गार्जियन
भौजीक अचानक एना चल जायब बौआभाईकेँ भीतरसँ तोड़ि देलकनि. सरि भ’ कए चिकित्साक अवसरे
नहि भेटलनि. तथापि, जे डाक्टर कहलखिन, से उपचार भेलनि. मुदा, जे हेबाक छलैक,
भेलैक. ओहुना उचित-विहितक विचारमे बौआभाईकेँ फुसिएक बड़प्पनक हिस्सक नहि रहनि. आ ने
देखयबाक लेल हुनका कर्मकांडहिमे विश्वास रहनि. अपने जे सोचथि, ओएह बाट धेने चलैत
चलल चल जाथि. मुदा, भौजीक श्राद्धक पसार हुनक मन विरक्त कए देलकनि. तैओ, ककरहु
किछु कहलखिन नहि; रहिमन निजमन की व्यथा मनहि राखिए गोय.
जखन सब काज बीति गेलैक, एक दिन छोटकी
बेटी, सरिता, दरबज्जा पर आबि लगमे बैसि गेलखिन. बौआ भाई आराम कुरसी पर ओलरल
विचारमग्न छलाह; बुढ़ारीमे जीवन संगी चल जाएबसँ पति-पत्नीसँ बेसी आओर आन के प्रभावित
हएत.
पिताकेँ विचारमग्न देखि, सरिताए मौन
तोडलनि: कहलखिन, ‘माँ तँ चल गेल. सब काजो नीक जकाँ भए गेल. बड़का संतोष. बौआ
सम्हारि लेलनि.’
‘हँ. हमरा सब दिन अपने बल काज देलक. एखन धरि लाठीक काज नहि पड़ल. अपनहि पयर पर ठाढ़
छी. आगुओ तकरे भरोस.’
बेटी गुम्म भए गेलखिन. बौआ भाई फेर
बाजब शुरू केलनि: ‘तोहर माय वा हमरा अपने जहिया कहियो किछु रोग-व्याधि भेल. कहियो
अनठाओल नहि.’ कहि ओ कनेक कालक लेल चुप भए गेलाह. सरिता बापक मुँह दिस ताकय लगलीह.
बापक मुँह देखि हुनका भेलनि, जेना, कोनो ज्वालामुखी फ़ुटबा लेल तैयार छल. बौआ भाई
फेर शुरू भेलाह: ‘आगू जेना विचार भेलनि, केलनि. अपना दरबज्जा पर पछिला वर्ष बच्छा
तरेँ बियाइलि गाई छल. पशु आब धन नहि गराक घेघ थिक. गोंत-गोबर-सफाई-सेवा लेल लोक
नहि भेटैत छैक. अगत्या बेचय पड़ल. पछाति, काजमे फेर तीस हज़ारमे गाई-बच्छा किनलनि. ओएह
गाई-बच्छा पोखरिक घाटहि पर पात्र लगले एगारह हज़ारमे बेचलनि. अंगनामे जे गाई दान
केलनि, से अगत्या गाड़ी पर लादि कए ओझाक दरबजा धरि पहुँचाबय पड़लनि.’ कहैत बौआ भाईक
भौंह ऊपर चढ़ि गेलनि. हुनक भावमे विचार मंगबाक वा सहमतिक याचना नहि रहनि. पिताक भाव
देखि बेटीकेँ पिताक मनोभाव बुझबामे भाङठ नहि भेलनि. सरिता कहलखिन, ‘पहिने वैतरणी
पार करबाक हेतु लोक सवा टाका वा गाईक संग गोदान करबैत छल. आब शय्यादानमे पलंग-सोफा
आ ओछाओन-बिछाओनक संग टॉर्च-मोबाइल, टेबलेट-टीवी आ ए सी सेहो दान होइत छैक.’ कहैत
सरिताकेँ मुसुकी छूटि गेलनि. मुदा,बौआ भाईकें एहि नव रियाए पर हँसी नहि लगलनि.
परसू बौआ भाई अकस्मात् क’ल पर पिछड़ि
गेलाह. खसलाक बाद अपनेसँ उठि कए ठाढ़ो नहि भेल भेलनि. दू दिनसँ बौआभाई बिछाओन धेने
छथि. किछु दर्दनिवारक दवाई चलैत छनि. डाक्टर ऑपरेशनक सलाह देने छनि. बेटा डेरायल
छथिन, गुनधुनमे छथिन. कहैत छथिन, केओ-केओ कहैत अछि, अस्सी बरखक बाद ऑपरेशनसँ खतरा
रहैत छैक.
बौआ भाई पुछैत छथिन,’ डाक्टरसँ पुछबनि बिछाओन धेने खतरा नहि छैक.’ बेटा कपिलेश्वर
गुम्म भए गेलखिन.
दर्द रहितो बौआ भाईक ठोर पर मुसुकी
पसरि जाइछ छनि. बेटाकेँ कहैत छथिन, ‘बौआ, डराउ जुनि. हमरा चिकित्सासँ भय नहि. भय
बिनु मांगल सलाहसँ होइछ. हम मरिओ जायब तँ छार-भार हमरे कपार; कोनो एहन औषधि नहि,
करा किछु दुष्प्रभाव नहि होइछ, कोनो एहन ऑपरेशन नहि जाहिमे खतरा नहि. हमर अपन तर्कबुद्धि
काज करैछ. दायित्वबोध सेहो अछि. संगहि, यावत् जीबैत छी, अपन गार्जियन हम अपनहि छी.
रहल क्रिया-कर्म. हमरा तकर चिंता नहि. हम अपन शरीर-दान करबाक करार दरभंगा मेडिकल
कालेजक शरीर रचना विभागमे दाखिल कए आयल छी. जखन अवसर अओतेक, तँ समीपस्थ संबंधीक
रूपमे अहाँलोकनि केओ अपन सहमति पत्र पर हस्ताक्षर क’ कए देबैक. हमर शरीरक जे कोनो
अंग कोनो आन मनुखक शरीरमे लागि सकतैक से बुझू समाजक उपकार भेलैक, हमरा हेतु
संतुष्टि. बाँकी शरीर पर विद्यार्थीलोकनि मानव शरीरक संरचना पढ़त. हमरा जनैत, मानव
शरीरक एहिसँ नीक अओरो कोनो उपयोग नहि भए सकैछ. रहल समाज, से गाँओ भरिमे सबकेँ
बुझले छैक, हमरा श्राद्ध, भोज आ दानमे विश्वास नहि, ओ आवश्यको नहि. ई विचार हम
कतेको बेर विष्णु भवन मन्दिर आ दुर्गा स्थानक बैसाड़मे सार्वजिनक रूपें व्यक्त कए
चुकल छी. जखन हमर शरीर नष्ट भए जायत, तँ भूख-पियास ककरा लगतैक.
अहाँलोकनि सेवामे कोनो कसरि नहि रखैत छी, से हमहूँ देखिते छी आ समाजो देखिते अछि.
तखन कथीक परबाहि! रहल हमर चिकित्साक खर्चा. सरकार पेंशनक ऊपर बैंक मोटरकार- मोटर
साईकिल वा घर बनयबाक हेतु कर्ज दैत छैक. हमर चिकित्साक हेतु लोन तँ भेटत नहि. हमरा
तकर आवश्यकताओ नहि. अपन अरजल जमीन अछि. से तँ हम बेचिए सकैत छी. बैंकमे जमा पूँजी अछि.
सेहो खर्च कय सकैत छी. हमर इलाज कराउ.’ कहैत, बौआ भाई अपन दस्तखत कयल दू-तीन गोट
सादा चेक कपिलेश्वरक हाथमे दए देलखिन आ कहलखिन, काल्हि हमरा दरभंगा लए चलू. आब
बिलम्ब नहि हो. आ हँ जखन जे खर्च होअय, टाका बैंकसँ निकालि लेब. चेकबुक संगहि रहत,
आ हम छीहे. कहैत बौआ भाईक ठोर पर मुसुकी पसरि अयलनि.
कपिलेश्वर अवाक् भए गेलाह.