Wednesday, April 1, 2026

कुछ सोचिये

1

इजराइल में हो या इरान में,

फिलिस्तीनी हो

या हो और कोई इंसान,

जब हो वह मोर्चे हो खड़ा 

दुश्मन के सामने

वह हैं दुश्मन अपने शत्रु के.

पर, इंसान के बच्चे की जान!

इंसान के बच्चे की जान लेना

है केवल हैवान का काम!

फिर फिलिस्तीन, हो इरान या हिन्दुस्तान,

बचायें हम बच्चे को,

उसने किया कौन सा नुकसान ?

2

हिटलर, मुसोलिनी, या हो

कोई याह्या ख़ान

मालूम है ? तारीख़ में क्यों 

दर्ज है तेरा नाम,

नरसंहार का पर्याय 

है तेरा नाम!

कौन भूला है?

विजेता अशोक ने 

कितना किया था शोक?

अपने हाथों हुए नरसंहार पर!

पर आज?

अब बंद हो ये नाच 

और बंद हो यह लूट का यह खेल.

आखिर खेल तो है तेल का

और

यह निरर्थक युद्ध  निगल रहा है

मानवता को!

कुछ सोचिये,

हे ट्रम्प, हे पुतिन, हे सी, 

हे विश्व के नेतागण महान,

कब तक लेंगे आप?

स्वतंत्रता के नाम पर

असहाय इंसान की जान!

Tuesday, March 24, 2026

कोकनल सोङर


कोकनल सो  


परसू नन्दिनीक विवाह हेबाक होइतैक, आ आइ भोरे-भोर बाप कपार फ़ोड़ि देलकैक. निशांबाज मनुख; बेटीकेँ जलखै देबय लेल कहलकैक. खगल घर. यावत् बेटी किछु इंतजाम कए खयबाक किछु आनि कए सोझाँ रखितैक, तावत् बाप-अनबुमणि-क तामस कपार पर चढ़ि गेलैक. तामस तँ सदिखन ओकर नाके पर रहैत छलैक. चिकरय लगलैक, ‘एक मुट्ठी अन्न सेहो जल्दी आनि कए दैत से पार नहि लगैत छैक एकरा सबकेँ. जेहने माए तेहने बेटी.’
बेटी कहलकैक, ‘किछु बनेबैक तखन ने. सेहो घरमे किछु रहतैक तखन ने. तोरा तँ घरसँ बहरयना हप्ता भए गेलह.’
बेटीक गप्प अनबुमणिकेँ लेसि देलकैक. पानिक पाइप सोझाँमे छलैक. ओ आव देखलक ने ताव, पाइप उठौलक आ सोहाइ डाङ नन्दिनीक कपार पर दए बैसलैक. बेटी किकिहारि करैत दुनू हाथेँ माथ पकड़ि ठामहि बीच अङनामे बैसि गेलैक. गीता दौड़िते दोसर कोठलीसँ बहरायल तँ नन्दिनी माथसँ छर-छर शोणित बहैत देखलकैक. पहिने ओ जेना-तेना फूटल कपारसँ शोणित बहब बंद करबाक द्वारा ताकय लागल. मुदा, शोणितक पमार ओकरा बुतें सम्हरैक तखन ने.  ओकरा अनबुमणिकेँ किछु कहब बेकार लगलैक; मनुखकेँ ने लोक किछु कहतैक. ओकरा भेलैक, एहन चण्डालक कोन काजक!!

कतहु भागि जाइत, चल जाइत, मरि जाइत तँ, धियापुताक एहन हालत नहि होइतैक, हमरा समाजक सोझाँ एहन हँसारथ नहि होइत. कुमारि छलहुँ तँ माय-बाप एकटा मनुखक अंक लगा देलक. सोचलक जे जीवन कटि जायत. मुदा, जँ इएह हमर आ धियापुताक जीवन थिकैक, तँ मरण केहन होइछ. हम आ हमर धियापुता तँ नित दिन समाज, आ परिवारक सोझाँ मरैत छी. मुदा, ई क्षणिक विचार गीताक मनमे जहिना आयल छलैक, तहिना उड़ि गेलैक. नन्दिनीकेँ तुरत अस्पताल ल’ जायब ओकरा सोझाँ रहैक.ओ लत्ते-पत्ते नन्दिनीकेँ ल’ कए सड़क पर आयल, आ जे कोनो ऑटो सामने भेटलैक ओहिमे बैसि अस्पताल विदा भए गेल.

हम भोरहि अस्पताल पहुँचले रही. गाड़ी पार्क कए अस्पतालक पोर्टिकोमे अयलहुँ तँ गीताकेँ धड़फड़ाइत अस्पतालक भीतर जाइत देखि आश्चर्य भेल. हम आगू बढ़लहुँ. हमरा देखिते गीता थकमका कए जतहि छल, ठाढ़ि भए गेलि. मूड़ी नीचा झुकल, नोराएल आँखि, आ अस्तव्यस्त केश.
हम यावत् किछु पुछितिऐक, तावत्  हमर नजरि अस्पतालक द्वारिक भीतर बेंच पर बैसलि लड़की पर गेल. गीताक बेटी नन्दिनी रहैक. करीब बरख बीसेक वयस, पिंडश्याम वर्ण, फूटल कपार. कपारक घाओसँ बहैत शोणित गाल धरि टघरि आयल रहैक आ शोणितायल केशक किछु भाग गाल पर सटि गेल रहैक. हम सोझे भीतरे दिस बढ़लहुँ. लड़कीक एहन हाल देखि हमरा किछु पुछबाक आवश्यकता नहि बूझि पड़ल. गीता अपने अपरतिभ-जकाँ छल. दू दिन बाद नन्दिनीक विवाह हेबाक रहैक से हमरा बूझल रहय. एहन परिस्थितिमे ई घटना गीताक हेतु केहन छल हेतैक, से कल्पना करब कठिन नहि. चिकित्साक आवश्यकता रहैक, से देखिए लेले रहियैक. टाँका तँ लगबहि पड़ितैक. हम आगू भेलहुँ. दुनू माय-बेटी सेहो हमर पाछू-पाछू विदा भेल. सीनियर रेजिडेंटक कमरा लग आबि हम बाहरेसँ ड्यूटी- डाक्टरकेँ बाहर बजओलियनि आ जे किछु निर्देश देबाक छल, से दैत आगाँ बढ़ि गेलहुँ.
करीब दस वर्ष पहिने जखन हमरालोकनि पांडिचेरी आयल रही, तहियेसँ  गीता हमरा सबहक काज करब शुरू केने छल. ने ओकरा हिन्दी-अंग्रेजी अबैत रहैक, ने हमरालोकनिकेँ तमिलक कोनो ज्ञान छल. देश भरिक नौकरी करैत ई अनुभव हमरा सबहक लेल नव नहि छल. काज आ दरमाहाक अतिरिक्त ने ओकरा किछु पुछबाक रहैक, ने हमरालोकनिकेँ आन कथूमे रुचि छल. ओतय कतेक गोटे घरमे काज देबासँ पहिने खबासिनीक संग अनेक शंका-समाधान करथिन. जाति आ छूआछूतक विचार सेहो. मोन पड़ल छल, नेपालहुमे हमर एकटा विद्यार्थी कहने छलि, सर, अहाँक घरमे सुनीता काज करैत अछि, ने. हम सब ओकरा अपना घरमे नहि ने राखि सकबैक.
हम गप बूझि गेल रहिऐक; सुनीताक पानि नहि चलैत रहैक. माने, ओ अछोप भेल. ई समस्या दक्षिण भारतमे नहि छैक, से नहि.  मुदा, हमरालोकनिकेँ तकर चिंता नहि. आन जे बूझथु, बूझथु.
गीता स्वस्थ छलि. नीक-जकाँ काज करितहि छलि. अनेरे छुट्टी, आ बिनु पूर्व सूचनाक काज नागा कए परेशान नहि करैत छलि. ओकरा रहैत घरसँ एकटा सूई धरि नहि हेड़ायल. खबासिनिक हेतु एहिसँ कोन बेसी गुण चाहिऐक. जँ, लाख टाका मासिक दरमाहा पओनिहार सरकारी अफसर आ कर्मचारीसबकेँ एतबा गुण होइतैक, तँ, देशक एहन हाल रहितैक. मुदा, बिनु पढ़ल गीताकेँ कोन सरकारी नोकरी भेटितैक नहि! तखन अफसर सबहक घरमे झाडू-पोछा-बरतन-बासन करैत दस साल धरि निमाहि लेलक ई कोनो कम भेलैक. गीताक लेल इएह नौकरी पंथक पाकड़ि रहैक.

2

गीताक घरबला छलैक स्वस्थ-बलिष्ठ युवक. मुदा, रहैक निकम्मा. ओतबे रहितैक तँ बड्ड बेस. मुदा, ओ मरतरिया आ पियाक सेहो छल. तेँ, गीता बतर एसगरे कमाकए घर चलबैत छलि. कोरोना कालमे मनरेगामे मटिकट्टीओ केलक. तहिया अनबुमणि सेहो कखनो काल कने-मने काज केलकैक. मुदा, ओकरा काज करबाक हिस्सक नहि रहैक. दिन-दू दिन काज पर गेल आ थस खा कए फेर घरहिमे पड़ल-पड़ल दिन बिता दैक. गीता मनहि मन सोचय, लोक परिवार डेबैत अछि सहारा लेल. जखन अदिनमे घर-परिवार ढहय लगैत छैक, तँ, पति-पत्नी एक दोसराक लेल सोङर बनि परिवार सम्हारि लैत छैक. मुदा, कोकनल काठ ककरा लेल सोङर बनतैक. सोङरक विचारसँ गीताक मन विह्वल भए जाइक. सोचय हमर एतेक टा जिनगी आगू अछि. धियापुतामे केओ रास्ता नहि धेने अछि. हम कतयसँ अपना लेल सोङर आनब, के हमर ढहैत घरक सोङर हएत! किन्तु, केओ ओकर नजरि पर नहि अबैक, ओ सहानुभूतिक संग ककरो अपना दिस अबैत नहि देखैक. तैओ ओ हारि नहि मानय. सोचय हारि मानने जीवन चलत, धियापुताक पालन हेतैक.
तें,जहिया गीता मटिकट्टीमे जाय ओ अपना घरक भानस-भात अहलभोरे निमाहि हमरा ओतय आबय आ हमर काज ख़तम कए आठ बजेसँ पहिनहि आपस जा मटिकट्टीमे लागि जाय.
कहुना ओ काल-सन ‘कोरोना काल’ कटि गेलैक. सबहक प्राण बचि गेलैक. मुदा, ओहनो प्रलयकालमे घरमे गीताक संग की होइत छलैक, से ओकर मने जनैत छलैक. यद्यपि, ओ अपन दुर्दशाक गप कहियो ओकर मुहसँ नहि बहरयलैक. आन केओ पुछ्तैक किएक.
मुदा, जहिया कहिओ गीता देह-दुखयबाक, माथ-बाँहि-पीठ दुखयबाक गोटी हमर पत्नीसँ मङैत छलनि, आ से हप्तामे एक-दू बेर होइते छलैक, हमरालोकनिकेँ ओकर घरमे मारि-पीटक अनुमान भइए जाइत छल. एक-दू बेर हमरालोकनि गीताक माथ पर टेटर सेहो देखने रहियैक. मुदा, ओकर खोदबेध कियैक करबैक. तखन घरक कलह आ मारि-गारिसँ बचबाक हेतु गीता ओतयसँ बहरयबाक कोनो बाट तकैत छल, वा नहि तकैत छल से ओकर मने जनतैक.
माउगिक हेतु पतिसँ मारि खाएबसँ पैघ कोनो लाज नहि. ईहो बलात्कारसँ कम नहि. शरीर आ मन पर चोट तँ दुनूमे पहुँचिते छैक. पतिक हाथेँ मारि खाइत माउगि धियापुता आ समाज दुनूक सोझाँ अपमानित होइछ.

3

गीता ओम्हर बेटीकेँ ल’ कए अस्पताल विदा भेल, एम्हर अनबुमणिक दोस्त-मित्र सब अङनामे आबि धमकलैक. घरे पर घर, सब कान पथनहि रहैत छलैक. संगी-साथी ओकरा हुथय लगलैक: ‘तोरा अक्किल छौक! परसू एहि लड़िकी विवाह होइतैक, आ आइ तों कपार फ़ोड़ि देलही!!’

दोसर कहलकैक: ‘आब जे भेलैक से भेलैक. कम-सँ-कम अस्पताल तँ अपना संगे ल’ जैतें.’
‘बड्ड बढ़िया! तों तँ तेहन शिक्षा दैत छहिक जे अनबुमणि सोझे हवालातहि चल जाइत. हमरा संगे जे भेल छल, से कि हमरा बिसरल अछि: जहाँ डाक्टर पुलिस केस बनबैत छैक, इंस्पेक्टर सोझे आओत आ बस ! पुलिस तँ टक लगौनहि रहैए!’ कहि कए केओ तेसर चुप भए गेल.
हवालातक नाम सुनिते अनबुमणिक कान ठाढ़ भए गेलैक. हवालात ओकरा रेहले-खेहल छलैके. मुदा, केओ आन डर देखौतैक! ओकरा आनि लागि गेलैक. सोचलक, बेटी हमर आ ई सब हमरे टिटकारैए! ओ सोझे उठि कए ठाढ़ भए गेल, आ कहनिहारक गरदनि पर हाथ देलकैक आ कहलकैक: ‘निकल हमर अङनासँ! नहि तँ कोनो दशा बाँकी नहि रखबौ!! परिवार हमर आ हमरे बिटगरहा पढ़बैए’ कहैत, अनबुमणि ओकरा नौ ढाकी फज्झति कए देलकैक.
अनबुमणिक दोस्त सबमे ओकरे समाजक लोक रहैक. मुदा, सब ने ओकरे सन नहि छल आ ने सब ओकरासँ डेराइते रहैक. कण्णन टेलीफ़ोन विभागमे लाइन-मैन छल. दुनूक अङनासँ सटले रहैक. ओ अनबुमणिकेँ पकड़ि कए कात कए देलकैक आ कहलकैक: ‘तों बड़का पहलवान छें. मानल. मुदा, तोरा गोपाल कोनो बेजाय कहलकौ-ए. आब नीक-जकाँ सुन. आ इहो सुन जे जखन सब बात कलकुशल भए सुनबिही तँ पैन्टहिमे लग्घी भ’ जेतहु.’
कण्णनक गप सुनि अनबुमणि साकांछ भेल. अनबुमणिकेँ साकांछ देखि, कण्णन कहब शुरू केलकैक: ‘आब सुन. एक तँ वियाह ले’ तैयार बेटीक कपार फोड़ि देलही. दू टा अपराध- मौगी पर हाथ उठायब, सेहो दारू पीबि कए. जमानत तँ बिसरिए जो. सजाए बुझैत छही? जँ सजाए भेलौक, तँ कोन ठेकान सहजहि पाँच साल धरि घर परिवारक कोनो चिन्तो नहि रहतौ. सेहो तोरा ले ठीके हेतौक. बैसल ठाम खाइत रहिहें.’
कण्णन गप सूनि गोपाल टोनलकैक: ‘तों अनबुमणिकेँ डर देखबै छही. जकरा अपने पीठ पर नगाड़ा बजैत रहैत छैक, ताहि ऊँटक आगू तों सूप डेङबै छें!’

‘किएक ने!’ अनबुमणिक माय अङना पैसिते कहलकैक ‘आइ धरि गीताकेँ तँ भोर-साँझ डेङबिते छले, आइ समर्थि बेटिओक कपार फ़ोड़ि उतकिरना केलक!’
‘सएह तँ. हमरालोकनि बुझाकए थाकि गेलियैक. ओ तँ गीते थिक जे एतेक सहैए आ एकरा घरमे रखने अछि. एकरा कतेक बेर बुझौलिऐक: गीताकेँ नीक-जकाँ राख. एतुका एस.पी. लेडी छैक. जँ कहिओ गीताक मगज फिरि गेलैक आ ओ थाना-पुलिसमे शिकायत कए देलकौक , तँ फेर अपने बुझिहें.’ कहैत कण्णन चुप भए गेल.

अनबुमणिक माएक अयलाक बाद सब सहटि गेल आ अपन-अपन रास्ता धेलक. भेलैक जे आब माए-बेटाकेँ जे फुरैक, करओ. मुदा, अनबुमणिक माए सेहो आयल आ फेर अङनासँ बहरा गेल.                      

4

पछिले बर्खक गप तँ छिऐक, हम दुपहरियामे अस्पतालसँ अबैत रही. गोड़ दसेक माउगिसब सड़कक कातमे घोदामाली भेल बैसलि जोर-जोरसँ गप करैत छलि. भीड़मे गीताक माए अंजली सेहो रहैक. हम जखन अंजलीकेँ आँचरसँ नोर पोछैत देखलिऐक, तँ, एतबा तँ बुझबामे आबिए गेल छल, कोनो बड़का दुर्घटना भेलैए. हमरा जल्दी छल. ताहू पर ओकरा सभक गप सुनबाक हमरा फुरसति नहि छल. आधा घंटाक लंच-ब्रेक, ताहिमे आयब भोजन करब आ आपस जायब. हम सोझे आगू बढ़ैत डेरा आबि गेल रही. पछाति, बुझलिऐक जे पछिला दिन गीताक देओर, मुरुगन देहमे आगि लगा मरि गेल रहैक. एहन दुर्घटना पर हमरा कोनो आश्चर्य नहि भेल छल. तमिलनाडु-पांडिचेरीमे शराबक बिक्रीकेँ एक तरहें सरकारे बढ़ावा दैत छैक. शराबक बिक्री पर राज्य सरकारक एकाधिकार सेहो छैक. शराबक बिक्री सरकारक आमदनीक एक प्रमुख श्रोत थिक. सरकार एहि आमदनीक उपयोग राज्यक लेल करैत अछि. तखन शराबक जतेक बिक्री, सरकारकें ओतेक नफ़ा. फलतः, एहि राज्य सबमें दारू-शराबक सेवनक दुष्प्रभावक रोग मज़दूर वर्गक बीच एक बड़का सामाजिक समस्या थिक. एहि इलाकामे मद्यसेवनक कारण आत्महत्याक संख्या आन राज्य सबसँ सेहो बहुत अधिक छैक. मुदा, तेँ कि सरकार विकासक काज  छोड़ि देतैक!

एहि व्यवस्थाक फल ई छैक जे भोरे दस बजे शराबक दोकान खुजबासँ पहिनहि एतय शराबक दोकान सबहक काउन्टरक आगाँ गहाकि सबहक पतिआनी लागि जाइत छैक. हमरा लेल ई नव अनुभव छल. एकदिन हम एक परिचित, श्रीराम कृष्णमूर्तिकेँ पुछने रहियनि: ‘एतय एतेक लोक प्रतिवर्ष शराबक दुष्प्रभावसँ मरैत अछि, आ सरकारकेँ कोनो उपाय नहि सुझैत छैक?’ श्रीराम कृष्णमूर्ति शिक्षक रहथि. ओ समीपहिक गाममे एक मध्य विद्यालयमे पढ़बैत रहथि.
हमर गप्प सूनि कृष्णमूर्ति भभाकए हँसय लागल रहथि आ ओ उत्तरमे  तिरुवल्लुवरक एक कुरल (दोहा) पढ़ने रहथि जकर भाव ई छलैक जे नशाबाज आ तर्क! ई तँ पानिमे डूबल मनुखकेँ तकबाक लेल हाथमे दीप ल’ कए पानिमे डुबकी लगायब भेल!
हमरा हँसी लागि गेल. हँसी रोकैत हम कहलियनि, ‘से तँ बेस. मुदा, सरकार?’
कृष्णमूर्ति पुनः हँसय लगलाह. कहलनि, ‘दुनूमे कोनो अंतर छैक ? से रहितैक तँ सरकार शराब बेचिकय विकासमे निवेश करितैक. कहिऔक ने, इनारेमे भाङ घोरल छैक.’ हम बात बूझि गेलियैक.
ताहि बातकेँ बरख दिनसँ बेसी भए गेल रहैक.

5

नन्दिनी गीताक संगहि अस्पतालसँ आपस आयल. डाक्टर टाँका लगाकए घाव सीबि देलकैक. शुकुर रहैक, माथमे तेहन चोट नहि रहैक. गीताकेँ एक मोन भेलैक सोझे अस्पतालक स्टाफ क्वार्टरमे चल जाय आ काज खतमे कए घर आपस आबय. मुदा, फेर ओकरा की फुरलैक की ने, ओकरा भेलैक जे नन्दिनीकेँ अपनहि संग डेरा तँ पहुँचा दियैक. काजमे  करबाक देरी तँ पहिनहि भइए गेले.

अङना पहुँचल तँ अङना सुन्न मसान रहैक. अङना सुन्न देखि गीतक पिल्ही चमकलैक. कतय गेल अनबुमणि? फेर भेलैक, कतहु गेल हएत, जाओ. रहिए कए कोन पहाड़ तोड़ैत. ठीक छैक, पहिने नन्दिनीकेँ किछु खोआ कए अपनहि हाथें दवाई खोआ दियैक, आ हबर-हबर दुपहरियाक भोजनक किछु व्यवस्था सेहो कइए ली, तखन भागि कए काज पर जाएब. ओ ओसरा पर चढ़ल तँ घरक केबाड़क दुनू पट्टा बंद रहैक. केबाड़ बंद देखि एकरा किछु बुझबामे नहि एलैक. भेलैक जे की जानि केबाड़  भिड़ाकए अनबुमणि कतहु भीतर-बाहर गेल होअय, वा सुतले होअय. दिन भरि सूतब तँ ओकर सोहागे भाग छियैक. ओ केबाड़ ठेलकैक. केबाड़ भीतरसँ बन्न रहैक. छन भरिमे गीताक सौंसे देह पसेनासँ भीजि गेलैक. ओ जोर-जोरसँ अनबुमणिक नाम धए चिकरय लागल. कोनो उत्र नहि. तखन दुनू माए-बेटी केबाड़मे जोरसँ केबाड़मे धक्का देलकैक. मुदा, केबाड़ किएक खुजतैक! गीताक चिकरब सुनि लगपासमे जे केओ रहैक, दौड़ल एलैक. केबाड़ तोड़ल गेल. सत्ये, ओतुका दृश्यपर ककरो विश्वास नहि भेलैक: अनबुमणि लाश घरक धरनिसँ लटकल रहैक. निष्प्राण! देखिते गीता ठामहि बैसि गेल.

6

ओहि दिन हम अस्पतालसँ आपस अयलहुँ-ए तँ सौंसे कॉलोनीमे आयालोकनिक बीच घोल-फचाक्का; गीताक पति फाँसी लगा लेलकैक! बरख भरिक भीतरे दू सहोदर भाईक आत्महत्या. एक देहमे आगि लागौलक. दोसर फाँसी पर लटकि गेल. दुनू एक रोगक रोगी: तन्नी- शराबक लति। 
हमर सुनि मन क्षुब्ध भए गेल. अस्पताल पहुँचि हम अपन सहयोगीलोकनिकेँ पुछलियनि. सब केओ कहलनि, जे गीताक ओतय जा कए जिज्ञासा करिऐक आ किछु सहायता सेहो.
दुर्घटनाक चारिम दिन हम गीताक ओतय गेलहुँ. गीता मेडिकल कालेज अस्पताल परिसरक छहरदेवालीसँ किछुए दूर पर रहैत छलि. सुन्न-मसान अङनामे गीता एसगरि बैसलि छलि. निःशब्द. चेहरा पर कोनो भाव नहि. हमरा अबैत देखि उठि कए ठाढ़ भेलि. नहि जानि ओकर मनमे की-की होइत रहैक. ओ अनाथ भेल छलि वा मुक्त, कहब कठिन.

बेटी नन्दिनी लगक कोनो छोट प्राइवेट अस्पतालमे हाउसकीपिंग वा नर्सक सहायकमे काज करैत रहैक. जखन हम ओतय गेल रही, नन्दिनी घरक भीतर किछु करैत छलि. दू दिनक बाद ओकर विवाह होइतैक. मुदा, आब एहन परिस्थितिमे कहिया विवाह हेतैक, कहब कठिन.

गीताक बेटा दू भाई-बहिनिमे छोट. बेटी  आइ ने काल्हि अपन घर जइतैक. गीता बेटा पर आस लगौने छलि. गीता बेटाकेँ हम अङनामे नहि देखलिऐक. हम दू मिनट बीच अङनामे ठाढ़ भेलहुँ. एहन विकट परिस्थितिमे हमरा मुँहसँ हठे किछु बहराइत नहि अछि. की कहितिऐक? जाहि परिस्थितिमे गीता फँसल छलि, सांत्वनाक कोन स्वर स्वाभाविक लगितैक. पतिक हाथें निरंतर प्रताड़ना सहैत नारिक हेतु पतिक मृत्यु ओकरा हेतु मुक्ति थिकैक वा वज्रपात. वा दुनू ? हम किछु निश्चित नहि कहि सकैत छी.
हमरा जे किछु उचित बूझि पड़ल छल, किछु टाका एक लिफाफामे दए लए गेल रही. जेबीसँ लिफ़ाफ़ निकालि हम गीताक हाथमे दए देलिऐक आ सोझे पर डेरा आपस आबि गेलहुँ.

करीब अगिला  पन्द्रह दिन गीता काज पर नहि आयल. मुदा, काज पर अयबे करत हमरा ताहिमे कोनो शंका नहि छल. नोकरीक बिना परिवारक गुजर कोना होइतैक. अनबुमणिक मृत्युक सोलहम दिनसँ ओ काज पर आपस आबय लागल.
हमरालोकनिकेँ हरदम होअय, गीताक बेटी भले विवाह योग्य होइक, गीताक अपनो वयस तँ चालीससँ बेसी नहिए हेतैक. तखनि जँ ओकरहु एकटा नीक पुरुख भेटि जइतैक, तँ.... तेँ, होअय कोन ठेकान गीता कहियो आबि किछु नव गप हमर पत्नीकेँ कहतनि. मुदा, आगू की होइतैक के कहत! 
मुदा, गीता कहिओ अपना दए हमरा सबहक सोझाँ किछु चर्चा नहि केलक. अपन अनुभव, आ समाजक मनुखक आँखि खोलि दैत छैक. ओकरो जीवन कटु अनुभव छलैके।

अनबुमणिक मृत्युक करीब छौ महिनाक भितरे एक दिन दुपहरियामे घंटी बाजल. हमर पत्नी केबाड़ खोललखिन. गीता छलि. ई गीताक अयबाक समय नहि रहैक. आश्चर्य भेलनि. देखलखिन गीताक हाथमे एकटा स्टीलक थारी रहैक. थारीमे एकटा नारिकेर, पाँच गोट पानक पात, एक गद्दी सिनुर आ ऊपर एकटा कार्ड. चेहरा पर क्षीण मुसुकी. कोनो नीक समाचार आशासँ हिनको चेहरा चमकलनि. ई आगू बढ़ि  गीताक लग गेलखिन, आब भीतर आबय कहलखिन. गीता ओतहि ठाढ़ि रहल। ओकर चेहरा हर्ष आ आश्वस्तिक मुसुकी पसरि गेलैक. कहलकनि, लड़काबलाकेँ बड्ड अगुताई रहैक. कहलकैए, नन्दिनीकेँ नर्सिंगमे पढ़बाक लेल कालेजमे जल्दिए नाम लिखौतैक. अगिला पूर्णिमा दिन कल्याणम् (विवाह) छैक. अहाँ दुनू गोटे अयबैक अवश्य. हमर पत्नी कार्ड राखि लेलखिन. एतबा तँ बुझबामे आबिए गेलनि गीता कोकनल सोङर टुटनहु गीताक घर ठाढ़े छैक आ सबकेँ सम्हारि लेलकए. पछाति अपना हेतु ओ जहिया जे सोचय.

कहलकनि, एखन एही कॉलनीमे आओर दू-तीन घर कार्ड देबाक अछि। आ ओ धड़धड़ाइते तेसर महलसँ नीचा उतरैत आपस चलि गेलि.                                                       

 


Saturday, March 21, 2026

किएक?


सूर्योदय 

समस्त जीव जगत केर जीवनक आधार

अजस्र ऊर्जाक अक्षय भंडार

सुदूर अंतरिक्ष निवासी निरंतर गतिमान 

अहाँक अप्रतिम आभासँ होइछ इजोत

तथापि, किएक रहि जाइछ?

अहंकारी मनुखक हृदयक 

कतेक कोन वज्र अन्हार,

जे ओ शान्ति-सुरक्षाक नाम पर

करैत अछि एतेक नरसंहार 

दैछ इसकुलिया नेनाक बलि,

दूषित करैछ, जल, वायु, पृथ्वी

आ सब किछु,

जे थिक,

मानवताक अस्तित्वक आधार।

Friday, February 20, 2026

पाठकीय प्रतिक्रिया: प्रयोगशालाक जीवन

 

पाठकीय प्रतिक्रिया

प्रयोगशालाक जीवन
(राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चक संग किछु आत्मचर्चा)

2005 ई. मे प्रकाशित ‘पसरैत वृत्त: सँकुचैत बिन्दु’ नामक एक आलेखमे पण्डित गोविंद झा लिखने रहथि:
‘देखल जाइत अछि जे मैथिली मे केवल मध्यम स्तरक लोक कलम उठबैत अएलाह अछि. उच्च स्तरक प्रतिभा मिथिलासँ आ मैथिलीसँ पड़ाइत रहल अछि.......................................वर्त्तमान दशक मे मैथिलीक प्रतिष्ठा बढ़लैक अछि आ उच्च स्तरहुक  लोक मैथिली मे कलम उठबय लगलाह अछि.’
गोविन्द बाबूक ई उक्ति एक कथा संग्रह समीक्षामे लिखल गेल छल. मुदा,जँ उपन्यास-कथा-कविता आदिक विधासँ भिन्न विधाक गप करी तँ हेबनि धरि स्थिति उत्साहजनक नहि रहैक. तें, एहि स्थितिक चर्चा हमहू अपन ब्लॉग ‘मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक’ केने रही. मुदा, नाभिकीय भौतिकी(Nuclear Physics)क सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगीक विपुल लोकप्रिय विज्ञान लेखन (writings on Popular Science)एकर अपवाद थिक. कोलकातासँ प्रकाशित (आब बंद भेल) ‘मिथिला दर्शन’क पाठक मे विरले केओ हेताह जे डाक्टर पाठकक विज्ञान संबंधी विस्तृत प्रमाणिक लेख सबसँ अपरिचित हेताह. स्मरणीय थिक, ओहि लेख सबहक संकलन डाक्टर वियोगी जी ‘विज्ञानक बतकही’ नामक पोथीक भाग 1,2 एवं 3मे प्रकाशित भेल अछि.गत वर्ष, 2025 मे डाक्टर वियोगीक नव पोथी ‘प्रयोगशालाक जीवन’ प्रकाशित भेल अछि. प्रस्तुत लेखमे एही पोथीक चर्चा अछि.
डाक्टर वियोगी एहि पोथीकेँ ‘राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चाक संग किछु आत्मचर्चा’ कहैत छथि. अछियो ई सएह. मुदा, एहि पोथीमे अधिकतर एहन विषयक चर्चा छैक जे अंग्रेजी भाषाक वैज्ञानिक संस्मरणमे तँ भेटत, मुदा, मैथिलीमे हमरा देखबामे नहि आयल अछि.
‘प्रयोगशालाक जीवन’ करीब सवा दू सौ पृष्ठकेँ पाठक विषयक संदर्भक दृष्टिसँ तीन भागमे बाँटि सकैत छथि: पहिल भाग- पोथी पहिल पचास पृष्ठ- मे लेखकक बाल्यकालसँ ल’ कए प्रयोगशालाक जीवनमे प्रवेशसँ पूर्वक जीवनक चर्चा अछि. ई खण्ड भारतक स्वतंत्रतासँ ल’ कए साठिक दशककक अंत आ सत्तरिक दशकक आरंभ धरिक कालखण्डकेँ धङैत, ओहि समयक मिथिलाक सामाजिक आ शैक्षणिक जीवन पर संक्षिप्त, किन्तु, वस्तुनिष्ठ रूपेँ प्रकाश दैछ. पोथीक एहि खण्डमे लेखकक आन ठाम प्रकाशित एहन अओरो लेख सबहक संदर्भ भेटत जे पहिने हुनक भिन्न-भिन्न पोथीमे प्रकाशित भेल अछि, एवं प्रशंसित भेल अछि.
ज्ञातव्य अछि, विगत शताब्दीक पचासक दशक मिथिलामे विपन्नताक काल छल. तहिया मेहनती आ महत्वाकांक्षी छात्रसबकेँ केवल शिक्षासँ उन्नतिक आस छलैक. फलतः, अनेक गाममे समाज, शिक्षक आ छात्रक संकल्पसँ उत्कृष्ट परिणाम देखबामे अबैत छलैक. अजुका मधुबनी जिलाक मधेपुर गामक जवाहर उच्च विद्यालय शिक्षाक एहने केन्द्र छल जतयसँ डाक्टर वियोगीसँ पूर्व, वैज्ञानिक शचीनाथ झा, शिक्षाविद् डाक्टर लक्ष्मण झा एवं डाक्टर ब्रजकिशोर वर्मा सदृश मूर्धन्य साहित्यकार बहरायल छलाह. अस्तु, एहि पुस्तकमे ओहि युगक ग्रामीण जीवन अतिरिक्त स्कूली जीवनक संक्षिप्त वर्णन सेहो भेटत.
स्मरणीय थिक, अगिला दशक, साठिक दशक, सेहो बिहारमे विषम काल छल. साठिक दशकमे राजनेता लोकनिक अदूरदर्शिता आ महत्वाकांक्षा शिक्षाक अवनति जनक प्रमाणित भेल. तहिया ओलोकनि शिक्षाक क्षेत्रमे एहन बबूरबोनी  लगबैत गेलाह,जे शीघ्रे शिक्षण आ परीक्षा व्यवस्थाकेँ अस्तव्यस्त तँ कइए देलक, ओकर दुष्प्रभावसँ  बिहारक शिक्षा व्यवस्था आइओ धरि उबरि नहि सकल अछि. ‘प्रयोगशालाक जीवन’मे विश्वविद्यालयक जीवनक ओहि दुखद युगक एहन झाँकी भेटत, जाहिमे शिक्षाक अवनतिए टाक नहि, प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानक प्रति शिक्षक लोकनि अभिज्ञता आ उदासीनता छात्रक भविष्यकेँ कोना प्रभावित करैत छल, तकरो चर्चा अछि.
लेखकक प्रयोगशालाक जीवनक आख्यानक आरंभ वस्तुतः पोथीक अगिला भागमे तेसर अध्यायसँ होइछ, जखन लेखक अगस्त 1971मे भाभा नाभिकीय अनुसन्धान केन्द्र (
BARC), मे प्रशिक्षु वैज्ञानिक (Trainee scientist) रूपमे योगदान केलनि. ट्रेनिंग समाप्तिक पछाति लेखक भारतमे विज्ञानक स्वदेशीकरण अभियानक अंतर्गत कलकत्तामे प्रस्तावित VEC Project (Variable Energy Cyclotron Project) क निर्माणक संग जुड़लाह. वैज्ञानिक जीवनक आगूक यात्रा, शिक्षा, अनुसन्धान आ नव उपकरण एवं सॉफ्टवेयरक निर्माण एवं वैज्ञानिक आविष्कारक चुनौतीपूर्ण जीवन छल. ई यात्रा मुम्बई (तत्कालीन बंबई)सँ आरंभ होइत, हुनका अमेरिकाक लौरेन्स बर्कले राष्ट्रीय लेबोरेटरी, कैलिफोर्निया तथा फ्रान्सक गैनिल (प्रयोगशाला) होइत अंततः अगिला तीन दशकमे  स्विट्ज़रलैंड स्थित एल एच सी (Large Hydron Collider) धरि लए केवल लइए टा नहि गेलनि, बल्कि एहि दीर्घ अवधिमे हुनका विश्वभरिक अनेक विख्यात वैज्ञानिक सबहक संग काज करबाक अवसर देलकनि. ओहि अवधिमे ई भौतिकीक अनेक मूलभूत वैज्ञानिक अनुसन्धानक अतिरिक्त ब्रह्माण्डक उत्पत्ति सम्बन्धी अनुसन्धानक दुनू चरणक प्रयोगमे सहभागी भेलाह एवं अविष्कारमे योगदान एवं नेतृत्वक अवसर भेटलनि. जर्मनीक ‘हेमहोज हम्बोल्ट रिसर्च अवार्ड’ एवं ‘ब्रेकथ्रू लौरिएट’ सदृश प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारसँ सम्मान विज्ञानमे हिनक योगदानेक परिणाम थिक. अपन कार्य कालमे ई अनेक राष्ट्र्रीय योजना सबमे महवपूर्ण योगदान केलनि, जाहिमे छोट ग्रुपक स्तरसँ पैघ-सँ-पैघ विज्ञान आ पैघसँ पैघ सहयोग (mega collaboration) सँ संचालित वैज्ञानिक प्रयोगमे सहभागिता आ नेतृत्वक अवसर भेटलनि. एहि सबहक वर्णनक किछु अंश आम रूचिसँ बाहरक विषय थिक, तें, लेखक स्वयं एहि पोथीक किछु अंशकेँ तारांकित कए ओहि अंशकेँ बीछि-बेराकए पढ़बाक सुझाव देने छथि. मुदा, विज्ञानमे रूचि रखनिहार पाठक, आ छोट एवं पैघ स्तरक मूलभूत वैज्ञानिक प्रयोगक भीतरक गतिविधि आ समस्यामे रूचि रखनिहार विद्यार्थीक हेतु पोथीक एहि अंशमे आयल अनेक रोचक संस्मरण आ घटनाक चर्चा एहि पोथीक विशेष आकर्षण थिक. ओना एहि पोथीमे जाहि अनेक विषयक वैज्ञानिक पक्षक विस्तार वर्णन भेल अछि, ओकर सबहक रोचक संस्मरण 2014 मे प्रकाशित हिनक पोथी ‘किछु तीत मधुर’ मे सेहो भेल अछि.

पोथीक तेसर अंश, अंतिम तीन अध्यायमे लेखक प्रयोगशालाक जीवन पछातिक अनुभवक चर्चा कयने छथि. ओहि अवधिमे , स्थापक निदेशकक रूपमे ई भारत सरकारक परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) क अंतर्गत भुवनेश्वरमे नाइसर (NICER)-[National Institute of Science Education and Research]- क स्थापना केलनि. राष्ट्रीय स्तरक नव संस्थाक स्थापनामे अनेक प्रकारक प्रशासनिक चुनौती अबैत छैक; केन्द्र आ राज्य सरकारक अनेक स्तरसँ तालमेल बैसाबए पड़ैत छैक, एवं संस्थाक प्रमुखकेँअनेक आकस्मिक परिस्थितिसँ निबटय पड़ैत छैक. ‘भुवनेश्वरक प्रवास आ नाइसरक स्थापना’ नामक अध्यायमे ओहि सबहक  रोचक वृत्तांत भेटत.
नवम अध्याय- भारत-आधारित न्यूट्रिनो वेधशालाक सपना- मे न्यूट्रिनो वेधशालाक प्रोजेक्ट एवं राजनैतिक कारणसँ ओहि योजनाक अकालमृत्युक घटनाक चर्चा कयल गेल छैक. एहि वर्णनसँ ई देखल जा सकैछ, जे समाजमे पसारल भ्रान्ति कोना महत्वाकांक्षी अन्तर्राष्ट्रीय योजनाक भ्रूण ह्त्या कए दैछ.
अंतिम अध्यायमे लेखक ग्रामीण इलाकाक अपन आवासीय परिसरमे प्रयोगशाला खोलि कोना जिज्ञासु छात्र लोकनिक मार्गदर्शन करैत रहथि, तकर संक्षिप्त वर्णन अछि. ओहि प्रयोगशालाक माध्यमसँ लेखक अनेक मेधावी छात्रक मार्गदर्शन कयलनि. हिनक मार्गदर्शनसँ अनेक छात्र लाभान्वित आ विभिन्न क्षेत्रमे सफल भेलाह. छात्रलोकनिक सफलता हिनक व्यक्तिगत प्रयोगशालाक योगदानक सफल परिणामक प्रमाण थिक. 

सारांशमे ‘प्रयोगशालाक जीवन’, सरल बोधगम्य भाषामे लिखल मैथिलीक पहिल एहन पोथी थिक, जाहिमे स्थानीयसँ राष्ट्रीय, छोटसँ विशाल, तथा बेसिकसँ विराट् विज्ञानक क्षेत्रक अनुसन्धानक विहंगम दृश्य प्रस्तुत भेल अछि. एहि पोथीक केवल स्वागते टा नहि हेबाक चाही, ई पढ़ल जेबाक चाही. मैथिलीमे अपना तरहक ई पहिले पोथी थिक. लेखक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी एहि प्रकाशनक हेतु साधुवादक पात्र छथि.

संदर्भ:

1.झा, गोविन्द. पसरैत वृत्त: सँकुचैत बिन्दु, कर्णामृत, कोलकाता, 2005.

2. झा, कीर्तिनाथ. मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक. https://kirtinath.blogspot.com/2023/09/blog-post.html accessed 20 Feb 2026.  

प्रयोगशालाक जीवन
(राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजक चर्चाक संग किछु आत्मचर्चा)
लेखक डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी
प्रकाशक:
pothi.com प्रथम संस्करण 2025
पृष्ठ संख्या :224; मूल्य रु.400
प्रप्तिस्थान: प्रिंट एवं ई-बुक

https://pothi.com                        

Wednesday, January 21, 2026

फकड़ा संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी

                                                                             फकड़ा

संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी



पाण्डुलिपिक एक पृष्ठक छायाप्रति 

पण्डित काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क अनुसारें ‘फकड़ा काव्यक एक प्रकार आ लोक-साहित्यक प्रमुख अंग’  एवं ‘आडम्बरहीना, निर्मल हृदया, सत्यमयी,बाट-घाट, जंगल-झाड़ आदि प्रकृतिक विशाल क्षेत्रक अनुभवसँ भरलि मुनि-कन्या थिक’।1 हुनक कहब छनि, ‘पण्डितक काव्य पाँच प्रतिशत लोकक चित्र दैछ त’ फकड़ा पनचानवे प्रतिशत लोकक’। अस्तु, स्वयं किरण जी करीब ‘सय छबेक (फकड़ा) संग्रह’ कयने रहथि. मुदा, ओ संकलन अनुपलब्ध अछि. किन्तु, अक्टूबर १९६१ केर ‘वैदेही’ पत्रिकामे प्रकाशित हुनक ‘फकड़ा’ नामक लंबा लेखमे ओहि संकलनसँ करीब सत्तरि-पचहत्तरि टा फकड़ा उद्धृत छैक. किछु फकड़ा हुनक कृतिमे आनो ठाम यत्र-तत्र छिड़ियायल सेहो भेटत. लोक साहित्यक संकलन कयनिहारक कृतिमे आनहु ठाम फकड़ा भेटबे करत.
एतय प्रस्तुत अछि, हमर माता, स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा जीवनक नवम दशकमे टिपल किछु फकड़ा आ एक आध टा गीत जकर हमरा जनैत समाजशास्त्रीय महत्व छैक. स्मरणीय थिक, स्व. बिन्देश्वरी देवी पं. काशीनाथ झा काव्यतीर्थ एवं किरणजीक छोटि बहिनि रहथि जनिक मृत्यु ०६ अगस्त २००३ क भए गेलनि. हुनक हाथें संकलित फकड़ा आ गीतक चारि-पाँच पृष्ठ जे हमरा हुनक मृत्युक बाद घरमे भेटल  अछि सएह एतय प्रस्तुत अछि.        

फकड़ा

1
आबेसे केलौं खेती दुलारे भेल बेटी
छोडू सैंया खेती खेलाउ हमर बेटी
2
लाड़ करू सैंआ तोरा पर
पोटा पोछू तोरा मोछा पर
3
एके बाँस बसेला, कोइ चालनि कोइ पैला
4
उखरिमे धान त ककबा आन
5
पलङ्ग पर चिलका रोबैए
मनसा सुतल मौगी ठहकैए
6
वरक मुहमे जाल त बरिआतीक कोन हाल
7
कनियाके आँखिमे नोरे ने लोकनिया भोकारि मारैए
8
बाहरक ठीक ठाक देख रे नौआ
भीतरी महलमे हगै छै कौआ
9
कुकुर कौआ भंडारी त घरमे गुहे गुहटार
10
घरमे पकैए कुरथीक रोटी / बाहर सुखाइए जोड़ धोती
11
बाप के गरा घोंघा/ बेटा के गरा रुद्राक्ष
12
थोड़ कनै छी बाबा ले ? बहुत कनै छी टाका ले
13
आँखिमे नोर त / दाँत निपोड़

14
घरमे टाट नै देहरिमे सरकी
मुहमे नाक नै कानमे तड़की
15
अन्हराकए गाय बिएलै / चालनिमे दुहै जो
16
वरक माय निरधोंछी सांठल नै चतुर्थी
कनियाक माय न(नौ) लगरा
हुनको बेटाके नै देबनि कोजगरा
17
अबिते एली चुल्ही फुटौली (नि)
 अरिपन पोछि क लिटी लगौलनि
18
अपन गाम भम्ह पड़ए/ पाही पट्टी नोत पड़ए
गाम नोते ने बेलाही नोत पड़ए
19
मुखसुद्धिक नै वेवहार/ अड़िआतैक बड़ चमत्कार
20
नवक धन भेल त बेङ्ग महाजन भेल
21
सब गेल हाट धान के  कूटत
सब दंतरंगा चुल्हि के फुकत
22
मैगर ने बपगर ठेसगर बड़/ नोनगर ने तेलगर चहटगर बड़
23
माय बहु रहै नै, जेठकी बहु / चुमाबे नै त कोना बने
24
किए धोबिनिया बाढ़ि, किए तेलिनिया घाटि
ओ लेतै मुङरी, हम लेब जाठि
25
बेटिया स बुढ़िया भेलौ सोनसन पाकल केस
एहेन चरित्र कहिओ नै देखलौ जे गोइठा एल सनेस
26
चालनि दुसलनि बाढ़निके जिनका अपन सहस्र टा छेद
27
जे बाजय से बड़ बजन्ता जे नै बाजै से गोंग
जे खाय से बड़ खाधुर जे नै खाय से सोम
28
जावे पांडे दोना लगौता तावे पंडीआनि सुरुकि बैसती
29
खोना बेटा खेलनि पान
माय हसथिन बहु होथि झमान
30
वरक जैतुक जखने देखलौ कनिआक नाम निरासी
31
वर कनिया कए भेटे ने ओठङर ले मारि



32
निरलज के नै लाज नै अपमान
सहन कथा एक मरन समान

33  
वरक बरनन कते करब वर एक नजरी
कनियाक बरनन कते करब कनिया गरमे गगरी
34
वर बीसे बीसे बीस
बर ताकथि एके दिस
35
बड़े-बड़े के  लाइ ने
लड़िकन के मिठाई
36
बाबरीवला वर करबै कोठावला घर
लगेमे पैखाना आँगनेमे कल

37  
सैंया दर रे देवानी बहु छुछुनरि रानी
सैंया नित नहाथि बहु ढकनेमे खाथि
38  
मर जाइ त रासि गाबी
देह दशा अछि पूरा मुहसँ उड़ैए धुरा
39  
अंधे देखलनि बड़ियारक गाछ
त कहलनि जे लंका इएह छिऐ
40  
जैसाके तैसा मिले, मिले चोंच मे चोंच
दाढ़ीमे दाढ़ी मिले, मेले मोंछ मे मोंछ
41  
पेट जरैए त मलार गबै छी

42   
पेट कहकह करए जुड़ा महमह करए
42

त’र कान तड़की ऊपर कान खुटी
दांत मिसी कोचा सीटी
तखन चिन्हबनि जे कटकाक छिका
43      
छटाक भरि सोन तकर कने छनगर कने फनगर
कने सोतिआम तखन ने धिआ जेती सोतिआम
43  
एहन चुड़ा कूटब जे धान बिछि कए खाएब
एहन नैहर जे अपने जायब
44
आन्हर गुरु बहिर चेला
माङथि गुड़ त देथि भेला
45

लजैली ने कठेली सवेरे चलि एली



गीत
परम अभाग कपारक लिखल जनिका घरमे फुहरि नारि
मस-मस दिन पर आङन बहारथि बैसथि टाङ्ग पसारि।। परम अभाग ..  
धियापुताके ठोकि सुताबथि अपने बैसथि कोन दाबि
बासन धो के कोनटा फेकथि आङन पड़ि गेल हील
गालमे जे मांड़ी बहकल केसमे पसरल ढील।। परम अभाग..
ओलती झीकि क चुल्हा पजारथि झिकथि कोनटाक बाती
साँझ राति मे दीआ नै बारथि लेसथि दुपहर आ राती।। परम अभाग ..

 

बिकौआ सोति
सुध समै उपगत भेल सखी चमकल फिरे बिकौआ
कम्बल लोटा मोटा बन्हलनि झाड़ी ओ पनबट्टा
किओ बिकौआ धोती सिटै छथि केओ थकड़ै छथि टीक
किओ बिकौआ चानन करै छथि ई सब सुधक रीत
घोड़ा पीठी जे कसल सवारी ताहि पर अपने असवारी
चमकै पाग जड़ीकोर धोती रेसमी केर दोपटा
दुइ चारि जे हर बहै छैन चारि चलै छैन लहना
अहाँक कनिआ हिनक घर जेती तुरन्त गढ़ा देथिन कगना

लगनी
पनिआँ के गेलीऐ हे स्वामी ओही रे जमुनमा रे की
उमतल भैसुरवा बटिआ रोकल रे की
घाट छोडू बाट छोडू उमतल भैसुरवा
कनिए कनिए चुनरी भिजल रे की
भीज दियौ भीज दियौ अपनी चुनरी
हमर दोपटा तोहर पालट रे की
तोहर दोपटा अगियाके धाधर
अपन चुनरी सीतल बसात रे की
जांघ घुन लगिहै बाँहि घुन लगिहै
हे स्वामी तोहरे अछैत भैसुर परेखल रे की
हुअ दे प्रात रे धनी पसराक हटिआ
छुरिआ बेसाहि भैआ जीव हतबै रे की
भैआ जीव हतबै हे स्वामी एसकर हेबै
तिरिआ मुइने तिरी वध लागत रे की ।।

स्व. बिन्देश्वरी देवीके पढ़बाक रूचि रहनि. मुदा, हम जहियासँ देखलियनि, काजक तेहन व्यस्तता रहनि जे कहथिन, ‘होइए दिन राति मे चौबिसे घंटा किएक, पच्चीस-छब्बीस घंटा होइतैक.’ मुदा, करीब अठासी वर्षक जीवनक अंतिम तीस वर्षमे हुनक अधिक समय पूजा-पाठ आ पढ़बामे बितनि. तथापि, हुनका कहियो हमरालोकनि  कथा, कविता वा गीत लिखैत देखने नहि रहियनि. जखनि समय भेटनि मौनी-चङेरी-सितलपाटी बिनथि. अंचार, मुड़ौरी, कुम्हड़ौरी, निमकी बनबथि. मुदा, टोल-पडोसक स्त्रीगण लोकनिक आ अपन चिट्ठीक अतिरिक्त किछु लिखथि नहि. एक बेर करीब 2000 ई. मे, मृत्युसँ दू-अढ़ाई वर्ष पूर्व, एकटा गीत लिखने रहथि. ओ गीत बंगलोर डेरा पर हमरा देखय देने रहथि. मुदा, हम तहिया ध्यान नहि देलिऐक. बादमे ओ किएक भेटत. तथापि, जीवनक अंतिम चरणमे ओ कोन प्रेरणासँ किछु फकड़ा लिखिकए घरमे राखि गेलीह, से कहब असंभव. संयोगवश हालहिमे हमर ममिऔत आ किरणजीक तेसर पुत्र, केशरीनाथ झा  कहलनि, जे ‘बाबू (किरण जी) कहने रहथि जे मझिली पिसिया (स्व. बिन्देश्वरी देवी) हमरा सब भाई बहिनिमे सबसँ बेसी प्रतिभावान रहथि.’ मुदा, आब तकर कोनो महत्व नहि. तथापि, संकलित फकड़ा आ गीतक महत्व भए सकैत छैक.
उपरोक्त फकड़ा सबमे बहुतो एखनो प्रचलन मे छैक. बहुतो आब नहि सुनबैक. किछु फकड़ा आ गीत संकलित उपरोक्त गीतक समाजशास्त्रीय महत्व छैक. तकर विवेचनाक अवश्यकता नहि, कारण, संदर्भ आ उक्ति अपने सब किछु स्पष्ट कए दैछ. एतबा अवश्य जे हमरा आङन वा आन ठाम लगनि सुनबामे आबय किन्तु कहिओ ध्यान नहि देलिऐक. उपरोक्त लगनीमे स्पष्ट छैक जे नारि गीतमे हर्ष-विषादक संग ओकर अपनहि परिवारजनक द्वारा शोषणक व्यथाक वर्णन सेहो रहैत छलैक. मुदा, बहिर समाज सुनिओ कए किछु नहि सुनैत छल.
एकटा गप आओर. स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा संकलित उपरोक्त फकड़ाक वर्तनी ओहिना राखल गेल अछि जेना ओ लिखने रहथिन. हुनक जन्म पण्डित परिवारमे भेल रहनि. मुदा, हुनक औपचारिक शिक्षाक अवसर नहि भेटल रहनि. कहने रहथि, “भाई ( पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थ) जखन भौजी (पत्नी जमुना देवी) कें पढ़बथिन, तँ, लगमे बैसि हम देखैत रहियनि. पछाति, नुनू भाई (किरणजी) कोइला पिसिकए सरबामे मोसि बना देलनि आ कड़चीक कलम बनाक देलनि. ओहीसँ लिखब सिखलहुँ. एगारहम वर्षमे तं एतहि (सासुर) आबि गेलहुँ.”         
  

संदर्भ
झा, काञ्चीनाथ ‘किरण’. फकड़ा. वैदेही अक्टूबर १९६१.   

     

  
      


Wednesday, January 14, 2026

प्रश्न

 प्रश्न 

ऊँची उठती मूर्तियाँ

ठिगने होते लोग

कचरे चुनती कुमुदिनी

नयन भरे हैं नोर।

गली-गली में भक्त हैं

करते अत्याचार

चौराहे पर प्रश्न खड़ा

प्रभु, कब लोगे अवतार ?


Wednesday, January 7, 2026

नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025

 

                                                 नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025 

जंगल, वृक्ष, हरीतिमा आओर नदी केर गीत
यायावर मन हमर, स्वर्गे तँ ई थीक!

एहि बेर 24 दिसंबरक दिन ओ दिन ओ साँझ फेर आयल : हम कावेरीक कछेर पर एसगर बैसल रही. घाट लग बाँसक कमचीसँ बनल नाओ सब रहैक. दू गोट नाविक सब सेहो रहथि. कहैत गेलाह, पंदरह मिनटक नौकायन आ मात्र दू सौ टाका. हमरा समय नहि छल. नहि गेलहुँ. एहि बेर करीब पचीस वर्षक पछाति श्रीरंगापत्तिनम् आयल छी. फेर कहिया आयब, कहब कठिन. हमर अनुभव कहैत अछि, अवसर हठे अबैत नहि छैक.
कावेरीकेँ उद्गमसँ समुद्र धरि टा नहि, हिनका हम लगभग संपूर्ण लंबाई धरि देखने छियनि; कोडागुक तलकावेरीक विन्दु-विन्दु जल प्रपातसँ लए कए श्रीरंगम्, तरंगमवाड़ी-पूम्पूहार धरि. एहि नदीक प्रशस्ति तँ संगम कालसँ शिलापत्तिकारम् – सन महाकाव्यसँ लए कए अनगणित काव्य आ गद्य साहित्यमे लिखल गेल छनि.'शिलापत्तिकारम्' केर हमर मैथिली अनुवाद 'कन्नगीक काड़ाक कथा' मे सेहो कावेरी गीत अछि; ई मूल कावेरी गीतक भावानुवाद थिक:


धवल पुष्प-सन कार्तिक तोहर हे
गतिओ पवन समान,
कारी आँखि पावन मनभावन
रूपक नहि उपमान ।
बूलय मयूर कोइली गाबय

हरिअर आँचर धान,

सबतरि भूमि पानिए पूरित

विपुल अन्न वरदान।

मुदा, एहि बेरुक कावेरी दर्शन विशिष्ट छल. श्रीरंगापत्तिनम् ऐतिहासिक आ पवित्र तीर्थस्थल थिक. ई स्थान धार्मिक भावें टा पवित्र नहि. पवित्र भूमि, पवित्र वायु आ पवित्र जल. ई स्थान एहि सबहक समुच्चय थिक. बहुत दिन बाद आयल छी. बहुत लगसँ, जल-परिपूरित, कल-कल बहैत, हरियर कचोर कावेरीक तट पर वृक्षक सघन छायामे आँखि मूनि बैसबाक क्षण, अनुभूतिक विषय थिक, वर्णन अनावश्यक आ निरर्थक प्रतीत होइछ. एतय कावेरीक स्वच्छ, चंचल धार लग ऊर्जाक स्वतः अनुभूति हमरा लेल स्वाभाविक थिक.

भूमि प्रदूषणसँ कोसी अंचलमे अनेक ठाम भूमिक नीचाक पानि पीबा योग्य नहि छैक, किछु वर्ष पूर्व से देखि मन कोनादन भए गेल छल: सुपौलमे बोतलबंद पानि पीने रही. यमुनाक जल आ वायुक प्रदूषणसँ दिल्लीक जनस्वास्थ्य प्रभावित अछि. किन्तु, श्रीरंगापत्तिनम् एहिसँ मुक्त अछि. दिसंबरक मास, मृदु सुखद रौद. जाड़ तँ एहि क्षेत्रमे होइते नहि छैक. एखन बरखा सेहो नहि.
हम एहि बेर एतय ‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क आयोजक दीपा मिश्रक निमंत्रण पर आयल छी. दीपा मिश्र अपन माता स्व. नीरा मिश्रक बरखी एक अभिनव रीतिऍ- साहित्य संगम आ साहित्यकारकेँ पुरस्कृत कए - मनबैत छथि. एहि प्रकारक बरखीक हम समर्थन करैत छी. दीपा अपन माता आ नारि समुदायक प्रति अत्यन्त भावुक छथि. सम्मेलनक बीच ओ एहि विषयकेँ अनेक प्रकारे अनेक बेर अभिव्यक्त केलनि. अपन भाषणमे दीपा कहलनि, जे ‘माताक मृत्युक पछाति, एसगरिए नदीक कछेर पर बैसलि नदीमे हुनका अपन माताक (प्रतिच्छविक) दर्शन भेल रहनि. अतः पछिला वर्ष ओ माताक बरखी सिप्रा नदीक कछेर पर मनओने रहथि. एहि बेर ई आयोजन कावेरी तट पर केलनि.
दीपा अपन भाषणमे मिथिला, आ अपन परिवारक महिलालोकनिक जीवनक अनेक अनुभव अभिव्यक्त केलनि, जकर विस्तृत व्याख्या, हमरा लगैत अछि ओ अपन कृतिमे लिखनहि हेतीह, आ लिखतीह. उर्जावान, रचनाशील आ मुखर छथि. अपन भाव स्पष्टतः व्यक्त करैत छथि.
हम आ हमर पत्नी रूपम करीब चारि बजे श्रीरंगापत्तिनम् पहुँचल रही. क्रमशः अओरो गोटे- साहित्यकार नीता झा, उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डाक्टर रमानन्द झा ‘रमण’, कथाकार रोमिशा, लेखक-पत्रकार  पंकज मिश्र, दिनेश एवं श्रीमती कल्पना मिश्र अइलीह. बेसी गोटे सपरिवार आयल रहथि. सबसँ भेट भेल. भोजनक पछाति तीन बजे दिनसँ साँझ सात बजे धरि चारि घंटाक कार्यक्रम. अनेक सारगर्भित भाषण-चर्चा, पुस्तक-‘सुखी मीन जो नीर अगाधा’ कविता-संग्रह एवं अन्य पोथीक – लोकार्पण, आ पुरस्कार- रोमिशाकेँ हुनक कथा संग्रहक हेतु पुरस्कार देल गेलनि- एवं सम्मान समारोह. कथाकार अशोक एवं तारानन्द वियोगीक अबैया रहनि. मुदा, नहि अयलाह. भेट नहि भेल.
‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क अवसर पर आयल विभिन्न वयसक प्रतिभागी लोकनिसँ भेट सेहो एकटा नीक उपलब्धिए भेल. कार्यक्रममे विचार विनिमयक अतिरिक्त नचिकेताजी, रमणजी, नीता झा, पंकज मिश्र, दीपा मिश्र, एवं रोमिशाकेँ सुनबाक अवसर भेटल. छोट ग्रुपमे साहित्य-संगम हमरा पसिन्न पड़ैछ.
25 दिसंबर 2025, क्रिसमसक दिन
हमरा भोरहि उठि टहलबाक हिस्सक अछि. भोरुक टहलानमे स्थानक स्पन्दन सोझे कान धरि पहुँचैछ, जेन कानमे स्टेथोस्कोप लगा ककरो हृदयक धड़कन आ श्वास-उच्छ्वास सुनैत होइ. स्थानीय जनसामान्यक दैनिक गतिविधि सेहो देखबाक अवसर भेटैछ आ कदाचित् अनचिन्हार लोकसँ परिचय भए जाइछ. शान्त मनें मनुखसँ भेट आ अनचिन्हारसँ  निःस्वार्थ गप-सप अजुका जिनगीमे बोनस थिक. मुदा, आइ ने कोट्टयम्-जकाँ धनखेतीक बीच सुखद भ्रमणक अवसर भेटल, ने उत्तरांचलक अरण्य, ने बनारसक गली. मुदा, घूरि कए आपस एलहुँ, तँ हमरा हेतु दोसर बोनस प्रतीक्षारत छल; सुजनै सह संगमः ; रमणजी, नचिकेता जी एवं दीपा रेस्टोरेंटमे चाहक कप संग ‘(बेडसँ दूर) भोरुका चाह सेवन करैत रहथि’. हमहूँ संग बैसि गेलहुँ. ओतय ‘
जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार, वहीं रात हो गुलज़ार’ बला बैसाड़ तँ नहि भेलैक, मुदा, चाहक अनेक कपक बीच बहुतरास गप भेलैक. ताहि प्रकारक गप-सप जाहिमे रूचि अछि, आ मन लगैत अछि. क्रिसमसक छुट्टीक दिन आ समानधर्मा लोकक संग. घड़ी पर नजरि गेल तँ साढ़े आठ बाजि गेल रहैक. किछु कालक बाद मैसूर विदा हेबाक छल. अस्तु, बैसाड़ विसर्जित भेल.   
जँ शहरक भीड़सँ मन अकच्छ भए गेल हो, आ  एसगर वा परिवारक संग स्वच्छ शान्त-शीतल स्थानमे किछु दिन रहब, पोथी पढ़ब आ गप-सप करब नीक लगैत हो, तँ जाड़क ऋतुमे श्रीरंगापत्तिनम् क कर्नाटक पर्यटन विभागक होटल ‘मौर्या रिवर व्यू’ नीक विकल्प थिक.


मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

हिन्दुस्तान का दिल देखो