Friday, September 17, 2021

एकटा आओर कुन्ती

 

1

ओहि घटनाक करीब दस  वर्षसँ बेसी भए गेलैक. भगवानपुर डेरा छोड़ि भवानी आ सतीश कतय गेलाह, तहिया ककरो कोनो भांज नहिं लगलैक. मनमोहन कें इहो जिज्ञासा नहिं भेलनि जे अंतत श्रीपतिक की भेलनि. मुदा,  न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायर में अकस्मात् दू गोटेक मैथिली मे गप्प करैत सुनि मनमोहन पाछू घुमलाह तं आश्चर्यक ठेकान नहिं रहलनि, अनेक वर्ष पहिनेक बिसरल ओ मर्मस्पर्शी कथा आँखिक सोझाँ ओहिना आबि गेलनि जेना ओतेक दिन पहिने भेल रहैक.

भवानी आ सतीशक कथा अजगुते  रहैक. कथा तहियाक छियैक जहिया, श्रीपति आ भवानी नौकरीक तलाशमें भगवानपुर आयल रहथि. हुनकर सबहक डेरा मखानाही मोहल्ला मे रहनि. मखनाही मोहल्ला तहिया निर्जने जकां रहैक. ओतुका जाहि मकान मे श्रीपति आ भवानी रहैत छलीह से सतीशेक परिवारक रहनि. मुदा, ताधरि सतीश गामहिं पढ़इत रहथि. भवानीक पति, श्रीपति, सतीशक जेठ भाई, रतीश,क सार छलथिन. श्रीपति कें भगवानपुर मे रहबाक अपन मकान नहिं रहनि. ओतय किरायाक हेतु नीक मकान उपलब्धो नहिं रहैक.  तें, श्रीपतिक  बहिनोइ, सतीशक जेठ भाई- रतीश, श्रीपति कें ओतय रहबाले भगवानपुरक अपने  खाली मकान  द’ देने रहथिन.

छोट सन कस्बा. पुरान ढहल ढनमनायल सन खपरैल घर, कतेक दिनसँ खालिए पड़ल रहैक. श्रीपति ओहि पर रंग-रोगन आ पोचाड़ा करबओलनि आ रहए लगलाह. घरक आगू मे एकटा छोट सन खाली सेहो मैदान रहैक जाहि में बरखा भेला पर जहाँ-तहां पानि भरि जाइक. मैदानक पूब उत्तर कोन पर एकटा इनार रहैक. कनेक दूर पर एकटा सरही आम गाछ सेहो रहैक. आम रहैक सरही, मुदा, स्वाद अपूर्व होइक. खूब मीठ आ कनेक धुमनाह. आम गुदगर नहिं रहैक. परंतु, आम मे खूब गढ़गर रस होइक. अस्तु, ई आमक गाछ श्रीपति आ भवानीक पड़ोसिया भए गेल. आ से नीके बुझू. ई आमक गाछ बियावान सन परिसरक  शोभा रहैक. पोखरि-इनार, आमक गाछ आ खुला मैदान, भवानी कें गामे सन लगनि. तथापि, निर्जनता काटय दौगनि. तें, जखन श्रीपति नौकरीक तलाश मे जाथि वा पोस्ट ऑफिस- रेलवे स्टेशन जाथि तं असगरि भवानी पुबरिया बरामदा पर बैसलि दूर पोखरिक मोहार परक ताड़क गाछक पतियानी आ ओहि पर लटकल, बसात मे डोलैत चोंचाक अजस्र खोंताके देखैत रहथि. सोचथि, एतेक छोट-छोट पक्षी आ एतेक उंच खोंता. जखन माए-बाप चरी ले खेत-खरिहान जाइत हेतैक तं बच्चा सब कतेक डेराइत हेतैक. सुनने रहथिन, ताड़क गाछपर साँप धरि पहुंचि जाइत छैक. साँपसँ भवानी कें अपन गाम मन पड़ि अबनि. गाम में सुनने रहथिन जे घर मे बैसल एसगरि माउगि निरीह चिड़ै थिक, आ आस पासक पुरुष सब घासमें नुकायल साँप ! ई सोचिते  भवानीक देह सिहरि उठलनि. मुदा, फेर मन पड़थिन काली माई आ मनक भय विलीन भए जानि.मनहिं मन  सोचथि, कतय हम काली माई बनैत छी, आ कतय साँपक नामहिसँ  हमरा भय होइत अछि. ई सोचैत भवानीक मुँह पर अनेरे मुसुकी छिटकि अबनि. तखन ओ अपन दृष्टि दूर आकाश मे उड़ैत चिड़ै पर केन्द्रित करथि. आकाश मे उड़ैत चिड़ै कें देखि हुनका एकाएक नव ऊर्जाक अनुभूति होइनि. होइनि, जेना आकाश मे उड़ैत ओ सब चिड़ै  भवानी अपनहिं होथि: मुक्त, स्वतंत्र !

एकटा नीक संयोग भेलैक. किछुए दिनक पछाति, सतीश पढ़बाले गामसँ भगवानपुर अयलाह आ एही परिवारक संग एक कोठली में रहय लगलाह.  सतीशक  भगवानपुर अयलाक किछुए दिनक बाद हुनक जेठ भाई सतीशक खोज-खबरि लेल  भगवानपुर आयल रहथिन. ओ सतीशक रहबाक व्यवस्थासँ संतुष्ट भेलाह. सरहोजि, भवानी, कें कहलथिन, ‘अहाँ हिनक भोजन-सांजनक व्यवस्था तं करिते छियनि,  अहाँकें हिनक गार्जियनी सेहो करय पड़त. ई पढ़बा लिखबा मे चुस्त छथि, मुदा, अपन देखभाल में कनेक सुस्त. जलखै-पनिपियाइ कखनि करताह, ठेकान नहिं. वस्तु-जात सरियाकए राखब सेहो अहींसँ सिखए पड़तनि.’

भवानी कें हँसी लागि गेलनि. पुछलथिन, ‘अहाँक जन्म कोन सालक अछि यौ, सतीश ?’

-‘चौबन इसवी.’

-‘आ हम बावनक भ’ गेलहुँ तं गार्जियन भ’ गेलहुँ ?’

ओहि दिनुका गप्प ओत्तहि समाप्त भए गेल रहैक. आ सतीश अपन काज में लागि गेल रहथि. सतीशक नज़रि केवल अपन लक्ष्य पर रहनि. ओ एक भोर कालेज जाथि आ आपस आबि मुनहारि साँझ धरि पढ़बा मे लागल रहथि. भगवानपुर मे बिजुली बिजलोताए जकाँ कखनो काल चमकि जाइत छलैक. बेसी विद्यार्थी कें डिबिया-लालटेम में पढ़य पड़ैक. तें, बेसी गोटे दिन-देखार, समय पर अपन काज समाप्त कए लैत छल. सतीशो सएह करथि.

मुदा, एसगरि भवानीक दिन आ राति पहाड़ भए जानि. बैसि कए मलाहिन-कुजड़नी-खबासिनीसँ निरर्थक गप्प करब आ अनकर खिधांश करब हुनकर स्वभाव नहिं रहनि. तखन,दू गोटेक भानस क कए भरि दिन  कतेक कशीदा करितथि, कतेक टकुड़ी कटितथि. पढ़बा मे रूचि छलनि, मुदा, सामग्री कतय पाबी. सतीशक भगवानपुर अयलाक पछातियो दिन भरि जखन सतीश कालेज जाथि, भवानी एसगरिए रहथि. कारण,  नौकरी भेटलाक पछाति श्रीपति मलेरिया उन्मूलन कार्यकर्त्ताक रूपमे कुशेश्वरस्थान मे पदस्थापित भेल छलाह. तहिया कुशेश्वरस्थान आ भगवानपुरक बाट, दूरसँ  बेसी दुर्गम रहैक. नीक पक्की सड़कक कोन कथा. कच्ची सड़क, सेहो कोन सड़क कहिया भासि जायत, कोनो ठेकान नहिं. कमलाक धार असल में कुशेश्वरस्थान लग नहिं, बुझू कुशेश्वरस्थान भइए कए बहैत छल. बाढ़ि आयल तं आरि-धूर-बाट, खेत-खरिहान, गाछी-बिरछी, जे किछु बाट मे आयल, नाश भए गेल. अगिला साल फेरसँ  सड़क मरम्मतक नाटक होअय. मुदा, यातायात जस के तस रहैक. लोग साले-साले कहुना घर ठाढ़ करय, आ दिन काटय. मुदा, एहि इलाकाक सरकारी मोलाजिम ले  कुशेश्वरस्थानक पोस्टिंग बतर कालापानी छल. ओतय माछ, माखनक कोनो कमी नहिं. शिकारक प्रेमी ले  सिल्ली, बटेर, दिघोंच, जे चाही लए आनू. मुदा, ओतयसँ निकलबाक बाट आ सवारी भेटत तखन ने. बरसातक छौ मास तं बुझू बाट बन्ने. भगवान आंग-स्वांगसँ बंचाबथि ! श्रीपति तं शनि-रविक कोन कथा, पाबनिओ-तिहार में यात्राक असुविधाक कारण भगवानपुर अयबासँ हारि मानि लेथि. अपना श्रीपति के माछ-मखानक खूब रूचि रहनि. असुविधाक पर्यन्तो कहियो काल ओ भवानी ले सिल्ली सेहो लए आनथि. सतीशो कें सेहो सिल्लीक मासु बड़ पसिन्न रहनि. तें, श्रीपति जखन सिल्ली आनथि हुनका अपना कोनो श्रम नहिं करए पड़नि. मुदा, कुशेश्वरस्थानसँ  भगवानपुर आयबे बड़ कठिन रहैक.

एक साँझुक गप्प थिक. सतीश लालटेमक इजोत मे किताब दिस नजरि गडौने, पढ़बा में ध्यानमग्न रहथि. हुनका पढ़इत देखि, भवानी पयर मारि अइलीह आ चौकीक एक कोन पर बैसि गेलीह. किछु कालक पछाति सतीशक ध्यान भंग भेलनि. ओ नज़रि उठौलनि तं भवानी कें चौकीक कोन पर बैसल देखि हुनका मुसुकी छूटि गेलनि. पुछलखिन, ‘कहू. बाज़ारसँ किछु अनबाक छैक, आनि दियअ ?’

-‘नहिं, अहिना असगरिए टौआइत रही. आबि कए एत्तहि, अहीं लग आबि बैसि गेलहुँ. अंय, औ सतीश, एकटा गप्प पुछैत छी, हम आगाँ नहिं पढ़ि सकबैक ?’

-‘किएक नहिं. अहाँ मैट्रिक पास छी. समय अछि. अहाँ कहैत छलहुँ, अहाँक बाबू अहाँकें बुधियारि सेहो कहैत छलाह. कालेज में नाम तं लिखिए लेत.’

-‘आ चूल्हि के फुकतैक. सबसँ पहिने तं अहीँक भोजन बन्न भ’ जायत !’

-‘तकर कोनो गप्प नहिं. सब, सब दिन थोड़े कालेज जाइत छैक. आ लोक तं प्राइवेटहुसँ पढ़िते अछि. एतय तं कतेक विद्यार्थी अपनहिं हाथें भानस-भात सेहो करैत छथि आ पढ़ितो छथि. हमरा ने सुविधा अछि.’

-‘हमरा के पढ़ाओत,यौ ? जनिका  पुछबनि, एके जवाब : की लाभ ? मुदा, हमरा बड़ सेहन्ता होइत अछि, हमहू पढ़ितहुँ. हमहूँ स्कूलक धिया-पुता कें पढ़बितिऐक. असल में पढ़बा मे मोन सेहो लगै अछि. कहू तं, लोक केवल मन लगबाक कारण जं पढ़तैक तं कोनो दोष छैक ! एतय तं लोक हाथ में तराजू ल कय सब किछु मे हानि-लाभ तौलबा ले बैसल रहैए. अंए, औ हम अहाँक संग नहिं पढ़ि सकैत छी ?’

-‘पढ़ू ने. पोथी मंगबए पड़त. अपनहुँ तं लोक पढ़िते अछि.’

-‘आ जे बुझबा मे नहिं आयल से अहाँ नहिं बुझा देब ?’ भवानी विह्वल जकाँ होइत पुछलखिन.

सतीश सोझ उत्तर बिना देनहिं कहलथिन, ‘अहाँकें तं एखन फ़ुरसतिए फ़ुरसति अछि. श्रीपति बाबूसँ पूछि कालेज में नाम लिखयबा में कोन हर्ज़. हमरा जखन समय रहत, तखन पर हमहूँ सहायता कइए देब.’

सतीशक सुझाव पर भवानी गुम्म भए गेलीह आ मनहिं मन श्रीपतिक अगिला छुट्टीक बाट ताकय लगलीह.

किछुए दिन पछाति, एक सांझ, ओहिना सतीश लालटेमक इजोत मे पढ़इत  रहथि. भवानी बाहरक ओसारा पर हुनके चौकीक एक कोन पर बैसल सतीशकें देखैत रहथिन. श्रीपति बससँ उतरल हकासल-पियासल डेरा आयल रहथि. एकाएक श्रीपति कें आयल देखि भवानी धड़फड़ा कए उठलीह आ एक लोटा पानि आनि ओसाराक कगनी पर रखैत कहलखिन, ‘पयर धो लियअ. चाह नेने आउ ?’

‘कनेक थम्हि जाउ.’ कहैत कान्ह परक गमछा ल कए श्रीपति माथक पसेना पोछय लगलाह. पसेना पोछि गमछा कें चौकी पर एक कात राखि देलखिन आ स्वगत बाजय लगलाह: ‘हद्द भए गेल. इमरजेंसी आ सरकारक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम जे ने कराबय. बाटे-घाटे लोकसबकें पकड़ि- पकड़ि नसबंदी कए दैत छैक. सा......र  सब.’ श्रीपतिक मुँहसँ गारि बहरा गेलनि. भवानीकें लगलनि, जेना श्रीपति बड्ड तमसायल होथिन; तामसक अतिसँ  साँझुक अन्हार मे श्रीपतिक पिण्डश्याम वर्ण भवानी कें कारी झाम सन बूझि पड़लनि.

भवानी श्रीपति कें पंखी हौंकैत कहलखिन, ‘तं, की करबैक. मुदा, एहना स्थिति में लोकक सखा-सन्तान कोना हेतैक ! लोक-वेद कें की हेतैक, यौ ?’

-‘जानथि भगवान ! कुन्ती कें कोना सन्तान भेल रहनि !!’ आ ई कहैत श्रीपति भभाकए हँसय लगलाह. मुदा, बाटें-घाटे जबरदस्ती नसबंदीक गप्पक आश्चर्य आ श्रीपतिक अद्भुत् गप्पसँ भवानी ओहि दिन अवाक् भए गेल रहथि. सरिपहुं, ओहि साँझुक श्रीपतिक गप्प भवानीक माथ पर ठनका जकाँ खसल रहनि. मुदा, माउगि कें चुप रहि बहुतो गप्प सुनय पड़ैत छैक, से भवानी माए-पितियाइनिक मुँहसँ कतेक बेर सुनने रहथि. कहलखिन, ‘बैसू चाह भए गेल हेतैक. हम नेने अबैत छी.’ आ भवानी भीतर चलि गेलीह. मुदा, इमरजेंसीक ई  विचित्र पराभव हुनके भोगय पड़तनि, से भवानी कें अनुमान नहिं रहनि.

पछाति,एक दिन जखन श्रीपति भगवानपुरसँ  आयल रहथि, एक साँझ  दुनू गोटे चाहक कप ल’ कए ओसारा पर बैसि, ओलती मे पयर लटकौने, मौसमक आनंद लैत रहथि. भवानी समय देखि कहलखिन, ‘एकटा गप्प बुझलहुँ ?’

-की ?

-‘सतीश कें देखि कय हमरो पढ़बाक मन होइत अछि. अहाँ नहिं रहैत छी तं समयो काटब मुश्किले रहैत अछि. जं कालेज में नाम लिखा गेल तं अनमना रहत. सतीश सेहो कहैत छथि, अवसर पड़ला पर सहायता कइए देताह.’

श्रीपति लाड़ करैत कहलखिन, ‘बड़  बेस. मुदा, अहाँ तं ओहिना एतेक बुधियारि छी. एतेक पढ़िकय करबैक की ?’

‘फेर केलहुँ  ने अनपढ़वला गप्प !’ भवानीक मुँहसँ अकस्मात् बहरा गेलनि. कहलखिन, ‘अऍ यौ, पढ़बा ले सेहो कारण चाहियैक ! हम मास्टर बनबैक ! प्रोफ़ेसर बनबैक !! अहाँकें कोनो आपत्ति ? टाका तं घरहि मे ने आओत, घरहिं खर्च हेतैक. मालिक तं पुरुखे थिकाह.’ कहि भवानी मुसुकाए लगलीह आ आगू कहलखिन, ‘धीया-पढ़त से मुफ्त में !!’

श्रीपति हँसय लगलाह. कहलखिन, ‘हमरा कोनो उजुर नहिं. दरखाश्त दिऔक. खर्च हम देबैक.’

भवानी सोझे उठि कय ठाढ़ भए गेलीह. दूरेसँ  हाक देलखिन, ‘सुने छी, यौ सतीश ? हमहूँ पढ़बैक.’ आ ओ सोझे भीतर गेलीह आ हाथ में एकटा सराई में दू टा लड्डू लेनहिं घरसँ बहरइलीह, आ श्रीपति कें  कहलखिन, ‘ई अहीं अनने रही, तें, एहि खुशनामाक पहिल लड्डू अहीं कें.’ श्रीपति चाहक कप एक कात कए देलखिन आ दाहिना हाथसँ एकटा लड्डू फोड़ि एक टुकड़ी मुँह में दैत कहलखिन, ‘लियअ एक टुकड़ी अहूँ खाउ.’ भवानी लड्डूक टुकड़ी श्रीपतिक हाथसँ ल’ लेलनि. पछाति, सतीश जुमलाह, तं, खुशनामाक लड्डू ओहो खयलनि.

2

भवानी स्वभावसँ पंछी जकाँ स्वतंत्र आ मनसँ  निश्छल रहथि. विशाल नील आकाश, शीतल पुरिबा बसात, आमक गाछी-कलमक छाया आ कमला कातक हरियरी भवानीक मन मोहि लैत छलनि. जखन कुमारि रहथि, जखन-जखन तेज पुरिबा बहैक तं ओ अपन केश खोलि सोझे बसातक विपरीत दिशामें दौड़ि आबथि. सखी-बहिनपा हँसथिन आ कहथिन, ‘है, कोना करैत छह !’ मुदा, भवानी भभाकए हँसथि आ  कहथिन, ‘तोहों सब चलह ने. केश खोलि कए पुरिबा दिस दौगलासँ केशक जड़ि- जड़ि मे जाइत बसातसँ  देहक पोर-पोरमे फुर्ती आबि जाइत छैक. देखैत नहिं छहक, कालीमाताक केश कोना खूजल रहैत छनि.’

‘बाप रे, बाप ! कालीमाता ?’ लोककें कतेक भय होइत छैक !

‘धुर ! भय आ काली मातासँ !! ओ तं माता छथिन. हुनकासँ भय तं राक्षसकें होउक. हमर अगोंट नहिं देखैत छह. हमर बाबू हमरा दुलारसँ श्यामा कहैत छथि. हमरो अंगोट तं कालीए माई जकां अछि. मुदा, माए भवानी कहैत छथि. ओ अपन बेटीकें कारी किएक कहथिन ! आ हमरा कहए केओ तं कारी ? काली जे छिऐक !!’

एहने रहथि भवानी: निधोख, मुँहफट्ट, निर्भीक, मुदा, सरल आ सहृदय. दोस्ती तं हुनका ककरहुँसँ  भ’ जाइनि. तखन सतीश कोन कथा. मुदा, जखन भवानीक नाम कालेज में नाम लिखल भइओ गेलनि, तइओ किछु दिन धरि ओ डेरहिं पर पढ़थि. पछाति सतीश कें रोज बहराइत देखि अपनो उत्सुकता भेलनि. भेलनि जे कालेज जायब तं नव अनुभव हएत. देखियैक. दिन काटब सेहो पहाड़ नहिं हयत. पछाति जं प्रति दिन जायब नहिं पार लागल, तं देखल जेतैक. आ भवानी प्रति दिन सतीशहिं संग कालेज जाए लगलीह.

सतीश स्वभावसँ कनेक लजकोटर, मुदा, सहमिलू रहथि. अपना वयसक  कन्या लोकनिसँ मेलजोलक अनुभव नहिं रहनि. ऊपरसँ  पढ़बाक धुनि. मुदा, प्रतिदिनक संगबे आ आन कोनो संगबेक अभाव दुनू गोटेक बीच परिचयकें क्रमशः मित्रता में बदलए लगलनि. पुरुखक संग एहन मित्रताक अनुभव भवानी कें कहियो नहिं भेल रहनि. सतीश सेहो अपना भरि भवानीक सहायता में कोनो कोर कसरि नहिं रहय देथिन. मुदा, हुनका अपन लक्ष्य रहनि. से ओ कहियो नहिं बिसरथि.  मुदा, बितैत समय आ दिन-प्रतिदिनक संगबे सतीश आ भवानीक परिचय बढ़ौलक. क्रमशः एक दोसराक स्वभाव आ व्यक्तित्वक खोल परत-दर-परत खुजैत चल गेल. ई दुनू गोटेक हेतु सुखद अनुभव छलनि.तथापि, सतीशक दिससँ  एखनहुँ औपचारिकताक देबाल आ दूरी ओहिना छल.  कखनो काल ई औपचारिकता भवानीकें छाती पर जांत जकां बूझि पड़नि. कहथिन, ‘यौ सतीश अहाँ हरदम मूड़ी गाड़ने किएक गप्प करैत छी. हमरासँ  भय होइछ ?’ एहि पर सतीश कें मुसुकी छूटि जाइनि. भवानी आओर खोंचाड़थिन: ‘हम बंगालिन छियैक ? आँखिएसँ जादू कए दैत छियैक ?’

सत्यमें भवानीक पिण्डश्याम वर्ण, घनगर कारी केश, गाढ़ कारी आँखि आ संतुलित देह-यष्टि में किछु चुम्बकीय छलैक तं अवश्य जे केवल देखनिहारे टा कें बूझि पड़ैक. एकर अनुभव सतीश कें कहियो नहिं भेल रहनि, से नहिं. किन्तु, ओ माए-बापसँ निरंतर सुनथि, ‘बौआ, आदर्श विद्यार्थीक हेतु कहबी छैक,  ‘काग चेष्टा बको ध्यानः श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणः’. सतीश एकरा गेठरी बान्हि कए रखने रहथि.  मुदा, एकटा अप्रत्याशित परिस्थिति सब किछु बदलि देलक; एकटा पुरुष आ एकटा नारिक संगबे आ तेसर व्यक्तिक स्वार्थ परिस्थितिके तेना बदलैत चल गेल, जे सतीशक  संकल्प, संकल्पे रहि गेलनि.

3

इंदिरा गांधीक सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय इमरजेंसीक बज्र बहुतो पर खसल रहैक. केओ जहल गेल, केओ लाठी खेलक, आ ककरो बलपूर्वक नसबंदी भए गेलैक. श्रीपति, जनिका एखन धरि सखा-संतान हएब बांकीए रहनि, अकस्मात् बलपूर्वक नसबंदी शिकार भए गेल रहथि. ई भवानी आ श्रीपति दुनू बुझैत रहथि. मुदा, भवानी एकरा एकटा दारुण दुर्घटना बूझि स्वीकार कए लेने रहथि. हुनक पारंपरिक संस्कार अक्षुण रहनि. ततबे नहिं, धिया-पुता नहिं भेने लोक बाँझ कहत, वा से सामाजिक दोष थिकैक हुनका तकरो बोध नहिं रहनि. मुदा, श्रीपतिक संग जे त्रासदी भेल रहनि ताहिसँ  सबसँ बेसी हुनक पुरुषार्थ पर ठेस पड़ैत रहनि. जं एहन दुर्घटना आइ भेल रहितैक तं बहुत उपाय होइतैक. मुदा, तहियाक मुफस्सिल इलाका आ लोक लाजक बहुतो बाध्यता रहैक. असल में जखन किछु वर्ष धरि भवानी आ श्री पति कें कोनो संतान नहिं भेलनि तं श्रीपतिक परिवार दिससँ श्रीपति पर  दोसर विवाहक करबाक दवाब पड़य लागल रहनि. भवानीकें श्रीपति से कहने रहथिन. भीतरे भीतर श्रीपति, सतीश आ भवानीक  अनायास सहयोगसँ एहि समस्याक समाधान अवश्य देखैत रहथि. मुदा, स्वार्थक अछैतो एहन गप्प कोन पुरुषक मुँहसँ बहरयतैक.

भवानी स्वभावसँ निर्भीक रहथि. तथापि, भवानी देखथिन जे सतीश आ भवानीक बीच बढ़इत मित्रतासँ  श्रीपतिक के कोनो आपत्ति किएक हेतनि, लगनि  जे हुनकर ध्यानहु ओम्हर जाइतो नहिं जाइत छलनि.  सत्यतः, पछाति भवानी कें ई बुझबामें कनिओ संदेह नहिं रहलनि जे श्रीपतिक सतीश आ भवानीक बीचक मित्रताकें सम्बन्ध में परिवर्तित करबाक हेतु आतुर छलाह. भवानी कें लगनि जे अपन स्वार्थ में श्रीपति सब लाज-धाख घोरि कए पीबि गेल रहथि. तथापि, श्रीपतिक मनें साँपो मरि जाय आ लाठीओ ने टूटय. मुदा,नारिक संस्कार संस्कार थिकैक. नारीक संकल्प में बज्र सन कठोरता आ आकस्मिकता सेहो होइछ, जे कदाचित् अवसर अयला पर प्रकट होइछ. ई सब सोचैत, भवानी कें अपन बाबू मन पड़ैत रहथिन. कहथिन, ‘है, राक्षस सबसँ हारल देवता लोकनिक उद्धार तं भगवती दुर्गा कयने रहथिन. ई कोनो कथा मात्र नहिं थिकैक. तें, नारि कें पुरुखक बैसाखीक सहारा नहिं चाहियैक. आश्चर्य अछि, सब ठाम नारि अबला जकां मारि-गारि किएक सहैत अछि !’ कान में बाबूक स्वर भवानीकें ऊर्जासँ भरि दैत छलनि. सोचथि, ‘पुरुष जेहन हो, मुदा, नारि सदानीरा थिक. हमर आत्मबल हमरा सत्य-असत्यक भेद में सहायक हएत !!’

4

भवानीक नाम कालेज में लिखल भए गेल रहनि. ओ पढ़य लगलीह. मुदा, हुनक पढ़ब, हुनक अपन दायित्व रहनि. अपन मनोरथ, अपन  प्रेरणा, आ अपने श्रम. हुनक सफलता आ असफलता अनका ले कोनो अर्थ नहिं रखैत छलैक. तें, सतीश आ भवानीक अपन-अपन दुनियाँ रहनि. अपन-अपन लक्ष्य रहनि. सतीश आ भवानी, दुनूक हेतु सफलताक अर्थ भिन्न-भिन्न रहनि. सतीशक सफलताक हेतु जहाँ धरि संभव छलनि, भवानी सहायता करबे करथिन. सतीशकें कोनो बाधा नहिं होइनि, सेहो हुनक प्रयास में रहनि. मुदा, मौका देखि भवानी अपन शंका-समाधान ले सतीशक सहायता लेथि. एक दिन सतीश कहलथिन, अहाँ जे हमरासँ शंका पुछबा ले अबैत छी, आ चल जाइत छी, फेर अबैत छी, फेर जाइत छी, से चाही तं एतहु हमरा लग बैसि पढ़ि सकैत छी. हमरा कोनो आपत्ति नहिं.’

भवानी सतीशक एहि प्रस्ताव पर कनेक गुम्म भए गेलीह. कहलखिन, असल में हम पढ़ितो रहैत छी, आ भानसो करैत छी. आश्रमक आनो हुच्ची-फुच्ची रहैत अछि. आ एकटा सत्य गप्प कहू ,यौ सतीश ?

-की ?

-‘अहाँक संग-संग पढ़ने हमरा तं लाभ अवश्य हयत. मुदा, परिवारक नजरि में ओ निरर्थक थिक. किन्तु, एहि डेरा पर रहि अहाँक पढ़ाई में जं कनेको बाधा भेल तं लोक दोष हमरे देत. श्रीपति बाबूक तं केओ नामो नहिं लेतनि.’

सतीश एहि पर ओहि दिन जहिना मूड़ी गाड़ने पढ़इत रहथि, ओहिना पढ़इत रहि गेलाह. किन्तु, ई कहब असत्य हएत जे संग पढ़बाक प्रस्ताव पर भवानी मन में एकटा सुखद संवेदनाक अनुभूति नहिं भेलनि. सुन्दर-सुदर्शन युवक. तेजस्वी आ पढ़बा पर केन्द्रित. ताहू में ओ सरि भ कए भवानीक दिस मुड़ी उठाइओ कए नहिं देखथिन. भवानीक वयसे की रहनि; सतीशक समवयस्के छलीह. मोहल्ला एकाकी रहैक. श्रीपति पावनिए-तिहार में आबि पबथिन. सेहो, जं समय रुख-सुख रहलैक. एहना परिस्थिति में सबसँ लगक मनुखक संगतिक सेहन्ता अनुचित नहिं छलैक. ऊपरसँ भवानी कें बूझि पड़नि जे सतीश हुनका दिससँ  सर्वथा उदासीन छथि. भवानीक प्रति सतीशक एहि उदासीन व्यवहारसँ  कोना-ने-कोना क्रमशः भवानीक भीतरे-भीतर सतीशक प्रति आकर्षणक अनुभव करय लागल रहथि. मुदा, ई भावना बहुत दिन धरि भवानीक मनक भीतरहिं नुकायल रहल. मुदा, सतीशक प्रति आकर्षण पछाति भवानीकें सतीश दिस झिकय लागल रहनि. फलतः, पहिने कहियो काल, पछाति नियमतः ओ सतीशे लग बैसि पढ़य लगलीह. तथापि, किछु दिन धरि तं सतीश जहिना रहथि, तहिना रहलाह. मुदा, पछाति जहिया ओ भवानी कें अपना लग नहिं देखथिन तं हुनको एकटा शून्यताक बोध होइनि. सतीश तकरा भले प्रकट नहिं करथि, मुदा, भवानी कें होइनि जे सतीश हिनकहिं बाट तकैत छथिन. भवानीक हेतु ई सुखद अनुभव छल.

संयोगसँ  एक दिन सतीश कें एकाएक ज्वर भए गेलनि. किछु दिन तं ओ ओकरा मोजर नहिं केलखिन. मुदा, पछाति डाक्टरसँ सलाह लेलनि. इलाज भेलनि. मुदा हुनक स्वस्थ हेबा में दस-पन्द्रह दिन लागि गेलनि. एहि अवधि में भवानी हुनक पथ्य-परहेजक हेतु हरदम तत्पर रहथि.

ज्वर उतरलाक पछाति एक दिन सतीश बिछाओन पर पड़ल छलाह. भवानी ओतहि आबि बिछाओनक एक कात बैसल छलीह.  सतीश कहलखिन, ‘ अहाँकें हमरा हेतु बड्ड तरद्दुद भेल. अहाँ तं हमरा हेतु नर्सहु सं बेसी भए गेलहुँ.’ सतीशक गप्पसँ भवानी के आँखि में नोर आबि गेलनि. कहलथिन, ‘ अहाँ सन जड़सँ एहने गप्पक आशा छल. अहाँक मन मरुभूमि थिक. मनुख के अहाँ मनुख बूझैत छिऐक ! हम तं अहाँकें मित्र आ सहपाठी बूझैत रही. आ अहाँ हमरा नर्स बूझि लेल. नारिक मन बूझब पुरुषक बस नहिं.’

सतीश कें अपन कहल पर पछताबक होमए लगलनि. हुनका अक्क ने बक्क फुरलनि. कहलखिन, ‘हम अहाँक ओतय रहि कए पढ़इत छी. अनुशासन में छी, किछु अपन आ किछु अनकर. कहू हमरासँ कोन घटी भेल ?’

भवानी कहलखिन, ‘ अनुशासन तं बूझल, मुदा, अहाँकें मनुष्यतो अछि ? हम मासक मास एसगरि रहैत छी. मनुखक संगति तकैत छी. मुदा, हमरा अपना लग इंटा-पाथर, गाछ-वृक्ष, आ चौखटि-केबाड़क अतिरिक्त आओर कहाँ किछु देखबा में अबैछ. होइत छल, एतय हमरा अतिरिक्त एकटा मनुखो रहैत अछि. मुदा, से हमर भ्रम छल. अहाँ पाथर छी !’

सतीश भवानीक एहि गप्प पर स्तब्ध भए गेलाह. एहन आकस्मिकता हुनक हेतु अप्रत्याशित छलनि. आकस्मिकताक एहने क्षण में ओ भवानीक लग आबि हुनकर हाथ पकड़ि, हुनक नोर  पोछि देलखिन. कहलखिन, ‘अहाँक मुँहसँ एहन गप्प नीक नहिं लागल.’

भवानी कहलखिन, ‘ आ हमरा ? अहाँ जहियासँ एतय एलहुं-ए हमरा लागल जे हम एतय एहि अकाबोन  में एसगर नहिं छी. अहाँक संगति हमर एकाकी जीवन कें सार्थक कए देने छल. श्रीपति व्यस्त छथि. अहाँ अपने व्यस्त छी. तखन हमर काज कोन ? घर देखू, भोजन बनाउ, आ बिछाओन पर पड़ल चार कें देखैत रहू. अहाँकें पढ़इत देखि पढ़बाक मनोरथ भेल. अहाँक संग कालेज जाय लगलहुँ, तं, भविष्यक अनेक सपना मन में आबय लागल. मुदा, अहाँ कें कहियो एहन भेल जे हम-अहाँ संग-संग रहितो छी. हम-अहाँ एक संग रहितहुँ ?’

‘ ई सब जुनि पुछू. उद्वेगक पाछू जं मनुष्य भागए लागए तं उद्देश्य बाटहिं रहि जेतैक.’ सतीश कहलखिन.

‘मुदा, हमरा कठिन बाटमें कनिओ कालक सुखद अनुभवकें मुट्ठी में पकड़बाक हिस्सक अछि. मुदा, अहाँ से नहिं बुझबैक !’ कहि भवानी हाथ छोड़बैत भीतर जाय लगलीह. मुदा, ओही क्षण सतीश हुनका अपना दिस घिचैत छाती में सटा लेलखिन आ हुनक ठोर पर अपन दुनू ठोर दए, भवानीकें ओत्तहि तेना शिथिल कए देलखिन, जे हुनका एकाएक भेलनि जे ओ सब बंधनसँ  मुक्त भए रहल छथि, ओ क्रमशः आ अपन मुँहके सतीश छाती में नुकबैत चल गेलीह. ओकरा पछाति भवानीक चेतनाक की भेलनि, हुनक मोन नहिं रहलनि. अन्ततः, जखन भवानीक  निन्न टुटलनि तं देखलखिन चारू कात सोनहुल रौद पसरि आयल रहैक. सतीश बाहर ओसरा पर भोरुका रौद में सब दिन जकां पढ़ि रहल छलाह. सत्यतः, भगवानपुर परिसर में भवानी कें रौद एतेक सोहनगर कहियो नहिं बूझि पड़ल रहनि. ततबे नहिं, ओहि दिनुक आकस्मिक घटना भवानी आ सतीशक संबंधके एकटा नव आयाम दए देलक. ओकर असरि एतबे भेल जे ओ लोकनि नित्य संग-संग पढ़य लगलाह. संगहिं, दुनूक संबंध आब वास्तविकताक धरातल आ आवश्यकताक अनुशासनक रितिएँ बढ़य लागल. भवानी मुक्त छलीह.

5

अगिला मास श्रीपतिकें एक हफ्ताक छुट्टी भेलनि. ओ अकस्मात् भगवानपुर अयलाह. बस अबैत-अबैत हुनका साँझुक दससँ  ऊपर भए गेल रहनि. भवानी आ सतीश ओहो दिन एकहि ठाम पढ़इत रहथि. सतीशकें पढ़बाक पाहि लगबामे देरी भए रहल छलनि. मुदा, भवानी नित्य प्रति जकाँ संगहिं खाए चाहैत छलीह. मुदा, हुनका दिनुका थकान में आँखि लागि गेलनि, आ ओ ओतहि सतीशक बिछाओने पर निभेर निन्न भए गेल रहथि. अकस्मात् श्रीपति जखन डेरा अयलाह, तं भवानी कें सतीशेक बिछाओन पर सूतल देखलथिन. श्रीपतिक एना आयबसँ सतीश हतप्रभ भए गेलाह. कहलखिन, ‘एखने तं पढ़इत छलीह. हमरा देरी भेल तं हिनका दिनुका थकान में निन्न आबि गेलनि.’

सतीशक गप्प पर बिना किछु ध्यान देने श्रीपति भवानी कें दुलारसँ उठौलखिन. श्रीपति कें देखि भवानी धड़फड़ा कए उठलीह. हुनक देह सुन्न होमए लगलनि, ‘कहलखिन की कहू, हमर निन्न पहाड़ अछि. सतीशक पढ़बा में किछु देरी की भेलनि, हमरा कखनि निन्न भए गेल बुझबो ने केलिऐक. स्वाइत कुमारि में हमर नाम लोक असेढ़ रखने छल. ओ तं अहाँ छलहुँ, नहिं तं लोक की कहैत ? कहू तं.’ कहैत भवानी कठहँसी हँसए लगलीह.

‘की कहैत ? अहाँ सतीशहुँक सरहोजिए जकां छियनि ने. लोक कें हँसी करबाक अधिकार तं छैहे, मुदा, एहन घटना जकरा सामान्य परिस्थिति में  परिवार कें तोड़ि कए राखि देबाक संभावना रहैक, केर श्रीपति पर कोनो असरि नहिं भेलनि. ओ खुशी-खुशी छुट्टी बिताकए कुशेश्वरस्थान वापस भए गेलाह.

अस्तु, आब भवानी आ सतीशक संबंधक नारि-पुरुषक संबंधक परिणति दिस अग्रसर भेल; किछुए दिन में भवानी कें संतान होनिहारी भए गेलनि. श्रीपति खूब प्रसन्न भेलाह. हुनक प्रसन्नताक कोनो सीमा नहिं छल, जखन भवानीकें पहिल बेटा भेलनि. श्रीपतिक माए कें छठिहार  नहिं धारैत रहनि.तें, छठिहार में बच्चाक पैत्रिकसँ  केओ नहिं एलनि. मुदा, भवानीक माए जे बच्चाक जन्मक हेतु आयल रहथिन रहि गेलीह. छठिहार में श्रीपति, भवानी, सतीश आ श्रीपतिक सासुक अतिरिक्त केवल एक दू गोटे आओर आयल रहथिन. मुदा, बहुत धूमधामक अभावक अछैतो, परिवार अत्यंत प्रसन्न छल. एहिसँ भवानीकें भेलनि जे हुनक छाती पर नौ माससँ  पड़ल जांत एकाएक उतरि गेलनिए. श्रीपति अपना दिससँ सासु कें छौ मास धरि रहि बच्चा-जच्चाक सुश्रूषाक अनुरोध केलखिन. सासु मानि गेलखिन आ श्रीपति निश्चिंत भए कुशेश्वर गेलाह.

मुदा, ई कथाक  समाप्ति नहिं छल. दू वर्ष भरिक भीतरे भवानीकें एकटा बेटी सेहो भेलनि. कन्या सेहो भगवतीए  जकां सुन्नरि छलि.  एहि कन्याक जन्म श्रीपतिक हर्ष कें दूना कए देने छल. मुदा, कन्याक जन्मक करीब दूइए वर्षक भीतर एकटा छोट घटना परिवार में बिहाड़ि आनि देलक. भेलैक एना जे एक दिन एकटा बहता योगी हिनका लोकनिक भगवानपुर डेरा पर आयल. श्रीपतिओ ओहि दिन भगवानपुरहिं रहथि. साधु कहलखिन जे ओ हस्तसामुद्रिक में सिद्धहस्त छथि. भवानी, सतीश आ साधु सब बाहरक ओसारा पर बैसल छलाह. भवानीक दुनू बच्चा सेहो खेलाइत- खेलाइत ओतय जूमि गेल छल. एही बीच श्रीपति एकाएक अपन दाहिना हाथ साधुक आगाँ पसारि देलखिन आ कहलखिन,’ बाबा, किछु कहू’. साधु किछु काल धरि हाथकें उनटा-पुनटा कए देखि गुम्म भए गेल. साधुकें गुम्म देखि श्रीपति पुछलखिन, ‘की बाबा ? गुम्म किएक भए गेलहुँ ?’

साधु मौन तोडैत कहलथिन, ‘अशुभ गप्प कहबा मे प्रमाद होइत अछि. मुदा, पुछलहुँ तं कहहि पड़त.’

‘तखन कहिए दिअए.’- श्रीपति हंसैत कहलखिन.

‘ अहाँ कें सन्तानक योग नहिं अछि.’

सतीशकें जेना अभिजंक भए गेलनि. मुदा, साधु हुनक दिससँ ध्यान हंटा, दुनू नेना दिस इंगित कए,  सतीशकें लक्ष्य करैत कहलखिन, अहाँक दुनू नेना ठोकल अहीं सन अछि.’

साधु एहि गप्प पर श्रीपतिक देह में जेना कबाछु लागि गेलनि आ ओ चोट्टे ओतयसँ  उठि, दुनू नेनाक डेन पकड़ने भीतर चल गेलाह. हुनका भेलनि जे क्रोधसँ हुनक ब्रह्माण्ड फाटि जेतनि. ओ भीतरेसँ साधुकें चल जेबाक हेतु कहि, भवानी कें अंदर बजा लेलखिन.

दोसर दिन कुशेश्वरस्थान जयबा काल ओ भवानीकें कहैत गेलखिन, जे हुनक अगिला बेर भगवानपुर अयबासँ पहिने सतीश डेरा छोड़ि देथि.

भवानी एहि पर अवाक् भए गेलीह. हालहिं सतीशक एम. ए. क रिजल्ट बहरायल रहनि. ओ दिल्लीक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम. फिल. क हेतु नाम लिखयबाक तैयारी में लागल रहथि. भवानीक बी ए क परीक्षा समाप्त भए गेल रहनि. रिजल्ट आयब बांकी रहनि. एहन परिस्थिति में श्रीपतिक एकाएक अठाबज्जर खसायब अप्रत्याशित छल. मुदा, विपरीत परिस्थितिए में मनुखक व्यक्तित्वक असल परीक्षा होइत छैक. भवानी कें यथार्थक सोझ बाट में हुनका कोनो व्यतिक्रम सेहो नहिं देखबा मे अबनि. एक कात छल अनायास, निःस्वार्थ प्रेम. दोसर कात श्रीपतिक स्वार्थ. एहि स्वार्थक प्रत्यक्ष उपकरण रहथि ओ अपने आ सतीश, एकटा पुरुष आ एकटा नारि. एकर विपरीत सतीश कें  संयोग आ स्वार्थक उपजल श्रृष्टि आ अपन अस्तित्व पर अपने मन प्रश्न चिह्न ठाढ़ करैत रहनि. मुदा, सतीश मनहिं मन आश्वस्त होथि जे भवानी ने निर्बल छथि, ने ओ अपने मूर्ख छथि. हुनका अपन विवेक विश्वास रहनि. ओ इहो सोचथि जे भवानी सेहो जतबे सरल छथि, ततबे दृढ़ छथि- ग्रेनाइट पाथर सन.’  से अवसर अयलापर प्रमाणित भइए गेल. ठीके, त्वरित रूपें बदलैत घटनाक्रम  अन्ततः एक दिन परिस्थिति एकाएक बदलि देलकैक. परिस्थितिक ई मोड़ आशातीत छल. अनायास बीतल आठ वर्ष में की-की ने भए गेलैक. आठ वर्षक एहि सुखद अवधि में एखनुक ई अचानक भूकम्प भवानी आ सतीश ले नितान्त अप्रत्याशित छलनि. भवानी सोचलनि श्रीपतिक स्वार्थसँ दूर, हुनकर अपन आ सतीशक बीचक सम्बन्धक में कोनो ग्लानि नहिं. हुनक मनक ई भाव हुनका एकटा नव बल देलकनि, आ ओही बलसँ उपजल स्वतंत्रताक बोध हुनका श्रीपतिक बंधनसँ मुक्त के देलकनि. ई एकटा नव अनुभूति छल.

6

सतीश कें ओ दिन कोना बिसरतनि. हुनक अंतिम परीक्षा लगिचायल रहनि. पछिले राति श्रीपति भगवानपुर आयल रहथि. नहिं जानि भवानीसँ राति में की गप्प भेल रहनि. दोसर दिन भोरे श्रीपति घर मे अठाबज्जर खसा देने रहथिन. ओहि समय में सतीश कतहु गेल रहथि. वापस अयलाह तं जे किछु होइत देखलनि ओहिसँ हुनका गप्प बुझबा में किछु भांगठ नहिं रहलनि. देखलनि जे श्रीपति हुनक कुल पोथी-पतरा, बक्सा-पेटी आ वस्तु जात उठाकए घरक बाहर फेकि चुकल रहथि. श्रीपतिक धृष्टता देखि ताधरि भवानी साक्षात् कालीक रूप  मे आबि गेल छलीह- क्रुद्ध  आ निर्भीक ! सतीश देखलनि जे क्रोध आ घृणासँ  भरल भवानी श्रीपतिक आँखि में आँखि द’ कए  हुनका ललकारि रहल छलीह, ‘अच्छा ? लोक नीक बेजाए बजैए, से आइ बुझलिऐक ? हमरा बच्चा पर बच्चा होइत गेल आ अहाँ कें लाज भेल ? आब एकाएक अपन प्रतिष्ठा मन पड़ल-ए’ ! ताहि पर क्रोधे आन्हर भेल श्रीपति, ‘चुप कुलटा !’ कहि अचानक बामा हाथें भवानीक झोंट पकड़ि जहाँ हुनका मारबाक हेतु जहाँ दहिना हाथ उठौलनि कि  भवानी अपन दाहिना पयर उठा श्रीपतिक अंडकोषमें तेहन लात देलखिन जे हुनका ओतहि मूर्छा भए गेलनि. ई अप्रत्याशित छल. मुदा, ई ओहि दिनुक घटनाक अंत नहिं छल. श्रीपति कें होश भेलनि तं ओ सतीश कें सेहो एकदम नव स्वरुप में देखि हतप्रभ भए गेलाह. श्रीपति कें ललकारैत सतीश चिकरि रहल छलाह, ‘हमरे घर आ हमही घरसँ बाहर हएब ?  अहाँ हमरे समान फेकि देल. अहाँक जोड़ा निर्लज्ज नहिं भेटत एहि संसार में. नपुंसक !! मुदा, अहाँक काज एखन पूरा नहिं भेले. भवानीक समान तं भीतरे छनि. हिनको सब समान एखनहिं बाहर करू . अहाँ हुनका कोन अधिकारसँ  अपना लग रखबनि ? ओ रहतीह एतय ? पुछियनु तं !’

श्रीपति सतीशक  एहि अकस्मात् परिवर्तित स्वरुप ले प्रस्तुत नहिं छलाह. क्रोध में हुनका सम्हार नहिं रहलनि. ओ एकाएक उठि सतीशक पर  चिकरलाह, ‘लम्पट !’- आ क्रोध मे, ओसारा पर पड़ल लोटा उठाकए सतीशक माथ पर दए मारलखिन. सतीशक कपारसँ छर-छर शोणित बहय लगलनि. सतीश युवक छलाह. ओ अपना कें तुरत सम्हारलनि आ कूदि कए, एके छरपान मे, दाहिना हाथें श्रीपतिक नरेटी पकड़ि , ‘आँखि में आँखि दैत कहलखिन, कए दियअ एखने लीला समाप्त ?’

श्रीपति के अक्क-बक्क किछु नहिं फुरयलनि. हुनकर चेहरा पीयर भए गेल रहनि. भेलनि जे आब क्षण भरि मे जं सतीशक हाथ ढील नहिं भेलनि तं प्राण नहिं बंचत. तखने, बिजलीक गति सं पुनः भवानी बहरयलीह. क्रोध-घृणा आ हताशाक मिश्रित भावक अछैतो, ओ संयमित जकां सतीश कें कहलखिन, ‘छोड़ि दियनु हिनका. मरल विवेक, मृत्यहुसँ निकृष्ट थिक. हिनक प्राण लेबासँ किछु नहिं भेटत. ई जीविते कहाँ छथि. ई कहि ओ श्रीपति कें  देखि कहलथिन, ‘अहाँक पुरुषे कहयबाक टा ने लोभ छल. से भेटि गेल ने ? हम अहाँक वंश बुड़बासँ बंचा देलहुँ. अहाँ पुरुख भ’ गेलहुँ ने ! अहाँ आब रहू. हम मुक्त छी. हमरा अपन बाट सोझ देखबामे अबैछ. हमरालोकनि चललहुँ .’

श्रीपति अवाक् भए गेलाह. कहलखिन, ‘ एना जुनि कहू, भवानी ! हमर की हयत ?’

‘से अहाँ जानी.’ भवानी अपन मन मे दृढ़ रहथि, तं सतीश कृतसंकल्प. भवानीक मन में कोनो दुविधा नहिं छलनि. ओ कहलथिन,’हमरो एकटा पुरुष चाही जकरा केवल अपन मिथ्या प्रतिष्ठा टाक लोभ नहिं, हमर आवश्यकतो होइक, हमर आदरो होइक.’ आ  भवानी दुनू नेनाक डेन पकड़लनि आ उठि कए विदा भए गेलीह, आ सतीश कें कहलखिन, ‘देखैत की छी ! चलू.’

श्रीपति किंकर्तव्यविमूढ़ भेल, ठामहिं बैसल रहि गेलाह.

आइ एतेक दिनक बाद अकस्मात् सतीश आ भवानी कें न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायर में देखि मनमोहन कें भेलनि जे सत्ते ओ आइ एकटा आओर कुन्तीकें देखि रहल छथि; ई कुन्ती महाभारतक अबला नहिं, ई सत्यतः भवानी थिकी. 

  

  

 

Sunday, August 29, 2021

किरण जीक सान्निध्य में किछु देखल, किछु सुनल

 

किरणजीक मृत्युक 32 वर्षसँ बेसी भए गेलनि. हुनकर समकालीन, आ हुनकर सहकर्मीक अतिरिक्त मैथिलीक प्रचार-प्रसारक आन्दोलन मे फाँड़ बान्हि हुनक संग चलनिहार म सं आब प्रायः किछुए बंचल होथि. हमरा लोकनिक पीढ़ीक किछु गोटे अवश्य किरणजीक मैथिली अभियानक प्यादा वा foot-soldier रहल हेताह. मुदा, हमरा सेहो गौरव प्राप्त नहिं अछि. तथापि, एक अर्थ मे हम किरणजीक समानधर्मा अवश्य छी.मुदा, से पछाति. एखन उद्देश्य अछि, किरणजीक निकट रहि जे किछु देखल, वा हुनका मुंहें जे सुनल, ताहि म सँ किछु किछु प्रेरक आ चमत्कृत करबा योग्य संदर्भक चर्चा.

हम जहिया ककहरा पढ़ब शुरू कयने हएब तहिया किरणजी ‘ किरणजी’ क रूपें प्रसिद्द भए चुकल छलाह. तें, हुनकर छवि कें हमर दिवंगता माता हमरा समक्ष प्रेरणा-पुंज वा आदर्शक रूप प्रतिष्ठापित कयने छलीह. तकर कारणों छलैक. हमर माताक दृष्टि मे किरणजी एहन योद्धा छलाह जे स्थापित मान्यताक छहरदेवाली कें सहजहिं अपन बाटक अवरोध मानबा ले तैयार नहिं होइत छलाह. एहि तथ्यक पक्ष मे अनेक प्रमाण सुनने छलहुँ. पहिल, सुनल जाइछ जे किरणजी अपन पित्तीक भविष्यवाणी रहनि जे ‘ हिनका जं विद्या होइनि तं तरहत्थी मे केश चरितार्थ हएत.’ मुदा, किरणजी अपन परिश्रमक बलें उच्च शिक्षा क कोन श्रेणी धरिक बटिखाराकें भजारलनि से सर्वविदित अछि. एहि संदर्भ में किरणजीक मुँहें सुनल दू टा आओर गप्प मन पड़ैछ. पहिल, किरणजीक शिक्षा-दीक्षाक युगमें अंग्रेजी शिक्षा ने सुलभ रहैक आ ने सर्वग्राह्य. मुदा, ई अपन दू गोट जेठ भाई जकाँ, रजौर (अजुका बांग्लादेश) जा कए राजा टंकनाथ चौधरीक संरक्षण में मैट्रिक पास केने रहथि. ओ कहथिन,  ‘ 16 म वर्ष में ABCD सिखने रही. पहिने, संस्कृत पढ़बाक-घोखबाक हिस्साक छल. रजौर गेला पर अहल भोर उठि जोर-जोरसँ  पाठ घोखए लगैत छलहुँ. राजा टंकनाथ चौधरीक आवास लगहिं में रहनि. मुदा, हमरालोकनिकें कोनो वर्जना नहिं. तथापि, एक दिन राजाक एकटा निकट संबंधी कहलनि, ‘एतेक भोरे, एतेक जोर-जोरसँ पढ़इत छी. राजाकें निन्न में बाधा हेतनि तं विदा कए देताह. बस. हमर जोर-जोरसँ पढ़ब बन्न भए गेल. दिन दुइएक पछाति राजाक नज़रि हमरा पर पड़लनि. पुछलनि, ‘ नत्थू, आइ-काल्हि पढ़इत नहिं छह ? हमरा हुनकर संबंधी जे हिदायत देने  रहथि, से हम राजाकें सुना देलियनि. राजा हँसय लगलाह. कहलनि, ‘ जाह, तों आओर जोर-जोरसँ पाठ पढ़ह.’

दोसर गप्प ओकर बहुत दिनक पछातिक थिक: केओ हितैषी वा मित्र  किरणजी कें पुछलखिन, ‘ किरणजी, अहाँ कें M.A., Ph D. आदि परीक्षा देबाक कोन प्रयोजन ! अर्थात्, अहाँक योग्यता सर्वविदित अछि. एहि पर किरणजी कहलथिन, ‘से जे बूझैए तकरा ले ने. जे नहिं बूझैए तकरा ले भजारि देलिऐक-ए.’

किरणजीक प्रकृतिसँ योद्धा हेबाक अओरो उदहारण छनि. सुनल अछि जे युवावस्था मे किरणजी कालाजारसँ  बहुत दिन धरि मरणासन्न भए पड़ल रहथि. तथापि, परिवारजन भले हुनक जीवाक आस त्यागि देने होथुन, किरण जी अपन जिजीविषा आ आन्तरिक उर्जाक बलें ओहि युग में मृत्यु पर विजय पओने  छलाह जहिया प्रतिवर्ष मलेरिया, कालाजार आ यक्ष्मासँ अजस्र लोक मरैत छल.

प्रारम्भिक जीवन मे किरण जीक परिवार आर्थिक दृष्टिऍ झमारल छलनि. किन्तु, अपन बाहुबल आ मितव्ययी स्वभावें ई एकटा शिक्षकक वेतन पर अपन आर्थिक परिस्थिति कें सुदृढ़ कयलनि. एहि संदर्भ मे किरणजी निम्नलिखित किछु पाँति जेना हुनक अपने जीवनक कथा कहैछ:

की थिक भाग्य, विधाता के अछि  ?

सबसँ पौरुष हमर प्रबल अछि .

                                    कतेक दिनक बाद, पृष्ठ 2

दाढ़ी मोंछ न पुरुखक लच्छन

ढेपा, चेपा, कांकर, पाथर, कांट-कूस ओ जंगल झाँखुड़

चूरि-चारि ओ थूरि-थारि पथ, पुरुख बनाबय चिक्कन

                                    विजेता विद्यापति, पृष्ठ 37

सर्वविदित अछि, आरम्भ में किरणजी व्यवसायें वैद्य छलाह. मुदा, अपन ज्ञान-प्राण में हमरालोकनि हुनका वैदागरी करैत नहिं देखने रहियनि. संयोगसँ हम जखन दरभंगा मे पढ़इत रही तं हुनकासँ  नित्य भेंट होइते छल. ओहि समय मे बुझबा में आयल जे किरणजीक चिकित्सा शास्त्रक ज्ञान आ अनुभव, दुनू गम्भीर छलनि. परिस्थितिवश चिकित्सा व्यवसाय छूटि गेल रहनि. प्रायः तकर कचोट सेहो रहनि. तें, कदाचित् बनारस हिन्दू विश्वद्यालय आ कलकत्ता विश्वविद्यालयक अपन जीवनक चर्चा सेहो करथिन. ओहि में काशी विश्वविद्यालय में मैथिलीक मान्यताक हेतु कयल हुनक प्रयासक चर्चा सेहो रहैत छल. ई प्रसंग आब सुपरिचित अछि, आ अनेक ठाम विस्तारसँ एकर चर्चा भेल अछि, तें ओकर चर्चा एतय छोड़ि दी.

किरण जी एक दिन हमरा लोकनि कें अपन बैदागरीक जीवनक आरम्भिक कालक एकटा रोचक प्रसंग कहलनि:  ‘बैदागरी पढ़िकए गाम आयल रही. अपने दरबज्जा पर .....( एक गोटे ) भेटलाह. कहलनि, ‘बैदागरी पढ़लहुँ-ए.’ आ से कहैत अपन गट्टा आगू बढ़बैत कहलनि, ‘ कहू तं हमरा कोन रोग अछि.’

हम कहलियनि, ‘ हम पशु चिकित्सा नहिं पढ़ने छी. पुछनिहार अपरतिब भए गेलाह.’

मुदा, एतबा अवश्य जे किरणजी कें चिकित्सा व्यवसायक प्रति लगाव छलनि. 1973 मे जखन दरभंगा मेडिकल कालेज में हमर नाम एम बी बी एस कोर्स में लिखल गेल तं कहने रहथि, ‘ दरभंगा मेडिकल स्कूल में नाम लिखेबाक लेल हमर चुनाव भेल छल. मुदा, पचास रुपैया नहिं छल. तें, नाम लिखबितहुँ से नहिं भए सकल. आइ ( दरभंगा मेडिकल कालेज में ) अहाँक नाम लिखल गेल, तं ओ मनोरथ पूर्ण भए गेल.

मुदा, हमरा हरदमे ई प्रश्न खिहारैत छल जे एहन तीक्ष्ण बुद्धि आ चिकित्सा शास्त्रक एहन विलक्षण ज्ञानक धनी चिकित्सक व्यवसायसँ  विमुख किएक भए गेलाह. एक बेर पुछलियनि: अहाँ चिकित्सा व्यवसाय किएक छोड़ि देलिऐक ? तं ओ कहलनि,’ की करितिऐक. एहि इलाका में तहिया अत्यंन्त गरीबी रहैक. जतय चिकित्सा करय जाइत छलहुँ, औषधिक मूल्य आ वैद्यक फीस देबाक हेतु लोककें रोगी / नेनाक काड़ा-माठा, वा खुट्टा पर बान्हल माले-गाए बेचब वृत्ति होइत छलैक. घर मे औषधि किनबाक मूल्य नहिं, पथ्य ले अन्न नहिं. चिकित्सा की करितिऐक !

फलस्वरूप, किरणजी चिकित्सा व्यवसाय छोड़ि शिक्षक बनि गेलाह. किरण जी शिक्षकक रूप में केहन रहथि, से तं ओएह सब कहताह जे हुनकासँ पढ़ने छथि.  हमरा से सौभाग्य नहिं भेल. किन्तु, हुनक दृष्टि एतेक स्पष्ट रहनि जे  कोनो विषय पर ओ एहन उपलक्षण दितथि जे हुनक उक्ति अएना जकाँ झलकि उठैत. एकर एकटा प्रसंग एतय कहब अप्रासंगिक नहिं हएत.

किरणजी चंद्रधारी मिथिला महाविद्यालयक अपन सेवाक अवधि मे रहमगंज, लहेरियासराय में डेरा रखने रहथि. दरभंगा प्रवासक ओहि अवधि में ओ प्रायः प्रतिदिने सांझ कए  हॉस्पिटल रोड स्थित हमरा सबहक डेरा आबथि. एक दिन हमरा लोकनि हुनकासँ गप्प करैत रही. किछु हंटि के एकटा नेना सेहो ओतहि पढ़इत रहथि. पढ़बासँ नेनाक ध्यान हंटि जाइनि. पढ़बासँ  ध्यान हंटिते, ओही परिवारक एक गोटे बेर बेर कहथिन, ‘अहाँ पढ़ू’, तं किरणजी कहलथिन, ‘ पोथी-किताब घास नहिं थिकैक, जे मालक आगू  फेकि दिऔक आ खा लेतैक. पढ़ाएब आवश्यक छैक.’  किरणजीक  संग बिताओल समयक एकटा आओर प्रेरक प्रसंग मन पड़ैत अछि.

हमरा लोकनिक डेरा परहक साँझुक  एहने एक बैसाड़क पछाति एक दिन किरणजी अपन डेरा ले बिदा भेल रहथि. राति करीब दस बाजि गेल रहैक. मेडिकल कालेजक गेट लग हुनका रिक्शा लेबाक विचार भेलनि. एकटा रिक्शावाला कें पुछलखिन, ‘ रहमगंज चलबह ?

-‘नैं’

हमरा लोकनि कालेजक छात्र रही. कहलिऐक, ‘ किएक नहिं ? आ हमरा लोकनि दू गोटे छरपि कए ओकर रिक्शा पर बैसि गेलहुँ. कहलिऐक- चलह !

किरणजी कहलनि, ‘ छोड़ि दिऔक.’

‘किएक नहिं जेतैक ?’ हमरा लोकनि प्रतिवाद केलियनि, ‘ एकरा सबहक हिस्सके एहने छैक !’

‘नहिं. नहिं जेतैक, तं नहिं जाउक. ओकरो अपन स्वतंत्रताक एतबा अनुभूति तं होबय दिऔक.’ कहैत किरणजी डेरा दिस आगू बढ़ि गेलाह.

आइओ कहैत छी, व्यक्तिगत स्वतंत्रताक प्रति हुनक एहन आदर हमरा लोकनि कें चमत्कृत अवश्य कयलक.

            तहिना छलनि किरण जीक अपन माटि-पानि-देश-भूमि-पर्वत-नदी सबसँ प्रेम जे धर्म-पुण्यक अवधारणासँ दूर आत्मवत्  अनुभूतिसँ अनुप्राणित छलनि. मन पड़ैत अछि, एक बेर हमर माता स्व. बिन्देश्वरी देवी ( स्व. किरणजीक छोटि बहिन) गंगा-स्नान ले सिमरिया घाट विदा भेल छलीह. हमरालोकनि ( किरणजीक धर्मपुर गामक वाससँ किछुए दूर) लोहना रोड स्टेशन पर ट्रेनक प्रतीक्षा मे बैसल रही. किरणजी हमर माताक भेंट करय स्टेशन पर आएल छलाह. गप्प कए वापस गाम पर जेबाकाल ओ हमर माए कें कहलथिन, ‘ अच्छा, गंगा मे हमरो ले एक डूब द’ देब.’

किरणजीक कट्टर नास्तिक रहथि. अस्तु, तहिया हुनक ई गप्प हमरालोकनि कें आश्चर्यनक लागल छल. मुदा, पछाति, किरणजीक मरणोपरांत जखन हुनक काव्य-कृति ‘पराशर’ प्रकाशित भेलनि तं ओहि में पढ़लहुँ:

जय जय धरती मानव जीवन केर आधार

प्राण

जय जय अनिल, सलिल, जय सूर्य-चान

जय आसमान .

जय जय पर्वत राज हिमालय,तोहरे देहक

कण-कण सँ अछि बनल हमर सबहक ई देश .

कोशी, कनकइ, कमला, गंडक, गंगा

द्वारा सनेस जकाँ पठा माटि

एकरा छह पुष्ट करैत

अपन शरीरक घाम सदृश हिमजल सँ

छह पटबैत

पुनि कहिओ-कहिओ तमसैल

जकाँ भूकम्प मचा ध्वंसो छह 

क’ दैत,

तें तीरभुक्ति मिथिलाक थिकह तों

ब्रह्मा-विष्णु-महेश.

                                                        एहि सब पाँति पढ़ि कए हमर भ्रांति दूर भए गेल !

( मैथिली अकादेमी पत्रिका, पटना, अंक 9, 2006 में प्रकाशित लेख केर संपादित, अद्यतन  स्वरुप )

                  

Tuesday, August 10, 2021

गंगा नदी आ अपूर्व चन्द्रोदयक एक सांझ

 

जीवन विस्मयकारी अनुभव सबहक यात्रा थिक

जीवन विस्मयकारी अनुभव सबहक यात्रा थिक. छोट नेनाक विस्मयक विषय आ चेतनक विस्मयक कारण भिन्न होइत छैक. मुदा, विस्मयकारी अनुभवक सिलसिला समाप्त नहिं होइछ. विस्मय बुढ़ारियो में होइछ, मृत्युशय्या पर सेहो होइछ. किन्तु, ओहि दिनुक विस्मयकारी अनुभव प्रकृतिक सुन्दरताक अनुभव थिक. गप्प तं प्रायः 1995- 96 क छियैक. हम बरेली सैनिक चिकित्सालय में पदस्थापित रही. ओहि समयमें मुलायम सिंह यादव रक्षा-मंत्री रहथि. पार्टी कोनो होइनि, राजनेता लोकनि सत्ताक दुधारू गाई कें दुहिते छथि. मुलायम सिंह यादव अपवाद नहिं रहथि. हुनका फ़तेहगढ़, उत्तरप्रदेश में पार्टी कार्यकर्त्ता लोकनिक सार्वजनिक सभाकें संबोधित करबाक रहनि. मुदा, सशस्त्र सेनाक वायुयानक उपयोग ले तं कोनो सरकारी ड्यूटीक बहाना चाहियैक. अस्तु, रक्षा-मंत्रीक सिख लाइट इन्फेंट्री रेजिमेंटल सेंटर आ राजपूत रेजिमेंटल सेंटरक दौराक कार्यक्रम बनल. रक्षा मंत्री फतेहगढ़ जयताह तं ओतुका मिलिटरी प्रतिष्ठान सबकें मंत्री जी कें अपन गतिविधि देखयबाक आदेश भेलैक. मध्यकमानक यु पी एरिया ( आब उत्तर भारत एरिया ) आदेश निर्गत कयलक. हमरा लोकनि बरेली मिलिटरी अस्पतालक दल ल कए फ़तेहगढ़ गेलहुँ. हम पहिनहुँ  फतेहगढ़ गेल रही. मुदा, एहि बेर रक्षामंत्री अबैत रहथि.  

                                                                फ़तेहगढ़ किला 

फ़तेहगढ़, फर्रुखाबाद जिलाक मुख्यालय गंगाक दक्षिणी कछेर पर बसल अछि कैंटोनमेंट थिक, फर्रुखाबाद शहर एतयसँ करीब पांच किलोमीटर दूर अछि. कैन्टोमेंट केर नाम एहि ठामक गढ़ वा किलाक कारण फ़तेहगढ़ थिक. जेना आन सबठाम छैक, एतुको किला सेनाक नियंत्रण में अछि. विकिपीडिया कहैत अछि, 1857 केर सिपाही विद्रोह में विद्रोही लोकनि किलापर कब्ज़ा कए लेने रहथि. एतय लगभग 200 यूरोपियन मारल गेल छलाह. किछु जे  गंगाक बाटें नाओसँ भगबा में सफल भेलाह से बाटे में पुनः पकड़ल गेलाह, आ विद्रोही लोकनिक हाथें हुनकोलोकनि संहार भेल. पछाति, जखन ब्रिटिश सरकार पुनः नियंत्रण स्थापित केलक तखन तं सब किछु फेर ओकरे भए गेलैक. ओना ब्रिटिश सरकारक उपस्थिति विद्रोहसँ पहिनहुँ एतय रहैक. ओहि समय में एतय ब्रिटिश सेनाक गन-कैरेज फैक्ट्री सेहो रहैक, जे सामरिक दृष्टिसँ उपनिवेशवादी सेनाक हेतु महत्वपूर्ण छलैक.                                                                        आब पुनः विषय पर आबी. नागरिक सभाक दिन रक्षामंत्री हेलिकॉप्टरसँ अयलाह. सेनाक प्रदर्शनी टेंट सबमे लागल छलैक. ओ प्रत्येक टेंट में गेलाह. अफसर लोकनिसँ हाथ मिलओलनि. फोटो घिचल गेल.  प्रदर्शनी देखलनि, आ सोझे सार्वजनिक सभामें गेलाह. मुदा, एहि में किछु विस्मयकारी नहिं रहैक. विस्मयकारी अनुभव रातिमें भेल.              रक्षामंत्रीक सम्मान में राजपूत रजिमेंटल सेंटर केर अफसर मेस में रात्रि-भोज भेलैक, जकरा सेनाक भाषामें डिनर-नाईट कहल जाइछ. ई अत्यंत औपचारिक पार्टी थिक जकर वर्दी, ड्रिल, बैंड-बाजा, आ बैसबाक, खयबाक आ उठबाक निर्धारित रीति रिवाज छैक.                                                                                                                  राजपूत रजिमेंट गंगाक कछेर पर बसल छैक. ऑफिसर मेस तं नदीक सबसँ लग छैक. हमरालोकनि गंगाकें हरिद्वार, प्रयाग, बनारस, पटना आ कलकत्ता सब ठाम देखने छी. मुदा, मन नहिं पड़ैत अछि, पहिने कहियो गंगाक कछेर परक चंद्रोदय आ पूर्ण चंद्रमा देखने छी कि नहिं. ओहि राति पूर्णिमाक राति रहैक. अफसर मेस केर गलीचा सन घास पर बार लागल छलैक. रेजिमेंटल मिलिटरी बैंडक सर्वोत्तम कलाकारलोकनि वातावरणकें संगीतमाय केने रहथि. रक्षामंत्रीक सम्मान में जेहन भोजन-साजन उपयुक्त होइतैक से रहैक.                                                                          चन्द्रोदयक पहिने कालिमासँ  गोधूलि आ राति संक्रमण घनीभूत भए आयल रहैक. किछुए काल में पूब क्षितिज पर प्रकाशक आभास एलैक. कनिए कालमें चंद्रमाक आकृति संझुका धूमिल वातावरणक बाटें अवतरित भेल. पछाति, किछुए क्षणमें जे भेल से अपूर्व छल; चंद्रमाक गाढ़ रक्ताभ चक्का, क्षितिज कालिमा पर एकटा नैसर्गिक कला जकां उदित भेल. क्रमशः, जखन  सम्पूर्ण चंद्रमा मेसक परिसरक गाछ सबहक उपर आयल तं दृश्य अभिभूत कए देलक. एहन निर्मल चंद्रमा, एहन मृदु वायु आ एहन व्यवस्था, जे ओहि पार्टी कें भेना पचीस वर्षसँ बेसी भए गेलैक आ हम ओकर अनुभव आइ लिखए बैसल छी. चंद्रमा परसँ नजरि हंटल तं एकाएक भान भेल जे हमर लग जे अफसरलोकनि छलाह ताहि म सँ कर्नल दाश गायब रहथि. मुदा, हुनका दुबारा प्रकट हयबा में देरी नहिं लगलनि. हम चकित रही. पुछ्लियनि: कतय बिला गेल रही आ कोना अवतरित भए गेलहुँ ? ओहि पर जे ओ कहलनि से आओर विस्मयकारी छल. कहलनि : एतेक अनुकूल मौसम. एहन मनोरम वातावरण. एहन इजोत आ गलीचा सन घास. हम तं लॉन केर कोन पर दू चारि बेर ओंघराकय आबि रहल छी ! हम देखलिअनि हुनकर शूट पर एक दू टा सुखायल दूबि तखनो सटल रहनि ! हमरा बुझबा में आबि गेल. सेना में अफसर मेसक इतिहास कहैत अछि, जे बहुत पहिने लेडिज लोकनिक हेतु अफसर मेस परिसर वर्जित रहनि. कोनो औपचारिक अवसर में जं बजाओल जेतीह, तं अओतीह. अन्यथा ‘ हाई स्पिरिट’ में अफसर लोकनि अपना सबहक बीच की कए बैसताह, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः. सत्ते, हमरोलोकनि जखन सेना में कमीशंड भेल रही तं इएह सुनने रही: अफसर मेस अविवाहित अफसर लोकनिक घर थिकनि. माने, ओतय ओ लोकनि ‘प्राकृतिक’ ( वा अप्राकृतिको) अवस्था में विचरण करैत छथि ! मुदा, सेनाक अनुशासन केहनो जीव कें साधि दैछ ! से हमर अपन अनुभव कहैछ.   

            ओहि पार्टी आ परिसर दोसर छवि जे आइओ स्मृति पटल पर खचित अछि, ओ थिक राजपूत रेजिमेंटल सेंटर परिसरमें स्थापित रानी विक्टोरियाक आदमकद ग्रेनाइटक मूर्ति. तहिया, संयोगसँ, भारत में तेना भ’ कए मूर्तिभंजनक  आधुनिक परिपाटी आरम्भ नहिं भेल रहैक. तहिया औरंगजेब खलनायक आ दाराशिकोह भारतप्रेमीक रूप में नामांकित नहिं भेल रहथि. सेनाक परिसरसँ मूर्ति उठायब, मूर्ति-तस्कर सुभाष कपूर ले सेहो सुलभ नहिं रहनि. नहिं जानि, आब विक्टोरियाक ओ मूर्ति ओतय अछि कि नहिं. कारण, आब इतिहासक पुनर्लेखन जारी अछि. हम सोचैत छी, जं भारत अपन इतिहास म सँ सबटा ‘अवांछित’ अंश हंटा देतैक तं भारत आ पकिस्तानक इतिहास में की अन्तर रहतैक; भारत आर्य लोकनिक इतिहासकें अपनाओत. पकिस्तान मुग़लकालीन इतिहासकें अपन पोथीमें स्थान देने छैक ! मुदा, हमर से चिन्ता नहिं. हमर विचार जे जं मौक़ा लागय तं एक बेर जखन आकाश निर्मल होइक, गंगा कछेर पर चन्द्रोदय अवश्य देखू. कारण, सौन्दर्यक अनुभव वस्तु थिक, लिखबाक नहिं. एहि बीच में कतहु पढ़बो केलहुँ  जे भाषा अपनामें अन्तर्हित सत्य कें छोड़ि आन कथुक वर्णन नहिं के सकैछ. आ से सत्य थिक ! जं आँखि मूनि ली, कान बंद कए ली तं शब्द, संगीत, आ कलाक स्वरुप चेतना धरि कोना पहुँचाओत !

हं, समाप्त करबासँ पूर्व एकटा आओर गप्प. हमरा लोकनिक प्रदर्शनी रक्षामंत्रीक गेलाक पछातियो, दोसरो दिन छल. जेना, अनुमान कए सकैत छी, स्थानीय फोटोग्राफर प्रत्येक अफसर आ जवानकें रक्षामंत्रीसँ  हाथ मिलबैत फोटो लेने रहथि. आइओ फोटो बेचए आयल छलाह. मुदा, जखन हमरा लग अयलाह तं हम कहलियन्हि, ‘ हमरा एतेक हिम्मत नहिं जे मुलायम सिंहक संग अपन फोटो घर में राखब ! हमर परिवार आ धीया-पुता हमरा घरसँ  निकालि देताह. तं, सब हंसय लागल. मुदा, पछाति अपना लागल जे हम अनर्गल कहि देलियैक. हमरा लोकनिक व्यवस्था लोकतंत्र थिक. बेचारी चलिए गेलीह. नहिं तं कोन ठेकान अगिला बेर स्व. फूलन देवी रक्षामंत्रीक रूप में अबितथि, हमरा  लोकनि हुनको गार्ड-ऑफ़-ऑनर देबे करितियनि ! ओ समाजवादी पार्टी क एम पी तं रहबे करथि. बेचारोक हत्या भए गेलनि ! नहिं, तं कोन  ठेकान !        

Monday, July 12, 2021

प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थिति

 

6 सितम्बर 2009, रवि दिन. न्यूयॉर्क सिटी, अमेरिका. हमरा लोकनि टाइम्स स्क्वायर लग घूमैत रही. हमरा संग  हमर पत्नी, कन्या, जमाय आ हुनक एकटा गुजराती मित्र परिवारक  रहथि. सड़कक कातक साइड-वाक पर नीक चहल-पहल छलैक. अकस्मात्, हमरा लागल, पाछूसँ  छूबि केओ हमर ध्यान आकृष्ट केलनि-ए. उनटिकय  देखैत छी, तं एकटा मैथिल परिवार : युवक, पत्नी, बरख दसेक एकटा बालक आ एकटा छोटि कन्या. मुसुकाइत कहलनि, ‘अपने सब कें मैथिली बजैत सुनलहु, तें...’ एतेक दूर में अपन भाषा बजैत नागरिकसं भेंट भेने जेहने हर्ष आ कौतूहल ओहि  मैथिल परिवारकें भेल रहनि, तेहने हमरो लोकनिकें भेल छल. हमरा लोकनि ओत्तहि ठाढ़े-ठाढ़ पांच मिनट परिचय-पात कयल आ अपन-अपन बाट धयल. मधुबनी जिलाक निवासी ओ युवक न्यूयॉर्कहिं में काज करैत रहथि.न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायरक भीड़में मैथिली सूनि एहि परिवारक  अचानक आकृष्ट हयब एतबा तं अवश्य सिद्ध करैछ, जे विदेशहु में रहला उत्तर, मातृभाषा एकटा चुम्बक प्रमाणित होइछ. 

                                       न्यूयॉर्क मधुबनीक मैथिल परिवारसँ अचानक भेंट, वर्ष 2009  

तथापि, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिकें महत्वकें प्रमाणित करबाले केवल एकटा ई उदाहरण पर्याप्त नहिं. तें, एहि विषयक कनेक विस्तारसं जाँच करी.                                                                                         सत्यतः, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक जांचले दू प्रकारक मापदंड चाही. एक, प्रवासी मैथिल लोकनिक बीच सर्वेसँ  ई ताकल जाय जे ओ लोकनिक अपन जीवनमें मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थितिक अनुभव करैत छथि; दू, भारतसँ  विदेश जाइत मैथिल अपन देखल अनुभवक आधार पर स्वतंत्र  निष्कर्ष  निकालथि जे ओ लोकनि विदेशमें प्रवासी मैथिल लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थिति देखलनि. हमरा अपन निष्कर्ष निकलबाक हेतु एहि दुनू म सं कोनो मापदंडक नहिं अछि. तें, हमरा अपन परिवारजन सहित अनेको प्रवासी लोकनिक संग देशसं बाहर आ भारतक भीतर जे सम्पर्क भेल अछि, ओही सम्पर्कक अनुभवक आधारपर हमर हम अपन विचार एतय रखैत छी.

जं प्रवासी लोकनिकें कनेक काल ले छोडि दी, तं, अपन इलाकाक प्रति लगावक एकटा भिन्न उदाहरण दैत छी. ईसवी सन 2006 में एगारह बजे रातिक करीबक एक ट्रेन में चढ़बाक क्रममें धक्का-धुक्कीक कारण, तीन गोटे नई दिल्ली स्टेशन पर अबैत ट्रेनक सामने रेलक पटरी पर खसिकय मरि गेलाह. हमरा अनुमान अछि,  फगुआ, दसमी, आ छठिक पूर्व दिल्ली-नई दिल्ली स्टेशन पर घरामुंहा बिहारी लोकनिक एहन भीड़  बहुतो गोटे कें देखल हयत. प्रश्न उठैछ, पर्व-त्यौहारक अवसर पर लोक गाम अबैले कोना आफन तोड़ने रहैछ, देशक भीतरक प्रवासी लोकनिकें गाम अपना दिस किएक  एना घीचैत छनि, जखन कि दशहरा–होली-दिवाली-छठि आब दिल्लियोमें मनाओल जाइछ, एहि सब पर्वक छुट्टी दिल्लीओमें  होइत छैक. माने, पर्वक  आलावा सेहो गाम में एहन किछु अदृश्य आकर्षण अवश्य छैक जे लोककें गाम दिस झिकैत छनि : ककरो माता-पिता, ककरो परिवार आ नेना आ ककरो केवल अपन भूमि आ कमला-कोसीक धार, वा गोसाउनि-ब्रह्मबाबा अपना दिस झिकैत छथिन . विदेश बसैत प्रवासी भारतीय लोकनि सेहो अपन भूमिक दिससं एहने घिचावक  अनुभव करैत छथि, से सब कहताह. किन्तु, कतेको बेर समयक अभाव, दूरी, आ व्यय बाधा बनि ठाढ़ भ’ जाइछ.  एतबे नहिं, देश दिस घिचाव आ जुड़ाव केर  आओर अनेको सूत्र छैक, जे कखनो आवश्यकतासं प्रेरित होइछ, आ कखनो महज भावनात्मक तन्तुक जोरसं  सेहो. हम अनेको परिवारसँ परिचित छी जे जीवन समुद्रपार बितौने छथि, किन्तु, सन्तान लोकनिक हेतु जीवन संगीक तलाश मिथिलहि में आबि कय कयने छथि. एकर अपवादो अवश्ये भेटत. किन्तु, ई प्रवासी लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक एकटा विन्दु भेल तं अवश्य.                                                            आब एकटा दोसर गप्प. की प्रवासी लोकनिक अपन जीवनमें मैथिल समाजक अभावक शून्यताक अनुभव करैत छथि ? हमरा जनैत, सब दिन जं नहिओ तं, कहिओ काल अवश्य. प्रवासी लोकनि जतय कतहु छथि अपन  देश आ भूमि पर  छूटल  अपन समाजक अभावक अनुभव अवश्य करैत छथि. तें, जतहु मैथिल लोकनिक पर्याप्त संख्यामें छथि, अपन गाम-घरक मैथिल समाजक कमी कें दूर करैक हेतु, मिथिला-मैथिलीक संस्था बनाकय, एक दोसराक सम्पर्क में रहैत छथि.  आओर नहिं किछु, तं,‘कठौती में गंगा’ तं सब सुननहिं छी. सएह सही.  यूनाइटेड किंगडम (UK) में लन्दनमें मिथिला सोसाइटी यू के नामक एकटा संस्था सक्रिय अछि से तं हमरा बूझल अछि. ई संस्था यूनाइटेड किंगडम (UK) क विभिन्न भागमें काज करैत, आ बसल, मैथिल लोकनिक संस्था थिक. एहि संस्थाक सदस्य लोकनि अपन संस्थाक दिससं समय-समय पर सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करैत छथि, आ अपन पर्व-उत्सव मनबैत छथि. भारत सं अबैत साहित्य आ ललितकलासँ  जुड़ल व्यक्ति सबहक संग सम्मेलन, आ हिनका लोकनिक अभिनन्दनक हेतु सेहो, ई संस्था आयोजन करैत अछि, से सुनल अछि. संस्थाक माध्यमसँ सबहक एक दोसराक सम्पर्क में रहलासं बेर-कुबेर पर एक दोसराक सहायता सेहो होइत छैक. एतय एकटा गप्प बूझब आवश्यक, जे  घर सं जतेक दूर जायब, अपन देश-प्रदेशमें सामान्यतया जे छोट-छोट देवाल देखबामें अबैछ से सब खसय लगैछ. तें, इंग्लैंड-अमेरिका तं छोडू बंगलोर धरिमें मैथिल लोकनि समस्त बिहार-उत्तरप्रदेशक हिंदी-भोजपुरी-मैथिली भाषी लोकनि संग मीलि कय सामूहिक संस्था चलबैत छथि. एहिसँ  समूह सेहो पैघ होइछ आ एके संग अनेक भाषिक समुदायकें अपन समाजक संम्पर्कमें रहबाक बोध सेहो होइत छैक. तें, विदेशमें सेहो संस्था सब राष्ट्रीय स्वरुप ल’ लैछ. तें, विदेशमें  भारतीय नागरिकक वृहत समाजक प्रतिनिधि संस्था सब सेहो लोककें क्षेत्रीय मित्रभाव आ मेलजोलक अवसर आ सुविधा दैत छैक.                                                                                   

आब अमेरिकाक गप्प करी. अमेरिका आकारमें योरपक देश सबसँ बड्ड पैघ. शहर सभक आकार सेहो तहिना. तें, पैघ शहरक गप्प हम नहिं कहि सकब. किन्तु, हमरा अमेरिकाक नार्थ कैरोलिना राज्यक एकटा छोट-सन यूनिवर्सिटी टाउनशिप, चैपल हिलमें, किछु दिन रहबाक अवसर भेल छल. ओहि समयमें चैपल हिलमें किछु मैथिल छात्र आ नोकरिहा लोकनि रहथि. हुनका लोकनिसँ हमरा सम्पर्क भेल छल. ओतय ओ लोकनि एक दोसरासं जुड़ल  अवश्य रहथि. हमरा एक गोटेक ओतय जयबाक अवसरो भेटल. ई दम्पति, दुनू, मैथिल. घरमें जनमौटी नेना रहनि. बच्चाक जन्ममें सहायताक हेतु नेनाक नानी आयल रहथिन तें हुनकोसँ  भेंट भेल. हिनका लोकनिक परिवारमें भाषा मैथिली आ सामान्यतः भोजन-सांजन मैथिल रुचिक.

हालमें, अमेरिकामें रहैत नेपाली मैथिल लोकनिक सांस्कृतिक गतिविधिक एकटा समाचार काठमांडूसं प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक The Rising Nepal क 28 दिसंबर 2019 क अंक में भेटल. समाचारक अनुसार एसोसिएशन ऑफ़ नेपाली तराईअन इन अमेरिका (ANTA ) आ मैथिल्स ऑफ़ नार्थ अमेरिका (MoNA ) क संयुक्त सहयोगसँ अमेरिकाक न्यू जर्सी शहरमें 14 दिसंबर 2019 क विद्यापति समारोह आयोजित भेल छल.एहि समारोह में नेपालसँ आमंत्रित किछु कलाकार आ साहित्यकार सेहो ओतय गेल रहथि. समाचारक अनुसार एहि समारोह में अमेरिकाक विभिन्न भारतीय आ नेपाली समुदायक नेता लोकनि सेहो सम्मिलित भेल रहथि.

                 न्यू जर्सी अमेरिका में विद्यापति पर्व. फोटो: The Rising Nepal, काठमांडू के सौजन्यसँ 

हमर अनुभव कहैछ, मैथिल विदेशमें जतय छथि, अपन पीढ़ी धरि मैथिली बजैत छथि, आ बहुधा अपन रूचि आ सुविधाक अनुसार भोजन-सांजनमें
  मैथिल-जकां खाइत-पिबैत छथि. किन्तु, दोसर पीढ़ी जाइत-जाइत मैथिली भाषा आ व्यवहार विलुप्त भ’ जाइछ. एकर कतेको कारण छैक. पहिल तं सामान्य जीवनमें भाषा आ व्यवहारक अभाव. दोसर, विवाह-दानक हेतु समाजक परिधि जेना-जेना पैघ भ रहल छैक, परिवारसँ मैथिली कतियाअल जा रहल अछि. भारतहु में बसैत मैथिल परिवारहुक स्थिति एहने अछि. तें, जाहि परिवारमें पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी नहिं छथि, ओहि परिवार में नेना-भुटकाकें मैथिली सुनबाक अवसर कदाचिते भेटैत छैक. अस्तु, ओतय मैथिली बिलाय लगैछ. मुदा, जं पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी छथि, तं, बच्चाकें लोक भले मैथिलीमें नहिं टोकौक, बच्चा माय-बापक बीचक गुप्प सुनिओकय किछु मैथिली अवश्य सीखि लैछ, से हम अनुभवसं कहैत छी. किन्तु, जं अहाँ पूछब, प्रवासी लोकनिक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि, तं, हम एतबे कहब, जे भारतहिंमें मिथिलासं दूर बसैत मैथिलक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि ! उत्तर सूनि हताशा हयब सम्भव, किन्तु, ई सत्य थिकैक. प्रवासी लोकनिमें कें जे मैथिलीकें जिया कय रखने छथि, ओ केवल अपन ममत्वसं, आवश्यकतासं नहिं. ततबे नहिं, जहिना भारतमें रहितो बहुतो मैथिल, मैथिली पढ़ब नहिं जनैत छथि, तहिना प्रवासी मैथिल म सं बहुतो मैथिली ने पढ़इत छथि, ने पढ़ि सकैत छथि. किन्तु, समस्या ई छैक जे  प्रवासी मैथिली पढ़हु चाहैत छथि, तं अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म सब पर मैथिलीक पोथीक अभावक कारण मैथिलीक पोथी हुनका सबहक लग पहुंचि नहिं पबैछ. अतः, मैथिलीक प्रति ममत्व रहितो ओ लोकनि मैथिलीसं दूर भ’ जाइत छथि. तें, अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म पर मैथिलीक उपस्थितिक आवश्यक. कारण, हमरा जनैत, विदेशमें मैथिलीक मांग सेहो छैक. तकर एकटा प्रमाण मैथिली भाषाक हमर अपन ब्लॉग ‘ कीर्तिनाथक आत्मालाप’ थिक. पिछला दस वर्षमें पाठक लोकनि हमर एहि ब्लॉगक पेजकें आइ धरि करीब 88834  उलटौलनि-ए, से analytics कहैत अछि . आश्चर्यक गप्प ई, जे एहि म सं अधिकांश पाठक समुद्र पारेक छथि ! माने, समुद्र पारहु सं लोक मैथिली तकैत तं अवश्य छथि !                                           

अंतमें, वर्तमान मिथिलाक समाजक हेतु प्रवासी मैथिल लोकनिक योगदानक गप्प करी. सफल पूत सदायसँ अपन समाजक उत्थानमें योगदान करैत एलैये.  आ तकर आशा उचितो. किन्तु, अपन समाजक उत्थानक हेतु प्रवासी लोकनिक योगदान ले ककरो तं डेग उठबहि पड़तैक. हम पूर्णतः विश्वासक संग ई नहिं कहि सकैत छी, जे प्रवासी मैथिल लोकनि सामूहिक रूपें पैघ स्तरपर मिथिलामें शिक्षा, समाज-सुधार, वा आधारभूत संरचनाक सुधारक कोनो अभियानक सहयोगी छथि वा नहिं. किन्तु, व्यक्तिगत स्तर पर कतेको गोटे मिथिलाक छोट-छोट स्थानीय अभियानमें सहयोग करैत छथि तकर एक-दू टा सूचना हमरा लग अवश्य अछि. हमर अनुमान अछि, विदेश गेल बहुतो सफल मैथिल, गाम-घरक लेल आरम्भ कयल  इमानदार आ सार्थक स्थानीय पहलमें कम वा बेसी सहयोग अवश्य करताह. किन्तु, एहि हेतु पहिल डेग तं केओ उठाबथि. ई डेग वा पहल मिथिलहुसं आरम्भ भ सकैछ. 

( 'तीरभुक्ति' नामक पत्रिका में प्रकाशित )                                   

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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