोटका बक्कस खोलि लबंग निकालि हमर तरहत्थी पर सबटा लबंग राखि दैत छथि.
‘एतेक रास!’ हम प्रतिवाद करैत छियनि.
ओ हमर कुर्त्ताक जेबी दिस संकेत करैत, कहैत छथि, ‘राखि लियअ’.
हमर भौजी एहन आवेश कोना टारि सकैत छियनि.
हम उठिकए विदा होमय लगलहुँ तँ भौजी फेरि बैसा लेलनि. कहलनि, कनियाँ आ धियापुता? ओ सबहक कुशल-समाचार पुछय चाहैत छथि. सबहक हालचाल इशारा आ जोरसँ कहला पर सूनि ओ आश्वस्त भेलीह.  
हम सोचैत छी, ई गाम केवल एकटा भूखण्ड, एकटा चौहद्दी, खरिहान, पोखरि-नदी-गाछी-कलमबाग़- कमला-कोसीक धारक समुच्चय नहि थिक. एतुका मनुखक ह्रदय, ओकर स्पंदन, ओहि स्पंदनक बलसँ बहैत अनुराग-प्रेम-राग-द्वेष सब किछु एहि गामक अन्तःसलिला धार थिकैक. हमरालोकिन ओही धारमे नहयबा लेल गाम अबैत छी. लगैए भौजीलोकनि एहि गामक मोहार परहक सिंगारहारक गाछ छथि. हम अबैत छी, ओहि गाछक नीचासँ भरि आँजुर फूल बिछैत छी. सिंगरहारक फूलक श्वेत पंखुड़ी जँ भौजीलोकनि  छथि तँ फूलक डंटीक नारंगी रंग हुनकालोकनिक प्रेम थिक.
नौकरीक कारण हम कतय-कतय ने गेलहुँ. पहिल बेर छौ मासक नौकरी लेल दिल्ली गेलहुँ, दादा चलि गेलाह. लेहमे रही, तँ, माता अपन अंतिम गंतव्य दिसि विदा भए गेलीह. आब तँ अपन परिवार क्रमशः सुन्न-जकाँ भए गेल अछि. ततबे नहि, एहि लंबा अवधिमे कतेक बेर घर-आङन कमलाक बाढ़िमे भासिओ गेल, आ फेरि कए बनबो कयल. तैओ गामक जाहि माटि-पानिसँ देह पुष्ट भेल अछि, तकर आकर्षण  हमरा यदा-कदा गाम दिस झिकैत रहल अछि. गामक माटिक गंध किताबक पन्नाक बीच जोगाओल सुखायल गुलाबक फूल-सन सुगन्धि-सन मादक, आ मधुर थिक, ऊर्जाक श्रोत थिक. अपन आङनक क
ल केर मधुर पानि-सन मधुर पानि आन ठाम कहाँ भेटल. ओकर मोह कहाँ छूटल.
अस्तु, एहि बेर कोनो व्याजें जूड़शितल दिन गाममे छी. पानि-पनिशाला, सतुआइनि, जौ-टिकुला- जलसँ भरल घैलक दानमे सँ बहुत किछु बँचलो छैक, किछु विलुप्तो भए गेलैए.
बासि पाबनि दिन हमर पड़ोसिन हमरा लेल बड़ी-भात-तिलकोड़क पातक तरुआ आ आओर अनेक वस्तु ल’ कए अइलीह. तखन स्मरण भेल, आब तँ ने माता छथि, ने पितियाइनिलोकनि. ने अपन भाउजिलोकनि केओ गाममे छथि. भगवतीक सीरमे राखल पानि के माथ पर देतीह? के कहती जुड़ाएल रहू?
एकाएक गामक बड़की भौजी स्मरण भए एलीह. हुनकर आङन हमर आङनसँ करीब चौथाई किलोमीटर दूर छनि. जलखई-पनिपियाईक पछाति हम बडकी भौजीक ओतय पहुँचि गेलहुँ. बाहरेसँ हाक देलियनि. हुनकर पुतहु हमर सोझाँ नहि अओतीह. भौजीक कोठलीक पुबरिया आ पछबरिया, दुनू केबाड़क चारू पट्टा खुजल रहनि. पुरिबा हवामे पर्दा सब उड़ि रहल छलैक. कोठलीमे आओर ककरो नहि देखि हम सोझे कोठलीमे प्रवेश केलहुँ.
हमरा अबैत देखि भौजी धड़फड़ा कए मसहरीक त
रसँ बहरइलीह: ‘डाक्टर साहेब?’
‘आइ अहाँसँ माथ पर पानि लेबय आयल छी, भौजी.’ हम प्रणाम करैत कहलियनि, ‘आब हमरासँ जेठि-श्रेष्ठ एतय आओर के छथि?

भौजी भरि पाँज कए पकड़ि लेलनि. कहलनि, ‘हँ, एहि बेर तँ वसंत सेहो पटना धेने छथि.’
ओ झुकि कए बामा हाथें बिछाओनक कातमे राखल लोटा उठओलनि. दाहिना हाथमे आमक पल्लव लेलनि आ लोटाक पानिसँ हमर माथ शिक्त करैत कहलनि, ‘जुड़ायल रहू. अहाँ तँ हमर छोटका दियर छी.’
हमरा दाई स्मरण भए एलीह आ आँखिमे नोर आबि गेल. हम हुनका प्रणाम केलियनि आ झटकारनहि आपस आबि गेलहुँ.

संदर्भ:

1.    भारतेन्दु हरिश्चंद: गंगा-वर्णन
https://www.anhadkriti.com/bhartendu-harishchandra-poem-ganga-varnan accessed 03 May 2026.                       

Tuesday, April 14, 2026

अवामक डायरी, मार्च, २०२६

 

अवामक डायरी, मार्च, २०२६

मार्च १८, २०२६. करीब साल भरिक बाद गाम आयल छी. स्वास्थ्यकर जलवायु आ अनुकूल ऋतु; रातिमे बढ़िया जाड़क अनुभव भेल. अनुमान नहि छल मध्य मार्चक बाद गाममे एतेक ठंडा हेतैक. जीन्स आ टी-शर्ट पहिरिकए  आयल रही. गरम कपड़ा घरमे अछिओ कि नहि, से सोचब आवश्यक नहि बूझि पड़ल छल. आब रातिमे खिड़की-केबाड़ निमुन्न कए बन्न कए दैत छियैक, तँ निन्न भए जाइछ. तथापि इच्छा होइए कंबल जँ रहितैक! पंकज हमर भातिज गाम अयलाह आ एकटा कंबल आ एकटा स्वेटर दए गेलाह. रातिमे कंबलक ऊष्मा सुखद लागल.

सुनल, एतय दू दिन पहिने धरि नवाह कीर्तन होइत रहैक. एक-एक टा गाछ पर चारि-चारि, छौ-छौ टा स्पीकर. एहि दुखद ध्वनिसँ भगवान कतेक प्रसन्न होइत छथि, ओएह जानथि. मुदा, जे गौआँलोकनि  बेहरी देने छथिन, तनिका घर धरि जँ कीर्तनक स्वर नहि पहुँचलनि तँ अगिला वर्ष ओ बेहरी किएक देथिन. आब लाउडस्पीकरक आवाजसँ किनको निन्न नहि होइनि तँ गाममे भाङ आ दवाईक दोकानक अभाव छैक! मुदा, नवाह कीर्तनक समाप्तिसँ जे शान्ति प्रतीत भेल से एकटा बोनस भेल.  

भोरमे उठलहुँ तँ अपन बाड़ीमे तीन घौड़ कर फूटल देखलियैक. अङनाक समाङ, गुलाबख़ास आमक सन्तति सेनुरिया आमक गाछक डारि घरक छत धरि ओलरि आयल अछि. सुखायल मज्जरक बीच-बीचमे मसुरी आ मटर केर दानाक आकारक टिकुला देखि आश्वस्त भेलहुँ, एहि बेरुका आमक फसिल भलहि पछिला साल-सन नहिओ होइक, तैओ जँ गाममे रहि गेलहुँ तँ खयबा जोगर आमक अभाव नहि होयत.
अङनाक एक कोनमे नव पल्लव सबसँ लदल  नान्हि टा लीचीक गाछ प्रसन्नचित्त लागल. अपन लगाओल नेबोक गाछ एक वर्षमे आकारमे ततेक पैघ नहि भेले, मुदा पात हरियर छैक. शीबू भाईक सोगाति, हौरसा/फालसा (
Grevia asiatica)क नान्हि टा गाछकेँ स्वस्थ आ मुसुकाइत देखि संतोष भेल जे एहि गाछ-वृक्षक हेतु हमर परिसर अनुकूल अछि. मूलतः माल- जालक अवर्यात नहि छैक.

हमर माता-पिता रहितथि तँ दोसरे बात रहितैक.माताकेँ गाछ-वृक्ष, लता-कंद-मूलक ततेक परिचय आ ओकर सबहक औषधीय गुणक ततेक ज्ञान रहनि जे हमरालोकनिक आलयक कोनो कोनो भैषज्य हुनका अपरिचित नहि रहनि. तकर कारणो छलैक; हुनकर दू सोदर- किरणजी एवं अनुज कामिनीनाथ झा- सुयोग्य वैद्य रहथिन. अग्रज पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थकेँ सेहो वैदागरीमे रुचि रहनि, आ ई सब भाई बाड़ीमे गाछ-वृक्ष आ जड़ी-बूटी लगबथिन. हमर पिताकेँ फूल-पत्ती आ फुलवारीक बड्ड शौख. ओ खुरपी-कोदारि पकड़ि अपन बाड़ी-झाड़ीमे घंटो परिश्रम करथि.
कचोट होइछ जे हमर बाड़ीसँ गाछ-वृक्ष,लताम-बड़हर-आँता-शरीफा-अनार-करोना-जामुन-जिलेबी तथा अनेक प्रकार नेबो सब विलुप्त भए गेल. किछु बेर-बेर बाढ़िक दुष्प्रभाव आ दोसर ताकुतक अभाव. गाछो-वृक्षकेँ मनुखे-जकाँ ताक-हेर चाहियैक, अन्यथा चाहे तँ दुर्द्धर्ष पड़ोसी-जकाँ जंगल-झाड़ दाबि कए फुलबाड़ीकेँ नष्ट कय दैत छैक, छोट गाछ फूल-पत्तीकेँ माल-जाल नष्ट कए दैत छैक, वा कखनो-काल, मनुखक हेतु गाछ-वृक्षक उपादेयतासँ अभिज्ञ घरबैया सेहो गाछ-वृक्षकेँ काटि अपन परिसरकेँ चिक्कन-चुनमुन बना लैत छथि!      
तैओ अपन हाथें नव-नव लगाओल गाछ सबकेँ स्वस्थ देखि हमरा एतबा विश्वास भेल जे आइ ने काल्हि अपन बाड़ी पहिनहि-जकाँ विभिन्न फल-फूल अवश्य सजि जायत. हँ, आरंभमे जँ दुइओ-चारि टा शरीफा, लताम, करोनाक गाछ लागि गेल तँ अपन परिसर चिन्हार-जकाँ लागय लागत. आम, जामुन, बेल, कटहर, केरा तँ अछिए.

 

2

गाम अबिते भोरुका टहलान शुरू कयल. सबसँ पहिने बाटक कातहि ‘पाँतरक पीपर’क हरियर-लाल सुकोमल पात आकृष्ट केलक. हम गाममे जेम्हर देने जाइत छी, गाछ-वृक्ष, मनुख, नेना-भुटका, युवक, कन्या, सांढ़ आ कुकुर धरिसँ गप्प करैत चलैत छी. सबसँ दोस्ती भले नहि हो, संवाद तँ होइते अछि. भाषा भिन्न भले होइक, मुदा ज्ञान तँ सब प्राणीकेँ होइछ. कुकुरक ज्ञानक तँ गपे नहि हो.  
हमर सङबे शीबू भाई कहैत छथि: ‘हमरालोकनि माउगि-मेहरकेँ नहि टोकैत छियैक. अहाँक दादा सेहो बाट-बटोहीकेँ टोकैत छलखिन.हम कहैत छियनि, ‘हम डाक्टर छी. आजीवन मनुखसँ संवाद कयल-ए. सफल चिकित्सा लेल रोगीक संग निर्बाध संवाद ओतबे आवश्यक होइछ, जतेक सैनिक अभियानक हेतु लेल सड़क. ऊपरसँ चिकित्सककेँ मनुखक नाड़ी परीक्षा करबाक हिस्सक होइछ. आ मनुखे तँ थिक गामक नाड़ी. ओकरासँ गप नहि करबैक तँ गामक ह्रदयक स्पंदनक बोध कोना हयत!
स्वभावें गंभीर शीबू भाई चुप भए मुसुकी देबय लगैत छथि: माने, आब करू हमर नाड़ी परीक्षा. कहू हम की सोचि रहल छी ?
हम सोचैत छी, शीबू भाई अहूँक गप-सप तँ हमरा गामक धुक-धुकी सुनबिते अछि.

3

स्वच्छ वायु आ शान्त वातावरणक अतिरिक्त भोरुका टहलानक आओर अनेक लाभ छैक. किछु गोटे फूल तोड़ैत हरि-स्मरण करैत छथि, तँ केओ सोझे ग्राम-देवता लक्ष्मीनारायणक द्वारि पर पहुँचैत छथि. किछु युवक-युवतीलोकनि जनशून्य सड़क पर निर्बाध दौड़ैत छथि, तँ, किछु गोटे सड़कहि पर छोट समूहमे योगासन सेहो करैत छथि. किछु खेतिहरलोकनि खेतक आरि दिस जाइछ छथि, तँ किछु नेना-भुटका सूर्योदय-समकालहि ट्यूशन आ कोचिंग क्लास दिस विदा होइत छथि.

अन्हारमे निकलैत काल मनुखक आवागमनसँ कुकुरक निन्न कामहि होइत छैक. कोनो-कोनो कुकुर गुम्हरितो अछि. हमर स्टिक बक्सामे नहि भेटल. कहिओ काल हम बाटक कातसँ कोनो कड़ची वा लकड़ीक ठहुरी उठा लैत छी. ओना एतय मोती नामक एकटा कुकुरसँ  परिचयो अछि. एकरा पछिला दू यात्रासँ बाटक कातमे बान्हल देखैत छियैक; बतर रुग्ण आ दुखी. भोरुका पहर जखन सब जीव-जन्तु उन्मुक्त रहैत अछि, भोरुका वायुमे बौआय चाहैत अछि, तखन ई बान्हल रहैए. एहना स्थितिमे एहि नेना (कुकुरक) मन दुखी हएब उचिते. हम लग जाइत छियैक, नाम कहि सोर पाड़ैत छियैक. सब दिन लग जा कए हाल-चाल पुछैत छियैक. पुछैत छियैक: सुतल छें? सुतले रहबे?
हमरा रबीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता स्मरण भए अबैत अछि:

अर्र...र  बकरी घास खो
छोड़ि गोठुल्ला बाहर जो
फुर्र....र चिड़ैया खोंता छोड़
लोल खोलिकए दाना खो  

आँखि-पाँखि जकरा छै जगमे
भूख मरल की कहियो !

एतेक दिनमे एहि यात्रामे केवल एक दिन भोरमे मोती हमरा खूजल भेटल. मोन प्रसन्न रहैक. हमरा देखिते हमर देह पर छरपय लागल. माने, आब मोती हमरा चिन्हैत अछि. हमहू कनेक दुलार कए देलियैक.एतबो परिचयसँ पनुगल ई सामाजिकताक कोनो कम भेलैक. जखन मनुख एकाकी रहैत अछि, तखन कुकुरो-बिलाड़िक संगति लोककेँ बताह हेबासँ बचबैत छैक!

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अवाम एवं पोखरभिंडा गामक बीचक बड़का बाधमे प्रवेश कयलासँ पूर्व लोक ग्राम-देवता लक्ष्मीनारायणकेँ दूरहिसँ प्रणाम कए टहलान लेल आगू बढ़ैत अछि. किछु गोटे घुरतीमे आरतीमे सेहो सम्मिलित होइत छथि.
एखन बिहार सरकार द्वारा एहि मन्दिर परिसरमे निर्माणक बड़का परियोजना चलि रहल छैक. हमरा प्रसन्नता अछि जीर्णोद्धारक एहि परियोजनासँ एतुका दुनू वृद्ध पीपरक गाछक कोनो अविघात नहि भेलैए: ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’.
हमरा हेतु इएह दुनू गाछ, चिन्हार थिकाह, चुम्बक थिकाह.
लक्ष्मीनारायण मन्दिरक ठीक उत्तर धनवती संस्कृत पाठशालाक बादक पुरान पीपरक गाछ लग जे दुचारी स्कूल रहैक ताहीमे १९६० ई.भाईजी( स्व. रघुनाथ झा) हमर नाम लिखओने रहथि.
बोर्ड अपर प्राइमरी स्कूल, अवाम आ पाठशालाक पश्चिमक मखनाही पोखरि-विष्णुपोखरि- एखनहु छैके. संस्कृत पाठशालाक आगूक इनारक कोनो अवशेष आब नहि छैक.
एक वर्ष एही संस्कृत विद्यालयक अंगनैमे वसंत पंचमी दिन प्रसिद्ध ध्रुपद गायक पण्डित रामचतुर मल्लिक हारमोनियम बजबैत कविकोकिलक अमर गीत  ‘आयल ऋतुपतिराज वसंत’ गओने रहथि. ने कोनो दरी, ने कोनो जाजिम, ने कोनो संगत कयनिहार वादक, आ ने पैघ दर्शक समुदाय. हमरालोकनि- नेना-भुटका- ओहिना जंहि-तंहि दौड़ैत-भगैत रही आ मल्लिक जी हारमोनियम बजबैत गबैत रहथि. कोन ठेकान ओ महान कलाकार वाग्देवी आ लक्ष्मीनारायणक परिसरमे वीणावादिनीक वरदानकेँ हुनकहि समर्पित करबाक भावसँ ओतय सीमित साज आ बिनु सभाकेँ अपन स्वरहिकेँ वाणी आ लक्ष्मीनारायणकेँ समर्पण करबाक भावसँ ओतय ई गीत गओने होथि. ओहि दिनुका हुनक गायन आ भंगिमामे किछु एहन  अवश्य रहैक जे ओ दिन आ ओहि दिनुका हुनक गायन, गीत एहि तत्कालीन पाँच-छौ वर्षक नेनाकेँ- हमरा- एखनो स्मरण छैक.
जखन हमर स्कूलक दुचारी भवन जखन खसि पड़लैक, तखन क्लास लक्ष्मीनारायणक मन्दिर सोझाँमे ठाढ़ दोसर विशाल गाछ त’र शुरू भेलैक.पीपरक शीतल छाहरि. चारू कात करबीर, अड़हूल, कनैल, कटहरिया इत्यादि फूल गाछ. गाछ त’र अजस्र कनैलक बीया. तथापि, तकर मोल रहैक, ओहि ले’ झगड़ा होइक. गाछक डारिक आदर रहैक.
चटिया- छात्र- सब भूंइये पर, बोरा-सपटा-खजूरक चटिया पर बैसय. मास्टर साहेबलोकनि बेंचपर. प्रायः एकटा कुर्सीओ रहैक.
जटही पोखरिसँ छात्र सबकेँ अनेरे डर होइक. जटही पोखरिक दछिनबरिया मोहार पर श्मसान रहैक. भूत-प्रेत सबसँ डर कोना नहि होइतैक. ऊपरसँ धारणा रहैक जे जटही पोखरिमे गोहि छैक, नेना सबहक टाङ घीचि लैत छैक. दोसर पोखरि, मखनाही पोखरि रहैक गहींड़. मखानक पातसँ पाटल. कतहु पक्का घाट नहि. मुदा, गेनहि कुशल. कतहु शौचालयक नाम नहि. विद्यार्थी वा शिक्षक, खोलू ढेका उतरू पार!
हमर जेठि बहिनि, शीला दाई हमर गार्जियन रहथि. हम स्वभावसँ चंचल रही, गछचढ़ा सेहो. उकठ-अपराधक कनेको संदेह भेने, लाल बहिन कहथि,’ मायकेँ कहि देबैक. हम सटक सीताराम!
सत्ये, डरबुक आ अनुशासित बच्चा लेल ई कोनो छोट धमकी भेलैक! मुदा, कन्या रहथि ने, पाँचवाँ वर्गक परीक्षा पास भेलीह, बियाह भेलनि, सासुर बसय लगलीह आ ओतहि माटिमे मिलि गेलीह.

                                                                                                    क्रमशः .........                 

 

 

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