जेहने विविध माटि अछि अप्पन
तेहने विविध अछि लोक,
भाषा मधुर, अनेको
बोली
माटिओक रंग अनेक।
शोणित सभक एक रंग जहिना
श्वासो एके थीक,
आगि-पानि विभेद ने मानय
संशय तखन कथीक?
सूर्य-चान बसै छथि ऊपर
एके ताप आ छाया,
तखन मनुख जे भेद कराबय
बेचय स्वार्थ, ओ
माया।
गाछ-वृक्ष नहि भेद करै अछि,
मेघ ने बाँटय पानि
मनुखक तखन बाँट-बखराकेँ,
लेबै कोना मानि!
मूर्ख रहौ, कपड़ा
नहि तन पर,
धन नहि दैछ विवेक
आगि-पानि आ झूठ-साँच केर
लक्षण होइछ अनेक।
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