बौकाक बहु
भुट-खाँट, आ सीकी-सन पातर देह. हाथमे लाठी, आ कनाह आँखिपर चश्मा. बामा हाथें
पतिक गट्टा धेने एकटा नारि सोझाँ आबि ठाढ़ि भेलि: ‘देखथुन ने, बामा आँखिसँ कोना लोर
बहै छै.’
हम दुनू गोटेकेँ ऊपर आबि कए बैसबा लेल कहलिऐक, आ अपने टॉर्च, पेन आ प्रेस्क्रिप्शन
पैड अनबा लेल उठि कए भीतर विदा भेलहुँ. बाहर एलहुँ तँ एक गोटेकेँ आओरकेँ ठाढ़
देखलिऐक; करीब चौदह-पंद्रह बरखक छौड़ा. बगय-बानिसँ मंदबुद्धि-जकाँ लागल.
हम रोगी, बौकाकेँ अपनालग बैसाकए ओकर आँखि जाँचए लगलहुँ. आँखिमे घाओ रहैक; लागि कए
चिकित्सा नहि भेने आँखि खराब हेबाक डर रहैक.
‘तकलीफ कोना शुरू भेलै?’ हम बौकाक बहुसँ पुछलिऐक.
‘की कहियनि कोना भेलै. बौक छै. किछु पुछ्बो करबै, तँ सरि भ’ कए कहबो कोना करतै.’
बौका अपने हमरा किछु इशारासँ आ गोंगियाइत-जकाँ किछु कहलक. मुदा, हमरा किछु
बुझबामे नहि आयल.
‘आँखिमे घाओ छैक. लागि कए दवाई नहि हेतैक तँ आँखि मारलो जा सकैत छै.’ हम कहलिऐक आ
दवाई लिखि कए पुर्जा दए देलिऐक आ कहलिऐक, ‘आँखिमे कोन बूंद कतेक बेर देबै, से
दोकानदारसँ नीक-जकाँ बूझि लेब. आ हे, जा धरि घाव सुखेतैक नहि, सब दिन एक बेर भोरमे
देखा जेबै अबस्से.
आ ई बच्चा अहाँक बेटा थिक?’ हम कनेक ठमकैत पुछलिऐक.
‘की कहबनि. हमरा धीया-पुता कहाँ भेलै. हमही दोसर बियाह करा देलिऐ.’
सुनिकए विश्वास नहि भेल; बहुए वियाह करा देलकैक!
‘अहीं बियाह करा देलियै?’
‘त्त! की करितहुँ? बौक मनुख. खेत-पथार छै. एकटा बेटो नहि रहै. लैड़िकी भेटि गेलै.
बियाह करा देलिऐ.’
हमरा मन पड़ि आयल. बहुत दिन भेलै. एकरे परिवारक खीसा तँ रहै. ठाकुर, एही मौगीक
पितम्हिया ससुर तँ रहैक, जे अपन भाबहु- नेतियाक स्त्रीसँ- घर-घराड़ी सहित सब जमीन-जथा
लिखा लेने रहैक. नेतियाकेँ दुइए टा बेटी. ओकरा अपना चट जौंडिस भेलैक आ पट दरभंगेमे
मरि गेल. मुदा, गामक पसारी, ठाकुर, अपन भतीजी सबकेँ नेतियाक डीह पर कोना बसय दितैक;
सरो-समाज गबदी मारि लेलक.
हमरा ओहिना मोन अछि. एक दिन नेतियाक स्त्री बाटक कातमे बैसलि भोकारि पाड़ि कए कनैत
रहैक. दुइए दिन पहिने, ओकरा ठकि फुसिया कए, भैसुर कोनो बहन्ने झंझारपुर रजिस्ट्री
ऑफिस ल’ गेल रहैक आ कुल जमीन-जथा अपना नाम करा लेने रहैक. जखन रसे-रसे गाममे गप
खुजलैक आ नेतियाक स्त्रीकेँ गप बुझबामे एलैक, तावत् तँ ओ अपन हाथ काटि चुकल छल. गौंए सब ओकरा
लूलू-थू-थू करए लागल रहै!
हम सोचलहुँ, जखन बौकाक अपनहि परिवारहिमे एक भाईक जमीन दोसरा भाई द्वारा हड़पबाक
इतिहास छैक, तखन बौकाक बहु अपनहि अपन पतिक दोसर बियाह करा देलकैक, तँ कोन आश्चर्य.
तैओ फेर हमरा मुहसँ निकलि गेल: ‘अहाँ अपनहि कनिया ताकि कए अपन घरबलाक दोसर वियाह
करा देलिऐक?’
‘करा नहि दितिऐक तँ की करितहुँ. मुदा, बियाह ने भ’ गेलै, कपार के दितै? देखै नहि
छथिन’ ओ कातमे ठाढ़ भेल छओड़ा दिस संकेत करैत कहलक ‘बेटा भेबो केलै तँ कोनो जोकरक!’
तखने गेट लगसँ कोनो कन्याक स्वर सूनि हम नजरि उठाकए आगू देखलिऐक, तँ देखलहुँ, एकटा
छरहरि, गोर नारि, करीब बारह बरखक कन्या ठाढ़ि छलि. छऊँड़ी तेजगरि आ सुन्नरि लागलि.
‘ई के छी?’
‘नवकीएक बेटी छियै. छौड़ा परसँ भेलै.’
‘पढ़ैए ने ? इएह अहाँ दुनूक देखभाल करत.’ हमरा मुहसँ निकलि गेल.
बौकाक स्त्री दाहिना हाथें अपन कपार पिटैत बाजल, ‘ जखन छौड़े ने मनुख भेलै, तँ छौड़ीकेँ
एहि डीह पर के बसय देतै!’ कहैत ओ बरामदासँ नीचा उतरि गेल आ ‘काल्हि एकरा ल’ कए फेर
एबनि. कहुना एकर आँखि ठीक क’
देथुन. बड़ गुन मानबनि’ कहैत ओ चलि गेलि.