Sunday, May 2, 2021

कोरोना-संकट 2021 : समस्या, सीख, आ समाधान,

 

कोरोना-संकट 2021 : समस्या, सीख, आ समाधान

पछिला वर्ष जखन अस्कस्मात कोरोनाक संकट आयल तं सम्पूर्ण विश्व स्तब्ध भ’ गेल. जखन प्रधानमंत्री जी घोषणा कयलनि जे ‘जं, अगिला एक्कैस दिन घरसँ  बहरयहुं  तं भारत कें हमरा लोकनि  21 वर्ष पाछू कय देबैक’, तं, हमरा लोकनि प्रधानमंत्रीक आह्वानकें ब्रह्मवाक्य मानि भारतके बचौलहुँ . ओहि प्रयासमें ककरा केहन पराभव भेलैक से भले समाज बिसरि गेल, भुक्तभोगी कें सबटा ओहिना मोन छैक .

एहि बेर जखन जनवरीमें कोरोनाक विरुद्ध टीकाकरण चलल, सुविधाक अछैतो केओ टीका लगबओलनि, केओ दुबकि रहलाह. स्थिति ई भ’ गेलैक, जे मार्चक मध्य धरि पांडिचेरी-सन छोटो केन्द्रशासित प्रदेश में टीकाकरणक केवल  छौ प्रतिशत लक्ष्य पूरा भेल रहैक. अन्ततः, ओतुका लेफ्टिनेंट गवर्नर कोरोनाक विरुद्ध टीकाकरणकें व्यक्तिगत चुनौती-जकां ल’ कय टीकाकरण अभियानमें गति अनबाक निर्देश देलखिन, तं, देखल गेलैक जे स्वास्थ्यकर्मीओ लोकनि म सँ  अधिकाँश टीका नहिं लेने रहथि !

पछाति, जखन क्रमशः टीकाकरण आरम्भ भेलैक तं उपलब्ध संख्याक विपरीत, राजनैतिक  संकेत एहन आबय लगलैक जे भारत कोरोनाक विरुद्ध युद्ध जीति गेल ! भारत विश्व भरि में उदाहरण प्रस्तुत कयलक-ए !! यद्यपि ई सत्यक विपरीत छल. तकर प्रमाण  आँखिक सोझाँ अछि ; राजधानी दिल्ली, भारतक सिलिकॉन वैली बंगलोरमें मंत्रीओ लोकनिक अपन सर-सम्बन्धी रोगी लोकनि ले अस्पतालमें सीटक व्यवस्था करबामें असफल साबित भए रहल छथि !

प्रश्न उठैछ एहन परिस्थितिमें हमरा लोकनि कोना पहुँचलहुँ  ?  प्रत्यक्षतः, एकर जवाब एकेटा अछि – पैघ स्तर पर कोरोनाक संक्रमन पसरि गेले, आ कोरोना संक्रमितक संख्या उपलब्ध सुविधासँ  बहुत बेसी अछि. मुदा, एहि प्रश्नकें कनेक विस्तारसँ जाँची. संभव अछि, एहि जांच-पड़तालसँ हमरा लोकनि एहि संकटसँ  उबरि सकी आ भविष्यक हेतु राष्ट्रकें मार्गदर्शन भेटैक. मुदा, एहि विषयकें जंचबा ले हम एखनुक समस्या-सन महामारीक स्थिति में, आ दिन-प्रतिदिनक हेतु सामान्य स्वास्थ्य सेवाक क्षमता आ दुर्बलता दुनूक अनेक विन्दु पर फूट-फूट विचार करी. एहि हेतु किछु उदहारण देब आवश्यक अछि.

विगत वर्षक अमेरिकाक उदहारण कें देखी. जनवरी 2021 में अमेरिकामें प्रतिदिन कोरोना पीड़ितक मृत्युक संख्या 3000 सँ  बेसी रहैक. ई संख्या आइ करीब मात्र 700 अछि. एकर विपरीत भारत में फरवरीक अंतमें कोरोनक कारण मृत्युक संख्या केवल 100 क करीब छल. आइ ई संख्या 3000 प्रतिदिन सँ  बेसी बढ़ि चुकल अछि ! दोसर दिस, जं, टीकाकरणकेर संख्या देखी, तं , अमेरिका में फरवरी 2020क अंत धरि केवल 2.4 करोड़ नागरिककें कोरोनाक विरुद्ध टीकाकरण पूरा भेल रहनि. आइ ई संख्या करीब 10  करोड़ पहुंचि चुकल अछि ; ई संख्य कुल जनसंख्याक 30.4 प्रतिशत थिक. एकर विपरीत भारतमें आइ धरि भारतमें केवल 2.5 करोड़ व्यक्तिक टीकाकरण सम्पन्न भेले ; ई संख्या भारतक जनसंख्याक केवल 1.9 प्रतिशत थिक. तथापि, एहि सबहक बीच जीवन-यापन आ हमरा व्यवहार क बाध्यताक अतिरिक्त पांच राज्यमें चुनाव आ कुम्भ-स्नान सब किछु भेले. माने, भरोस तं केवल भगवाने ने, विज्ञान ताख पर राखल गेल आ कोरोना अपन तांडव नचैत रहल. ज्ञातव्य थिक, कोरोना कालसँ  पहिनहुँ  विकसित देशमें प्रतिवर्ष फ्लू सब बंचावक हेतु  लोक टीका लगबिते छल . ई सब हमरा लोकनि एहि महामारीक अछैतो बिसरि गेलहुँ. मोन रखबाक थिक, राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान केर अंतर्गत टीका द्वारा नियंत्रित रोगक विरुद्ध टीकाकरणक अभियानकें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन केर अंतर्गत केंद्र सरकार अपना जिम्मा रखने अछि. मुदा, कोरोना-सन महामारीक परिस्थितिओ में केंद्र सरकार एकरा केंद्र सरकार, राज्य सरकार आ प्राइवेट उद्यमक बीच बंटैत एहि तीनू म सँ  जिम्मेदारीक मामलाकें पूर्णतया अस्पष्ट क देलकैक. भारत सरकार कोरोनाक विरुद्ध टीका सम्बन्धी अनुसन्धानमें निवेश, वा टीका उत्पादक कम्पनी सबकें अगुबार टीका खरीदक हेतु करार वा ओहि हेतु निवेशक कोनो व्यवस्था नहिं केलक.एकर चर्चा राष्ट्रीय दैनिक सबमें पछिले वर्षसँ चलि रहल अछि. एकर  परिणाम सामनहिं अछि . 

आब हमरा लोकनि एहि विपत्तिक परिस्थितिमें रोग निवारणक हेतु दोसर विन्दु, उपलब्ध स्वास्थ्य संरचना, पर नजरि घुमाबी.

भारतीय संविधानमें स्वास्थ्य-सेवा राज्य केर लिस्टमें अबैछ. अर्थात् नगरिकक स्वास्थ्य-रक्षाक भार राज्य सरकारक थिकनि. नियमानुसार एहि हेतु सरकार सब अपन-अपन राज्यमें प्राथमिक स्तरसँ, रेफेरल आ विशेषज्ञक सेवा धरिक व्यवस्था करबाक हेतु जिम्मेवार अछिओ, आ  नहिओ अछि. कारण, यद्यपि भारतीय संविधानक अंतर्गत नागरिकक जीवन-रक्षाकें मूलभूत अधिकारक दर्जा भेटल छैक, मुदा, ओहि में निःशुल्क स्वास्थ्य-रक्षाक गारंटी नहिं छैक ! तें, अपन दायित्वक रूपमें प्रत्येक राज्यमें स्वास्थ्य सेवाक विभाग आ व्यवस्था छैक. तथापि, स्थानीय स्तर पर आ व्यवहारिक  दृष्टिऐ राज्य सबहक बीच स्वास्थ्य-सेवामें गुणात्मक दृष्टिए  बहुत अन्तर छैक. एक दिस जं स्वास्थ्य केर आधारभूत आ रेफरल एवं स्पेशलिस्ट संरचनामें दक्षिण भारत उपेक्षाकृत सुदृढ़ अछि, ततय उत्तर केर बहुतो राज्यमें स्वास्थ्य-सेवाक स्थिति अत्यंत लचर छैक. किएक ? ताहि प्रश्नकें एखन छोड़ि दी. किन्तु, नीक वा बेजाय, उपलब्ध चिकित्सा सेवा एखन कोरना कालमें किएक  टूटि रहल अछि  ताहि दिस देखियैक. एकर उदाहरण हम सेनाक स्वास्थ्य सेवाक संग तुलनासँ  करी.

सेनाक सब विभागक संरचना नीचासँ ऊपर धरि, पिरामिड-जकां होइछ. बटालियन, जे सेनाक आधारभूत इकाई थिक, ओहि स्तर पर केवल एकटा डाक्टर आ एकटा नर्सिंग-सहायक रहैत छथि. ई लोकनि कखनो एक यूनिट वा लग-लग में स्थापित एकसँ  बेसी यूनिटक स्वास्थ्यक जिम्मेवारी उठबैत छथि. ओतय सामान्य स्थिति में केवल ओ पी डी सेवा उपलब्ध होइछ. किन्तु, आकस्मिक परिस्थितिमें किछु काल धरि रोगीक हेतु इमरजेंसी प्राण-रक्षक सेवाक हेतु सुविधा-सामग्री आ दक्षता रखैत छथि. समय पड़ला पर रोगी ओहिसँ  अगिला स्तर वा विशिष्ट स्पेशलिस्ट सेवा ले ओहूसँ ऊपर पठाओल जाइत छथि. संगहि, सामान्यतया रोगी कखन स्पेसिलिस्ट सेवा ले अगिला स्तरक स्पेशलिस्ट सेवा ले आगू जायत तकर  प्राथमिकताक निर्धारण आ निर्णय  बटालियन लेवल केर डाक्टर करैत छथि.  मुदा, अहम गप्प से नहिं. अहम बात थिक जे जाहि स्तर पर जे सुविधा हेबाक चाही से होइत छैक, से प्रशासन सुनिश्चित करैत अछि.

असैनिक सेवामें  प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रक आधारभूत स्तर भेल. एतय असैनिक सेवा हारि जाइत अछि. अनेक ठाम सुविधा आ व्यवस्था पूर्णतः फोंक छैक. सरकारी योजनामें एहिसँ उपर भेल रेफेरल अस्पताल. ओकरो स्थिति सर्वविदिते अछि. रेफरलक हेतु रोगीकें एक स्तरसँ  दोसर स्तरक स्पेशलिस्ट सेवा ले रेफरलक नियम नहिं. जकरा जतय मोन भेलैक चल गेल. ओहुना, स्वास्थ्यकर्मी आ नेता लोकनि मिलि कय एकरो कोनो काजक नहिं छोड़ने छथिन. लोक एहिसँ ऊपर जायत तं कतय ? मेडिकल कालेज. ओकर स्थिति सबहक सामने अछि. दरभंगा मेडिकल कालेज-सन लगभग सौ साल पुरान कालेज आइ खंडहरमें परिवर्तित भ’ चुकल अछि. तें, गामक दरिद्र सेहो रोग भेला पर सोझे दिल्ली जाइत अछि, बम्बई जाइत अछि. माने, जे संरचना, सेवा, सुविधा आ दक्षताक जाल भरि देश में पसरल होइतैक से आइ महानगर टा में अछि , आ सेहो मुफ्त नहिं !! मुदा, ओतहु जनसंख्याक अनुकूल आधारभूत सेवा थोड़ पडैछ. फलतः, आमसँ ल कय अत्यंत बीमार रोगी सब सोझे बड़का अस्पताल जाइछ. ताहि परसँ  कोरोनाक रोग में अधिकतर रोगीकें ऑक्सीजन केर आवश्यकता एकटा नव चुनौती थिक. मुदा, ई समस्याक केवल एकेटा पहलू भेल.

तें, मानि ली जे आइ PL-480 क गहूम-जकां सम्पूर्ण भारतमें अजुका सबसँ बेशकीमती वस्तु ऑक्सीजन सिलिंडर-कंसेंट्रेटर- ऑक्सीजन प्लांट सब ठाम बाँटिओ देल जाइक तैओ उचित रखरखाव, निरंतर मरम्मत, आ प्रशिक्षित सेवा कर्मीक बिना ओहिसँ  ककर उपकार हेतैक. हमरा सब मेडिकल कालेज में रही तहिया 1977 में सत्तामें आयल जनता पार्टीक सरकारक काल में प्रायः देशक सौ टा मेडिकल कालेजकें, सब सुविधासँ लैस बड़का बस केर आकारक उज्जर रंगक मोबाइल बस भेटल रहैक. आओर सब किछुक अतिरिक्त ओहि विशाल गाड़ीमें गाड़ीमें जनरेटर आ छोट-छोट ऑपरेशनक सुविधा सेहो रहैक. मुदा, दरभंगा मेडिकल कालेजक संग आनो बहुतो ठाम ओ मोबाइल बस ,जकरा लोक निंदामें सफ़ेद हाथी (white elephant) कहैत छलैक, पड़ल-पड़ल सड़ि गेल ! बहाना ई जे ई गाड़ी कोन  रोड पर चलत ! एहि गाड़ीक ड्राइवर, आ पेट्रोल के देतैक ? मरम्मति कोना हयत ! माने, स्थानीय संकल्पक आभावमें एकटा अनुपम उपकरण नष्ट भए गेल. सरकार तं खर्च केबे केलक.   

आब एकटा दोसर गप्प. 'कुरल' में तिरुवल्लुवर कहैत छथि:

रोगी, वैद्य, सेवक, उपचार

चारि खाम्ह पर रोग-विचार I

कुरल,950

अर्थात् रोग केर चिकित्सा हो वा  शमन, नागरिक वा रोगीक दायित्व प्रथम होइछ . अज्ञानता वा लापरवाही,  भले कथूसँ होइक, पसरैत अगड़ाही, भगवानो-भगवतीक परवाहि नहिं करैछ. कोरोना-सन संक्रामक रोग ककर परवाहि करत. कुम्भ-स्नान हो वा चुनाव स्वार्थ लोककें लापरवाह बना दैत छैक; सामाजिक दूरी राखि संक्रमणक पसारकें रोकबा ले पछिला पूरा वर्ष बाल-वर्गसँ ल’ कए विश्वविद्यालय धरिक छात्र लोकनिक पढ़ाई ऑनलाइन-विडिओ पर भेलैक. किन्तु,आइ जखन टी वी घरे-घर पहुंचि चुकल अछि, चुनाव प्रचारक रैलीमें हजारों ठाम लाखों लोक तेना जमा कयल गेल जे कलकत्तामें एक ठाम प्रधानमंत्री धरि चकित होइत बजलाह, जे, ‘एहन जनसमूह हम कहियो देखने नहिं छी’ ! सरिपहुं, जनिका ले वर्चस्व दांव पर लागल होइनि से ककर परवाहि करताह. जनता सेहो एहन महाकुम्भमें अपन पेट भरबा ले, वा वैचारिक प्रतिबद्धता ले ‘ महाजनो येन गताः सः पन्थाः ‘ कें चरितार्थ केलक. फलतः, बंगलोर, बम्बई आ दिल्ली में राजनेता लोकनि अशक्त भेल पड़ल छथि. आ ककरो किछु फुरि नहिं रहल छनि, की करी !

आब अंतिम विन्दु : एहन परिस्थितिसँ  कोना उबरब ? सत्यतः, एहि ले कोनो रामबाण नहिं . हमरा लोकनिकें विज्ञानक शरण लेबहिं पड़त; देशव्यापी टीकाकरण करहिं पड़त. सामाजिक दूरी आ मास्क लगबहिं पड़त. आखिर पोलियो आ स्माल-पॉक्सक उन्मूलन कोना संभव भेल !  दीर्घकालीन संकल्पक अंतर्गत, स्वास्थ्य जीवनक अधिकारक अंतर्गत मौलिक अधिकार थिक, से संविधान में निहित हो.  चिकित्सा क्षेत्र में सकल राष्ट्रीय उत्पादक दस प्रतिशत तक सरकारी निवेश हो. राज्य सरकार सब स्वास्थ्य सेवाक, आधारभूत स्तरसँ विशेषज्ञ सेवा धरिक संरचनाकें सुदृढ़ करय. एकर निगरानीक जिम्मेवारी प्रत्येक स्तर पर  नागरिक अपन हाथमें लियए आ सरकारसँ  पर ई सुनिश्चित करबाबथि जे नियमानुसार उपलब्ध सम्मग्री उपलब्ध होइक, ट्रेन्ड स्टाफ उपलब्ध होथि, आ रेफरलक कड़ीक अनुपालन हो जाहि सबसँ एखन-जकां उच्च स्वास्थ्य सेवाक हेतु नियत संस्थासब प्राइमरी सेवाक भारसँ मुक्त रहय. सत्यतः, राजनैतिक नियंत्रण सैद्धांतिक रूपें नागरिके नियंत्रण थिक. किन्तु, व्यवहारतः ई नियंत्रण स्थानीय स्वशासनक हाथ में हो, जाहिसँ  उपलब्ध सुविधा सर्वदा स्थानीय नागरिकक स्वास्थ्यक दैनिक आ आकस्मिक दुनू आवशयकता पूरा करबा में सक्षम रहय .हं, जं, समाज पंचायतक नियंत्रण मुखियाक स्थान पर मुखिया-पतिकें दए  देनि तं हमरा लोकनि ककरा दोष देबैक !

तथापि, एखन एहि महामारीसँ  राष्ट्रक आ विश्वसँ उपलब्ध उपलब्ध सामग्री, विश्व स्तरपर  उपलब्ध सब ज्ञान, देशमें उपलब्ध समस्त कार्मिकक सहायतासँ लड़ीं, जाहिसँ कोरोनाक ई तांडव पर नियंत्रण हो. बिसरबाक नहिं थिक, जे राष्ट्रीय विपदाक निवारणमें सब पक्षकें सम्मिलित करब सरकार दायित्व थिक.  

        

Saturday, March 6, 2021

यात्री-नागार्जुन: 'तोहर सरिस एक तोहें माधव'

 

यात्री बैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन केर प्रशस्ति आ आलोचना में बहुतो कहल आ लिखल गेल अछि आ अओरो कहल जायत. किन्तु, यात्रीक व्यक्तित्व आ रचनाक कोन एहन तत्व अछि जे हुनका समकालीन मैथिली साहित्यकार सबसँ भिन्न करैत छनि ? सत्य पूछी तँ, यात्रीमें अपन समकालीन सब समानताए की रहनि ! तथापि,  एतय केवल पहिले प्रश्न पर विचार करी. हम एहि विमर्शक हेतु तर्क यात्री-नागार्जुनहिंक रचनामें तकैत छी.

समकालीन लोक आ सामान सामजिक वर्गक व्यक्तिमें सामाजिक अवस्थाक लगभग समान अनुभव होइछ. तथापि, दृष्टिकोणक  भिन्नताक कारण सब केओ एके परिदृश्य वा घटना सँ समान निष्कर्ष नहिं निकालैत छथि. दृष्टिकोणक  इएह भिन्नता एक पीढ़ीक साहित्यकार लोकनिक बीच विचारक भिन्नता आ अभिव्यक्तिक विविधताक  कारण थिक. यात्री जीवन आ दृष्टिकोण आ रचनामे निर्विवाद अपन समकालीन सबसँ भिन्न रहथि. किन्तु, कोना ताहि पर विन्दु-विन्दु विचार करी.

1938 में प्रकाशित प्रसिद्द हिंदी कविताबादल को घिरते देखा हैमें यात्री-नागार्जुन कहैत छथि:

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर विष-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

हमरा जनैत ई कविता केवल कोनो एकटा परिदृश्यक नहिं, बल्कि यात्रीक विस्तृत दुनिया देखबाक संकेत आ भिन्न अनुभवक कथा कहैत अछि. विदित अछि, विस्तृत विश्वक दर्शन यात्रीकें अनुभवक विशाल क्षितिज आ भिन्न दृष्टि देलकनि. फलतः, विश्व भरिक घटनाके अपन साहित्यमें ओहिना समेटलनि जेना मिथिलाक समस्याकें. तें हुनक कवितामें मिथिलाक समस्या परबूढ़ बरआ विश्वक परिस्थिति परकी लालदुनू भेटत.

दोसर गप्प, यात्री-नागार्जुन पर अपन काजक बल पर कतेकोछापलगलनि. यद्यपि, हुनका केओ मार्क्सवादक 'ढोलिया' बुझलखिन, तं, केओगोड़ा  लगाओल कहलगैंयां लोटा’. किन्तु, कोनो धर्म, व्यक्ति, वाद वा पार्टी यात्री जीकें खुटेसि कय नहिं राखि सकल, कोनो कलइ हुनक भीतरी धातु पर पक्का नहिं भए सकल. ओ रमता जोगी , बहता पानी तं छलाहे, भौतिक आ वैचारिक दुनू स्तर पर. तें, जखन जतय मन भेलनि बिदा भगेलाह. हुनका गृहस्थ तँ नहिंए बूझि सकैत छियनि. जँ प्रमाण चाही तँ, नीचा देल उद्धरण देखू. ई निर्विवाद यात्रीक पारिवारिक दायित्वसँ विमुखताएक प्रमाण थिक. कारण भले जे हो :

कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप
हम टा संतति, से हुनक पाप
ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप

यद्यपि स्वयं यात्री जीमिथिला कें अंतिम प्रणाम'  हेतु निम्न पांती में  अपन 'रमता जोगी'क प्रवृत्तिक समर्थन करैत समुचित औचित्य सेहो प्रस्तुत करैत छथि:  

दुःखओदधिसँ संतरण हेतु
चिरविस्मृत वस्तुक स्मरण हेतु
सूतल सृष्टिक जागरण हेतु
हम छोड़ि रहल छी अपना गाम

मुदा, हुनक जीवन मे एहि सब उद्देश्य म सँ सबसँ प्रबल कोन प्रेरणा रहनि से कहब कठिन. तथापि जँ ओ सनातन धर्म छोड़ि, दीक्षा लय बौद्ध भिक्षुओ भेलाह, तं, पुनः उपनयन करा कय फेर जनौ सेहो पहिरलनि. अर्थात् , ओ सब परिस्थिति में सामाजिक दवाबक प्रतिरोध नहिं कए सकलाह. मुदा, हुनकर  मन जतय जखन भरि गेलनि, तँ, देहक चोला-जकाँ विचारो  बदलि लेलनि. तें,  जहिना, स्टॅलिनवाद आ मार्क्सवादक समर्थको बनलाह, तँ पछाति ओकर निंदा सेहो केलखिन. इन्दिराकें प्रगतिवादीओ कहलखिन, तं, इन्दिराक विरुद्ध जयप्रकाश नारायणक मुहिम में सेहो हिस्सा लेलनि आ कविताओ गढ़ि देलखिन:

क्या हुआ आपको ?
क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में
भूल गई बाप को?
इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को !
क्या हुआ आपको ?
क्या हुआ आपको?

कारण, कोनो व्यक्तिक महानता, हुनका लोकनिकें यात्री-नागार्जुनक कोप वा उपहास बंचा लेतनि तकर गारंटी नहिं.  केओ, वा केहनो होथि, यात्री सबके एकहिं लाड़निसँ  लाड़ि दैत छलखिन. गाँधी- गाँधीक अनुयायी लोकनिपर नागार्जुनक प्रहार नीचा देखल जाय:

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के!
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!

किन्तु, यात्री मनुखक दिन-प्रतिदिनक जद्दोजहदकें ततबा प्रधानता दैत रहथिन, जे कष्ट में हुनकाकखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथक हेतु धैर्य नहिं रहनि. हुनक उक्ति तँ इएह कहैछ जे हुनका मोने जं ओ कष्ट में छथि आभोलानाथनिर्द्वंद सूतल छथि तँ भोलेनाथ बातो-कथा- गारिओ सुनथु : 

पचकल लोढ़ा, तों धन्न रह
नहि आब नचारी केओ गओतहु !
जे बूड़ि हैत से बोकिअओतहु !
नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस ....
माटिक महत्वकें  चीन्हि लेलक ई देश-कोश !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !

तेसर गप्प, जे यात्रीकें अपन समकालीन लोकनिसँ भिन्न करैत छनि, से थिक यात्रीक जीवनमें साहित्यक उपादेयता. यात्रीक हेतु साहित्य जीविकाक साधन छलनि. एहना परिस्थितिमें साहित्यक लोकप्रिय आ बिकयबा जोकर हयब आवश्यक. सत्यतः, जं विचार करी तँ ओ केवल यात्री ए टा रहथि जे मैथिली उपन्यासक विधाकें परिचये टा नहिं देलखिन बल्कि ओकरा प्रगतिशील विचार सँ पुष्ट केलनि. ततबे नहिं, यात्रीक मन में मैथिली आ हिन्दीक बीच कोनो दुविधा सेहो नहिं छलनि. जाहिसँ हुनकपेट  भरैत छलनि, तकर पीड़ी पर सब किछु चढ़बैत छलाहआ तकरा उचितो बूझैत छलाह .हुनकर पीढ़ीक दोसर प्रसिद्द साहित्यकार  स्व. सुमन जी-सन साहित्यकार आरम्भ में साहित्यसँ जीविका चलबितो छलाह, तँ, हुनका नियामिकी नौकरीओ रहनि, आ वेतन सेहो भेटैत रहनि. नौकरी-पेशा साहित्यकार लोकनिक साहित्यक लोकप्रियता आ पोथीक बिक्री, हुनका लोकनिक  जीवन-यापनकें प्रायः ओतेक प्रभावित नहिं करैत रहनि जतेक यात्रीकें . हँ, ई गप्प भिन्न जे यात्रीक स्वर आ तेवर तेहनि रहनि, जे, हमरा नहिं लगैत अछि, यात्रीकें अपन लोकप्रियताक हेतु कोनो आयास करय पड़ल हेतनि.कारण, समाज, व्यक्ति, आ घटनाक  प्रति यात्रीक प्रतिक्रिया ततेक अनायास आ त्वरित होइत छलनि जे हुनक स्वर अनेरे सबकेँ आकृष्ट कए लैत छलनि. हँ, इहो स्मरण रखबाक थिक जे यात्रीक अधिकतर हिन्दी रचना हुनकासँ लिखाओल गेलनि. माने, रचना आ प्रकाशन मे कोनो बिलंब नहिं. हिन्दी रचनाक मांग रहैक. आब, प्रकाशित रचना हिन्दी में लोकप्रिय भए गेल, तँ  मैथिली मे ओकर  प्रचारक कोन आवश्यकता.

एकटा गप्प आओर . अपन समकालीन लोकनिक विपरीत, यात्री एहनो विषय आ व्यक्ति- यथा, कांसीराम आ मायावती - पर कविता लिखलनि, जे साहित्यक मुख्यधारा लेखनक विषय नहिं बूझल जाइत छलाह.हमरा जनैत, यात्रीक इहो प्रवृत्ति, लीकेसँ हंटि कय चलबाक बानि, आ हुनक विरल प्रतिभाए प्रमाण थिक.

 


Tuesday, February 16, 2021

कविताक अनुवादक समस्या

 

कविताक अनुवादक समस्या

एक भाषाक  कविताक दोसर भाषामें अनुवाद कोना करी जाहिसँ कविताक भाव आ भाषा, दुनूक सुन्दरता यथावत् प्रतीत हो; ई एकटा विकट समस्या थिक. सरल शब्दक अनुवाद संभव छैक. किन्तु, कठिन भावक अनुवाद कोना करी. एकटा उदहारण आचार्य जयशंकर प्रसादक कवितासँ देखी:

हिमाद्रि तुंग श्रृंगसे प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती

दोसर उदाहरण कवि नागार्जुनक कवितासँ  अछि:

बाँसक ओधि उखाड़ि करै छी जारनि

हम्मर दिन घूरत कि हे जगतारनि !

उपरोक्त दुनू पद केर अर्थ आ भाव अपन-अपन भाषामें स्पष्ट अछि. किन्तु, एकरे दुनूकें जँ अंग्रेजीमें अनुवाद करबाक हो कविताक लालित्य आ भाषा तँ दूर, पाठककें एकर भावो बुझायब कतेक कठिन हेतैक से बूझब कठिन नहिं, जेना, 'गोदान' शब्द भारतमें सार्थक तँ अछिए, तेँ,गोदान कहितहिं एकटा सामाजिक प्रथाक बोध भ' जाइछ, जकर बोध Gift of cow  सँ  एशियाई सँ  इतर पाठककें नहिं हेतनि. तखन प्रश्न उठैछ, एक भाषाक कविताक अनुवाद दोसर भाषा, आ दोसर संस्कृतिक भाषामें, कोना हो. एहि विषयमें ई विमर्श किछु अनुवादक लोकनिक विचारसँ आरम्भ करैत छी. पछाति हम अपनो विचार देब.

सर्वविदित अछि, नव देशमें पयर जमयबाक हेतु स्थानीय भाषाकें बुझबाक अनिवार्यताकें उपनिवेशवादी लोकनि सबसँ पहिने अनुभव केलनि. फलतः, ओ लोकनि विश्वकेर अनेक भागमें, जतय कतहु गेलाह, ओतुका भाषाकें बूझि, ओहि भाषा सबहक शब्द-कोष बनओलनि, ओकर व्याकरणक रचना केलनि, आ पछाति ओतुका साहित्यक अनुवाद सेहो केलनि. वीर महामुनिवरक नामसँ  दक्षिण भारतमें प्रसिद्ध इतालवी पादरी बेस्की तमिल भाषाक आरंभिक विदेशी अध्येता, एकर एक प्रसिद्ध उदाहरण रहथि. अनुवाद केर विषय में बेस्की ( 1680-1747) कहैत छथि:

हमरा लोकनि अधिक काल लैटिनक लोकोक्तिक शैलीक बिना लैटिन लिखैत छी, आ ताहूसँ बेसी तमिल शब्दकें यूरोपीय शैलीमें व्यक्त करैत छी.’[1]

एकरहिं स्पष्ट करैत, अंग्रेजी आ तमिल साहित्यक  दोसर सुप्रसिद्ध विद्वान, जी यू पोप (1820- 1908) तमिल भाषामें दक्षताक  संदर्भमें सँ लिखैत छथि, ‘ एहिसँ पहिने कि केओतमिलशैलीमें तमिल बजबाक प्रयास करथि, ई आवश्यक थिक जे, ओ लोकनि पहिने तमिल लोकनिक सोचबाक पद्धतिसँ  परिचित भजाथि. जखन वक्ता कठिन आ निरंतर श्रमसँ  तमिल लोकनि-जकाँ सोचब सीखि लेथि, तखने ओ नीक-जकाँ तमिल-भाषा बाजबाक आशा राखथु, ओहिसँ  पहिने नहिं. एकर अतिरिक्त, भाषामें दक्षताक हेतु विस्तृत अध्ययन आ स्थानीय नागरिकसँ  निरंतर सम्पर्क अनिवार्य थिक.’ [2]

हमरा जनैत, ई नियम ओहि सब व्यक्ति/अध्येताक हेतु लागू होइछ जे केओ एहन विदेशी भाषाक अनुवाद करैत छथि जतुका सामाजिक रीति-रिवाजसँ  ओ अपरिचित छथि. तें, नागार्जुनक मैथिली कविताक उपरोक्त अंशक भारतीय भाषामें, बुझबा योग्य, अनुवाद संभव अछि. किन्तुयोरोपीय भाषाक पाठककें, बाँसक ओधि उखाड़बाक कठिन परिश्रम आ ओधिक जारनि जरयबा-सन  दरिद्रताक दंश आ पीड़ाक अनुभव करायब कठिन छैकजकर अनुभव बाँसक ओधि उखाड़िनिहार करैत अछि ! अस्तु, एही कविताक भारतीय भाषाक अनुवाद आ अंग्रेजीक अनुवाद भिन्न हेतैक. ओकर विपरीत एक भारतीय भाषासँ दोसर भारतीय भाषा में अनुवादक एकटा उदहारण देखूकरजनीक दानाक लाल रंग आ ओकर ऊपरक भागक कारी टुरनीसँ  हमरा लोकनि परिचित छी. ‘तिरुक्कुरलमें ढोंगी साधुक गेरुआ वस्त्र आ कारी चरित्रक हेतु तिरुवल्लुवर सेहो करजनीक दानाक उपमाक देने छथि. तें, मैथिलीमें एहि कुरल केर सहज अनुवाद हमरा सुलभ प्रतीत भेल. किन्तु, ओही कुरल केर अंग्रेजी अनुवादकें ओहने धरगर बनायब कठिन अछि !

आब एकटा दोसर विन्दु पर विचार करी: कविताक अनुवाद केहन हयबाक चाही ? भवभूतिक नाटक 'उत्तर रामचरित'क अंग्रेजीमें अनुवाद करैत, बेलवालकर नामक विद्वान, अनुवादक आदर्श, आ अनुवाद-कार्यक कठिनताके निम्नवत प्रस्तुत करैत छथि:

‘.. in translating poetry we are called upon not only to give the meaning correctly, but also to reproduce the subtle literary qualities of the original. Rhythm, word-order, figures of speech, compactness or diffuseness of expression—in short, almost every literary device of the original ought, in theory, to reappear in the translation. But since the genius of one language differs radically from that of another, an ideal translation is, as von Wilamowitz- Moellendorff observes, a travesty or perhaps metempsychosis: in other words, a wellnigh impossible task. (Therefore)Some things must be sacrificed. But it is far better, wherever possible, to keep close to the original and show the author in his true native colours, rather than, under the pretext of giving a literary finish to the translation, to make him say things which he did not say and would never dream of saying.[3]

हमरा  जनैत उपरोक्त उद्धरण अनुवादक एहन आदर्श थिक जकर  निर्बाह असम्भव तँ अछिए, जँ एकर निर्बाह कयल जाय तँ संभवसूर्यक टीका भानुने चरितार्थ भजाय. प्रायः इएह कारण थिक जे रबीन्द्रनाथ ठाकुर-सन सिद्धहस्त कविओ जखन अपने (बांग्ला) गीतांजलिक अंग्रेजी अनुवाद करय बैसलाह तं ओ गीतांजलिक अनुवाद गद्यमें केलनि ! [4] प्रायः, एहन उदाहरण विरले भेटत. मुदा, ई उदाहरण कविताक अनुवादक समस्याक एकटा एहन उदहारण थिक जकर व्याख्या आवश्यक नहिं.

तथापि, जँ अनुवाद काव्यहि में हो, आ अनुवाद, मूल काव्यक छाया प्रति नहिओ हो, तैओ जँ अनुवाद मूल केर प्रतिबिम्ब बनि सकय (भले बाम-दहिन जकां बूझि पड़ैक- जेना अएना दहिनकें बाम कए दैछ), तँ, अनुवादकें पढ़लासँ  पाठककें मूल ग्रंथक स्वादक अनुभव अवश्य हेतनि. मुदा, एकर हेतु ई अवश्य आवश्यक थिक जे अनुवादक, मूल भाषा आ अनुवादक भाषा, दुनूक, शैली आ सौन्दर्यसँ  सुपरिचित होथि. अन्यथा, अनुवादक मूल ग्रंथक  भावकेँ अनुवादक भाषामें कोना व्यक्त करताह !

किन्तु, ई सब कहब जतबे सुलभ छैक, करब ततबे कठिन.

सार्वविदित अछि, स्व. आचार्य सुरेन्द्र झासुमनकें अनेक आन भाषाक सहित संस्कृत-मैथिली-हिंदी-बांग्ला पर समान अधिकार रहनि. ओ कतेको संस्कृत आ बांग्लाक ग्रन्थक हिंदी  आ मैथिलीमें उत्कृष्ट अनुवाद केने छथि. तथापि, आचार्य सुमनजी अनुवाद आ मूल केर बीचक अंतरकें कोना स्पष्ट करैत छथि से हुनके सँ  सुनी.

वेदवाणीकऋचालोकक नामसँ प्रकाशित अपन अनुवाद में सुमन जी कहैत छथि, ‘ सद्यः रसायल रसाल ओ चिर-बसिआयल अमौट में जेना आस्वाद-भेद अछि से (सभ वेदवाणी एवं लोकवाणी में एतय) संगते. [5]

काव्यक अनुवादक जटिलताक संकेत आचार्य सुमन जी एक ठाम  आओर देने छथि: संदर्भ थिक हुनक अनुगीतांजलि. एहि ग्रन्थमें सुमन जी कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ ठाकुर एक सौ चुनल गीत सबहक मैथिली अनुवाद प्रकाशित केने छथि. एहि पोथीक स्वर-संधानिकामें सुमन जी लिखैत छथि:

‘... गीत रचना सँ सय गोट गीतक चयन कय मातृभाषाक माध्यमे ओकर प्रतिबिम्बन प्रयास कयल अछि. परंच, ओ कहाँ धरि उपयुक्त भेल, ओ अपनहु  पता नहिं. अनुवाद तँ एकरा कहि नहिं सकै छी, कारण, ‘छायेवानुगच्छत्क एतय निर्वाह नहिं. कतहु रूप छाया तँ कतहु भावे, कतहु मर्म मात्रे. एतय विचार हुनक, तँ स्वर संचार अपन ; भाव निबन्ध हुनक तं, छंदबन्ध अपन ...’ [6]

यद्यपि,एहि अनुवाद कार्यमें 'हुनक (रबीन्द्रक) पद-पद्धतिक अनुगमन पूर्वक कण्ठ में कण्ठ मिलाय हुनक स्रोत-स्वरक अनुसरणकें सुमन जी अपन उद्देश्य-जकाँ व्यक्त केने छथि. संभव अछि, एहि कृतिक, मूलसँ भिन्न  स्वरुपक कारण, सुमनजी मौलिकता हो, वा ‘‘छायेवानुगच्छत्क सीमाबद्ध रीतिक अनिवार्यताक अनुवाद पर विपरीत प्रभावसँ बंचबाक कारण हो. किन्तु, एतबा तँ अवश्य जे सुमन जी-सन सिद्ध कवि-अनुवादक सेहो कविताक अनुवादमें स्वतंत्रताक आवश्यकताक अनुभव केलनि. आ ई समस्या तखन उत्पन्न भेले जखन बांग्ला आ मैथिली भाषाक समानता, आ अनुवाद में सुमन जीक दक्षता निर्विवाद अछि.

सत्यतः, कविताक छायानुवादहु में अनुवादककें मूल लेखकक भावकें बुझबामें अनेक ठाम अनुमानसँ काज चलबय पड़ैत छनि , से एकटा आओर विद्वानजी यू पोप केर उक्ति सँ प्रतीत होइत अछि; सन्दर्भकुरलकेर अंग्रेजी अनुवादक छैक :

(‘कुरल’ केर) हमर अनुवाद विश्वसनीय (faithful) अछि. अस्तु, हम अनुवाद में एकोटा एहन विचार वा भावकें निहित नहिं कयल, जकरा कविक मूल भाव बुझबाक हेतु हमरा कोनो ठोस आधार नहिं प्रतीत भेल.’[7]

अर्थात्  विश्वसनीय अनुवादक प्रयासक अछैतो, अनुवादककें (बहुतो ठाम) रचनाकारक मूल भावकेंअनुमान करयपड़लनि. ई थिकैक ओहि भाषाक काव्य-कृतिक अनुवादक समस्या जाहिमें अनुवादक जी यू पोप अपन जीवन भरिक श्रम लगा देलनि !

आब विश्वक आन भाषासँ मैथिलीमें अनुवादक चर्चा करी. हमर विचार अछि, जखन आन भाषाक गप्पकें मैथिलीक सुपरिचित उदाहरणक माध्यमसँ प्रस्तुत कयल जाइछ तँ पाठक मूल कविक भावकें बुझिते टा नहिं छथि, बल्कि अकस्मात् चमत्कृत भ' उठैत छथि. एकर विपरीत अपरिचित उपमा आ बलजोरीक उद्धरण पाठकक छाती पर भरिगर जाँत-जकां प्रतीत होइछ ! फलतः, पढ़बाक आनंदसँ वंचित पाठक ओहि पोथीकें किएक पढ़ताह !!

हम अपन एहि उक्तिक समर्थन में हम इतिहासकार ए एल बाशम केर उक्ति के यथावत उद्धृत करैत छी:

The translations…….. In most cases they are not literal translations, since the character of Indian classical languages is so unlike that of English that literal translations are at the best dull and at the worst positively ludicrous. I places I have taken liberty with the originals, in order to make their purport clearer to the Western reader, but in all cases I have tried to give them an honest interpretation of the intentions of their authors, as I understood them.”[8]

अर्थात् अंग्रेजी आ प्राचीन भारतीय भारतीय भाषाक प्राकृतिक मौलिक अन्तरक कारण संभव छैक जे कतहु शब्दशः अंग्रेजी  अनुवाद  रसहीन आ हास्यास्पद भए जाइक. एहन परिस्थिति में अनुवादक कें बोधगम्य बनयबाक हेतु अनुवादक कें मूल साहित्य केर आशय आ अपन भाव-बोध पर विश्वास करय पड़लनि.

तें, संभव होइक तं अनुवाद कतहु मूल केर अनुगमन करय. मुदा, जं से संभव नहिं होइक तं मौलिक ग्रंथक आशय जे अनुवादक कें बोध होइनि तकरा तेना प्रस्तुत करथि जे पाठककें मूलक भाव बोधगम्य होइक. अनुवाद में एतबा स्वतंत्रता अनुवादक उद्देश्यक सार्थकताक हेतु आवश्यक थिक, से हम मानैत छी.    

संदर्भ :

1. Pope The Rev. G U. A Tamil Hand-Book, 2nd edition, 1859. Madras: PR Hunt. pp 154

2. ibid

3.  S.K. Belvalkar. Rama’s Later History or Uttar-Rama-Charit, 1915: Cambridge, Massachusetts, Harvard University Press. Preface, Pp XXX.

4. Tagore Rabindranath. Geetanjali song offerings reprint 2016.Vishwabharati.

5. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’.ऋचालोक (वेद वाणी), प्रथम संस्करण 1970, पश्य ......  

6. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’. -अनुगीतांजलि, प्रथम संस्करण, 1969,स्वर-संधानिका, पृष्ठ संख्या ‘उ’  

7. Pope Rev. G U: The ‘Sacred’ Kurral of Tiruvalluva-Narayanar with Introduction, Grammar, Translation, Notes, Lexicon and Concordance 1886: London: W H Allen & Co. Introduction, xiv

8. Basham AL. The wonder that was India: Preface to the second edition. 3 rd revised ed. 2019; New Delhi: Picador India pp Xiii. 

metempsychosis = the supposed transmigration at death of the soul of a human being or animal into a new body of the same or a different species.

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