Monday, July 12, 2021

प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थिति

 

6 सितम्बर 2009, रवि दिन. न्यूयॉर्क सिटी, अमेरिका. हमरा लोकनि टाइम्स स्क्वायर लग घूमैत रही. हमरा संग  हमर पत्नी, कन्या, जमाय आ हुनक एकटा गुजराती मित्र परिवारक  रहथि. सड़कक कातक साइड-वाक पर नीक चहल-पहल छलैक. अकस्मात्, हमरा लागल, पाछूसँ  छूबि केओ हमर ध्यान आकृष्ट केलनि-ए. उनटिकय  देखैत छी, तं एकटा मैथिल परिवार : युवक, पत्नी, बरख दसेक एकटा बालक आ एकटा छोटि कन्या. मुसुकाइत कहलनि, ‘अपने सब कें मैथिली बजैत सुनलहु, तें...’ एतेक दूर में अपन भाषा बजैत नागरिकसं भेंट भेने जेहने हर्ष आ कौतूहल ओहि  मैथिल परिवारकें भेल रहनि, तेहने हमरो लोकनिकें भेल छल. हमरा लोकनि ओत्तहि ठाढ़े-ठाढ़ पांच मिनट परिचय-पात कयल आ अपन-अपन बाट धयल. मधुबनी जिलाक निवासी ओ युवक न्यूयॉर्कहिं में काज करैत रहथि.न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायरक भीड़में मैथिली सूनि एहि परिवारक  अचानक आकृष्ट हयब एतबा तं अवश्य सिद्ध करैछ, जे विदेशहु में रहला उत्तर, मातृभाषा एकटा चुम्बक प्रमाणित होइछ. 

                                       न्यूयॉर्क मधुबनीक मैथिल परिवारसँ अचानक भेंट, वर्ष 2009  

तथापि, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिकें महत्वकें प्रमाणित करबाले केवल एकटा ई उदाहरण पर्याप्त नहिं. तें, एहि विषयक कनेक विस्तारसं जाँच करी.                                                                                         सत्यतः, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक जांचले दू प्रकारक मापदंड चाही. एक, प्रवासी मैथिल लोकनिक बीच सर्वेसँ  ई ताकल जाय जे ओ लोकनिक अपन जीवनमें मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थितिक अनुभव करैत छथि; दू, भारतसँ  विदेश जाइत मैथिल अपन देखल अनुभवक आधार पर स्वतंत्र  निष्कर्ष  निकालथि जे ओ लोकनि विदेशमें प्रवासी मैथिल लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थिति देखलनि. हमरा अपन निष्कर्ष निकलबाक हेतु एहि दुनू म सं कोनो मापदंडक नहिं अछि. तें, हमरा अपन परिवारजन सहित अनेको प्रवासी लोकनिक संग देशसं बाहर आ भारतक भीतर जे सम्पर्क भेल अछि, ओही सम्पर्कक अनुभवक आधारपर हमर हम अपन विचार एतय रखैत छी.

जं प्रवासी लोकनिकें कनेक काल ले छोडि दी, तं, अपन इलाकाक प्रति लगावक एकटा भिन्न उदाहरण दैत छी. ईसवी सन 2006 में एगारह बजे रातिक करीबक एक ट्रेन में चढ़बाक क्रममें धक्का-धुक्कीक कारण, तीन गोटे नई दिल्ली स्टेशन पर अबैत ट्रेनक सामने रेलक पटरी पर खसिकय मरि गेलाह. हमरा अनुमान अछि,  फगुआ, दसमी, आ छठिक पूर्व दिल्ली-नई दिल्ली स्टेशन पर घरामुंहा बिहारी लोकनिक एहन भीड़  बहुतो गोटे कें देखल हयत. प्रश्न उठैछ, पर्व-त्यौहारक अवसर पर लोक गाम अबैले कोना आफन तोड़ने रहैछ, देशक भीतरक प्रवासी लोकनिकें गाम अपना दिस किएक  एना घीचैत छनि, जखन कि दशहरा–होली-दिवाली-छठि आब दिल्लियोमें मनाओल जाइछ, एहि सब पर्वक छुट्टी दिल्लीओमें  होइत छैक. माने, पर्वक  आलावा सेहो गाम में एहन किछु अदृश्य आकर्षण अवश्य छैक जे लोककें गाम दिस झिकैत छनि : ककरो माता-पिता, ककरो परिवार आ नेना आ ककरो केवल अपन भूमि आ कमला-कोसीक धार, वा गोसाउनि-ब्रह्मबाबा अपना दिस झिकैत छथिन . विदेश बसैत प्रवासी भारतीय लोकनि सेहो अपन भूमिक दिससं एहने घिचावक  अनुभव करैत छथि, से सब कहताह. किन्तु, कतेको बेर समयक अभाव, दूरी, आ व्यय बाधा बनि ठाढ़ भ’ जाइछ.  एतबे नहिं, देश दिस घिचाव आ जुड़ाव केर  आओर अनेको सूत्र छैक, जे कखनो आवश्यकतासं प्रेरित होइछ, आ कखनो महज भावनात्मक तन्तुक जोरसं  सेहो. हम अनेको परिवारसँ परिचित छी जे जीवन समुद्रपार बितौने छथि, किन्तु, सन्तान लोकनिक हेतु जीवन संगीक तलाश मिथिलहि में आबि कय कयने छथि. एकर अपवादो अवश्ये भेटत. किन्तु, ई प्रवासी लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक एकटा विन्दु भेल तं अवश्य.                                                            आब एकटा दोसर गप्प. की प्रवासी लोकनिक अपन जीवनमें मैथिल समाजक अभावक शून्यताक अनुभव करैत छथि ? हमरा जनैत, सब दिन जं नहिओ तं, कहिओ काल अवश्य. प्रवासी लोकनि जतय कतहु छथि अपन  देश आ भूमि पर  छूटल  अपन समाजक अभावक अनुभव अवश्य करैत छथि. तें, जतहु मैथिल लोकनिक पर्याप्त संख्यामें छथि, अपन गाम-घरक मैथिल समाजक कमी कें दूर करैक हेतु, मिथिला-मैथिलीक संस्था बनाकय, एक दोसराक सम्पर्क में रहैत छथि.  आओर नहिं किछु, तं,‘कठौती में गंगा’ तं सब सुननहिं छी. सएह सही.  यूनाइटेड किंगडम (UK) में लन्दनमें मिथिला सोसाइटी यू के नामक एकटा संस्था सक्रिय अछि से तं हमरा बूझल अछि. ई संस्था यूनाइटेड किंगडम (UK) क विभिन्न भागमें काज करैत, आ बसल, मैथिल लोकनिक संस्था थिक. एहि संस्थाक सदस्य लोकनि अपन संस्थाक दिससं समय-समय पर सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करैत छथि, आ अपन पर्व-उत्सव मनबैत छथि. भारत सं अबैत साहित्य आ ललितकलासँ  जुड़ल व्यक्ति सबहक संग सम्मेलन, आ हिनका लोकनिक अभिनन्दनक हेतु सेहो, ई संस्था आयोजन करैत अछि, से सुनल अछि. संस्थाक माध्यमसँ सबहक एक दोसराक सम्पर्क में रहलासं बेर-कुबेर पर एक दोसराक सहायता सेहो होइत छैक. एतय एकटा गप्प बूझब आवश्यक, जे  घर सं जतेक दूर जायब, अपन देश-प्रदेशमें सामान्यतया जे छोट-छोट देवाल देखबामें अबैछ से सब खसय लगैछ. तें, इंग्लैंड-अमेरिका तं छोडू बंगलोर धरिमें मैथिल लोकनि समस्त बिहार-उत्तरप्रदेशक हिंदी-भोजपुरी-मैथिली भाषी लोकनि संग मीलि कय सामूहिक संस्था चलबैत छथि. एहिसँ  समूह सेहो पैघ होइछ आ एके संग अनेक भाषिक समुदायकें अपन समाजक संम्पर्कमें रहबाक बोध सेहो होइत छैक. तें, विदेशमें सेहो संस्था सब राष्ट्रीय स्वरुप ल’ लैछ. तें, विदेशमें  भारतीय नागरिकक वृहत समाजक प्रतिनिधि संस्था सब सेहो लोककें क्षेत्रीय मित्रभाव आ मेलजोलक अवसर आ सुविधा दैत छैक.                                                                                   

आब अमेरिकाक गप्प करी. अमेरिका आकारमें योरपक देश सबसँ बड्ड पैघ. शहर सभक आकार सेहो तहिना. तें, पैघ शहरक गप्प हम नहिं कहि सकब. किन्तु, हमरा अमेरिकाक नार्थ कैरोलिना राज्यक एकटा छोट-सन यूनिवर्सिटी टाउनशिप, चैपल हिलमें, किछु दिन रहबाक अवसर भेल छल. ओहि समयमें चैपल हिलमें किछु मैथिल छात्र आ नोकरिहा लोकनि रहथि. हुनका लोकनिसँ हमरा सम्पर्क भेल छल. ओतय ओ लोकनि एक दोसरासं जुड़ल  अवश्य रहथि. हमरा एक गोटेक ओतय जयबाक अवसरो भेटल. ई दम्पति, दुनू, मैथिल. घरमें जनमौटी नेना रहनि. बच्चाक जन्ममें सहायताक हेतु नेनाक नानी आयल रहथिन तें हुनकोसँ  भेंट भेल. हिनका लोकनिक परिवारमें भाषा मैथिली आ सामान्यतः भोजन-सांजन मैथिल रुचिक.

हालमें, अमेरिकामें रहैत नेपाली मैथिल लोकनिक सांस्कृतिक गतिविधिक एकटा समाचार काठमांडूसं प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक The Rising Nepal क 28 दिसंबर 2019 क अंक में भेटल. समाचारक अनुसार एसोसिएशन ऑफ़ नेपाली तराईअन इन अमेरिका (ANTA ) आ मैथिल्स ऑफ़ नार्थ अमेरिका (MoNA ) क संयुक्त सहयोगसँ अमेरिकाक न्यू जर्सी शहरमें 14 दिसंबर 2019 क विद्यापति समारोह आयोजित भेल छल.एहि समारोह में नेपालसँ आमंत्रित किछु कलाकार आ साहित्यकार सेहो ओतय गेल रहथि. समाचारक अनुसार एहि समारोह में अमेरिकाक विभिन्न भारतीय आ नेपाली समुदायक नेता लोकनि सेहो सम्मिलित भेल रहथि.

                 न्यू जर्सी अमेरिका में विद्यापति पर्व. फोटो: The Rising Nepal, काठमांडू के सौजन्यसँ 

हमर अनुभव कहैछ, मैथिल विदेशमें जतय छथि, अपन पीढ़ी धरि मैथिली बजैत छथि, आ बहुधा अपन रूचि आ सुविधाक अनुसार भोजन-सांजनमें
  मैथिल-जकां खाइत-पिबैत छथि. किन्तु, दोसर पीढ़ी जाइत-जाइत मैथिली भाषा आ व्यवहार विलुप्त भ’ जाइछ. एकर कतेको कारण छैक. पहिल तं सामान्य जीवनमें भाषा आ व्यवहारक अभाव. दोसर, विवाह-दानक हेतु समाजक परिधि जेना-जेना पैघ भ रहल छैक, परिवारसँ मैथिली कतियाअल जा रहल अछि. भारतहु में बसैत मैथिल परिवारहुक स्थिति एहने अछि. तें, जाहि परिवारमें पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी नहिं छथि, ओहि परिवार में नेना-भुटकाकें मैथिली सुनबाक अवसर कदाचिते भेटैत छैक. अस्तु, ओतय मैथिली बिलाय लगैछ. मुदा, जं पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी छथि, तं, बच्चाकें लोक भले मैथिलीमें नहिं टोकौक, बच्चा माय-बापक बीचक गुप्प सुनिओकय किछु मैथिली अवश्य सीखि लैछ, से हम अनुभवसं कहैत छी. किन्तु, जं अहाँ पूछब, प्रवासी लोकनिक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि, तं, हम एतबे कहब, जे भारतहिंमें मिथिलासं दूर बसैत मैथिलक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि ! उत्तर सूनि हताशा हयब सम्भव, किन्तु, ई सत्य थिकैक. प्रवासी लोकनिमें कें जे मैथिलीकें जिया कय रखने छथि, ओ केवल अपन ममत्वसं, आवश्यकतासं नहिं. ततबे नहिं, जहिना भारतमें रहितो बहुतो मैथिल, मैथिली पढ़ब नहिं जनैत छथि, तहिना प्रवासी मैथिल म सं बहुतो मैथिली ने पढ़इत छथि, ने पढ़ि सकैत छथि. किन्तु, समस्या ई छैक जे  प्रवासी मैथिली पढ़हु चाहैत छथि, तं अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म सब पर मैथिलीक पोथीक अभावक कारण मैथिलीक पोथी हुनका सबहक लग पहुंचि नहिं पबैछ. अतः, मैथिलीक प्रति ममत्व रहितो ओ लोकनि मैथिलीसं दूर भ’ जाइत छथि. तें, अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म पर मैथिलीक उपस्थितिक आवश्यक. कारण, हमरा जनैत, विदेशमें मैथिलीक मांग सेहो छैक. तकर एकटा प्रमाण मैथिली भाषाक हमर अपन ब्लॉग ‘ कीर्तिनाथक आत्मालाप’ थिक. पिछला दस वर्षमें पाठक लोकनि हमर एहि ब्लॉगक पेजकें आइ धरि करीब 88834  उलटौलनि-ए, से analytics कहैत अछि . आश्चर्यक गप्प ई, जे एहि म सं अधिकांश पाठक समुद्र पारेक छथि ! माने, समुद्र पारहु सं लोक मैथिली तकैत तं अवश्य छथि !                                           

अंतमें, वर्तमान मिथिलाक समाजक हेतु प्रवासी मैथिल लोकनिक योगदानक गप्प करी. सफल पूत सदायसँ अपन समाजक उत्थानमें योगदान करैत एलैये.  आ तकर आशा उचितो. किन्तु, अपन समाजक उत्थानक हेतु प्रवासी लोकनिक योगदान ले ककरो तं डेग उठबहि पड़तैक. हम पूर्णतः विश्वासक संग ई नहिं कहि सकैत छी, जे प्रवासी मैथिल लोकनि सामूहिक रूपें पैघ स्तरपर मिथिलामें शिक्षा, समाज-सुधार, वा आधारभूत संरचनाक सुधारक कोनो अभियानक सहयोगी छथि वा नहिं. किन्तु, व्यक्तिगत स्तर पर कतेको गोटे मिथिलाक छोट-छोट स्थानीय अभियानमें सहयोग करैत छथि तकर एक-दू टा सूचना हमरा लग अवश्य अछि. हमर अनुमान अछि, विदेश गेल बहुतो सफल मैथिल, गाम-घरक लेल आरम्भ कयल  इमानदार आ सार्थक स्थानीय पहलमें कम वा बेसी सहयोग अवश्य करताह. किन्तु, एहि हेतु पहिल डेग तं केओ उठाबथि. ई डेग वा पहल मिथिलहुसं आरम्भ भ सकैछ. 

( 'तीरभुक्ति' नामक पत्रिका में प्रकाशित )                                   

Thursday, July 8, 2021

मुस्कराहटों का अकाल

 

मैंने उनको कभी साथ बैठकर हँसते-मुस्कराते नहीं देखा. देखता भी कैसे ? एक, उन्हें बैठने की फुरसत कहाँ थी ! दूसरी, मुस्कराने की न कोई सूरत थी और न वजह. कमला नदी माता तो थी, पर मनमौज. खेती थी, तो कमर तोड़. साल भर का अनाज खेत में पैदा हो गये तो ठीक. नहीं तो, आधा गाँव रात को भूखा ही सोता था. पर किसी को शिकायत नहीं थी ; सब की हालत एक जैसी जो थी. छप्पर पर फूस हो और बारिस में घर न चूता हो, भर पेट अन्न हो, पर्व-त्यौहार निबट जाए, और सामाजिक दायित्व पूरा होता रहे तो लोग सुखी समझे जाते थे. अगर इतना कुछ हो तो घरों में झगड़ों की वजह ही क्या है ! मगर ऐसा सुख कितनों को मयस्सर था गावों में उन दिनों. पर, परिवारों को टूटना लोगों ने सुना नहीं था, भले पति-पत्नी साथ बैठ कर हँसते-मुस्कराते नहीं हों. शायद ऐसा विकल्प उन दिनों तक उस समाज में लोग-बाग़ सोचते भी नहीं थे.

एक बार की बात है. एक ही  बरसात में कमला की बार-बार की बाढ़ ने लगे हुए धान को बर-बार डुबा-गला दिया था. और खेप की रोपनी का न समय बंचा था, न बीहन. फाकाकसी की नौबत थी. उस साल दूर किसी गाँव के किसी बड़े खेतिहर ने दीनानाथ को धान कटबाने का काम दिया. दीनानाथ ने सोचा कि चलो अगर दस मन भी धान मिल जाए तो साल निकल जाएगा. पर खुराक का धान क्या निकला, एक नयी आफत आ गयी. वहीं दूर के गाँव में  दीनानाथ बहुत जोर बीमार पड़े. आँखें पीली हो गयीं थी. गोरे चमड़े का रंग पीला हो गया था. लोगों ने कहा कमला बीमारी है. पर फ़िक्र की बात नहीं थी. उस गाँव में उस साल बहुतों को कमला रोग हुआ था, पर किसी की मौत हुई ऐसा किसी ने सुना नहीं था . परेशानी थी तो बस एक : दीनानाथ बेहद कमजोर हो गये थे, और उन्हें भूख बिलकुल नहीं लगती थी. उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं. खुद ही सुना था, पुनर्नवा से पीलिया/ कमला ठीक हो जाता है. तो फिर क्या था. तालाब के भीड़ पर पुनर्नवा की क्या कमी थी. उनका टहलू, रामेश्वर, रोज एक मुट्ठी पुनर्नवा नोच कर दीनानाथ के लिए लाता था, सिलबट्टा पर पीसता था और दीनानाथ उसे पानी में घोलकर ‘ जय धन्वन्तरि’ के साथ पी जाते थे. करीब दो महीने बाद जब पीलिया कम हो गया और धान की दौनी पूरी हो गयी तो दीनानाथ गाँव वापस चले. फिर भी, जब दीनानाथ बैलगाड़ी पर धान की बोरियां लेकर घर वापस लौटे तो उनकी हालत पैदल चलने की नहीं थी. बस, ख़ुशी इतनी थी कि जब तक गेंहूं का फसल घर न आये, भुखमरी तो नहीं होगी. लेकिन, घर का मरम्मत, स्कूल का फीस, नमक-तेल-मशाले का खर्च तो चाहिये था.घर के मरम्मत के लिए कमला के किनारे से कास के चंद बोझ मिल गये. बाँस तो अपनी ही  बंसबिट्टी से काट लिया.  संयोग से, पाचू पासवान के पास उनकी एक बछिया पोसिया लगी थी. उसे दोनों मिलकर जटमलपुर के मेले में बेच आए, तो हिस्से में कोई सौ रूपये आने से नकदी की आफियत हुई थी. यह सभी दीनानाथ को याद है. उन्हें यह भी याद है कि एकबार उनके पढ़ने की ऐनक गुम हो गयी. हर जगह ढूंढा. कहीं नहीं मिला. अचानक उनके मन में एक बात आयी. हो न हो, ऐनक कहीं कुंए में तो नहीं गिर गयी. चमड़े की खोल में रखी  ऐनक अक्सर कुर्ते के  ऊपरी जेब में होती थी. क्या पता, कुंए से डोल से पानी खींचते वक्त, खोल सहित चश्मा फिसल कर कुंए में तो नहीं गिर गया ! बस क्या था, दीनानाथ ने चश्मे को ढूंढ निकालने की ठान ली. आस  पास के लड़के-जवान कुंआ के पास हरिदास के आँगन से बाँस की सीढ़ी और रस्सा ले आये. और ऐनक को पानी से निकालने, रस्से और सीढ़ी के सहारे दीनानाथ कुंए में उतर गये. बाद में उनकी ऐनक सन्दूक पर पड़े एक बक्से के पीछे मिली यह और बात थी. पर दीनानाथ किसी पर नाराज नहीं हुए. बच्चों की पिटाई नहीं हुई. ऐनक मिल जो गया. अब दरभंगा जाने का खर्च, परेशानी और जहमत से जो बंच गये थे.

उन बातों को अरसा बीत गया. दीनानाथ आज कल मुंबई में हैं. छोटे बेटे  और बहू के आग्रह पर कुछ दिन के लिए मिज़ाजपुर्शी के लिए मुंबई आए हैं. वैसे तो दीनानाथ की नजर में  इस महानगर में असुविधा ज्यादा और सुविधा कम है, लेकिन उनकी जरूरतें इतनी कम है कि उन्हें असुविधा क्यों कर होने लगी. उनके तरह के गाँव में रहनेवालों के शब्दकोष में असुविधा की जगह नहीं है !  पढ़ने को हिन्दी समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाएं और किताबें मोहल्ले के कोने पर मिल जातीं हैं. पान-सुपाड़ी-तमाखू की कभी आदत डाली नहीं. मिथिलाकें गांवों में उनके जवानी के  ज़माने भांग खूब चलता था. पर दीनानाथ को इस घास ने कभी आकर्षित नहीं किया. कहते थे, इस गाँव में जिनके पास अपने खेत और पेड़ नहीं हैं उन्हें भी खाने के लिए आम-जामुन-अमरुद- गन्ना की कमी नहीं होती. गर्मियों में ताड़कून खाईये, अगहन में सिंघाड़ा खाईए. यहाँ खाने की चीज की कमी है क्या, जो लोग मवेशी के तरह घास खाय, चिमनी के तरह धुआँ छोड़े. और ताड़ी ? ताड़ी तो आदमी को ताड़ पर चढ़ा कर सीधा नीचे गिरा देता है; अपनी और बांकी सबों की नजर में.

लेकिन, मुबई आकर दीनानाथ चकित हैं . अभी तक उन्होंने अपने बेटे  और बहू को साथ हँसते मुस्कराते नहीं  देखा है .  सोचते हैं, वक्त को क्या हो गया है ! लोग बातें करते हैं तो सिर्फ काम की, या दाम की. मुँह खोलते हैं तो बातें निरी बातें होतीं हैं. सुबह बारह बजे होता. तब तक अट्टालिकाओं के बीच सूरज कहीं दीखता नहीं, धूप भले हर जगह हो. ना आफिस जाने की ज़ल्दी ना बच्चे को स्कूल भेजने की तरद्दुद. यहाँ तो बच्चा है ही नहीं. जहां बच्चे हैं , बेचारे बच्चे भी दोस्तों की कमी के कारण बिलबिलाते रहते हैं. पर वह दीगर बात है. दीनानाथ जिस इमारत में हैं, उस पन्द्रह मंजिली ईमारत में दर्ज़नों परिवार और सैकड़ों लोग हैं. लेकिन न कोई किसी का पड़ोसी है, और न अपने घर के बाहर किसी का कोई चाचा-भतीजा, भाई-बहन, और ना कोई दादाजी-दादी. सभी कबूतरखानों में बंद, अपने ही काम में ज़ब्द हैं, अपने तनाव में कैद हैं. ऐसा क्या है इस वक्त में, इस शहर में कि मुस्कराहट नदारद है ! सब केवल भाग रहें हैं, जिंदगी गुज़र रही है, वक्त कट रहा है.

दीनानाथ अपने घर में  देखते हैं, शाम होते ही बेटा-बहू काम में लग जाते हैं. कहतें हैं, उन्हें भारत के दिन-रात से नहीं, अमेरिका के सूर्योदय-सूर्यास्त को देखकर उठना और सोना होता है . दीनानाथ सोचते है, ये बच्चे पैसे भरपूर कमाते हैं. मुंबई में जहां लाखों लोग फुटपाथ पर सोते हैं उनके बेटे-बहू के पास चार कमरे है. कारें हैं. घर में वह सब कुछ है जो दीनानाथ ने कभी सिनेमा में समृद्ध लोगों के घर में देखा था. पर एक ही चीज नहीं है, खुशियाँ. दीनानाथ अचम्भे में हैं ; सारी समृद्धि हैं, पर खुशियाँ नदारद ! मुस्कराहट की कमी दीनानाथ को नहीं खलती हैं, लेकिन, सोचते है, अगर घर में सुख-शान्ति और आराम का माहौल न हो तो लोग आफियत की सांस कहाँ लेंगे ? आदमी थक कर आराम कहाँ करेगा ? प्यार से जो मिजाज़पुर्शी होती है, वह कहाँ से आयेगा ? बच्चे कहाँ पनपेंगे, कहाँ पलेंगें. बच्चों के लिए घर तो ऐसा अभयारण्य है जहाँ चारों और शान्ति होनी चाहिये. और अगर यह सब होगा ही नहीं तो बसेरा और घोंसला किस काम के लिए है ? दीनानाथ की उम्र में आसमान में तूफ़ान के संकेत और परिवार में पनपता तनाव को सूंघने में वक्त नहीं लगता. उन्हें बेटे-बहू से कभी पूछने का मन करता है, बच्चे इस शहर में मुस्कराहट कहाँ बिकता है ? मैं अपने बंचे-खुचे पैसे से थोड़े मुस्कराहट खरीद कर ले आता हूँ. तुम लोग कुछ दिन उसे शरबत में मिला कर पियो, सेहत सुधार जायेगी ! मगर, दीनानाथ गंवई हैं, गंवार नहीं. वृद्ध है, बेवक़ूफ़ नहीं !! बरसों से सुनते आये हैं, सांई-बहू का झगड़ा, पंच बने लबड़ा ! यानी, सांई-बहू के  झगड़ा में जो बीच में  पड़ा वह या तो लबड़ा है, या वह आखिरकार लबड़ा कहलायगा !! इसलिए, चुपचाप अपना समय बिताते हैं. पर अब दीनानाथ को अब समय भारी लगने लगा है.

इसलिए,आखिरकार एक दिन दीनानाथ ने कहा, बेटे मेरा टिकट कटबा दो. बेटा और बहू दोनों उनकी ओर देखने लगे. इससे पहले कि बेटा और बहू पूछें, ‘बाबूजी जी कोई दिक्कत हुई क्या ? ’, दीनानाथ ने उनके सवाल का जवाब खुद ही दे दिया: बेटे मुझे गाँव के चौक के पास के उलुवा पाकड़ पेड़ के नीचे बैठे बहुत दिन हो गये. वहाँ के ठहाके थकन की गांठें खोल देते है, पाचन बढ़ा देती है. मुझे उलुवा पाकड़ की याद आ रही है !

दीनानाथ की बातें सुनकर बहू-बेटे हंसने लगे; याद और पाकड़ के पेड़ की ! बेटा, जयवीर ने कहा, बाबूजी कुछ दिन और रह कर शरीर को आराम दे दीजिये. आप गाँव में बैठने से तो रहे. यहाँ आराम से सेहत सुधर जायगी.

दीनानाथ मुस्कराने लगे. बोले, बेटे इस शहर में सब कुछ है, मुस्कराहटें नहीं हैं. इस शहर में मुस्कराहटों का अकाल है. मुस्कराहटों में अजीब की तासीर होती है, मुझे अपने लोगों के साथ खुलकर हँसे बहुत दिन हो गये. और दीनानाथ अगले हफ्ते ही कर्णपुर लौट आये .              

Wednesday, July 7, 2021

लघु लघु कथा : तितलियाँ

  

मनु के आने से लगा कि एकाएक हमारा घर रौशन हो गया है. जहाँ हमलोग घरके अलग-अलग कोने में बैठ किताबें पढ़ते थे, कहानियाँ लिखते थे, या टीवी देखते थे, वहीं आज हमारा घर एकाएक खुशनुमा बगीचे में तब्दील हो गया था.काल्पनिक ही सही; कहीं नायब फूल खिल रहे थे, कहीं चिड़ियाँ चहक रही थीं, तो कहीं हरी घास पर बच्चे लोट रहे थे. और तितलियाँ ? तितलियाँ तो बेशुमार थीं: काले, पीले, बैगनी, मटमैले, नारंगी . लग रहा था पूरे बैठकखाने में हवा में चारों तरफ तितलियाँ हीं तितलियाँ तैर रहीं थीं. इर्द गिर्द बैठ लोग अपने काम में मसरूफ थे, और मैं मनु को देख रहा था.  मैंने कहा, ‘मुझे भी एक तितली चाहिये !’ और मनु दौड़ता हुआ मेरे पास आया और एक छोटा सा तितली मेरे नाक पर चिपका कर जाने लगा तो मैंने उसके गाल चूम लिए. पर सूरज की रोशनी को मुट्ठी में पकड़ना आसन है क्या ! मनु पल झपकते मेरी पकड़ से बाहर निकल कर बैठकखाने के दूसरे कोने की ओर भाग गया. वहाँ उसके पास तरह-तरह के खिलौने थे , जिसमे उसकी जान बसती थी: खिलौने बच्चों के लिए, खिलौने नहीं सचमुच के सजीव प्राणी होते हैं, जिन्हें भूख लगती है, प्यास लगती है, जो रूठते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, सोते हैं,  और प्यार भी करते हैं.

मैंने कहा, मनु मुझे और तितलियाँ चाहिए ! मनु ने मुझे देखा, मुस्कराया, और एक साथ कई तितलियाँ मेरी कुर्सी के हत्थे, उसके पैर, और उसके बगल में चिपका गया. मैंने कहा, ‘ वाह ! तुम कितने प्यारे हो. और ये तितलियाँ कितनी अच्छी हैं.’ उस दिन को गुजरे अरसा हो गया. मैं भी तितलियाँ भूल गया था, मनु के जाने के बाद से तितलियाँ मेरे घर का रास्ता जो भूल गयीं थीं !

आज अचानक तितलियाँ फिर मेरी चेतना में वापस आ गये हैं. दीवाली में फर्नीचर की रंगाई-पुताई हो रही है. और कुर्सियों पर चिपके प्लास्टिक के  तितिलीयों को दिखाकर पेन्टर  ने पूछा, ‘ कुर्सी में रंग लगाने के पहले इन स्टिकर को हंटाना पड़ेगा.’

- कौन सा स्टिकर ? मैंने पूछा.

-प्लास्टिक की तितलियाँ.

मैंने कहा हरगिज नहीं ! यही तितलियाँ तो रोज मेरे बैठकखाने में रंग बिखेरतीं हैं, इन्ही तितलियों से तो गाहे-बगाहे मेरे जेहन में रौनक आती है  ! तितलियाँ जहां हैं, वहीं रहेंगी !! और अगले साल मनु जब वापस आएगा तो उसको, मुझे इन तितलियों की हिसाब जो देनी है . मैं तो रोज ये तितलियाँ उसे विडियो-काल पर दिखाता जो  हूँ !

Saturday, June 12, 2021

गुलाब पलास भए गेल, मुदा, एखनो बिकाइए

 

रूप यौवन संपन्ना विशालकुलसंभवा

विद्याहीनां न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः

किशुंक वा पलासक फूलक चर्चा  सब ठाम   गुणविहीन सौन्दर्यक प्रतीकक रूप में होइत आयल अछि. संस्कृत साहित्य हो वा आन केओ होथि, ई उपमा जहिना छल, तहिना अछि. किशुंक तहियो उपहासक लक्ष्य छल आ आइओ अछि. तहिना, गुलाब सुगंधिसँ पूर्ण रूप-गुण प्रतीक पहिनो छल, एखनो अछि. फलतः, मांग आ आपूर्तिक नियम केर पालन करैत गुलाबक एक-एक टा कली बाज़ार में पांचसँ पचास टाका में बिकाइत अछि. मुदा, कोनो मित्रकें जन्मदिन पर उपहार में देबा ले वा अपन प्रेमिका/ संगिनी कें वैलेंटाइन डे, जन्मदिन, वा कोनो आन अवसर पर उपहारक रूप में देबा ले हाल-साल में गुलाबक फूल किनलहुँ–ए? हम किनलहुँ–ए. जंगली गुलाबक विपरीत बाज़ारमें उपलब्ध गुलाब में आब कोनो सुगंधि नहिं. मुदा, हमरा अहाँकें से बुझबा में आयल ? आ जं से बुझबा में अयबो कयल, तं, की अहाँ गंधहीन गुलाब किनब छोड़ि देल. नहिं. किन्तु, किएक ? एतय हम एहि विन्दु पर विचार करैत छी.

आब एतय एहि विषयकें कनेक फड़िछाबी. तें, एहि विषय पर विचारक हेतु हमरा लोकनि ई सोची जे लोक गुलाब किएक तोड़इत अछि, किएक किनैत अछि. जं विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसँ  देखी तं गुलाब आ पलास केर गुण धर्म में कोनो समानता नहिं. गुलाब गुणक खान थिक, तं पलास गुणविहीन सौन्दर्यक उदाहरण. गुलाबक उपयोग गुलाब-जल, इत्र, गुलकंद आ अनेक प्रकारक भोजन आ पेय बनयबा में होइछ. दक्षिण भारतमें  पलासक फूल कतहु-कतहु शिवकें पूजामें चढ़इत छनि. कतहु अग्निहोत्र में पलासक काठक  प्रयोग होइछ. किन्तु, गुलाबसँ हमरा लोकनिक परिचय  केवल सुगंधिसँ अछि. जखन सुगंधिए नहिं तं गुलाब की. किन्तु, एखन जे गुलाब ‘उत्तम’ गुलाबक नामसँ बाज़ार में बिकाइछ लोक ओहि में खरीददार सुगंधिक मांग किएक नहिं करैछ ? अथवा जं गुलाब गंधहीन होइछ तं लोक किनैत किएक अछि ? की गंधहीन गुलाबक प्रति शिकाइतक अभाव लोकक बदलैत सौन्दर्यबोधक प्रतीक थिक ? वा, की बाज़ार ग्राहककें केओ, किछुओ, कोनो दाम पर बेचि सकैत अछि ? प्रायः उत्तर अछि,  हं. एकर उदाहरण एखन समाजक आनो क्षेत्रमें अबैत रहल अछि.

राजनीति वा समाज-सेवाक क्षेत्रमें पहिने गुणवान लोक अबैत छलाह. तखन किछु त्यागी आ किछु अपराधी लोकनि अयलाह. आब राजनीति में अपराधी आ भ्रष्ट लोकक बाहुल्य अछि. किन्तु, प्रत्येक पांच वर्ष पर ओएह लोकनि चुनावी मैदान में उतरैत छथि, जितैत छथि, आ हमरा लोकनि पर राज करैत छथि. हमरा लोकनि प्रसन्न छी. बाज़ार जे उपलब्ध करबैत अछि धड़ल्ले बिका रहल अछि.

शिक्षाक क्षेत्र सेहो एहि प्रकारक उदाहरणसँ भरल पड़ल अछि. पछिला शताब्दीक छठम दशकमें शिक्षाक जे अवनति आरम्भ भेल तकर असली असरि आब देखबामें आबि रहल अछि. पढ़ल लिखल लोककें  जीविकाक पात्रता नहिं छनि. डाक्टर-इंजिनियर लोकनि में दक्षताक अभाव प्रत्यक्ष अछि. किन्तु, गंधहीन गुलाब-जकाँ सब बिका रहल अछि.

तें हम सोचैत छी, कि गंधहीन गुलाबक बिकायब हमरालोकनिक उदासीनताक कारण थिक ? कि बाज़ारबाद हमरालोकनिक उपर तेहन सवारी कसने अछि जे प्रतियोगिता क अछैतो हमरा लोकनिकें अक्क-बक्क नहिं सुझैत अछि आ हमरा लोकनिक आगू जे किछु राखल जाइछ हमरा लोकनि किनि लैत छी. उदारीकरण आ भूमण्डलीकरणसँ  तं ई अपेक्षा नहिं छल !          

 

Tuesday, June 8, 2021

कोरोना की दूसरी लहर : कुछ विचारणीय विन्दु

 

2020 में COVID 19 की लहर खतम हो जाने के बाद,  सितम्बर से दिसंबर 2020 तक करीब तीन महीने लोगों ने चैन की सांस लेनी शुरू की थी. लोग-बाग़ बाज़ार जाने लगे थे. होटलों में बैठ कर खाने की इजाज़त शुरू हो गयी थी. दिन-प्रतिदिन अस्पताल में संक्रमण का डर तो था, लेकिन, लोग थोड़ा लापरवाह होने लगे थे. जनवरी से मार्च 21 के बीच तो अस्पताल में फ्लू क्लिनिक और COVID वार्ड बंद हो गया था. सचमुच, स्वास्थ्यकर्मी भी थक चुके थे. फलतः, साल भर के सख्ती के बाद  थोड़ी ढील से हमें आफ़ियत महशूस होनी लगी थी. लेकिन, मार्च 21 के अंत तक एकाएक सूरत बदलने लगी. अप्रैल की एक तारीख से महाराष्ट्र से कर्नाटक में दाखिल होने के लिए कोरोना मुक्त होने का प्रमाण-पत्र माँगा जाने लगा. ऐसी ही परिस्थिति  में 31 मार्च को हम पांडिचेरी से बंगलोर आए.

नया शहर, नई कोलोनी. हम अपरिचित थे. दो चार परिचित आगे आये, खैरमकदम भी किया. पर नए लोगों से दोस्ती करना तो दूर, पुराने परिचित को पहचानना मुश्किल था. सभी के चेहरे पर मास्क. बीस साल के परिचित युवक अब सिनियर सिटिज़न हो चुके थे. बहुतो कें सर पर घने बाल की जगह चमकदार चमड़ी या सन-से सफ़ेद बाल ले चुके थे; मैं भी तो बदल गया हूँ. 2 गज की दूरी के कारण किसी के नजदीक फटक नहीं सकते, यह भी नहीं पूछ सकते कि आप वो तो नहीं. एक दिन मैं ने हिम्मत की. एक फौजी-से लगते सरदार जी को अभिवादन करते उनकी और मुड़े तो महानुभाव और दो मीटर पीछे हंट गये.हम तो पहले ही दो मीटर पर थे, अब तो चिल्ला कर बात करने के आलावा और कोई चारा न था. खैर, परिचय की औपचारिकता पूरी की. पता चला कि सज्जन मेरे पुराने परिचित नहीं थे . इस वाकये के बाद मैंने फिर कभी किसी के नज़दीक फटकने की कोशिश न की. करता भी कैसे. यहाँ के एक सज्जन ने यहाँ के बासिंदों की whatsapp जमात पर अपनी खासी नाराजगी जाहिर की थी. महोदय की शिकायत थी कि टहलते वक्त लोग-बाग़ उनके सामने आ जाते हैं. यह अनुचित था. श्रीमान् सेवानिवृत्त फौज़ी अफ़सर है. इसलिये उन्होंने धमकी दी थी कि सड़क पर चलते अब  वह अपने हैट के आगे छौ फीट का लम्बा डंडा लगबा लेंगे जिससे लोग उनके सामने न आ सकें. मुझे नहीं  मालूम नहीं, उन्होंने किस प्रकार के हैट का अविष्कार किया है ! लेकिन, यह सब, आगे जो होता गया उसके सामने, केवल मसखरी-जैसी थी.

लगा, एकाएक शहर की हवा भोपाल-जैसी हो गयी है.  भला बच्चे कहाँ समझे ऐसी बात. हर दिन छौ से सात साल की  तीन-चार लडकियाँ और एक-दो लड़के गार्ड की मनाही की परवाह किये बिना हमारे सामने के मण्डप पर रोज आ जाते थे. लेकिन, आखिरकार उन्हें भी गार्ड ने खदेड़ डाला. बच्चों के जान पर आफत जो थी ! फिर कोलोनी एकाएक सूनसान हो चला. लोगों ने सुबह शाम की सैर बंद कर  दी. साफ़-सफाई कर्मचारी भी आधे हो गये. इलाका कन्टेनमेंट जोन में तब्दील हो गया. साग-सब्जी के दूकान के पास बंदिशे शुरू हो गयी. राज्य और शहर से आती खबर तो दिल दहला देने वाली थी. एक दिन में पैतालीस-पचास हज़ार नए रोगी. दिन भर में 500 से 700 मौतें. नए-नए श्मशान भूमि के बन जाने के बाद भी अपने परिजन के दाह-संस्कार के लिए  हमारे एक मित्र को प्रतीक्षामें सुबह से रात को दस बज गये. तब कभी जाकर नम्बर आया. समाचार पत्र और टीवी में श्मशान भूमि में एक साथ खुले तंदूर-जैसे एक साथ पचासों चिताएं अगर दहला देनेवाली थीं, तो बाद में जो खबर आयी उससे विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है. दैनिक ‘हिन्दू’ समाचार पत्र में एक साथ साढ़े आठ सौ अस्थिकलश की तस्वीर छपी थी. इन कलशों को जिस सम्मान के साथ पंक्तिबद्ध और मालाओं के साथ रखा गया था जीवन काल में शायद उन नागरिकों को ऐसा आदर-सम्मान नसीब नहीं हुआ होगा.  समाचार था, कि मृतकों के परिवारजन अस्थि-संचय के लिए नहीं आए. सरकार ने  अस्थियों का सामूहिक विसर्जन किया. सचमें, लोग आते भी कैसे ! शहर में लॉक-डाउन. गाड़ियाँ चलतीं नहीं. चिताएं लगातार जलती थीं. जलती चिता से अस्थि कौन चुने. और चुने भी तो तब जब चिताएं बुझे. यहाँ तो इस विश्वव्यापी  विपत्ति में चिताएं अहोरोत्र जल रहीं थी. किसी माँ  को केवल बेटे-बेटियों और पति ने कंधा दिया, तो कहीं किसी को कंधा देनेवाला अपना मिला ही नहीं. परिवार उजड़ गये, बच्चे अनाथ हो गये. अगर शुमार मौतों के मृतक के मृत्यु प्रमाण-पत्र में कारण के तौर पर कोरोना का संकेत हुआ, तो सरकार की अनुग्र राशि मिलने की संभावना जीवित है. अन्यथा, वो भी नहीं. हजारों लावारिश  लाशें गंगा माँ की गोद में इस राज्य से उस राज्य में बह गयीं. न मरनेवालों में उनकी शुमार हुयीं ,न उनके परिजनों को अनुग्रह राशि मिलेगी. जो हजारों लाश गंगा के किनारे रेत में दफन किये गये, लोगों ने उनकी कफन तक को नहीं छोड़ा. इस पर जो भी बंचा था, और जिस किसी ने भी जुवान खोली, सरकार ने उसे भी उसकी जर-जमीन कुर्क करने की धमकी दे डाली. संवेदनहीनता का ऐसा मिशाल इतिहास में शायद ही मिले. मगर, कहते हैं

                        इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां

-       स्व. दुष्यंत कुमार

इतना ही नहीं, इस महामारी के वक्त लोगों की मानसिकता और व्यवहार में भी आमूल परिवर्तन आ गया है ; यहाँ मैं चिन्ता और अवसाद जैसे मनोरोग की बात नहीं कर रहा. बहरहाल, सावधानी और भय जैसे कुछ परिवर्तन को तो समझा जा सकता है, किन्तु, लोगों का लोगों से भय समझ के बाहर हैं. लोग-बाग पड़ोसी को फोन करने से कतराते हैं, एक दूसरे का हाल-चल पूछना तो दूर. पता नहीं कौन किस सहायता की मांग कर दे. वैसे इस लॉक-डाउन में कौन किस की, क्या सहायता कर सकता है. पर मैं देखता हूँ, कोलोनी के भीतर सब्जी की दूकान के आसपास बातचीत तो दूर, लोग एक दूसरे को अभिवादन भी नहीं करते ! आखिर, क्या पता, लोग डरते हों, कहीं हमारी श्वास ही दूषित न हो जाय, और बात करने से ही कोरोना का संक्रमण हो जाये !!

रोगी के परिजनों द्वारा चिकित्साकर्मियों पर आक्रमण इस राष्ट्रीय विपदा का दूसरा काला चेहरा है. यह बीमारी नयी नहीं है. लेकिन, समाज को सोचना होगा, इसका निराकरण क्या है. स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा का भार सरकार पर तो है ही, पर समाज में एक दूसरे की सुरक्षा, नागरिकों का एक दूसरे के प्रति सद्भाव पर टिका है. 

दूसरी ओर, प्रति दिन टीकाकरण की नई-नई सूचना आ रही है. किन्तु, टीकाकृत नागरिकों की संख्या भारत की कुल संख्या का छोटा हिस्सा है. राष्ट्रीय पोलियो अभियान में सरकार का नारा था, ‘एक भी बच्चा छूटने न पाए’. रेल स्टेशन, बस स्टैंड, एअरपोर्ट पर बच्चों को पोलियो की बूँदें पिलाकर हमने पोलियो को हराया था. हम कोरोना जैसे जानलेवा रोग के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते थे ! इस प्रश्न का जवाब हमें ढूढ़ना पड़ेगा. सभी के लिए टीका खरीदने का केन्द्र सरकार का निर्णय स्वागत-योग्य है. किन्तु, सरकारें महामारी अधिनियम या राष्ट्रद्रोह अधिनियम जैसे कानून नागरिकों के प्रश्न पूछने के अधिकार नहीं छीन सकते ! किन्तु, अभी हमारी प्राथमिकता जान बंचाने की है ! और वह भी एक ही बीमारी से नहीं . अब एक और दूसरी महामारी- मुकोरमायकोसिस (mucormycosis)- से भी जान बंचाना है.

मेरा मानना है कि, अन्य कारणों के अलावा कोर्टिकोस्टेरॉयड (Corticosteroid) के अंधाधुंध प्रयोग से मुकोरमायकोसिस का  रोग एकाएक फैला है . विकसित देशों में चिकित्सा पद्धति के विपरीत, भारत में हम लोग  रोगों के नियमबद्ध चिकित्सा प्रक्रिया के आदी नहीं हैं. हर चिकित्सक रोगों की चिकित्सा अपने तरीके और ‘अनुभव’ के अनुसार करते हैं. कोरोना के बारे में चिकित्सा समुदाय का अनुभव तो अवश्य सीमित है.  फलतः, दुष्परिणाम समय-समय पर सामने आता है. अगर यह भी माना जाय कि मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) त्रुटिपूर्ण चिकित्सा के कारण नहीं हुआ है, तब भी मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) के रोगियों के चिकित्सा रिकॉर्ड के निष्पक्ष जांच से इस रोग की एकाएक वृद्धि के कारणों का पता लगाया जा सकता है. संभव है, शीघ्र ही वैज्ञानिक भारत में मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) की संख्या में अचानक वृद्धि के कारण की जड़ तक पहुंचें. यह आवश्यक है.

   

 

Saturday, May 29, 2021

जटही पोखर

 

जटही पोखर

तालाबों भरे गाँवमें मैं वर्षों तक अछूत-सा था : जटही पोखर. दक्षिणमें भुतही गाछी. उत्तरमें बड़ा-सा कलम बाग़. भीड़के ठीक नीचे उत्तर-दक्षिण जाता सड़क, बड़ा-सा मैदान, पीपल का पेड़, बच्चोंका स्कूल, संस्कृत पाठशाला, और फिर दूसरा पोखर जो नजदीक के लक्ष्मीनारायण मन्दिर का पोखर है. मेरे पूरब, और मेरे पश्चिम के पोखर के पश्चिम जहाँ तक नजर जाए केवल धान के खेत.

लोग कहते हैं, गाँवोंमें जहां भी लोग होते हैं, भूत और चुड़ैल भी वहां डेरा डाल ही लेते हैं . लेकिन, बच्चे केवल डरते मुझसे हैं- जटही पोखरसे. इसलिए, मैं थोड़ी अपनी बातें कर लूं.

ऊँचे भीड़. खड़े किनारे. साफ़, गहरा पानी और भरपूर मछली. अलबत्ता एकबार चोरों को चोरी के सामान को  छिपाने की जगह नहिं  मिली तो उसे मेरे जटही पोखर मे ही डुबा गये और आज तक किसीको उसकी खबर न मिली.

कभी कभार कोई दिलेर इंसान रात को मछलियों के लिए जटही पोखरके पानी में चारे डाल जाता है और दिनमें बंसी डाल कर अपना हुनर आजमाता है. मछली मिली तो ठीक, नहीं तो कमला के किनारे इस गाँव में मछली की कमी है भला.

बच्चे भूल कर भी हमारे किनारे पर नहीं आते. बच्चों को कहते कई बार सुना है, ‘जटहीके पेट में गोह है. पानीमें पैर डाला कि नहीं, सीधा खीच लेता है. सुना है, कभी-कभी गोह पानी से निकलकर बच्चों की तलाशमें किनारे पर भी बैठा होता है. पत्तों के बीच. पत्तों जैसा ही रंग. रंग बदल लेता है. आखिर है तो गिरगिट ही !’ इसलिए नजदीक के गाछी के पेड़ों के पके और गिरे हुए आम भले सड़ जाएँ, ये बच्चे इधर मुंह नहीं करते. बर्ना, बच्चे कहीं पके आम को छोड़ते हैं ! पर, कभी-कभार चरबाहे, हल-कुदाल चलानेवाले किसान और बटोही  जटहीमें पैर हाथ धो लेते हैं. लक्ष्मीनारायण के मन्दिर का पोखर सड़क से थोड़ा अलग जो है. 

जटही पोखर 

आखिर किसको अपना जन्म याद होता है. मगर, बरगदके पेड़ के नीचे बैठे बड़े-बूढ़ों की बातें एकबार सुनी थी. कहते हैं, एकबार बहुत बड़ा अकाल पड़ा था. रोजगार की तलाश में दूर दूर से आए लोग जहां-तहां घूम रहे थे. उसी समय दूर से आया जाटों के एक जत्थे ने इस गाँवमें डेरा डाला था. उन्होंने ही यहाँ एक तालब खोदा था, जिससे मेरा नाम जटही हो गया: जाटों का खोदा तालाब. आस पास के गाछी-कलमबागमें भूत चुड़ैल भले हों, मगर, मेरी असली बदनामी बाद में हुई, जब मोदाइ झा नाम का एक गबरू जवान जटही में डूब कर मर गया था. सुनते हैं, मिर्गी की बिमारी थी उसे. किनारे के पास से जा रहा था. दौरा पड़ा. दौरे में ही लुढ़क कर पानी में जो गिरा, बाहर नहीं आ पाया. लोग कहतें हैं, आस-पास की चुड़ैले उसकी गर्दन चबा गयी थी. बच्चे तो खौफ से पूरब की तरफ देखना भूल गये थे. क्यों न हो. यहाँ के स्कूल के बच्चे कद में इतने छोटे होते थे कि उनकी ऊँचाई स्कूलके चबूतरे तक भी नहीं पहुँचती थी. मोदाई झा तो उनके सामने ताड़ था. जब जटही उसे गटक सकती है, तो बच्चों की क्या बिसात ! स्कूल में भी जब किसी बच्चे ने पैंट में मूता या क्लास में बातें की, कि मास्टर जोर से चिल्लाते, ‘इसे जटहीमें फेक आओ’. मजे लेने के लिए जैसे ही बड़े बच्चे गुनहगार बच्चे की ओर लपकते, अपराधी बच्चे को साँप सूंघ जाता था. छिपने की तो कोई जगह थी नहीं. स्कूल भी क्या था, मिट्टी का एक लम्बा चबूतरा था जिसके उत्तर और दक्षिण के  दोनों छोर पर शीशम के दो ऊँचे खम्भे थे. खम्भे के उपर एक सीधा बरी था और पूरब और पश्चिम के तरफ गिरती एक-एक छप्पर. जब छप्पर जर्जर होने लगता था, कोई गौवां पांच- दस बोझ फूस दे जाता था. मास्टर लोग श्रमदान से उसे किसी तरह छत पर डलबा देते थे. इसी भवन (!) के उत्तरी हिस्से में स्कूल का क्लास लगता था और दक्षिण के तरफ मौलवी मोहम्मद युनुस का मदरसा , जहाँ मौलवी साहब अपने शागिर्दों को उर्दू की तालीम देते थे.

एकबार बड़े अंधड़ में स्कूल का छप्पर जो उड़ा, सो उड़ ही गया. जाड़ेके दिन तो बच्चे धूप में बैठ लेते थें और मास्टर लोग संस्कृत पाठशाला के बरामदे पर अपना बेंच  डाल लेते थे. मगर मौलवी साहब ने भी हौसला नहीं छोड़ा. लेकिन ये बातें, तो बात की बात है. स्कूल तो बाद में बड़े पीपल के नीचे, और उसके बाद गाँव के तीसरे किसी पोखर के भीड़ पर चला गया था. इस छोटे से गाँव में भला पोखर और कलमबाग़ की कमी है ! हमारे करीब से स्कूल के हंटते ही  बच्चे सदा के लिए मेरी नजर से दूर हो गये. और जटही का खौफ भी जाता रहा !

लक्ष्मीनारायणके मन्दिर का पोखर. उसकी तो और ही बात थी. कहते हैं, महाराजा की माँ इस गाँव में पैदा हुई थीं. उन्होंने यहाँ पोखर खुनबाने की सोची, तो चमत्कार हो गया. तालाब से लक्ष्मीनारायण की मूर्ति जो निकल गयी. मूर्ति निकल गयी, तो मन्दिर भी बन गया. मन्दिर बन गया  तो संस्कृत पाठशाला भी खुल गया. लक्ष्मीनारायण तो उस पोखर के पानी से नहाते ही थे, लोगों को भी उस पोखर का पानी मीठा लगता था. पीछे किसी ने उस पोखर में मखाने के बीज डाल दिए तो डूबने की परवाह किए बिना कच्चा मखाना के लिए बच्चे पोखर के पानी में उतरने लगे. मखाने से याद आया. यहाँ के लोग पान और मखान के लिए पागल हैं. कहते हैं, पान और मखान स्वर्ग में भी नहीं मिलता है. पर, वो तो दूसरी बात है.  मखाने की एक और बात है: इसके फूलों का रंग केसर के फूलों जैसा भले हो, पर, पत्तों पर कांटे ! बाप रे बाप !! तभो तो अगर कभी किसी लड़के, ने इस गाँव की किसी लड़की को छेड़ा, तो वह मुँह बनाती है और कहती है, ‘ मखाने के पत्ते से मुँह पोछ कर आ जा !

पर बातें तो हम पोखरों की हो रही थी. हम लड़के-लड़कियों पर कहाँ चले गये. हाँ,  लड़के-लड़कियों से याद आया. एक दिन इस स्कूल का कोई ‘बूढ़ा’ बच्चा शहर से यहाँ आया था. गाँव में वैसे ‘बूढ़े’ बच्चों की कमी नहीं. यहाँ की ‘बूढ़ी’ बच्चियों को तो मैंने कभी लौटकर आते नहीं देखा. एक बार गाँव से गयीं, सो गयीं. तो फिर यहाँ के  ‘बूढ़े’ बच्चों की बात करते है. उस दिन जब इस स्कूल का वह ‘बूढ़ा’ बच्चा शहर से यहाँ आया था तो लक्ष्मीनारायण के मन्दिर का पोखर देखकर वह शहरी ठंडी साँसे ले रहा था. लक्ष्मीनारायण के मन्दिर के पोखर का जलकुम्भी से भरा पेट. ढहते भीड़ और सूनसान सा मैदान ! स्कूल तो कब का यहाँ से चला गया था. संस्कृत पाठशाला के खपरैल कमरे कब के मिट्टी में मिल चुके थे. कभी-कभार कोई भूला भटका बूढ़ा पण्डित लक्ष्मीनारायण का दर्शन करने आता है तो पाठशाला मिट्टी माथे लगाता है. एकबार स्कूल का एक बूढ़ा विद्यार्थी बूढ़े पीपल की तस्वीर भी खींच कर ले गया था.

हाँ, तो, उस ‘बूढ़े’ विद्यार्थियों की बात तो रह ही गयी. वह शहरी लक्ष्मीनारायण के मन्दिर का पोखर देखकर ठंडी साँसे ले रहा था. जलकुम्भी से भरा पेट और ढहते भीड़ को देखकर पुरानी बातें कहा रहा था. कहा रहा था, जटही से तो लोग बाग़ सब दिन ही डरते रहे, लेकिन, लक्ष्मीनारायण का पोखर ? वह तो हमरा साथी था. लगता है, एक के बाद एक गुजरते जाते  हमारे बांकी साथियों की तरह यह भी नहीं बचेगा ! इस पर ग्रामीण बूढ़े ने जो कहा उससे मुझे कैसा लगा यह कहना मुश्किल है . ग्रामीण बूढ़ा जो शहरी के बचपन का अजीज था, कहा रहा था, अब  यहाँ कोई पोखर, कोई इनार नहीं बंचेगा. घर-घर में नल है, पर  खेतो में हल नहीं. गाँवमें मवेशी नहीं, चरवाहे, हरवाह, बहलमान भी नहीं हैं . लक्ष्मीनारायण के मन्दिर में भी नलका लग चुका है. पोखर के पानी में रसोई बनाकर खाने से नए, युवक पुजारी की आंत उखड़ गयी थी. अब गाँव के लोगों के पास अफरात पैसे हैं. पर गाँव में जमीन नहीं है. जमीन का भाव आसमान छू रहा है. इसलिए, इस बार जो देखना हो देख लो. तस्वीर खींच लो. अगली बार आओगे तो न तो जटही मिलेगा, न लक्ष्मीनारायण का पोखर. सब सपाट हो जाएगा !

 

Tuesday, May 25, 2021

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध केर पदचिन्ह पर चलैत

                                                 सिद्धार्थ गौतम बुद्ध केर पदचिन्ह पर चलैत

सिद्धार्थ गौतम जन्मसँ राजकुमार रहथि. मनन आ चिंतनसँ ओ बुद्ध भए गेलाह. पछाति, हुनक अनुयायी लोकनि हुनका महात्मा, भगवान, आ अवतार, सब किछु बना देलखिन. तथापि, समाज हुनका जे किछु बूझनु, गौतम रहथि तं समाज सुधारक. हमरो लोकनि नेना मे बुद्धक खीसा किछु एहिना पोथीमें पढ़ैत रही. हं, दोसर गप्प जे हमरा मोन अछि, से छल एकटा प्रश्न जे शिक्षक लोकनि हमरा लोकनिसँ  पूछथि : बिहारक नाम ‘बिहार’ किएक पड़लैक. एकर उत्तर – ‘पहिने एहि क्षेत्र में अनेक बिहार सब रहैक’- सेहो छात्र लोकनि  सुग्गा-जकां सुनथि आ सएह जवाबो देथिन. मुदा, ककरो मन में ई नहिं अबैक जे संस्था-बिहार- पहिने बहुतो ठाम छलैक , से कतय चल गेलैक ! ततबे नहिं, जं बुद्ध भगवान छथि तं हुनकर मन्दिर कतहु किएक नहिं छनि !! ई गप्प ने शिक्षक पढ़बथिन, आ ने छात्र पुछथिन. हमरो मन में ई प्रश्न छात्र जीवन में कहियो नहिं आयल. हमरा लोकनिक मोन में प्रश्न किएक नहिं उठैत छल, प्रायःतकर कारण ताकब कठिन नहिं; जाहि परिवारमें ढेर लोक रहतैक ताहि ठाम अनुपस्थित सदस्यक खगता लोक कें कदाचिते अनुभव होइत छैक. हमरा लोकनि कें छत्तीस करोड़ देवताक अतिरिक्त शीतला माता, नाग-नागिन, डिहबार- सलहेस, धरमराज की नहिं रहथि ! तखन जं बुद्ध नहिए छथि, तं कोन खगता. तथापि, बुद्ध केर शिक्षाक जे मूल विन्दु सब रहनि से हम प्राथमिके वर्गमें कंठस्थ कए नेने रही. कारण, ओहि सब म सँ  अनेको - सत्य बाजब, चोरि नहिं करब, अनका दुःख नहिं देब- हमरा रुचैत छल. तथापि, जाधरि हम मैट्रिकक परीक्षा नहिं देलहुँ, बुद्धक विषयमें हमरा एतबे धरि ज्ञान भेल छल जे सिद्धार्थ गौतम राजा शुद्धोदनक पुत्र रहथि.हुनका बोधगया में कठिन साधनासँ ज्ञान प्राप्त भेलनि आ ओ ‘बुद्ध’ कहयलाह . गया तं हिन्दुओ लोकनिक तीर्थ छले. मिथिलांचलसँ माता-पिताक मृत्युक पछाति, जेठ बेटा सुविधानुसार गया जा कय फल्गू नदीक तट पर पिण्डदान कय माता-पिताक मुक्तिक दायित्व पूर्ण करैत रहथि आ गाम वापस आबि गौआं-सौजनिया ले भोज करैत रहथि.

1971 वर्षमें हम मैट्रिकक परीक्षा देल. परीक्षाक पछाति, पहिल बेर पटना जेबाक अवसर भेटल. ओही बेर जेठ भाई लोकनिक संग गया-बोधगया सेहो गेलहुँ. पछाति, 2005 में सारनाथ, 2006 में उत्तरप्रदेश में कुशीनगर गेलहुँ, आ  2008 में बुद्धक जन्म-स्थान लुम्बिनी, नेपाल जा कय बुद्धसँ जुड़ल चारू  पवित्र तीर्थक यात्रा समाप्त भेल. पछाति तं भारतसँ  बाहर सेहो बुद्धक उपस्थितिसँ परिचय भेल. मुदा, तकर  गप्प एतय नहिं.

महत्मा बुद्ध: महाबोधि मन्दिर, बोधगया 

संयोग एहन छल जे बुद्ध हमर चेतनामें बाल्य-कालहिं एकटा महापुरुषक स्थान ल चुकल रहथि, आ ओ भौतिक रूपें सेहो हमरा संग-संग चलैत गेलाह. इहो संयोगे छल जे 1983 में जखन हम सेनामें योगदान कयल तं हमर पहिल पोस्टिंग तिब्बती शरणार्थी लोकनिक संग भेल. ओ लोकनि भारत कें पवित्र देश आ भारतीयकें गुरु-जकां बूझैत रहथि. एतेक तक जे तिब्बती सैनिक आम भारतीय सैनिकक नामक पाछां गुरु जोड़ि देथिन, जेना, शर्मा गुरु, आदि. बौद्ध लोकनिक संगक अनुभव कें हम अपन कथा आ संस्मरण में आनो ठाम लिखने छी. तें, एतय ओकर दोबारा कहब आवश्यक नहिं. तिब्बती शरणार्थी लोकनिक संग छोड़लाक करीब चौदह वर्ष बाद हम लद्दाख़ पहुँचलहुँ. लद्दाख़में भगवान-भगवतीक पूजा-स्थल नाम पर चाहे तं बुद्ध केर मन्दिर रहनि,  वा मस्जिद. लद्दाख़क अढ़ाई वर्षक प्रवासमें पुनः हम बुद्धकेर पद-चिह्नक अनुगमन करैत रहलहुँ . आब पछिला आठ वर्षसँ दक्षिण भारत में छी. एतय बुद्ध केर प्रत्यक्ष दर्शन तं कतहु नहिं हयत, किन्तु, सुदूर अतीतसँ अबैत ध्वनि कें जं नीकसँ अकानबैक तं बुद्धक स्वर सुनबामें अवश्य आओत.ओकर विस्तारसँ चर्चा पछाति फूट हेतैक. तें, ओकर गप्प एतय नहिं. एतय लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ आ कुशीनगरक यात्राक छोट-छोट झलक देब हमर उद्देश्य अछि.

हम जहिया लुम्बिनीक बौद्ध तीर्थ गेल रही, 2008 साल रहैक. नेपाल में राजतन्त्रकेर  सूर्य अस्त भय गेल रहैक आ कम्युनिस्ट लोकनिक लोकतंत्रिक सरकार सत्ता में छल. ओतय पुनः चुनाव हयबा ले रहैक. हमरा लोकनि छुट्टीमें पोखरासँ  पटनाक बाट में रही. सोचल लुम्बिनी सेहो देखि ली. सोनौली बॉर्डर लग नेपालक ‘प्रकाश’ नामक होटल में डेरा छल. रिक्शा लेलहुँ आ लुम्बिनी दिस विदा भ’ गेलहुँ. हम जतय कतहु जाइत छी जकरासँ भेंट भेल, किछु गप्प- सप्प करय लगैत छी. रिक्शावाला हिंदी-भोजपुरी भाषी छल. पुछ्लिऐक : एहि बेर ककरा भोट देबैक, कम्युनिस्ट कें, कि नेपाली कांग्रेस कें ? रिक्शावाला रिक्शा चलयबाक व्यवसाय करैत छलाह, किन्तु, बुद्धि में थोड़ नहिं छलाह. कहलनि, ‘उकासी आयगा, तब न मुँह खोलेंगे !’ हमरा अर्थ लागि गेल ! हम सोचल एखन नीक हयत जे हिनकासँ  लुम्बिनीएक गप्प करी, आ एहि ऐतिहासिक स्थलक दर्शने करी.

सिद्धार्थ गौतमक जन्मस्थल 

सरोवर जतय सिद्धार्थकें नहाओल गेल रहनि 

नेपाल आ भारत पड़ोसी अछि. किन्तु,जखने सीमा पार करब अंतर देखबा में आओत. भारतमें जोगबनी-सुनौली-रक्सौल गंदगीसँ भरल; गंदगीमें बिहारमें रक्सौल सबसँ अव्वल. विराटनगर-भैरहबा-वीरगंज साफ-सुथरा आ चिक्कन-चुनमुन. लुम्बिनी तं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थान थिक, तें सहजहिं साफ़-सुथरा. ओहुना ई महानगर तं थिकैक नहिं. गाम सब दूर दूर छैक. एतय हमरा लोकनिक पर्यटनक केंद्र-विन्दुमें छल महात्मा बुद्ध केर जन्म-स्थान. एहि ठाम अनेक पुरातात्विक अवशेष आ पवित्र स्थल सब छैक जाहि में सबसँ  प्रमुख थिक ओहि भवनक भग्नावशेष, अवशेषक भीतर ओ स्थान जकरा सिद्धार्थ गौतम  केर माताक पेटसँ बहरयबाक स्थल-जकां चिन्हित कयल गेल छैक. इतिहास विदित अछि, सिद्धार्थ गौतम केर जन्म गाछ तर भेल रहनि. सम्भव छैक, पछाति राजा महराजा लोकनि ओतय भवन-निर्माण कयने होथि जे आब ध्वस्त भय गेल छैक. समीपे में एकटा सरोवर छैक जाहि में जन-श्रुतिक अनुसार शिशु सिद्धार्थकें पहिल बेर स्नान कराओल गेल रहनि. एकर अतिरिक्त एहि ठाम अनेक भवन आ उद्यानक भग्नावशेष छैक. बुझबाक थिक, बुद्धकेर जन्मक पछाति पिछला पचीस सौ वर्षमें कतेक राजा आ सामंत अपन आस्थाक प्रतीक बुद्ध केर जन्म भूमि में कतेक निर्माण करओने हेताह, कतेक उत्सव मनओने हेताह आ ओहि निर्माण में कतेक पुरान घर खसल हयत. तथापि, एहि सब स्थानक वर्णन चीनी तीर्थयात्री आ लेखक फाहियान आ ह्वान त्सांगकेर यात्रा-वृत्तांतमें अछि.

सर्वविदित अछि, प्रागैतिहासिक समयसँ एखन धरिक सब राजा, सामंत आ प्रशासक अपन कार्य आ निर्माणसँ पहिलुक कृति आ निर्माणमें उत्कृष्टताक रंग टीप करैत छथिन.बुद्ध केर निरंतर स्मरणहिक फल थिक जे बुद्ध एखनो लोककें स्मरण छथिन. ककरो, महात्मा-जकां, ककरो ईश्वर-जकां, आ ककरो सनातन धर्मक शत्रु-जकां !

हमरा सर्वदा ई जिज्ञासा रहल अछि जे बुद्ध केर समय में ओ क्षेत्र केहन छल जतय ओ साधनामें बैसल छलाह आ ज्ञान प्राप्त केने रहथि. विदेशी पर्यटक फाहियान आ ह्वेनत्सांगक वृत्तांत आ तारानाथक इतिहास क्रमशः भारतमें बौद्ध परम्पराक पुरान इतिहास सब थिक. किन्तु, फाहियान आ ह्वेनत्सांग सेहो  बुद्धकेर मृत्युक अनेक शताब्दीक पछाति भारत आयल रहथि. फाहियान आ ह्वेनत्सांग अपन वृत्तांतमें बुद्धसँ सम्बन्धित प्रत्येक स्थलक वर्णन कयने छथि. हुनका लोकनिक वृत्तांतमें बाटमें पड़ैत आनो स्थान सबहक वर्णन अछि. भाषाक दुरूहता, विभिन्न अनुवादक विपर्यय आ दीर्घ कालक कारण बहुतो स्थान कें चिन्हब कठिन छैक. तथापि, फाहियान आ ह्वेनत्सांग भारतीय महाद्वीप में ततेक समय बितौने रहथि जे बुद्धसँ सम्बन्धित कोनो स्थान आ ओही दिनुक जनश्रुतिक चर्चा हुनका लोकनिसँ छूटल नहिं छनि.


महाबोधि मन्दिर 

बोधि वृक्ष आ बज्राशन- ओ चबूतरा जाहि पर बैसि सिद्धार्थ साधना केने रहथि 

आब बोधगया पर आबी. फाहियान 399 ई. सँ 412 ई. धरि चीन, मध्य एशिया,भारत, दक्षिण आ दक्षिण-पूर्व एशियाक यात्रा केने रहथि. फाहियान लिखैत छथि,’गया शहर खाली-खाली छल. एकदम भकोभंड’. ओ पहिने गया शहरसँ  करीब 6-7 माइल दक्षिण दिस ओतय पहुँचलाह जतय सिद्धार्थ गौतम बुद्धत्वक प्राप्तिक पूर्व छौ वर्ष धरि कठिन तपस्या कयने छलाह. फाहियानक समयमें ओहि स्थानक चारू दिस जंगल छलैक. ओहि स्थान सं करीब एक माइल पश्चिम ओ जलाशय रहैक जतय बुद्ध स्नान कयने रहथि.स्नान करबाक समयमें सिद्धार्थ गौतम कठिन तपस्याक कारण ततेक दुर्बल रहथि जे हुनका जलाशयसँ  बहरयबाक हेतु ओतुका एकटा वृक्षक शाखाक सहारा लेबय पड़ल रहनि. ओही जलाशयसँ किछुए दूर ओ स्थान सब छलैक जतय ग्रामिका कन्या हुनका चाउरक खीर देने रहथिन आ सिद्धार्थ प्राण-रक्षाक हेतु भोजन केने रहथि. फाहियान लिखैत छथि, ‘ ओ वृक्ष आ ओ शिला एखनहु ओतय अछि, जतय सिद्धार्थ बैसि कय भोजन केने रहथि.’ एहिना फाहियान बुद्धसँ सम्बन्धित आओर सब स्थानक वर्णन कयने छथि. एहि वर्णनमें स्थान-सन स्थूल आ स्थायी संज्ञाक संग मिथक, पूर्व-जन्मक संदर्भ, आ दैविक चमत्कार सब कथुक चर्चा छैक. स्पष्ट छैक, समयक संग-संग ऐतिहासिक घटना आ चमत्कार महापुरुषक जीवनक सत्य संगे ओहिना मिझर होइत चल जाइत छैक जेना चाउर दालि संग अकटा-मिसिया. मुदा, दुनूमें अन्तर छैक, चाउरमें मिझर अकटा-मिसियाक दानाकें बिछि फूट कय सकैत छी. किन्तु, महापुरुषक जीवनक इतिहासक संग मिझड़ायल मिथक आ चमत्कारकें फुटकयबाक प्रयासकें धर्मक विरुद्ध आचरण बूझल जाइछ. कारण दैवी चमत्कार ईश्वरत्वक प्रमाण आ अभिन्न अंग बूझल जाइछ.

हम 1971 क गर्मीक मासमें जहिया बोधगया गेल रही, जहां धरि हमरा स्मरण अछि, महाबोधि मन्दिरक परिसर जनशून्ये-जकां रहैक. मुदा, महाबोधि मन्दिर, ओकर पछुआड़क बोधि वृक्ष आ दुनूक बीच बज्रासनक चबूतरा ओतुका सबसँ प्रमुख  आ दर्शनीय छल. तहिया कैमरा तं छल नहिं. तें फोटो तं नहिंए झिकने रही. मुदा, मन पड़ैत अछि, महाबोधि मन्दिरक अतिरिक्त तब्बिती आ जापानी मन्दिर आ धर्मचक्र तखनो रहैक.  दोसर बेर 2011 में जखन बोधगया गेलहुँ तं महाबोधि मन्दिरक आसपास ओहने चहल-पहल देखलियैक जेना धर्मस्थानमें होइत छैक. मुदा, भीड़-भड़क्का हिन्दू धर्मस्थान-जकां नहिं. कारण बूझब कठिन नहिं. जे किछु. महाबोधि मन्दिर केवल बोधगया केर नहिं, विश्व भरिक बौद्धक हेतु आस्थाक केंद्र-विन्दु थिक. ह्वेनत्सांगक वृत्तांतक अनुसार आरम्भिक महाबोधि मन्दिरक निर्माण एकटा शैव ब्राह्मण द्वरा भेल छल.ओहि ब्राह्मणक भाई एतुका पोखरि खुनबौने छलाह. एहि मन्दिरक पाछांक पीपरक गाछ तं इतिहास विदिते अछि. कहल जाइछ, सम्राट अशोक सेहो अपन शासनक दसम वर्षमें बोध गया आयल रहथि. बोधि वृक्षक प्रति सम्राट अशोकक अगाध प्रेम आ निष्ठाक प्रति इर्ष्यासँ  कारण हुनक पत्नी बोधिवृक्षकें कटबा देलखिन्ह. तथापि, बोधिवृक्ष समूल नाश नहिं भेल.पछाति सम्राट अशोककहिंक प्रेरणासँ बोधिवृक्षक ब’ह श्रीलंका गेल. इतिहासक अनुसार एखनुक बोधिवृक्षक ठीक पहिलुका पूर्वज 1876 ई. क पछातिक थिक. पुरातत्वविद आ भारतक सर्वेयर जनरल एलेग्जेंडर कनिंघम बोधिवृक्षकें 1862 सँ 1875क अनेक बेर भिन्न-भिन्न अवस्थामें देखने रहथिन. कनिंघम लिखैत छथि, ‘1876 में गाछक बंचल भाग केर खसला उत्तर बोधिवृक्ष समूल नष्ट भए गेल छल.’ पछाति ओकरे बीआसँ ओही वृक्षक वंशज आइ बोधिवृक्षक रूपमें अछि.

एखन बोधगयामें महाबोधि विहारक अतिरिक्त अनेको विहार, स्मारक, मूर्ति, सेवा-संस्थान अछि. किन्तु, दुःखद थिक जे बुद्धकेर साधना-भूमि, गया सम्पूर्ण बिहारमें अपराध आ अपहरण ले प्रसिद्ध अछि. तथापि, एहि स्थानक महत्व आ ऐतिहासिकताक कारण अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन आ हिन्दू तीर्थयात्रीक तीर्थाटन एतुका आमदनीक मुख्य श्रोत थिक. गयामें अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनि गेने निर्विवाद पर्यटनकें बल भेटलैए.

नालंदाक अवशेष 

पावापुरीक भव्य द्वारि 

सड़कसँ पटनासँ  गया-बोधगया जाइत जहिना बाटक कातेकात लहलहाइत खेत, भोरुका बसातमें अगराइत फसिल भेटत, तहिना इतिहास एम्हर पग-पग पर छिड़ियायल भेटत. समय अछि, तं थम्हू. आ सुदूर भूत केर इतिहासक स्वरकें अकानू. समय अछि तं थोड़बे घुमानसँ नालंदा, राजगीरक अवशेष , आ  पावापुरीक जैन तीर्थ सेहो देखि लेब. इतिहास बिहारक हेतु जतबे उदार छैक, वर्तमान ओतबे कंजूस. दोष तं हमरे लोकनिक थिक. बिहार आ बिहारी तं ओएह थिक. भूमि, जलवायु, वनस्पति आ भैषज्य तं ओएह छैक. तखन उर्बरता किएक नष्ट भए गेल से सोचबाक थिक. आब सारनाथ चली.

इतिहास विदित अछि, सारनाथक मृग-वनमें गौतम बुद्ध पहिल बेर उपदेश देने रहथि. गौतम बुद्धकें बोधिवृक्षक परिसरसँ  सारनाथ जयबामें किछु दिन लागल रहनि. हमरा ई दूरी तय करबा में करीब 34 वर्ष लागि गेल.

स्तूप: सारनाथ 
वर्ष 2005. बनारसमें अखिल भारतीय नेत्र- चिकित्सक संघ केर वार्षिक सम्मेलन रहैक. हम बनारस पहिनहु अनेक बेर गेल रही. किन्तु, एहि बेर सारनाथ जयबाक पहिल अवसर भेटल. सारनाथ में जे सबसँ  पहिने आकृष्ट करत ओ थिक ऐतिहासिक स्तूप. आब तं ऐतिहासिक हो वा समसामयिक, परमपावन संत होथि वा दुर्दान्त अपराधकर्मी, राजनेता वा अपराधकर्मी-राजनेता, सबहक चारुकात सुरक्षाचक्र, लोहाक गजाड़ा, आ ए.के.- 47 बंदूक नेने सुरक्षाकर्मी अवश्ये भेटत. बोधगया, सारनाथ वा सोमनाथ केओ एकर अपवाद नहिं ! केहन विडंबना ने !    

सारनाथक स्तूपक समीपहिं, संग्रहालयमें अनेक ठामसँ उत्खननमें प्राप्त मूर्ति, शिलालेख, पात्र, आ आन सामग्री सब भेटत. संग्रहालयकेर बाहर बौद्ध-मूर्ति, फोटो, तंखा, पात्रक संग खयबाक वस्तु, चाह-पानि सेहो भेटत. मुदा, जं वाराणसी आ सारनाथमें बौद्ध परम्पराक अनुशासनक कनियो अन्वेषण करबाक मनोरथ हो तं बिसरि जाउ. इतिहास विदित अछि, बौद्ध धर्मकें सनातन धर्म, विरोधीए टा नहिं, धर्मक शत्रु बूझैत छल. अस्तु, बौद्ध चिंतन जं सनातन धर्मक गढ़ बनारससँ बिला गेल तं उचिते. किन्तु, बनारसमें अपराध, ठगी, व्यभिचारकें देखबाक हो तं सब ठाम भेटत. हमरा तं जे अनुभव भेल से भेले. तें, धर्म तं अपन मनहिं में ताकी सएह उचित !

जेना हम सबठाम कहैत आयल छी, जं भारतीय सेनाक देल अवसर नहिं भेटैत, तं टाका खर्च क’ कय पर्यटन ले मध्यवित्त लोक कतेक ठाम घूमत. 2006 ई. हम लखनऊ कमान अस्पताल में पदस्थापित रही. भारतीय सेनाक कलकत्ता स्थित पूर्वी कमान आ लखनऊ स्थित मध्य कमान प्रति वर्ष नेपाल गोरखा भूतपूर्व सैनिक आ हुनका लोकनिक परिवार जनक हेतु प्रति वर्ष अनेक मेडिकल वेलफेयर टीम नेपाल पठबैत अछि. हमरा 1995 आ 2006 में एहि दलक नेतृत्वक अवसर भेटल. लखनऊसँ जाइत ई टीम गोरखपुर होइत जाइछ. 2006 में नेपाल जेबा काल किछु प्रशासनिक कारणसँ  हमरा लोकनिकें गोरखपुरक गोरखा रिक्रूटिंग डिपो ठहरय पड़ल छल. कुशीनगरमें महात्मा बुद्धकेर परिनिर्वाणक स्थान गोरखपुर सं बेसी दूर नहिं. बस, करीप 55 किलोमीटर. अस्तु, एक दिन स्थानीय बस पकड़ल आ कुशीनगरसँ भए एलहुँ .

ह्वेनत्सांग लिखैत छथि, कुशीनगरमें निरंजना नदीक कछेर पर दू गोट वृक्षक बीच, उत्तर दिशा दिस माथ राखि,  गौतम बुद्ध परिर्वाण प्राप्त कयलनि. ह्वेनत्सांग आगू लिखैत छथि, कुशीनगरमें तहिया साधु-समाजक भिन्न-भिन्न समाजक  किछु- किछु सदस्य, निवासी-जकां कतहु-कतहु रहथि.

एहि इतिहासक अनुसार मृत्युक पछाति, बुद्धके स्थानीय राजा, चक्रवर्ती राजाक समान सम्मान दैत, बुद्ध केर अंतिम संस्कारक हेतु अपन राज्याभिषेकक सभागार में स्थान देलखिन. मृत्युक पछाति बुद्धक पार्थिव शरीरकें स्वर्ण-मंजूषामें राखल गेल रहनि.

महापरिनिर्वाण में बुद्ध  (श्रोत: साभार, विकिपीडिया)  

एखनो, कुशीनगरमें परिनिर्वाणक स्थलमें दाहिना करोट लेने बुद्धके लम्बा प्रतिमा छनि. ओत्तहि पुरान भवन सबहक भग्नावशेष, आ  बर्मा देशक बौद्ध लोकनि द्वारा निर्मित आ परिचारित स्वर्णिम  पैगोडा/ मन्दिर सेहो अछि. हमरा लोकनि सब ठाम घूमि इतिहासक दर्शन कयल. एतहि आबि बुद्धकेर पदचिन्ह पर चलबाक हमर परिक्रमाक एक अंश पूर्ण भेल. भारत-नेपाल सीमक ओहि पार लुम्बिनी धरि जेबामें दू वर्ष आओर लगी गेल से तं कहनहि छी.  

सर्वविदित अछि, वैदिक धर्मक विधिक विरोध वा वैदिक धर्ममें सुधारक धाराक रूपमें विकसित बौद्धमत कें सनातनी लोकनि अपन शत्रु बूझि ओकरा भारत वर्षसँ  उखाड़ि फेकबाक संकल्प केने रहथि. फल ई भेल जे बौद्ध धर्म भारतक हृदयस्थल आ ह्रदय दुनूसँ बिला गेल. किन्तु, बौद्ध धर्मक विभिन्न परम्परा उत्तर, पूर्व, आ पूर्वोत्तर भारतक अनेक भागमें एखनहु जीवित अछि. विगत शताब्दीमें समाजमें अपमानित किछु दलित लोकनि डाक्टर अम्बेडकरक नेतृत्वमें बौद्ध धर्मकें अपनओलनि. किन्तु, आब ओहि घटनाक आधा शताब्दी बाद ओ मुहिम आब केवल सांकेतिक भए कए रहि गेले. तथापि, बुद्ध अमर छथि. कारण, केवल ज्ञान आ निर्देशित मार्ग पर चलबाक जीवन पद्धति बौद्ध धर्मक प्राण थिकैक. आ जाधरि बुद्ध केर दर्शनक तत्वकें  बूझनिहार विश्वमें जीवित रहताह, बुद्धकें सुधी मनुष्यक ह्रदयसबसँ केओ निकालि नहिं सकत. कारण, बुद्ध धर्म केर विरोधी नहिं, कृष्ण केर परम्पराक ओहने धर्म संस्थापक छलाह, जे धर्मक अवनति भेला पर समय-समय पर भूमि पर अवतरित होइत आएल छथि !           

  

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

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