Thursday, December 26, 2019

लकीली (भाग्यवश )


लकीली (भाग्यवश)

ओहि दिन हॉस्पिटल कमिटीक मीटिंग में जबरदस्त घोंघाउज बजरि गेल रहैक. मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट कहलखिन,’ यावत एहि मामलाक तस्फिया नहिं भ जायत एजेंडा आगू नहिं बढ़त; बाजय दिऔक साँझक सात ! असल गप्प बुझू तं बुढ़ियाक फूसि; पछिला दिन पैतालिस वर्ष करीबक एकटा युवक छाती में कनेक दर्द ल क आयल छलाह. मेडिकल स्पेशलिस्ट जांच केलखिन आ ठोकि-बजाक देखि लेलखिन. शोणितक जांच, ई सी जी, आ इको पर्यन्त भ गेल रहनि. हार्ट-एटैकक कोनो प्रमाण नहिं रहैक. रोगीक छातीमें, छूलापर, एक ठाम  कनेक दर्द सेहो बूझि पडैत रहनि. माने, ई समस्या मांस-पेसी सं जुडल होइक, ह्रदय सं नहिं, से संभव. किन्तु, अनुभव लोककें आत्मविश्वास आ फूकि-फूकि कय पयर रखबाक दृष्टि, दुनू दैत छैक. अस्तु, डाक्टर शिवरामन रोगीकें कहलखिन, ‘ भले अहाँक जांचमें एखन ह्रदय-रोगक कोनो प्रमाण नहिं हो , किन्तु, हम अहाँकें 24 घंटा धरि आइ सी यू में निगरानीमें अवश्य राखब. रोगी तैयार रहथि. मुदा, आइ सी यू में बेड खाली नहिं रहैक. फलतः, रोगी रंगनाथकें स्थानीय सरकारी अस्पताल जाय पड़लनि. असल में सएह अप्रतिष्ठा मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्टकें छूबि देलकनि. ओ अग्निश्च-वायुश्च. ‘कतय हमरा लोकनि सुपर स्पेसिआलिटी अस्पताल हयबाक दाबा करैत छी, आ देखू, एकटा स्वस्थ शरीरमें अदना-सन छातीक दर्द ले आयल रोगीकें  सरकारी अस्पताल जाय पडि गेलैक’ ! माने, अस्पतालक तं नाक कटि गेल. आ सेहो सत्ते. बूझल सब कें छैक, सरकारक कृपा आ डाक्टर लोकनिक सहयोग सं सरकारी अस्पतालकें यमलोक द्वारकें दर्जा दिययबाक जे प्रयास आधा शतक सं चलि रहल छल, आब से सफल भ रहल अछि. तें सरकारी अस्पताल में इलाज आ चुंगीक स्कूलमें पढ़ब एके प्रकारक अपमान थिक. इएह गप्प मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट आ फिजिशियन लोनिक बीच अजुका द्वन्दक मुद्दा छल. एहिमें पहिने तं डाक्टर शिवरामन अपन बंचाव में एसगरेकरबाक प्रयास केलनि. मुदा, मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट बमकि उठलखिन. ‘रोगीकें जनरल वार्डमें रखबामें की आपत्ति ! एहि रोगी कें हार्ट-एटैकक कोनो प्रमाण तं नहिं रहैक.’  अन्ततः, जखन ई विवाद थम्हलाक बदला आगूए बढ़य लगलैक तं आओर सीनियर फिजिशियन लोकनिकें बुझबा में आबय लगलनि, जे आब आइ जं मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट एहि द्वन्दमें जीति गेलाह तं ई एकटा रिआय बनि जायत आ रोगिक चिकित्सा में प्रोफेशनल स्वतंत्रता तं दूर मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट दिन-प्रतिदिन हमरा लोकनिक दक्षताक एहिना धज्जी उड़बैत रहताह. हमरा लोकनिक दिन-प्रतिदिनक काजमें दखलअंदाजी जे हयत से फूट. तें आइ एकर निबटारा भइए जाय.  अस्तु, फिजिशियन लोकनि बेरा-बेरी डाक्टर शिवरामनकेर समर्थनमें बजैत मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्टक प्रतिवाद करय लगलखिन:
‘ चाहे जे भ जाय, ‘चेस्ट-पैन’क केसकेर  कम-सं-कम 24 घंटाक आइ सी यू मोनिटरिंग तं नितान्त आवश्यक.’ डाक्टर राव जोर देलखिन.
‘ हम डाक्टर राव केर समर्थन करैत छियनि’- कनेक मद्धिमे स्वरमें, किन्तु, डाक्टर वह़ाब सेहो अपन सहकर्मीक समर्थनमें ठाढ़ भेलाह.
डाक्टर ढाका बहुत काल सं अपना पर नियंत्रण रखने छलाह. ई हुनक जाट-प्राकृतिक प्रतिकूल आ तें आश्चर्यनक. मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट सं हुनकर छत्तीसकेर आंकड़ा ककरो सं छिपल नहिं. अस्तु, डाक्टर राव आ वहाबकें मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्टक प्रतिवाद करैत देखि ओ एकाएक बमकि  उठलाह: ‘ चलो, रख देते हैं जनरल वार्ड में.  और अगर रोगी मर गया तो ! सरपर लाठी खाने के लिए आओगे आप ?’
एतेक सामूहिक विरोध सुनि मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट  कनेक तं ठमकलाह, किन्तु, हारि नहिं मानलनि. आखिर एहि इलाकामें अस्पतालक साख़ बरकरार रखबाक दारोमदार तं हुनके माथ पर छनि. तथापि, आब हुनकर स्वरमें कनेक नरमी अयलनि. कहलखिन, ‘ से तं बूझल. मुदा, बेर-बेर एहन समस्या केवल मेडिसिन विभागमें किएक ? आन विभागक डाक्टर तं कोनो रोगीकें आन ठाम रेफर करैत होथि से तं हमरा कहियो नहिं देखबामें आयल अछि. आन विभाग कोना बिना आइ सी यू बेड के अपन-अपन इमरजेंसीओ  सम्हारैत छथि आ अपन रोगीकें आन ठाम पठबितो नहिं छथि !
कनेक काल ले मेडिसिन विभागक डाक्टर लोकनि एकाएक निःशब्द भ गेलाह. ओंघाइत युवक न्यूरोसर्जन, डाक्टर प्रतीक, ताधरि एहि वाद-विवादसं निरपेक्ष रहथि. मुदा, आन कोनो विभाग में एहन समस्या नहिं होइत छैक, से सुनि, एकाएक हुनक भक्क खुजि गेलनि  आ ओ सोझे उठि ठाढ़ भ गेलाह: ‘ ऐसा नहीं है, सर. बांकी विभागोंमें भी ऐसी समस्या होती है.  मेरे साथ तो कल ही ऐसा हुआ था. सुबह ही एक सीरियस हेड-इंजुरी का केस आया था. भर्ती करें तो कैसे ? आइ सी यू में बेड नहीं, मोनिटर कैसे करेंगे. सारे लोकल हुडदंग रोगी के साथ आये थे. मेरा तो अक्ल काम नहीं कर रहा था. लेकिन, लकीली (भाग्यवश) तभी आइ सी यू में भर्ती एक रोगी मर गया और इस हेड-इंजुरीको हमने भर्ती कर लिया ! हमारी तो जान बंच गयी !!                                     
लकीली एक पेशेंट मर गया  और हमारी जान बंच गयी  ! सुनि मीटिंग में अचानक उठल ठहक्कासं  हौल में बड़ी काल सं जबकल तनाव  अकस्मात् बिला गेलैक.  किन्तु, जखन एहि उक्तिक निर्ममता सबहक संज्ञा धरि पहुँचलनि तं मीटिंग में एकाएक पुनः श्मशान-सन नीरवता पसरि गेलैक.                 

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