Monday, September 28, 2020

विद्यापतिक पुरुष-परीक्षासं दू गोट रोचक कथा

 

नेना-भुटकाक हेतु

विद्यापतिक पुरुष-परीक्षासं दू गोट रोचक कथा 

विद्यापति अपन पुरुष-परीक्षा नामक ग्रन्थमें कथाक माध्यमसं कतेको प्रकारक मनुष्यक उदाहरण देने छथिन. ओही म सं आइ दू गोटेक दू टा रोचक कथा कहैत छी. एहि म सं एक गोटे पढ़ल-लिखल रहथि. मुदा, हुनका बुद्धि नहिं रहनि. दोसर, रहथि छुद्र-बुद्धि, किन्तु, चालाक. आब दुनूक कथा सुनू :

एकटा बकलेल पण्डित

कौशाम्बी नामक नगर में एकटा देवधर नामक ज्योतिषी रहैत छलाह. हुनका शान्तिधर नामक एकटा बेटा रहनि. शान्तिधर मंदबुद्धि छलाह. तथापि,  देवधर बहुत दिन धरि कठिन परिश्रमसं शांतिधरकें ज्योतिष-विद्या पढ़ओलनि. अन्ततः जखन सब किछु शान्तिधार कें रटल भ गेलनि तं देवधर अपन बेटाकें राजाक दरबार ल’ गेलाह. राजा देवधरकें देखिते पुछलखिन, ‘ हं, कहू, अहाँक बेटा की सबसिखने छथि ? देवधर बजलाह, हे राजा, शान्तिधर ज्योतिष सिखने छथि. तें, ओहि सम्बन्धी जे कोनो समस्या अपने देबनि ई तकर समाधान क’ सकैत छथि. तें, आइ जं ई अपनेकें सन्तुष्ट क’ देलनि, तं आइ हिनक शिक्षाक उद्देश्य पूरा भ’ जेतनि.’

राजाकें कौतूहल भेलनि. ओ अपन हाथक सोनाक अंगूठी मुट्ठीमें मूनि लेलनि आ शान्तिधर सं पुछलखिन: कहू हमर मुट्ठीमें की अछि ?

                                                                         जांतक उपरका पट्टा 

शान्तिधर अपन हाथमें खड़ी लय भूमि पर लिखि किछु गणना केलनि आ कहलखिन: ‘ अपनेक हाथमें ने जन्तु अछि, ने फल. अहाँक हाथमें कोनो खनिज अछि.’ राजा परम प्रसन्न भेलाह. सोचलनि, ई कहैत तं ठीक छथि. सोना खानहिं सं तं निकलैत छैक. कहलखिन: ठीक. शान्तिधर आगू बजलाह: अहाँक हाथमें जे किछु अछि से भरिगर आ गोलाकार अछि. राजाक कौतूहल बढ़लनि. ओ बालककें चाबासी दैत कहलखिन, वाह ! आगू कहू. राजाक प्रशंसासं प्रसन्नतामें शान्तिधर उन्मत्त भ’ गेलाह. सोचलनि, बाजी मारि लेल. आ जोशमें कहलखिन आब तं हम तुरते कहि देब अपनेक हाथ में की अछि, आ बाजि उठलाह  ‘ अपनेक हाथमें जांतक ऊपरका पट्टा अछि ! राजा हंसय लगलाह आ देवधरकें कहलखिन, अहाँक पुत्र ज्योतिष अवश्य रटने छथि, किन्तु, हिनका बुद्धि नहिं छनि. हताश देवधर, शान्तिधर कें ल’ कय आपस भ’ गेलाह.[1 ]

एकटा चालाक चोर

काँची नामक नगरमें सुप्रताप नाम राजा रहथि. एक दिन हुनक सिपाही सब चारि टा चोर कें पकडि दण्डले हुनका सामने अनलक. ओ सब मिलिकय एकटा समृद्ध व्यापारीक घरमें चोरि केने छल. फलतः. राजा  चारूकें तुरत मृत्युदण्डक आदेश  द’ देलखिन. सिपाही सब आदेशक पालन करैत तीन टा चोरकें तुरत सुल्फा घोंपि मारि देलक. जखन चारिम चोरक दण्डक समय अयबाक भेलै, ठीक ओकर पहिने चोर मनहिं मन सोचलक, भले मृत्युक द्वारि पर किएक नहिं होइ , प्राण बंचबाक युक्ति तं लगेबेक चाही. युक्ति जं सफल भेल तं उत्तम, अन्यथा, मरब तं अछिए. अस्तु, ओ बंचबाक हेतु एकटा युक्ति सोचलक. तें, जखन सिपाही सब ओकरा दण्ड देबाले उद्यत भेलैक तं चोर कहय लगलैक: कनेक थम्हू. हमरा राजाकें किछु अति आवश्यक सूचना देबाक अछि. किन्तु, जखन अहाँ लोकनि हमर प्राण ल’ लेब तं ओ गुप्त सूचना हमरहिं संग चल जायत. आ एहन महत्वपूर्ण सूचना ककरो नहिं भेटतैक. तें, अहाँ लोकनि कनेक बिलमि जाइ. जाहि सं हम ई रहस्य राजाकें कहि दियनि आ ई ज्ञान संसार सं विलुप्त हेबा सं बंचि जाइक.’ सिपाही चोरके जोरसं डंटैत कहलकैक, गुंडा कहीं कें ! हमरे सब संग चतुराई !’ चोर चालाक तं छले, ‘ कहलकैक सुनू. अहाँ लोकनि राजाक काजमें बाधा देबनि ? सिपाही सब चुप्प भ’ गेल. सिपाही सब कें चुप्प देखि, चोरक हिम्मत बढ़लैक. कहलकैक, आओर एकटा गप्प.जं ई काजक गप्प अहाँ लोकनिक माध्यमसं राजाकें भेटलनि, तं कोन ठेकान अहूँ लोकनिकें किछु, इनाम भेटय. गप्प सिपासी सबकें जंचलैक. अतः, सिपाही सब चोरकें राजाक सामने ल’ गेल. राजाकें गप्प सुनि जिज्ञासा भेलनि. चोरकें लक्ष्य कय कहलखिन, कह’, की कहैत छह.

चोर बाजल, ‘ सरकार, हम माटिमें सरिसबक दाना-सन-सन, छोट-छोट सोनाक बीआ बाग़ कय एहन गाछ लगबय जनैत छी जकर फूल अगबे सोनाक होइत छैक. एवं प्रकारे हम सरिसबक दानाक आकारक प्रत्येक सोनाक बीआसं एक पैसाक बराबरि वजनकें सोनाक फूल उपजा सकैत छी.’

अच्छा ? सत्त कहैत छह ?

अपनेक सामने फूसि के बाजत, सरकार – चोर बाजल. आ जं हमर कहल फूसि साबित भेल तं एमहर मास  बीतत ओमहर हमहूँ मरिए जायब. सबठाम अपनेक न्याय आ दयाक चर्चा तं हेबे करत. एहि पर राजा सहमत होइत चोरकें अपन करतब देखेबाक अनुमति द’ देलखिन. चोर सेहो सोनारक सहायतासं सरिसबक दानाक  आकारक थोड़ेक सोनाक बीआ गढ़बौलक. पछाति राजदरबारक अन्तःपुरमें नहयबाक कुण्डक समीपे सोनाक गाछ लगयबाक हेतु एकटा छोट-सन  किआरी सेहो तैयार केलक  आ राजाक आगू जा कय अर्ज केलकनि, ‘सरकार खेत आ बीआ तैयार अछि. आब अपने कोनो उपयुक्त व्यक्तिकें सोनाक बीआ बाग करबाक हेतु नियुक्त करी.’ एहि पर राजा पुछलथिन. ‘ ई काज तों अपने किएक नहिं करैत छह’. चोर हंसय लागल. कहलकनि, सरकार जं हमरा बाग़ केने सोनाक गाछ जनमितैक तं हम एहने निर्धन रहितहुं आ चोरिए करितहुं ! एहि बीआक बाग़ करबाक हेतु तं एहन लोक चाही जे कहिओ कोनो चोरि नहिं केने हो. तें, सरकार अपनहिं  किएक नहिं ई बीआ बाग करी.’ राजा सोचमें पडि गेलाह. कहलखिन, ‘मुदा हम तं एक बेर एकटा साधुकें देबाक हेतु, अपन पितासं नुकाकय, हुनकर किछु टाका चोरओने रहियनि’. ‘तखन, मंत्री लोकनि ई काज करथु’, चोर बाजल. मंत्री लोकनि एक दम असहमत  होइत कहैत गेलखिन,‘ हमरा लोकनि सरकारक अनेक काज करैत छी. हमरा लोकनिसं कखन की गलती होइछ कहब असम्भव. हमरा सब ई नहिं कय सकैत छी. तखन मुख्य  न्यायाधीश ई काज करथु’ चोर बाजल. ‘नहिं, हम एकबेर मायसं चोराकय मधुर खेने छी.’ मुख्य न्यायाधीश प्रतिवाद केलखिन. चोर हंसय लागल. ओ बाजल, ‘सरकार अपने सब गोटे चोरि केने छी, तखन हमरे टा चोरि ले फांसी लागय से उचित थिकैक ? एहि पर राजा सेहो हंसय लगलाह आ कहलखिन, ‘ एहि चोरक फांसीक सजा माफ़ भेल. मंत्री लोकनि, ई चोर छुद्र-बुद्धि अछि, तथापि ई  अछि बेजोड़ बिदूषक. आइ सं ई हमरहिं लग रहत आ समय-समय पर अपन हास्य-विनोद सं हमरा हंसबैत रहत.’[2]

1. & 2. Grierson GA.  The Test of A Man being the Purusha-Pariksha of Vidyapati Thakkura, 1935; London: The Royal Asiatic Society pp  65-6 & 120-22 

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