मृत्युक भयसँ छोड़य नहि ओ
मोर्चा बूझय प्राण
मुदा, सत्य केर खातिर
केओ नहि अरपय जान।
एहन बसात कोम्हरसँ आयल
बना गेल ई क्लीव
ताल ठोकि कय चढ़थि मंच पर
बंध्या छैन्हि शरीर।
रहय ओ, एतहि छल जनमल
नाङट आधा आङ
लाठी हाथ चलै छल तैओ
निर्भय गेलै प्राण।
कीड़ा केओ रहय, वा बिढ़नी
ओकरो होइछ दंश
डांड़ सोझ कय होइऔ सोझाँ
सुमिरत देशक वंश ।
कीर्तिनाथक आत्मालाप, आत्ममंथनक क्षणमें हमर मनक दर्पण थिक. 'Kirtinathak aatmalap' mirrors my mind in moments of reflection.
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