नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन 2025
जंगल, वृक्ष, हरीतिमा आओर नदी
केर गीत
यायावर मन हमर, स्वर्गे तँ ई थीक!
एहि बेर 24 दिसंबरक दिन ओ दिन ओ साँझ फेर आयल : हम कावेरीक कछेर पर एसगर बैसल
रही. घाट लग बाँसक कमचीसँ बनल नाओ सब रहैक. दू गोट नाविक सब
सेहो रहथि. कहैत गेलाह, पंदरह मिनटक नौकायन आ मात्र दू सौ टाका. हमरा समय नहि छल.
नहि गेलहुँ. एहि बेर करीब पचीस वर्षक पछाति श्रीरंगापत्तिनम्
आयल छी. फेर कहिया आयब, कहब कठिन. हमर अनुभव कहैत अछि, अवसर हठे अबैत नहि छैक.
कावेरीकेँ उद्गमसँ समुद्र धरि टा नहि, हिनका हम लगभग
संपूर्ण लंबाई धरि देखने छियनि; कोडागुक तलकावेरीक विन्दु-विन्दु जल प्रपातसँ लए
कए श्रीरंगम्, तरंगमवाड़ी-पूम्पूहार धरि. एहि नदीक प्रशस्ति तँ संगम कालसँ
शिलापत्तिकारम् – सन महाकाव्यसँ लए कए अनगणित काव्य आ गद्य साहित्यमे लिखल गेल छनि.'शिलापत्तिकारम्' केर हमर मैथिली अनुवाद 'कन्नगीक काड़ाक कथा' मे सेहो कावेरी गीत अछि; ई मूल
कावेरी गीतक भावानुवाद थिक:
धवल
पुष्प-सन कार्तिक तोहर हे
गतिओ
पवन समान,
कारी आँखि पावन मनभावन
रूपक नहि उपमान ।
बूलय मयूर कोइली गाबय
हरिअर आँचर धान,
सबतरि भूमि पानिए पूरित
विपुल अन्न वरदान।
मुदा, एहि बेरुक कावेरी दर्शन विशिष्ट छल. श्रीरंगापत्तिनम्
ऐतिहासिक आ पवित्र तीर्थस्थल थिक. ई स्थान धार्मिक भावें टा पवित्र नहि. पवित्र
भूमि, पवित्र वायु आ पवित्र जल. ई स्थान एहि सबहक समुच्चय थिक. बहुत दिन बाद आयल
छी. बहुत लगसँ, जल-परिपूरित, कल-कल बहैत, हरियर कचोर कावेरीक तट पर वृक्षक सघन
छायामे आँखि मूनि बैसबाक क्षण, अनुभूतिक विषय थिक, वर्णन अनावश्यक आ निरर्थक
प्रतीत होइछ. एतय कावेरीक स्वच्छ, चंचल धार लग ऊर्जाक स्वतः अनुभूति हमरा लेल
स्वाभाविक थिक.
भूमि प्रदूषणसँ कोसी अंचलमे
अनेक ठाम भूमिक नीचाक पानि पीबा योग्य नहि छैक, किछु वर्ष पूर्व से देखि मन कोनादन
भए गेल छल: सुपौलमे बोतलबंद पानि पीने रही. यमुनाक जल आ वायुक प्रदूषणसँ दिल्लीक
जनस्वास्थ्य प्रभावित अछि. किन्तु, श्रीरंगापत्तिनम् एहिसँ मुक्त अछि. दिसंबरक
मास, मृदु सुखद रौद. जाड़ तँ एहि क्षेत्रमे होइते नहि छैक. एखन बरखा सेहो नहि.
हम एहि बेर एतय ‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क आयोजक दीपा मिश्रक निमंत्रण पर आयल
छी. दीपा मिश्र अपन माता स्व. नीरा मिश्रक बरखी एक अभिनव रीतिऍ- साहित्य संगम आ
साहित्यकारकेँ पुरस्कृत कए - मनबैत छथि. एहि प्रकारक बरखीक हम समर्थन करैत छी. दीपा
अपन माता आ नारि समुदायक प्रति अत्यन्त भावुक छथि. सम्मेलनक बीच ओ एहि विषयकेँ
अनेक प्रकारे अनेक बेर अभिव्यक्त केलनि. अपन भाषणमे दीपा कहलनि, जे ‘माताक मृत्युक
पछाति, एसगरिए नदीक कछेर पर बैसलि नदीमे हुनका अपन माताक (प्रतिच्छविक) दर्शन भेल
रहनि. अतः पछिला वर्ष ओ माताक बरखी सिप्रा नदीक कछेर पर मनओने रहथि. एहि बेर ई
आयोजन कावेरी तट पर केलनि.
दीपा अपन भाषणमे मिथिला, आ अपन परिवारक महिलालोकनिक जीवनक अनेक अनुभव अभिव्यक्त केलनि,
जकर विस्तृत व्याख्या, हमरा लगैत अछि ओ अपन कृतिमे लिखनहि हेतीह, आ लिखतीह. उर्जावान,
रचनाशील आ मुखर छथि. अपन भाव स्पष्टतः व्यक्त करैत छथि.
हम आ हमर पत्नी रूपम करीब चारि बजे श्रीरंगापत्तिनम् पहुँचल रही. क्रमशः अओरो
गोटे- साहित्यकार नीता झा, उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डाक्टर रमानन्द झा ‘रमण’,
कथाकार रोमिशा, लेखक-पत्रकार पंकज मिश्र, दिनेश एवं श्रीमती कल्पना मिश्र अइलीह. बेसी गोटे सपरिवार आयल रहथि.
सबसँ भेट भेल. भोजनक पछाति तीन बजे दिनसँ साँझ सात बजे धरि चारि घंटाक कार्यक्रम.
अनेक सारगर्भित भाषण-चर्चा, पुस्तक-‘सुखी मीन जो नीर अगाधा’ कविता-संग्रह एवं अन्य
पोथीक – लोकार्पण, आ पुरस्कार- रोमिशाकेँ हुनक कथा संग्रहक हेतु पुरस्कार देल
गेलनि- एवं सम्मान समारोह. कथाकार अशोक एवं तारानन्द वियोगीक अबैया रहनि. मुदा, नहि
अयलाह. भेट नहि भेल.
‘नीर मैथिली कथाकार सम्मलेन’क अवसर पर आयल विभिन्न वयसक प्रतिभागी लोकनिसँ भेट
सेहो एकटा नीक उपलब्धिए भेल. कार्यक्रममे विचार विनिमयक अतिरिक्त नचिकेताजी,
रमणजी, नीता झा, पंकज मिश्र, दीपा मिश्र, एवं रोमिशाकेँ सुनबाक अवसर भेटल. छोट
ग्रुपमे साहित्य-संगम हमरा पसिन्न पड़ैछ.
25 दिसंबर 2025, क्रिसमसक दिन
हमरा भोरहि उठि टहलबाक हिस्सक अछि. भोरुक टहलानमे स्थानक स्पन्दन सोझे कान धरि पहुँचैछ,
जेन कानमे स्टेथोस्कोप लगा ककरो हृदयक धड़कन आ श्वास-उच्छ्वास सुनैत होइ. स्थानीय
जनसामान्यक दैनिक गतिविधि सेहो देखबाक अवसर भेटैछ आ कदाचित् अनचिन्हार लोकसँ परिचय
भए जाइछ. शान्त मनें मनुखसँ भेट आ अनचिन्हारसँ
निःस्वार्थ गप-सप अजुका जिनगीमे बोनस थिक. मुदा, आइ ने कोट्टयम्-जकाँ
धनखेतीक बीच सुखद भ्रमणक अवसर भेटल, ने उत्तरांचलक अरण्य, ने बनारसक गली. मुदा, घूरि
कए आपस एलहुँ, तँ हमरा हेतु दोसर बोनस प्रतीक्षारत छल; सुजनै सह संगमः ; रमणजी,
नचिकेता जी एवं दीपा रेस्टोरेंटमे चाहक कप संग ‘(बेडसँ दूर) भोरुका चाह सेवन करैत
रहथि’. हमहूँ संग बैसि गेलहुँ. ओतय ‘जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार,
वहीं
रात हो गुलज़ार’ बला बैसाड़ तँ नहि भेलैक, मुदा, चाहक अनेक कपक
बीच बहुतरास गप भेलैक. ताहि प्रकारक गप-सप जाहिमे रूचि अछि, आ मन लगैत अछि. क्रिसमसक
छुट्टीक दिन आ समानधर्मा लोकक संग. घड़ी पर नजरि गेल तँ साढ़े आठ बाजि गेल रहैक.
किछु कालक बाद मैसूर विदा हेबाक छल. अस्तु, बैसाड़ विसर्जित भेल.
जँ शहरक भीड़सँ मन अकच्छ भए गेल हो, आ एसगर
वा परिवारक संग स्वच्छ शान्त-शीतल स्थानमे किछु दिन रहब, पोथी पढ़ब आ गप-सप करब नीक
लगैत हो, तँ जाड़क ऋतुमे श्रीरंगापत्तिनम् क कर्नाटक पर्यटन विभागक होटल ‘मौर्या
रिवर व्यू’ नीक विकल्प थिक.

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अहाँक सम्मति चाही.Your valuable comments are welcome.