Wednesday, November 10, 2021

श्रीशैलम-यात्रा

 

 श्रीशैलम-यात्रा

कलौ स्थानानि पूज्यन्ते’. ई कहावत विद्यार्थी जीवन में सुनने रही. किन्तु, पूजा नहिओ करबाक हो तँ नव-नव स्थान में सब ठाम एकाधिक रूचिक आकर्षण भेटिए जायत. एहि  बेर  मल्लिकार्जुन स्वामीक तीर्थ आंध्रप्रदेश राज्यक श्रीशैलम  यात्रा हेतैक. श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग थिकाह आ  श्रीशैलम धार्मिक महत्व छैक.

श्रीशैलम सड़कसँ देशक सब भाग सबसँ नीक जकां जुड़ल अछि. तें, हमरा लोकनि पांडिचेरीसँ अपनहिं कारसँ सोझे ओतय जयबाक नेयार कयल. हवाई जहाजसँ दक्षिणक कोनो पैघ शहरसँ , जेना, बंगलोर, हैदराबाद, चेन्नईसँ श्रीशैलम लग नहिं. यात्रा पोंगलक पछाति, 16 जनवरी 2019 क भोरे पांडिचेरीसँ आरंम्भ भेल. संग में पत्नी आ सासु रहथि. यात्रा में बारहसँ चौदह घंटा लागत. तें, अहल भोरे विदा भेलहुँ.

यात्रा में एहि बेर हमरा लोकनि परशुराम नामक स्थानीय तमिल ड्राइवर कें संग केलहुँ. परशुराम हमरा लोकनिक संग अनेक बेर चेन्नई  यात्रा तं केनहिं छलाह ओ हमरा लोकनि कें रामेश्वरम धरि ल’ कय गेल रहथि. तें, एहि बेरुक लम्बा यात्राक हेतु हुनके संग कयल. मुदा, परशुरामक शर्त रहनि जे ‘पोंगल पाबनि में ओ बाहर नहिं जायब’. तें हमरा लोकनि पोंगलक पछातिए श्रीशैलम प्रोग्राम बनलैक. ओहुना, पर्व त्यौहारक अवसर पर तीर्थाटनसँ बचबे नीक.

यात्राक पहिल चरण, पांडिचेरीसँ  वेल्लोर करीब तीन घंटा. वेल्लोर क्रिस्चियन मेडिकल कालेज अस्पताल में उपलब्ध उत्तम मेडिकल सुविधाक हेतु सम्पूर्ण देश में प्रसिद्द अछि. मुदा, वेल्लोरक संबंध में जे गप्प बेसी लोक कें नहिं बूझल छैक ओ थिक भारतक स्वतंत्रता संग्रामसँ  वेल्लोरक संबंध. तें आइ कनेक ओकर गप्प कइए ली.

वेल्लोर किला आ सिपाही विद्रोह,1806 ई.

1806 केर 10 जुलाई केर दिन वेल्लोर किला प्रायः भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक ओ पहिल बिगुल बाजल छल जकर प्रतिध्वनि उत्तर भारत में आधा शताब्दीक पछाति 1857 में बाजल. एहि विद्रोहक अहल भोरेक आक्रमण में ब्रिटिश सेनामें कार्यरत करीब 500 सौ सिपाहीक हाथे करीब 200 ब्रिटिश सैनिक आ अफसर मारल गेल छलाह. इतिहासकार राजमोहन गाँधी कहैत छथि, ‘10 जुलाई 1806 क अहल भोरे अकस्मात् भेल भारतीय सैनिक लोकनिक ई विद्रोह ब्रिटिशक हाथें टीपू सुल्तानक पराजयक कारण उपजल असंतोषक परिणाम छल.’

मुदा, आन श्रोतसँ एहि विद्रोह आनो कारणक उद्घाटन होइछ, जाहि में मूल छल अंग्रेज शासक द्वारा सैनिक लोकनिक धार्मिक आस्था पर प्रहार. एकर अतिरिक्त, ओहि समय में फ़कीर लोकनि दल चुपे-चुप दक्षिण भारत में  जे अभियान चलबैत रहथि. हुनका लोकनिक अभियानक संदेश छल जे ‘ अंग्रेज संख्या में थोड़ अछि , हमरा लोकनिक समुदाय पैघ अछि’, अर्थात् हमरा लोकनि अंग्रेज कें पराजित कए सकैत छी,  केर असरि सेहो एहि विद्रोह आगि कें हवा देलक से इतिहासकार लोकनि मानैत छथि. दुःखद थिक, भारतक  स्वतंत्रता संग्राम में वेल्लोर सिपाही विद्रोहकें जेहन प्रधानता भेटब उचित थिक एकरा नहिं भेटैछ.

एहि विद्रोहक आँखों देखा हाल The Sydney Gazette and New South Wales Advertiser, 14 June 1842, में प्रकाशित भेल छल. वेल्लोर विद्रोहक समय वेल्लोर किलाक कमान अधिकारी सर जॉनफ फैनकोर्ट क पत्नी, एमेलिया फर्रेर, द्वारा लिखित एहि वृत्तांत में अंग्रेज द्वारा ओहि इलाका आ ओतुका सिपाही लोकनिपर कयल अत्याचारक चर्चा निर्विवाद नहिंए छैक.

वेल्लोर नगर कें तमिल लोकनि तीन व्यंग, ‘बिना राजाक किला, विना देवी-देवताक मन्दिर, आ बिना पानिक नदी’ सँ  जोड़ैत छथि. से हमर सहकर्मी डाक्टर श्रीकान्त हमरा एक बेर कहने रहथि, ‘’ सत्यतः, उपलब्ध सामग्रीक अनुसार किला केर भीतरक जलकंडेश्वर मन्दिर में बहुत दिन धरि कोनो देवता स्थापित नहिं रहथि, वस्तुतः, ओतय अस्त्र-शस्त्रक भंडार रहैक. ई बूझब कठिन नहिं. कारण, जे किला समय-समय पर विजयनगरक राजा, मराठा शासक, गोलकुंडाक नवाब, आ अंग्रेज सरकारक हाथ में जाइत रहल ओहि में शासकक आस्थाक अनुसार जं देवी-देवताक पूजास्थल  सेहो पराभवक शिकार भेल तं कोन आश्चर्य. परवर्ती शासक लोकनि ओतय अपना सुविधानुसार चर्च वा मस्जिद तं बनाइए लेलनि. ओना कारागारक मन्दिर में परिवर्तन वा मन्दिरक सभागार बनबाक उदाहरण तं भारतक प्राचीन धार्मिक ग्रन्थहु में भेटत. राजा कंसक जाहि कारागार में देवकी आ वसुदेव बंदी रहथि ओ आस्थावान ले मन्दिर थिक. आधुनिक काल में अंडमान द्वीपक सेलुलर जेल आजुक तीर्थस्थल थिक !  

आब पुनः वेल्लोर किला आबी. एखन किलाक भीतर तमिलनाडु पुलिस केर प्रशिक्षण केंद्र छैक. एहि किला में  किला परिसरक में पैसैत दाहिना दिस मैदानक आगू एकटा विशाल मन्दिर छैक. मुदा, दर्शन करबाक समय नहिं छल. तें, आब कोनो देवी देवता ओतय छथि वा नहिं, से कहब कठिन.

पुलिस प्रशिक्षण केंद्रक अतिरिक्त एतय  एकटा संग्रहालय छैक जाहि में तमिलनाडुक विभिन्न क्षेत्रक झांकीक अतिरिक्त अनेक ऐतिहासक अस्त्र-शस्त्र आ आन वस्तु सब प्रदर्शित अछि. संग्रहालयक परिसर में ढेरो टूटल-फूटल पाथरक मूर्तिक पतिआनी लागल भेटल. संग्रहालयसँ किछुए दूर हंटि कए एकटा छोट मस्जिद  आ पैघ चर्च सेहो छैक.

आब पुनः अजुका यात्रा पर आबी. आइ वेल्लोर में यात्रा कें थोड़ेक  विराम देल. ड्राइवर सेहो अहल भोरेसँ जागल छथि; यात्राक सुरक्षामें ड्राइवरक समुचित निन्न आ आराम आवश्यक थिक. नींदक अभाव दुर्घटनाक नोतब थिक.   अस्तु, एतय गाडी रुकल. हाथ पयर सोझ भेल. आर्या भवन रेस्टोरेंट में पवित्र दक्षिण शाकाहारी नाश्ता आ उत्तम कॉफ़ीक सेवन भेलैक. आ आगू बढ़लहुँ. एखन भरि दिन बहुर दूर जेबाक अछि. एखन लगभग एक चौथाईए दूरी तय भेल अछि ! आगू रास्ता दूर आ दुर्गम दुनू अछि.

वेल्लोरसँ श्रीशैलम

एखन हमरालोकनि राष्ट्रीय राजमार्ग 40 पर छी . ई सड़क उत्तम अछि. हमर अनुमान अछि, सड़कक रखरखाव में तमिलनाडु  देश में अव्वल दर्जाक हकदार अछि. यद्यपि, संभव अछि सब एहिसँ सहमत नहिं होथि. आब गाड़ी गति पकड़तैक. मुदा, गाड़ी ड्राइवर चलाबथि, वा अपने हांकी, गति सीमा सर्वदा नियंत्रित सीमा में रहय.एहि विषय पर हम कोनो समझौता नहिं करब. उपलब्ध आंकड़ाक अनुसार वर्ष 2019  में भारत में करीब डेढ़ लाखसँ  बेसी व्यक्ति सड़क दुर्घटना में मारल गेलाह. गति सीमाक उल्लंघन आ लापरवाही, मौसमक खराबी,आ मदिरापान दुर्घटनाक प्रमुख कारण पाओल गेल अछि, से भारत सरकारक आंकड़ा कहैत अछि. तें, सावधानी हंटी दुर्घटना घटी, मोन राखी. तथापि, अपन सावधानीक अछैतो दुर्घटना होइते छैक. मुदा, से पछाति.

एतयसँ  आगू हमरा लोकनि आंध्रप्रदेश केर कुरनूल दिस सोझे उत्तर मुँहे जायब. बाट में चित्तूर, कडप्पा, नन्दयाल,अत्माकुर, दोर्नाला आओत. हमरा लोकनि आगूक कुर्नूल शहरसँ पहिनहिं दाहिना दिस श्रीशैलमक बाट धरब. बीच में नागार्जुन सागर श्रीशैलम टाइगर रिजर्व सेहो आओत, जाहि में अनेक ठाम रहबाक आ जंगल भ्रमणक सुविधा छैक. मुदा, एहि बेर एहि अभयारण्य में रहबाक नेआर नहिं छैक.

ई इलाका खूजल मैदानी इलाका थिक. दूर-दूर धरि क्षितिज धरि कोनो अवरोध नहिं. ज़मीन अधिक ठाम बंजर. थोड़ आबादी. पानिक कमी प्रत्यक्ष छैक. सुनल छल, आंध्रप्रदेशक गुंटूर, प्रकाशम, कृष्णा, खम्मम, वारांगल आ करीमनगर जिला में लाल मरचाईक खेती होइत छैक. मुदा, से देखबाक अवसर नहिं भेल छल. बाट में एहि इलाका में मरचाईक खेती तं नहिं मुदा, सड़कक कात में सुखाइत मरचाईक पथार, आ गामे गाम पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस आर रेड्डीक मूर्ति देखल. ई नव अनुभव छल.

सड़कक कात सुखाइत मरचाई 
दिनक करीब एक बाजल हेतैक. हमरा लोकनि कुर्नूलसँ किछु दूरे रही कि अकस्मात् फोनक घंटी बाजल. अपरिचित नंबर आ अपरिचित स्वर. ई  फोन श्री कुलशेखर रेड्डी श्रीशैला देवस्थानमक कार्यालयक प्रोटोकॉल ऑफिसरक फोन छल. सुखद आश्चर्य भेल. हम तं केवल कमरा बुकिंगक हेतु एकटा ईमेल लिखि बिसरि गेल रही. मुदा, ओ लोकनि हमरा सन सेवानिवृत्त सैनिक अधिकारीक आदर करबाक कष्ट केलनि से अभिभूत केलक. सेना सेवा आ देशक नागरिक दुनू पर गौरवक बोध भेल. कहलनि, ‘धाम पर पहुंचि, हमरा फ़ोन करी. हम भेटि जायब.’ एवमस्तु. देखी, ई प्रोटोकॉल अफसर की करैत छथि.

नागार्जुन सागर श्रीशैलम टाइगर रिज़र्व

नागार्जुन सागर इलाकाक एक डैम 

हाई वे छोड़ि नागार्जुन सागर श्रीशैलम टाइगर रिज़र्व दिस बाट पकड़बासँ पूर्व करीब डेढ़ बाजि गेलैक. दुपहियाक भोजनक बेर. ड्राइवर सेहो  हाथ पयर सोझ करथु. अस्तु, हमरा लोकनि एकटा गाओं में बाटक कातहि, एकटा गृहस्थक घरक आगू गाछ तर  साफ़-सुथरा  सीमेंटक बेंच पर बैसलहुँ. भोजनक डब्बा खुजलैक. पानि निकालल. ताबत् ओतुका गृहणी सेहो जलपात्रमें जल लए उपस्थित भेलीह. ओ भीतर अयबाक आग्रहो केलनि. हमरा लोकनि कें श्रीशैलम पहुँचबा में समय लागत.  तें, शीघ्रे भोजन समाप्त कए आगू विदा भेलहुँ.

सड़क थोड़ेक दूर धानक खेत बीच होइत जलाशय, आ बाँधक काते कात आगू बढ़ल. चारू कात हरियरी. खुला इलाका. शहरक प्रदूषण, भीड़, ट्रैफिक सबसँ  दूर. पछाति, सड़कक दुनू कातक हरियरी जंगल में परिवर्तित होअए गेलैक. जंगल कतहु सघन नहिं. कतहु पुरान, विशाल गाछ सेहो देखबामें नहिं आयल. सालक गाछ, नव रोप. प्रायः, पुरान जंगलक समाधि पर नव गाछ वृक्ष रोपल जा रहल छैक. कतहु-कतहु बाँस सेहो.नवे लगाओल. सड़क कतहु सोझ, कतहु घुमावदार, मुदा, भूमि समतल, कोनो चढ़ाई नहिं. जंगलक बीचसँ जाइत  वन्य जीवक सुरक्षा, आ कार-बस-आ जंगलसँ काठ ल जाइत ट्रक सबहक आवागमनक कारण प्रत्येक सौ पचास मीटर पर अजस्र स्पीड ब्रेकर. तें, गाड़ीक गति 30 किलोमीटर प्रति घंटासँ  बेसी असंभव. एहि इलाका सबसँ यात्रा में परिपूर्ण समय चाही. कारण, आरंभ में जखन कारक नेविगेशन पर दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर देखिएक आ  गूगूल अनुमानित समय चारि घंटासँ बेसी कहय तं आश्चर्य होइत छल. मुदा, जं जं आगू जाइत गेलहुँ, गाड़ीक गति देखि गप्प बुझबा में आयल. संशय होबए लागल जे अन्हार हेबासँ पूर्व श्रीशैलम पहुँचबो करब कि नहिं. आगू बढ़ला पर  बाटक बामा कात अत्माकेर डिवीज़न केर अंतर्गत, नागार्जुन सागर श्रीशैलम टाइगर रिजर्व केर  राजीव गाँधी वन्यजीव अभयारण्यक कार्यालय आ गेस्ट हाउस देखबामें आयल. एहि स्थानक नाम प्रायः बैरलुती थिकैक. पछाति, जखन जंगल सघन भेलैक तखन गाछ वृक्षक झोंझ में हमर पत्नी कहलनि जे  ओ अचानक एकटा बाघ सेहो देखलखिन.दिन देखार बाघक नाम पर  हम  साकांछ भेलहुँ आ गाड़ीसँ उतरि ओकरा देखबाक हेतु गाड़ी कें किछु दूर पाछू कयल. सड़कसँ नीचा सेहो गेलहुँ. मुदा,बाघ ओतय किएक बैसल रहत ! तें, जं बाघ ओतय छल तं हुनका दर्शन देलकनि आ बिला गेल. अन्यथा, गाड़ी सबहक आवागमनक बीच सड़कक कात दिन-देखार बाघक हयब सामान्य नहिं; वन्य जीव कें सबसँ बड़का भय नख-दन्त विहीन ‘सभ्य’ मनुखेसँ होइछ !

किछु काल यात्रा माध्यम गति आ आनन्द में बीतल. पछाति, सड़क संकीर्ण, उबड़-खाबड़ आ तहस-नहस छलैक. सड़कक बामा कात सुरक्षा-देवाल आ ओकर बाद खाधि. जंगल में ई कहब कठिन जे खाधि कतेक गहिंड छलैक. मोन रखबाक थिक कृष्णा तुंगभद्रा नदीक इलाका थिक. एहि दुनू नदीक जल अन्ततः श्रीशैलम डैम केर बैक-वाटर में एकत्रित होइछ. श्रीशैलम डैम भारत में पनिबिजलीक प्रमुख श्रोत म सँ एक आ आंध्रप्रदेश-तेलंगानाक पेय जलक एक श्रोत थिक.

आगू सड़क आओर ख़राब.  सड़कक काते-कात भरि-भरि ठेहुन खाधि. आमने-सामने अबैत गाड़ी कें एक दोसरासँ बचबा ले ड्राइवरक कुशलता आ फुर्ती दुनू चाही. ताहि पर सामनेसँ ट्रक अयला पर कार के अनेरे खतरा. हमर ड्राइवर साकांछ छलाह. हमरा लोकनि सुरक्षित चल जाइत रही. किन्तु, एही बीच सामनेसँ अबैत लकड़ीसँ लदल एकटा लॉरी हमरा सबहक कार कें दाहिना तरफ, पछिला पहिया लग कनेक घंसैत चल गेल. प्रायः गलती ओकरो नहिं रहैक. स्थान संकीर्ण रहैक. खाधिसँ बचबाक प्रयास में प्रायः स्टीयरिंग पर नियंत्रण कनेक ढील भए गेल छलैक. हमरो लोकनि बामा सड़कक संकीर्ण आ जगह गहीड़ रहैक. किन्तु, रक्ष एतबे रहल जे गाड़ी कें कोनो तेहन नोकसान नहिं भेलैक. तत्काल कोनो मरम्मति आवश्यकता नहिं पड़ल. हमरा लोकनि सुरक्षित रही. ट्रकवला किएक गाड़ी ठाढ़ करत. ओ तं  भगिते चल गेल. एक बेर तं मोन भेल खिहारि कए ड्राइवर कें पकड़ी. कनेक दूर दौड़बो केलहुँ. मुदा, ई व्यर्थ थिक. तामससँ नोकसाने नोकसान. टाका तं इन्स्युरेंस कम्पनी दइए दैत छैक. ड्राइवर-ख़लासीसँ ओकर इलाका में झगड़ा क कए जीति नहिं सकैत छी. जीतिओ कए लाभ की. गाड़ी चलबैत अनेक बेर गाड़ी में छोट-छोट चोट-पटक लगैत, इएह दिव्य ज्ञान भेल अछि. तामस तं असल होइत छैक जे हमर गाड़ी कें नोकसान भए गेल. ताहि में नव गाड़ी में पहिल चोटक पीड़ा बेसी होइत छैक. पहिल बेर तं गाड़ी किनलाक पन्द्रह दिनुक भीतरे बंगलोर में हमरा गाड़ीक फेंडर तोड़ि देने छल. एहू बेर, तत्काल तं अपनो लोकनि आतंकित भइए गेल रही. मुदा, जखन ई बुझबा में आयल जे अपने लोकनि सुरक्षित अछि, आ गाड़ीक कोनो नोकसान नहिं भेल, तं आश्वस्त बेल रही. मुदा, ताहि में थोड़ेक समय लागि जाइत छैक. हमर ड्राइवरो चिन्हल, विश्वस्त आ निपुण छल. तथापि दुर्घटना भए गेलैक. ताहिसँ ओ अपने आओर अप्रतिभ भए गेल छल. हमरा लोकनि ओकरा जल पियाओल, भरोसा दिअओलिऐक जे अहाँक कोनो दोष नहिं. हमार एखन आओर दूर जेबाक छल. आगुओ बहुत दूर बाट ओहने रहैक. मुदा,ड्राइवर कें प्रकृतिस्थ हेबा में समय लगलैक. संगक धर्मप्राण लोकनि भगवान कें धन्यवाद देलखिन. ई प्रसन्नताक विषय छल जे गाड़ी चलैत रहि गेल. यात्रा में ई सबसँ बड़का गप्प भेल. छोट छिन  मरम्मति लगतैक, से पछाति भए जेतैक. जं  एहन ठाम गाड़ी अशक्त भेल रहैत, तखन असली पराभव. ऊपरसँ दुर्घटना-स्थल पर जं  फंसि जैतहुँ  तं अबैत-जाइत ट्रैफिक सं गाड़ी कें आओर नुकसानक भय. अस्तु,  आगुए बढ़ब उचित छल. तें, हमरा लोकनि समय कें बचबैत,जंगलसँ निकलैत श्रीशैलमक दिस बढ़िते छल गेलहुँ.

  नागार्जुन सागर श्रीशैलम अभयारण्य 

जंगली मार्ग सं निकलि श्रीशैलमसँ करीब पचास किलोमीटर दूर दोर्नाला जंक्शन नामक कस्बा पहुँचैत बेरू पहरक करीब चारिसँ बेसी भए गेल छल. दोर्नालासँ श्रीशैलम तीर्थ धरि  फेर पहाड़ी बाट छैक. ई नल्लमल्ला जंगलक इलाका थिकैक. पर्यटनक दृष्टिऍ महत्वपूर्ण एहि इलाकाक विकास एतुका सरकारक प्राथमिकता थिकैक. पर्यटन स्थानीय नागरिक आ तीर्थस्थलक व्यवस्थापक संस्थाक हेतु आमदनीक प्रमुख श्रोत थिकैक. तें, पर्यटनक हेतु महत्वपूर्ण इलाकाक विकास में सबहक हित सन्निहित होइछ.

सड़क डबल आ चिक्कन. घुमावदार. मुदा, मनोरम. जंगली इलाकाक विपरीत खोंड़ा-खुच्चा एकदम नहिं . दिनक समय रहितैक, तं कतहु-कतहु ठमकि प्राकृतिक सुन्दरताक सेवन करितहुँ, फोटोग्राफी सेहो करितहुँ. फोटोग्राफी हमर एकटा प्रधान रूचि थिक. मुदा, लम्बा यात्रा, बीच में दुर्घटना आ संझुका समय. निकलिते चल गेलहुँ . अन्ततः हमरा लोकनि जखन श्रीशैलम तीर्थ पहुँचहुँ  तं झलफल भए गेल रहैक. मुदा, श्री कुलशेखर रेड्डी, प्रोटोकॉल ऑफिसर मल्लिकार्जुन सदन में तैनात रहथि. हमरा लोकनिक हेतु दू रातिक हेतु ग्राउंड फ्लोर पर दू टा कमरा बुक छल. इन्टरनेट बुकिंग पर अपना बुते से संभव नहिं भेल छल. प्रोटोकॉल ऑफिसर  महोदय हमरा लोकनिक कमरा दिआ, दोसर दिन भोरे दर्शनक टिकट आदिक व्यवस्था कए कहलनि, ‘काल्हि भोरे छौ बजे हम मन्दिरक द्वारि पर भेटब. समय पर चल आबी.’ हमरा लोकनि कें एहिसँ बेसी कथिक आवश्यकता छल. अस्तु, भोजन भात भेलैक आ विश्राम कयल.

 ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुनक तीर्थ श्रीशैलम

श्रीशैला देवस्थानम केर अतिथि-गृह, मल्लिकार्जुन सदन मन्दिरसँ एक चौथाई किलोमीटर, मन्दिर दिस जाइत सड़कक कातहि. भोरे उठलहुँ. बाहर मल्लिकार्जुन सदनक एक कात शाकाहारी भोजनालय छैक. ओकर कतबहि में एकटा बेलक गाछ. एकटा स्थानीय भक्त बेलक गाछ ऊँचका डारि पर चढ़ि बेलपात तोड़ैत रहथि. हम कतहु जाइत छी, जखन आन गोटे आराम करैत छथि, हम भोर आ साँझ आस-पासक इलाका देखय निकलि जाइत छी. मुदा, अजुका मोर्निंग-वाक मन्दिरे धरि हेतैक. श्रीशैलम स्थान एतेक छोट छैक जे एक घंटा में पूरा नगरक दू चक्कर लगा लेब. से आइ सांझ में हेतैक.

मन्दिर परिसरक सुन्दर भित्ति चित्रक अवलोकन 

हमरा लोकनि निरधारित समय पर मन्दिरक द्वारि पर पहुँचि गेलहुँ. जयबाकाल मन्दिर परिसरक पाथरक देवाल पर उत्कीर्ण भित्ति चित्र आकृष्ट केलक. प्रोटोकॉल अफसर श्री कुलशेखर रेड्डी महोदय पहिनहिंसँ ओतय उपस्थित रहथि. हुनका ताकय नहिं पड़ल. सफाई, समयक पाबंदी, आ गुणवत्ता, उत्तर भारत में हमरा लोकनि कें जकर सेहन्ता होइछ, दक्षिण भारतक ट्रेड मार्क थिक. आब बहुतो ठाम उत्तर भारत में एहि प्रकारक परिवर्तन आबि रहल छैक. मुदा, आम नागरिकक अभाव में ई संभव नहिं. नियम तोड़ि आगू बढ़बा में गौरवक बोध आ वी आइ पी कल्चर एकर मूल में अछि. नव पीढ़ीक अनुशासन प्रिय नागरिक एहि परिपाटी कें बदलबा में निर्णायक भए सकैत छथि. नव पीढ़ीसँ बहुत आशा अछि.

दर्शनक संतोष 

श्रीशैलम  ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुनक तीर्थ थिक. एतय शिवलिंग अतिरिक्त भ्रामरी देवीक मन्दिर सेहो छनि. भ्रामरी देवीक मन्दिर सेहो शक्तिपीठ मानल जाइछ. भक्त लोकनिक आस्थाक अनुसार शिव आ पार्वती एहि स्थान पर तहिया अपन पुत्रक समीप निवास करबा ले आयल रहथि जहिया बुद्धि, ऋद्धि आ सिद्धिक श्री गणेशक संग पहिने विवाह भए गेलासँ असंतुष्ट कार्तिकेय कुमारब्रह्मचारीक रूप में क्रौंज पर्वत पर एकान्त वास में चल गेल रहथि. आरंम्भ में मल्लिका (जूही)क फूलसँ पूजित हयबाक कारण एतय शिव मल्लिकार्जुनक नामसँ  प्रसिद्द छथि. विकिपीडियाक अनुसार एतय दोसर शताब्दीसँ  मन्दिर हेबाक शिलालेखक प्रमाण उपलब्ध अछि. शैव परंपरा में श्रीशैलम कें ‘पाडल पेट्र स्थलम्’ (प्रशस्ति गान में चर्चित स्थान ) कहल जाइछ. ‘पाडल पेट्र स्थलम्’ ओ भेल जकर चर्चा  शैव परंपराक  संत नयनारलोकनिक (शिवक) प्रशस्ति गान में  अछि. 275 ‘पाडल पेट्र स्थलम्’ में श्रीशैलम सेहो अबैछ. वैष्णव परंम्परा में आड़वाड़ संत लोकनिक प्रशस्ति-गां , ‘दिव्य-प्रबन्धम’ में जाहि  108 तीर्थ स्थलक चर्चा अछि ओकरा दिव्य-देशम कहल जाइछ. श्रीशैलम मन्दिरक परिसर में पर निर्माण में समय-समय पर सातवाहन, विजयनगर, आ रेड्डी शासक लोकनिक योगदान अछि. कहल जाइछ, 1677 ई. में शिवाजी महाराज सेहो श्रीशैलम आयल रहथि आ एहि मन्दिरक उत्तरी गोपुरम( द्वार)क निर्माण हुनके द्वारा भेल छल. तें उत्तरी गोपुरम कें शिवाजी गोपुरम कहल जाइछ.

एखन एतय कोनो पर्व त्यौहारक भीड़ नहिं. भीड़ पूजा अर्चनाक पवित्रताक नाश कए दैछ. हमर विचार थिक, दर्शनक आलावा तीर्थ स्थल आत्म-दर्शनक स्थल सेहो थिक, जाहि हेतु शान्ति आवश्यक. प्रायः ओही शांतिक अन्वेषण में संत लोकनि एहन निर्जन स्थल सब में आबि साधना कयलनि. मुदा, धर्मक पहाड़ निर्माण करबाक मनुष्यक लोभ धर्म-स्थल सबकें तेहन बना देलक जे ओतय धर्म छैक कि नहिं कहब तं मधुमाछी क छत्ता में हाथ देब थिक, मुदा, जं एहि सब ठाम शान्ति खोज करब तं प्रायः निराशाए हाथ लागए, से संभव. एहि में असहमति संभव अछि. तें, हमर विचार जे अपने भ्रमण करू, मनन करू आ अपन निष्कर्ष निकालू. आइ हमरा लोकनि प्रातःकालक मृदु आ सुखद बेला में नीक जकां दर्शन कयल. बाहर आबि रेड्डी महाशय विदा लेलनि. हमरा लोकनि हुनका धन्यवाद देलियनि. हमर अपन अनुशासनक अनुसार एतुका एग्जीक्यूटिव ऑफिसर कें पत्र लिखि हम हुनकर सहायताक धन्यवाद आ श्री रेड्डीक प्रशंसा अवश्य लिखि तुरंत ईमेल कए देल. धन्यवाद देब अनुशासन थिक. प्रशंसा ककरा नीक नहिं लगैछ.

पूजा अर्चनाक पछाति हमरा लोकनि मल्लिकार्जुन सदन अयलहुँ. मुदा, कमरा में जेबासँ पूर्व रेस्तोरां में जलखै भेलैक. इडली-दोसा आ काफी. एतुका इडली आकार में खूब पैघ. चटनी-साम्पर सब किछुक स्वाद भिन्न. असल में दक्षिणक प्रत्येक क्षेत्र में समाने खाद्यक भिन्न-भिन्न स्वाद भेटत. तमिलनाडु-पांडिचेरीक साम्पर में तेत्तरि बेसी, नारिकेर चटनी में कॉच लहसुनक गंध. आंध्र में खट्टा कम, किन्तु मरचाई बेसी. कर्नाटक में साम्पर कनेक मीठ. हमर पत्नी आ हुनक माता विश्राम करतीह. हम बेरू पहर पयरे श्रीशैलम केर धांगब. ई हम कतहु नहिं छोड़ैत छी.

शिवाजी महाराज: श्री शिवाजी  स्फूर्ति केंद्र 

पैदल यात्राक क्रम में देखल, शहर खूब साफ़ सुथरा. चौड़ा सड़क. शहर केर परिक्रमा करैत हम शहरक एक कात ऊँच स्थान पर श्री छत्रपति शिवाजी स्फूर्ति केंद्र पहुँचलहुँ. एकर स्थापना छत्रपति शिवाजीक राज्याभिषेकक तेसर शताब्दी पूर्ण भेला पर भेल छल. गुलाबी रंगक पाथरसँ  निर्मित एहि केंद्रक भूमि तल पर समर्थ सभा-मंडप में श्री शिवाजी महाराज मूर्तिक अतिरिक्त हुनक राज्यसँ संबंधित किछु नक्सा-चित्रक प्रदर्शनी आ  ऊपरक तल पर दरबार हॉल छैक जे ध्यान आ मनन ले उपयुक्त अछि. एहि केंद्रक आगूक  भूमि खुला आ बेस पैघ छैक. एतयसँ सम्पूर्ण शहर आ आगूक दूरक इलाका देखबामें कोनो अवरोध नहिं. स्फूर्ति केंद्रक दाहिना दिस मन्दिर एकटा छैक. मन्दिरक बगलक सड़कक दोसर तरफ एक पाँति में आगू पर्यटकक लेल बहुत रास छोट-छोट किरायाक कॉटेज. शिवाजी स्फूर्ति केंद्र देखि मल्लिकार्जुन सदन आपस भेलहुँ.

मल्लिकार्जुन सदन सं आ आगू जे सड़क जाइछ तकर बामा दिस बाज़ार आ सोझे आगू कृष्णा नदीक कछेर पर जयबाक सीढ़ी छैक. नदीक कछेर दिस पातालगंगा रोप वे सेहो जाइछ. तकर पछाति नाओ पर कृष्णा नदी धार पर जाइत नदीक दोसर पार अक्कामहादेवी गुफा छैक. मुदा, हम एहि बेर समयाभाव में ओम्हर नहिं गेलहुँ.  बुड़बकहाक खेती अगिला साल.

श्रीशैलम नगरक एक चौराहा पर भव्य मूर्ति 

सांझ में पत्नी आ हुनक माँ कें ल कए मन्दिरक आगूक बाज़ार में कनेक टहलान भेलैक. किछु सनेस-बाड़ी किनल. पहिने जहिया दूरस्थ तीर्थ स्थल जयबाक उपाय सुलभ नहिं रहैकतं अनको ले लोक अणाची दाना आ बद्धी अनिते छल. मुदा, से इतिहास भए गेल. आब ई यात्रा समाप्त हेबा पर अछि. काल्हि भोरे आपसक यात्रा. मुदा, घुरती में एहि नगरक चौक-चौराहा पर स्थापित भव्य मूर्ति सब देखब जुनि बिसरी. चौक-चौराहा पर स्थापित देवी देवताक एहन भव्य मूर्ति हम भारत में आन ठाम नहिं देखने छी.  

 

     

 

    

 

Saturday, November 6, 2021

अष्टदल कमल

 

अष्टदल कमल

कल्लूक अंगना में टटका पिसल पिठारक अष्टदल कमल आ ओहि पर सिन्दूरक ठोप देखि कए श्रीमती पंत कें आश्चर्य भेलनि. दू तल्लाक दू टा अलंग, चारि टा अफसर लोकनिक चारि टा फ्लैट. चारि टा सर्वेन्ट क्वार्टर. मुदा, अकस्मात् मैडम कें सेवादारक संग आम गाछ लग ठाढ़ देखि शान्ती  कें आश्चर्य भेलैक. ओ अढ़िया में आधा सानल चिक्कस कें ओहिना छोड़ि, दौड़ि कए मैडम लग आयलि. हुनका एकाएक एम्हर आयल देखि, चकित शान्तीकें श्रीमती पंत कहलखिन, पोद्दार कहलक आम गाछ सब बड्ड फड़ल छैक, तं देखबाक मोन भेल.’ 

‘त. ई गाछ कोनो साल नागा नहिं जाइछ, मेम साहेब.’ शान्ती बाजलि, ‘किछु ने किछु फड़िते छैक. कोनो बेर कम, कोनो बेर बेसी. एहि बेर तं टूटि कए फड़ल छैक.’

‘मुदा, पकबा धरि रहतैक तखन ने ! दिल्ली छावनी में हमर हाता में तेहन मीठ चौसा आ लंगड़ा आम फड़ैक जे.... आह ! एहन आम कतय भेटत !! मुदा, एखन कतेक हवा-बिहाड़ि अओतैक. बानर-लुक्खी, धिया-पुता रहय देतैक तखन ने .’ श्रीमती पंत बजलीह.

श्रीमती पंत केर गप्प सूनि शान्ती कहलकनि, ‘ हवा बिहाड़ि तं आमक मास में आबिए जाइत छैक, मुदा, एहि आम कें केओ नहिं छूअत. चुक्क खट्टा. केवल अंचार बनायब, तै ले नीक हैत. बनाउ ने. हमरा जखने कहब, फांक, कुटबी, जे कहब, हम सब काटि देब, कुच्चा बना देब.’

मुदा, श्रीमती पंत बात कटैत कहलखिन, शान्ती ई अरिपन के देलकैए ? कर्नल यादवक आया ?

‘नहिं मैडम. ई अरिपन हमही देने छियैक.’

‘अच्छा ?’ कहि श्रीमती पंत पोद्दार कें थोड़ेक आम तोड़बाले कहलखिन आ आपस भए गेलीह. जाइत-जाइत शान्ती कें कहलखिन, ‘आइ हम थोड़ेक कुच्चा अंचार बनाएब . जखन होअह आबि जैहह.’  

मुदा, डेरा आपस अयलो पर श्रीमती पंतक जिज्ञासाक आइ अंत नहिं भेलनि. कल्लूक आँगन में अष्टदल कमलक अरिपन ! लखनऊ में जतय साले-साल मुहर्रम में सिया-सुन्नीक बीचक हड़हड़-खटखट प्रशासनक निन्न हराम केने रहैत छैक ओतय तखन एहि अंगना में दू सौतिन, शान्ती आ शबनम, मिलि कए रहैछ. एके संग ईद-बकरीद सेहो मनबैत अछि. किन्तु, दुनूक बीच पूजा-पाठ, पर्व-त्यौहार ल’ कए एखन धरि खट-पट भेलैये से आइ तक केओ नहिं कहलक. ई श्रीमती पंत कें कनेक नव बूझि पड़लनि.

2

कल्लू सेनाक सिविलियन हजाम थिक. एकर पैघ परिवार दू अफसरक दू टा सर्वेन्ट क्वार्टर में रहि कए अफसर लोकनिक टहल-टिकौरा करैत अछि आ मिलि जुलि कए खुशी-खुशी रहैत अछि. सर्वेन्ट क्वार्टर छोट छैक. मुदा, तैयो एतय बहुत सुभीता छैक. छावनी में लखनऊ शहरसँ चोरि-डकैती कम छैक. बिजुलीक लाइन नहिं कटैत छैक. कल्लूक मेडिकल बटालियन सेहो एतयसँ लग पड़ैत छैक. अस्पताल-स्कूल सब लगे. आओर चाही की ? एही सबहक दुआरे सिविलन नौकर-चाकर डीही जकां पुश्त-दर-पुश्त छावनीक में रहैत आयल अछि. अफसर आ सैनिक चलन्त थिकाह. आइ एलाह, काल्हि गेलाह. नौकर-चाकर सर्वेन्ट क्वार्टर में रहैत कतेको पीढ़ी गुजारि दैत अछि. कखनो काल डेरा बदललक, कहियो काल इलाका सेहो. मुदा, ई लोकनि चुप मुँहे अफसर लोकनिक लग  रहैत छथि, अफसर लोकनिक सेवा करैत छथि, आ गुजर करैत छथि. आयालोकनि  अफसर लोकनिक बदलीक समय मेम साहिब कें नोर भरल आँखिए बिदा करैत छथिन. आ फेर, अनायास अगिला साहेब-मेम साहेबक सेवा में लागि जाइत छथि. इएह कारण थिक जे नौकर-चाकर-नाई-बाबर्ची- व्यापारी छावनीक जीवित इतिहास थिक. तें जं छावनीक मुँह जवानी इतिहास सुनय चाहैत छी तं वयसाहु  सर्वेंटसँ  सुनू, चिकन कपड़ाक व्यापारी रहीम चाचासँ  सुनू, करीम बार्बरसँ सुनू. रहीम चाचा अपन हीरो ‘पुक’ मोपेड पर जतबे चिकन साड़ी-सलवार-कमीज-कुर्ता- दुपट्टा संगे अनैत अछि, ओ अपना संग ओतबे गप्प सेहो अनैत अछि. मेम साहेब लोकनि गप्प सुनैत-सुनैत साड़ी-सलावार-कमीज-कुर्ता- दुपट्टाक चुनाव करैत छथि आ रहीम चाचा हुनका लोकनि कें साहब-मेमसाहिब लोकनिक पीढ़ी दर पीढ़ीक  खीसा-खेड़हा सुनबैत अछि. करीम हजामत बनबैत, चम्पी करैत कतेको नव-पुरान गप्प सुनि लैछ, कहि जाइछ. मुदा, छावनीक बहुतो परिपाटी मीलक पाथर जकां अचल अछि. एहि अर्थ में छावनीक पुरान भत्थन इनारक जबकल पानि थिक. मुदा, आब समयक संग छावनीक बदलि रहल अछि, तथापि, एतुका बहुतो परिपाटी जक-थक  अछि. तें, कल्लू आ शान्ती, शबनम आ कल्लूक धिया-पुता ले छावनी एहन अभयारण्य थिकैक जतय अनेक प्रकारक लोक धर्म आ परम्परा एके संग पलैछ. एतय जे नौकर-चाकर एक बेर छावनी में बसि गेल तकरा एतुका नीक-बेजाय सब किछुक हिस्सक लागि गेलैये. तें, शान्ती जे संयोगहिं एक दिन लखनऊ छावनी में आयल छलि, एतुके भ’ कए रहि गेल.

3

माए-बाप शान्ती कें मोन नहिं छैक. गाम में लोक कहैक जे बाप मुन्ना लाल बाराबंकी शहर में काज करैत रहैक. ओत्तहि एक बेर  हैजा पसरि गेल रहैक. ओही में मुन्ना लाल शान्त भए गेल रहैक. जखन मुन्ना लाल शान्त भेल छल, शान्तीक माए सितिया कें दू टा सन्तान रहैक- करीब छौ बरखक शान्ती आ बरख दुइएक, सुरेश. लोक कहैक जे मुन्ना लालक मरलाक बरख भीतरे सितिया, शान्तीक बियाह करा कए, ककरो संग संबंध क कए, कहांदन नेपाल दिस भागि गेल रहैक. मुदा, से गप्प ततेक पुरान भए गेल रहैक जे शान्ती कें सरि भए कए मायक मुँह मोनो नहिं छैक. लोक गाओं में एतबा अवश्य कहैक जे बेटी गराक घेघ छलैक तें दूधपीबे (शान्ती) कें बियाहि देलकै आ साँए-बेटा के ल कए भागि गेल; बेटा कमा कए जे खोअओतैक !   

जहिया बुधनक संग शान्तीक विवाह भेल रहैक, ओकर वयस छौ-सात वर्खक करीब छल हेतैक. दोहारा बान्ह, गहुमा रंग, पैघ-पैघ, कुइर आँखि, आ चेहरा पर गोटीक दाग. नमती में वयससँ छरहर छलि. बजैत कम छलि, मुदा, छल काजुल. तें, शान्ती पर सब कें दया आबि जाइक. काजुल छलि, तं अपन घर-अंगनाक काजक ऊपर आन अंगनाक काज सं किछु खुदरा पाइ, फाटल-पुरान कपड़ा आ कखनो काल दू मुट्ठी काँच-पाकल अन्न सेहो भेटि जाइक.

शान्तीक घरवला,बुधन,क वयस  तहिया सोलह, नहिं तं हे सत्रह ! ताहिसँ बेसी तं  नहिंए छल हेतैक. बुधनक परिवार में बुधन आ शान्तीक आलावा एकर एकटा दूरक संबंधक केओ रहैत छलि, नाम छलैक रेशमी. बुधन कहै जे बहिन छी.एकटा खोपड़ी सन घर रहैक. ओही में एक कात चूल्हा रहैक आ दोसर दिस ई तीनू राति कए भूंइए पर पड़ि रहैत छल. दुआरि पर एकटा गाए आ एकटा बाछी सेहो रहैक. बुधन बोनि-बुत्ता करैत छल, रेशमी घर सम्हारैत छलैक, भानस करैत छलैक. शान्ती गाए बाछी चरबैत छलि, गोबर करसी करैत छल. ऊपरसँ कनेक-मनक अनको काज कए दैत छलैक. नेना वयस आ एतेक काज.  थाकल देहे, राति क’ शान्ती कें कखन निन्न भए जाइक बुझबो नहिं करैक.’  से एक दिन श्रीमती पंतक पुछला पर शान्ती कें कहने रहनि. मुदा, ओहिसँ  बेसी नहिं. शान्ती कें बूझल रहैक जे  मेम साहिब लोकनि जतबे पूछथि, ततबे बाजी. अपना दिससँ हुनकालोकनिसँ गप्प नहिं करी. हुनका लोकनिक  घरक गप्प कहियो बिसरियो कए ने पुछियनि. ने गप्पक बीचमें टोक दियनि. नौकरीक ई रिवाज एकरा मौसी कहने रहैक.

जहिया शान्ती कल्लूक संग क्वार्टर में पहिले पहिल आयल छलि तहिया परिवार में कल्लू आ शान्ती दुइए गोटे छलि. कल्लू शान्ती कें बुझबैत कहने रहैक जे ‘ककरोसँ फालतू गप्प सप्पक कोनो काज नहिं. एहि क्वार्टर केर गप्प दोसर क्वार्टर,   दोसरक गप्प तेसरक सामने भेल तं एतुका दाना पानी तं बिसरिए जैंहें. तखन कोनो मैडम अपन डेरा लग टपय नहिं देथुन.’ शान्ती कल्लूक एहि गप्प कें गेठरी में बान्हि कए राखि नेने छल.

एहि ठाम छावनी में कल्लूक डेरा में सब भोरे उठि जाइत छल. कल्लू के पाँचहि बजे उठि कए बटालियन जाय पड़ैक. एक-एक बटालियन में चारि सौ-पाँच सौ रंगरूट. मुदा, हज़ाम दुइए गोटे- एकटा फौजी आ दोसर कल्लू. केश कटैत कटैत केक दिन दुपहरिया भए जाइक. शबनमक बेटा छेटगर रहैक, स्कूल जाइक. शान्तीक बेटा, दीपू, छोट छलैक. मुदा, स्कूल ओहो जाइत छलैक. शबनम केर दू टा टेल्हगर बेटी सेहो रहैक. ओकरा सब कें घरेक काजसँ फुरसति नहिं. ऊपरसँ  दुनू दू क्वार्टर में काज सेहो धेने छलि. शबनम आ शान्ती के फूटे दू टा क्वार्टरक टहल टिकौरा  रहैक. तें दुनू सौतिन लोकनि मिलि भोरे उठि कए पहिने घरक काज सम्हारैत छल. भानस-भात संपन्न करैत छल आ तखन क्वार्टर में झाडू-पोछा-बरतन ले जाइत छल. हरेक क्वार्टर में डेराक एवज में दू टा काज बान्हल रहैक. जं भानस- भात- कपड़ा धोअब आदि आओर काज ले मैडम कहलखिन तं ओहिसँ  किछु नकदीओ आमदनी भए जाइत रहैक. एहि बीच में जं मैडम लोकनि कें कहिओ आंग-स्वांग भए जानि तं ई सब हुनका लोकनिक सेवा-बरदाइस अपन डयूटीए बूझैत छलि.

ओहि बीचे अचानक श्री मती पंत कें ठेहुनक दर्द उठि गेल रहनि. डाक्टरी दवाई आ संयम चलिते रहनि. तथापि, कष्ट रहनि. नीक स्वभाव आ मधुर बोलक कारण शान्ती कें श्रीमती पंत बड़ नीक लगथिन. हुनकासँ गप्प करब शान्ती कें नीक लगैक. कारण, श्री मती पंत ने अपने मोने कहिओ किछु खोद-बेद करथिन आ ने कोनो आन मेम साहेबक गप्प-खिधांश पुछथिन.  तें हुनका कष्ट में देखि, शान्ती अपने मोने आबि हुनका कखनो कए दवाईक मालिश कए दनि, हाथ-पयर जांति देनि. एक दिन एहिना शान्ती श्रीमती पंत केर ठेहुन में दवाई लगबैत रहनि. श्रीमती पंत आरामकुर्सी पर बैसलि कोनो पत्रिका उलटबैत रहथि. शान्ती कें की फुरलैक, पुछलकनि,  ‘मेम साहेब एहि बेर अहाँक माँ लोकनि एतय नहिं एलखिन ? दुर्गा-पूजाक छुट्टिओ बीति गेलैक.’

‘हं, एहि बेर नहिं एलखिन.’ श्री मती पंत अन्यमनस्कतासँ कहलखिन. मुदा, फेर हुनक की फुरलनि, पुछलखिन, ‘शान्ती तोहर नैहर कतय छह ? माय-बाप ?’ 

शान्तीक आँखिसँ टप-टप  नोर खसय लगलैक. शान्तीकें चुप देखि श्रीमती पंत मूड़ी ऊपर उठओलनि, तं शान्तीक नीचा झुकल मूड़ी आ गालपर टघरैत नोर पर नजरि गेलनि. पुछलखिन, की भेलह ? शान्ती किछु नहिं बाजलि, तं ओएह फेर पुछलखिन, ‘किएक कनैत छह ? कोनो आंग-स्वांग भेलैए ?’

शान्ती चुप्पे मुँहे मूड़ी डोलाकय, नहिं, केर संकेत देलकनि. श्रीमती पंत चुप भए गेलीह. हुनका चुप देखि शान्ती नोर पोछैत नहुँसँ बाजलि, ‘मैडम हमरा आन ठाम केओ अछि. हमरासँ अभागल के हयत ! माय ने बाप. हम अबोधे रही, बाप तखने मरि गेल. माए जिबैए कि मरि गेल, जानाथि भगवान.  जे अछि, एत्तहि जकरा देखै छियैक, बस सएह.’

शान्तीक गप्प सूनि मिसेज पंत शान्तीक मुँह ताकय लगलथिन, तं, शान्ती पुनः शुरू भए गेल. कहलकनि, ‘मैडम गरीबक जीवन कोनो जीवन थिकैक. नेने रही तं माए बुधन संग बियाह करा कए सासुर विदा कए देने छलि. तहिया ने वयस छल ने अक्किल. मुदा, की कहू. जिनगी हमरा संग कोन कोन ने खेल केलक. मेम साहेब, रहि तं जइतिऐक हम गामो में. मुदा, दुःखे एहन भेल, जे भेल जे जिनगीसँ मरन भला. कहबे तं केलहुँ, मेम साहेब, बियाह भेल तं नान्हिए टा रही. मुदा, जखन देह-दशा भेल, ज्ञान भेल  तं अपने आँखिए देखलिऐक जे बुधना की छल. हम बुझबो ने करितिऐक. हमरा तं कहैओ में लाज होइए, मेम साहेब. मुदा, एक राति हमरा पेट में बड्ड जोर दर्द उठि गेल रहय. हम निसाभाग राति में उठि कए बैसि गेलहुँ. तखन जे हम बुधना आ रेशमीक बीचक खेला देखलहुँ, तं,  हमर सागर देह में तं जेना आगि लागि गेल. तहिये हम बुझलियैक, मैडम, जे  ओहि घर में पहिनहिंसँ हमर सौतिन बसैत छल. पाछू जखन सर-समाज बुझलकैक, हमहूं हम बुधनाकें गारि सराप देबय लगलिऐक तं  दिन-रातिक कल्लह हुअए लागल. जखन नित्तह कल्लह, मारि-गारि-गंजनसँ मोन आजिज भ’ गेल तं एक दिन इनारमें कूदि गेलहुँ. मुदा, मरलहुँ नहिं. इनार में पानि कम रहैक. अक्किल तं छल नहिं. मगर,अरुदा बचल छल. मुदा, हम ओही दिन सोचि लेलहुँ जे बुधनक संग हमर निमहता नहिं हयत. आ जखन अपने बोनि-बुत्ता करब तं कत्तहु कमायब, दू मुट्ठी अन्न आ सूतैक ठाम में भेटिए जायत. हमर मौसी लखनऊ में रहै छल. ओ आयल, गप्प सुनलकै तं हमरा बड्ड फज्झति केलक. हम कहलियैक, हमरा बुधना आ रेशमीक संग निमहता नहिं हैत. तं, ओ अपने संग  हमरा लखनऊ नेने आयल आ अपने संग एकटा क्वार्टर में काज धरा देलक. हम राति कए ओकरे कोठली में कहुना सूति रही. किछु दिनक बाद  एत्तहि काज करैत कल्लूसँ भेंट भेल. क्वार्टर सब में साहेब सब लग ओकरा अवर्यात रहैक. ओ एत्तहि काज करैत छल, से कहलक. बोली बानी नीक रहैक. ओ हमरो नीक लागय. दुखायल मोन में केओ दू टा नीक बोल कहै छै तं नीक लगिते छै ने, मेम साहेब. हम गामसँ आयल. छौ-पाँच नहिं बुझिऐक. ओ छौ मास-बरख दिनक बाद एक दिन पुछलक, ‘हमरा संगे रहबें ?’ हम की कहितिऐक ? एसगरि रही. एसगरि मौगी, शहर बजार में कोन धरानी रहैए से हम अहाँ कें की कहब, मेम साहेब !   मौसी के पुछलिऐक, कहलक, ‘कोन बेजाय कहै छौक. बुधनासँ नीके छौ. ओ घुरिओ कए ताकए एलौ ! एबो ने करतौ, से जानि ले. कल्लू कें सरकारी नौकरी छै, एत्तहि रहैए. हमरा तं कोनो ऐब नहिं बूझि पड़ैए.’  आ हम कल्लू कें ‘हं’ कहि देलिएक. मुदा, मैडम जखन कैसरबाग़ कोर्ट में कल्लूक संग बियाह ले गेलहुँ आ कोर्ट में ई अप्पन नाम ‘करीम’ कहलकैक तं कहै छी मैडम, हमरा तं गस आबि गेल. हम कोना एकर जाति बूझितिऐक ! नामो तं जरलाहा ‘कल्लू’  रखने अइ. हम तं ठामे खसि पड़लहुँ. एक दिससँ कल्लू मुँह पर पानि छिटलक. दोसर दिससँ मौसी पंखा हौकए लागल. हाकिम पुछलकैक, ‘ क्या बात है ? मौसी गप्प सम्हारि लेलकैक, ‘ कहलकैक, माने, धूप बहुत है. सुबह से मुँह में कुछ पानी भी नहीं दिया है, चक्कर आ गया. लौंडियों का तो आप जानते है, हजूर.’ मौसी तं कहियासँ लखनऊ में छल.  आब ओकरा सब गप्प बूझल रहै, कि नहिं, से ओकर धरम जानय. हमरा ओ नरकसँ बहार क कए लखनऊ अनने छल. हम झूठ आगि उठेबै तं हमरा नरको में ठाँव भेटत, मेम साहेब ! मुदा, हम की कहू, ओइ घड़ी हमरा मन में की भेल छल. मुदा,निरुपाय रही. घुरती में हम कल्लू के बड्ड गारि-सराप देलिऐक. मुदा, जे बात छियैक. ओ ओही दिन हमरा कहलक. ‘देख, हम सरकारी नौकर छी. तोरा दुःख नै देबौ. जेना मोन होउ, रहिहें.’ बाद में इहो बुझलिऐक, एकर घर गौंडा जिला में रहैक. ओतय कलुआ कें पहिनहिसँ लोक-बेद सेहो रहैक. तहिया तामस तं बड्ड भेल. बेर बखत अप्पन अक्किल पर कचोट तं आइओ होइए. मुदा, जानथि भगवान, ककरो आगि नहिं उठाबी. जेना कलुआ हमरा कहलक, से ने ओ अपने, आ ने हमर सौतिन शबनम, आइ धरि हमरा कोनो दुःख नहिं देलक. शबनम केर बेटा-बेटी सेहो अलो-मलो केने रहैए, जे बात छियै, मेम साहेब.  हम जहिना रही, तहिना रहै छी. तुलसी में पानि ढारै छी, अरिपन दै छी. दसमी में नौ दिन फलाहार करै छी, कलश रखै छी. शबनम के जे फुरै छै, ओहो करैए. बस ! ’ कहि शान्ती चुप भए गेलि.

तखने मिसेज पंत देखलखिन, शान्तीक बरख आठेक बेटा, दीपू स्कूलसँ  आबि रहल छलैक. ओही काल शबनमक बेटी, छोटी मुन्नी, आबि कए शान्ती कें कहलकैक, ‘ छोटी मम्मी चलिए, मम्मी बुला रही है. पापा खाना के लिए आ गये हैं .’

शान्ती मिसेज पंतसँ छुट्टी कए अपन डेरा दिस बिदा भेल. मिसेज पंत सेहो उठिकए भीतर गेलीह. हुनका शान्तीसँ  फेर कहिओ आओर किछु पुछबाक आवश्यकता नहिं बूझि पड़लनि.

 

Tuesday, October 5, 2021

सरल चित्रांकित बाल-साहित्यक प्रकाशन मैथिलीक हेतु संजीवनी भए सकैछ

 

  

वैज्ञानिक योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ मैथिली कें ‘बिनु जड़िक गाछ’ कहैत छथि. कारण, अजुका पीढ़ीक बेसी गोटे मैथिली पढ़िए नहिं सकैत छथि; ‘छात्र कें मैथिली पढ़बाक आ लिखबाक अवसर हाई स्कूल में जा कए भेटैत छैक, सेहो मातृभाषाक रूप मे नहिं, बल्कि वैकल्पिक भाषाक रूप  मे.’  एहन परिस्थिति में नव पीढ़ी मे  मैथिली पढ़बाक रूचि कोना जगाओल जाय, मैथिलीक पाठक वर्ग कोना तैयार करी ताही विषय पर एतय विचार करैत छी.

सर्वविदित अछि, मातृभाषा मैथिलीक माध्यमे शिक्षा एकटा राजनैतिक निर्णय थिक, जाहि पर हमरा अहाँ कें कोनो नियंत्रण नहिं. ऊपरसँ भाषाक ‘वर्चस्व आ मैथिली ‘साम्राज्यवादक’ विवाद अन्ततः मातृभाषा मैथिलीक माध्यमसँ पढ़ाईक विषय कें कतय ल’ जायत, कहब असंभव. तें, एखनुका चर्चा कें हम ओहिसँ फूटे रखैत छी.

निर्विवाद मैथिलीक पाठक वर्ग तैयार करबाक हेतु कोनो एकटा अचूक नुस्खा नहिं. मुदा, एहि विषय में एखन हम किछु समकालीन अनुसन्धानक निष्कर्ष प्रस्तुत कए अपन विचार प्रस्तुत करैत छी.

सिंगापुरसँ प्रकाशित ‘रीडिंग होराइजन्स’ नामक एक पत्रिकाक 2018 क एक अंक मे ‘Leisure reading behaviour of young children in Singapore’ नामक एकटा अनुसन्धान प्रकाशित भेल छल.1 धिया-पुता की पढ़य चाहैत अछि, कोना पढ़इत अछि, पढ़बाक ओकर रूचि कें कोन-कोन प्रभाव स्वरुप दैत छैक इत्यादि एहि अनुसंधानक मोट-मोट विन्दु थिक. एहि सबहक अतिरिक्त खाली समय मे पढ़बाक (leisure reading क) कारण, प्रेरणा, रूचिक विषय, आ पढ़बा मे बाधा एहि अनुसंधानक आन-आन विन्दु थिकैक. आंकड़ाक संकलन एकटा निर्धारित प्रश्नोत्तरी पर कएल गेल छल जाहि में  6-12 वर्षक करीब अढ़ाई सौ नेनासँ सम्मिलित भेल रहथि.  

एहि अनुसन्धानक  अनुसार अधिकतर नेना रहस्य-रोमांच, हास्य-विनोद, जीव-जन्तुक कथा पिहानी आ साहस-शौर्य विषयक पोथी कें फ़ुरसति मे पढ़बाक हेतु चुनैत छथि. पढ़बामे इबुक आ ऑडियो बुकक बनिस्बत छपल पोथी (print-book) बच्चा  लोकनिकें बेसी नीक लगैत छनि. मुदा, leisure reading मे सेहो मातृभाषाक पोथी मारि खा जाइछ ; जहां 70 प्रतिशतसँ बेसी नेना पढ़बा ले अंग्रेजीक पोथी चुनैत छथि, मातृभाषा पढ़निहारक संख्या केवल 20 % धरि पहुँचैत अछि.

मुदा, एहि अनुसन्धानक जाहि बिंदु कें हम रेखंकित करय चाहैत छी ओ पोथीक चुनावसँ  सम्बन्धित अछि. जतय करीब साठि प्रतिशत नेना विषय वस्तुक आधार पर पोथीक चुनाव स्वीकार केलनि, ओत्तहि करीब चालीस प्रतिशत नेना केवल पुस्तकक नामक आधार पर पुस्तकक चुनाव करबाक गप्प गछलनि. ततबे नहिं, करीब एक तिहाई नेना पोथीक भीतरक  रंगीन चित्रकला आ पढ़बामें सरलताक आधार पर पोथी चुनैत छथि, से स्वीकार कयलनि.

एहि अनुसन्धान में लेखक लोकनि एहू तथ्यकें उजागर कयलनिए जे जीविकाक हेतु माता-पिताक स्थान परिवर्तनक कारण नेनाक मातृभाषाक बुझबाक आ पढ़बाक दक्षता कें प्रतिकूल रूपें प्रभावित केलकैक अछि, ओकर पढ़बाक क्षमता में ह्रास भेलैए. मातृभाषाक पोथीक उपलब्धता सेहो बड़का समस्या छैके. मुदा, ताहूसँ बेसी कठिन छैक एहन पोथीक उपलब्धता जकर भाषा सरल आ सुगम होइ, आकार छोट होइक, विषय रोचक होइक, आ शब्दाबली सीमित होइक. आब जं मैथिलीभाषी नेनाक स्थितिक गप्प करी तं सर्वविदित अछि, मैथिली में नेनाक रुचिक पोथी सुलभ नहिं छैक. चित्रांकित पोथी, सरल छोट-छोट कथा, नेनाक रुचिक रहस्य रोमांच आ साहस-शौर्यक एहन कथा नेनाक कल्पनाकें आकाश मे उड़ाबय तकर मैथिली में सर्वथा अभाव छैक. स्व. मणिपद्मक ‘भारतीक बिलाड़ि’  लेफ्टिनेंट कर्नल मायानाथ झाक ‘इजोत’ आ ‘ जकर नारि चतुर होइक’ मन पड़ैछ. रहस्य-रोमांच में योगेन्द्र पाठक ‘वियोगीक उड़न छू गोला’ नवीनतम आ उत्कृष्ट योगदान थिक. किन्तु, चित्रांकित बाल-साहित्य तं मैथिली में विरले भेटत. हमरा लोकनि सुनने छी जे हरिमोहन झाक कथा पढ़बाले बहुतो गोटे  मैथिली पढ़ब सिखने रहथि. अस्तु, कोन ठेकान, रोचक कथा, आकर्षक चित्र आ सरल भाषासँ आकृष्ट भए भूमण्डलीकरण एहि युग में सुदूर महानगर में बसैत मैथिल नेना सेहो मैथिली पढ़बा ले आकृष्ट हो. तें, हमरा जनैत मैथिली में सरल आ चित्रित बाल-साहित्यक प्रकाशनक आवश्यकता छैक.

ततबे नहिं, पढ़बाक रुचिक विकास मे माता-पिताक, शिक्षकक आ  संगी-साथीक  प्रेरणा, समयक उपलब्धताक योगदान सेहो छैक. किछु माता पिता जे बच्चा के बड्ड छोटे वयससँ पोथी पढ़ि कय सुनबैत छथिन, कथा-चित्र देखबैत छथिन ओहि म सँ  अधिकतर नेना कें छोटे वयससँ  पोथी पढ़बा में रूचि जागि जाइत छैक. तें जं एहि वयस में नेना कें मातृभाषा में कथा-पिहानी सुनबाक अवसर भेटैक, मातृभाषाक चित्र-कथा देखबाक अवसर भेटैक तं पछाति मातृभाषा पढ़ब निर्विवाद सुलभ भ’ जेतैक.  हं एहि में माता-पिताक संकल्प, प्रेरणा आ योगदान चाहियैकक. मुदा, एहि सब प्रयाससँ जं हमरा लोकनि आगामी पीढ़ी में मैथिली पाठकक संख्या में किछुओ वृद्धि कए सकी तं मैथिली कें बंचयबा दिशा में एकटा ई सार्थक प्रयास हयत.

 

1. Majid, S. (2018). Leisure Reading Behaviour of Young Children in Singapore. Reading Horizons: A Journal of Literacy and Language Arts, 57 (2). Retrieved from https://scholarworks.wmich.edu/reading_horizons/vol57/iss2/5

Monday, October 4, 2021

ओ बाबू भोजन नहिं ने मंगैत छथिन !

    1

कुञ्ज बिहारी बाबू आब बेस बृद्ध भए गेल छथि. जहिया धरि देह में पैरुख छलनि, जाधरि दिन में एक बेर भरि गामक फेरा नहिं लगा अबैत छलाह, नीक जकां अन्न नहिं पचनि. आब ठेहुन कज्जी भए गेल छनि, तें बेसी काल, दिन दलाने पर बिछाओने पर बितबैत छथि.

चिक्कन-चुनमुन कोठली, सीमेंटक फ्लोर नित्य चक-चक क’ कए पोछ्ल जाइछ. कोठलीक एक भाग उंचगर पलंग पर बिछाओल उज्जर दप-दप चद्दरि पर कुञ्जबिहारी बाबू पड़ल छथि. शरीर घटने जे अशक्तता आ उपेक्षाक बोध  होइत छनि, से चेहरापर घनीभूत भेल छनि.

आइ कतेक दिन पर दीनानाथ, कुञ्जबिहारी बाबूक पुत्र मणिनाथसँ भेट करए अयलाह तं हुनकर नजरि देबाल पर टांगल बुढ़ाक फोटो पर पड़लनि. एगारह गुणा चौदह इंचक भरिगर फ्रेम में कुञ्जबिहारी बाबूक भव्य स्वेतश्याम फोटोसँ  अप्रतिम आभा टपकि रहल छलनि.

फोटो देखि दीनानाथकें मणिनाथक प्रति असीम श्रद्धाक भाव जागि उठलनि. फोटोक प्रशंसा करैत कहय लगलखिन: बाबा,अहाँक ई फोटो बहुत दिन पहिनेक हयत ने ? ‘हूं.’ – कुञ्जबिहारी बाबू अन्यमनस्कतासँ  कहलथिन.

-‘सएह देखियौक मणिनाथ कहन जोगा कए रखने छथि. लगैए, आइए फ्रेम चढ़ाओल गेलैए !

दीनानाथक प्रशंसा सुनि बुढ़ाक माथ तबि गेलनि. कहलखिन, ठीके किने. ओ बाबू  भोजन नहिं ने मंगैत छथिन !

दीनानाथक मुँह अपन सन भए गेलनि.    

2

दादी  रहैत छथि ‘मोबाइल फ़ोन में !

जहियासँ बौआ बाजब सिखलनि, दादा-दादी कें प्रतिदिन हुनकासँ मोबाइल फ़ोन पर देखा-देखी होइत छनि. किछु-किछु गप्प सेहो होइत छनि. कहियो ओ कोनो कथा आ कविता सेहो सुनबैत छथिन. आब हुनका अपन नाम-गाम, माता-पिताक नाम सेहो आबि गेलनि-ए. दादी पुछैत छथिन:

-‘अहाँ कतय रहैत छी, बौआ ?’

-‘लालपुर’

-‘डैडीक नाम की अछि ?’

-‘एम एम कुमार.’

-‘मम्मीक नाम ?’

-‘लक्ष्मी कुमार.’ 

-‘आ,दादा कतय रहैत छथि ?’

बच्चा बिसरि गेलैये, गुणाकरपुर. नान्हि टा बच्चा आ बड़का टा नाम. बच्चा मन पाड़ैक कोशिश करैछ. बाप कहैत छथिन, ‘कहियौ, गुणाकरपुर’.

‘गुणाकरपुर’ बच्चा दोहरबैत अछि.

दादी पुछैत छथिन : ‘आ दादी कतय रहैत छथि ?’ बच्चा फेर सोचय लगैछ. ओकरा प्रतिदिन दादीसँ गप्प होइत छैक. बाप पहिने अपन माएसँ फ़ोन मे गप्प करैत छथि. बच्चा फ़ोन देखैत देरी, दादी-दादी, दादा-दादा, कहय लगैछ. आ बाप विडियो कॉल ऑन के दैत छथिन. आइ बच्चा कें जवाब देबा मे कनेक बिलम्ब होइत छैक तं बाप फेर पुछैत छथिन, ‘दादी कतय रहैत छथि ? कहियौ.’

बच्चा चटसँ  जवाब दैछ: ‘मोबाइल फ़ोन में !’

सब एके संग हँसए लगैत छथि. बच्चा ख़ुशी मे थोपड़ी बजबय लगैछ.


Friday, September 17, 2021

एकटा आओर कुन्ती

 

1

ओहि घटनाक करीब दस  वर्षसँ बेसी भए गेलैक. भगवानपुर डेरा छोड़ि भवानी आ सतीश कतय गेलाह, तहिया ककरो कोनो भांज नहिं लगलैक. मनमोहन कें इहो जिज्ञासा नहिं भेलनि जे अंतत श्रीपतिक की भेलनि. मुदा,  न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायर में अकस्मात् दू गोटेक मैथिली मे गप्प करैत सुनि मनमोहन पाछू घुमलाह तं आश्चर्यक ठेकान नहिं रहलनि, अनेक वर्ष पहिनेक बिसरल ओ मर्मस्पर्शी कथा आँखिक सोझाँ ओहिना आबि गेलनि जेना ओतेक दिन पहिने भेल रहैक.

भवानी आ सतीशक कथा अजगुते  रहैक. कथा तहियाक छियैक जहिया, श्रीपति आ भवानी नौकरीक तलाशमें भगवानपुर आयल रहथि. हुनकर सबहक डेरा मखानाही मोहल्ला मे रहनि. मखनाही मोहल्ला तहिया निर्जने जकां रहैक. ओतुका जाहि मकान मे श्रीपति आ भवानी रहैत छलीह से सतीशेक परिवारक रहनि. मुदा, ताधरि सतीश गामहिं पढ़इत रहथि. भवानीक पति, श्रीपति, सतीशक जेठ भाई, रतीश,क सार छलथिन. श्रीपति कें भगवानपुर मे रहबाक अपन मकान नहिं रहनि. ओतय किरायाक हेतु नीक मकान उपलब्धो नहिं रहैक.  तें, श्रीपतिक  बहिनोइ, सतीशक जेठ भाई- रतीश, श्रीपति कें ओतय रहबाले भगवानपुरक अपने  खाली मकान  द’ देने रहथिन.

छोट सन कस्बा. पुरान ढहल ढनमनायल सन खपरैल घर, कतेक दिनसँ खालिए पड़ल रहैक. श्रीपति ओहि पर रंग-रोगन आ पोचाड़ा करबओलनि आ रहए लगलाह. घरक आगू मे एकटा छोट सन खाली सेहो मैदान रहैक जाहि में बरखा भेला पर जहाँ-तहां पानि भरि जाइक. मैदानक पूब उत्तर कोन पर एकटा इनार रहैक. कनेक दूर पर एकटा सरही आम गाछ सेहो रहैक. आम रहैक सरही, मुदा, स्वाद अपूर्व होइक. खूब मीठ आ कनेक धुमनाह. आम गुदगर नहिं रहैक. परंतु, आम मे खूब गढ़गर रस होइक. अस्तु, ई आमक गाछ श्रीपति आ भवानीक पड़ोसिया भए गेल. आ से नीके बुझू. ई आमक गाछ बियावान सन परिसरक  शोभा रहैक. पोखरि-इनार, आमक गाछ आ खुला मैदान, भवानी कें गामे सन लगनि. तथापि, निर्जनता काटय दौगनि. तें, जखन श्रीपति नौकरीक तलाश मे जाथि वा पोस्ट ऑफिस- रेलवे स्टेशन जाथि तं असगरि भवानी पुबरिया बरामदा पर बैसलि दूर पोखरिक मोहार परक ताड़क गाछक पतियानी आ ओहि पर लटकल, बसात मे डोलैत चोंचाक अजस्र खोंताके देखैत रहथि. सोचथि, एतेक छोट-छोट पक्षी आ एतेक उंच खोंता. जखन माए-बाप चरी ले खेत-खरिहान जाइत हेतैक तं बच्चा सब कतेक डेराइत हेतैक. सुनने रहथिन, ताड़क गाछपर साँप धरि पहुंचि जाइत छैक. साँपसँ भवानी कें अपन गाम मन पड़ि अबनि. गाम में सुनने रहथिन जे घर मे बैसल एसगरि माउगि निरीह चिड़ै थिक, आ आस पासक पुरुष सब घासमें नुकायल साँप ! ई सोचिते  भवानीक देह सिहरि उठलनि. मुदा, फेर मन पड़थिन काली माई आ मनक भय विलीन भए जानि.मनहिं मन  सोचथि, कतय हम काली माई बनैत छी, आ कतय साँपक नामहिसँ  हमरा भय होइत अछि. ई सोचैत भवानीक मुँह पर अनेरे मुसुकी छिटकि अबनि. तखन ओ अपन दृष्टि दूर आकाश मे उड़ैत चिड़ै पर केन्द्रित करथि. आकाश मे उड़ैत चिड़ै कें देखि हुनका एकाएक नव ऊर्जाक अनुभूति होइनि. होइनि, जेना आकाश मे उड़ैत ओ सब चिड़ै  भवानी अपनहिं होथि: मुक्त, स्वतंत्र !

एकटा नीक संयोग भेलैक. किछुए दिनक पछाति, सतीश पढ़बाले गामसँ भगवानपुर अयलाह आ एही परिवारक संग एक कोठली में रहय लगलाह.  सतीशक  भगवानपुर अयलाक किछुए दिनक बाद हुनक जेठ भाई सतीशक खोज-खबरि लेल  भगवानपुर आयल रहथिन. ओ सतीशक रहबाक व्यवस्थासँ संतुष्ट भेलाह. सरहोजि, भवानी, कें कहलथिन, ‘अहाँ हिनक भोजन-सांजनक व्यवस्था तं करिते छियनि,  अहाँकें हिनक गार्जियनी सेहो करय पड़त. ई पढ़बा लिखबा मे चुस्त छथि, मुदा, अपन देखभाल में कनेक सुस्त. जलखै-पनिपियाइ कखनि करताह, ठेकान नहिं. वस्तु-जात सरियाकए राखब सेहो अहींसँ सिखए पड़तनि.’

भवानी कें हँसी लागि गेलनि. पुछलथिन, ‘अहाँक जन्म कोन सालक अछि यौ, सतीश ?’

-‘चौबन इसवी.’

-‘आ हम बावनक भ’ गेलहुँ तं गार्जियन भ’ गेलहुँ ?’

ओहि दिनुका गप्प ओत्तहि समाप्त भए गेल रहैक. आ सतीश अपन काज में लागि गेल रहथि. सतीशक नज़रि केवल अपन लक्ष्य पर रहनि. ओ एक भोर कालेज जाथि आ आपस आबि मुनहारि साँझ धरि पढ़बा मे लागल रहथि. भगवानपुर मे बिजुली बिजलोताए जकाँ कखनो काल चमकि जाइत छलैक. बेसी विद्यार्थी कें डिबिया-लालटेम में पढ़य पड़ैक. तें, बेसी गोटे दिन-देखार, समय पर अपन काज समाप्त कए लैत छल. सतीशो सएह करथि.

मुदा, एसगरि भवानीक दिन आ राति पहाड़ भए जानि. बैसि कए मलाहिन-कुजड़नी-खबासिनीसँ निरर्थक गप्प करब आ अनकर खिधांश करब हुनकर स्वभाव नहिं रहनि. तखन,दू गोटेक भानस क कए भरि दिन  कतेक कशीदा करितथि, कतेक टकुड़ी कटितथि. पढ़बा मे रूचि छलनि, मुदा, सामग्री कतय पाबी. सतीशक भगवानपुर अयलाक पछातियो दिन भरि जखन सतीश कालेज जाथि, भवानी एसगरिए रहथि. कारण,  नौकरी भेटलाक पछाति श्रीपति मलेरिया उन्मूलन कार्यकर्त्ताक रूपमे कुशेश्वरस्थान मे पदस्थापित भेल छलाह. तहिया कुशेश्वरस्थान आ भगवानपुरक बाट, दूरसँ  बेसी दुर्गम रहैक. नीक पक्की सड़कक कोन कथा. कच्ची सड़क, सेहो कोन सड़क कहिया भासि जायत, कोनो ठेकान नहिं. कमलाक धार असल में कुशेश्वरस्थान लग नहिं, बुझू कुशेश्वरस्थान भइए कए बहैत छल. बाढ़ि आयल तं आरि-धूर-बाट, खेत-खरिहान, गाछी-बिरछी, जे किछु बाट मे आयल, नाश भए गेल. अगिला साल फेरसँ  सड़क मरम्मतक नाटक होअय. मुदा, यातायात जस के तस रहैक. लोग साले-साले कहुना घर ठाढ़ करय, आ दिन काटय. मुदा, एहि इलाकाक सरकारी मोलाजिम ले  कुशेश्वरस्थानक पोस्टिंग बतर कालापानी छल. ओतय माछ, माखनक कोनो कमी नहिं. शिकारक प्रेमी ले  सिल्ली, बटेर, दिघोंच, जे चाही लए आनू. मुदा, ओतयसँ निकलबाक बाट आ सवारी भेटत तखन ने. बरसातक छौ मास तं बुझू बाट बन्ने. भगवान आंग-स्वांगसँ बंचाबथि ! श्रीपति तं शनि-रविक कोन कथा, पाबनिओ-तिहार में यात्राक असुविधाक कारण भगवानपुर अयबासँ हारि मानि लेथि. अपना श्रीपति के माछ-मखानक खूब रूचि रहनि. असुविधाक पर्यन्तो कहियो काल ओ भवानी ले सिल्ली सेहो लए आनथि. सतीशो कें सेहो सिल्लीक मासु बड़ पसिन्न रहनि. तें, श्रीपति जखन सिल्ली आनथि हुनका अपना कोनो श्रम नहिं करए पड़नि. मुदा, कुशेश्वरस्थानसँ  भगवानपुर आयबे बड़ कठिन रहैक.

एक साँझुक गप्प थिक. सतीश लालटेमक इजोत मे किताब दिस नजरि गडौने, पढ़बा में ध्यानमग्न रहथि. हुनका पढ़इत देखि, भवानी पयर मारि अइलीह आ चौकीक एक कोन पर बैसि गेलीह. किछु कालक पछाति सतीशक ध्यान भंग भेलनि. ओ नज़रि उठौलनि तं भवानी कें चौकीक कोन पर बैसल देखि हुनका मुसुकी छूटि गेलनि. पुछलखिन, ‘कहू. बाज़ारसँ किछु अनबाक छैक, आनि दियअ ?’

-‘नहिं, अहिना असगरिए टौआइत रही. आबि कए एत्तहि, अहीं लग आबि बैसि गेलहुँ. अंय, औ सतीश, एकटा गप्प पुछैत छी, हम आगाँ नहिं पढ़ि सकबैक ?’

-‘किएक नहिं. अहाँ मैट्रिक पास छी. समय अछि. अहाँ कहैत छलहुँ, अहाँक बाबू अहाँकें बुधियारि सेहो कहैत छलाह. कालेज में नाम तं लिखिए लेत.’

-‘आ चूल्हि के फुकतैक. सबसँ पहिने तं अहीँक भोजन बन्न भ’ जायत !’

-‘तकर कोनो गप्प नहिं. सब, सब दिन थोड़े कालेज जाइत छैक. आ लोक तं प्राइवेटहुसँ पढ़िते अछि. एतय तं कतेक विद्यार्थी अपनहिं हाथें भानस-भात सेहो करैत छथि आ पढ़ितो छथि. हमरा ने सुविधा अछि.’

-‘हमरा के पढ़ाओत,यौ ? जनिका  पुछबनि, एके जवाब : की लाभ ? मुदा, हमरा बड़ सेहन्ता होइत अछि, हमहू पढ़ितहुँ. हमहूँ स्कूलक धिया-पुता कें पढ़बितिऐक. असल में पढ़बा मे मोन सेहो लगै अछि. कहू तं, लोक केवल मन लगबाक कारण जं पढ़तैक तं कोनो दोष छैक ! एतय तं लोक हाथ में तराजू ल कय सब किछु मे हानि-लाभ तौलबा ले बैसल रहैए. अंए, औ हम अहाँक संग नहिं पढ़ि सकैत छी ?’

-‘पढ़ू ने. पोथी मंगबए पड़त. अपनहुँ तं लोक पढ़िते अछि.’

-‘आ जे बुझबा मे नहिं आयल से अहाँ नहिं बुझा देब ?’ भवानी विह्वल जकाँ होइत पुछलखिन.

सतीश सोझ उत्तर बिना देनहिं कहलथिन, ‘अहाँकें तं एखन फ़ुरसतिए फ़ुरसति अछि. श्रीपति बाबूसँ पूछि कालेज में नाम लिखयबा में कोन हर्ज़. हमरा जखन समय रहत, तखन पर हमहूँ सहायता कइए देब.’

सतीशक सुझाव पर भवानी गुम्म भए गेलीह आ मनहिं मन श्रीपतिक अगिला छुट्टीक बाट ताकय लगलीह.

किछुए दिन पछाति, एक सांझ, ओहिना सतीश लालटेमक इजोत मे पढ़इत  रहथि. भवानी बाहरक ओसारा पर हुनके चौकीक एक कोन पर बैसल सतीशकें देखैत रहथिन. श्रीपति बससँ उतरल हकासल-पियासल डेरा आयल रहथि. एकाएक श्रीपति कें आयल देखि भवानी धड़फड़ा कए उठलीह आ एक लोटा पानि आनि ओसाराक कगनी पर रखैत कहलखिन, ‘पयर धो लियअ. चाह नेने आउ ?’

‘कनेक थम्हि जाउ.’ कहैत कान्ह परक गमछा ल कए श्रीपति माथक पसेना पोछय लगलाह. पसेना पोछि गमछा कें चौकी पर एक कात राखि देलखिन आ स्वगत बाजय लगलाह: ‘हद्द भए गेल. इमरजेंसी आ सरकारक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम जे ने कराबय. बाटे-घाटे लोकसबकें पकड़ि- पकड़ि नसबंदी कए दैत छैक. सा......र  सब.’ श्रीपतिक मुँहसँ गारि बहरा गेलनि. भवानीकें लगलनि, जेना श्रीपति बड्ड तमसायल होथिन; तामसक अतिसँ  साँझुक अन्हार मे श्रीपतिक पिण्डश्याम वर्ण भवानी कें कारी झाम सन बूझि पड़लनि.

भवानी श्रीपति कें पंखी हौंकैत कहलखिन, ‘तं, की करबैक. मुदा, एहना स्थिति में लोकक सखा-सन्तान कोना हेतैक ! लोक-वेद कें की हेतैक, यौ ?’

-‘जानथि भगवान ! कुन्ती कें कोना सन्तान भेल रहनि !!’ आ ई कहैत श्रीपति भभाकए हँसय लगलाह. मुदा, बाटें-घाटे जबरदस्ती नसबंदीक गप्पक आश्चर्य आ श्रीपतिक अद्भुत् गप्पसँ भवानी ओहि दिन अवाक् भए गेल रहथि. सरिपहुं, ओहि साँझुक श्रीपतिक गप्प भवानीक माथ पर ठनका जकाँ खसल रहनि. मुदा, माउगि कें चुप रहि बहुतो गप्प सुनय पड़ैत छैक, से भवानी माए-पितियाइनिक मुँहसँ कतेक बेर सुनने रहथि. कहलखिन, ‘बैसू चाह भए गेल हेतैक. हम नेने अबैत छी.’ आ भवानी भीतर चलि गेलीह. मुदा, इमरजेंसीक ई  विचित्र पराभव हुनके भोगय पड़तनि, से भवानी कें अनुमान नहिं रहनि.

पछाति,एक दिन जखन श्रीपति भगवानपुरसँ  आयल रहथि, एक साँझ  दुनू गोटे चाहक कप ल’ कए ओसारा पर बैसि, ओलती मे पयर लटकौने, मौसमक आनंद लैत रहथि. भवानी समय देखि कहलखिन, ‘एकटा गप्प बुझलहुँ ?’

-की ?

-‘सतीश कें देखि कय हमरो पढ़बाक मन होइत अछि. अहाँ नहिं रहैत छी तं समयो काटब मुश्किले रहैत अछि. जं कालेज में नाम लिखा गेल तं अनमना रहत. सतीश सेहो कहैत छथि, अवसर पड़ला पर सहायता कइए देताह.’

श्रीपति लाड़ करैत कहलखिन, ‘बड़  बेस. मुदा, अहाँ तं ओहिना एतेक बुधियारि छी. एतेक पढ़िकय करबैक की ?’

‘फेर केलहुँ  ने अनपढ़वला गप्प !’ भवानीक मुँहसँ अकस्मात् बहरा गेलनि. कहलखिन, ‘अऍ यौ, पढ़बा ले सेहो कारण चाहियैक ! हम मास्टर बनबैक ! प्रोफ़ेसर बनबैक !! अहाँकें कोनो आपत्ति ? टाका तं घरहि मे ने आओत, घरहिं खर्च हेतैक. मालिक तं पुरुखे थिकाह.’ कहि भवानी मुसुकाए लगलीह आ आगू कहलखिन, ‘धीया-पढ़त से मुफ्त में !!’

श्रीपति हँसय लगलाह. कहलखिन, ‘हमरा कोनो उजुर नहिं. दरखाश्त दिऔक. खर्च हम देबैक.’

भवानी सोझे उठि कय ठाढ़ भए गेलीह. दूरेसँ  हाक देलखिन, ‘सुने छी, यौ सतीश ? हमहूँ पढ़बैक.’ आ ओ सोझे भीतर गेलीह आ हाथ में एकटा सराई में दू टा लड्डू लेनहिं घरसँ बहरइलीह, आ श्रीपति कें  कहलखिन, ‘ई अहीं अनने रही, तें, एहि खुशनामाक पहिल लड्डू अहीं कें.’ श्रीपति चाहक कप एक कात कए देलखिन आ दाहिना हाथसँ एकटा लड्डू फोड़ि एक टुकड़ी मुँह में दैत कहलखिन, ‘लियअ एक टुकड़ी अहूँ खाउ.’ भवानी लड्डूक टुकड़ी श्रीपतिक हाथसँ ल’ लेलनि. पछाति, सतीश जुमलाह, तं, खुशनामाक लड्डू ओहो खयलनि.

2

भवानी स्वभावसँ पंछी जकाँ स्वतंत्र आ मनसँ  निश्छल रहथि. विशाल नील आकाश, शीतल पुरिबा बसात, आमक गाछी-कलमक छाया आ कमला कातक हरियरी भवानीक मन मोहि लैत छलनि. जखन कुमारि रहथि, जखन-जखन तेज पुरिबा बहैक तं ओ अपन केश खोलि सोझे बसातक विपरीत दिशामें दौड़ि आबथि. सखी-बहिनपा हँसथिन आ कहथिन, ‘है, कोना करैत छह !’ मुदा, भवानी भभाकए हँसथि आ  कहथिन, ‘तोहों सब चलह ने. केश खोलि कए पुरिबा दिस दौगलासँ केशक जड़ि- जड़ि मे जाइत बसातसँ  देहक पोर-पोरमे फुर्ती आबि जाइत छैक. देखैत नहिं छहक, कालीमाताक केश कोना खूजल रहैत छनि.’

‘बाप रे, बाप ! कालीमाता ?’ लोककें कतेक भय होइत छैक !

‘धुर ! भय आ काली मातासँ !! ओ तं माता छथिन. हुनकासँ भय तं राक्षसकें होउक. हमर अगोंट नहिं देखैत छह. हमर बाबू हमरा दुलारसँ श्यामा कहैत छथि. हमरो अंगोट तं कालीए माई जकां अछि. मुदा, माए भवानी कहैत छथि. ओ अपन बेटीकें कारी किएक कहथिन ! आ हमरा कहए केओ तं कारी ? काली जे छिऐक !!’

एहने रहथि भवानी: निधोख, मुँहफट्ट, निर्भीक, मुदा, सरल आ सहृदय. दोस्ती तं हुनका ककरहुँसँ  भ’ जाइनि. तखन सतीश कोन कथा. मुदा, जखन भवानीक नाम कालेज में नाम लिखल भइओ गेलनि, तइओ किछु दिन धरि ओ डेरहिं पर पढ़थि. पछाति सतीश कें रोज बहराइत देखि अपनो उत्सुकता भेलनि. भेलनि जे कालेज जायब तं नव अनुभव हएत. देखियैक. दिन काटब सेहो पहाड़ नहिं हयत. पछाति जं प्रति दिन जायब नहिं पार लागल, तं देखल जेतैक. आ भवानी प्रति दिन सतीशहिं संग कालेज जाए लगलीह.

सतीश स्वभावसँ कनेक लजकोटर, मुदा, सहमिलू रहथि. अपना वयसक  कन्या लोकनिसँ मेलजोलक अनुभव नहिं रहनि. ऊपरसँ  पढ़बाक धुनि. मुदा, प्रतिदिनक संगबे आ आन कोनो संगबेक अभाव दुनू गोटेक बीच परिचयकें क्रमशः मित्रता में बदलए लगलनि. पुरुखक संग एहन मित्रताक अनुभव भवानी कें कहियो नहिं भेल रहनि. सतीश सेहो अपना भरि भवानीक सहायता में कोनो कोर कसरि नहिं रहय देथिन. मुदा, हुनका अपन लक्ष्य रहनि. से ओ कहियो नहिं बिसरथि.  मुदा, बितैत समय आ दिन-प्रतिदिनक संगबे सतीश आ भवानीक परिचय बढ़ौलक. क्रमशः एक दोसराक स्वभाव आ व्यक्तित्वक खोल परत-दर-परत खुजैत चल गेल. ई दुनू गोटेक हेतु सुखद अनुभव छलनि.तथापि, सतीशक दिससँ  एखनहुँ औपचारिकताक देबाल आ दूरी ओहिना छल.  कखनो काल ई औपचारिकता भवानीकें छाती पर जांत जकां बूझि पड़नि. कहथिन, ‘यौ सतीश अहाँ हरदम मूड़ी गाड़ने किएक गप्प करैत छी. हमरासँ  भय होइछ ?’ एहि पर सतीश कें मुसुकी छूटि जाइनि. भवानी आओर खोंचाड़थिन: ‘हम बंगालिन छियैक ? आँखिएसँ जादू कए दैत छियैक ?’

सत्यमें भवानीक पिण्डश्याम वर्ण, घनगर कारी केश, गाढ़ कारी आँखि आ संतुलित देह-यष्टि में किछु चुम्बकीय छलैक तं अवश्य जे केवल देखनिहारे टा कें बूझि पड़ैक. एकर अनुभव सतीश कें कहियो नहिं भेल रहनि, से नहिं. किन्तु, ओ माए-बापसँ निरंतर सुनथि, ‘बौआ, आदर्श विद्यार्थीक हेतु कहबी छैक,  ‘काग चेष्टा बको ध्यानः श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणः’. सतीश एकरा गेठरी बान्हि कए रखने रहथि.  मुदा, एकटा अप्रत्याशित परिस्थिति सब किछु बदलि देलक; एकटा पुरुष आ एकटा नारिक संगबे आ तेसर व्यक्तिक स्वार्थ परिस्थितिके तेना बदलैत चल गेल, जे सतीशक  संकल्प, संकल्पे रहि गेलनि.

3

इंदिरा गांधीक सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय इमरजेंसीक बज्र बहुतो पर खसल रहैक. केओ जहल गेल, केओ लाठी खेलक, आ ककरो बलपूर्वक नसबंदी भए गेलैक. श्रीपति, जनिका एखन धरि सखा-संतान हएब बांकीए रहनि, अकस्मात् बलपूर्वक नसबंदी शिकार भए गेल रहथि. ई भवानी आ श्रीपति दुनू बुझैत रहथि. मुदा, भवानी एकरा एकटा दारुण दुर्घटना बूझि स्वीकार कए लेने रहथि. हुनक पारंपरिक संस्कार अक्षुण रहनि. ततबे नहिं, धिया-पुता नहिं भेने लोक बाँझ कहत, वा से सामाजिक दोष थिकैक हुनका तकरो बोध नहिं रहनि. मुदा, श्रीपतिक संग जे त्रासदी भेल रहनि ताहिसँ  सबसँ बेसी हुनक पुरुषार्थ पर ठेस पड़ैत रहनि. जं एहन दुर्घटना आइ भेल रहितैक तं बहुत उपाय होइतैक. मुदा, तहियाक मुफस्सिल इलाका आ लोक लाजक बहुतो बाध्यता रहैक. असल में जखन किछु वर्ष धरि भवानी आ श्री पति कें कोनो संतान नहिं भेलनि तं श्रीपतिक परिवार दिससँ श्रीपति पर  दोसर विवाहक करबाक दवाब पड़य लागल रहनि. भवानीकें श्रीपति से कहने रहथिन. भीतरे भीतर श्रीपति, सतीश आ भवानीक  अनायास सहयोगसँ एहि समस्याक समाधान अवश्य देखैत रहथि. मुदा, स्वार्थक अछैतो एहन गप्प कोन पुरुषक मुँहसँ बहरयतैक.

भवानी स्वभावसँ निर्भीक रहथि. तथापि, भवानी देखथिन जे सतीश आ भवानीक बीच बढ़इत मित्रतासँ  श्रीपतिक के कोनो आपत्ति किएक हेतनि, लगनि  जे हुनकर ध्यानहु ओम्हर जाइतो नहिं जाइत छलनि.  सत्यतः, पछाति भवानी कें ई बुझबामें कनिओ संदेह नहिं रहलनि जे श्रीपतिक सतीश आ भवानीक बीचक मित्रताकें सम्बन्ध में परिवर्तित करबाक हेतु आतुर छलाह. भवानी कें लगनि जे अपन स्वार्थ में श्रीपति सब लाज-धाख घोरि कए पीबि गेल रहथि. तथापि, श्रीपतिक मनें साँपो मरि जाय आ लाठीओ ने टूटय. मुदा,नारिक संस्कार संस्कार थिकैक. नारीक संकल्प में बज्र सन कठोरता आ आकस्मिकता सेहो होइछ, जे कदाचित् अवसर अयला पर प्रकट होइछ. ई सब सोचैत, भवानी कें अपन बाबू मन पड़ैत रहथिन. कहथिन, ‘है, राक्षस सबसँ हारल देवता लोकनिक उद्धार तं भगवती दुर्गा कयने रहथिन. ई कोनो कथा मात्र नहिं थिकैक. तें, नारि कें पुरुखक बैसाखीक सहारा नहिं चाहियैक. आश्चर्य अछि, सब ठाम नारि अबला जकां मारि-गारि किएक सहैत अछि !’ कान में बाबूक स्वर भवानीकें ऊर्जासँ भरि दैत छलनि. सोचथि, ‘पुरुष जेहन हो, मुदा, नारि सदानीरा थिक. हमर आत्मबल हमरा सत्य-असत्यक भेद में सहायक हएत !!’

4

भवानीक नाम कालेज में लिखल भए गेल रहनि. ओ पढ़य लगलीह. मुदा, हुनक पढ़ब, हुनक अपन दायित्व रहनि. अपन मनोरथ, अपन  प्रेरणा, आ अपने श्रम. हुनक सफलता आ असफलता अनका ले कोनो अर्थ नहिं रखैत छलैक. तें, सतीश आ भवानीक अपन-अपन दुनियाँ रहनि. अपन-अपन लक्ष्य रहनि. सतीश आ भवानी, दुनूक हेतु सफलताक अर्थ भिन्न-भिन्न रहनि. सतीशक सफलताक हेतु जहाँ धरि संभव छलनि, भवानी सहायता करबे करथिन. सतीशकें कोनो बाधा नहिं होइनि, सेहो हुनक प्रयास में रहनि. मुदा, मौका देखि भवानी अपन शंका-समाधान ले सतीशक सहायता लेथि. एक दिन सतीश कहलथिन, अहाँ जे हमरासँ शंका पुछबा ले अबैत छी, आ चल जाइत छी, फेर अबैत छी, फेर जाइत छी, से चाही तं एतहु हमरा लग बैसि पढ़ि सकैत छी. हमरा कोनो आपत्ति नहिं.’

भवानी सतीशक एहि प्रस्ताव पर कनेक गुम्म भए गेलीह. कहलखिन, असल में हम पढ़ितो रहैत छी, आ भानसो करैत छी. आश्रमक आनो हुच्ची-फुच्ची रहैत अछि. आ एकटा सत्य गप्प कहू ,यौ सतीश ?

-की ?

-‘अहाँक संग-संग पढ़ने हमरा तं लाभ अवश्य हयत. मुदा, परिवारक नजरि में ओ निरर्थक थिक. किन्तु, एहि डेरा पर रहि अहाँक पढ़ाई में जं कनेको बाधा भेल तं लोक दोष हमरे देत. श्रीपति बाबूक तं केओ नामो नहिं लेतनि.’

सतीश एहि पर ओहि दिन जहिना मूड़ी गाड़ने पढ़इत रहथि, ओहिना पढ़इत रहि गेलाह. किन्तु, ई कहब असत्य हएत जे संग पढ़बाक प्रस्ताव पर भवानी मन में एकटा सुखद संवेदनाक अनुभूति नहिं भेलनि. सुन्दर-सुदर्शन युवक. तेजस्वी आ पढ़बा पर केन्द्रित. ताहू में ओ सरि भ कए भवानीक दिस मुड़ी उठाइओ कए नहिं देखथिन. भवानीक वयसे की रहनि; सतीशक समवयस्के छलीह. मोहल्ला एकाकी रहैक. श्रीपति पावनिए-तिहार में आबि पबथिन. सेहो, जं समय रुख-सुख रहलैक. एहना परिस्थिति में सबसँ लगक मनुखक संगतिक सेहन्ता अनुचित नहिं छलैक. ऊपरसँ भवानी कें बूझि पड़नि जे सतीश हुनका दिससँ  सर्वथा उदासीन छथि. भवानीक प्रति सतीशक एहि उदासीन व्यवहारसँ  कोना-ने-कोना क्रमशः भवानीक भीतरे-भीतर सतीशक प्रति आकर्षणक अनुभव करय लागल रहथि. मुदा, ई भावना बहुत दिन धरि भवानीक मनक भीतरहिं नुकायल रहल. मुदा, सतीशक प्रति आकर्षण पछाति भवानीकें सतीश दिस झिकय लागल रहनि. फलतः, पहिने कहियो काल, पछाति नियमतः ओ सतीशे लग बैसि पढ़य लगलीह. तथापि, किछु दिन धरि तं सतीश जहिना रहथि, तहिना रहलाह. मुदा, पछाति जहिया ओ भवानी कें अपना लग नहिं देखथिन तं हुनको एकटा शून्यताक बोध होइनि. सतीश तकरा भले प्रकट नहिं करथि, मुदा, भवानी कें होइनि जे सतीश हिनकहिं बाट तकैत छथिन. भवानीक हेतु ई सुखद अनुभव छल.

संयोगसँ  एक दिन सतीश कें एकाएक ज्वर भए गेलनि. किछु दिन तं ओ ओकरा मोजर नहिं केलखिन. मुदा, पछाति डाक्टरसँ सलाह लेलनि. इलाज भेलनि. मुदा हुनक स्वस्थ हेबा में दस-पन्द्रह दिन लागि गेलनि. एहि अवधि में भवानी हुनक पथ्य-परहेजक हेतु हरदम तत्पर रहथि.

ज्वर उतरलाक पछाति एक दिन सतीश बिछाओन पर पड़ल छलाह. भवानी ओतहि आबि बिछाओनक एक कात बैसल छलीह.  सतीश कहलखिन, ‘ अहाँकें हमरा हेतु बड्ड तरद्दुद भेल. अहाँ तं हमरा हेतु नर्सहु सं बेसी भए गेलहुँ.’ सतीशक गप्पसँ भवानी के आँखि में नोर आबि गेलनि. कहलथिन, ‘ अहाँ सन जड़सँ एहने गप्पक आशा छल. अहाँक मन मरुभूमि थिक. मनुख के अहाँ मनुख बूझैत छिऐक ! हम तं अहाँकें मित्र आ सहपाठी बूझैत रही. आ अहाँ हमरा नर्स बूझि लेल. नारिक मन बूझब पुरुषक बस नहिं.’

सतीश कें अपन कहल पर पछताबक होमए लगलनि. हुनका अक्क ने बक्क फुरलनि. कहलखिन, ‘हम अहाँक ओतय रहि कए पढ़इत छी. अनुशासन में छी, किछु अपन आ किछु अनकर. कहू हमरासँ कोन घटी भेल ?’

भवानी कहलखिन, ‘ अनुशासन तं बूझल, मुदा, अहाँकें मनुष्यतो अछि ? हम मासक मास एसगरि रहैत छी. मनुखक संगति तकैत छी. मुदा, हमरा अपना लग इंटा-पाथर, गाछ-वृक्ष, आ चौखटि-केबाड़क अतिरिक्त आओर कहाँ किछु देखबा में अबैछ. होइत छल, एतय हमरा अतिरिक्त एकटा मनुखो रहैत अछि. मुदा, से हमर भ्रम छल. अहाँ पाथर छी !’

सतीश भवानीक एहि गप्प पर स्तब्ध भए गेलाह. एहन आकस्मिकता हुनक हेतु अप्रत्याशित छलनि. आकस्मिकताक एहने क्षण में ओ भवानीक लग आबि हुनकर हाथ पकड़ि, हुनक नोर  पोछि देलखिन. कहलखिन, ‘अहाँक मुँहसँ एहन गप्प नीक नहिं लागल.’

भवानी कहलखिन, ‘ आ हमरा ? अहाँ जहियासँ एतय एलहुं-ए हमरा लागल जे हम एतय एहि अकाबोन  में एसगर नहिं छी. अहाँक संगति हमर एकाकी जीवन कें सार्थक कए देने छल. श्रीपति व्यस्त छथि. अहाँ अपने व्यस्त छी. तखन हमर काज कोन ? घर देखू, भोजन बनाउ, आ बिछाओन पर पड़ल चार कें देखैत रहू. अहाँकें पढ़इत देखि पढ़बाक मनोरथ भेल. अहाँक संग कालेज जाय लगलहुँ, तं, भविष्यक अनेक सपना मन में आबय लागल. मुदा, अहाँ कें कहियो एहन भेल जे हम-अहाँ संग-संग रहितो छी. हम-अहाँ एक संग रहितहुँ ?’

‘ ई सब जुनि पुछू. उद्वेगक पाछू जं मनुष्य भागए लागए तं उद्देश्य बाटहिं रहि जेतैक.’ सतीश कहलखिन.

‘मुदा, हमरा कठिन बाटमें कनिओ कालक सुखद अनुभवकें मुट्ठी में पकड़बाक हिस्सक अछि. मुदा, अहाँ से नहिं बुझबैक !’ कहि भवानी हाथ छोड़बैत भीतर जाय लगलीह. मुदा, ओही क्षण सतीश हुनका अपना दिस घिचैत छाती में सटा लेलखिन आ हुनक ठोर पर अपन दुनू ठोर दए, भवानीकें ओत्तहि तेना शिथिल कए देलखिन, जे हुनका एकाएक भेलनि जे ओ सब बंधनसँ  मुक्त भए रहल छथि, ओ क्रमशः आ अपन मुँहके सतीश छाती में नुकबैत चल गेलीह. ओकरा पछाति भवानीक चेतनाक की भेलनि, हुनक मोन नहिं रहलनि. अन्ततः, जखन भवानीक  निन्न टुटलनि तं देखलखिन चारू कात सोनहुल रौद पसरि आयल रहैक. सतीश बाहर ओसरा पर भोरुका रौद में सब दिन जकां पढ़ि रहल छलाह. सत्यतः, भगवानपुर परिसर में भवानी कें रौद एतेक सोहनगर कहियो नहिं बूझि पड़ल रहनि. ततबे नहिं, ओहि दिनुक आकस्मिक घटना भवानी आ सतीशक संबंधके एकटा नव आयाम दए देलक. ओकर असरि एतबे भेल जे ओ लोकनि नित्य संग-संग पढ़य लगलाह. संगहिं, दुनूक संबंध आब वास्तविकताक धरातल आ आवश्यकताक अनुशासनक रितिएँ बढ़य लागल. भवानी मुक्त छलीह.

5

अगिला मास श्रीपतिकें एक हफ्ताक छुट्टी भेलनि. ओ अकस्मात् भगवानपुर अयलाह. बस अबैत-अबैत हुनका साँझुक दससँ  ऊपर भए गेल रहनि. भवानी आ सतीश ओहो दिन एकहि ठाम पढ़इत रहथि. सतीशकें पढ़बाक पाहि लगबामे देरी भए रहल छलनि. मुदा, भवानी नित्य प्रति जकाँ संगहिं खाए चाहैत छलीह. मुदा, हुनका दिनुका थकान में आँखि लागि गेलनि, आ ओ ओतहि सतीशक बिछाओने पर निभेर निन्न भए गेल रहथि. अकस्मात् श्रीपति जखन डेरा अयलाह, तं भवानी कें सतीशेक बिछाओन पर सूतल देखलथिन. श्रीपतिक एना आयबसँ सतीश हतप्रभ भए गेलाह. कहलखिन, ‘एखने तं पढ़इत छलीह. हमरा देरी भेल तं हिनका दिनुका थकान में निन्न आबि गेलनि.’

सतीशक गप्प पर बिना किछु ध्यान देने श्रीपति भवानी कें दुलारसँ उठौलखिन. श्रीपति कें देखि भवानी धड़फड़ा कए उठलीह. हुनक देह सुन्न होमए लगलनि, ‘कहलखिन की कहू, हमर निन्न पहाड़ अछि. सतीशक पढ़बा में किछु देरी की भेलनि, हमरा कखनि निन्न भए गेल बुझबो ने केलिऐक. स्वाइत कुमारि में हमर नाम लोक असेढ़ रखने छल. ओ तं अहाँ छलहुँ, नहिं तं लोक की कहैत ? कहू तं.’ कहैत भवानी कठहँसी हँसए लगलीह.

‘की कहैत ? अहाँ सतीशहुँक सरहोजिए जकां छियनि ने. लोक कें हँसी करबाक अधिकार तं छैहे, मुदा, एहन घटना जकरा सामान्य परिस्थिति में  परिवार कें तोड़ि कए राखि देबाक संभावना रहैक, केर श्रीपति पर कोनो असरि नहिं भेलनि. ओ खुशी-खुशी छुट्टी बिताकए कुशेश्वरस्थान वापस भए गेलाह.

अस्तु, आब भवानी आ सतीशक संबंधक नारि-पुरुषक संबंधक परिणति दिस अग्रसर भेल; किछुए दिन में भवानी कें संतान होनिहारी भए गेलनि. श्रीपति खूब प्रसन्न भेलाह. हुनक प्रसन्नताक कोनो सीमा नहिं छल, जखन भवानीकें पहिल बेटा भेलनि. श्रीपतिक माए कें छठिहार  नहिं धारैत रहनि.तें, छठिहार में बच्चाक पैत्रिकसँ  केओ नहिं एलनि. मुदा, भवानीक माए जे बच्चाक जन्मक हेतु आयल रहथिन रहि गेलीह. छठिहार में श्रीपति, भवानी, सतीश आ श्रीपतिक सासुक अतिरिक्त केवल एक दू गोटे आओर आयल रहथिन. मुदा, बहुत धूमधामक अभावक अछैतो, परिवार अत्यंत प्रसन्न छल. एहिसँ भवानीकें भेलनि जे हुनक छाती पर नौ माससँ  पड़ल जांत एकाएक उतरि गेलनिए. श्रीपति अपना दिससँ सासु कें छौ मास धरि रहि बच्चा-जच्चाक सुश्रूषाक अनुरोध केलखिन. सासु मानि गेलखिन आ श्रीपति निश्चिंत भए कुशेश्वर गेलाह.

मुदा, ई कथाक  समाप्ति नहिं छल. दू वर्ष भरिक भीतरे भवानीकें एकटा बेटी सेहो भेलनि. कन्या सेहो भगवतीए  जकां सुन्नरि छलि.  एहि कन्याक जन्म श्रीपतिक हर्ष कें दूना कए देने छल. मुदा, कन्याक जन्मक करीब दूइए वर्षक भीतर एकटा छोट घटना परिवार में बिहाड़ि आनि देलक. भेलैक एना जे एक दिन एकटा बहता योगी हिनका लोकनिक भगवानपुर डेरा पर आयल. श्रीपतिओ ओहि दिन भगवानपुरहिं रहथि. साधु कहलखिन जे ओ हस्तसामुद्रिक में सिद्धहस्त छथि. भवानी, सतीश आ साधु सब बाहरक ओसारा पर बैसल छलाह. भवानीक दुनू बच्चा सेहो खेलाइत- खेलाइत ओतय जूमि गेल छल. एही बीच श्रीपति एकाएक अपन दाहिना हाथ साधुक आगाँ पसारि देलखिन आ कहलखिन,’ बाबा, किछु कहू’. साधु किछु काल धरि हाथकें उनटा-पुनटा कए देखि गुम्म भए गेल. साधुकें गुम्म देखि श्रीपति पुछलखिन, ‘की बाबा ? गुम्म किएक भए गेलहुँ ?’

साधु मौन तोडैत कहलथिन, ‘अशुभ गप्प कहबा मे प्रमाद होइत अछि. मुदा, पुछलहुँ तं कहहि पड़त.’

‘तखन कहिए दिअए.’- श्रीपति हंसैत कहलखिन.

‘ अहाँ कें सन्तानक योग नहिं अछि.’

सतीशकें जेना अभिजंक भए गेलनि. मुदा, साधु हुनक दिससँ ध्यान हंटा, दुनू नेना दिस इंगित कए,  सतीशकें लक्ष्य करैत कहलखिन, अहाँक दुनू नेना ठोकल अहीं सन अछि.’

साधु एहि गप्प पर श्रीपतिक देह में जेना कबाछु लागि गेलनि आ ओ चोट्टे ओतयसँ  उठि, दुनू नेनाक डेन पकड़ने भीतर चल गेलाह. हुनका भेलनि जे क्रोधसँ हुनक ब्रह्माण्ड फाटि जेतनि. ओ भीतरेसँ साधुकें चल जेबाक हेतु कहि, भवानी कें अंदर बजा लेलखिन.

दोसर दिन कुशेश्वरस्थान जयबा काल ओ भवानीकें कहैत गेलखिन, जे हुनक अगिला बेर भगवानपुर अयबासँ पहिने सतीश डेरा छोड़ि देथि.

भवानी एहि पर अवाक् भए गेलीह. हालहिं सतीशक एम. ए. क रिजल्ट बहरायल रहनि. ओ दिल्लीक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम. फिल. क हेतु नाम लिखयबाक तैयारी में लागल रहथि. भवानीक बी ए क परीक्षा समाप्त भए गेल रहनि. रिजल्ट आयब बांकी रहनि. एहन परिस्थिति में श्रीपतिक एकाएक अठाबज्जर खसायब अप्रत्याशित छल. मुदा, विपरीत परिस्थितिए में मनुखक व्यक्तित्वक असल परीक्षा होइत छैक. भवानी कें यथार्थक सोझ बाट में हुनका कोनो व्यतिक्रम सेहो नहिं देखबा मे अबनि. एक कात छल अनायास, निःस्वार्थ प्रेम. दोसर कात श्रीपतिक स्वार्थ. एहि स्वार्थक प्रत्यक्ष उपकरण रहथि ओ अपने आ सतीश, एकटा पुरुष आ एकटा नारि. एकर विपरीत सतीश कें  संयोग आ स्वार्थक उपजल श्रृष्टि आ अपन अस्तित्व पर अपने मन प्रश्न चिह्न ठाढ़ करैत रहनि. मुदा, सतीश मनहिं मन आश्वस्त होथि जे भवानी ने निर्बल छथि, ने ओ अपने मूर्ख छथि. हुनका अपन विवेक विश्वास रहनि. ओ इहो सोचथि जे भवानी सेहो जतबे सरल छथि, ततबे दृढ़ छथि- ग्रेनाइट पाथर सन.’  से अवसर अयलापर प्रमाणित भइए गेल. ठीके, त्वरित रूपें बदलैत घटनाक्रम  अन्ततः एक दिन परिस्थिति एकाएक बदलि देलकैक. परिस्थितिक ई मोड़ आशातीत छल. अनायास बीतल आठ वर्ष में की-की ने भए गेलैक. आठ वर्षक एहि सुखद अवधि में एखनुक ई अचानक भूकम्प भवानी आ सतीश ले नितान्त अप्रत्याशित छलनि. भवानी सोचलनि श्रीपतिक स्वार्थसँ दूर, हुनकर अपन आ सतीशक बीचक सम्बन्धक में कोनो ग्लानि नहिं. हुनक मनक ई भाव हुनका एकटा नव बल देलकनि, आ ओही बलसँ उपजल स्वतंत्रताक बोध हुनका श्रीपतिक बंधनसँ मुक्त के देलकनि. ई एकटा नव अनुभूति छल.

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सतीश कें ओ दिन कोना बिसरतनि. हुनक अंतिम परीक्षा लगिचायल रहनि. पछिले राति श्रीपति भगवानपुर आयल रहथि. नहिं जानि भवानीसँ राति में की गप्प भेल रहनि. दोसर दिन भोरे श्रीपति घर मे अठाबज्जर खसा देने रहथिन. ओहि समय में सतीश कतहु गेल रहथि. वापस अयलाह तं जे किछु होइत देखलनि ओहिसँ हुनका गप्प बुझबा में किछु भांगठ नहिं रहलनि. देखलनि जे श्रीपति हुनक कुल पोथी-पतरा, बक्सा-पेटी आ वस्तु जात उठाकए घरक बाहर फेकि चुकल रहथि. श्रीपतिक धृष्टता देखि ताधरि भवानी साक्षात् कालीक रूप  मे आबि गेल छलीह- क्रुद्ध  आ निर्भीक ! सतीश देखलनि जे क्रोध आ घृणासँ  भरल भवानी श्रीपतिक आँखि में आँखि द’ कए  हुनका ललकारि रहल छलीह, ‘अच्छा ? लोक नीक बेजाए बजैए, से आइ बुझलिऐक ? हमरा बच्चा पर बच्चा होइत गेल आ अहाँ कें लाज भेल ? आब एकाएक अपन प्रतिष्ठा मन पड़ल-ए’ ! ताहि पर क्रोधे आन्हर भेल श्रीपति, ‘चुप कुलटा !’ कहि अचानक बामा हाथें भवानीक झोंट पकड़ि जहाँ हुनका मारबाक हेतु जहाँ दहिना हाथ उठौलनि कि  भवानी अपन दाहिना पयर उठा श्रीपतिक अंडकोषमें तेहन लात देलखिन जे हुनका ओतहि मूर्छा भए गेलनि. ई अप्रत्याशित छल. मुदा, ई ओहि दिनुक घटनाक अंत नहिं छल. श्रीपति कें होश भेलनि तं ओ सतीश कें सेहो एकदम नव स्वरुप में देखि हतप्रभ भए गेलाह. श्रीपति कें ललकारैत सतीश चिकरि रहल छलाह, ‘हमरे घर आ हमही घरसँ बाहर हएब ?  अहाँ हमरे समान फेकि देल. अहाँक जोड़ा निर्लज्ज नहिं भेटत एहि संसार में. नपुंसक !! मुदा, अहाँक काज एखन पूरा नहिं भेले. भवानीक समान तं भीतरे छनि. हिनको सब समान एखनहिं बाहर करू . अहाँ हुनका कोन अधिकारसँ  अपना लग रखबनि ? ओ रहतीह एतय ? पुछियनु तं !’

श्रीपति सतीशक  एहि अकस्मात् परिवर्तित स्वरुप ले प्रस्तुत नहिं छलाह. क्रोध में हुनका सम्हार नहिं रहलनि. ओ एकाएक उठि सतीशक पर  चिकरलाह, ‘लम्पट !’- आ क्रोध मे, ओसारा पर पड़ल लोटा उठाकए सतीशक माथ पर दए मारलखिन. सतीशक कपारसँ छर-छर शोणित बहय लगलनि. सतीश युवक छलाह. ओ अपना कें तुरत सम्हारलनि आ कूदि कए, एके छरपान मे, दाहिना हाथें श्रीपतिक नरेटी पकड़ि , ‘आँखि में आँखि दैत कहलखिन, कए दियअ एखने लीला समाप्त ?’

श्रीपति के अक्क-बक्क किछु नहिं फुरयलनि. हुनकर चेहरा पीयर भए गेल रहनि. भेलनि जे आब क्षण भरि मे जं सतीशक हाथ ढील नहिं भेलनि तं प्राण नहिं बंचत. तखने, बिजलीक गति सं पुनः भवानी बहरयलीह. क्रोध-घृणा आ हताशाक मिश्रित भावक अछैतो, ओ संयमित जकां सतीश कें कहलखिन, ‘छोड़ि दियनु हिनका. मरल विवेक, मृत्यहुसँ निकृष्ट थिक. हिनक प्राण लेबासँ किछु नहिं भेटत. ई जीविते कहाँ छथि. ई कहि ओ श्रीपति कें  देखि कहलथिन, ‘अहाँक पुरुषे कहयबाक टा ने लोभ छल. से भेटि गेल ने ? हम अहाँक वंश बुड़बासँ बंचा देलहुँ. अहाँ पुरुख भ’ गेलहुँ ने ! अहाँ आब रहू. हम मुक्त छी. हमरा अपन बाट सोझ देखबामे अबैछ. हमरालोकनि चललहुँ .’

श्रीपति अवाक् भए गेलाह. कहलखिन, ‘ एना जुनि कहू, भवानी ! हमर की हयत ?’

‘से अहाँ जानी.’ भवानी अपन मन मे दृढ़ रहथि, तं सतीश कृतसंकल्प. भवानीक मन में कोनो दुविधा नहिं छलनि. ओ कहलथिन,’हमरो एकटा पुरुष चाही जकरा केवल अपन मिथ्या प्रतिष्ठा टाक लोभ नहिं, हमर आवश्यकतो होइक, हमर आदरो होइक.’ आ  भवानी दुनू नेनाक डेन पकड़लनि आ उठि कए विदा भए गेलीह, आ सतीश कें कहलखिन, ‘देखैत की छी ! चलू.’

श्रीपति किंकर्तव्यविमूढ़ भेल, ठामहिं बैसल रहि गेलाह.

आइ एतेक दिनक बाद अकस्मात् सतीश आ भवानी कें न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायर में देखि मनमोहन कें भेलनि जे सत्ते ओ आइ एकटा आओर कुन्तीकें देखि रहल छथि; ई कुन्ती महाभारतक अबला नहिं, ई सत्यतः भवानी थिकी. 

  

  

 

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