Saturday, September 4, 2010

मधुवाता ऋतायते ..........

जहिया सँ भेली मैथिली सरकारी नव कनियाँ ,
आ पावय लगली मुँह देखाई,
तहिये सँ कतेको सोचलनि ,
येह थिकी लगहरि गाई !
बस, की छलैक ,
बंगौरे के कतेक गोटे बनवय लागल पीर ,
आ जोलही खंडुकी के कहय लागल पटोर !
भांटहुं भ गेलाह भाष्यकार !
पुरस्कारे भ गेल साहित्य सँ भरिगर !
आ, किएक नहिं ?
मधुवाता ऋतायते , मधुक्षरन्ति सिन्धवः  ...............
( मादक मधुर बसात सिहकैये , सर- सरिता - समुद्र में मधुए बहैये !)
....अन्हरा के गाई बिअयलै, चालनि ल कय दौगई जो !
                              
                                                                                                                  ०८.९. २००८

Friday, September 3, 2010

दूटा महानगर , दूटा अनुभूति : दिल्ली आ काठमांडू

                                                          काठमांडू

काठमांडूक कारी सड़कपर,
टिनही , डब्बानुमा , तिनपहिया वाहन हंकैत ,
हे! बहिनी ,
तोंही थिकह एहि युगक नायिका !
तोंही थिकह एहि युगक नायिका !
 तोंही थिकह एहि युगक नायिका,
जकर वक्ष केर ऊष्मा करैछ सबतरि सिनेहक सिंचन ,
पयर हंकैत छैक  गाडी ,
आ दुनु हाथ,
अपन बलें,
सतत 
उठओने रहैए ,
घर-परिवारक चार
आ गिरहस्तीक चौखम्बा आधार !
                                                                                                                 काठमांडू
                                                                                                                 १६.५.२००८

दूटा महागर , दूटा अनुभूति : दिल्ली आ काठमांडू

                                                                        दिल्ली

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान आ सफदरजंग अस्पतालक विस्तृत, अड्वाल परिसर,
पुरनका चौराहा कें चीरैत दूर धरि पसरल फ्लाई- ओवर ,
सड़कपर दौगैत  डीटीसीक बस , मर्सिडीस ,बी एम्  डव्लू, होंडा, आ ह्युन्दाई !
आ, चाकर- चौरस सड़कक कातमें फुटपाथ पर बैसलि,
नान्हि टा रीता , गीता , सरिता , सबिता वा आन कोनो अनामा छौड़ी !
संपूर्ण शहर आ दुनिया कें तौलैत !
नान्हि- नान्हि टा तरहत्थी पर चारि टा कैंचा !
खोंछि में एक मुट्ठी मकैक लावा ,
आगू में किताब- कापी - सिलेट -पेंसिल नहिं , मनुक्ख कें जोखैवाला छोट-सन , वेइंग-मशीन !
मुदा किएक नहिं ककरो देखबा में अबैत छै नान्हिटा  फूल,
 आ  कतहु दूर में मखरैत, वा गन्हैत, चकेठ्बा मूल,
जे दूर सँ रखने रहइए सबटा आमद पर दृष्टि ?
किएक , तं, रीता , गीता , सरिता , सबिता वा आन कोनो अनामा छौड़ी छिएक तं ओकरे सृष्टि !
हमहूँ जाइत  छी, प्रतिदिन , ओम्हरे बाटें, झटकारने,
माने,
कदाचित ! पैर नहिं ठेकि जाय ओहि छौडिक तराजुमें !
खसि ने पड़ी धडाम !
मुदा, ऊपर दिस  सतत गतिमान हमरा लोकनि ,
जे प्रतिवर्ष करैत छी संविधान में संशोधन ,
जाहि सँ बनि सकय सुदृढ़ समाजक आधार,
किएक नहिं तकैत छी -
नेना- भुटका, छौड़ी -मौगीक पयर तर सँ सतत ससरैत भूमि,
जे ने ओकरा होमय दैत छै गतिमान ,
आ ने समाज कें द पबैत छै सुदृढ़ आधार ?

Thursday, August 26, 2010

हे, माता-पिता; हे,पितर

माताक स्मृतिक पर्व - मातृनवमी
आई सिन्धु चरणतल,
पितृपक्षक तर्पणक बेर
सियोकक कछेर में ,
छी  पितामहक तिथि दिन नुब्राक उद्गम लग .
यायावरी व्यवसाय आ घुमक्कड़ प्रवृत्ति !
शत्रुदमन सेनाक अनुगमन
आ रोगहरणक   वृत्ति !
हे ,माता , पिता , आ पितर
कतय करू ? अहाँक प्रति जल तर्पण !
कतय, ब्राह्मण भोजन ?
कतय, वर्षी-पार्वण ?
वैश्वीकरण-भूमंडलीकरणक बिहाडि में ,
आब नित्तः मनाओल जाइछ,
फादर'स, मदर'स आ नहि  जानि कोन-कोन दिन !
वृद्धाश्रम आ अनाथाश्रम में -
एकाकी जीवनक अभिशापक बंधन में ओझरायल ,
हताश मानव अस्थिपंजर ले ओहि दिन मात्र -
एक गफ्फी फूलक कोंढ़ी,
एकटा केक, एक डिब्बा  मिठगर बिस्कुट !
मुदा, साल भरिक तिक्त जीवन ,
आ एकाकीपनक खटास , कहाँ मेटा पबैत छैक एहि वार्षिक अर्घ्य सँ-
जे अन्हरिया में औनाइत वर्ष में होइछ ,
सुदुक क्षणिक बिजलोका जकां !
तें , हे माता ,
ने मातृनवमी में ब्राह्मण भोजन ,
 ने पितृपक्ष में तर्पण हे, पिता ,
ने सुखरात्रि में उर्ध्व मुख ऊक हे , पितर !
मुदा ,
क्षण , पल, दिन, राति, प्रति निमेष,
हमर शरीरक प्रत्येक रोम ,शिरा,कोशिकाक स्पंदन , आ आन्दोलन
थिक अहिंक स्मृतिक निरंतर आवृत्ति !

                                                                                            लद्दाख, १८.१०.२००४

Sunday, August 22, 2010

एतनी टा जान आ एतेक ज्ञान *

( ई बाल कथा हमर दौहित्र तन्मय ले छनि. आओर नेना लोकनिकें जं नीक लागनि त हमरा आओर संतोष हयत )
ई कथा डूगीक थिकैक . डूगी एकटा तेजगर आ होशियार कुकुर छल .हमरा लोकनि ओकरा बड़ स्नेह सं पोसने रही.
एकबेर हमरा लोकनिक ओतय बहुत गोटे आयल रहथि. कनेक ठंढाक समय रहै.केओ एकगोटे हमरा लोकनिक एकटा ओढ़ना ओढ़ि नेने रहथिन .डूगी के ई नीक नै लगलइ ; कुकुरक नाक आ कान बड़ तेज होइत छै. ओही स ओ अपन बस्तु- जात चीन्है छै. तें , डूगी अपना घरक ओढ़ना दांत सं झीकय लगलई. पहिने त लोक के बुझै में नहिं एलई .मुदा, जखन नानी ओतय एली त  हुनका हंसी लागि गेलनि; ओ गप्प बूझि गेलखिन .
पछाति, जखन सब बुझलकई जे डूगी अप्पन-आन बुझै छै तं सब के मुंह सं एकेबेर बहरेलई , एतनी टा जान आ एतेक ज्ञान.

Sunday, June 13, 2010

आदमकद आईने में मेरी तस्वीर

छोटे से आईने में मेरी तस्वीर,
कितनी सोंधी दिखती थी;
काले घुंघराले बाल,
पतली-सी मूंछें ,
और सांवला-सा चेहरा .
पर सच-
जब तुमने
आज
रखा है मेरे सामने आदम कद आइना ,
तो,
पहली बार हुआ है एहसास-
मैं हूँ कितना ठिगना,
सर है मेरा सपाट !
मैं तो दंभ में था,
झूठा,
मुझे लोग समझते हैं ,
कितना विराट !

ये कच्चे धागे

कौन से हैं ये कच्चे धागे ,
जो ज़ोरता है मुझे तुमसे ?
कौन से हैं ये कच्चे धागे ,
जो खींचता है मुझे तेरी ओर ?
नहीं मालूम मुझे,
पर सच है,
इन धागों में खिचाव है बहुत जोर !

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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