Sunday, August 16, 2026

महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरक अमर काव्य "चित्त जेथा भयशून्य"क अनुवाद

"चित्त जेथा भयशून्य"क अनुवाद 


जतय चित्तमे भय नहि कोनो, 

तानल सोझाँ माथ;

बुद्धि-विवेक पर रोध ने कोनो,

ने बांटल जग, ने संकीर्ण देबाल;

वाणी जतय उठय सत्यसँ प्रेरित,

दक्षता हेतुक, अथक उठय हमर नित हाथ;

जतय जड़ स्वभावक कारण,

निर्मल स्वच्छ तर्क केर धारा,

नहि मरुभूमहिमे बहि जाय;

अहिंक प्रेरणेँ, हे नाथ,

व्यापक हमर विचार आ कृतिसँ,

एहने स्वतंत्र स्वर्गमे जागय 

उठय, देश हमर, हे तात।

अनुवाद: कीर्तिनाथ झा

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