Saturday, May 7, 2022

गुणी लोकनिक कथा

 

व्यंग

गुणी लोकनिक कथा

उचित बाजब अप्रिय होइत छैक, तें तं मैथिली मे कहावत छैक, उचित कहैत घर झगड़ा. एहि प्रकारक उक्ति संस्कृत सहित अनेक भाषा मे भेटत. ततबे नहिं,उचित बजलाक कारण  दण्डित हेबाक उदाहरणक कोनो कमी नहि. बहुतो विद्वान, राजनेता, आ संत उचित बजबाक फल भोगने छथि आ भोगि रहल छथि. ई सदासँ होइत आबि रहल अछि. सत्य बजने दण्डित हेबाक उदाहरण महाभारत काल  आ गैलिलियोक युग धरिमे भेटत. फलतः, बहुतो कतेको गोटे भले अनुचितक समर्थन नहिं करथि, मुदा, उचित बजितो नहि छथि. किन्तु, सब ठाम परिस्थिति एक रंग नहि. कखनो घटना व्यक्तिक जीवन होइछ आ कखनो सामाजिक वा  सार्वलौकिक.

अपन अहित होइत देखि मौन रहब व्यक्तिगत निर्णय थिक. तात्कालिक भय वा  भविष्यक चिंताक एकर कारण भए सकैछ. किन्तु, कोनोक समूहक प्रतिनिधित्वक भार लेला उत्तर अपन समूहक हितक चिंता नहि करब अनुचित थिक. अनुचित होइत देखि उचित नहि, बाजब अनुचितक समर्थन थिक.

सत्यतः, कोनो सत्य परम सत्य  नहिं होइछ. केवल जीवन आ मरण  एकर एकर अपवाद थिक. अन्यथा, सत्य, देश, काल, नीति आ  व्यवस्था-सापेक्ष होइछ ? तथापि, व्यावहारिक जीवन मे सत्य आ असत्य बीच भेद करबाक हेतु एतेक दूर जयबाक काज नहिं.

एतय प्रश्न अछि, सत्यक अवहेलनासँ स्वयं प्रभावित होइतो  लोक किएक चुप लगा जाइछ? एहन कोन बाध्यता होइछ.

की एहि प्रकारक बाध्यताक कारण राजाक नवका पोशाक (https://en.wikipedia.org/wiki/The_Emperor%27s_New_Clothes) नामक लोक कथा लिखल गेल छल. ई कथा प्रायः निरंतर असत्य बजबा में अभ्यस्त दरबारी लोकनिकें देखार करबाक हेतु लिखल गेल छल. मुदा, एहि कथाक प्रासंगिकता एखनो छैक.

कथाकें दोहरायब आवश्यक नहिं. तथापि, कहिए दी.

‘राजाक नवका पोशाक’ नामक ई कथा ओहि राजाक थिक जे अपन राज-काजक स्थान पर अपन पहिरना-ओढ़नाकें बेसी महत्व दैत रहथिन. एक दिन ठक लोकनिक एक दल, जोलहा बनि हुनका ओतय आयल आ कहलकनि जे हमरा लोकनि एहन वस्त्र बिनि सकैत छी जे विशिष्ट होइतो लोककें देखबा मे नहिं अओतैक.  राजाकें विश्वास भए गेलनि. किछु दिनक पछाति एक दिन ओ जोलहा लोकनि राजाकें नव वस्त्र पहिरयबा ले' उपस्थित भेल आ हुनका संग वस्त्र पहिरयबाक प्रपंच कयलक. राजाकें विश्वास भए गेलनि जे सत्ये अत्यंत निपुण (ठक) जोलहाक दल हुनका  नव (अदृश्य) पोशाक पहिरएबामे सफल भेल अछि. राजा ओहि चमत्कारिक परिधानकें देखयबाक लोभें अपन दरबार मे तं ओहिना बैसबे केलाह, अपन ओही (नग्न) स्वरुपमे नगर भ्रमण ले सेहो बहरा गेलाह. राजाकें नग्न देखितो  सभासद आ मंत्रीगण राजाक अप्रसन्न हेबाक भयसँ किछु नहि बजलाह. किन्तु, ओहि समूह मे उपस्थित एकटा नेना कें सब किछु आश्चर्यजंक लगलैक. ओ नेना कहि देलकनि: जा ! राजा तं नंगटे छथिन ! 

कथाक दोसर स्वरुपमे केओ निर्भीक वा सोझमतिआ नागरिक राजाकें पूछि देलकनि: ‘सरकार, की अपने दिगंबर जैन बनि गेलिएक-ए ?’

तखन अकस्मात् राजाकें  बुझबा में अयलनि जे ओ ठकल गेल छथि !

ओना मैथिलीमे एकटा आओर कहबी आओर छैक: अपन हारल बहुक मारल कतहु बाजए  !

बहुक मारलमे भले लोकलाजक भय होइक, किन्तु, जं सार्वजनिक प्रतियोगितामे बैमानीसँ अहाँ हरा देल गेल होइ, तं बजबामे कोन हानि ? सेहो जखन प्रतियोगिता सबहक सामने खुला मैदानमे भेल होइक ! एहि गप्प पर हमरा एकटा घटना मोन पड़ैत अछि. प्रायः एहुना होइत होइक आ लोक हारि मानि लिअय. तखन तं ठीके सत्य कें खिहारबाक कोन काज. जे भेल देह लगा कए मारू !  मुदा बाट तेहन  नहिं होइक तखन ?

चलू आब खीसा सुनू:

कोनो गाममे अनेक गुणी रहथि. ओतय गुणी सबहक समूहमे किछु गोटे एहनो रहथि जनिका गुणी हेबाक दाबी रहनि, मुदा, रहथि मूढ़, किन्तु, दबंग. 

मुदा, एतेक गोटेमे सबसँ बेसी गुणी  के ? एकर निर्णय करब असंभव छलैक. अनेक दिन धरि सब गोटे अपनामें खूब घोंघाउज-घमर्थनि केलनि. कोनो परिणाम नहि बहराएल. अंततः, सब गोटे सहमत भेलाह जे हमरा लोकनि अपने गामक पंडित लोकनिसँ ई  निर्णय कराबी. बड्ड बेस. 

आब भेल जे निर्णय कहिया हो. ई बड़का समस्या छल. किछु गोटे कहलखिन, पंडित लोकनिसँ  पुछैत छियनि. ओ लोकनि जखन कहताह, जायब. किन्तु, ओहि म सँ दबंग लोकनि अड़ि गेलाह. कहलखिन  आइए निर्णय करए पड़त. असलमे सब युवके छलाह आ सौराठ सभाक दिन लगिचायल रहैक. अंततः, सब गोटे हकासल पियासल एके संग गामक संस्कृत पाठशाला पर पहुँचि, पण्डित लोकनिक समक्ष उपस्थित भेलाह आ पण्डित  लोकनिकें अपना लोकनिक बीचक  समस्या कहलखिन.

पंडित लोकनि ओहि दिन बड्ड जल्दीमे रहथि. हुनका लोकनि सब गोटे संग-संग कतहु नोत खयबा ले विदा भेल रहथि. ओ लोकनि कहलखिन,  देखू काज कठिन छैक. एहन काजमे जल्दी नीक नहि. नीचेनसँ निर्णय हो से उचित. मुदा, बहुमत छलैक, जे आइए दूधक दूध आ पानिक पानि भए जाए. अंततः, जखन गामक गुणी  लोकनि पण्डित लोकनिक सबहक समक्ष कोनो विकल्प नहि छोड़लखिन तं पण्डित लोकनि एक दोसराक मुँह ताकए लगलाह. बुझलनि जे आइ कोनो उपाय नहि. अस्तु, ओ लोकनि तुरत अपना मे इशारहिसँ किछु मन्त्रणा केलनि. फलतः, पण्डित लोकनिमे सबसँ तेजस्वी पण्डितक विचार सब गोटे मानि लेलखिन. सोचलनि, विपत्तिमे कोनो बाट तं खूजल.

पण्डित लोकनिक प्रतिनिधि बाजब आरंभ केलनि: ‘बेस ! निर्णय एखने भ’ जायत. मुदा, एकटा शर्त पर.

युवक लोकनि साकांक्ष भेलाह.

वरिष्ठ पण्डित मुसुकी छोड़ैत कहलखिन, ‘ हं. निर्णय हएत. मुदा, हमरा लोकनि जे निर्णय एक बेर कए देल सबकें मानय पड़त ! मंजूर अछि ?’

गुणी लोकनि एक दोसराक मुँह ताकए लगलाह. जे लोकनि वस्तुतः गुणी रहथि, सोचलनि, चिंता कोन !  निर्णायकमे एक सँ एक पण्डित छथि. प्रतिष्ठित छथि. प्रतिष्ठित पण्डित लोकनि अपर अविश्वास करबो पापे थिक ! जे बकलेल रहथि, हुनको चिंता नहिं. सोचलनि: भाग्यं फलति सर्वत्रः, न विद्या न च पौरुषम् ! 

अस्तु, सब एक स्वरमे कहलखिन, ‘ अवश्य ! एवमस्तु .’

वरिष्ठ पण्डित सब प्रतियोगीकें एकटा वृत्त बना  विद्यालयक अंगनैमे भूमि पर  बैसय कहलखिन. दसो प्रतियोगी ठामहि पलथा मारि बैसि गेलाह. पण्डित लोकनि सेहो चतुस्पाटी पर बैसलाह. पण्डितक प्रतिनिधि अपन दहिना हाथक तर्जनीसँ प्रतियोगी लोकनिक दिस निर्देश दैत आरंभ केलनि:

औका, बौका, तीन तलौका  

लौआ लाठी, चानन काठी !

एवं क्रमे ई मंत्रोच्चार चलैत गेल. गुणी  लोकनि अवाक् देखैत रहि गेलाह. तेसर चक्कर चलैत-चलैत पण्डित जी निर्णय करैत विजेताक कान्ह पर हाथ धए हुनका उठा ठाढ़ केलनि आ विजेता घोषित केलनि !

बलेल बाबू सबसँ बकलेल होइतो विजेता गुणी घोषित भेलाह. बाँकी सब गोटे मुँह बिधुऔने घर घूरि गेलाह. किन्तु, प्रतियोगी तं छोड़ू परोपट्टामे कहियो केओ नहि बाजल जे ई अनुचित भेल.

अगिला साल हुरा-हरीक उत्सवक अवसर पर गौआ लोकनि विजेता गुणी कें माला पहिरओलनि.

ई गप्प बहुतोकें अनसोहांत लगलनि.

फलतः, गाम दिस घुरबाकाल एक गोटे सत्यतः गुणी, मुदा, पराजित प्रतियोगीक प्रति सहानुभूति देखबैत हुनका पुछलखिन, ‘अंय यौ, एहनो अन्याय भेलैए ! मुदा, अहाँ बजलिऐक किएक ने ?

प्रतियोगी दांत  निपोड़ैत कहलखिन, ‘ बताह भेलौं-ए ! हम अहीं जकाँ नेना छी. एके माघमे जाड़ नहिं जाइत छैक ! हुरा-हरी अगिलो साल हेतैक ने !!

गुणीक मित्र कें दांती लागि गेलनि. आ प्रश्न कयनिहार ठामहि भूमि पर खसि पड़लाह !    

Saturday, March 26, 2022

हर घर नल का जल : योजना आ यथार्थ

 

हर घर नल का जल : योजना आ यथार्थ 

अवाम, 21 मार्च 2022 

कोरोनाक भय गाम में एकदम नहिं छैक. अर्थात् आब लोक सामूहिक रूपें सब प्रकारक सामाजिक उत्सव मना रहल अछि. हमरा ओहि ठाम मातमी माहौल छैक. ‘ब्राह्मणस्य ब्राह्मणों गतिः’ क अनुकूल ब्राह्मणकें पयर पुजबैत देखलियनि. ई पयर पूजा हम स्वयं सिमरिया घाट में 1975 में कए चुकल छी. ओहि वर्ष हमर जेठ भाई ऊधोजी अकस्मात् चलि बसल रहथि. मुदा, हमरा अपना, ने तहिया आ ने आइ एहि सब में विश्वास रहल. देखि रहल छी, तीस हज़ार रुपैया में बच्छा तरे दू टा गाए अइलीहे. मुदा, दान होइते पात्र ओकरा पाँच हज़ार डिस्काउंट पर घाटहिं पर बेचलनि. मने मन सोचैत छी, ई पात्र जं स्वयं गाए बेचबाक व्यवसाय करितथि तं यजमान कें आफियत होइतैक.

युगक अनुकूल दानक लिस्ट समकालीन भेल जा रहल छैक. सात वर्ष पूर्व हमर स्वशुरक काज भेल रहनि. ओहि में मोबाइल फोन सेहो दान भेल रहैक ! एखनो टॉर्च, रेचार्जेबुल लालटेन लिस्ट में शामिल अछि. चौकी-खाट-पलंग तं हेबेक चाही. मच्छड़ स्वर्गहु में छैक. तें, मच्छरदानी सेहो.

हमर जेठ भाई भरत जीक बालक, सरोज कुमार एखन एहि कर्मकांडक कर्त्ता थिकाह. सब किछु एही परिवार में भए रहल छैक. किन्तु, हमर भाई भरत जी सब किछु कें एक वाक्य में समेटि कए कहलनि, ‘ एहि सबहक एके टा उद्देश्य; समाज में जकर खा आयल छिऐक, तकर बदला चुका रहल छी. बाँकी के देखलकैए !’ हमरा नहिं लगैत अछि, कोनो दार्शनिक एहि विषय कें एहिसँ बेसी नीक जकाँ बुझा सकैत छथि. किन्तु, लोक खर्च करैत अछि.

नवकी पोखरिक मोहार पर जाहि ठाम भौजीक काज भए रहल छनि, ओकर लगहिं एकटा नव पानिक टंकी देखैत छियैक. बिहार सरकारक नारा ‘ हर घर नल का जल’ पानी टंकीक गुमटी में लिखल छैक. एहि परियोजना में 12,59,000 टाका खर्च भेलैए, से गुमटीक देवाल पर लिखल छैक. मुखिया लोकनिक नाम सेहो लिखल रहनि. मुदा, केओ उकाठी पद छोड़ि, केवल नाम कें पाथरसँ मेटा देने छनि. सेहो नीके. कारण, टोल पर गेला पर घरे-घर पानिक टैप लागल देखलिऐक. मुदा, सुखायल. पानि नदारद. पता लागल जे पानि ने टंकी में छैक, आ ने नल में. एहन परिस्थिति में एहि परियोजनाक समापनक वाहवाही के लेत !

सोचए लगलहुँ, गाम में इनार सब पहिनहिं भत्थन भए चुकल अछि. जं लोक एहि नल जल पर हैण्डपंप कें उखाड़ब आरंभ कए देलक तं ओ दिन दूर नहिं जे एतहु चेन्नई आ बंगलोर जकाँ, एतहु लोक प्रतिदिन पानि किनब आरंभ कए देत. ओना किछु गोटे कहलनि, गाम में बोतल बंद पानि बिका रहल अछि. ततबे नहिं कमला कात हमर गाम में भूमिगत जलक स्तर तीन सौ फीट धरि पहुँचि गेल छैक ! शुकुर अछि, हमरा अंगना में ज़मीनक 120 फीट नीचा धरि गाड़ल कल में एखनो ओहने निर्मल शीतल मधुर पानि आबि रहल अछि जेहन 1979 में कल गड़यबाक समय अबैत छल ! हमरा अंगनाक ई कल हमर पिताक निसानी थिक. मुदा, कहिया धरि रहत, कहब असंभव.

एहि बेर पुनः किछु गौआं / टोलबैया लोकनि हमरा लोकनिक ओतय जमा छथि. दुर्गामन्दिरक परिसर में गेट लगयबा ले सहायता चाहियनि. एहि गाम में आइ धरि कहियो केओ सड़कक मरम्मत वा स्कूल में पढ़ाईक समस्याक चर्चा धरि नहिं केलनिए. केओ अस्पताल वा हेल्थ सब सेंटर खोलबाक गप्प नहिं करैत छथि. मुदा, ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित, सब गोटे मन्दिरक नाम पर एकमत छथि. ताहू में पिछड़ा वर्गक लोक मन्दिर निर्माण में अगुआ छथि. हमरा आश्चर्य नहिं होइछ, किन्तु, गामक प्राथमिकता बदलितैक से मनोरथ तं होइते अछि. मुदा, गामक लोकक अनपढ़ होइतो हिनक लोकनि कें गार्जियनक आवश्यकता नहिं. केवल हिनका लोकनिक योजनाक कार्यान्वयन ले अर्थ चाहियनि. ततबे.

गामक पूब कमलाक तटबंध पर हाईवे बनत से सुनलहुँ. मिथिला में सड़कक जाल बिछाओल जा रहल अछि. किन्तु, कोनो उद्योग आरंभ हएत वा कल-कारखाना लागत तकर कोनो लक्षण नहिं. माने, बिहार अगिलो समय में पंजाबसँ ल कए केरल धरिक हेतु दिहाड़ी मज़दूर आपूर्तिक हेतु झारखंड आ उड़ीसाक संग मुख्य श्रोत  रहत. बिहारक विद्यार्थी इंजीनियरिंग पढ़बाले कर्णाटक, तमिलनाडु वा महाराष्ट्रे जेताह. पढ़ल इंजीनियर नौकरी ले  बंगलोर, गुडगाँव, चेन्नई, हैदराबादे जेताह !

नहिं जानि कहिया बिहारक प्रतिभा आ परिश्रम बिहार में बिकायत. बिहारक उत्पादन में योगदान करत.

अवाम गामक भोरुकबासँ भेंट

 

अवाम गामक भोरुकबासँ भेंट

अवाम, 20 मार्च 2022

अहल भोरे टहलबा ले विदा भेलहुँ तं बहुत दिनक बाद अवामक भोरुकबासँ भेंट भेल.

हम सन 1971 मे गाम छोड़ल. मुदा, गाम आयब नहिं छोड़ने छी. मुदा, अवामक ई बिसरल भोरुकबा बहुत दिन बाद भेटलाहे. आइ बहुतो गप्प मोन पड़ैत अछि. वर्ष 1971 सँ पूर्व सूर्योदयसँ दू तीन घंटा पहिनहिं उठि कए पढ़ब आरंभ करी. कोनिया ओसाराक एक कात चौकी पर दादा सूतथि. दोसर कातक चौकी पर जीतन सूतथि. हमर चौकी बीच में रहैत छल. हमरा उठयबा ले हिनका दुनूक अतिरिक्त हमर माता सेहो तत्पर रहथि. दादा कें सूर्योदयक बाद उठैत हम कहियो नहिं देखलियनि. ओहि युग में परिवारक मुखिया लोकनिक इएह नियम रहनि. जीतनक हेतु भोर हेबाक सूचना भोरुकबे दैत रहनि. कहियो काल हमरा अलसाइत देखि कहथि, ‘बौआ उठू, ओएह भोरुकबा उगि गेलैक !’

गाम में भोरुकबाक देखब भोर हेबाक एलार्म रहैक. महिसबार सब ओहिसँ पहिनहिं पसर चरबै ले महिस के लए  कए निकलि जाइत छल.

आइ अपन दरबज्जा परसँ  निकलि पहिने शीबू भाई कें संग करी. शीबू भाई समयक पक्का छथि. बिलंब भेल तं निकलि जेताह. हमरो लोकनि तं तेहने अनुशासन में पलल छी. अजुका नेयार 5 बजे भोरक छैक. माने हम शीबू भाईक ओतय 5 सँ  पाँच मिनट पहिने पहुँची. तखने ने पाँच बजे टहलान ले विदा हयब. अन्यथा On time is late ! माने, निर्धारित समय पर तं नेयारल काज आरंभ भए जेबाक चाही !! भारतीय सेना में सएह अनुशासन छैक. हम अपन पन्द्रह वर्ष लंबा अध्यापनक अवधि में छात्र लोकनि कें इएह सिखौलियनि. एहिना करैत रहलहुँ. हमरा लोकनिक शिक्षक स्व. डाक्टर हरिनन्दन द्विवेदी दुपहरियाक दू बजेक लेक्चर ले क्लास में पौने दू बजे आबि बैसि जाथि. मुदा, आब अनुशासन बदलि गेलैए. अपना ओतय समयक पाबंदी प्राथमिकताक सूची में सबसँ नीचा. पांडिचेरी में जखन हम एकबेर तत्कालीन डीन डाक्टर कृष्णन कें विद्यार्थीक क्लास में बिलंबसँ अयबाक शिकायत केलियनि तं ओ कहलनि, ‘ पन्द्रह मिनट धरिक छूट दिऔक.’ हम कहलियनि,’ असंभव!’ विद्यार्थी कें समय पालन सिखाएब हमरा लोकनिक काज थिक!’ आ सत्यतः  हमरा संग सदा विद्यार्थी सब सहयोग करैत रहल.

आइ शीबू भाई संग भेलाह आ हमरा लोकनि विदा भेलहुँ. टोल परक कुकुर सब अलसायल भोरुका निन्न मारि रहल छल. बनिया टोल पर कोनो कुकुर कें अपरिचित गंध लगलैक. एक दू बेर भूकल. मुदा, हमरा लोकनि आगू बढ़ि गेलहुँ. आइ हमर जयबा काल बेसी गौआं लोकनि सुतले छथि. ग्राम देवता लक्ष्मीनारायण सेहो शेषनाग पर निभेर निन्न छथि. पुजारी कें हुनका उठयबा में एखन बिलंब छनि. हं, लक्ष्मीनारायणक दक्षिण भारतीय प्रतिनिधि, वेंकटेशक स्तुति तं कतेक काल पहिने आरंभ भए गेल हेतनि. अमृतसरक स्वर्णमन्दिर में सेहो भक्त लोकनिक पतियानी लागल हएत. अवामक लक्ष्मीनारायण गौआं लोकनिक परिवारक सदस्य थिकाह. वा पुरान युगक आदर्श राजा थिकाह जनिका समक्ष केओ, कखनो फ़रियाद लए सोझे उपस्थित भए सकैछ.ने कोनो पतिआनी, ने कोनो प्रतीक्षा.

तें, एखन हमरो लोकनि लक्ष्मीनारायण के सूतले छोड़ि सोझे (अवाम आ पोखरभिंडा गामक बीचक) बाध में आबि गेलहुँ. एतय अबिते भोरुकबा आ पूर्ण चन्द्रमा दुनू मुहांमुही ठाढ़ भेटलाह. भोरुकबा पुबरिया आकाश में आ चन्द्रमा पश्चिम दिस. आकाश एखन साफ़ अछि. वातावरण निर्वात, किन्तु सुखद. जेना, हेमंत ऋतु होइक. भोरुका झलफल में खेतक जजात तं नीक जकाँ नहिं देखबा में नहिं अबैछ, किन्तु, एखन रब्बी-राईक समय छैक.

क्रमशः पौ फाटि गेलैए. बाध दिस लोक आब भेटब शुरू भेले. एतय सड़कक एक कात पत्रहीन पीपर ठाढ़ छथि आ दोसर दिस आमक कलम आ गाछी में मज्जरसँ भरल आमक गाछक समूह. लगैत अछि, एहि बेर खूब आम फड़तैक. किन्तु, आमक मज्जर आ आमक फसलक बीच अनेक संभावना छैक. अगिला किछु मास में मौसम केर मिजाज़ सबसँ बड़का निर्णायक थिक.

किछु आओर आगू बढ़ला पर किछु परिचित गौआं लोकनि अभरलाह आ हमरा लोकनिक संग भए गेलाह. सड़कक कातक खेत में मसुरी उखाड़ि कए गोलियाओल छैक. एकटा ग्रामीण कहैत छथि, ‘ पहिनेक समय रहितैक तं उखाड़ल मसुरी कहिया ने पार भए गेल रहितैक ! आब पन्द्रहो दिन एतय रहतैक तं केओ छूबो नहिं करतैक.’ ई सूनि नीक लागल.

हमरा लोकनि पोखरिभिंडा गाम धरि गेलहुँ. आपस होइत रही तं पूर्वक क्षितिज पर सूर्यक लाल चक्का सेहो उपस्थित भेलाह. महानगर सब में चान-सूर्य-तारा देखबाक सेहन्ता होइछ. गाम घर में एखन धरि ई लोकनि नागा नहिं करैत छथि. धूल-धुआं, धोन, आ मेघ तं सबठाम स्पर्धा करैछ.

आपसी में लक्ष्मीनारायण केन सेहो सुगबुगाइत देखलियनि. हुनक मन्दिरक सामनेक विशाल पीपरक गाछ, हमर बोधि-वृक्ष, एखनहु एहि परिसर कें छाया दैत ठाढ़ छथि. संयोगसँ हिनका शरीर पर पातक आभाव नहिं, ई पत्रहीन नहिं छथि. नहिं जानि, सड़कक पुबारि कातक पीपरक देह एखन नांगट किएक छनि. छथि तं ओएह पोखरिक बेसी लग. मुदा, मोन बिखिन्न छनि. हुनका जड़ि में प्रायः फूल-बेलपात नहिं चढ़ैत छनि. श्मसानक लग छथि. कदाचित भयभीत होथि! चिता सबहक धाहसँ काया कवलित भेल होइनि.  

ई सब सोचिते रही कि, तावते हमर गौआं, विनोद, भजन गबैत बाटे-बाट जाइत भेटलाह. हम प्रत्येक बेर हुनका अपना घर में पितामहक अमल केर कबीरपंथी साहित्यक खोज पुछारि करैत छियनि. मुदा, लोकक रूचि केवल बाप-पितामहक छोड़ल संपत्ति-सोना-बास डीह आ गाछी कलम में होइत छैक. घरक सफाई में सबसँ पहिने पोथीए-पतरा बाहर फेकल जाइछ. दिबाड़ सेहो पहिने पोथीएक संहार करैछ. तखन बाबाक युगक किताब कतय भेटत !  

संयोगसँ एहि बेर गाम में भोरे पढ़ैत केओ नेना देखबा में नहिं आयल. लगैए, कोरोना कालक प्रभाव एखनो छैक. मुदा, गाम में एखन कोरोनाक भए देखबा में नहिं आयल.भरि गाम में एको गोटे मास्क लगौने नहिं भेटल. अंततः हम अपनों मास्क उतारि बैग में राखल.

एहि बेर हम भौजीक निधनक कारण गाम आयल छी. आइ आ काल्हि बहुत गोटे भेटताह. तखन गाम में आओरो  बहुत किछु देखबा में आओत.                            

Thursday, March 24, 2022

पारंपरिक मैथिली में ‘धन्यवाद’ शब्दक समावेश नहिं !

 मैथिली में आभारक अभिव्यक्ति

 पारंपरिक मैथिली में ‘धन्यवाद’क समावेश नहिं !

पश्चिमी सभ्यता में धन्यवादक खर्च बड्ड बेसी. हमरा लोकनि अपन गाम-घरसँ बाहर आबि बसलहुँ . आब हमरो लोकनिक जीवन में धन्यवादक खर्च थोड़ नहिं. तें, अपेक्षा जे लोक भरि-भरि आँजुर धन्यवाद दिअए. आ से नहिं भेटल तं नीक नहिं लगैछ. मुदा, किएक ? मैथिल समाज में हमरा जनैत धन्यवादक परंपरा नहिं. तखन, मिथिला में आभार प्रदर्शनक अवसर आ आभार प्रदर्शनक अभिव्यक्ति केहन होइछ, एतय एही पर विचार करी.

आरम्भ ‘धन्यवाद’ शब्दसँ करी. सत्यतः, ‘शब्दकल्पद्रुम’ में ‘धन्यवाद’ शब्द नहिं भेटल. अर्थात् संस्कृत साहित्य में वार्तालाप में (प्रायः) धन्यवाद शब्द नहिं भेटत. हम अपने संस्कृत साहित्य नहिं पढ़ने छी. अस्तु, ई गप्प केओ संस्कृतक विद्वाने अधिकार पूर्वक कहि सकैत छथि.

आब मैथिली में आभार प्रदर्शनक किछु उदाहरण देखी. मूलतः, एहि सब में उपकार मानबाक स्वीकृति छैक.

हमर बड़ उपकार भेल.

ई उपकार जिनगी भरि नहिं बिसरब.

ई गुण नहिं बिसरब.

बेर पर (वस्तु/ अर्थ) काज आयल/ (अहाँ काज) अयलहुँ.

आबि कए पार लगा देलहुँ.

अहाँक सहयोगसँ  पार घाट लागल

पति रखलहुँ/ (सहायता) पतिराखन भेल.

पतित हेबासँ बचाओल.

उत्तरी(य) तोड़ाओल/ उत्तरी(य) टूटल.

जाति बचल

अजाति हेबासँ बचलहुँ.

खोज पुछारी राखल, उपकार भेल.

आभार-  ई शब्द मैथिलीक गप्प सप्प में पहिने तं नहिंए छल. आब तं हमरा लोकनि प्रयोग करिते छी.

धन्यभाग- एहि शब्द में आभार वा धन्यवादक ध्वनि नहिं छैक. एहि में अपन भाग्य पर संतोष छैक. अर्थात् ‘धन्यभाग. अहाँ अयलहुँ’ में सेहो अयबाक कारण अपन भाग्यक प्रशंसा छैक, आयल व्यक्तिक प्रति आभार नहिं.

पश्चिमी परंपरा में प्रीति- भोज आ निमंत्रणक हेतु सेहो आभार प्रदर्शनक परंपरा छैक. अपना ओतय नोतहारी ‘नोत मानि’ घरवारी पर उपकार करैत छथिन. तखन, धन्यवाद कथिक ? ऊपरसँ आइ अहाँ नोत देलहुँ, तं काल्हि हमहू देब. तखन उपकार कथिक! ऊपरसँ, आब तं सुनैत छी, गाम घरहुँ में नोतहारी भेटब कठिन. शहर में तं केओ नोत खयबा ले अयबो करताह तं रवि दिन, वा राति कए. यदि रविओ क नोतहारी कें आयब कठिन होइनि तं swiggy वा zomato app पर भोजन घर पर पठा दियनु. नोतहारीसँ भेंट नहिं हएत.  मुदा, ई विषयांतर भेल. मूल बात जे खयबाक निमंत्रण आभारक विषय नहिं भेल. हं, ‘थैहर-थैहर भए गेलैक !’ भोजनक प्रशंसा भेलैक, धन्यवाद नहिं.

वस्तु  वा पदार्थक हेतु प्रशंसा ले ‘बड़ दिब लागल’, ‘बड़ सुन्दर’ पर्याप्त थिक.

नीचा लिखल अभिव्यक्ति अनुरोध-सूचक थिक, आभार सूचक नहिं:

( ई कए दी/ दए दी तं) बड़ गुण मानब

खोज पुछारी राखल / राखी ( अनुरोध सूचक).

‘पोथी नीक लागल’ पोथीक प्रशंसा थिक. मुदा, उपहार-स्वरुप देल पोथीक प्रति आभार नहिं थिक.

अस्तु, हमरा जनैत, पारंपरिक मैथिली गप्प-सप्प में अपन परिवार में तं नहिंए, अनको संग गप्प में ‘धन्यवाद’क

समावेश नहिं !     

 


Thursday, February 17, 2022

Murder at Maharaji pul*

 

Murder at Maharaji pul*

For a neophyte doctor establishing successful practice is a Herculean task. Yet, when push comes to shove you have to get going. And that’s what I did: I set up my consultation room in a crowded poor locality, Maharajee pul area by the side of Bagamati River in Darbhanga. It was difficult to find a decent accommodation for a clinic in that area. Someone came to help; he suggested me a small house that was vacant there. The property belonged to a distant relative of the late Maharaja of Darbhanga. The house was in a dilapidated condition, but low rent suited my pocket. It had two rooms, one by the roadside served me as my consultation room, and the other with a table and some necessary paraphernalia served as the operation theatre for minor surgeries.

A local young boy with a few years’ experience offered his services as my assistant. He was hard of hearing, but knew his job. Being a local, he knew people well and he could warn me of troublemakers, of which the area was full. The troublemakers frequently showed up at my clinic, often for no particular reason. They loved to sit with me across the table and talk sweet nothing. I particularly remember a man who often frequented the road in front of my clinic many times a day. He was young, tall and lean with disorderly hair and overgrown beard. He always had a long black gamachha covering his left arm and hand shoulders down. He once came casually and sat down for chitchat. I didn’t mind. In any case, I wanted to develop acquaintance with locals. That day as he sat down, he coolly placed a revolver on my table. I didn’t feel afraid, or wasn’t surprised. I was new there and had no issues with him or anyone else in the area. The revolver in his trouser pocket might have felt uncomfortable and possibly he wanted to feel at ease, I thought! But that wasn’t all. He had another trophy with him- a scorpion in a screw-capped glass bottle. He put it too on my table. Later I learnt, his left hand was all but exposed skeleton; a crude bomb had blown his hand up while he worked on it, someone told me!

I remember another character there who frequently dropped in for no particular reason. He called himself a private tutor for school children. When I asked him out of curiosity what subjects he taught, he proudly replied, ‘also subject!’ I believe, he meant ‘all subjects’.

But men and women selling vegetables and local laborers were my common patients. They found my consultation fee of ten rupees reasonable, and my behavior pleasant.

For a couple of months things went fine. My practice was rule-based and ethical. I scrupulously refused medical termination of pregnancy and never issued fake medical certificates, the former because I had no infrastructure or training, and the latter because I wouldn’t trade in falsehood. Yet, during the first month I made about seven hundred rupees! The next month it was about a thousand rupees. I was happy; those days an MBBS doctor in Bihar Government service received less than that as monthly salary. As such I had very few overhead expenses. I commuted to my clinic on my Avon bicycle, and back home spent time playing with my little daughter who found the whole World amazing as it unfolded before her eyes. Also, a placid life in a sleepy town allowed me opportunities both to practice my newly acquired craft, and ample time to prepare for my postgraduate entrance examination.

But no one knows when life would take a surprising turn. And it did. One evening there was a great commotion outside my clinic. As I looked out, a group of about 5-6 young men trooped into my clinic unannounced. They carried an unconscious man on their shoulders. As they came in, they put the unconscious man on the examination couch and left as quickly as they had come!

Disregarding the suddenness, I and my assistant, Jinu, quickly had a look at the patient. The man on the couch was limp, lifeless, had dilated pupils, and no signs of life. We immediately started cardiopulmonary resuscitation as per protocol. All efforts went futile. It was a case brought dead! And it was my baby now! I had no choice. I called the police. A sub-Inspector came quickly. He was polite and a man of few words. I told him the story. He didn’t have many questions. However,, he inquired if I knew anyone among the men who brought the patient to me. Frankly, I didn’t know them, although some faces were familiar in the area. They all were unemployed local youth who often roamed the area aimlessly. The police sub-Inspector wasn’t interested in much inquiry. He called a vehicle, took possession of the body and left.

It was very late by the time I reached home after the police formalities. People at home were a little surprised due to unusual delay. When they heard the story, their surprise turned into horror.

Today in places big and small, loss of life is no more than a momentary curiosity. Those bereaved suffer, but for others, death is just a statistics! The next day it was business as usual in Maharaji pul area as if nothing had happened. I was a little curious. May be more curious than the police. But in Maharaji pul area almost everyone knew what had happened, and who the culprit was. The victim was a local Marawari boy. The death resulted from a trivial tiff on small amount that resulted in the victim being choked to death as a gamachha tightened gradually around his neck proved the deadly noose. The culprit and the victim were all from a local group of friends, I learnt. They all were well-known to each other. May be things took a deadly turn the way no one expected. Yet, it was a murder most foul!

During a few more months I spent there, I never heard anything about the case. The police never returned to me. May be in the government records this murder was reported as a case of sudden death in young, or a death from fall. Who knows?

Few months later, I received my commission in the Army Medical Corps. I had enough of private practice to test my patience by then. Also I had made up my mind to move outside Bihar. Thus within no time I folded my practice up, shifted whatever belonging I had there, and moved to Danapur cantonment to join my commission. That was Jan 1983. Even today nearly forty years down the line memories of Maharaji pul lingers on! But that’s a different story!!

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Maharaji pul*, a bridge over Bagamati River built by the Maharaja of Darbhanga in Shubhankarapur locality on the outskirts of the town.

Gamachha, a multipurpose cotton scarf of varying length that serves also as headgear, duster, and a sheet to carry things bundled in it.

 

 

         

Sunday, February 6, 2022

भूमिकाक आवश्यकता, स्वरुप, आ सार्थकता

 

भूमिकाक आवश्यकता, स्वरुप, आ सार्थकता  

साहित्य में भूमिका लिखबाक परंपरा नव नहिं. मुदा, भूमिका लेखक अपनहिं लिखथि कि हुनक अपेक्षित- वरिष्ठ वा कनिष्ठ- तकर कोनो एक रंग परम्परा देखबा में नहिं अबैछ. मुदा, भूमिका की थिक, भूमिका आ समीक्षा में की अंतर छैक, आ पाठक कें भूमिकासँ  की अपेक्षा करबाक चाही, वा होइत छनि, से हमरा जनैत लेखक ले बूझब आवश्यक थिकनि. तें, एतय मैथिली में भूमिकाक स्वरुप, भूमिकाक आवश्यकता आ सार्थकता, आ भूमिकाक, भूमिका लेखकक विश्वसनीयता पर प्रभाव पर विचार करब हमर उद्देश्य अछि. 

ऐतिहासिक काल में जखन लेखक, ऋषि-मुनि एकान्तवास में पहाड़ पर, जंगल आ गुफा रहैत रहथि आ ग्रन्थ लिखबा में हुनका लोकनिक जीवन बीति जाइत रहनि, ओहि परिस्थिति में ग्रंथकार कें , जं ओ भूमिकाक आवश्यकताक अनुभव करथि तं, अपन कृतिक भूमिका अपने लिखबाक बाध्यता रहनि. पछाति कोनो परवर्ती विद्वान – शिष्य वा पाठक- सेहो  देर, सबेर कोनो-कोनो ग्रन्थक भूमिका लिखैत रहथिन. ओ भूमिका परंपरासँ पोथीक अंगे जकाँ भए जाइत छल. तें, ग्रन्थक भूमिका लेखक/ कविक अपन लिखल थिकनि  कि आन विद्वानक से लोक ग्रन्थ कें पढ़िए कए अनुमान करैत छल. हं, भूमिका में जं भूमिकाक लेखक अपन परिचय व्यक्त केलनि तं बड्ड बढ़िया, अन्यथा भूमिका लेखकक परिचय सेहो अनुमानेक विषय रहि जाइत छल.

किछु उदाहरण पुरान ग्रन्थ सबसँ देखी. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणक पहिल सँ  तेसर सर्ग ओकर भूमिका मानल जाइछ. किन्तु, ओकर भाषा आ ओहि में वाल्मीकि ऋषिक हेतु प्रयुक्त सर्वनाम सँ  ई स्पष्ट अछि जे भूमिका हुनक शिष्य वा कोनो आन विद्वानक लिखल थिकनि. एकर विपरीत, तुलसीकृत रामायण- श्रीरामचरितमानस- क बालकाण्डक मंगलाचरणक एक अंश कें गोस्वामी तुलसीदास जी भूमिका-जकाँ प्रस्तुत केने छथि, जाहि में रामकथाक श्रोत आ ग्रंथ लिखबाक उद्देश्य व्यक्त कयल गेल अछि. रघुवंश महाकाव्य में कालिदास सेहो प्रथम सर्ग में अपन भूमिका जकाँ ‘ अपन अल्पज्ञता, महान  कार्य करबाक धृष्टता, आ प्रयासक विधि- मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्य वास्ति मे  गतिः- कें’ उदाहरणक संग व्यक्त कयने छथि.

आब भूमिकाक आवश्यकताक गप्प करी. विलियम शेक्सपियर सहित बहुतो  विद्वानक ई विचार छनि जे नीक साहित्यकें भूमिकाक कोन काज.[1, 2] पोथी अपन परिचय अपने कहैछ.

वर्ष 2000 में प्रकाशित ‘जड़ि’ नामक हमर कविता-संग्रह आ प्रथम पोथी क भूमिका, ‘कहबाक आओर किछु नहिं अछि’ में हमरो तर्क इएह छल जे ‘ जे किछु कहबाक छल सएह तं थिक कविताक संकलन’. 1922 में प्रकाशित ‘मिसेज डैलोवे’ नामक उपन्यास में  प्रसिद्ध उपन्यासकार वर्जिनिया वुल्फ सेहो एही प्रकारक विचार प्रस्तुत केने रहथि. हम यद्यपि, तहिया हम वर्जिनिया वुल्फक ओहि पोथी सँ अपरिचत रही.

तथापि जं लेखक ई बूझथि जे विषय-वस्तुक नवीनता कारणें भूमिका आवश्यक अछि, तं भूमिका हेबेक चाही. किन्तु, लेखकक मन में भूमिकाक आवश्यकता आ उद्देश्य स्पष्ट हयब आवश्यक. सत्यतः, भूमिका शब्दक संबंध विषयक भूमि वा पृष्ठभूमिसँ छैक. भूमिका प्रायः ओ सीढ़ी सेहो थिक जाहि बाटें पाठक कें विषय-प्रवेश में सुविधा होइत छनि. किन्तु, व्यवहारतः भूमिका ओ छोट वा पैघ लेख थिक जे पुस्तक आ लेखकक परिचय दैछ. जं लेखक पाठकक बीच सुपरिचित होथि तं परिचयक कोन काज ? आ तहिना जं विषय सर्वविदित होइक तखनो विषय-प्रवेशक हेतु लेख केर कोन काज. मुदा, विषय नव होइक तं परिचय देल जा सकैछ. लेखकक परिचय तं हुनक बायोडाटासँ सेहो ज्ञात होइते अछि. ई भेल लेखकक दिससँ  भूमिकाक आवश्यकता.

आब लेखकसँ भिन्न दोसर विद्वानक लिखल भूमिका पर आबी. एहन भूमिकासँ  पुस्तक आ लेखकक परिचयक अतिरिक्त पाठक कें की अपेक्षा करबाक चाही ? की भूमिका लेखकक हेतु अनुशंसा( testimonial) थिक ? जं, हं, तं भूमिका लेखकसँ पाठक कें की अपेक्षा करबाक चाही ? ई अनुभूत थिक जे लेखकक अपन तथा लेखकक वरिष्ठ वा अपेक्षित द्वारा लिखल भूमिकाक स्वरुप में भिन्नता होइछ. तथापि, की भूमिकाक लेखकसँ ई अपेक्षा करब अनुचित थिक जे ओ पाठकक समक्ष पोथीक विषय-वस्तुक वस्तुनिष्ठ आकलन प्रस्तुत करथि. अन्यथा, भूमिका लेखकक विश्वसनीयता पर आँच नहिं अओतनि ! तर्क संगत थिक, पुस्तकक संगहिं केओ लेखक समालोचनाकें प्रकाशित नहिं करय चाहताह. मुदा, ई अनुसंधेय थिक, जे कतेक पाठक पोथीक भूमिका पढ़बाक कष्ट करैत छथि. वा की पाठक भूमिका लिखनिहारक नाम देखि भूमिका पढ़बाक निर्णय करैत छथि ? की इहो संभव जे भूमिकाक आकार देखि पाठक भूमिका पढ़बाक विचार करैत छथि. तें, भूमिकाक आकार कतेक टा हेबाक चाही सेहो विचारणीय थिक. ई तं भूमिकाक उद्देश्य में निहित हेबेक चाही. कारण जं भूमिका केओ पढ़बे नहिं केलनि तं भूमिकासँ लेखक वा पाठकक कोन हितसाधन हेतनि.

आब मैथिलीक पोथी सब में भूमिकाक स्वरुप पर एक नजरि घुमाबी, देखिऐक जे मैथिली आ आन भाषा में भूमिकाक स्वरुप केहन छल आ केहन अछि. एहि हेतु हम अपन अलमारीसँ मैथिली, हिन्दी आ अंग्रेजीक विभिन्न विधाक बीस गोट पोथी निकालल अछि. एहि में इतिहास, संस्मरण, उपन्यास आ विज्ञान आ व्याकरण सब किछु अछि. जं सरसरी नजरिसँ देखी तं लगैत अछि, मैथिली में अनकासँ भूमिका लिखयबाक परंपरा बेसी प्रचलित अछि. यद्यपि, आरंभ में ई परंपरा नहिं छल. तें, सन्  1340 साल (1932 ई.) में प्रकाशित उपन्यास ‘चन्द्रग्रहण’ क भूमिका, ‘किछु’ आ 1345 साल में प्रकाशित ‘बीरप्रसून’ नामक बालोपयोगी पुस्तकक ‘ पहिने ई पढ़ि लिय !’ लेखकक अपने लिखल छनि.एहि पोथी सबहक संक्षिप्त भूमिका रोचक अछि. बीरप्रसूनक भूमिका में एकदम संक्षिप्त भूमिका में किरण जीक लिखैत छथि:

‘हम अपना में सम्पादनकलाक ज्ञानक सर्वथा अभाव अनुभव करैत छी. परन्तु, मैथिलीक प्रति अदम्य भक्ति तथा सहयोगीक आज्ञा स विवश भै हमरा ई भार स्वीकार करै पड़ल.’

एहि में अपन परिचय वा पोथीक संबंध में किछु नहिं छैक. तहिना ‘चन्द्रग्रहण’क ‘किछु’ क भूमिका सेहो देखबा योग्य अछि:

अपने लेखक नहिं. मैथिली भाषा में एहि प्रकारक कोनो पुस्तक नहिं जाहिसँ- मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्य वास्ति मे  गतिः- चरितार्थ हो. एहि भाषा में लेखन शैलीयो निश्चित नहिं अतः एहूमें गडबड़ीए होयबाक सम्भावना. लेखन-संसोधन सभ प्रथमारम्भे. की त्रुटि की नहिं एकरो ज्ञान नहिं. तखन किमर्थ क्षमाप्रार्थी हउ ?’ अयोग्यक हाथ में महान कार्य देखि तत्कार्य्यकुशल ह्रदय में ओहि कार्य के अपनेबाक प्रवृत्ति स्वाभाविक.’

मुदा,सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्रीबालकृष्ण मिश्रक ‘ मैथिल महाकवि विद्यापतिठाकुर विरचित पदावली (जुलाई 1937) में कोनो भूमिका नहिं अछि. मुदा, जं मैथिली व्याकरणक शिरोमणि ‘मिथिलाभाषा विद्योतन’ कें देखी तं 1946 में प्रकाशित एहि पोथीक भूमिका जं लेखकक, उचिते, अपन थिकनि तं एहि में प्रकाशकीय  सेहो छैक जाहि में अत्यन्त ई  संक्षेप में आशा व्यक्त कयल गेल अछि जे ई  ग्रन्थ ‘ मिथिलाभाषाक गौरव बढ़ाओत’. किन्तु, प्रोफ़ेसर श्री तंत्रनाथ झाक ‘कीचक-बध’ में कोनो भूमिका नहिं छैक. मुदा, 1971 में प्रकाशित किरणजी ‘विजेता विद्यापति’क विस्तृत भूमिका आचार्य सुमन जी लिखने छथि, जकरा भूमिका आ समालोचना कम, नाटककारक परिचय आ पोथीक प्रशंसा बेसी कहि सकैत छिऐक. ‘विजेता विद्यापति’ में छोट सन लेखकीय वक्तव्य सेहो छैक, मुदा, ओहि में पोथीक विषय किछुओ नहिं.

एक्कैसम शताब्दी में  में प्रकाशित पण्डित गोविन्द झा केर ‘भाषाशास्त्र-प्रवेशिका’ (2011) क भूमिका ‘भाषा प्रबन्ध : प्रवेशिका’ जं रमानन्द झा ‘रमण’ क लिखल छनि तं प्राक्कथन (लक्ष्य आ’ सीमा) लेखकक अपन छनि.

मैथिलिओ में मरीचिका में लेखकीय नहिं भेटत, प्रकाशकीय छैक. ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ क ‘उत्स’क लेखक, लेखक अपनहिं छथि. वैज्ञानिक योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’क अधिकतर पोथी में भूमिका हुनक अपने लिखल भेटत; केवल ‘चुल्हिचन पुराण’ क आमुखक लेखक स्व. रामलोचन ठाकुर थिकाह आ  ‘त्रिनाटकम् ‘ में ‘नाटकक  कथा’क लेखक गंगा झा थिकाह. ‘नाटकक कथा’क केवल एहि में संकलित नाटक सबहक पृष्ठभूमिक कथा कहैत अछि, ई नाटक सभक अनुशंसा नहिं थिक ! ‘चुल्हिचन पुराण’क आमुख में पोथीक वस्तुनिष्ठ प्रसंशा छैक.

 

प्रश्न ई उठैछ जे प्रस्तावना, भूमिका वा परिचय में एहन की रहैत छैक जे लेखक अपने नहिं लिखि सकैत छथि. कारण प्रणेताक रूप में अपन कृतिसँ  सबसँ बेसी परिचय तं लेखकेक होइत छनि. तें, अपन वरिष्ठ, समकक्ष, वा प्रसिद्ध कनिष्ठसँ  लिखल भूमिका, पोथीक परिचय थिक वा अनुशंसा ? कारण, अंग्रेजी साहित्यक विभिन्न विधाक पोथी में जतय कतहु आमुख भेटत, ओ लेखकक अपने वक्तव्य होइत छनि. हं, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका में पोथीक समीक्षाक प्रशंसात्मक अंशकेर उद्धरण पोथीक पछिला पीठ पर प्रचारक हेतु देबाक परंपरा जगजाहिर अछि. ई परंपरा वैज्ञानिक विषयक पुस्तक The Emperor of All Maladies (Siddhartha Mukherjee ), इतिहासक पुस्तक The Anarchy( William Dalrymple), समाज-विज्ञानक Ladakh (Janet Rizavi), धर्मग्रन्थ Bhagavadgita ( S Radhakrishnan), आ उपन्यास The Glass Palace (Amitav Ghosh), सब में भेटत.

किन्तु, हमरा अंग्रेजीक एकटा एहनो पोथी भेटल जाहि में लेखक आ आमुख लिखनिहार दुनू सामान रूपें प्रसिद्ध रहथि. ई पोथी थिक ले. कर्नल. डाक्टर डाक्टर सच्चिदानन्द सिन्हाक ‘Some Eminent Behar contemporaries’.[3] आमुख लिखनिहार थिकाह ले. कर्नल डाक्टर अमरनाथ झा. मुदा, एहि आमुख में डाक्टर अमरनाथ झा स्वयं शेक्सपियर कें उद्धृत कए [1 ] आमुखक उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लगौने छथि.

किन्तु, नजरि हिन्दी दिस घुमाबी. पण्डित राहुल संकृत्यायनक ‘वोल्गा से गंगा’क  प्राक्कथन में हुनक प्रस्तुति एकदम भिन्न अछि. ओ लिखैत छथि:

‘मानव आज जहाँ है, वहां प्रारंभ में ही नहीं पहुँच गया था. इसके लिए उसे बड़े बड़े संघर्षों से गुजरना पड़ा. मानव समाजकी प्रगति का सैद्धांतिक विवेचन मैंने अपने ग्रन्थ ‘ मानव समाज’ में  किया है. इसका एक सरल चित्रण भी किया जा सकता है, और उससे प्रगतिके समझने में आसानी हो सकती है, इसी ख्याल ने मुझे ‘वोल्गा से गंगा’ लिखने के लिए मजबूर किया है.’

एतय एके वाक्य में ओ पोथी लिखबाक मजबूरी ( वा उद्देश्य) कें व्यक्त कय दैत छथि. तहिना 1954 में प्रकाशित ‘मैला आँचल’ ( फणीश्वरनाथ रेणु )क भूमिका आ ‘वैशाली की नगरवधू’क ‘प्रवचन’ आचार्य चतुरसेनक अपने छनि. किन्तु, कर्त्तार सिंह दुग्गल केर उपन्यास ‘जल की प्यास न जाए’ में  लेखकीय नहिं छैक; पुनर्मुद्रित संस्करण में प्राक्कथन प्रकाशकक छनि. दोसर दिस, प्रसिद्ध कवि निदा फ़ाज़लीक ‘आदमी की तरफ’ में एकटा छोट वक्तव्य छैक. हुनक पोथी ‘सफ़र में धूप तो होगी’ क ओ संस्करण जे कविक मृत्युक पछाति छपल अछि, ओहि में भूमिका लेखकक अतिरिक्त दोसर व्यक्तिक लिखल छनि. एकर कारण बूझब कठिन नहिं.

प्रश्न उठैछ, की लेखकसँ इतर व्यक्ति लिखल भूमिका वस्तुनिष्ठ भए सकैछ ? जं, हं, तं कि अपने पोथी में लेखक कें  अपन पोथीक नीर-क्षीर विवेचना रुचतनि ? आ जं भूमिका में विवेचनाक स्थान पर केवल प्रशंसा होइक तं की पाठक केवल भूमिका पढ़ि आँखि मूनि पोथी किनताह ? हमरा जनैत, पोथी पढ़बासँ  पूर्व कतेक पाठक भूमिका पढ़इत छथि तकर सर्वेक्षण बहुतो लेखक आ पाठकक आँखि खोलि सकैत अछि. ततबे नहिं, की संतुलित भूमिकाक स्थान पर  केवल प्रशंसात्मक भूमिका लेखकक प्रतिष्ठा कें आघात पहुँचबैत छनि ? जं नहिं तं उत्तम. अन्यथा, लेखक अपन पोथीक भूमिका अपने किएक नहिं लिखैत छथि ? अपन पोथीक वस्तुनिष्ठ समीक्षाक किएक प्रतीक्षा नहिं करैत छथि ? ई विचारणीय थिक.                   

1. Shakespeare William in ‘As you Like It. ’"If it be true, that good wine needs no bush, ’tis true, that a good play needs no epilogue." 

2. Woolf Virginia: Mrs. Dalloway (Introduction) 1922. It is difficult- perhaps impossible- for a writer to say anything about his work. All he has to say has been said fully and as well as he can in the body of the book itself. It he has failed to make his meaning clear there it is scarcely likely that he will succeed in some few pages of preface or postscript.

3. Amarnatha Jha. Foreword  In: Sinha Sachchidananda. Some Eminent Behar contemporaries,1944.Patna: Himalaya Press.


Wednesday, February 2, 2022

एक अविस्मरणीय घटना

 

                                                            एक अविस्मरणीय घटना

भारतीय सेना में यह कहावत आम है: ‘जब खाने का मौका मिले खा लो, जब मौका मिले सो लो. क्या पता परिस्थिति कब एकाएक बदल जाए. इसके अतिरिक्त, नौकरी के कई और गुर लोग धीरे-धीरे नौकरी के दौरान सीखते थे. इस में से एक यह भी था कि जब छुट्टी मिले, भाग लो. क्योंकि सेना में यह कहावत आम था कि छुट्टी एक सुविधा है, अधिकार नहीं. इसलिए, सुविधा मिली तो भोग लो ! और उन दिनों इस सुविधा को भोगने के लिए फौजी हर जहमत उठाने को तैयार होते हैं. कारण, छुट्टी मिल भी गई तो क्या ? जरूरत होने पर घर से वापस भी बुलाया जा सकता है, और बुलाया जाता है. पर मैं जिस छुट्टी की बात कर रहा हूँ वह यादगार छुट्टी थी ! क्यों ? वही तो इस वाकये के अविस्मरणीय  होने का कारण है !

जून या जुलाई का महीना, 1984 ई. मैं उस समय आसाम के एक दूरस्थ इलाके में, दूमदूमा टाउन नामक स्थान में पदस्थापित था. निर्धारित ‘लीव-प्लान’ के  मुताबिक मैं दो महीने की वार्षिक छुट्टी पर जाने को तैयार था. वैसे भी घर जाने के लिए कौन सी तैयारी चाहिए ! केवल, डाक्टर का ‘रिलीफ’- यानी मेरी जगह पर दूसरे मेडिकल ऑफिसर- को समय से पहुँचना आवश्यक था. और मेरे ‘रिलीफ’ मेरी छुट्टी के दो महीनों के लिए वहाँ पहुँच चुके थे.

 परन्तु, मेरी छुट्टी आरम्भ होने के ठीक पहले एकाएक ब्रह्मपुत्र में भीषण बाढ़ आ गयी. बाढ़ ऐसी थी कि गुवाहाटी और न्यू बोगाइगाँव के बीच सैकड़ों किलोमीटर दूर तक रेल लाइन बह गयी थी. फिर भी, दूमदूमा टाउन और गुवाहाटी के बीच रेल यातायात जारी था. सो मैं चल पड़ा और गुवाहाटी तक पहुंचा. उन दिनों दूमदूमा से दरभंगा पहुँचने में तीन रात,तीन दिन लगते थे ! गुवाहाटी के आगे रेल यातायात बंद था. बहरहाल, ब्रह्मपुत्र पार करने के लिए करीब डेढ़ सौ किलोमीटर की सड़क यात्रा के बाद नाव से नदी पार करने विकल्प था. ब्रह्मपुत्र पार कर आगे फिर न्यू बोगाइगाँव तक पचास-पचपन किलोमीटर की सड़क यात्रा, और फिर पटना की रेल यात्रा.

आम अनुभव  है, जब भी कोई आफत आसमानी आती है, प्रभावित लोग उससे जूझते हैं. किन्तु, अवसर की ताक में बैठे लोग उस प्रतिकूल अवसर में भी अपने लिए लाभ का अवसर ढूंढ लेते है; किसे याद नहीं होगा बिहार के बदला घाट की रेल दुर्घटना. उस दुर्घटना में करीब आठ सौ यात्री के साथ सवारी गाड़ी बागमती में गिर गयी थी. किन्तु, ऐसी आकस्मिक त्रासदी में भी जिन्दा बचे यात्रियों के साथ लूटपाट की घटना हुई थी. बहरहाल, मैं गुवाहाटी से गोआलपारा की यात्रा के लिए गुवाहाटी में बस में सीट लूटनेवाले रंगदार को दस रुपये दिए और खिड़की के पास की  एक सीट को अपने लिए रिज़र्व कर सीट पर बैठ गया.

चित्र 1 : ब्रह्मपुत्र  तिब्बत से बांगला देश तक 

             अब हम असम राज्य के  नक़्शे पर नजर घुमाएँ. [ चित्र 1 ] आप देखेंगे कि तिब्बत से आती हुई ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करने के पहले अरुणाचल पहाड़ों के ऊपर से गुजरती है. फिर, पहाड़ की उचांई से सियांग और दिहांग नदी के नाम से उतरने के बाद, इसमें दिबांग और लोहित नदियाँ मिलतीं हैं. लोहित नदी के मिलने के बाद असम के सदिया नामक स्थान से इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है. सदिया से बंगाल की खाड़ी तक की ब्रह्मपुत्र की करीब नौ सौ मील लम्बी यात्रा में हिमालय से उतरती हुई आधा दर्ज़न से अधिक नदियाँ इसमें मिलती जातीं है. फलतः, पूरे असम में पूरब से पश्चिम तक बहती  ब्रह्मपुत्र, राज्य को लगभग बीचोबीच उत्तर एवं दक्षिणी भागों में विभक्त कर देती है.  पूरे राज्य से होकर बहती इतनी लम्बी नदी को पार करने के लिए उन दिनों एकमात्र रेल-पुल गौहाटी में पांडुघाट और अमीनगाँव के बीच था ! बाढ़ के कारण उस समय उस इलाके से रेल यातायात बंद था.

चित्र 2 : ब्रह्मपुत्र असम से बंगाल तक 

अस्तु, हमलोग बस से सीधा करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गोआलपारा को चले. गोआलपारा में नाव से ब्रह्मपुत्र पार कर बड़े रेल जंक्शन न्यू बोंगाईगाँव पहुँचकर ट्रेन पकड़ना था. इसलिए, पहले गोआलपारा और न्यू बोंगाईगाँव के बीच की पचास किलोमीटर से दूर की यात्रा हमने ट्रक पर तय की. न्यू बोंगाईगाँव के आगे बंगाल और बिहार में रेल यातायात चालू था.

उस दिन जब हम न्यू बोंगाईगाँव रेलवे स्टेशन पहुंचे, शाम का कोई चार बज रहा होगा. खुशी की बात थी कि दिल्ली की ओर जानेवाली तिनसुकिया मेल न्यू बोंगाईगाँव रेलवे स्टेशन पर आगे जाने को तैयार खड़ी थी. अर्थात् जो तिनसुकिया मेल गौहाटी से दिल्ली के लिए चलती, अब बाढ़ के कारण न्यू बोंगाईगाँव से चल रही थी. बाढ़ हमारे पीछे छूट चुकी थी. किन्तु, रेल यातायात तब भी बिलकुल अस्तव्यस्त था. बाढ़ से पहले का टाइम-टेबुल अभी बेकार था.  सो, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी थी. पर कब चलेगी, हमने इसकी कोई परवाह नहीं की. ट्रेन का मिलना काफी था. फलतः मैंने फर्स्ट क्लास की एक बोगी में अपना सूटकेस रखा, बर्थ पर अधिकार जमाया और खुश हो गए. अब टिकट की ज़रुरत थी. टिकट के लिए मुझे मिलिटरी वारंट दे कर टिकट लेना होगा. अस्तु, मैंने सहयात्री के जिम्मे सूटकेस को छोड़कर रेल ओवरब्रिज के उस पार मिलिटरी के एम सी ओ (Movement Control Officer ) के ऑफिस की ओर चल पड़ा. किसी कारणवश मुझे टिकट नहीं मिल सका और मुझे ट्रेन की तरफ आने लेने में कुछ वक्त लगा. पर जब मैं वापस प्लैटफॉर्म पर पहुँचा तो देखा कि गाड़ी जा रही थी ! मैंने किसी से पूछा, ‘ तिनसुकिया मेल ?’

उन्होंने जवाब दिया, ‘वो जा रही है !’ मेरी परिस्थिति कैसी हुई उसका अनुमान लगाना कठिन नहीं. दौड़ कर ट्रेन पकड़ना असंभव था.

उस समय सूर्यास्त हो चुका था. अँधेरा होने ही वाला था. मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था. मेरे पास रेलवे वारंट था. कुछ, सौ-दो सौ रुपये थे. पीने का पानी भरने के लिए  हाथ में प्लास्टिक का एक बोतल था. मैंने सोचा था, वापसी में पानी भर लूँगा.खाना तो साथ ही था. उन दिनों रेलवे स्टेशनों पर बोतल-बंद पीने का पानी बिकना शुरू नहीं हुआ था.

फिलहाल, इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए मैं तुरत स्टेशन मास्टर के पास जाकर अपनी समस्या सुनायी. उन्होंने कहा ‘ अगला स्टेशन कोकराझाड़ में तिनसुकिया मेल का केवल दो मिनट का स्टॉपेज है. अँधेरा हो चुका है. अभी कुछ करना असंभव है.’

मेरे पास अनेक समस्याएँ थी. उसमे घर तक जाना सब से छोटी समस्या थी. असली समस्या थी कि मैंने उस यात्रा में वह गलती की थी जिसके विरुद्ध फौजियों को हज़ार हिदायतें दी जाती हैं : अर्थात् अपना पहचान-पत्र हमेशा अपने साथ रखें ! पहचान-पत्र कभी भी सूटकेस और सामान में तो बिलकुल नहीं रखें. किन्तु, फौजियों के लिए पहचान-पत्र की सुरक्षा सर्वोपरि होती है. इसलिए, कई बार कानून का उल्लंघन हो जाता है.  और मैंने भी इसका उल्लंघन किया था. जाहिर है, पहचान-पत्र खोना दण्डनीय अपराध है. और जितना बड़ा ओहदा, दण्ड उतना ही सख्त. अर्थात् अफसर के मामले में कम से कम छौ महीने की वरीयता तो जायेगी ही ! यह सबसे बड़ा भय और अप्रतिष्ठा की बात थी. इससे अफसर, जो दूसरों के लिए उदहारण माना जाता है, लापरवाह सिद्ध होता है ! किन्तु, अभी कोई उपाय नहीं था.

बहरहाल, मैं अगली उपलब्ध गाड़ी से दरभंगा चल पड़ा और घर पहुंचा. नौकरी की शुरुआत के छौ महीने के भीतर ही पहचान-पत्र खोने की बात से माहौल मातमी हो गया था. सूटकेस में जो उपहार लेकर चला था, सब खो चुका था. मेरे सामान में वो खिलौने भी थे जो मैंने अपनी छोटी-सी बच्ची के लिए खरीदे थे. उसके अलावे सूटकेस में  पैक्ड डिनर, करीब हज़ार रुपये, अपने उपयोग के कपड़े, एक-दो बोतल व्हिस्की, मेरी डायरी, सब कुछ थे. किन्तु, मुझे चिंता केवल पहचान-पत्र की थी. वह सरकारी संपत्ति थी. सेना-सेवा की अवधि में प्रति माह उसकी विधिवत जांच होती है, और उसका रिकॉर्ड रखा जाता है. अभी सरकारी संपत्ति मेरे हाथों गम हो गयी थी. अतः, मैंने पुलिस स्टेशन जाकर एफ आई आर लिखबाया. उसकी प्रतिलिपि ली और डरते-डरते असम स्थित अपने यूनिट के कमान अधिकारी को चिट्ठी लिख डाली. वहाँ से जवाब आया; छुट्टी समाप्त होने के बाद वापस आयें.’ किन्तु, उससे मेरा भय समाप्त नहीं हुआ. यूनिट पहुँचने पर कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी और आगे की फजीहत होनी ही थी. तथापि, तनाव में छुट्टी के तीन-चार दिन दरभंगा में गुजारने के बाद मैं अपने गाँव चला गया.

तीन-चार दिनों के बाद जब मैं गाँव से दरभंगा वापस आया तो मुझे देखते ही सभी मुस्कराने लगे. मैं तो अभी भी अवसाद में था. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. बाद में बातें खुली. मेरा सूटकेस जो न्यू बोंगाईगाँव स्टेशन में तिनसुकिया मेल में छूट गया था वह, मय सामान, दरभंगा पहुँच चुका था !

यह अविश्वसनीय था !

हुआ ऐसा था कि मैंने किसी सहयात्री को बताया था कि मुझे पटना जाना था. मेरे सूटकेस पर लगे टैग से मेरा नाम और फौजी परिचय भी स्पष्ट था. अस्तु, पटना उतरनेवाले किसी मेहरबान सहयात्री ने मेरा सामान यह सोच कर उतार लिया था कि शायद वह पटना में ‘इस कैप्टेन के एन झा’ का कोई अता-पता लगा सकेंगे. हुआ भी ऐसा ही. पटना में उस व्यक्ति ने किसी कैप्टेन झा के गुमशुदा सामान की चर्चा हमारी पत्नी के चाचा जी से की. चाचा जी उस समय पटना में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी थे. उन्होंने जब समान अपने पास मंगबाया तो सब कुछ आईने के तरह साफ़ हो गया; कैप्टेन झा साहब दामाद निकले ! उन्होंने ही हमारा सामान हमारे पास दरभंगा भेज दिया था ! जय हो !

मेरा सामान सुरक्षित मुझ तक पहुँचने से मनुष्य के स्वभाव के मूलभूत गुणों में मेरी आस्था दृढ़ हुई. मैं आज भी मनाता हूँ, दुनिया में बुरे के बनिस्बत अच्छे लोगों की संख्या ज्यादा है.

यह घटना अविस्मरणीय है. हाँ, इस वाकये के बाद मेरे अनेक बारमेरे  गुमशुदा सामान मेरे पास वापस आते रहे हैं ! पर वे बातें, फिर कभी !!

हाँ, उस दिन मेरे सामान आने की सबसे ज्यादा खुशी शायद मेरी बेटी सुष्मिता को हुई थी, कारण सूटकेस खुलने के बाद सबसे पहले उसमे से उसका लियो-टॉय का रंगीन ‘गन’ निकला था ! और उसे पुनः विश्वास हो गया कि  ‘दादू’ के पास ‘गन’ (जिसे वह उस समय ‘दन’ कहती थी) होता है !         

 

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