Friday, November 1, 2013

तन्हाई में


                          1
शोर में सुनाई नहीं देती थी अपने ही मन की बातें ,
आज तन्हाई में बहुत सी दास्ताँ याद आई है !

                          2 
मीलों दूर की दौड़  और बेइन्तहां  फजीहत
आज पास की दरिया और अपने ही समन्दर ने मेरा दिल जीता है !

                          3
आसमा को चूमती तुम्हारी बुत कितनी बौनी है
पीपल के नीचे का बैठा वो बुद्ध का शिर कितना ऊंचा है !

                          4
 इंसानियत  ही मजहब की खुशबू है
फिरकापरस्ती ने ही  हम सब को लूटा है  !

1 comment:

अहाँक सम्मति चाही.Your valuable comments are welcome.

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