संकलन: स्व. बिन्देश्वरी देवी
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| पाण्डुलिपिक एक पृष्ठक छायाप्रति |
पण्डित काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क अनुसारें ‘फकड़ा काव्यक एक प्रकार आ लोक-साहित्यक
प्रमुख अंग’ एवं ‘आडम्बरहीना, निर्मल
हृदया, सत्यमयी,बाट-घाट, जंगल-झाड़ आदि प्रकृतिक विशाल क्षेत्रक अनुभवसँ भरलि
मुनि-कन्या थिक’।1 हुनक कहब छनि, ‘पण्डितक काव्य पाँच प्रतिशत लोकक
चित्र दैछ त’ फकड़ा पनचानवे प्रतिशत लोकक’। अस्तु, स्वयं किरण जी करीब ‘सय छबेक (फकड़ा)
संग्रह’ कयने रहथि. मुदा, ओ संकलन अनुपलब्ध अछि. किन्तु, अक्टूबर १९६१ केर
‘वैदेही’ पत्रिकामे प्रकाशित हुनक ‘फकड़ा’ नामक लंबा लेखमे ओहि संकलनसँ करीब
सत्तरि-पचहत्तरि टा फकड़ा उद्धृत छैक. किछु फकड़ा हुनक कृतिमे आनो ठाम यत्र-तत्र
छिड़ियायल सेहो भेटत. लोक साहित्यक संकलन कयनिहारक कृतिमे आनहु ठाम फकड़ा भेटबे करत.
एतय प्रस्तुत अछि, हमर माता, स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा जीवनक नवम दशकमे टिपल
किछु फकड़ा आ एक आध टा गीत जकर हमरा जनैत समाजशास्त्रीय महत्व छैक. स्मरणीय थिक,
स्व. बिन्देश्वरी देवी पं. काशीनाथ झा काव्यतीर्थ एवं किरणजीक छोटि बहिनि रहथि
जनिक मृत्यु ०६ अगस्त २००३ क भए गेलनि. हुनक हाथें संकलित फकड़ा आ गीतक चारि-पाँच
पृष्ठ जे हमरा हुनक मृत्युक बाद घरमे भेटल अछि सएह एतय प्रस्तुत अछि.
फकड़ा
1
आबेसे केलौं खेती दुलारे भेल बेटी
छोडू सैंया खेती खेलाउ हमर बेटी
2
लाड़ करू सैंआ तोरा पर
पोटा पोछू तोरा मोछा पर
3
एके बाँस बसेला, कोइ चालनि कोइ पैला
4
उखरिमे धान त ककबा आन
5
पलङ्ग पर चिलका रोबैए
मनसा सुतल मौगी ठहकैए
6
वरक मुहमे जाल त बरिआतीक कोन हाल
7
कनियाके आँखिमे नोरे ने लोकनिया भोकारि मारैए
8
बाहरक ठीक ठाक देख रे नौआ
भीतरी महलमे हगै छै कौआ
9
कुकुर कौआ भंडारी त घरमे गुहे गुहटार
10
घरमे पकैए कुरथीक रोटी / बाहर सुखाइए जोड़ धोती
11
बाप के गरा घोंघा/ बेटा के गरा रुद्राक्ष
12
थोड़ कनै छी बाबा ले ? बहुत कनै छी टाका ले
13
आँखिमे नोर त / दाँत निपोड़
14
घरमे टाट नै देहरिमे सरकी
मुहमे नाक नै कानमे तड़की
15
अन्हराकए गाय बिएलै / चालनिमे दुहै जो
16
वरक माय निरधोंछी सांठल नै चतुर्थी
कनियाक माय न(नौ) लगरा
हुनको बेटाके नै देबनि कोजगरा
17
अबिते एली चुल्ही फुटौली (नि)
अरिपन पोछि क लिटी लगौलनि
18
अपन गाम भम्ह पड़ए/ पाही पट्टी नोत पड़ए
गाम नोते ने बेलाही नोत पड़ए
19
मुखसुद्धिक नै वेवहार/ अड़िआतैक बड़ चमत्कार
20
नवक धन भेल त बेङ्ग महाजन भेल
21
सब गेल हाट धान के कूटत
सब दंतरंगा चुल्हि के फुकत
22
मैगर ने बपगर ठेसगर बड़/ नोनगर ने तेलगर चहटगर बड़
23
माय बहु रहै नै, जेठकी बहु / चुमाबे नै त कोना बने
24
किए धोबिनिया बाढ़ि, किए तेलिनिया घाटि
ओ लेतै मुङरी, हम लेब जाठि
25
बेटिया स बुढ़िया भेलौ सोनसन पाकल केस
एहेन चरित्र कहिओ नै देखलौ जे गोइठा एल सनेस
26
चालनि दुसलनि बाढ़निके जिनका अपन सहस्र टा छेद
27
जे बाजय से बड़ बजन्ता जे नै बाजै से गोंग
जे खाय से बड़ खाधुर जे नै खाय से सोम
28
जावे पांडे दोना लगौता तावे पंडीआनि सुरुकि बैसती
29
खोना बेटा खेलनि पान
माय हसथिन बहु होथि झमान
30
वरक जैतुक जखने देखलौ कनिआक नाम निरासी
31
वर कनिया कए भेटे ने ओठङर ले मारि
32
निरलज के नै लाज नै अपमान
सहन कथा एक मरन समान
33
वरक बरनन कते करब वर एक नजरी
कनियाक बरनन कते करब कनिया गरमे गगरी
34
वर बीसे बीसे बीस
बर ताकथि एके दिस
35
बड़े-बड़े के लाइ ने
लड़िकन के मिठाई
36
बाबरीवला वर करबै कोठावला घर
लगेमे पैखाना आँगनेमे कल
37
सैंया दर रे देवानी बहु छुछुनरि रानी
सैंया नित नहाथि बहु ढकनेमे खाथि
38
मर जाइ त रासि गाबी
देह दशा अछि पूरा मुहसँ उड़ैए धुरा
39
अंधे देखलनि बड़ियारक गाछ
त कहलनि जे लंका इएह छिऐ
40
जैसाके तैसा मिले, मिले चोंच मे चोंच
दाढ़ीमे दाढ़ी मिले, मेले मोंछ मे मोंछ
41
पेट जरैए त मलार गबै छी
42
पेट कहकह करए जुड़ा महमह करए
42
त’र कान तड़की ऊपर कान खुटी
दांत मिसी कोचा सीटी
तखन चिन्हबनि जे कटकाक छिका
43
छटाक भरि सोन तकर कने छनगर कने फनगर
कने सोतिआम तखन ने धिआ जेती सोतिआम
43
एहन चुड़ा कूटब जे धान बिछि कए खाएब
एहन नैहर जे अपने जायब
44
आन्हर गुरु बहिर चेला
माङथि गुड़ त देथि भेला
45
लजैली ने कठेली सवेरे चलि एली
गीत
परम अभाग कपारक लिखल जनिका घरमे फुहरि नारि
मस-मस दिन पर आङन बहारथि बैसथि टाङ्ग पसारि।। परम अभाग ..
धियापुताके ठोकि सुताबथि अपने बैसथि कोन दाबि
बासन धो के कोनटा फेकथि आङन पड़ि गेल हील
गालमे जे मांड़ी बहकल केसमे पसरल ढील।। परम अभाग..
ओलती झीकि क चुल्हा पजारथि झिकथि कोनटाक बाती
साँझ राति मे दीआ नै बारथि लेसथि दुपहर आ राती।। परम अभाग ..
बिकौआ सोति
सुध समै उपगत भेल सखी चमकल
फिरे बिकौआ
कम्बल लोटा मोटा बन्हलनि झाड़ी ओ पनबट्टा
किओ बिकौआ धोती सिटै छथि केओ थकड़ै छथि टीक
किओ बिकौआ चानन करै छथि ई सब सुधक रीत
घोड़ा पीठी जे कसल सवारी ताहि पर अपने असवारी
चमकै पाग जड़ीकोर धोती रेसमी केर दोपटा
दुइ चारि जे हर बहै छैन चारि चलै छैन लहना
अहाँक कनिआ हिनक घर जेती तुरन्त गढ़ा देथिन कगना
लगनी
पनिआँ के गेलीऐ हे स्वामी ओही
रे जमुनमा रे की
उमतल भैसुरवा बटिआ रोकल रे की
घाट छोडू बाट छोडू उमतल भैसुरवा
कनिए कनिए चुनरी भिजल रे की
भीज दियौ भीज दियौ अपनी चुनरी
हमर दोपटा तोहर पालट रे की
तोहर दोपटा अगियाके धाधर
अपन चुनरी सीतल बसात रे की
जांघ घुन लगिहै बाँहि घुन लगिहै
हे स्वामी तोहरे अछैत भैसुर परेखल रे की
हुअ दे प्रात रे धनी पसराक हटिआ
छुरिआ बेसाहि भैआ जीव हतबै रे की
भैआ जीव हतबै हे स्वामी एसकर हेबै
तिरिआ मुइने तिरी वध लागत रे की ।।
स्व. बिन्देश्वरी देवीके पढ़बाक रूचि रहनि. मुदा, हम जहियासँ देखलियनि, काजक तेहन
व्यस्तता रहनि जे कहथिन, ‘होइए दिन राति मे चौबिसे घंटा किएक, पच्चीस-छब्बीस घंटा
होइतैक.’ मुदा, करीब अठासी वर्षक जीवनक अंतिम तीस वर्षमे हुनक अधिक समय पूजा-पाठ आ
पढ़बामे बितनि. तथापि, हुनका कहियो हमरालोकनि कथा, कविता वा गीत लिखैत देखने नहि रहियनि. जखनि
समय भेटनि मौनी-चङेरी-सितलपाटी बिनथि. अंचार, मुड़ौरी, कुम्हड़ौरी, निमकी बनबथि.
मुदा, टोल-पडोसक स्त्रीगण लोकनिक आ अपन चिट्ठीक अतिरिक्त किछु लिखथि नहि. एक बेर
करीब 2000 ई. मे, मृत्युसँ दू-अढ़ाई वर्ष पूर्व, एकटा गीत लिखने रहथि. ओ गीत बंगलोर
डेरा पर हमरा देखय देने रहथि. मुदा, हम तहिया ध्यान नहि देलिऐक. बादमे ओ किएक भेटत.
तथापि, जीवनक अंतिम चरणमे ओ कोन प्रेरणासँ किछु फकड़ा लिखिकए घरमे राखि गेलीह, से
कहब असंभव. संयोगवश हालहिमे हमर ममिऔत आ किरणजीक तेसर पुत्र, केशरीनाथ झा कहलनि, जे ‘बाबू (किरण जी) कहने रहथि जे मझिली
पिसिया (स्व. बिन्देश्वरी देवी) हमरा सब भाई बहिनिमे सबसँ बेसी प्रतिभावान रहथि.’
मुदा, आब तकर कोनो महत्व नहि. तथापि, संकलित फकड़ा आ गीतक महत्व भए सकैत छैक.
उपरोक्त फकड़ा सबमे बहुतो एखनो प्रचलन मे छैक. बहुतो आब नहि सुनबैक. किछु फकड़ा आ
गीत संकलित उपरोक्त गीतक समाजशास्त्रीय महत्व छैक. तकर विवेचनाक अवश्यकता नहि,
कारण, संदर्भ आ उक्ति अपने सब किछु स्पष्ट कए दैछ. एतबा अवश्य जे हमरा आङन वा आन ठाम
लगनि सुनबामे आबय किन्तु कहिओ ध्यान नहि देलिऐक. उपरोक्त लगनीमे स्पष्ट छैक जे
नारि गीतमे हर्ष-विषादक संग ओकर अपनहि परिवारजनक द्वारा शोषणक व्यथाक वर्णन सेहो रहैत
छलैक. मुदा, बहिर समाज सुनिओ कए किछु नहि सुनैत छल.
एकटा गप आओर. स्व. बिन्देश्वरी देवी द्वारा संकलित उपरोक्त फकड़ाक वर्तनी ओहिना
राखल गेल अछि जेना ओ लिखने रहथिन. हुनक जन्म पण्डित परिवारमे भेल रहनि. मुदा, हुनक
औपचारिक शिक्षाक अवसर नहि भेटल रहनि. कहने रहथि, “भाई ( पण्डित काशीनाथ झा काव्यतीर्थ)
जखन भौजी (पत्नी जमुना देवी) कें पढ़बथिन, तँ, लगमे बैसि हम देखैत रहियनि. पछाति,
नुनू भाई (किरणजी) कोइला पिसिकए सरबामे मोसि बना देलनि आ कड़चीक कलम बनाक देलनि.
ओहीसँ लिखब सिखलहुँ. एगारहम वर्षमे तं एतहि (सासुर) आबि गेलहुँ.”
संदर्भ
झा, काञ्चीनाथ ‘किरण’. फकड़ा. वैदेही
अक्टूबर १९६१.

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