Wednesday, September 5, 2018

बढ़इत वयस आ आँखिक रोग

बढ़इत वयस आ आँखिक रोग

पहिने आँखिक रोशनीक कम हयब बुढ़ापाक पर्याय मानल जाइत छलैक. लोकक मुँहें सुनितिऐक, 'नै सुझैत छनि, बूढ़ भ गेलखिन ने'. मुदा, एखनुक युगमें परिस्थिति बदलि गेलैये. स्वस्थ जीवन पद्धति, समय पर निदान, आ समुचित चिकित्सासं आँखिक रोशनीकें सुरक्षित राखब संभव छैक.       रोगसब वयसक सीमा रेखाक परबाहि नहिं करैछ. तथापि, एहि लेखमें हम चालीस-पचास-साठि वर्षक लगीचक वयस में आरम्भ होबयबला आँखिक किछु एहन रोगक लक्षण, ओकर निदान, ओहि सब सं बचाव, आ चिकित्साक चर्चा करब जकर  मूल लक्षण आँखिक रोशनीमें क्रमिक आ निरंतर  ह्रास  थिक.                                                   
दूर देखब , लग देखब , रंगकें चीन्हब, दिन में देखब, राति में देखब, सोझे आगू देखब, आगू देखैत अगल-बगलक वस्तुक आभास ( Visual field ), आ वस्तु आ व्यक्ति दूरी क अनुभव आँखिक ज्योतिक विस्तृत आयाम थिकैक. एहि सब म सं एक वा अधिक प्रकारक  ह्रास दृष्टि दोष थिक. तें, ककरो लगक नजरि कम, दूर स्पष्ट. ककरो लग, दूर दुनू अस्पष्ट. ककरो लगक नजरि साफ़, दूर क रोशनी कमजोर. ककरो रौद में चकचोन्हीक अनुभव, आ ककरो मेघाओन दिनमें वा साँझुक पहर नजरि साफ़ लगैत छनि. किनको नीक इजोत में नजरि साफ़ लगैत छनि, मुदा सांझुक पहर सब किछु पर कुहेस-जकां लागल बूझि पड़ैत छनि.किनको सोझ-सामने किछु देखबा में नहिं अबैत छनि, किन्तु, कात-करोटक वस्तु किछु-किछु देखि पबैत छथि. केओ सोझे आगू तं किछु देखितो छथि, किन्तु, कात- करोट वस्तु - जेना चौकी-खाट, टेबुल-कुर्सी में ठोकरसं यदा-कदा लटपटा जाइत छथि. ई सब किछु आँखिक रोशनीमें कमीक लक्षण थिक जकर जांच-पड़ताल हेबाक चाही. रोगक आरंभिक लक्षण के चिन्हला सं आ  समय पर उचित  चिकित्सा सं आँखिक ज्योतिकें सुरक्षित राखब सम्भव छैक. आब बढ़इत वयसक आँखिक रोग सबहक गप्प करी.

प्रेस्बायोपिया (Presbyopia)
लगक महीन वस्तुकें देखबामें बाधा (Presbyopia) बढ़इत वयसक सब सं पहिल दस्तक थिक.  प्रेस्बायोपिया आंखिमें उम्रक संग-संग होइत निरंतर परिवर्तनक फल थिक; ई कोनो रोग नहिं. चालीस वर्षक वयसक आसपासक ई अनुभव नारि आ पुरुषकें समान रूपें प्रभावित करैछ.  पोथी-पेपर-चिट्ठी आ मेंही वस्तुकें कनेक दूर राखि स्पष्टताक अनुभव presbyopia क पहिल लक्षण थिक. presbyopia क निवारण ले सामान्य चश्मा ( + 0.75 सं + 3.5 diopter पावर केर ) आइ- काल्हि चश्माक दोकान वा पैघ स्टोर में भेटि जायत. चश्मा उठाउ. चश्मा आंखिपर चढ़ाउ, पढ़िकय देखियौ, साफ़ नज़रि आबय तं कीनि लियए. ई सुलभ अवश्य छैक. किन्तु, मोन राखी, पढ़बाक  चश्माक पॉवर व्यक्तिक  उम्र, पहिलुक दृष्टि-दोष, आ व्यक्तिक व्यवसाय पर निर्भर करैछ. तें, चश्मा जांच करयबला पारामेडिक (optometrist) वा नेत्र चिकित्सक सं आँखिक जांच कराकय चश्मा लेब निर्विवाद नीक. डाक्टरी जांच सं सही नम्बर भेटत आ जं आँखिक आन कोनो रोग हो, तकरो निदान भ जायत. एतबा अवश्य जे पढ़बाक चश्माक नंबर साल-दू-साल पर बढ़ि जाइछ. तें, समय-समय पर आँखिक जांच करायब उचित. 
मोतियाविंदु (cataract), काला मोतिया ( Glaucoma ), मैकुलर डिजनरेशन (age-related macular degeneration)  बढ़इत  वयसमें आँखिक ज्योतिक क्षीण करयबला तीनटा प्रमुख रोग थिक.
मोतियाविंदु (cataract)
मोतियाविंदु भारत में  अन्धताक प्रमुख कारण थिक. ई मूलतः बुढ़ापाक रोग थिक. मोतियाविंदुक सामान्य अर्थ भेल मोतीक रंगक विन्दु.  मोतियाविंदुक सबसँ परिचित आ पूर्ण विकसित प्रकारमे आँखिक पुतलीक बीच मोती-सन उज्जर-सपेत विन्दु जकां देखबामें अबैछ.
दाहिना आँखिक मोतियाविंदु
ई रोग मनुष्यक आँखिक पारदर्शी  लेंसक क्रमशः अपारदर्शी भ जयबाक परिणाम थिक. सूर्यक प्रकाशक परावैगनी किरण (ultra violet rays) आ आँखिक लेंसक प्रोटीनक बीचक प्रतिक्रिया सं लेंसक पारदर्शी प्रोटीन अपारदर्शी भ जाइछ जे मोतियाविन्दुक रूपें परिलक्षित होइछ. तें, बहुधा, निरंतर रौदमें खट्निहार मज़दूर में कमे वयस में  आ ऑफिसमें काज केनिहारक आँखिकमें  पछाति मोतियाविंदु होइछ से  सामान्य अनुभव थिक. तथापि बुझबाक थिक, सूर्यक रोशनीक परवैगनी किरण (ultra violet rays) मोतियाविंदुक अनेक कारण म सं प्रमुख, किन्तु एकमात्र कारण नहिं थिक. वंशानुगत विरासत, शरीरक आन रोग, जेना डाइबिटिज, आँखिक लेंस ले हानिकारक औषधि, जेना, कोर्टिकोस्टेरॉयड ( corticosteroid), क लम्बा अवधि तक सेवन, आ आँखिक किछु आन रोग सेहो कम वयसमें मोतियाविंदुक कारण होइछ. दूरस्थ व्यक्ति वा वस्तुके देखबामें बाधा, वा आँखिक ज्योतिक धुंधलापन मोतियाविन्दुक प्रमुख लक्षण थिक. आरंभिक अवस्थामें रोशनीक श्रोत, जेना, बिजुलिक बल्बक चारू कात इन्द्रधनुषी घेरा, एके वस्तुक, जेना चन्द्रमाक, अनेक बिम्ब, तेज रोशनी आ  तेज रौदमें आँखिक चोन्हरायब मोतियाविन्दुक आम लक्षण थिक. एकटा गप्प मोन राखी, मोतियाविंदु में आँखिमे कोनो पीड़ा वा लालीक नहिं होइछ.
मोतियाविंदुक आरंभिक अवस्थामें पहिलुक चश्माक नम्बरमें परिवर्तन भ सकैछ. चश्माक नम्बरमें परिवर्तन सं कतेक गोटेकें  लगक नज़रिमें सुधारक अनुभव सेहो होइत छनि. लगक रोशनीक एहि सुधारकें दोसर दृष्टि (second sight) कहल जाइछ.  अस्तु, मोतियाविंदुक आरंभिक स्थितिमें नव चश्मा वा नंबर बदललासं आँखिक ज्योतिमें सुधार भ सकैछ. किन्तु, अंततः मोतियाविंदुक इलाज़ ऑपरेशने थिक. मोतियाविन्दुक ऑपरेशनमें आँखिक प्राकृतिक लेंसक अपारदर्शी भागकें निकालि सही पॉवरकेर लेंस आँखिमे प्रत्यारोपित कयल जाइछ. पछिला 70 वर्षमें मोतियाविन्दुक ऑपरेशनमें तेहन क्रांति भेलैये जे मोतियाविन्दुक ऑपरेशन शल्य-चिकित्सा विज्ञानक सर्वाधिक सफल विधि मानल जाइछ. मोतियाविन्दुक ऑपरेशन कहिया कराबी ? ई प्रश्न आम थिक. उत्तर सोझ छैक. जखन दिन-प्रतिदिनक काजमें मोतियाविन्दुक कारण आँखिक कमजोर रोशनी बाधा बनय, ऑपरेशन करा ली. दक्ष चिकित्सकक हाथ में ऑपरेशनेक दिन वा दोसर दिन आँखिक रोशनी साफ़ बूझि पड़त. पछाति महीन वस्तु देखबाले वा पढ़बाले चश्मा लेबय पड़त. मुदा, से नहिं चाही तं, विशेष प्रकारक लेंस- multifocal lens- क प्रत्यारोपण सं लगक चश्माक सेहो काज नहिं. एकटा गप्प आओर. मोतियाविन्दुकें  बहुत दिन धरि जुनि अनठाबी. ऑपरेशनमें बिलम्ब सं आओर नव समस्या, यथा, मोतियाविन्दुक कारण ग्लौकोमा भ सकैत अछि, आ आखिक रोशनी पूर्णरूपें ख़राब भ सकैछ जे पछाति  ऑपरेशनहु सं नहिं सुधरय.                                                                     
राष्ट्रिय अन्धता निवारण मिशनक अन्तर्गत भारत सरकार, आन कतिपय रोग सहित, मोतियाविन्दुक निवारणक हेतु राज्य सरकार सबकें ऑपरेशनक संख्याक वार्षिक लक्ष्य निर्धारित करैछ आ आर्थिक अनुदान दैत छैक. एहि मिशन केर अन्तर्गत जिला अन्धता निवारण समितिक तत्वावधानमें मोतियाविन्दुक रोगीसब कें निर्धारित सरकारी वा गैर-सरकारी संस्थानमें आनि मोतियाविंदुक ऑपरेशन आ लेंस प्रत्यारोपणक मुफ्त व्यवस्था रहेछ. ऑपरेशन भेलाक पछाति रोगीके घर धरि पहुंचाओल जाइत छैक आ पुनः रोगिक अपने गाम आ शहरमें निर्धारित अवधि आ स्थानपर आँखिक जांच कय चश्मा देबाक व्यवस्था छैक. तमिलनाडु आ पांडिचेरी राज्यमें सरकारी आ गैर-सरकारी संस्था सब एहि अभियान सफलताक भार अपना पर उठौने छथि. बिहार में ई व्यवस्था कतेक धरि चालू अछि, से नहिं कहब. यद्यपि, नेपाल स्थित गैर- सरकारी अस्पताल सब में बिहार आ उत्तर प्रदेशक मोतियाविन्दुक रोगिक बाढ़ि दोसरे कथा कहैत अछि ! सामजिक रूपें सचेत लोक जिलाधिकारीसं एकर खोज-पुछारि करथि तं बहुतो कें उपकार हेतैक. 

काला मोतिया (Glaucoma)
भारतवर्ष में ग्लौकोमा अन्धताक दोसर प्रमुख कारण थिक जे जनसंख्याक 1-2 प्रतिशत व्यक्तिक आंखिक ज्योतिकें  प्रभावित करैछ.. ग्लौकोमा आँखिक संवेदना वाहक स्नायु - ऑप्टिक नर्व (optic nerve) - क रोग थिक; इहो बढ़इत वयसक रोग थिक. ग्लौकोमामें व्यक्तिक वंशानुगत प्रकृतिक कारण, आ,बहुधा, आँखिक प्रेशरक बढ़ला सं आँखिक संवेदी कोशिका सबहक क्षय होमय लगैछ . संवेदी कोशिका सबहक क्षय आ स्नायुक क्रमशः घटैत शक्ति आँखिक रोशनीमें दिनानुदिन ह्रासक कारण बनैछ. एतय एकटा गप्प फडिछायब आवश्यक. मोतियाविंदु आ काला मोतिया-ग्लौकोमा (glaucoma) में कोनो समानता नहिं. मोतियाविंदु आँखिक लेंसक रोग थिक आ ग्लौकोमा आँखिक संवेदी स्नायु (optic nerve ) क रोग. मोतियाविंदुक ऑपरेशनसं आँखिक रोशनीक पूर्णतया आपस आबि जाइछ. ग्लौकोमाक कारण भेल नेत्र-ज्योतिक ह्रास नियमिकी होइछ. तें, आरंभिके अवस्थामें  ग्लौकोमाक निदान आ चिकित्सा आवश्यक.                                                          
ग्लौकोमाक लक्षण की ? असलमें आरम्भ में ग्लौकोमाक कोनो लक्षणे नहिं होइछ; बहुधा, ई  चुप्पा रोग थिक. तथापि सांझुक पहर वा कम इजोत में आँखिक रोशनीमें कमी, मेघाओन वा धौन-सन लागल जेकां अनुभव, सांझुक पहर कपार में व्यथा, रोशनीक श्रोतक चारू कात इन्द्रधनुषी घेराक अनुभव, यदा-कदा आँखिक लाल भ जायब, वा किछुए-किछु दिन में पढ़बाक चश्माकें बदलबाक आवश्यकता ग्लौकोमाक आरंभिक लक्षण थिक. जखन रोग बहुत बढ़ि जाइछ, कात-करोटक वस्तु देखबामें नहिं अबैछ. आ अन्ततः आँखिक ज्योति समाप्त भ जाइछ. किछु लोकके 50-60 वर्षक वयसमें आँखिक में अचानक, भयानक पीड़ाक संग आँखिक लाली आ आँखिक रोशनीक एकाएक कम हयब सेहो एक प्रकारक ग्लौकोमाक लक्षण थिक; एहन स्थितिक अविलम्ब इलाज आवश्यक.        प्रश्न उठैछ, जाहि रोगक आरंभिक स्थितिमें कोनो लक्षण नहिं हो तकरा चिन्ही कोना ? उत्तर अछि, आँखिक नियमित जांच. निदान भेलापर ग्लौकोमाक इलाज लेज़र, आँखिमे देबबला बूँदबला औषधि वा ऑपरेशन सं कयल जाइछ. मुदा, कोन प्रकारक ग्लौकोमाक इलाज कोना हो तकर जानकारी नेत्र-चिकित्सक कहताह. तें, रोगक प्रकृति आ आँखिक परिस्थितिके देखैत, रोगी आ रोगिक परिवारजनक संग परामर्श सं नेत्र-चिकित्सक द्वारा ग्लौकोमाक इलाज निर्धारित कयल जाइछ. एक बेर ग्लौकोमा निदान भेला पर जीवनपर्यन्त आँखिक डाक्टरक सं नियमित जांच आ चिकित्सा आवश्यक. ग्लौकोमा एहन रोग नहिं जे एक बेर इलाज भेल आ रोग निर्मूल भ गेल. ई मोन रखबाक थिक. 

वयस-जनित मैकुलर डिजनरेशन (age-related macular degeneration)
मैकुला आँखिक पर्दा- रेटिना- क सर्वाधिक संवेदी आ केन्द्रीय भाग थिक. स्पष्ट दृष्टि, रंगक पहिचान, आ दिन में देखब मैकुला क काज थिक. 60 सं 65 वर्षक आयु व्यक्तिक आँखिक रोशनिक क्रमिक ह्रासक कारण म सं एक प्रमुख कारण मैकुलर डिजनरेशन थिक. विकसित देश सबमे मैकुलर डिजनरेशन बुढ़ापामें अन्धताक ओहने प्रमुख कारण थिक जेना भारत में मोतियाविंदु. मैकुलर डिजनरेशनक कोनो एकटा कारण कें एखन धरि चीन्हब सम्भव नहिं भेलैये. मानल जाइछ, मैकुलर डिजनरेशन रेटिनामें वयसक कारण भेल परिवर्तनक परिणाम थिक.
पैघ वा मेंही वस्तुकें सोझे देखबाक शक्तिमें क्रमिक ह्रास मैकुलर डिजनरेशनक लक्षण थिक. एकरा एना बूझी; दूर सं अबैत मनुक्ख, वाहन, आगूक गाछ-वृक्ष, पढ़बाक पोथी, जाहि पर दृष्टि केन्द्रित करी ओही पर मेघ जकां कालिमाक अनुभव वा विकृत छवि, मैकुलर डिजनरेशनक मुख्य लक्षण थिक. ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (OCT) स्कैन-सन जांचक आविष्कार सं आजुक युग में मैकुलर डिजनरेशनक निदानमें बहुत सहायता होइत छैक. आँखिक भीतर देबाबला सूई- एंटी वस्कुलर एन्दोथेलिअल ग्रोथ फैक्टर (anti- VEGF)- सन  नव-नव औषधिक आविष्कार मैकुलर डिजनरेशनक एक प्रकारक सफल चिकित्सा सम्भव छैक. तें सही समय पर निदानसं मैकुलर डिजनरेशनक इलाज में अवश्य सहायता होइत छैक . यदि, मैकुलर डिजनरेशनक कारण मैकुला अंततः नष्ट भ गेल तं विम्बकेर सम्वर्धन उपकरण, लो विज़न ऐड (low-vision aid) केर सहायता सं काज जोकर दृष्टि सम्भव छैक.
जं सोझांक वस्तु देखबामें विकृति बूझि पड़य, जेना सोझ रेखा लहरदार-जकां बूझि पड़य, किताबक पन्नापर  बीचेमें कालिमा बूझि पड़य, तं ग्राफ पेपरक सहायता सं मैकुलाक  मूल पारिस्थितिक जांच सम्भव अछि. 
आम किताबक पन्नाक आकारक सामान्य ग्राफ पेपर केर  केंद्रपर कलम सं एकटा विन्दु बनाउ.
आँखिक जांचमें प्रयुक्त Amsler grid

मैकूलाक रोग में ग्राफ पेपरक रेखा एहिना विकृत भ सकैछ
पढ़बाक चश्मा आँखिपर चढ़ा नीक इजोतमें एक आँखिकें बंद कय, ग्राफ पेपर कें आँखिसं करीब 1 फुट दूर राखि, उघाड़ आँखिसं ग्राफपेपर पर बनाओल बिंदु कें देखी.  केंद्रक विन्दुक संग खड़ा- आ पड़ा रेखा  सोझ देखबामें आबय, ग्राफ-पेपरक कोनो इलाका पर धुँआ वा निपल-पोतल सं नहिं बूझि पड़य तं आस्वश्त रहू, मैकुला स्वस्थ अछि. तथापि, नेत्र-चिकित्सकसं जांच करायब जुनि बिसरी !
अंतमें, सारांशमें  रूपें निम्नलिखित मोन राखी:
1. मोतियाविंदु अन्धता सबसँ मुख्य कारण थिक. समयपर मोतियाविंदुक ऑपरेशन सं आँखिक रोशनी पूर्णतया आपस आबि जाइछ. ऑपरेशन बाद चश्माक काज पडि सकैत अछि.
2. ग्लौकोमा बहुधा चुप्पे-चुप्प आँखिक रोशनी हरि लैछ. आँखिमें मामूली व्यथा, रोशनीक श्रोतक चारू कात इन्द्रधनुषी घेराक अनुभव हयब, आँखिक लाल भ जायब, वा किछुए-किछु दिन में पढ़बाक चश्माकें बदलबाक आवश्यकता सेहो ग्लौकोमा लक्षण थिक. एहन कोनो लक्षण हो तं देरी जुनि करी, नेत्र-चिकित्सकक सलाह अवश्य ली. जं माता-पिता, सोदर भाई-बहिन ग्लौकोमाक रोगी होथि, अपना डाइबिटिज हो, चश्मा नंबर पहिनहिं सं बेसी हो तं ग्लौकोमाक सम्भावना बेसी.
3. बढ़इत वयसमें वर्षे-वर्ष आँखिक जांच अवश्य कराबी; नियमित जांच आरभिक अवस्था में रोग पकडि लैछ .  तें, आँखिक नियमित जांच अन्धताक विरुद्ध अभियांमें कारगर अश्त्र थिक.
4. आँखिक कोनो दोषकें मामूली नहिं बूझी; नेत्र-चिकित्सकक सलाह अवश्य ली.

नोट: हमर ई लेख 'भारती-मंडन' पत्रिकाक अंक -14 / नवक्रमांक-२ में हालहिं में प्रकाशित भेले. 


Thursday, August 30, 2018

भोजपुरी गीताक मैथिली भाषी रचयिता स्व. डा. उमेश झा


स्व. डा. उमेश झा 'गीता भाव प्रकाश' प्रतिद्वंदी भाषा सबहक बीचक परस्पर विद्वेषक विरुद्ध प्रखर उद्घोष थिक ! 
मातृभाषा-प्रेम स्वाभाविक थिक. किन्तु, आन भाषक प्रति विद्वेष मातृभाषा-प्रेमक वीभत्स रूप थिक. सत्यतः, एकसं अधिक भाषा बजबाक -लिखबाक क्षमता गुण आ सशक्तीकरण  दुनू थिक. अपन एही क्षमताक कारण भोजपुरी गीताक रचयिता स्व. डा. उमेश झा मैथिल कवि लोकनिमें अपरिचित, किन्तु, अद्वितीय छथि. किएक ? से, कनेक रहि कय.   
स्व. डा. उमेश झा

इतिहास विदित अछि, स्वतंत्र भारतमें करीब आधा शताब्दी धरि हिंदी-अंग्रेजीक अतिरिक्त केवल करीब गोड बीसेक भाषाकें संविधानक आठम अनुसूचीमें स्थान रहैक. फलतः, आठम अनुसूचीसं बाहर भाषा-भाषीकें हीनताक बोध हयब स्वाभाविक. ततबे नहिं, सरकारी मान्यताक अभावमें बहुतो भाषाने अपन क्षेत्रमें शिक्षाक माध्यम छल आ ने  ओहि भाषासब कें समुचित सरकारी सहायता भेटैत छलैक. एहिसं मैथिली-सन भाषाकें जे हानि होइत छलैक से सर्वविदित अछि. तथापि, सरकारी परश्रयक अभाव नागरिक भाषा-प्रेम कें निर्मूल नहिं कय सकल. हं, ओहि समय में अपन भाषाकें उचित अधिकार दिअयबाक अभियानमें जुटल बहुतो गोटेक धारणा रहनि – आ से निराधार नहिं – जे हिन्दीक बोझ मैथिलीक डांड तोडि रहल छैक;  भोजपुरिक सरकारी मान्यता भेटतैक तं मैथिलीकें कमजोर हयत ; बज्जिका पृथक भाषा नहिं, मैथिलीक भिन्न स्वरुप थिक,आदि. 
किन्तु, भाषा- आ साहित्य-प्रेमक एकटा दोसरो पक्ष अछि: भाषा-साहित्यक समर्थक आ विरोधी लोकनिक एहि परस्पर द्वन्द आ विद्वेषसं दूर एक दिस जं कतेको व्यक्ति अपन स्वतः प्रेरणाक बलें मातृभाषा आ राष्ट्रभाषामें सृजन करैत  यात्री-नागार्जुन, आरसी प्रसाद सिंह-जकां दुनू भाषामें प्रसिद्द भेलाह, तं, दोसर दिस  प्रचार आ प्रसिद्धि सं दूर आन कतेको गोटे मातृभाषाक संग आन पड़ोसी भाषामें निःस्वार्थ भावे सृजन करितो विस्मृत भ गेलाह. एहि दुनू कोटिक साहित्यकारक दोसर कोटिक कवि स्व. डॉ उमेश झा एहने साहित्यकार छलाह जनिक भोजपुरी गीता, अपना-सन अपने-टा होइतो अपरिचयक गर्भमें पड़ल अछि. विश्वास नहिं हो, तं, गूगल पर मैथिली-गीता टाइप करू पहिल परिणाम में भोजपुरी भाषाक कोनो वीभत्स गीतक विडियोक लिंक भेटत: गीता रानी सौंग ! अस्तु, हमर ई लेख स्व. डॉ उमेश झा एवं हुनक भोजपुरी गीता आ भोजपुरी सृजन पर केन्द्रित अछि. ज्ञातव्य थिक, डॉ उमेश झाक दरभंगा-लहेरियासराय परिसरमें करीब पचास वर्ष धरि स्वास्थ्य सेवा ( दरभंगा-लहेरियासराय केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट संघ केर प्रमुख), राजनीति (युवा कांग्रेस केर अध्यक्ष), पत्रकारिता ( हिन्दी मासिक ‘त्रिकाल नूतन भारतीक सम्पादक प्रकाशक आ दरभंगा जिला पत्रकार संघ केर अध्यक्ष), समाज सेवा ( दरभंगा स्टेडियम निर्माण समिति ) आ शिक्षाक क्षेत्र (लहेरियासराय पब्लिक स्कूल एवं JMIT दरभंगाक संस्थापक सदस्य ), एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानीक रूप में सक्रिय रहथि. 
ततबे नहिं, ओ अवाममें अपन आवास परिसरहिंमे रमानाथ जन पुस्तकालय क स्थापना सेहो केने रहथि.दुर्भाग्यवश, कमलाक बाढि आ ग्रामीण लोकनिक उदासीनताक कारण ई सुन्दर संस्था आई निर्मूल भ चुकल अछि.
किन्तु, हुनक मृत्यु लगभग सत्रह वर्ष पछातियो हुनक प्रकशित व अप्रकाशित रचना सब ओहिना पड़ल अछि.
दरभंगा जिलाक अवाम ग्राम निवासी स्व. डॉ उमेश झाक जन्म विगत शताब्दीक तेसर दशकमें हिनक मात्रिक तत्कालीन चम्पारण जिलाक ओझा-बरबा गाओं में भेल रहनि. अपन मात्रिकहिक समीप मच्छरगांवा नामक स्थानमें मिडिल स्कूल धरिक शिक्षाक पछाति हाई स्कूलक शिक्षाक हेतु डॉ उमेश झा तहियाक दरभंगा जिलाक मधेपुर हाई स्कूलमें किछु दिन पढ़ने छलाह. किन्तु, पारिवारिक कारण आ स्वतंत्रता संग्राममें सहभागिताक कारण ओतय हिनक शिक्षा पूर्ण नहिं भ सकलनि. तहियाक मिथिलांचलमें आर्थिक विपन्नता घर-घरमें डेरा जमओने छल. अस्तु, जकरा जतबा ऊहि आ अवगति छलैक जीविका तकैत छल. डॉ उमेश झा सेहो मेडिकल व्यवसायक बाट धेलनि आ चालीस आ पचासक दशकमें लहेरियासराय परिसरमें पहिने प्रसिद्द फिजिशियन डॉ भवनाथ मिश्र आ पछाति सर्जन डॉ कपिलदेव प्रसादक सहायकक रूपमें जीविकोपार्जन आ समाजसेवा दुनू केलनि आ समाजक आदर पओलनि. पछाति, ओत्तहि भारत फार्मेसी नामक प्रतिष्ठान चलबैत पूर्ववत आजीवन समाज सेवा सं जुड़ल रहलाह.
डॉ उमेश झाकें नान्हिए टा सं कवित्व आ सामाजिक चेतना दुनू रहनि. जकर प्रमाण कमे वयस नेना लोकनिक हेतु हिनक रचल वर्णमाला पर आधारित पद सब हुनक कतेको पड़ोसी आ परिवारजनकें सुनल हेतनि. युवावस्था में अपन गामक समवयस्क सबमें साक्षरताक अभियान हुनकर सामाजिक चेतनाक ज्वलंत उदहारण थिक. हुनक चटिसारक साक्षर व्यक्तिसब में ओ आजीवन ‘ मास्टरे साहेब’ छलाह. अवामक नब्बे वर्षीय हरिदास आब ओहि ओहि चटिसारक अंतिम जीवित सदस्य छथि.    
आब एहि लेखकेर मूल विषय- बहुभाषाक सहअस्तित्व- पर आबी. स्व. उमेश झाक माता स्व. गंगावती देवीक मातृभाषा भोजपुरी रहनि. किन्तु, ओ छोटे वयसमें बियाहि मिथिलांचल आबि गेल छलीह. अस्तु, क्रमशः ओ मैथिलीकें अपनबैत मैथिली-भाषी भ गेलीह. किन्तु, बाल्यावस्थामें लागल माईक भाषाक लसेढ़ पछाति अपन प्राथमिक शिक्षाक अवधिमें भोजपुरी प्रेमक रूप लेलक आ मैथिली-भोजपुरी दुनू  स्व. उमेश झा मातृभाषा भ गेल; यद्यपि, हुनका अपन माताक संग भोजपुरीमें गप्प करैत हमरालोकनि कहियो सुनने नहिं छियनि. तथापि, जीवनपर्यंत स्व. उमेश झा अपन भोजपुरी-प्रेम कें ‘तूफान का दिया’-जकां जोगा कय रखने रहलाह. हुनक भोजपुरी-प्रेम हुनक मृत्यु ( 2000 ई ) सं किछुए दिन पूर्व फलीभूत भेलनि जखन ओ श्रीमद्भगवद्गीताक भोजपुरी अनुवाद ‘गीता भाव प्रकाश’ क नामें प्रकाशित कयलनि. जहां धरि स्मरण अछि, हम करीब तीस वर्ष धरि स्व. उमेश झाकें  भोजपुरी-गीता पर काज करैत देखने छियनि. अनुवादक पद्यकेर लय आ तुककें परिमार्जित करबाक हेतु ओ प्रतिदिन अहल भोरे गीताक अनुवादके ल कय अपन लहेरियासराय आवासक बरामदा पर बैसि गीताक सस्वर पाठ करैत छलाह. चूकिं, हुनक आवासक ओ बरामदा बाटक कातहिं रहनि, तें, ई दृश्य बहुतो कें देखल हेतनि,से सम्भव. संयोगसं स्व. उमेश झा हेतु माईक भाषा (भोजपुरी), मातृभाषा (मैथिली), आ राष्ट्रभाषा (हिन्दी) प्रति क प्रेमक बीच कोनहु द्वन्दकेर अनुभव नहिं भेलनि. एकर प्रमाण थिक तीनू भाषामे हिनक समान योगदान. सम्भव अछि, एहि तथ्य सं बहुतो अभिग्य होथि. जं एकदिस ई भोजपुरी गीताक रचना कयलनि तं दोसर दिस भर्तृहरिक नीति, श्रृंगार आ वैराग्य शतककेर मैथिली अनुवाद मैथिलीक पीडी पर हिनक अर्पण थिक. दुःखक विषय जे हिनक मृत्युक एतेक दिनक पछातिओ ई कृतिसब अप्रकाशिते अछि. एकर अतिरिक्त प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंहक जीवनपर आधारित लघु काव्य कृति ‘वीर कुंवर सिंह’ एवं भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गाँधीक प्रशस्तिमें रचित ‘भारत की महान बेटी’ राष्ट्रभाषामें हिनक योगदान थिक, जे सत्तरि दशकमें प्रकाशित भेल छल. ज्ञातव्य थिक, हिन्दी एहि दू प्रकाशित कृतिक अतिरिक्त हिन्दीमें हिनक आओर अनेको कृति एखनहु अप्रकाशित छनि. ततबे नहिं, एहू सं बेसी दुःखद विषय सुनू . हम कौतूहलवश ई तकबाक प्रयास कयल जें स्व. उमेश झाक गीता भाव प्रकाश सं भिन्न आन कोनो गीता भोजपुरी में छैक, कि नहिं. एखनुक युगमें ई सब गप्प एखुनका सर्वग्य गूगलकें छोडि ककरा पुछबनि. अस्तु, हम ‘गूगल सर्च पेज’ पर भोजपुरी गीता सर्च कयल तं परिणाम में गीता तं नहिं भेटल, किन्तु, क्षण मात्रमें सम्पूर्ण गूगल पेज वीभत्स ‘भोजपुरी गीत’ सबसं भरि गेल ! हमरा अपन प्रश्नक उत्तर भेटि गेल: एक, भोजपुरीमें गीता भाव प्रकाशक अतिरिक्त भगवद्गीताक दोसर अनुवाद नहिं छैक; दू, भोजपुरीमें गीताक अनुवाद छ्पलो छैक तकर अनुमान, जनसाधारणक तं गप्प छोडू, ‘गूगुल’ बाबा धरि कें नहिं छनि! 
भोजपुरी गीताक सम्बन्धमें स्व. उमेश झा कहथिन, ‘महिसक पीठ पर बैसि महिस चरबैत महिसबारहु कें जं मोन हेतैक तं ई गीता ओ पढ़ि, आ बूझि लेत.’ दुःखद थिक, हुनकर (भोजपुरी) गीता भाव प्रकाश प्रचारक अभाव में , एहन आनो कतेक ग्रन्थ जकां विस्मृत पड़ल अछि. किन्तु, भाषा साहित्यक जीवनमें ई समय बहुत नहिं. ककरा कहिया कोन विस्मृत कृति नव आविष्कार बूझि पड़ैक आ बिसरल ग्रन्थ स्वतः प्रकाशमें आबि चमत्कृत भ जाय.  
हमरा जनैत, मैथिली-हिन्दी-भोजपुरीमें स्व. उमेश झाक समान साहित्यिक योगदान केवल हुनक राष्ट्रीय दृष्टिक द्योतके टा नहिं पड़ोसी भाषा साहित्यक बीचक परस्पर विद्वेषक विरुद्ध प्रखर उद्घोष थिक ! दुःखद अछि, हुनक गांओ में एहि स्वतंत्रता-सेनानी आ साहित्यिक मूक साधकक आइ कोनो  स्मारक नहिं अछि. 

Friday, July 20, 2018

ICU क बेड आ एकटा बिसरल सुखद अनुभव

रोग आ मोन 
'कुमार सम्भव' नामक ग्रन्थमें कालिदास कहैत छथि :
शरीरमाद्यम खलु धर्म साधनं .
सत्यतः, शरीरे सब धर्म साधनक सोपान थिक. सैनिकक जीवन में शरीरक ततबे प्रधानता छैक जे , शरीरक बलिदाने सर्वोत्कृष्ट सेवा बूझल जाइछ. ' वीरभोग्या वसुंधरा' शरीरेक बलि तं लैत  छथि.
संयोगसं शरीरे भंगठि गेल. कोनो तेहन नहिं, मुदा, भंगठल तं छले. अस्तु, मशीन हो वा शरीर, एकरा सब कें चालू रखबा ले तुरत मरम्मति चाही. हमर माता कहथि, ' रोग आ शत्रु कें थोड़ नहिं बूझी'. अस्तु, मरम्मति तुरत हो.
 हमर डाक्टरी जीवनक वृहत भाग चिकित्सा सेवा कोर (AMC) में बीतल अछि. अस्तु, ओकरे शरण लेल:
वायु सेना कमांड अस्पताल बंगलोर. 
अस्पताल आ डाक्टरी वृत्तिक एकटा रोचक पक्ष छैक : रोगक चिकित्सा करैत-करैत चिकित्सक लोकनिमें रोगक प्रति एकटा निरपेक्षता आबि जाइत छनि. फलतः, डाक्टरी व्यवसाय सं जुड़ल व्यक्ति लोकनिक ई भाव प्रायः हुनका लोकनिक चेतना में नहिं अबैत छनि. किन्तु, रोगी के एहि सं एहन सन भान होइत छैक जे डाक्टर हमर रोगकें तेहन प्रधानता नहिं देलनि, जेहन देबाक चाहियनि. डाक्टर लोकनिके डाक्टरी व्यवसायक ई पक्ष एकाएक तखने चेतना में अबैत छनि, जखन ओ लोकनि स्वयं रोगी बनि अस्पताल जाइत छथि. अस्तु, अस्पताल में गेलहुं तं डाक्टर पुछ्लनि, ' अमुक ऑपरेशन करेबाक अछि ने, भर्ती भ जाउ '. आ भर्तीक आदेशक कागज़ हाथमें थम्हा देलनि. मोन  भेल कहियनि, 'डाक्टर अहाँ छी. अहाँ कहू, अहाँ हमराले अहाँक की सलाह, अहाँ की करब ?.' मुदा, हमरा हंसी लागि गेल. हमरो लोकनि तं पुछैत छियैक, ' मोतियाविन्दुक ऑपरेशन करेबैक ?' रोगी लोकनि, हमरे जकां हंसैत हेताह !  किन्तु, बिनु किछु कहने intensive care unit में टहलैत गेलहुं आ भर्ती भ गेलहुं.
दस टा बेड केर इंटेंसिव केअर यूनिट. हमरा अतिरिक्त आन सब रोगी जीवन-मृत्युक बीच संघर्ष में. करीब सोलह वर्ष पहिने हमहूँ एहि अस्पताल में काज करैत रही. स्टाफ आ चिकित्सक ताहि दृष्टिए सजग रहथि, जाहि सं  हमर सेवामे कोनो कमी नहिं हो. हमरा कोनो तात्कालिक समस्या वा पीड़ा नहिं. पहिल बेर अत्यन्त सीरियस रोगी सबहक बीच 'रोगी-जकां' पड़ल रही; हमरा पचीस वर्षक सेना सेवामें सेहो एक बेर एक-दू दिन ले अस्पतालमें भर्ती होमय पड़ल छल. एतय आइ किछुए काल में एतुके पुरान सहकर्मी डाक्टर आ अत्यन्त सीरियस हुनक पत्नी पर नज़रि पड़ल. हाल-चाल पुछलियनि. पता चलल, ओहि डाक्टरक एकदम तन्दुरुस्त पत्नी अचानक भयानक संक्रमण (infection) सं पीड़ित भ जानलेबा परिस्थिति में एतय आयल छथिन. ई प्रायः ओहि सुपर-बग (दुर्दान्त रोगाणु ) क प्रसारक असर थिकैक जे एखन एंटी-बायोटिकक दुरुपयोगक कारण सर्वत्र पसरि चिकित्सा व्यवसायक  हेतु भयानक चुनौती बनल जा रहल अछि.
दोसरा दिन भोर में अस्पतालक कमांडेंट अयलाह. संग में आधा  दर्जन आओर  विशेषग्य आ प्रशासनिक अधिकारी लोकनि. ओहि में बहुत गोटे  चिन्हलो निकलि गेलाह. कमांडेंट मुसुकाइत कहलनि, 'सर , ऐना किएक पड़ल छी ? अहाँ तं तेहन  बीमार नहिं '. मने मोन  कहलहु, intensive care unit में छी. आओर की करब !
दोसर दिन  जांच-पड़ताल, चिकित्सा ले निर्धारित छल. प्रायः नौ बजे , लेबोरेटरी धरि गेलहुं. पत्नी संग में छलीह, बाहर प्रतीक्षा-कक्ष में बैसलिह. हमर मोन  भाव शून्य छल: ने कथुक चिन्ता, ने ककरो स्मरण. अस्पतालक ऑपरेशन थिएटरमें ने परिवारजनक कोनो सक्क, आ ने भगवानक कोनो भरोस. सत्यतः, जनिको विश्वास छनि , भगवान जं छथि , तं, भरोस मात्रे थिकाह. जीवन अस्पताले में बीतल अछि. हमरो लोकनि रोगी सं सम्मति (informed consent )  लैत छियैक, जाहि सं जांच वा  चिकित्साक अप्रत्याशित दुष्प्रभावसं भेल कानूनी दावा सं बचाव हो. हमहू सम्मति देनहि छलियैक. माने, नीक वा बेजाय जे किछु करबाक होइक, डाक्टरक निर्णय पर हमरा पूर्ण विश्वास अछि  आ डाक्टरकें हमरा हेतु सब निर्णय लेबाक पूर्ण स्वतंत्रता छनि. तखन चिंता कथिक. हमरा मात्र टेबुल पर पड़ल रहबाक अछि. भेबो सेह कलैक. टेबुल पर पड़ल रही तं डाक्टर सं सामान्य गप्प होइत रहल. ओ रांचीक थिकाह. हम एखन मेडिकल-टीचिंग में ( वरिष्ठ प्रोफेसर )  छी, से बूझल छनि. हम निर्भीक रोगी छी, से कहलनि. रोग आ चिकित्साक किछु विन्दु विमर्श केलनि. मुदा, हम सोझे कहलियनि, 'अहाँ के जे उचित लगैछ करू'. बीस मिनटक पछाति बाहर.  पेशेंट-ट्राली पर बाहर-भीतर अस्पताल केहन लगैत छैक से पहिले बेर बुझबामें आयल. अस्पतालक बिल्डिंगकेर सपाट सीलिंग. आँखिक सोझां गोल-गोल, भटरंग फूल; प्रायः जांच-पड़तालक दोष, दस मिनटमें बिला गेल.  
डाक्टर बाहर भ' हमर पत्नी सं गप्प सप्प केलखिन; सेना चिकित्सा कोर परिवारक ई दस्तूर हमर पत्नी कें नीक लगलनि.
दस मिनटकेर बाद हमर पत्नी होटल विदा भेलीह आ हम ICU. एतेक वयस भ गेल. मुंहमें कहियो केओ भोजन करौने हयत से मोन  नहिं. आइ नर्स लोकनिक हिदायत छल, बिछाओन पर उतान भेल पड़ल रहू. पयर नहिं हिलाबी. बड़ बढ़िया. एतेक दिन हम अपने रोगी सब कें हिदायत दैत आयल छियैक. आइ अपनो अनुशासन मानी. बड बेस.
एक कप भात, कनेक तरकारी आ कनिए किछु आओर खेलहु आ बिछाओन पर पड़ल रही. जनवरीक मास. बंगलोर में तं बारहो मास मौसम अनुकूले रहैत छैक; जीवनक करीब चारि सुखद वर्ष एतय बितौने छी. बेरुक पहर. ICU क लम्बा-चौड़ा खिड़की सब  पश्चिम दिस. पूबे पश्चिमे हौस्पिटलक बेड, आ पश्चिम दिस माथ.   खूजल खिड़की सं अचानक जाड- मासक मृदु आ सुखद रौदक एकटा टुकड़ी कपार पर पड़ल. लागल जेना कोनो आप्त परिचायकक सुखद-उष्ण तरहत्थीक स्पर्श भेल अछि. हम आंखि मूनि लेल. जेना सुखद मालिशक स्पर्शक  आंनदसं  शरीर शिथिल होमय लगैत छैक हमर शरीर एकाएक शवासनक मुद्रा में आबि गेल. पसरइत  रौद  क्रमशः मूनल आंखि, छाती सं ल कय सम्पूर्ण शरीर धरि पसरइत गेल, आ हमरा बिसरि गेल जे हम ICU में छी. भेल जेना नबका चाउरक भातक संग कठतिमनाक झोरक भरि पेट भोजनक पछाति अगहनक मासक मृदुल हेमंती रौदमें  बीच अंगनामें धानक झट्टा, पाटिया वा पोआर पर कल्याण करोट देने होइ. सत्यतः, बंगलोरक वायुसेना अस्पतालक ICU क बेड पर जाड मासक रौद एकटा बिसरल सुखद अनुभवकें एतेक दिनक बाद सहजे हमर चेतना में आनि  देलक-ए.          

Wednesday, July 4, 2018

भू पू आ नेपालमें भारतीय सेनाक मेडिकल कैंप

सेवानिवृत्त गोरखा सैनिक  (भू पू ) आ परिवारजनक सेवा
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्र विप्लवे
राजद्वारे श्मशाने च यः तिष्ठति सः बांधवः
एकरा कनेक फरिछा क कहैत छी:  उत्सव, व्यसन, अकाल, गृह-युद्ध,राजाक दरबार, शोक-श्मशान-भूमि में जे निरंतर संग  दिअय वएह मित्र थिक, से  संस्कृतक ई सूक्ति कहैछ.सत्य कही तं, नेपाली  मूलक गोरखा सैनिक आन भारतीय-सैनिक आ भारत देश ले एहने बान्धव थिकाह. अस्तु,भारत सरकार आ भारतीय  सेना भूतपूर्व गोरखा सैनिक ( भू. पू .) आ हुनका लोकनिक परिवारजनक हितसाधन ले कृतसंकल्प अछि.  भारतीय सेना में गोरखा लोकनिक सहभागिताक कारण, सेवानिवृत्त गोरखा सैनिक लोकनिक द्वारि पर पेंशन आ मेडिकल सुविधा पहुंचयबाक भार भारतेक थिकैक. काठमांडूक भारतीय दूतावासक अधीन कार्यरत Indian Ex-servicemen  Welfare Organisation in Nepal  (IEWON) गोरखा लोकनिक हेतु ई कार्य करैछ.
भारतीय सरकार एहि हेतु नेपाल में काठमांडू, पोखरा, आ धरान में स्थायी पेंशन- वितरण कार्यालय खोलेने अछि. पेंशन- वितरण कार्यालय  काठमांडू स्थित  भारतीय दूतावासक देखरेखमें कार्य  करैछ. एहि सब स्थायी प्रतिष्ठानमें  भारतीय सेनाक मेडिकल ऑफिसर सेहो पोस्टेड होइत छथि. किन्तु, नेपाल-सन पैघ देश आ अनेको दुर्गम इलाकाक भू. पू. सैनिक लोकनिक हेतु एहि सुविधाक उपयोग असम्भव . अस्तु, भारतीय सेना मुख्यालय आ काठमांडूमें भारतीय दूतावासक तालमेलसं भारतीय सेना प्रत्येक वर्ष नेपालक विभिन्न दूर-दराज़ इलाकामे पेंशन पेइंग कैंपक संग मेडिकल कैंपक आयोजन करैत आयल अछि. एहि कैंपमें मेडिकल स्पेशलिस्ट, दांतक डाक्टर, नेत्र-चिकित्सा विशेषग्य, आ आन अनेक प्रकारक विशेषग्य दू- चारि-छौ-आठ  हप्ताक हेतु माल-असबाब- औषधि आ ऑपरेशनक उपकरण ल कय नेपालक अनेक दूर दराज़ इलाका धरि जा कय ओतय  कैंपक आयोजन करैत छथि  एवं भूतपूर्व सैनिक हुनका लोकनिक परिवार जनक चिकित्सा  करैत छथि.  सेना सेवा क अवधि में दू बेर- 1995 आ 2006में - हमरा एहि वेलफेयर कैंप के ल कय नेपाल जेबाक अवसर भेटल. एहि लेखमें ओही नेपाल प्रवासक झलक भेटत. 
ज्ञातव्य थिक, भारतक सब पड़ोसी लोकनिक बीच नेपालक स्थान  विशिष्ट अछि. ओना तं पाकिस्तान-बांग्लादेश तं  बाँटल भाई थिक. किन्तु , एहि देश सब सं हमरा लोकनिक सम्बन्ध सेहो बाँटले भाई-जकां: माने , सौहार्द्र सं ल कय गरदनि-कट्ट शत्रुता धरि . भारत-नेपालक बीचक  सम्बन्ध सेहो पड़ोसी देश सबहक  बीचक  संबंधक गुण-दोषसं ऊपर तं नहिं, किन्तु, भिन्न अवश्य छैक. खूजल सीमा पर निधोख आवाजाही, एक दोसराक देशमें वाणिज्य-व्यापार, नौकरी, आ कुटमैती करबाक स्वतंत्रता आ भारतीय सेनामें नेपाली नागरिक लोकनिक सहभागिता. यद्यपि, भारतमे अंग्रेजक शासनक अमलसं चल अबैत नेपाली नागरिकक भारतीय सेना में सहभागिता यदा-कदा नेपाली जनमानस में राष्ट्रिय अस्मिताक प्रश्न उठबैछ. किन्तु, एहि में की परिवर्तन हो से नेपालक इच्छा आ दुनू पड़ोसिक सहमति पर निर्भर करैछ. अस्तु,  एहिमें   युगक अनुकूल परिवर्तन ले दुनू देश इच्छुक छथि किन्तु, जा धरि यथा स्थिति अछि,  दुनू पड़ोसी  दायित्वक निर्वाह ले वचनबद्ध छथि. 
सीजनल पेंशन पेइंग कैंप आ मेडिकल कैंप
जहिया गाम घरमें सब ठाम बैंकक कोन  कथा, गाम-गमाइत जायब-आयब धरि मोश्किल रहैक मासे-मास सेवानिवृत्त सैनिक धरि पेंशन पहुंचायब  कठिन रहैक. एहि समस्याक समाधान ले नेपाल स्थित पेंशन पेइंग ऑफिस सब मोटा-मोटी छौ-छौ मास पर विभिन्न इलाका में सीजनल पेंशन पेइंग कैंपक आयोजन करैत छल. भारत सं गेल मेडिकल टीम एहि सीजनल कैंपक दौरान पेंशनर लोकनिक चिकित्सा करैत छलाह. आब नेपाल मैदानी इलाकामें  बैंकिंग सेवाक प्रसारक कारण एहि कैंप सबहक प्रासंगिकता नहिं रहि  गेल छैक, आ बहुतो गोटेक पेंशन नियमतः हुनका लोकनिक बैंक खतामें सोझे चल जाइत छनि. किन्तु, दूर-दराज़क लोककें  एखनहु यातायातआ असुविधा आ बैंकिंग सुविधाक अभावमें पेंशन कैंप आयब दुर्निवार होइत छनि. जे किछु. किन्तु , आइ सं बीस वर्ष पूर्व पहिने नेपाल में ई पेंशन कैंप सब  एकटा सामाजिक उत्सवक रूप ल लैत छल, जकर रोचक स्वरुप हमरा एखनहु स्मरण अछि. एहि लेख में तकरे किछु चित्र आ संस्मरण भेटत.
काली गण्डकी : साभार गूगल इमेज 

कलिका मन्दिर, बागलुंग : साभार गूगल इमेज 
पोखरा सं दूर बागलुंग गाओं. हालहिं में चीन सरकारक सहायता सं  पोखरासं बागलुंगक रोडक  निर्माण भेलैये. गाँवमें प्रवेश सं पूर्व कालीगण्डकी नदीपर पुल. गाओंक बाहरे कालीक मन्दिर. गाँवक आरम्भहिं में डिस्ट्रिक्ट सोल्जर बोर्ड केर परिसर. भारतीय गोरखा सैनिकक डिस्ट्रिक्ट सोल्जर बोर्डक परिसर प्रायः नेपालक ओहि  प्रत्येक इलाका में भेटत जतय गोरखा भूतपूर्व ( संक्षेप में, भू पू ) सैनिकक सघन जनसंख्या छनि. एही सब इलाकासं गोरखा सैनिक लोकनिक भारतीय सेना में भर्ती सेहो होइत छथि. एहू बेर गोरखा रिक्रूटिंग डिपो (GRD) कुनराघाट, गोरखपुरसं भारतीय सेनाक रिक्रूटिंग टीम एतय आयल अछि. भर्तीक दिन एतय  उम्मीदवार सैनिक लोकनिक फूटे मेला लागत.
जेना कहलहुं, नेपालक दूर-दराज़ इलाका में पेंशन कैंप  एकटा सामाजिक उत्सवक रूप ल लैछ. सत्यतः, उत्सवले सबसँ मूल छैक अर्थ. टाका नहिं हो तं पाबनिओ-तिहार  में लोकक धिया-पूताक मुंहमें जाबी लागल रहि जाइत छैक , आ जेब में टाका हो तं जीवने उत्सव  थिक. अस्तु, जखन पेंशनरकें एकमुश्त छौ मासक पेंशन भा रू ( माने भारतीय रुपैया में भेटैत
छनि तं किएक ने हो उत्सव ! तें, पेंशन पेइंग कैंप के अयबासं पूर्व पेंशन कैंपक बाहर छोयला, सेकुवा-भुटुवा- तास-झिर, मधुर मिठाई सं ल कय सोना-चानी,कपड़ा-लत्ता, अन्न-पानिक वणिज सं ल कय मदिरालय आ वेश्यावृत्ति धरिक दोकान-हाट-बजार रातिए-राति
 तहिना जनमि जाइछ, जेना नीक अछार  बरखा पडला सं बंजरो भूमिमें  जहत्तर-पहत्तर दूबि पनुकी दिअय लगैछ.
हम कोनो वैज्ञानिक प्रमाण देबाक स्थितिमें नहिं छी. किन्तु, हमर अनुमान अछि, स्वस्थ शरीर आ संयमित-अनुशासित जीवन पद्धतिक कारण सैनिक लोकनिक आयु आम नागरिक सं दीर्घ होइछ. एकर अनेक प्रमाण हमरा नेपाल में भेटल; खाटपर लदि दू-दू तीन दिनक यात्राक पछाति 90- 95 वर्षक आयुक भू पू क कैंप में आयब कोनो आश्चर्य नहिं. आ जखन पेंशन ले एते दूर आयले छी, टाका भेटिए गेल तं बुतादक सामानक संग घर-गिरहस्तीक वस्तुक कीनब- बेसाहबक संग, मुफ्त  दर- दवाई, मोतियाबिंदक आपरेशन, चश्माक व्यवस्था, दांतक चिकित्सा- नकली दांतक जोगार सेहो भइए जाय. एहि मामला मेंं सीजनल पेंशन-कैम्प हमरा अद्भुत लागल. एहि सब कथुक संग पेंशन-कैम्प क समयमें भारतीय सेनाक रिक्रूटमेंट रैली भू.पू. लोकनिक हेतु सोनापर सोहगा साबित होइछ.
एहि पेन्शन कैम्प सबहक एकटा आओर  मार्मिक पक्ष छैक जकर संबंध सैनिक- जीवन सं छैक.
सैनिक जीवनक पुरान सहकर्मी, Comrade-in-arms, सबसं भेंट घांट.  पेंशन कैम्प पुरान, बिछुडल वंधु-बांधव सं भेंट-घांट आ एक दोसराक संग  पुरान संबंधकें पुनः जिययबाक अनुपम अवसर दैछ.  भू.पू. लोकनि पुरान परिचित सबसं अपन रेजिमेंट क खोज- खबरि लेताह। अपना जमानाक जुनियर अफसर क नबका ओहदा देखि प्रशन्न हेताह. नब सैनिक लोकनिक संग अपन रेजिमेंटल अतीतक खीसा- पिहानी क आदान-प्रदान करताह. सत्यतः, हमरा पूछी तं लोक दुइएटा समयकें अफशोस वा मात्सर्य सं मोन पाडैछ, चाहे तं खूब आनंद क दिन वा बड कठिन दिन. सैनिक जीवनक अवधि मेंं ई दूनू सन्निहित होइछ. तें, सैनिक ओहि अवधिकें आश्चर्यनक nostalgia क संग स्मरण करैछ. ईएह कारण थिकैक जे हम यदाकदा अपन सहकर्मी लोकनिकें कहैत छियनि,  'जं अगिला जन्म मेंं नौकरी करबाक मौका लागत तं पुनः भारतीये सेनाक नौकरी धरब' !

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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