"चित्त जेथा भयशून्य"क अनुवाद
जतय चित्तमे भय नहि कोनो,
तानल सोझाँ माथ;
बुद्धि-विवेक पर रोध ने कोनो,
ने बांटल जग, ने संकीर्ण देबाल;
वाणी जतय उठय सत्यसँ प्रेरित,
दक्षता हेतुक, अथक उठय हमर नित हाथ;
जतय जड़ स्वभावक कारण,
निर्मल स्वच्छ तर्क केर धारा,
नहि मरुभूमहिमे बहि जाय;
अहिंक प्रेरणेँ, हे नाथ,
व्यापक हमर विचार आ कृतिसँ,
एहने स्वतंत्र स्वर्गमे जागय
उठय, देश हमर, हे तात।
अनुवाद: कीर्तिनाथ झा