Saturday, March 6, 2021

यात्री-नागार्जुन: 'तोहर सरिस एक तोहें माधव'

 

यात्री बैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन केर प्रशस्ति आ आलोचना में बहुतो कहल आ लिखल गेल अछि आ अओरो कहल जायत. किन्तु, यात्रीक व्यक्तित्व आ रचनाक कोन एहन तत्व अछि जे हुनका समकालीन मैथिली साहित्यकार सबसँ भिन्न करैत छनि ? सत्य पूछी तँ, यात्रीमें अपन समकालीन सब समानताए की रहनि ! तथापि,  एतय केवल पहिले प्रश्न पर विचार करी. हम एहि विमर्शक हेतु तर्क यात्री-नागार्जुनहिंक रचनामें तकैत छी.

समकालीन लोक आ सामान सामजिक वर्गक व्यक्तिमें सामाजिक अवस्थाक लगभग समान अनुभव होइछ. तथापि, दृष्टिकोणक  भिन्नताक कारण सब केओ एके परिदृश्य वा घटना सँ समान निष्कर्ष नहिं निकालैत छथि. दृष्टिकोणक  इएह भिन्नता एक पीढ़ीक साहित्यकार लोकनिक बीच विचारक भिन्नता आ अभिव्यक्तिक विविधताक  कारण थिक. यात्री जीवन आ दृष्टिकोण आ रचनामे निर्विवाद अपन समकालीन सबसँ भिन्न रहथि. किन्तु, कोना ताहि पर विन्दु-विन्दु विचार करी.

1938 में प्रकाशित प्रसिद्द हिंदी कविताबादल को घिरते देखा हैमें यात्री-नागार्जुन कहैत छथि:

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर विष-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

हमरा जनैत ई कविता केवल कोनो एकटा परिदृश्यक नहिं, बल्कि यात्रीक विस्तृत दुनिया देखबाक संकेत आ भिन्न अनुभवक कथा कहैत अछि. विदित अछि, विस्तृत विश्वक दर्शन यात्रीकें अनुभवक विशाल क्षितिज आ भिन्न दृष्टि देलकनि. फलतः, विश्व भरिक घटनाके अपन साहित्यमें ओहिना समेटलनि जेना मिथिलाक समस्याकें. तें हुनक कवितामें मिथिलाक समस्या परबूढ़ बरआ विश्वक परिस्थिति परकी लालदुनू भेटत.

दोसर गप्प, यात्री-नागार्जुन पर अपन काजक बल पर कतेकोछापलगलनि. यद्यपि, हुनका केओ मार्क्सवादक 'ढोलिया' बुझलखिन, तं, केओगोड़ा  लगाओल कहलगैंयां लोटा’. किन्तु, कोनो धर्म, व्यक्ति, वाद वा पार्टी यात्री जीकें खुटेसि कय नहिं राखि सकल, कोनो कलइ हुनक भीतरी धातु पर पक्का नहिं भए सकल. ओ रमता जोगी , बहता पानी तं छलाहे, भौतिक आ वैचारिक दुनू स्तर पर. तें, जखन जतय मन भेलनि बिदा भगेलाह. हुनका गृहस्थ तँ नहिंए बूझि सकैत छियनि. जँ प्रमाण चाही तँ, नीचा देल उद्धरण देखू. ई निर्विवाद यात्रीक पारिवारिक दायित्वसँ विमुखताएक प्रमाण थिक. कारण भले जे हो :

कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप
हम टा संतति, से हुनक पाप
ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप

यद्यपि स्वयं यात्री जीमिथिला कें अंतिम प्रणाम'  हेतु निम्न पांती में  अपन 'रमता जोगी'क प्रवृत्तिक समर्थन करैत समुचित औचित्य सेहो प्रस्तुत करैत छथि:  

दुःखओदधिसँ संतरण हेतु
चिरविस्मृत वस्तुक स्मरण हेतु
सूतल सृष्टिक जागरण हेतु
हम छोड़ि रहल छी अपना गाम

मुदा, हुनक जीवन मे एहि सब उद्देश्य म सँ सबसँ प्रबल कोन प्रेरणा रहनि से कहब कठिन. तथापि जँ ओ सनातन धर्म छोड़ि, दीक्षा लय बौद्ध भिक्षुओ भेलाह, तं, पुनः उपनयन करा कय फेर जनौ सेहो पहिरलनि. अर्थात् , ओ सब परिस्थिति में सामाजिक दवाबक प्रतिरोध नहिं कए सकलाह. मुदा, हुनकर  मन जतय जखन भरि गेलनि, तँ, देहक चोला-जकाँ विचारो  बदलि लेलनि. तें,  जहिना, स्टॅलिनवाद आ मार्क्सवादक समर्थको बनलाह, तँ पछाति ओकर निंदा सेहो केलखिन. इन्दिराकें प्रगतिवादीओ कहलखिन, तं, इन्दिराक विरुद्ध जयप्रकाश नारायणक मुहिम में सेहो हिस्सा लेलनि आ कविताओ गढ़ि देलखिन:

क्या हुआ आपको ?
क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में
भूल गई बाप को?
इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को !
क्या हुआ आपको ?
क्या हुआ आपको?

कारण, कोनो व्यक्तिक महानता, हुनका लोकनिकें यात्री-नागार्जुनक कोप वा उपहास बंचा लेतनि तकर गारंटी नहिं.  केओ, वा केहनो होथि, यात्री सबके एकहिं लाड़निसँ  लाड़ि दैत छलखिन. गाँधी- गाँधीक अनुयायी लोकनिपर नागार्जुनक प्रहार नीचा देखल जाय:

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के!
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!

किन्तु, यात्री मनुखक दिन-प्रतिदिनक जद्दोजहदकें ततबा प्रधानता दैत रहथिन, जे कष्ट में हुनकाकखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथक हेतु धैर्य नहिं रहनि. हुनक उक्ति तँ इएह कहैछ जे हुनका मोने जं ओ कष्ट में छथि आभोलानाथनिर्द्वंद सूतल छथि तँ भोलेनाथ बातो-कथा- गारिओ सुनथु : 

पचकल लोढ़ा, तों धन्न रह
नहि आब नचारी केओ गओतहु !
जे बूड़ि हैत से बोकिअओतहु !
नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस ....
माटिक महत्वकें  चीन्हि लेलक ई देश-कोश !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !

तेसर गप्प, जे यात्रीकें अपन समकालीन लोकनिसँ भिन्न करैत छनि, से थिक यात्रीक जीवनमें साहित्यक उपादेयता. यात्रीक हेतु साहित्य जीविकाक साधन छलनि. एहना परिस्थितिमें साहित्यक लोकप्रिय आ बिकयबा जोकर हयब आवश्यक. सत्यतः, जं विचार करी तँ ओ केवल यात्री ए टा रहथि जे मैथिली उपन्यासक विधाकें परिचये टा नहिं देलखिन बल्कि ओकरा प्रगतिशील विचार सँ पुष्ट केलनि. ततबे नहिं, यात्रीक मन में मैथिली आ हिन्दीक बीच कोनो दुविधा सेहो नहिं छलनि. जाहिसँ हुनकपेट  भरैत छलनि, तकर पीड़ी पर सब किछु चढ़बैत छलाहआ तकरा उचितो बूझैत छलाह .हुनकर पीढ़ीक दोसर प्रसिद्द साहित्यकार  स्व. सुमन जी-सन साहित्यकार आरम्भ में साहित्यसँ जीविका चलबितो छलाह, तँ, हुनका नियामिकी नौकरीओ रहनि, आ वेतन सेहो भेटैत रहनि. नौकरी-पेशा साहित्यकार लोकनिक साहित्यक लोकप्रियता आ पोथीक बिक्री, हुनका लोकनिक  जीवन-यापनकें प्रायः ओतेक प्रभावित नहिं करैत रहनि जतेक यात्रीकें . हँ, ई गप्प भिन्न जे यात्रीक स्वर आ तेवर तेहनि रहनि, जे, हमरा नहिं लगैत अछि, यात्रीकें अपन लोकप्रियताक हेतु कोनो आयास करय पड़ल हेतनि.कारण, समाज, व्यक्ति, आ घटनाक  प्रति यात्रीक प्रतिक्रिया ततेक अनायास आ त्वरित होइत छलनि जे हुनक स्वर अनेरे सबकेँ आकृष्ट कए लैत छलनि. हँ, इहो स्मरण रखबाक थिक जे यात्रीक अधिकतर हिन्दी रचना हुनकासँ लिखाओल गेलनि. माने, रचना आ प्रकाशन मे कोनो बिलंब नहिं. हिन्दी रचनाक मांग रहैक. आब, प्रकाशित रचना हिन्दी में लोकप्रिय भए गेल, तँ  मैथिली मे ओकर  प्रचारक कोन आवश्यकता.

एकटा गप्प आओर . अपन समकालीन लोकनिक विपरीत, यात्री एहनो विषय आ व्यक्ति- यथा, कांसीराम आ मायावती - पर कविता लिखलनि, जे साहित्यक मुख्यधारा लेखनक विषय नहिं बूझल जाइत छलाह.हमरा जनैत, यात्रीक इहो प्रवृत्ति, लीकेसँ हंटि कय चलबाक बानि, आ हुनक विरल प्रतिभाए प्रमाण थिक.

 


Tuesday, February 16, 2021

कविताक अनुवादक समस्या

 

कविताक अनुवादक समस्या

एक भाषाक  कविताक दोसर भाषामें अनुवाद कोना करी जाहिसँ कविताक भाव आ भाषा, दुनूक सुन्दरता यथावत् प्रतीत हो; ई एकटा विकट समस्या थिक. सरल शब्दक अनुवाद संभव छैक. किन्तु, कठिन भावक अनुवाद कोना करी. एकटा उदहारण आचार्य जयशंकर प्रसादक कवितासँ देखी:

हिमाद्रि तुंग श्रृंगसे प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती

दोसर उदाहरण कवि नागार्जुनक कवितासँ  अछि:

बाँसक ओधि उखाड़ि करै छी जारनि

हम्मर दिन घूरत कि हे जगतारनि !

उपरोक्त दुनू पद केर अर्थ आ भाव अपन-अपन भाषामें स्पष्ट अछि. किन्तु, एकरे दुनूकें जँ अंग्रेजीमें अनुवाद करबाक हो कविताक लालित्य आ भाषा तँ दूर, पाठककें एकर भावो बुझायब कतेक कठिन हेतैक से बूझब कठिन नहिं, जेना, 'गोदान' शब्द भारतमें सार्थक तँ अछिए, तेँ,गोदान कहितहिं एकटा सामाजिक प्रथाक बोध भ' जाइछ, जकर बोध Gift of cow  सँ  एशियाई सँ  इतर पाठककें नहिं हेतनि. तखन प्रश्न उठैछ, एक भाषाक कविताक अनुवाद दोसर भाषा, आ दोसर संस्कृतिक भाषामें, कोना हो. एहि विषयमें ई विमर्श किछु अनुवादक लोकनिक विचारसँ आरम्भ करैत छी. पछाति हम अपनो विचार देब.

सर्वविदित अछि, नव देशमें पयर जमयबाक हेतु स्थानीय भाषाकें बुझबाक अनिवार्यताकें उपनिवेशवादी लोकनि सबसँ पहिने अनुभव केलनि. फलतः, ओ लोकनि विश्वकेर अनेक भागमें, जतय कतहु गेलाह, ओतुका भाषाकें बूझि, ओहि भाषा सबहक शब्द-कोष बनओलनि, ओकर व्याकरणक रचना केलनि, आ पछाति ओतुका साहित्यक अनुवाद सेहो केलनि. वीर महामुनिवरक नामसँ  दक्षिण भारतमें प्रसिद्ध इतालवी पादरी बेस्की तमिल भाषाक आरंभिक विदेशी अध्येता, एकर एक प्रसिद्ध उदाहरण रहथि. अनुवाद केर विषय में बेस्की ( 1680-1747) कहैत छथि:

हमरा लोकनि अधिक काल लैटिनक लोकोक्तिक शैलीक बिना लैटिन लिखैत छी, आ ताहूसँ बेसी तमिल शब्दकें यूरोपीय शैलीमें व्यक्त करैत छी.’[1]

एकरहिं स्पष्ट करैत, अंग्रेजी आ तमिल साहित्यक  दोसर सुप्रसिद्ध विद्वान, जी यू पोप (1820- 1908) तमिल भाषामें दक्षताक  संदर्भमें सँ लिखैत छथि, ‘ एहिसँ पहिने कि केओतमिलशैलीमें तमिल बजबाक प्रयास करथि, ई आवश्यक थिक जे, ओ लोकनि पहिने तमिल लोकनिक सोचबाक पद्धतिसँ  परिचित भजाथि. जखन वक्ता कठिन आ निरंतर श्रमसँ  तमिल लोकनि-जकाँ सोचब सीखि लेथि, तखने ओ नीक-जकाँ तमिल-भाषा बाजबाक आशा राखथु, ओहिसँ  पहिने नहिं. एकर अतिरिक्त, भाषामें दक्षताक हेतु विस्तृत अध्ययन आ स्थानीय नागरिकसँ  निरंतर सम्पर्क अनिवार्य थिक.’ [2]

हमरा जनैत, ई नियम ओहि सब व्यक्ति/अध्येताक हेतु लागू होइछ जे केओ एहन विदेशी भाषाक अनुवाद करैत छथि जतुका सामाजिक रीति-रिवाजसँ  ओ अपरिचित छथि. तें, नागार्जुनक मैथिली कविताक उपरोक्त अंशक भारतीय भाषामें, बुझबा योग्य, अनुवाद संभव अछि. किन्तुयोरोपीय भाषाक पाठककें, बाँसक ओधि उखाड़बाक कठिन परिश्रम आ ओधिक जारनि जरयबा-सन  दरिद्रताक दंश आ पीड़ाक अनुभव करायब कठिन छैकजकर अनुभव बाँसक ओधि उखाड़िनिहार करैत अछि ! अस्तु, एही कविताक भारतीय भाषाक अनुवाद आ अंग्रेजीक अनुवाद भिन्न हेतैक. ओकर विपरीत एक भारतीय भाषासँ दोसर भारतीय भाषा में अनुवादक एकटा उदहारण देखूकरजनीक दानाक लाल रंग आ ओकर ऊपरक भागक कारी टुरनीसँ  हमरा लोकनि परिचित छी. ‘तिरुक्कुरलमें ढोंगी साधुक गेरुआ वस्त्र आ कारी चरित्रक हेतु तिरुवल्लुवर सेहो करजनीक दानाक उपमाक देने छथि. तें, मैथिलीमें एहि कुरल केर सहज अनुवाद हमरा सुलभ प्रतीत भेल. किन्तु, ओही कुरल केर अंग्रेजी अनुवादकें ओहने धरगर बनायब कठिन अछि !

आब एकटा दोसर विन्दु पर विचार करी: कविताक अनुवाद केहन हयबाक चाही ? भवभूतिक नाटक 'उत्तर रामचरित'क अंग्रेजीमें अनुवाद करैत, बेलवालकर नामक विद्वान, अनुवादक आदर्श, आ अनुवाद-कार्यक कठिनताके निम्नवत प्रस्तुत करैत छथि:

‘.. in translating poetry we are called upon not only to give the meaning correctly, but also to reproduce the subtle literary qualities of the original. Rhythm, word-order, figures of speech, compactness or diffuseness of expression—in short, almost every literary device of the original ought, in theory, to reappear in the translation. But since the genius of one language differs radically from that of another, an ideal translation is, as von Wilamowitz- Moellendorff observes, a travesty or perhaps metempsychosis: in other words, a wellnigh impossible task. (Therefore)Some things must be sacrificed. But it is far better, wherever possible, to keep close to the original and show the author in his true native colours, rather than, under the pretext of giving a literary finish to the translation, to make him say things which he did not say and would never dream of saying.[3]

हमरा  जनैत उपरोक्त उद्धरण अनुवादक एहन आदर्श थिक जकर  निर्बाह असम्भव तँ अछिए, जँ एकर निर्बाह कयल जाय तँ संभवसूर्यक टीका भानुने चरितार्थ भजाय. प्रायः इएह कारण थिक जे रबीन्द्रनाथ ठाकुर-सन सिद्धहस्त कविओ जखन अपने (बांग्ला) गीतांजलिक अंग्रेजी अनुवाद करय बैसलाह तं ओ गीतांजलिक अनुवाद गद्यमें केलनि ! [4] प्रायः, एहन उदाहरण विरले भेटत. मुदा, ई उदाहरण कविताक अनुवादक समस्याक एकटा एहन उदहारण थिक जकर व्याख्या आवश्यक नहिं.

तथापि, जँ अनुवाद काव्यहि में हो, आ अनुवाद, मूल काव्यक छाया प्रति नहिओ हो, तैओ जँ अनुवाद मूल केर प्रतिबिम्ब बनि सकय (भले बाम-दहिन जकां बूझि पड़ैक- जेना अएना दहिनकें बाम कए दैछ), तँ, अनुवादकें पढ़लासँ  पाठककें मूल ग्रंथक स्वादक अनुभव अवश्य हेतनि. मुदा, एकर हेतु ई अवश्य आवश्यक थिक जे अनुवादक, मूल भाषा आ अनुवादक भाषा, दुनूक, शैली आ सौन्दर्यसँ  सुपरिचित होथि. अन्यथा, अनुवादक मूल ग्रंथक  भावकेँ अनुवादक भाषामें कोना व्यक्त करताह !

किन्तु, ई सब कहब जतबे सुलभ छैक, करब ततबे कठिन.

सार्वविदित अछि, स्व. आचार्य सुरेन्द्र झासुमनकें अनेक आन भाषाक सहित संस्कृत-मैथिली-हिंदी-बांग्ला पर समान अधिकार रहनि. ओ कतेको संस्कृत आ बांग्लाक ग्रन्थक हिंदी  आ मैथिलीमें उत्कृष्ट अनुवाद केने छथि. तथापि, आचार्य सुमनजी अनुवाद आ मूल केर बीचक अंतरकें कोना स्पष्ट करैत छथि से हुनके सँ  सुनी.

वेदवाणीकऋचालोकक नामसँ प्रकाशित अपन अनुवाद में सुमन जी कहैत छथि, ‘ सद्यः रसायल रसाल ओ चिर-बसिआयल अमौट में जेना आस्वाद-भेद अछि से (सभ वेदवाणी एवं लोकवाणी में एतय) संगते. [5]

काव्यक अनुवादक जटिलताक संकेत आचार्य सुमन जी एक ठाम  आओर देने छथि: संदर्भ थिक हुनक अनुगीतांजलि. एहि ग्रन्थमें सुमन जी कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ ठाकुर एक सौ चुनल गीत सबहक मैथिली अनुवाद प्रकाशित केने छथि. एहि पोथीक स्वर-संधानिकामें सुमन जी लिखैत छथि:

‘... गीत रचना सँ सय गोट गीतक चयन कय मातृभाषाक माध्यमे ओकर प्रतिबिम्बन प्रयास कयल अछि. परंच, ओ कहाँ धरि उपयुक्त भेल, ओ अपनहु  पता नहिं. अनुवाद तँ एकरा कहि नहिं सकै छी, कारण, ‘छायेवानुगच्छत्क एतय निर्वाह नहिं. कतहु रूप छाया तँ कतहु भावे, कतहु मर्म मात्रे. एतय विचार हुनक, तँ स्वर संचार अपन ; भाव निबन्ध हुनक तं, छंदबन्ध अपन ...’ [6]

यद्यपि,एहि अनुवाद कार्यमें 'हुनक (रबीन्द्रक) पद-पद्धतिक अनुगमन पूर्वक कण्ठ में कण्ठ मिलाय हुनक स्रोत-स्वरक अनुसरणकें सुमन जी अपन उद्देश्य-जकाँ व्यक्त केने छथि. संभव अछि, एहि कृतिक, मूलसँ भिन्न  स्वरुपक कारण, सुमनजी मौलिकता हो, वा ‘‘छायेवानुगच्छत्क सीमाबद्ध रीतिक अनिवार्यताक अनुवाद पर विपरीत प्रभावसँ बंचबाक कारण हो. किन्तु, एतबा तँ अवश्य जे सुमन जी-सन सिद्ध कवि-अनुवादक सेहो कविताक अनुवादमें स्वतंत्रताक आवश्यकताक अनुभव केलनि. आ ई समस्या तखन उत्पन्न भेले जखन बांग्ला आ मैथिली भाषाक समानता, आ अनुवाद में सुमन जीक दक्षता निर्विवाद अछि.

सत्यतः, कविताक छायानुवादहु में अनुवादककें मूल लेखकक भावकें बुझबामें अनेक ठाम अनुमानसँ काज चलबय पड़ैत छनि , से एकटा आओर विद्वानजी यू पोप केर उक्ति सँ प्रतीत होइत अछि; सन्दर्भकुरलकेर अंग्रेजी अनुवादक छैक :

(‘कुरल’ केर) हमर अनुवाद विश्वसनीय (faithful) अछि. अस्तु, हम अनुवाद में एकोटा एहन विचार वा भावकें निहित नहिं कयल, जकरा कविक मूल भाव बुझबाक हेतु हमरा कोनो ठोस आधार नहिं प्रतीत भेल.’[7]

अर्थात्  विश्वसनीय अनुवादक प्रयासक अछैतो, अनुवादककें (बहुतो ठाम) रचनाकारक मूल भावकेंअनुमान करयपड़लनि. ई थिकैक ओहि भाषाक काव्य-कृतिक अनुवादक समस्या जाहिमें अनुवादक जी यू पोप अपन जीवन भरिक श्रम लगा देलनि !

आब विश्वक आन भाषासँ मैथिलीमें अनुवादक चर्चा करी. हमर विचार अछि, जखन आन भाषाक गप्पकें मैथिलीक सुपरिचित उदाहरणक माध्यमसँ प्रस्तुत कयल जाइछ तँ पाठक मूल कविक भावकें बुझिते टा नहिं छथि, बल्कि अकस्मात् चमत्कृत भ' उठैत छथि. एकर विपरीत अपरिचित उपमा आ बलजोरीक उद्धरण पाठकक छाती पर भरिगर जाँत-जकां प्रतीत होइछ ! फलतः, पढ़बाक आनंदसँ वंचित पाठक ओहि पोथीकें किएक पढ़ताह !!

हम अपन एहि उक्तिक समर्थन में हम इतिहासकार ए एल बाशम केर उक्ति के यथावत उद्धृत करैत छी:

The translations…….. In most cases they are not literal translations, since the character of Indian classical languages is so unlike that of English that literal translations are at the best dull and at the worst positively ludicrous. I places I have taken liberty with the originals, in order to make their purport clearer to the Western reader, but in all cases I have tried to give them an honest interpretation of the intentions of their authors, as I understood them.”[8]

अर्थात् अंग्रेजी आ प्राचीन भारतीय भारतीय भाषाक प्राकृतिक मौलिक अन्तरक कारण संभव छैक जे कतहु शब्दशः अंग्रेजी  अनुवाद  रसहीन आ हास्यास्पद भए जाइक. एहन परिस्थिति में अनुवादक कें बोधगम्य बनयबाक हेतु अनुवादक कें मूल साहित्य केर आशय आ अपन भाव-बोध पर विश्वास करय पड़लनि.

तें, संभव होइक तं अनुवाद कतहु मूल केर अनुगमन करय. मुदा, जं से संभव नहिं होइक तं मौलिक ग्रंथक आशय जे अनुवादक कें बोध होइनि तकरा तेना प्रस्तुत करथि जे पाठककें मूलक भाव बोधगम्य होइक. अनुवाद में एतबा स्वतंत्रता अनुवादक उद्देश्यक सार्थकताक हेतु आवश्यक थिक, से हम मानैत छी.    

संदर्भ :

1. Pope The Rev. G U. A Tamil Hand-Book, 2nd edition, 1859. Madras: PR Hunt. pp 154

2. ibid

3.  S.K. Belvalkar. Rama’s Later History or Uttar-Rama-Charit, 1915: Cambridge, Massachusetts, Harvard University Press. Preface, Pp XXX.

4. Tagore Rabindranath. Geetanjali song offerings reprint 2016.Vishwabharati.

5. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’.ऋचालोक (वेद वाणी), प्रथम संस्करण 1970, पश्य ......  

6. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’. -अनुगीतांजलि, प्रथम संस्करण, 1969,स्वर-संधानिका, पृष्ठ संख्या ‘उ’  

7. Pope Rev. G U: The ‘Sacred’ Kurral of Tiruvalluva-Narayanar with Introduction, Grammar, Translation, Notes, Lexicon and Concordance 1886: London: W H Allen & Co. Introduction, xiv

8. Basham AL. The wonder that was India: Preface to the second edition. 3 rd revised ed. 2019; New Delhi: Picador India pp Xiii. 

metempsychosis = the supposed transmigration at death of the soul of a human being or animal into a new body of the same or a different species.

Monday, January 25, 2021

पिंजड़ामें बंद अम्बेडकर, गांधी, आ राम

 

पिंजड़ामें बंद अम्बेडकर, गांधी, आ राम

मूर्ति चाहे ब्राज़ील केर शहर,रियो द जेनेरो लगक पहाड़ी पर ‘क्राइस्ट द रिडीमर’ के होइनि, आ केवाडिया, गुजरात में पटेल केर; अयोध्यामें राम केर, वा कालाकुरिची, तमिलनाडु में अम्बेडकर केर. ई सब मूर्ति नागरिकक आस्थाक प्रतीक थिक. किन्तु, समाजक नागरिक जं एक दोसराक आस्थाक आदर नहिं करथि, तं एहन स्थिति उपस्थित भ जाइछ जे पुलिस आ प्रशासनकें अम्बेडकर, गांधी, आ रामहु कें पिंजड़ामें बन्न करय पड़ैत छनि.

चेन्नईसँ  प्रकाशित 21 जनवरी 2021 क अंग्रेजी  दैनिक ‘हिन्दू’ में छपल एहने एकटा फोटो हमरा आकृष्ट केलक. एहि फोटोमें ऊँच आधार पर स्थापित, डाक्टर अम्बेडकर केर एक मूर्तिकें चारू दिससँ लोहाक जालीमें बन्न तं कयले गेल छनि, मूर्तिक नाकक सोझमें पुलिस-प्रशासन हाई रेजोल्यूशन सि सि टी वी कैमरा सेहो लगओने छथि, जाहिसँ मूर्तिकें क्षति तं नहिए होइक, वरन मूर्तिकें क्षति कयनिहार उपद्रवीक पहचान भ’ आसानीसँ भ’ सकैक.

                            फोटो साभार : अंग्रेजी दैनिक ' द हिन्दू', चेन्नई, दिनांक 21 जनवरी 2021 

अजुका एही फोटोकें देखि अयोध्याके तहियाक ध्वस्त, तथाकथित ‘विवादित ढांचा’में स्थापित राम-लला, बनारसमें विश्वनाथ, आ आन-आन ठामक राजनेता लोकनिक मूर्तिक चारू कात बेढ़ल सुरक्षा-चक्र मन पड़ि  आयल.

जं मूर्ति भंजन केर आरंभिक इतिहासकें देखी तं सबसँ पहिने प्रायः इस्लामी धर्म प्रचारक सैनिक अभियानी लोकनि अपन धर्मक प्रचार ले मूर्ति भंजनकें अपन उद्देश्य बनओलनि; तालिबान द्वारा बामियान बुद्धक ध्वंस  आ पाकिस्तानमें हास-सालमें हिन्दू मंदिर सब पर आक्रमण एकर नवीनतम उदाहरण थिक. इसाई धर्मक प्रचारक  प्रायः ग्रीक आ मिस्रकेर प्रागैतिहासिक मूर्तिक भंजनकें अपन अभियानक हिस्सा नहिं बनओलनि, यद्यपि नव धर्म- इसाई - क स्थापना ले जे ‘धर्मयुद्ध’ सब लड़ल गेल से इतिहास विदित अछिए.

सवाल उठैछ, लोक आन नागरिकक आस्थाक प्रतीकक ध्वंससँ की पबैत अछि ? की अपन आस्था, वा अपन प्रतीक में आस्था दृढ़ करबाले मूर्ति भंजन आवश्यक छैक ? आइ एही पर विचार करी.

मनुष्य ईश्वर के मूर्त रूप कहिया देबय लगलनि, से ठीक-ठीक कहब कठिन. बौद्ध आ जैनकालीन राजा लोकनि अनेक भव्य मन्दिरक निर्माण कयलनि, तथापि, अशोक आ हर्षवर्धनसँ ल कय, दक्षिण केर पल्लव, चोल, आ चेर राजा लोकनि कतहु अपन पूर्तिक स्थापना नहिं कयलनि. हिनका लोकनि परवर्तीओ राजा लोकनि  जतय कतहु मन्दिरक निर्माण कयलनि, ओतय मन्दिरक पटल पर निर्माताक नाम भले होइनि, हुनका लोकनिक मूर्ति नदारद अछि. तें, राजनेता लोकनिक मूर्ति स्थापना प्रायः आधुनिक कालक परिपाटी थिक, जे प्रायः उपनिवेशवादक संग आरम्भ भेल. उपनिवेश कालमें प्रशासक लोकनि विभिन्न स्थान पर राजा-रानीक मूर्तिक संग-संग प्रशासक आ सेना नायक लोकनिक मूर्ति अवश्य स्थापित केलनि. सत्ता परिवर्तनक पछाति, बहुतो ठाम  ई मूर्ति सब तोड़ल गेल,तं, किछु तस्करक हाथें बेचलो गेल. समयक संग संग जं अनेक मूर्ति पर बड़-पीपर जनमि गेलैक, तं, किछु  मूर्ति  अपने आप कालक गालमें  समा गेल . किछु स्थान पर पहिलुका युग में अराध्य, देवी-देवता-जकां पूजित, राजा-रानीक मूर्ति ओहिना कतबहि में पड़ल अछि. कारी पाथरसँ बनल ब्रिटिश महारानी विक्टोरियाक  एकटा एहने आदमकद मूर्ति हम राजपूत रेजिमेंटल सेंटर, फतेहगढ़, उत्तर प्रदेश में करीब सत्ताइस वर्ष पूर्व देखने रही. अनुशासित सैनिक लोकनिक बीच ई मूर्ति तहियो केवल एकटा सजावट वा इतिहासक संकेतक रूप में ओहिना पड़ल छल, जेना अंग्रेजक शासन काल में. राजनीतिसँ  दूर सैनिक वातावरणमें प्रायः ताधरि एहि मूर्ति पर कोनो राजनेताक नजरि नहिं गेल रहनि. आब ओ मूर्ति ओतय अछि वा नहिं, कहि नहिं सकैत छी.

मुदा, ई सर्वविदित अछि जे सोवियत यूनियनक विघटनक पछाति जहिना लेलिन सहित अनेको नेताक मूर्ति सब ढाहल गेल, तहिना इराकमें सद्दाम हुसैनक शासनक अंतमें हुनक मूर्ति सबहक गरदनि में लोहाक रस्सी बान्हि ओकरा भूमिसात कयल गेल. अर्थात्, मूर्तिओक उदय आ अस्त राजनीतिक शक्तिक उदय आ अस्त संगे-संग होइछ. मुदा, जखन राष्ट्र सब में सोवियत यूनियनक विघटन, वा इराकमें सद्दामक शासनक अंत-सन परिवर्तन नहिओ होइत छैक समाजमें भीतरे- भीतर मूर्ति स्थापना आ मूर्ति-भंजनक प्रक्रिया निरंतर चलैत रहैछ. भारतमें जखन स्वतंत्रताक अभियान चलल, एहिना लार्ड-लेडी, राजा-रानीक मूर्ति पर कारिख पोतब आरम्भ भेल छल. एकर परिणति भारतक स्वतंत्रता में भेल. तथापि, ओहि समयमें गाँधी-नेहरु-पटेल-सुभाष केर मूर्ति स्थापना आरम्भ नहिं भेल छल. क्रमशः अपन राजनैतिक रुझानक अनुकूल आ राजनीतिक शक्तिक प्रदर्शन रूपें समाज, अपन नेता लोकनिक हेतु पार्क-सड़क-चौक-चौराहा हथियायब आरम्भ केलक. जे कनेक बेसी दूरदर्शी छल से हनुमान जीक मूर्ति ठाढ़ केलक. मुदा, समाज आ समाजक सोच निरंतर नदीक धार-जकां बहैत रहैछ. ऊपरसँ  कखनो अकस्मात् कोनो सामाजिक-राजनीतिक बिहाडियो आबि जाइछ, अचानक  कोनो धूमकेतुओ चमकि जाइत छथि. समाजमे आयल  ओहि अचानक  बिहाडिक प्रभावें, वा नव  धूमकेतुक आभामंडलमें समाजमें  सब किछु एकाएक बदलए लगैछ.

कालाकुरिची, तमिलनाडु में डाक्टर अम्बेडकरक मूर्तिक चारुकात लागल लोहाक जाली आ हुनक नाकक सोझ लागल हाई रेजोल्यूशन सि सि टी वी कैमरा एही परिवर्तनक द्योतक थिक !          


Wednesday, January 13, 2021

मोतियाविंदु (Cataract): समस्या आ समाधान

 

मोतियाविंदु (Cataract): समस्या आ समाधान

मनुष्यक आँखिक भीतरक प्राकृतिक लेन्स पारदर्शी होइछ. आँखिक भीतरक एही प्राकृतिक लेन्सक अंशतः या पूर्णतः अपारदर्शिता ( opacity) कें मोतियाविंदु ( cataract )  कहल जाइछ.




आँखिक चोटक कारण मोतियाविंदु: ऑपरेशनसँ  पूर्व आ ऑपरेशनक पछाति 

भारतमें सैकड़ामें पचाससँ  बेसी वयसक व्यक्तिमें आँखिक रोशनीक कमीक सबसँ प्रमुख कारण मोतियाविंदुए थिक. विश्वस्तर पर सेहो वृद्धावस्थामें मोतियाविंदु आँखिक ज्योतिक कमी वा अन्धताक मुख्य कारण थिक. ज्ञातव्य थिक, मोतियाविंदुक रोग, नवजात शिशुसँ ल’ कय वृद्ध धरि, सब वयसमें होइछ. ओना तं प्रत्येक वयसमें मोतियाविंदुक कारण, भिन्न-भिन्न होइछ. किन्तु, बढ़इत वयसक संग होइत मोतियाविंदुक कोनो एकटा कारण कें दोष देब सम्भव नहिं. तथापि, आँखिक लेन्स पर सूर्यक रोशनीक पराबैगनी किरण ( ultra violet rays ) क निरन्तर आ दीर्घकालीन प्रभाव मोतियाविन्दुक प्रधान कारण मानल जाइछ. ज्ञातव्य थिक, डायबिटीज सहित शरीरक विभिन्न भागक अनेक रोग, आ किछु औषधिक दीर्घकालीन सेवन, आ आँखिक चोट आ हानिकारक विकिरणक कारण सेहो   मोतियाविन्दुक होइछ.

एहि लेखमें मोतियाविंदुक लक्षण आ निवारणपर जनसामान्यक रुचिक सूचना देब हमर अभिष्ट अछि. एकर अतिरिक्त, मोतियाविंदुक ऑपरेशनक कखन हेबाक चाही, समय पर ऑपरेशन नहिं भेलासँ की परिणाम भए सकैछ, ऑपरेशनक चुनाव कोना करी, आ ऑपरेशनसँ केहन परिणामक अपेक्षा राखी, ताहि सब प्रश्नक उत्तर एहि लेखमें भेटत.  

मोतियाविंदुक लक्षण

आँखिमें बिना कोनो पीड़ा वा लालीक, रोशनीक धुंधलापन मोतियाविंदुक सबसँ परिचित लक्षण थिक. बढ़इत धुंधलापनक संग दिन-प्रतिदिनक  काज करब असम्भव होबय लगैछ आ अंततः प्रभावित आँखिसँ    केवल इजोत आ अन्हारक अनुमान भए पबैछ. निरंतर, समान गतिएँ विकसित होइत  मोतियाविंदुक संग आँखिक पुतली, अंततः मोती-जकां उज्जर सपेत भए जाइछ, आ पुतली एही रंग, आ एही सुपरिचित लक्षणक कारण एहि रोगक नाम मोतियाविंदु भेल. एकरे मोतियाबिंदुक पाकब ( mature cataract ) सेहो कहल जाइछ. ज्ञातव्य थिक, सब प्रकार मोतियाविंदु रोशनीकें खराब करैछ, मुदा सब प्रकारक मोतियाविंदु अंततः उज्जर नहिं होइछ , पकैछ नहिं !

आँखि पर, सोझे तेज प्रकाश पड़ने आँखिमें चकचोन्ही लागब, तेज रौदमें आँखिक धुंधलापन, एके वस्तु- जेना चन्द्रमा- क अनेक छवि देखबामें आयब , वा रोशनीक श्रोत- बिजलीक बल्ब, कार केर हेडलाइट- क  चारू कात इन्द्रधनुषक रंग-सन घेरा प्रतीत हयब मोतियाविंदुक आन  सुपरिचित लक्षण थिक. एकर अतिरिक्त, बढ़इत वयसमें लगक दृष्टि- जेना पढ़बा-लिखबामें आसानी, आ दूरस्थमें ठाढ़ मनुष्य वा वस्तुकें देखबामें असुविधा सेहो मोतियाविंदुक लक्षण थिक.       

बुझबाक थिक, सब प्रकारक मोतियाविंदु समान गतिएँ नहिं बढ़इछ. फलतः, मोतियाविंदु अछैतो किनको बहुतो वर्ष धरि आँखिसं किछु किछु सूझैत रहैत छनि, तं, कनिको  सालहिं दू साल में आँखिसँ  देखब बन्न भए जाइत छनि. प्रश्न उठैछ, एहन परिस्थिति में मोतियाविंदुक ऑपरेशन  कखन कराबी.

मोतियाविंदुक ऑपरेशन निर्णय कोना करी

सामान्यतया ऑपरेशनक निर्णयक आधार  आँखिक रोगक डाक्टरक सलाहे होइछ. तथापि, जं मोतियाविंदुक कारण दिन-प्रतिदिनक कार्य में बाधा होबय लागय तं ऑपरेशन में बिलंब नहिं करी; ऑपरेशन ले मोतियाविंदुक पाकब आवश्यक नहिं. वस्तुतः, मोतियाविंदुक पकैत-पकैत आँखिक रोशनी एकदमे समाप्त भ जाइछ. तथापि, ई बुझबाक थिक जे सामान्य रूपक मोतियाविंदुक ऑपरेशन इमर्जेसी ऑपरेशन नहिं थिक, तें मास-दू मासक बिलंबसँ आँखिक रोशनीमें कोनो आकस्मिक खतरा हेबाक सम्भावना नहिं होइछ. मुदा, पाकल मोतियाविंदुकें बहुत बिना ऑपरेशनकें रहि गेलासँ आँखिमें ग्लौकों सहित अनेक नव समस्या भए सकैछ. तें, ऑपरेशनकें अधिक दिन नहिंए टारी.

एकटा गप्प आओर, बढ़इत वयसमें आँखिक रोशनीक कमीसँ खसबाक आ हड्डी टुटबाक सम्भावना बढ़ि जाइछ. बुढ़ापामें चोट आ ताहिसँ बिछाओन धरब अपने आपमें घातक थिक. तें, समय रहैत ऑपरेशन, नीक दृष्टि आ आगामी समस्या सबहक रोकथाम हेतु उचित थिक.

ऑपरेशनक हेतु तैयारी

मोतियाविंदुक ऑपरेशनक हेतु बेसी रोगीकें बेसी तैयारीक आवश्यकता नहिं. तथापि, ब्लड-प्रेशर आ डायबिटीजक कंट्रोल हयब आवश्यक. इहो आवश्यक जे देह, मुँह, आ आँखिक लग कोनो घाव-घोस, फोड़ा-फुंसी नहिं हो. यद्यपि, ई सब जांच ऑपरेशनसँ पूर्व नियमतः कायले जाइछ.  

ऑपरेशनक पूर्व औषधि-उपचार

मोतियाविंदुक  ऑपरेशनसँ  पूर्व कोनो विशेष औषधि उपचारक आवश्यकता नहिं. सामान्यतया, ऑपरेशनसँ  एक-दू वा तीन दिन पूर्व पहिनेसँ, ऑपरेशनबला आँखिमें दिन में तीन-चारि बेर एंटीबायोटिक आइ-ड्राप(बूँद) देल जाइछ. ई ड्राप ऑपरेशनक पछातिओ किछु दिन चलैछ. ब्लड-प्रेशर केर रोगी ऑपरेशन दिन सेहो अपन औषधि सामान्य रूपें खाइत छथि. सामान्यतया डायबिटीजक रोगीकें ऑपरेशन  दिन भोरुक औषधि वा इन्सुलिन नहिं देल जाइत छनि. ऑपरेशन केर पछाति रक्तमें सुगर केर मात्राक जाँच होइछ, आ जांच रिपोर्टक अनुसार सुगरक औषधि-उपचार पहिनहिं जारी रहैछ. एहिमें परिवर्तनक यदि कोनो आवश्यकता भेल तं तकर सूचना डाक्टर रोगीकें समय-समय पर दैत छथिन.  

 ऑपरेशनक विधि 

मोतियाविंदुक ऑपरेशन अनेक विधि छैक, जकर विस्तृत वर्णन ने एतय आवश्यक, आ ने संभव. सामान्यतया, फेकोइमल्सिफिकेशन ( phacoemulsification) मशीन वा बिना मशीनकेर ऑपरेशन कयल जाइछ. डाक्टर वा काउंसिलर, रोगी, आ रोगीक परिजन मिलि कय, डाक्टर अपन दक्षता आ रोगक अनुसार , आ रोगी अपन आवश्यकता आ बजेटक अनुसार, ऑपरेशनक विधिक निर्धारित करैत छथि. तथापि, ऑपेरशनक संगहिं आँखिमें कृत्रिम लेन्स लगायब एखनुक ऑपरेशनक सामान्य विधि छियैक. बुझबाक थिक, समान्य लेन्स लगओलाक पछाति रोगीकें पढ़बाक हेतु, नजदीकक रोशनीक चश्मा लगायब अनिवार्य होइछ. यद्यपि, विशेष प्रकारक लेन्स (multifocal लेन्स )क प्रत्यारोपणसँ नजदीकीओ रोशनीक समस्याक निवारण भए सकैछ. किन्तु, multifocal लेन्सक मूल्य बेसी छैक, आ सब रोगी multifocal लेन्ससँ  संतुष्ट नहिं भए पबैत छथि. तें, multifocal लेन्सक प्रत्यारोपण रोगीक व्यवसाय- आवश्यकता , आ वैभव तथा  रोगीक व्यक्तित्व पर निर्भर होइछ.

ऑपरेशनक अवधिमें पीड़ा निवारण ( anesthesia )

वयस्क रोगीक मोतियाविंदुक ऑपरेशनक हेतु बेहोशीक आवश्यकता नहिं. समान्यता, ऑपरेशनसँ किछु मिनट पूर्व आँखिकें सुन्न करबाक हेतु आँखिक डिम्हाक बाहर एक वा दू टा सूई देल जाइत छैक. नव विधिक ऑपरेशनमें ऑपरेशनसँ तुरत पहिने, ऑपरेशन टेबुलहिं पर, केवल आँखिमें  बूँद द’ कय आँखिकें सुन्न कयल जाइछ, जकर प्रभाव ऑपरेशनक किछुए काल पछाति समाप्त भए जाइछ.

ऑपरेशनक पछाति औषधि-उपचार

 ऑपरेशनक पछाति आँखि पर लगाओल पट्टी ऑपरेशन चारिसँ  छौ घंटाक बादहिं हंटा देल जाइछ. पछाति, ऑपरेशन कयल आँखिमें, सामान्यतया, दिन में चारिसँ छौ बेर, दू वा तीन प्रकारक आँखिक बूँद देल जाइछ. एहिमें एकटा एंटीबायोटिक ड्राप, दोसर कोर्टिको स्टेरॉयड (corticosteroid) ड्राप, आ तेसर आँखिक पुतलीकें पैघ करयबला बूंद होइछ. एंटीबायोटिक ड्राप सात सँ दस दिन आ, कोर्टिको स्टेरॉयड (corticosteroid) ड्राप चारिसँ छौ हफ्ता धरि चलैछ पहिनेसँ  चलैत ब्लड-प्रेशर, डायबिटीज आ ह्रदय रोगक औषधि पहिनहिं-जकां चलैत चल जाइछ.

मोतियाबिंदु ऑपरेशनक बादक सावधानी 

मोतियाबिंदुक ऑपरेशन पछाति निम्नलिखित पर ध्यान दी :

  • रोगीकेँ भोजनक कोनो रोक नहिं। टीवी देखि सकैत छी.

  • डाक्टरक सलाह अनुसार आँखिक बूँद नियमित आ निर्धारित समय पर ली। 

  • आँखिकेँ हाथसँ जुनि छूबी। जँ आँखिसँ कखनो पानिओ आबय तँ साफ रुमाल आ तौलियॉं पानिकेन गाल परसँ  पोछि ली, आँखि परसँ  नहिं।

  • कोनो   समस्या भेला पर डाक्टर सं तुरत सम्पर्क करी.

ऑपरेशनक पछाति डाक्टरी जांच  

नियमानुसार ऑपरेशनक दोसर दिन आ ऑपरेशनक चारिसँ  छौ हफ्ताक पछाति आँखिक डाक्टर आँखिक जांच कयल  जाइछ . एहि बीच जं कखनो अकस्मात् आँखि लाल भ’ गेल , आँखिक रोशनी कम भ’ गेल वा आँखिमें पीड़ा भ’ गेल तं अबिलंब डाक्टरसँ संपर्क अनिवार्य. मोन रखबाक थिक, आँखिक जांचमें बिलंब आँखिक रोशनीकें खराब कय सकैत अछि.

ऑपरेशनक सामान्य परिणाम

मोतियाविंदुक ऑपरेशनक परिणाम – स्पष्ट दृष्टि- ऑपरेशनक तुरत देखबा योग्य भ’ जाइछ. किन्तु, व्यक्ति विशेषक आँखि, ऑपरेशनक प्रकार, आ ऑपरेशनक पछाति आँखिमें भेल प्रतिक्रियाक फलस्वरूप आँखिक रोशनीकें सामान्य हयबामें एक-दू वा अधिको दिन लागि सकैछ. एखनुक ऑपरेशनसँ सैकड़ामें 90-95 प्रतिशत व्यक्ति, ऑपरेशनक बाद देल चश्माक संग, डाक्टरी जांचक हेतु उपयुक्त चार्ट- Snellen chart- पर उपरसँ पांच पांती धरि अक्षर पढ़ि लैत छथि. संगहिं, ऑपरेशनक बाद चश्माक संग नजदीकक काजमें सेहो स्पष्ट रोशनी सामान्य थिक.

कखनो काल ऑपरेशनक समय भेल कोनो दुर्घटना वा समस्यासँ आँखिक रोशनीकें सामान्य हेबामे किछु आओर समय लागि जाइछ. मुदा, एहन परिस्थितिमें ई डाक्टरक दायित्व आ रोगीक  अधिकार थिकनि जे ओ आँखिक परिस्थितिक संबंधमें सूचनाक आदान-प्रदान करथि. सामान्य परिस्थितिमें ऑपरेशनक चारि वा छौ हफ्ताक पछाति डाक्टर रोगीलोकनिकें पढ़बाक आ  नजदीकी काजक हेतु चश्माक नंबर दैत छथिन. मोटा-मोटी एही समयमें आँखिक बूँद सब सेहो बंद कय देल जाइछ. जं,कदाचित, ऑपरेशनक समय वा ऑपरेशनक पछाति कोनो दुर्घटना भ’ गेलैक  वा आँखिक परदा- रेटिना वा आँखिक स्नायु-optic nerve- में पहिनेसँ कोनो  रोग होइक तं ऑपरेशनक पछातिक अनुमानित रोशनीक कम हयब स्वाभाविके. अनियंत्रित डायबिटीजक कारण आँखिक परदा- रेटिना- क रोग, ग्लौकोमा, तथा मैकुलर डिजनरेशन( macular degeneration) एहन सब रोग सब म सँ  प्रमुख अछि. एहि सब परिस्थितिक जानकारी रोगीकें ऑपरेशनक पहिनहिं देल जाइछ जाहिसँ  रोगी सब बातकें पहिने बूझथि आ डाक्टर आ रोगीक बीच विश्वास बनल रहय.

ऑपरेशनक दौरान दुर्घटना आ असामान्य दुष्परिणाम

सब प्रकारक सावधानीक बावजूद कखनो-काल  ऑपरेशनक दौरान दुर्घटना हयब सामान्य थिक. दक्ष चिकित्सककें एहि सब परिस्थितिक समाधानक ट्रेनिंग रहैत छनि. तथापि, कखनो-काल ऑपरेशन केर समय  आँखिमें लेन्स लगायब सम्भव नहिं भ पबैछ, मोतियाविंदु  वा लेन्स आँखिक भीतर खसि पड़ैछ, वा दोसर ऑपरेशनक आवश्यकता भ’ जाइछ. मुदा, एहि प्रकार असामान्य दुर्घटना सौ ऑपरेशन में करीब एकटा केस में होइछ. संयोगसँ, एहू सब परिस्थितिमें आँखिक रोशनी पर दूरगामी दुष्प्रभाव कदचिते पड़ैत छैक. किन्तु, रोगी ई सब किछु बूझथि, से उचित.  

ऑपरेशनक पछाति आँखिमें संक्रमण (endophthalmitis) आँखिक रोशनीले सबसँ घातक परिणाम थिक. मुदा, एखनुक चिकित्सा प्रणालीमें एकर संभावना दस हज़ार में एक केसक बराबर अछि. ततबे नहिं, उचित जांच-पड़ताल आ ऑपरेशनक बाद उचित सावधानी आ उपचारसँ ऑपरेशनक बाद आँखिमें संक्रमण (endophthalmitis)क संख्या नगण्य अछि. तथापि, डाक्टर लोकनि एकर विरुद्ध अत्यंत सजग रहैत छथि से, सर्वविदित अछि.

 

   

 

 

 

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