Tuesday, August 27, 2024

Rape and Murder in Kolkata

 

Rape and Murder of a Doctor in Kolkata


Rule-based society takes cognizance of crime as a routine; swift punishment proves deterrent. Crime against women, children, and marginalized deserve not only swift action but also exemplary punishment. These fall in the realm of ideal.

Lethargy of law enforcement agencies is legendry in India. Add to that political interference, and you have lawless state where criminals run amok. Recent rape and murder of a young doctor in Kolkata jolted the medical community and shook the conscience of the Nation. Although the nature of crime left no one in doubt everyone was not on the same page. The Supreme Court of India had to step in suo moto to insure justice.

Medical Professional have to work in a demanding environment. Nature of job, and commitment to duties often force them to neglect their own safety and comfort that, ironically, remain the last thing on the mind of administrators and the governments. Regulatory bodies do not go beyond the documentary compliance as for as the facilities in the hospitals and colleges go. Thus the crimes against medical professionals continue and enforcement agencies are never held accountable in spite of the customary hue and cry in which the political parties take stand based on their own sectarian agenda. The state Governments defend the police and the institutions where crimes occur. This hasn't served the government of the day in the instant case; the government is accountable. To make matters worse the ruling party workers stepped in . They went so as far as vandalizing peaceful demonstrations by doctors. It was shameful to say the least.

We as a society we need to reflect. Crimes against women reflect societal attitude. Rape of a minor in ‘illegal NCC Camp’ in Tamil Nadu, gang-rape of a women by the crews of a State Road Transport Corporation-run bus Dehradun-bound bus, and rape and murder of a minor Dalit girl in a far-off village in Muzaffarpur, Bihar are some examples.

Attitude of the society toward women needs to change. Romanticizing eve-teasing, like in the movies, need to stop. Mothers need to stops provoking their sons to ‘take care’ of sisters who marry outside the cast. Mother-in-laws have to stand by daughter-in-laws when they rightfully question the authority of their husbands. Employers need to stop gender-based profiling of workers, and need to ensure safe working environment for women. Law enforcement agencies have their work cut-out too. They need to enforce law without fear or favour in a time-bound manner whenever laws are violated.       

     

Tuesday, August 20, 2024

डिजिटल संस्करण आ डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्मक सहायतासँ पोथीक पहुँच बढ़ाबी

 

डिजिटल संस्करण आ डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्मक सहायतासँ पोथीक पहुँच बढ़ाबी 

एहि बीच हमर रुचिक अनेक मैथिली पोथी छपल. हम किनबाक नेआरो करैत रही. मुदा, डिजिटल प्लेटफार्म पर पोथीक अनुपलब्धता वा प्लैटफॉर्म पर डिजिटल संस्करणक अभावक कारण ‘दूर रहैत’ पोथी किनि नहि सकलहुँ. अस्तु, एहि संक्षिप्त लेखमे हम मैथिली पोथीक  डिजिटल संस्करणक अभाव एवं  डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म ओकर अभावक विषय पर विचार करय चाहैत छी.

सर्वविदित अछि, इन्टरनेट आविष्कार आ मोबाइल फ़ोन टेक्नोलॉजीक सहायतासँ पढ़ब आ लिखब दुनू सुलभ भेलैए. के नहि जनैछ, विश्वभरिक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय आ अनेक अन्य संस्थाक पुस्तकालयक द्वारि घर बैसल, ओहि सब पाठकक हेतु खूजल छनि, जे इन्टरनेटक प्रयोग करब जनैत छथि. ई वरदान थिक. एहि सब ‘वेब साइट’ पर पोथी, पाण्डुलिपि, इंटरव्यू, फिल्म, सब किछु भेटत. संयोगवश, एहि किछु ‘वेब साइट’ पर मैथिलिओक किछु पोथी उपलब्ध अछि. मुदा, बहुत नहि. श्री गजेन्द्र ठाकुर ‘विदेह ई पाक्षिकक’ पत्रिकाक माध्यमसँ मैथिलीक अनेक पुस्तक आ छात्रोपयोगी सामग्री http://www.videha.co.in/archive.htm पर पाठकक हेतु संकलित कयने छथि. किछु लेखक लोकनि सेहो यदा-कदा https://archive.org/ एवं अन्य साइट पर अपन पोथी देने छथिन. तथापि, हमरा जनैत, संम्पूर्ण मैथिली साहित्यिक सम्पदाकें ध्यानमे रखैत ई पर्याप्त नहि. आ नव पोथी मुफ्त बिलहबाक तं प्रश्ने नहि उठैछ.
तथापि, एक दिस जं मैथिलीमे पोथी नहि बिकयबाक समस्या छैक, तं दोसर दिस पोथी-पत्रिकाक पाठक धरि नहि पहुँचबाक समस्या सेहो छैक.  एहि विषयक चर्चा  हम आइसँ करीब पाँच वर्ष पूर्व पहिने अपन ब्लॉग (‘
बेचबाले पोथीकें किनबा जोग बनाउ, पाठक धरि पहुँचाउ’) (https://kirtinath.blogspot.com/2019/08/blog-post.html) मे कयने रही, जे आइओ प्रासंगिक अछि. कारण, आइओ पुस्तक वितरण आ विपणनमे बहुत परिवर्तन नहि भेलैए. फलतः, ‘पोथी नहि बिकाइए’क चिंता जहिना तहिया रहैक, तहिना आइओ छैक.
एहि अवधिमे नव पीढ़ीक रचनाकारक नीक संख्या सोझाँ आयल छथि. स्थापित रचनाकार तं छथिए. तथापि, ग्रामीण क्षेत्रमे एवं डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म पर सब नव-पुरान पोथी भेटबो नहि करत. भेटबो करत तं पोथीक  इलेक्ट्रॉनिक संस्करण (
kindle edition) भेटत कि नहि, कहब असंभव.
अस्तु, आइ मैथिलीमे जे कोनो पोथी छपैत अछि, सबहक डिजिटल एडिशन बनाबी आ सबहक डिजिटल वर्शन डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म पर पाठकक हेतु किनबा लेल उपलब्ध हो. जाहि सबसँ पाठक कतहु होथि पोथी किनि सकथि. जे ‘हार्ड कॉपी किनय चाहथि, ओ तं किनिए सकैत छथि.

एतय ई कहब अतिशयोक्ति नहि हएत जे, कारण, एखनि पोथीक प्रकाशनमे कंप्यूटरक प्रयोग अनिवार्य अछि, आ पोथीक डिजिटल संस्करणमे ततेक थोड़ श्रम लगैछ जे एकरा ‘दालि-भातक कओर’ बूझि सकैत छी. अस्तु, मुद्रक-प्रकाशकक संग पोथी आ पत्रिकाक प्रकाशनक करारमे पोथी-पत्रिकाक डिजिटल कॉपीक प्रकाशन आ डिजिटल प्लैटफॉर्म पर मार्केटिंगक हेतु लिस्ट करबाक करार सेहो अवश्य सम्मिलित कराबी. एहिसँ पोथी-पत्रिका आ मैथिली साहित्यक पहुँच संपूर्ण विश्व धरि तं पसरिए जायत, हमरालोकनिकें दूर देशमे बैसल मैथिलीक पाठकक सहयोग सेहो अनायास भेटत. मातृभाषा-पिपासु पाठक लोकनिक संतुष्टिक तं गपे नहि हो.      

Wednesday, July 3, 2024

गामक डायरी : गाछ पर आम लुबुधल अछि, मुदा तोड़त के !

 

गाछ पर आम लुबुधकल अछि, मुदा तोड़त के !

बंगलोर रहितो हम गाम अबैत रहैत छी; एही बेर तँ छौ मासमे तीन बेर आबि गेलहुँ. प्रत्येक बेर किछु परिवर्तन देखबामे अबैछ. एहि लेखमे एहि बेरुका अनुभव कहब.

जूनक अंत. एखन आमक मास छैक. आम फड़लो छैक. मुदा, दू गोट बड़का समस्या: बानरक उपद्रव आ गछचढ़ाक अभाव. फल ई जे जँ जकरा आम बेचबा योग्य गाछी-कलम छनि, से जँ गाछ पर लागल आम बेच नहि लेलनि तँ तोड़ि कए घर आनब असंभव. युवक सब गामसँ  बाहर अछि. गाछ पर चढ़त के? व्यापारी अपन आम तोड़िए लैछ. मुदा, अहाँ की करब. बानरक उपद्रव दोसर समस्या थिक, जे सब गाममे नहि छैक, मुदा, जतय छैक ओतय लोक परेशान अछि. बानर चिडैक विपरीत खाइत कम छैक, बर्बाद बेसी करैत छैक.
तथापि, गाममे खयबा योग्य उत्तम आम खूब भेटैत छैक. किन्तु, कार्बाइडक पाउडर दए आम पकेबाक रोग गामहु धरि पसरि गेले, तकर कोन उपाय? देखबामे ललितगर सपेता किनल. मुदा, खयबामे पनिसोह.

गर्मी असाध्य छैक. उमस खूब. बरखाक अभाव.  लगैतए एहि गर्मीमे ओसरा पर काँच अल्हुआ राखि देबैक तँ  अपनहि उसिनल भए जायत ! तैओ हिम्मत कए आइ टहलबा लेल बहरयलहुँए. चारि बजे फरिच्छ भए जाइछ. एखन साढ़े चारि बजैत छैक. तीन-चारि वर्ष पहिने माघ मासक अहल भोरे, सड़क पर टहलनिहार लोकनिक बड़का जुटान देखने रहिऐक. महिला, पुरुष सब. मुदा, एहि दू बेरसँ टहलनिहारक संख्या कम. हमरा जे केओ भेटैत अछि, हम टोकि दैत छियैक. केओ चिन्हियो जाइछ, ककरो परिचयो देबय पड़ैछ. हम टहलानमें बदलैत गामक नाड़ी परीक्षा सेहो करैत छी.

करीब बीस मिनट टहलैत, हम पड़ोसी गाम पोखरिभिंडा धरि चल आयल छी. सूर्योदयक समय बीति चुकल छैक. क्षितिज धरि दृष्टिक कोनो अवरोध नहि. मुदा, अलासयल सूर्य एखनो मेघक पातर आवरणक पाछाँ पड़ल छथि. नीके. सोझाँ अओताह, तँ ओहने प्रचण्ड. तें, नुकायले रहथु, यावत् धरि हम गाम पर पहुँचि ने जाइ.

एही बीच हम एक ग्रामीणकें बाटक कातसँ एकटा भाँटि/ भटवासक गाछ उखाड़ैत देखैत छियनि, दतमनि लेल.

                                                लक्ष्मीजी दतमनि लेल भाँटिक गाछ उखाड़ने 

दतमनि लेल कोन गाछ वा गाछक ठारिक उपयोग करी, ताहि लेल गाम घरक कहबी हमरा मन पड़ैछ:                  

                                                उत्तम चिरचिरी मध्यम भाँटि

                                                किछु-किछु साहड़ आओर सब झाँटि

 [ दतमनि ले प्रयुक्त भैषज्य : चिरचिरी: Achyranthes aspera भाँटि: Cleodendron infortunatum साहड़ Ficus virens]

चिरचिरी  आ भाँटि तँ सड़कक कातमे सबठाम भेटत. मुदा, गाम घरमे आब साहड़ अभावृत्तिए भेटय. हम ग्रामीण, लक्ष्मीजी,क हाथक भाँटिक गाछक फोटो लैत छी. बाटक कातमे भांग, अरिकोंछ, नेबोक गाछ, झिंगुनीक लत्ती, दनूफ़क फूल देखबामे अबैछ. हम सब किछुक फोटो घिचैत छी. आब शहरी लोकनिकें ई सब देखबाक संयोग कतय भेटतनि. दनूफक फूलक चर्चा तमिल महाकाव्य शिलापत्तिकारम् मे सेहो अभरल छल. उत्तरापथक अभियानमे विजयी भए  चेर सम्राट् सेंगुट्टवन जखन अपन राजधानी आपस होइत छथि तँ हुनक गलामे दनूफ़क फूलक माला छनि, तकर वर्णन छैक. ओना विष्णुक पूजामे मिथिलामे दनूफ़क फूल विशिष्ट मानल जाइछ.

                                                दनूफ़क फूल (Leucas aspera)

किछु आगू एलहुँ तँ सड़कक पूब युवक पीपरक गाछ भेटलाह. भेटैत तँ छथि ई बहुत दिनसँ. मुदा, एहि बेर हिनक स्वरूप दोसर रंग देखल; केओ गौआँ हिनक डांडमे गुलाबी रंगक कपड़ा लपेटि देलकनि. केओ थोड़ेक लाल-पियर ताग. जड़िक चारू कात सीमेंटसँ इंटा जोड़ि चबूतराक आकार सेहो देखलिऐक. माने, देखिते-देखित ई युवक अस्वत्थ वृक्षसँ  देवता बनि गेलाह. गीतामे भगवान कृष्ण तँ अपन पर्याय बनाइए देने छथिन (अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां,श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १०/२६).   आब ई कोनो पुजगिरीक गुजर-बसर केर सहारा सेहो बन लाहे. वृक्षसँ हालहिमे देव बनल एहि गौआँ अस्वत्थकें बधाई देलियनि, हुनक फोटो झिकल. आगू बढ़लहुँ तँ टेलीफ़ोनक तार पर बैसलि दू गोट कोइली भेटलीह. अंग्रेजीमे कहैत छैक: two for joy! तें हुनको फोटो झिकल. किछु आओर बटोही. केओ पैदल, केओ साईकिल पर, आ बेसी मोटर साईकिल पर. एक गोटे माथ परहक बोझा नीचा राखि ओहि पर बैसल रहथि. हमरा भेल. रोगी ने होथि. ओ हमरा आश्वस्त केलनि. भोरुका बसातमे टहलान देनिहार तँ सहजहि. एक दढ़ियल मौलवी साहेब पूब मुँहे योगक व्यायाम करैत रहथि.

दू गामक बीचक बाधसँ होइत जाइत ई सड़क गौआँ लोकनिक टहलबाक सुपरिचित आ प्रिय बाट थिक. खूब साफ़, चिक्कन आ नयनाभिराम.

आगू अयला पर धनखेतीमे एसगर बैसल कडांकुल (Greater Adjutant ) देखलिऐक.

                                                     कडांकुल (Greater Adjutant)

कनिए दूर पर ओकर जोड़ा रहैक. हम फोटो झिकल. पछाति कडांकुलकें भेलैक, मनुख थिक, कोन ठेकान जाने ने लए लिअय: चिडै-चुनमुनीक बीच हमरा लोकनिक एहने छवि भए गेले, उचिते. नहि जानि सुखायल धानक खेतमे एहि कडांकुलकें कोन भोजन भेटितैक. ई खाइत तं ओएह सब किछु अछि जे गिद्ध खाइछ. कतहु आन ठामसँ भोजन कएने हएत आ एतय भोरुका प्रकाशमे किछु आराम करैत हो, से संभव. मुदा, दुनू फोटो झिकओलक आ दुनू उड़ि गेल. हमरा सबहक बाल्यकालमे प्रतिवर्ष चौर आ नासीमे किछु दिन लेल कडांकुल आबि कए बैसिते छल. मुदा, आब एकर संख्या बहुत कम भेलैए.

विकिपीडिया कहैत अछिपहिने कडांकुल (Greater Adjutant ) पक्षीक पैघ समुदाय एशियामे रहैत छल. एकर मिलिटरी सैनिक जकाँ तनिकए, सोझे टांग उठा-उठा चलबाक कारण एकर नाम Adjutant stork राखल गेल छलैक.१९म शताब्दीमे कलकत्तामे एकर संख्या ततेक रहैक जे एक समयमे ई कलकत्ता शहरक निशानी छल आ कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशनकेर चिह्नमे एकर चित्र रहैक. मुदा, वर्ष २००८ मे  एहि प्रजातिक कुल संख्या हज़ारक करीब गनल गेल छल. कारणों छैक: एकर प्रजननक तिनिए टा स्थान- भागलपुर, असम आ कम्बोडिया- बचल छैक. भोजनक अभाव आ पर्यावरणक परिवर्तन आने पक्षी-जकाँ कडांकुलकें सेहो प्रभावित केलक अछि.

            चलैत-चलैत हम ग्राम देवता लक्ष्मीनारायणक मन्दिर लग पहुँचैत छी. मन्दिर दिस जाइत कच्चा बाटक बामा कात कनैल इत्यादि फूल गाछ आ दाहिना कात विशाल पीपरक गाछ, जकर छायामे हमरा लोकनिक बालवर्गक क्लास लगैत छल.

फूलक एक गाछसँ एकटा कन्या नान्हि-नान्हि उज्जर फूल तोड़ैत छथि. एक वृद्ध कनैलक गाछसँ फूल तोड़ि फुलडाली मे रखने जाइत छथि. हम नाम पुछैत छियनि तँ उलटे ओएह पूछि बैसैत छथि . ‘मोहनजी यौ ? हम कहैत छियनि, ‘बाबाजी ?’ माने हमरालोकनि एक दोसराक बाल सखा थिकहुँ से दुनू गोटेकें बुझबामे आबि गेल. हमरा भेल, एहि फूल तोड़निहारि कन्या आ वृद्ध-सन लगैत, लगभग हमरे वयसक बाबाजी, पीपरक गाछक अतिरिक्त आओर अनेक परिचित वृक्ष एतय अछि जे हमरा चिन्हैत अछि. मने, ओ सब कहि रहल अछि, हम तँ अहाँकें तहिएसँ चिन्हैत छी जहिया अहाँ सात-आठ वर्षक रही. हम सहमति व्यक्त करैत छी, तँ हमर आँखि नोराए लगैए. हम बिनु बिलमने लक्ष्मीनारायण मन्दिरक चबूतरा लग पहुँचि जूता खोलि, मन्दिरक बरामदा पर चढ़ैत छी. लक्ष्मीनारायणकें प्रणाम करैत छी, आ ओतय जे पाँच-सात गोटे तुलसीकृत रामायणक एक पदक सस्वर पाठ कए रहल छथि, हुनका लोकनिक संग, लक्ष्मीनारायण गर्भगृहक बाहर लक्ष्मीनारायणक सोझाँ ठाढ़ भए जाइत छी. कनिए कालमे ओतय ठाढ़ पुजगिरी हमरा ओतयसँ घुसकि जयबाक इशारा करैत छथि. कोनो भीड़ नहि. तथापि, हुनक सुझाव पर हम कनेक कात भए गेलहुँ. मुदा, ओ संतुष्ट नहि भेलाह. हमरा पुनः इशारा कयलनि. लगैत अछि, आइ काल्हि लक्ष्मीनारायणक सोझाँ पूब दिशामे ठाढ़ हएब वर्जित छैक. यद्यपि, संभव जे जहियासँ लक्ष्मीनारायण हमरा लोकनिक परिवारक सदस्य छथि, तहिया एहि पुजगिरीक पिताओक जन्म सेहो नहि भेल होइनि.

                                        अवामक विष्णुभुवन परिसर जतय हम घूरि-घूरि अबैत छी 

हमरा तमिल संत माता अव्वईक कथन मन पड़ैछ. किंवदंति छैक, एक दिन अव्वई कोनो मन्दिरमे पयर पसारने बैसल रहथि. केओ भक्त आबि हुनका कहलनि,’ अहाँकें लाज नहि होइछ, जे भगवान दिस टांग पसारने बैसल छी!’
अव्वई जनिक कविता तमिल साहित्यक मणि थिक, कहलखिन: ‘सरकार, कने हमरा बुझा दियअ, भगवान कोम्हर नहि छथिन, हम ओम्हरे पयर कए लेब !’
प्रायः, लक्ष्मीनारायणक सोझाँ ठाढ़ हेबासँ हमरा मना करबाक पुजगिरीक उद्देश्य सेहो एहिना किछु रहल हेतनि. मुदा, हम बिना कोनो तर्क-वितर्क केने, मूर्तिकें प्रणाम कयल आ बाट धेलहुँ.

बाटक कातमे आमक गाछ सब आमसँ लदल. ओतय बाटक कातहिमे एक गोटे कुर्सी पर बैसल रहथि. लगमे एकटा कुर्सी आओर राखल. हम बाटक पूब दिसक गाछ दिस लक्ष्य कए पुछलियनि,’ ई आम किनकर थिकनि ?’

                                                     आम अवाम गामक परिचय थिक 
‘मोदाइ मालिकक’
‘आ ई ?’ हम बाटक पछबारि कात, ओहि व्यक्ति लगक नव गछुली, जे आमक झाबा सबसँ लुधकल रहैक लक्ष्य करैत पुछलियनि.
‘नै मालिक. हम तँ किछु नहि छी. बुझू हम तँ सुगरक गूह थिकहुँ.’
ग्रामीणक एहन उक्ति पर हमर मोन विरक्त भए गेल. हम कहलिअनि,’एना जुनि कहिऔक’.
‘ ठीके कहल-ए.’
हम हुनका लग राखल कुर्सी पर बैसि गेलहुँ. कनेक काल परिचय पात भेल. नाम जाति दूर रहओ. हम पुछलियनि. ‘घर कोन ठाम अछि?’
ओ आंगुरसँ कनिएक दूर पर निर्माणाधीन पक्का मकान दिस संकेत केलनि.
हम कहलिअनि,’ अपन घर अछि. गुजर अपने करैत छी. तखन एना किएक कहैत छियैक ?’
जवाबमे ओ अनेक गप कहलनि. जाहिमे ग्रामीण जीवनमे होइत अनेक परिवर्तन जेना, ध्वस्त होइत पुरान, ऊँच घर-परिवारक धन संपत्तिक ह्रास आ ओही संपत्तिक बलें  नव स्वामी सबहक उदय, सरकारी सुविधाक सत्य आ माता-पिताक प्रति, शहर दिस जीविका लेल जाइत अनेक युवक लोकनिक उदासीनताक अनेक झलक भेटल.
आब भोरक करीब साढ़े पाँच बजैत छैक. हमरा गामक नाड़ीक स्पन्दनक अनुमान भए रहल अछि. अस्तु, अपना टोल दिस विदा भेलहुँ. आश्चर्य जे एतेक भोरे टहलान लेल बहरयहुँ, मुदा, शीबू भाई कतहु नहि भेटलाह. हुनकर घर बाटक कातहि छनि. ओतय पहुँचि जिज्ञासा कयल तँ सब किछु स्पष्ट भए गेल: ओ दरभंगामे एक प्राइवेट अस्पतालमे भर्ती छथि. पेटक ऑपरेशन भेल छनि. ठीक छथि. हम आश्वस्त भए गाम पर घुरैत छी, आ गरम ग्रीन-टी क एक कप लए बरामदा पर बैसि जाइत छी.                         

Tuesday, April 9, 2024

किरणजी आइ जँ रहितथि

किरण-स्मृति पर विशेष 


आइ जँ रहितथि किरणजी,
तँ पड़बे करितनि डांग
आ फुटितनि अबस्से कपार।
आइ जँ रहितथि यात्री,
तँ बजबे करितथि,
अनटोटल बोल,
आ दरबारी
तथा राजाकेँ लगितनि अनसोहांत,
आ फेर जैतथि ओ जेल।
मुदा, बाबा, आ किरणजी
नीके भेल चलि जाइत गेलहुँ
अहाँलोकनि,
आ छोड़बो ने कयल केओ शिष्य।
कारण, आइ जँ रहितहुँ
तँ अहाँलोकनिकें
पार नहि लगैत
सिखब नव ककहरा
ने छोड़ितियैक उचित कहब ,
आ बाजब अनटोटल बोल,
तखन रखिते के रोच?
तेँ, भोगितहुँ अवस्से नव व्यवहार
:
देखिते छिऐक रङताल
!
अथच,
आ अहुँलोकनिक,
नित्तह फुटबे करैत कपार।
किरणजी आ बाबा,
नीके भेल चलि जाइत गेलहुँ
अहाँलोकनि
आ छोड़बो ने कयल केओ शिष्य 

Saturday, April 6, 2024

न कोई है पराया, न कोई अंजान

 

न कोई है पराया, न कोई अंजान

सूरज, चाँद और तारे

पड़ोसी हैं हमारे

एक उर्जा का श्रोत

दूसरा शीतलता का पर्याय,

सुन्दरता का प्रतीक।

नजदीकी से कदाचित्

होता है अपमान भी,

दूरी से दुराव,

पर,

दूरी से रहता

आकर्षण,

छूने की ललक,

देखने की आकांक्षा-

बदलते रूप की,

प्रकृति और मिजाज की।

आज जब

आदमी हो रहा है

अपनों से दूर,

सुदूर के पड़ोसी

से मिलता है

उसे शुकून।

कभी वह चाँद

को निहारता है,

कभी लेता है

सूरज की खबर,

कभी करता है

तारों से गुफ्तगू,

जब अपने

चुराते हैं नजर।

फूल भी, पत्ती भी,

पेड़ भी, पानी भी,

मिट्टी भी,

हवा से भी

होती हैं बातें,

इसलिए, जाते-आते

होती है सबसे दुआ सलाम,

न कोई है पराया,

न कोई अंजान।

Sunday, February 11, 2024

Lepakshi (లే పక్షి)’ village and the Jatayu Sculpture In Andhra Pradesh

 

 The village-sign ‘Lepakshi’ attracted my attention on way to Puttaparthi in Andhra Pradesh. We visited the village on our way back. The village boasts of Jatayu sculpture atop a hillock as you approach the village. In spite of this very unusual piece of art people usually head straight past this to the temple complex without paying much attention to the bird. We too did the same.

Jatayu sculpture atop the hillock

The Virabhadra temple in ‘Lepakshi’, erected during the 16th century by the Nayaka brothers, the governors under the Vijaynagar Empire, has Virabhadra- the rudra (fierce form Shiva) as its presiding deity; it also houses images of Durga, Parvati, and Ganesh. But the hanging pillar in temple ante-chamber is the main tourist attraction. The base of this hanging pillar rises about an inch above the ground in a way that a sheet of paper can be pushed underneath with ease. This gravity-defying pillar is hugely popular. 

Entrance to Virabhadra temple, Lepakshi

The temple showcases other numerous sculptures- of   Brahma, Vishnu, Shiva, Parvati, as also the musicians- in stone relief on its pillars. But the beautiful colorful murals on the ceiling depicting stories from Ramayana, Mahabharata, and Sanskrit classics like Kiritarjuniya of Kalidasa takes the cake for their exquisite beauty. Alas! the painting are fading due to ageing and exposure to the elements. A huge granite Shivalingam protected by the many-hooded serpent in the temple complex straight in the line of the sight of Jatayu sculpture is another attraction of this temple complex.

Shivalingam protected by many-hooded serpent

Being not on popular tourist map this temple complex isn’t usually crowded; we were done with it in less than an hour. But it was only when we proceeded homeward to Bangalore, we realized having missed another famous attraction here- the huge Nandi bull, possibly the largest in size in the South.  

Later, the quaint name- Lepakshi- got me thinking. It took me a little while to search. The very helpful Internet proved a boon again with a few searches here and there.

The word ‘Lepakshi’ is associated with a lore from Ramayana age, which tells about Jatayu who fought Ravana, the demon king as he flew to Lanka with Sita. The ageing vulture- Jatayu- lost one of his wings in the process and fell to the ground. Later, when Rama miraculously appeared on the scene, he pepped up the ageing bird-warrior with a call, ‘le, pakshi (లే పక్షి)’- get up, bird!’ And the village since then is known as Lepakshi. The name finds immediate connection with the land and the people for the Rama’s words sounds accurate in Telugu language!

  

Wednesday, December 20, 2023

मैथिली पत्र-पत्रिकाकें गाम-गाम धरि लए जाएब आवश्यक अछि

 

मैथिली पत्र-पत्रिकाकें गाम-गाम धरि लए जाएब आवश्यक अछि

मैथिलमे मैथिली प्रेमक अभाव नहि। मुदा, जीवनक यथार्थक कारण लोक मैथिलीके आत्मसात नहि कए पबैत अछि। से जँ नहि रहितैक तँ ओ लोकनि जे मैथिलीसँ अपन जीविका चलबैत छथि, अपन नेनाकेँ मैथिली किएक नहि पढ़बितथिन, मैथिली पर प्रहार भेने विरोध किएक नहि प्रकट करितथि। दोसर दिस, जँ संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षामे मैथिलीक माध्यमसँ सफलताक संभावना बेसी नहि होइतैक तँ इतिहास, राजनीति शास्त्रक छात्र  विज्ञानक छात्र संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षामे वैकल्पिक विषयक रूपमे मैथिली किएक चुनितथि ?

तथापि ई तँ देखिते छियैक जे मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक गहाकि (ग्राहक) नहि। किछु मैथिली प्रेमी जीतोड़ परिश्रमसँ मैथिली दैनिक छपैत छथि। मुदा, पढ़निहार नहि भेटैत छनि। एकर कारण पर मंथन होइते रहैत अछि। मुदा, एहि लेखमे ओकर निवारणक चर्चा करय चाहैत छी। यद्यपि, एहि विषय पर हम पहिनहुँ लिखने छी

एहिमे कोनो संदेह नहि जे भाषाक रूपमे मैथिली अपन प्रासंगिकताक अवसर पहिल बेर तखनहि चूकि गेल जखन राज दरभंगा अपन राज-काजमे हिन्दी भाषाके चुनलक। दोसर बेर, मगही आ भोजपुरीक संग  मैथिली अपन प्रासंगिकता स्थापित करबामे तहिए चूकि गेल जहिया बिहार एवं ओड़िसा राज्यक विघटनक बाद ओड़िसाक स्थापना तँ भाषाक आधार पर भेलैक किन्तु, बिहारक स्थापनाक संग संपूर्ण बिहारक भाषा हिन्दी भए गेल। पछाति भोट-बैंकक लोभें मैथिलीभाषी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रक कांग्रेस सरकार उर्दूकें बिहारक दोसर भाषा कए देलक। ई सब पुरान बात दोहराएब भेल. तें एहि इतिहासकें समाधानसँ कोनो मतलब नहि।

हाल-सालमे जतेक बेर मातृभाषाक माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षाक निर्णय भेल सरकार कान-बात नहि देलकैक। किन्तु, किएक ? उत्तर सोझ छैक। हमरा लोकनि पहिने बिहारी, हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण, राजपुर, भूमिहार, कायस्थ, दलित, पिछड़ा, इत्यादि-इत्यादि छी। मैथिल-जकाँ हमरालोकनिक परिचय सबसँ पाछू अबैछ वा नहिओ अबैछ। मैथिली भाषी छी से तँ आओर सुदूर भेल। कारण, बहुत दिन धरि मैथिल शब्द मिथिला रहनिहार प्रत्येक नागरिकक पर्याय नहि छल। एखनो जखन आब ई परिभाषा सर्वमान्य होबय लागल अछि तैओ मैथिली पढ़बाक-लिखबाक लाभ सबकें एक रूपें उपलब्ध नहि छैक । एहि विषयकें आओर खोंइचा छोड़यबाक काज नहि, तथापि इहो मैथिल समाजक अनेक वर्गमे अशंतोषक कारण नहि थिक, से मानब सत्यसँ आँखि चोराएब होएत। अस्तु, आब केवल मैथिली पाठकक विषय पर आबी।

मिथिलांचलमे एखनो मैथिली प्राथमिक शिक्षाक माध्यम नहि थिक। तें, मैथिली लेखक छोड़ि मैथिली पढ़बामे दक्ष लोकक संख्या कतेक अछि तक्र अनुमान करब कठिन। मुदा, जँ मैथिली प्राथमिक शिक्षाक माध्यम भइओ जायत तँ ओकर गति देखबाक हेतु दक्षिण भारतक दिस देखने सत्य सोझाँ आबि जायत। दक्षिणहुमे हाई स्कूल धरि स्थानीय भाषा पढ़ब अनिवार्य छैक. किन्तु,ओतहु स्थानीय भाषामे ओएह छात्र पढ़ैत छथि जनिक अभिभावककें अपन सन्तानकें अंग्रेजी माध्यमक प्राइवेट स्कूलमे पढ़ेबाक उपाय नहि छनि। बिहारहुमे परिस्थिति एहिसँ भिन्न नहि। तें, जँ मिथिलांचल क्षेत्रमे मैथिलीक माध्यमसँ पढ़ाई आरंभ भइओ गेल तँ कतेक छात्र हिन्दी छोड़ि, मैथिलीक माध्यमसँ पढ़बाक विकल्प चुनताह, से कहब कठिन। उपरसँ आब मैथिली अंगिका, बज्जिका, सूरजपुरिया, पुबरिया आ पचपनियांमे विभक्त भए रहल अछि। एहि मुहिमकें सरकारी प्रोत्साहन भेटैत छैक. तें एहि प्रयासकें राजनैतिक समर्थन भेटब कठिन नहि। मुदा, एखन मैथिलीक माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षाक विषयकें एतहि छोड़ि दी। आ पुनः मैथिली दैनिकक हेतु पढ़निहार कोना जुटाबी ताहि विषय पर घूरि आबी। आ ओहि विषयकें पुनः एहि स्थापनाक संग आरंभ करी जे ‘मैथिली अनपढ़ मैथिली भाषीक बलें जीवित अछि’।

जँ अपने क्षण भरि ले हमर उपरोक्त परिकल्पनाकें मानि ली तँ समाचारपत्रक पाठक बढ़यबाक हेतु निम्नलिखित प्रयास काज करय पड़त:

१.     किछु दिन पाठककें समाचारपत्रक मुद्रित प्रति मुफ्त उपलब्ध होइक। ई अनेक कारणसँ असंभव छैक। कारण, एकर ले अर्थ के जुटाओत? गाम-घरमे पुस्तकालय-वाचनालय तँ छैक नहि जे पहिने जकाँ लोक ओतय पढ़त। हमरो लोकनि आब समाचारपत्र मोबाइल आ टेबलेटहि पर पढ़ैत छी। अस्तु, ई-समाचारपत्र आ मोबाइल एडिशन अधिकसँ अधिक पाठक धरि पहुँचय।

२.      मिथिलांचलक विद्यालय सबमे समाचारपत्रक प्रिंट एडिशन मुफ्त पहुँचैक। आ स्कूलक प्रातःकालीन असेंबली मे मैथिलीमे ५ मिनटकेर समाचार वाचनक अनुमति भेटैक। एहि हेतु प्रायः सरकारी सहमति चाहिऐक। कालक्रमे मोर्निंग-असेंबलीमे उकृष्ट प्रदर्शनक हेतु चुनल छात्र सबकें वर्षमे एकबेर सांकेतिक पारितोषिक भेटैक।

३.      की मैथिल एहि हेतु एक मत हेताह जे, जे व्यवसायी/ प्रकाशक मिथिलांचलमे हिन्दी-अंग्रेजी समाचारपत्र बेचैत छथि तनिका समाचारपत्रक मैथिली संस्करण छापब अनिवार्य हेतनि। की एहन आन्दोलन संभव अछि. मैथिली पत्रिकाकें जं सरकारी आ गैरसरकारी विज्ञापन भेतैक तं ई असंभव नहि. पाठक बढ़तैक तं विज्ञापनो बढ़तैक.

४.     विगत शताब्दीक मैथिली आंदोलनी लोकनि बिना साधन, यातायात छिन्न-भिन्न रहितो कोना मिथिला भरिमे विद्यापति पर्वक प्रचार केलनि, से ककरोसँ छिपल नहि। आइ लगभग मिथिलांचलक प्रत्येक गाओं सड़कसँ जुड़ल अछि। की ई संभव नहि जे युवक लेखक-कवि  आ आंदोलनी लोकनि  स्थानीय उत्साही ग्रामीण युवकलोकनिक सङोर करथि, गाम-गाम जाथि ओतय आ पाठककें अपन साहित्य सुनबथिन। हमरालोकनि धियापुताकें मैथिलीक कथा-कविता पढ़बाक हेतु उत्साहित करिऐक। जे साहित्य धियापुताकें रुचतैक ओ कालक्रमे ताकि कए पढ़ब आरंभ करत। प्रायः एहि प्रकारक अभियान अगिला पीढ़ीमे मैथिलीकें जीवित रखबाक हेतु बिआ बाग करब-जकाँ होएत।एहि अभियानकें जँ वयस्क शिक्षाक अभियान संग जोड़ल जाए तँ सद्यः साक्षर भेल पाठक मैथिलीक स्थायी पाठक प्रमाणित हेताह। ई अभियान गाम अतिरिक्त महानगर धरि जाए, से आवश्यक. जुनि बिसरी, ओ अनपढ़ जे मैथिली छोड़ि आन कोनो भाषा नहि बजैत छथि, मैथिली हुनके बलें  मैथिली जड़ि धेने अछि।


       

 

 

           

   

 

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

हिन्दुस्तान का दिल देखो