Sunday, August 29, 2021

किरण जीक सान्निध्य में किछु देखल, किछु सुनल

 

किरणजीक मृत्युक 32 वर्षसँ बेसी भए गेलनि. हुनकर समकालीन, आ हुनकर सहकर्मीक अतिरिक्त मैथिलीक प्रचार-प्रसारक आन्दोलन मे फाँड़ बान्हि हुनक संग चलनिहार म सं आब प्रायः किछुए बंचल होथि. हमरा लोकनिक पीढ़ीक किछु गोटे अवश्य किरणजीक मैथिली अभियानक प्यादा वा foot-soldier रहल हेताह. मुदा, हमरा सेहो गौरव प्राप्त नहिं अछि. तथापि, एक अर्थ मे हम किरणजीक समानधर्मा अवश्य छी.मुदा, से पछाति. एखन उद्देश्य अछि, किरणजीक निकट रहि जे किछु देखल, वा हुनका मुंहें जे सुनल, ताहि म सँ किछु किछु प्रेरक आ चमत्कृत करबा योग्य संदर्भक चर्चा.

हम जहिया ककहरा पढ़ब शुरू कयने हएब तहिया किरणजी ‘ किरणजी’ क रूपें प्रसिद्द भए चुकल छलाह. तें, हुनकर छवि कें हमर दिवंगता माता हमरा समक्ष प्रेरणा-पुंज वा आदर्शक रूप प्रतिष्ठापित कयने छलीह. तकर कारणों छलैक. हमर माताक दृष्टि मे किरणजी एहन योद्धा छलाह जे स्थापित मान्यताक छहरदेवाली कें सहजहिं अपन बाटक अवरोध मानबा ले तैयार नहिं होइत छलाह. एहि तथ्यक पक्ष मे अनेक प्रमाण सुनने छलहुँ. पहिल, सुनल जाइछ जे किरणजी अपन पित्तीक भविष्यवाणी रहनि जे ‘ हिनका जं विद्या होइनि तं तरहत्थी मे केश चरितार्थ हएत.’ मुदा, किरणजी अपन परिश्रमक बलें उच्च शिक्षा क कोन श्रेणी धरिक बटिखाराकें भजारलनि से सर्वविदित अछि. एहि संदर्भ में किरणजीक मुँहें सुनल दू टा आओर गप्प मन पड़ैछ. पहिल, किरणजीक शिक्षा-दीक्षाक युगमें अंग्रेजी शिक्षा ने सुलभ रहैक आ ने सर्वग्राह्य. मुदा, ई अपन दू गोट जेठ भाई जकाँ, रजौर (अजुका बांग्लादेश) जा कए राजा टंकनाथ चौधरीक संरक्षण में मैट्रिक पास केने रहथि. ओ कहथिन,  ‘ 16 म वर्ष में ABCD सिखने रही. पहिने, संस्कृत पढ़बाक-घोखबाक हिस्साक छल. रजौर गेला पर अहल भोर उठि जोर-जोरसँ  पाठ घोखए लगैत छलहुँ. राजा टंकनाथ चौधरीक आवास लगहिं में रहनि. मुदा, हमरालोकनिकें कोनो वर्जना नहिं. तथापि, एक दिन राजाक एकटा निकट संबंधी कहलनि, ‘एतेक भोरे, एतेक जोर-जोरसँ पढ़इत छी. राजाकें निन्न में बाधा हेतनि तं विदा कए देताह. बस. हमर जोर-जोरसँ पढ़ब बन्न भए गेल. दिन दुइएक पछाति राजाक नज़रि हमरा पर पड़लनि. पुछलनि, ‘ नत्थू, आइ-काल्हि पढ़इत नहिं छह ? हमरा हुनकर संबंधी जे हिदायत देने  रहथि, से हम राजाकें सुना देलियनि. राजा हँसय लगलाह. कहलनि, ‘ जाह, तों आओर जोर-जोरसँ पाठ पढ़ह.’

दोसर गप्प ओकर बहुत दिनक पछातिक थिक: केओ हितैषी वा मित्र  किरणजी कें पुछलखिन, ‘ किरणजी, अहाँ कें M.A., Ph D. आदि परीक्षा देबाक कोन प्रयोजन ! अर्थात्, अहाँक योग्यता सर्वविदित अछि. एहि पर किरणजी कहलथिन, ‘से जे बूझैए तकरा ले ने. जे नहिं बूझैए तकरा ले भजारि देलिऐक-ए.’

किरणजीक प्रकृतिसँ योद्धा हेबाक अओरो उदहारण छनि. सुनल अछि जे युवावस्था मे किरणजी कालाजारसँ  बहुत दिन धरि मरणासन्न भए पड़ल रहथि. तथापि, परिवारजन भले हुनक जीवाक आस त्यागि देने होथुन, किरण जी अपन जिजीविषा आ आन्तरिक उर्जाक बलें ओहि युग में मृत्यु पर विजय पओने  छलाह जहिया प्रतिवर्ष मलेरिया, कालाजार आ यक्ष्मासँ अजस्र लोक मरैत छल.

प्रारम्भिक जीवन मे किरण जीक परिवार आर्थिक दृष्टिऍ झमारल छलनि. किन्तु, अपन बाहुबल आ मितव्ययी स्वभावें ई एकटा शिक्षकक वेतन पर अपन आर्थिक परिस्थिति कें सुदृढ़ कयलनि. एहि संदर्भ मे किरणजी निम्नलिखित किछु पाँति जेना हुनक अपने जीवनक कथा कहैछ:

की थिक भाग्य, विधाता के अछि  ?

सबसँ पौरुष हमर प्रबल अछि .

                                    कतेक दिनक बाद, पृष्ठ 2

दाढ़ी मोंछ न पुरुखक लच्छन

ढेपा, चेपा, कांकर, पाथर, कांट-कूस ओ जंगल झाँखुड़

चूरि-चारि ओ थूरि-थारि पथ, पुरुख बनाबय चिक्कन

                                    विजेता विद्यापति, पृष्ठ 37

सर्वविदित अछि, आरम्भ में किरणजी व्यवसायें वैद्य छलाह. मुदा, अपन ज्ञान-प्राण में हमरालोकनि हुनका वैदागरी करैत नहिं देखने रहियनि. संयोगसँ हम जखन दरभंगा मे पढ़इत रही तं हुनकासँ  नित्य भेंट होइते छल. ओहि समय मे बुझबा में आयल जे किरणजीक चिकित्सा शास्त्रक ज्ञान आ अनुभव, दुनू गम्भीर छलनि. परिस्थितिवश चिकित्सा व्यवसाय छूटि गेल रहनि. प्रायः तकर कचोट सेहो रहनि. तें, कदाचित् बनारस हिन्दू विश्वद्यालय आ कलकत्ता विश्वविद्यालयक अपन जीवनक चर्चा सेहो करथिन. ओहि में काशी विश्वविद्यालय में मैथिलीक मान्यताक हेतु कयल हुनक प्रयासक चर्चा सेहो रहैत छल. ई प्रसंग आब सुपरिचित अछि, आ अनेक ठाम विस्तारसँ एकर चर्चा भेल अछि, तें ओकर चर्चा एतय छोड़ि दी.

किरण जी एक दिन हमरा लोकनि कें अपन बैदागरीक जीवनक आरम्भिक कालक एकटा रोचक प्रसंग कहलनि:  ‘बैदागरी पढ़िकए गाम आयल रही. अपने दरबज्जा पर .....( एक गोटे ) भेटलाह. कहलनि, ‘बैदागरी पढ़लहुँ-ए.’ आ से कहैत अपन गट्टा आगू बढ़बैत कहलनि, ‘ कहू तं हमरा कोन रोग अछि.’

हम कहलियनि, ‘ हम पशु चिकित्सा नहिं पढ़ने छी. पुछनिहार अपरतिब भए गेलाह.’

मुदा, एतबा अवश्य जे किरणजी कें चिकित्सा व्यवसायक प्रति लगाव छलनि. 1973 मे जखन दरभंगा मेडिकल कालेज में हमर नाम एम बी बी एस कोर्स में लिखल गेल तं कहने रहथि, ‘ दरभंगा मेडिकल स्कूल में नाम लिखेबाक लेल हमर चुनाव भेल छल. मुदा, पचास रुपैया नहिं छल. तें, नाम लिखबितहुँ से नहिं भए सकल. आइ ( दरभंगा मेडिकल कालेज में ) अहाँक नाम लिखल गेल, तं ओ मनोरथ पूर्ण भए गेल.

मुदा, हमरा हरदमे ई प्रश्न खिहारैत छल जे एहन तीक्ष्ण बुद्धि आ चिकित्सा शास्त्रक एहन विलक्षण ज्ञानक धनी चिकित्सक व्यवसायसँ  विमुख किएक भए गेलाह. एक बेर पुछलियनि: अहाँ चिकित्सा व्यवसाय किएक छोड़ि देलिऐक ? तं ओ कहलनि,’ की करितिऐक. एहि इलाका में तहिया अत्यंन्त गरीबी रहैक. जतय चिकित्सा करय जाइत छलहुँ, औषधिक मूल्य आ वैद्यक फीस देबाक हेतु लोककें रोगी / नेनाक काड़ा-माठा, वा खुट्टा पर बान्हल माले-गाए बेचब वृत्ति होइत छलैक. घर मे औषधि किनबाक मूल्य नहिं, पथ्य ले अन्न नहिं. चिकित्सा की करितिऐक !

फलस्वरूप, किरणजी चिकित्सा व्यवसाय छोड़ि शिक्षक बनि गेलाह. किरण जी शिक्षकक रूप में केहन रहथि, से तं ओएह सब कहताह जे हुनकासँ पढ़ने छथि.  हमरा से सौभाग्य नहिं भेल. किन्तु, हुनक दृष्टि एतेक स्पष्ट रहनि जे  कोनो विषय पर ओ एहन उपलक्षण दितथि जे हुनक उक्ति अएना जकाँ झलकि उठैत. एकर एकटा प्रसंग एतय कहब अप्रासंगिक नहिं हएत.

किरणजी चंद्रधारी मिथिला महाविद्यालयक अपन सेवाक अवधि मे रहमगंज, लहेरियासराय में डेरा रखने रहथि. दरभंगा प्रवासक ओहि अवधि में ओ प्रायः प्रतिदिने सांझ कए  हॉस्पिटल रोड स्थित हमरा सबहक डेरा आबथि. एक दिन हमरा लोकनि हुनकासँ गप्प करैत रही. किछु हंटि के एकटा नेना सेहो ओतहि पढ़इत रहथि. पढ़बासँ नेनाक ध्यान हंटि जाइनि. पढ़बासँ  ध्यान हंटिते, ओही परिवारक एक गोटे बेर बेर कहथिन, ‘अहाँ पढ़ू’, तं किरणजी कहलथिन, ‘ पोथी-किताब घास नहिं थिकैक, जे मालक आगू  फेकि दिऔक आ खा लेतैक. पढ़ाएब आवश्यक छैक.’  किरणजीक  संग बिताओल समयक एकटा आओर प्रेरक प्रसंग मन पड़ैत अछि.

हमरा लोकनिक डेरा परहक साँझुक  एहने एक बैसाड़क पछाति एक दिन किरणजी अपन डेरा ले बिदा भेल रहथि. राति करीब दस बाजि गेल रहैक. मेडिकल कालेजक गेट लग हुनका रिक्शा लेबाक विचार भेलनि. एकटा रिक्शावाला कें पुछलखिन, ‘ रहमगंज चलबह ?

-‘नैं’

हमरा लोकनि कालेजक छात्र रही. कहलिऐक, ‘ किएक नहिं ? आ हमरा लोकनि दू गोटे छरपि कए ओकर रिक्शा पर बैसि गेलहुँ. कहलिऐक- चलह !

किरणजी कहलनि, ‘ छोड़ि दिऔक.’

‘किएक नहिं जेतैक ?’ हमरा लोकनि प्रतिवाद केलियनि, ‘ एकरा सबहक हिस्सके एहने छैक !’

‘नहिं. नहिं जेतैक, तं नहिं जाउक. ओकरो अपन स्वतंत्रताक एतबा अनुभूति तं होबय दिऔक.’ कहैत किरणजी डेरा दिस आगू बढ़ि गेलाह.

आइओ कहैत छी, व्यक्तिगत स्वतंत्रताक प्रति हुनक एहन आदर हमरा लोकनि कें चमत्कृत अवश्य कयलक.

            तहिना छलनि किरण जीक अपन माटि-पानि-देश-भूमि-पर्वत-नदी सबसँ प्रेम जे धर्म-पुण्यक अवधारणासँ दूर आत्मवत्  अनुभूतिसँ अनुप्राणित छलनि. मन पड़ैत अछि, एक बेर हमर माता स्व. बिन्देश्वरी देवी ( स्व. किरणजीक छोटि बहिन) गंगा-स्नान ले सिमरिया घाट विदा भेल छलीह. हमरालोकनि ( किरणजीक धर्मपुर गामक वाससँ किछुए दूर) लोहना रोड स्टेशन पर ट्रेनक प्रतीक्षा मे बैसल रही. किरणजी हमर माताक भेंट करय स्टेशन पर आएल छलाह. गप्प कए वापस गाम पर जेबाकाल ओ हमर माए कें कहलथिन, ‘ अच्छा, गंगा मे हमरो ले एक डूब द’ देब.’

किरणजीक कट्टर नास्तिक रहथि. अस्तु, तहिया हुनक ई गप्प हमरालोकनि कें आश्चर्यनक लागल छल. मुदा, पछाति, किरणजीक मरणोपरांत जखन हुनक काव्य-कृति ‘पराशर’ प्रकाशित भेलनि तं ओहि में पढ़लहुँ:

जय जय धरती मानव जीवन केर आधार

प्राण

जय जय अनिल, सलिल, जय सूर्य-चान

जय आसमान .

जय जय पर्वत राज हिमालय,तोहरे देहक

कण-कण सँ अछि बनल हमर सबहक ई देश .

कोशी, कनकइ, कमला, गंडक, गंगा

द्वारा सनेस जकाँ पठा माटि

एकरा छह पुष्ट करैत

अपन शरीरक घाम सदृश हिमजल सँ

छह पटबैत

पुनि कहिओ-कहिओ तमसैल

जकाँ भूकम्प मचा ध्वंसो छह 

क’ दैत,

तें तीरभुक्ति मिथिलाक थिकह तों

ब्रह्मा-विष्णु-महेश.

                                                        एहि सब पाँति पढ़ि कए हमर भ्रांति दूर भए गेल !

( मैथिली अकादेमी पत्रिका, पटना, अंक 9, 2006 में प्रकाशित लेख केर संपादित, अद्यतन  स्वरुप )

                  

Tuesday, August 10, 2021

गंगा नदी आ अपूर्व चन्द्रोदयक एक सांझ

 

जीवन विस्मयकारी अनुभव सबहक यात्रा थिक

जीवन विस्मयकारी अनुभव सबहक यात्रा थिक. छोट नेनाक विस्मयक विषय आ चेतनक विस्मयक कारण भिन्न होइत छैक. मुदा, विस्मयकारी अनुभवक सिलसिला समाप्त नहिं होइछ. विस्मय बुढ़ारियो में होइछ, मृत्युशय्या पर सेहो होइछ. किन्तु, ओहि दिनुक विस्मयकारी अनुभव प्रकृतिक सुन्दरताक अनुभव थिक. गप्प तं प्रायः 1995- 96 क छियैक. हम बरेली सैनिक चिकित्सालय में पदस्थापित रही. ओहि समयमें मुलायम सिंह यादव रक्षा-मंत्री रहथि. पार्टी कोनो होइनि, राजनेता लोकनि सत्ताक दुधारू गाई कें दुहिते छथि. मुलायम सिंह यादव अपवाद नहिं रहथि. हुनका फ़तेहगढ़, उत्तरप्रदेश में पार्टी कार्यकर्त्ता लोकनिक सार्वजनिक सभाकें संबोधित करबाक रहनि. मुदा, सशस्त्र सेनाक वायुयानक उपयोग ले तं कोनो सरकारी ड्यूटीक बहाना चाहियैक. अस्तु, रक्षा-मंत्रीक सिख लाइट इन्फेंट्री रेजिमेंटल सेंटर आ राजपूत रेजिमेंटल सेंटरक दौराक कार्यक्रम बनल. रक्षा मंत्री फतेहगढ़ जयताह तं ओतुका मिलिटरी प्रतिष्ठान सबकें मंत्री जी कें अपन गतिविधि देखयबाक आदेश भेलैक. मध्यकमानक यु पी एरिया ( आब उत्तर भारत एरिया ) आदेश निर्गत कयलक. हमरा लोकनि बरेली मिलिटरी अस्पतालक दल ल कए फ़तेहगढ़ गेलहुँ. हम पहिनहुँ  फतेहगढ़ गेल रही. मुदा, एहि बेर रक्षामंत्री अबैत रहथि.  

                                                                फ़तेहगढ़ किला 

फ़तेहगढ़, फर्रुखाबाद जिलाक मुख्यालय गंगाक दक्षिणी कछेर पर बसल अछि कैंटोनमेंट थिक, फर्रुखाबाद शहर एतयसँ करीब पांच किलोमीटर दूर अछि. कैन्टोमेंट केर नाम एहि ठामक गढ़ वा किलाक कारण फ़तेहगढ़ थिक. जेना आन सबठाम छैक, एतुको किला सेनाक नियंत्रण में अछि. विकिपीडिया कहैत अछि, 1857 केर सिपाही विद्रोह में विद्रोही लोकनि किलापर कब्ज़ा कए लेने रहथि. एतय लगभग 200 यूरोपियन मारल गेल छलाह. किछु जे  गंगाक बाटें नाओसँ भगबा में सफल भेलाह से बाटे में पुनः पकड़ल गेलाह, आ विद्रोही लोकनिक हाथें हुनकोलोकनि संहार भेल. पछाति, जखन ब्रिटिश सरकार पुनः नियंत्रण स्थापित केलक तखन तं सब किछु फेर ओकरे भए गेलैक. ओना ब्रिटिश सरकारक उपस्थिति विद्रोहसँ पहिनहुँ एतय रहैक. ओहि समय में एतय ब्रिटिश सेनाक गन-कैरेज फैक्ट्री सेहो रहैक, जे सामरिक दृष्टिसँ उपनिवेशवादी सेनाक हेतु महत्वपूर्ण छलैक.                                                                        आब पुनः विषय पर आबी. नागरिक सभाक दिन रक्षामंत्री हेलिकॉप्टरसँ अयलाह. सेनाक प्रदर्शनी टेंट सबमे लागल छलैक. ओ प्रत्येक टेंट में गेलाह. अफसर लोकनिसँ हाथ मिलओलनि. फोटो घिचल गेल.  प्रदर्शनी देखलनि, आ सोझे सार्वजनिक सभामें गेलाह. मुदा, एहि में किछु विस्मयकारी नहिं रहैक. विस्मयकारी अनुभव रातिमें भेल.              रक्षामंत्रीक सम्मान में राजपूत रजिमेंटल सेंटर केर अफसर मेस में रात्रि-भोज भेलैक, जकरा सेनाक भाषामें डिनर-नाईट कहल जाइछ. ई अत्यंत औपचारिक पार्टी थिक जकर वर्दी, ड्रिल, बैंड-बाजा, आ बैसबाक, खयबाक आ उठबाक निर्धारित रीति रिवाज छैक.                                                                                                                  राजपूत रजिमेंट गंगाक कछेर पर बसल छैक. ऑफिसर मेस तं नदीक सबसँ लग छैक. हमरालोकनि गंगाकें हरिद्वार, प्रयाग, बनारस, पटना आ कलकत्ता सब ठाम देखने छी. मुदा, मन नहिं पड़ैत अछि, पहिने कहियो गंगाक कछेर परक चंद्रोदय आ पूर्ण चंद्रमा देखने छी कि नहिं. ओहि राति पूर्णिमाक राति रहैक. अफसर मेस केर गलीचा सन घास पर बार लागल छलैक. रेजिमेंटल मिलिटरी बैंडक सर्वोत्तम कलाकारलोकनि वातावरणकें संगीतमाय केने रहथि. रक्षामंत्रीक सम्मान में जेहन भोजन-साजन उपयुक्त होइतैक से रहैक.                                                                          चन्द्रोदयक पहिने कालिमासँ  गोधूलि आ राति संक्रमण घनीभूत भए आयल रहैक. किछुए काल में पूब क्षितिज पर प्रकाशक आभास एलैक. कनिए कालमें चंद्रमाक आकृति संझुका धूमिल वातावरणक बाटें अवतरित भेल. पछाति, किछुए क्षणमें जे भेल से अपूर्व छल; चंद्रमाक गाढ़ रक्ताभ चक्का, क्षितिज कालिमा पर एकटा नैसर्गिक कला जकां उदित भेल. क्रमशः, जखन  सम्पूर्ण चंद्रमा मेसक परिसरक गाछ सबहक उपर आयल तं दृश्य अभिभूत कए देलक. एहन निर्मल चंद्रमा, एहन मृदु वायु आ एहन व्यवस्था, जे ओहि पार्टी कें भेना पचीस वर्षसँ बेसी भए गेलैक आ हम ओकर अनुभव आइ लिखए बैसल छी. चंद्रमा परसँ नजरि हंटल तं एकाएक भान भेल जे हमर लग जे अफसरलोकनि छलाह ताहि म सँ कर्नल दाश गायब रहथि. मुदा, हुनका दुबारा प्रकट हयबा में देरी नहिं लगलनि. हम चकित रही. पुछ्लियनि: कतय बिला गेल रही आ कोना अवतरित भए गेलहुँ ? ओहि पर जे ओ कहलनि से आओर विस्मयकारी छल. कहलनि : एतेक अनुकूल मौसम. एहन मनोरम वातावरण. एहन इजोत आ गलीचा सन घास. हम तं लॉन केर कोन पर दू चारि बेर ओंघराकय आबि रहल छी ! हम देखलिअनि हुनकर शूट पर एक दू टा सुखायल दूबि तखनो सटल रहनि ! हमरा बुझबा में आबि गेल. सेना में अफसर मेसक इतिहास कहैत अछि, जे बहुत पहिने लेडिज लोकनिक हेतु अफसर मेस परिसर वर्जित रहनि. कोनो औपचारिक अवसर में जं बजाओल जेतीह, तं अओतीह. अन्यथा ‘ हाई स्पिरिट’ में अफसर लोकनि अपना सबहक बीच की कए बैसताह, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः. सत्ते, हमरोलोकनि जखन सेना में कमीशंड भेल रही तं इएह सुनने रही: अफसर मेस अविवाहित अफसर लोकनिक घर थिकनि. माने, ओतय ओ लोकनि ‘प्राकृतिक’ ( वा अप्राकृतिको) अवस्था में विचरण करैत छथि ! मुदा, सेनाक अनुशासन केहनो जीव कें साधि दैछ ! से हमर अपन अनुभव कहैछ.   

            ओहि पार्टी आ परिसर दोसर छवि जे आइओ स्मृति पटल पर खचित अछि, ओ थिक राजपूत रेजिमेंटल सेंटर परिसरमें स्थापित रानी विक्टोरियाक आदमकद ग्रेनाइटक मूर्ति. तहिया, संयोगसँ, भारत में तेना भ’ कए मूर्तिभंजनक  आधुनिक परिपाटी आरम्भ नहिं भेल रहैक. तहिया औरंगजेब खलनायक आ दाराशिकोह भारतप्रेमीक रूप में नामांकित नहिं भेल रहथि. सेनाक परिसरसँ मूर्ति उठायब, मूर्ति-तस्कर सुभाष कपूर ले सेहो सुलभ नहिं रहनि. नहिं जानि, आब विक्टोरियाक ओ मूर्ति ओतय अछि कि नहिं. कारण, आब इतिहासक पुनर्लेखन जारी अछि. हम सोचैत छी, जं भारत अपन इतिहास म सँ सबटा ‘अवांछित’ अंश हंटा देतैक तं भारत आ पकिस्तानक इतिहास में की अन्तर रहतैक; भारत आर्य लोकनिक इतिहासकें अपनाओत. पकिस्तान मुग़लकालीन इतिहासकें अपन पोथीमें स्थान देने छैक ! मुदा, हमर से चिन्ता नहिं. हमर विचार जे जं मौक़ा लागय तं एक बेर जखन आकाश निर्मल होइक, गंगा कछेर पर चन्द्रोदय अवश्य देखू. कारण, सौन्दर्यक अनुभव वस्तु थिक, लिखबाक नहिं. एहि बीच में कतहु पढ़बो केलहुँ  जे भाषा अपनामें अन्तर्हित सत्य कें छोड़ि आन कथुक वर्णन नहिं के सकैछ. आ से सत्य थिक ! जं आँखि मूनि ली, कान बंद कए ली तं शब्द, संगीत, आ कलाक स्वरुप चेतना धरि कोना पहुँचाओत !

हं, समाप्त करबासँ पूर्व एकटा आओर गप्प. हमरा लोकनिक प्रदर्शनी रक्षामंत्रीक गेलाक पछातियो, दोसरो दिन छल. जेना, अनुमान कए सकैत छी, स्थानीय फोटोग्राफर प्रत्येक अफसर आ जवानकें रक्षामंत्रीसँ  हाथ मिलबैत फोटो लेने रहथि. आइओ फोटो बेचए आयल छलाह. मुदा, जखन हमरा लग अयलाह तं हम कहलियन्हि, ‘ हमरा एतेक हिम्मत नहिं जे मुलायम सिंहक संग अपन फोटो घर में राखब ! हमर परिवार आ धीया-पुता हमरा घरसँ  निकालि देताह. तं, सब हंसय लागल. मुदा, पछाति अपना लागल जे हम अनर्गल कहि देलियैक. हमरा लोकनिक व्यवस्था लोकतंत्र थिक. बेचारी चलिए गेलीह. नहिं तं कोन ठेकान अगिला बेर स्व. फूलन देवी रक्षामंत्रीक रूप में अबितथि, हमरा  लोकनि हुनको गार्ड-ऑफ़-ऑनर देबे करितियनि ! ओ समाजवादी पार्टी क एम पी तं रहबे करथि. बेचारोक हत्या भए गेलनि ! नहिं, तं कोन  ठेकान !        

Monday, July 12, 2021

प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थिति

 

6 सितम्बर 2009, रवि दिन. न्यूयॉर्क सिटी, अमेरिका. हमरा लोकनि टाइम्स स्क्वायर लग घूमैत रही. हमरा संग  हमर पत्नी, कन्या, जमाय आ हुनक एकटा गुजराती मित्र परिवारक  रहथि. सड़कक कातक साइड-वाक पर नीक चहल-पहल छलैक. अकस्मात्, हमरा लागल, पाछूसँ  छूबि केओ हमर ध्यान आकृष्ट केलनि-ए. उनटिकय  देखैत छी, तं एकटा मैथिल परिवार : युवक, पत्नी, बरख दसेक एकटा बालक आ एकटा छोटि कन्या. मुसुकाइत कहलनि, ‘अपने सब कें मैथिली बजैत सुनलहु, तें...’ एतेक दूर में अपन भाषा बजैत नागरिकसं भेंट भेने जेहने हर्ष आ कौतूहल ओहि  मैथिल परिवारकें भेल रहनि, तेहने हमरो लोकनिकें भेल छल. हमरा लोकनि ओत्तहि ठाढ़े-ठाढ़ पांच मिनट परिचय-पात कयल आ अपन-अपन बाट धयल. मधुबनी जिलाक निवासी ओ युवक न्यूयॉर्कहिं में काज करैत रहथि.न्यूयॉर्कक टाइम्स स्क्वायरक भीड़में मैथिली सूनि एहि परिवारक  अचानक आकृष्ट हयब एतबा तं अवश्य सिद्ध करैछ, जे विदेशहु में रहला उत्तर, मातृभाषा एकटा चुम्बक प्रमाणित होइछ. 

                                       न्यूयॉर्क मधुबनीक मैथिल परिवारसँ अचानक भेंट, वर्ष 2009  

तथापि, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिकें महत्वकें प्रमाणित करबाले केवल एकटा ई उदाहरण पर्याप्त नहिं. तें, एहि विषयक कनेक विस्तारसं जाँच करी.                                                                                         सत्यतः, प्रवासी जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक जांचले दू प्रकारक मापदंड चाही. एक, प्रवासी मैथिल लोकनिक बीच सर्वेसँ  ई ताकल जाय जे ओ लोकनिक अपन जीवनमें मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थितिक अनुभव करैत छथि; दू, भारतसँ  विदेश जाइत मैथिल अपन देखल अनुभवक आधार पर स्वतंत्र  निष्कर्ष  निकालथि जे ओ लोकनि विदेशमें प्रवासी मैथिल लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक केहन उपस्थिति देखलनि. हमरा अपन निष्कर्ष निकलबाक हेतु एहि दुनू म सं कोनो मापदंडक नहिं अछि. तें, हमरा अपन परिवारजन सहित अनेको प्रवासी लोकनिक संग देशसं बाहर आ भारतक भीतर जे सम्पर्क भेल अछि, ओही सम्पर्कक अनुभवक आधारपर हमर हम अपन विचार एतय रखैत छी.

जं प्रवासी लोकनिकें कनेक काल ले छोडि दी, तं, अपन इलाकाक प्रति लगावक एकटा भिन्न उदाहरण दैत छी. ईसवी सन 2006 में एगारह बजे रातिक करीबक एक ट्रेन में चढ़बाक क्रममें धक्का-धुक्कीक कारण, तीन गोटे नई दिल्ली स्टेशन पर अबैत ट्रेनक सामने रेलक पटरी पर खसिकय मरि गेलाह. हमरा अनुमान अछि,  फगुआ, दसमी, आ छठिक पूर्व दिल्ली-नई दिल्ली स्टेशन पर घरामुंहा बिहारी लोकनिक एहन भीड़  बहुतो गोटे कें देखल हयत. प्रश्न उठैछ, पर्व-त्यौहारक अवसर पर लोक गाम अबैले कोना आफन तोड़ने रहैछ, देशक भीतरक प्रवासी लोकनिकें गाम अपना दिस किएक  एना घीचैत छनि, जखन कि दशहरा–होली-दिवाली-छठि आब दिल्लियोमें मनाओल जाइछ, एहि सब पर्वक छुट्टी दिल्लीओमें  होइत छैक. माने, पर्वक  आलावा सेहो गाम में एहन किछु अदृश्य आकर्षण अवश्य छैक जे लोककें गाम दिस झिकैत छनि : ककरो माता-पिता, ककरो परिवार आ नेना आ ककरो केवल अपन भूमि आ कमला-कोसीक धार, वा गोसाउनि-ब्रह्मबाबा अपना दिस झिकैत छथिन . विदेश बसैत प्रवासी भारतीय लोकनि सेहो अपन भूमिक दिससं एहने घिचावक  अनुभव करैत छथि, से सब कहताह. किन्तु, कतेको बेर समयक अभाव, दूरी, आ व्यय बाधा बनि ठाढ़ भ’ जाइछ.  एतबे नहिं, देश दिस घिचाव आ जुड़ाव केर  आओर अनेको सूत्र छैक, जे कखनो आवश्यकतासं प्रेरित होइछ, आ कखनो महज भावनात्मक तन्तुक जोरसं  सेहो. हम अनेको परिवारसँ परिचित छी जे जीवन समुद्रपार बितौने छथि, किन्तु, सन्तान लोकनिक हेतु जीवन संगीक तलाश मिथिलहि में आबि कय कयने छथि. एकर अपवादो अवश्ये भेटत. किन्तु, ई प्रवासी लोकनिक जीवन में मिथिला आ मैथिलीक उपस्थितिक एकटा विन्दु भेल तं अवश्य.                                                            आब एकटा दोसर गप्प. की प्रवासी लोकनिक अपन जीवनमें मैथिल समाजक अभावक शून्यताक अनुभव करैत छथि ? हमरा जनैत, सब दिन जं नहिओ तं, कहिओ काल अवश्य. प्रवासी लोकनि जतय कतहु छथि अपन  देश आ भूमि पर  छूटल  अपन समाजक अभावक अनुभव अवश्य करैत छथि. तें, जतहु मैथिल लोकनिक पर्याप्त संख्यामें छथि, अपन गाम-घरक मैथिल समाजक कमी कें दूर करैक हेतु, मिथिला-मैथिलीक संस्था बनाकय, एक दोसराक सम्पर्क में रहैत छथि.  आओर नहिं किछु, तं,‘कठौती में गंगा’ तं सब सुननहिं छी. सएह सही.  यूनाइटेड किंगडम (UK) में लन्दनमें मिथिला सोसाइटी यू के नामक एकटा संस्था सक्रिय अछि से तं हमरा बूझल अछि. ई संस्था यूनाइटेड किंगडम (UK) क विभिन्न भागमें काज करैत, आ बसल, मैथिल लोकनिक संस्था थिक. एहि संस्थाक सदस्य लोकनि अपन संस्थाक दिससं समय-समय पर सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करैत छथि, आ अपन पर्व-उत्सव मनबैत छथि. भारत सं अबैत साहित्य आ ललितकलासँ  जुड़ल व्यक्ति सबहक संग सम्मेलन, आ हिनका लोकनिक अभिनन्दनक हेतु सेहो, ई संस्था आयोजन करैत अछि, से सुनल अछि. संस्थाक माध्यमसँ सबहक एक दोसराक सम्पर्क में रहलासं बेर-कुबेर पर एक दोसराक सहायता सेहो होइत छैक. एतय एकटा गप्प बूझब आवश्यक, जे  घर सं जतेक दूर जायब, अपन देश-प्रदेशमें सामान्यतया जे छोट-छोट देवाल देखबामें अबैछ से सब खसय लगैछ. तें, इंग्लैंड-अमेरिका तं छोडू बंगलोर धरिमें मैथिल लोकनि समस्त बिहार-उत्तरप्रदेशक हिंदी-भोजपुरी-मैथिली भाषी लोकनि संग मीलि कय सामूहिक संस्था चलबैत छथि. एहिसँ  समूह सेहो पैघ होइछ आ एके संग अनेक भाषिक समुदायकें अपन समाजक संम्पर्कमें रहबाक बोध सेहो होइत छैक. तें, विदेशमें सेहो संस्था सब राष्ट्रीय स्वरुप ल’ लैछ. तें, विदेशमें  भारतीय नागरिकक वृहत समाजक प्रतिनिधि संस्था सब सेहो लोककें क्षेत्रीय मित्रभाव आ मेलजोलक अवसर आ सुविधा दैत छैक.                                                                                   

आब अमेरिकाक गप्प करी. अमेरिका आकारमें योरपक देश सबसँ बड्ड पैघ. शहर सभक आकार सेहो तहिना. तें, पैघ शहरक गप्प हम नहिं कहि सकब. किन्तु, हमरा अमेरिकाक नार्थ कैरोलिना राज्यक एकटा छोट-सन यूनिवर्सिटी टाउनशिप, चैपल हिलमें, किछु दिन रहबाक अवसर भेल छल. ओहि समयमें चैपल हिलमें किछु मैथिल छात्र आ नोकरिहा लोकनि रहथि. हुनका लोकनिसँ हमरा सम्पर्क भेल छल. ओतय ओ लोकनि एक दोसरासं जुड़ल  अवश्य रहथि. हमरा एक गोटेक ओतय जयबाक अवसरो भेटल. ई दम्पति, दुनू, मैथिल. घरमें जनमौटी नेना रहनि. बच्चाक जन्ममें सहायताक हेतु नेनाक नानी आयल रहथिन तें हुनकोसँ  भेंट भेल. हिनका लोकनिक परिवारमें भाषा मैथिली आ सामान्यतः भोजन-सांजन मैथिल रुचिक.

हालमें, अमेरिकामें रहैत नेपाली मैथिल लोकनिक सांस्कृतिक गतिविधिक एकटा समाचार काठमांडूसं प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक The Rising Nepal क 28 दिसंबर 2019 क अंक में भेटल. समाचारक अनुसार एसोसिएशन ऑफ़ नेपाली तराईअन इन अमेरिका (ANTA ) आ मैथिल्स ऑफ़ नार्थ अमेरिका (MoNA ) क संयुक्त सहयोगसँ अमेरिकाक न्यू जर्सी शहरमें 14 दिसंबर 2019 क विद्यापति समारोह आयोजित भेल छल.एहि समारोह में नेपालसँ आमंत्रित किछु कलाकार आ साहित्यकार सेहो ओतय गेल रहथि. समाचारक अनुसार एहि समारोह में अमेरिकाक विभिन्न भारतीय आ नेपाली समुदायक नेता लोकनि सेहो सम्मिलित भेल रहथि.

                 न्यू जर्सी अमेरिका में विद्यापति पर्व. फोटो: The Rising Nepal, काठमांडू के सौजन्यसँ 

हमर अनुभव कहैछ, मैथिल विदेशमें जतय छथि, अपन पीढ़ी धरि मैथिली बजैत छथि, आ बहुधा अपन रूचि आ सुविधाक अनुसार भोजन-सांजनमें
  मैथिल-जकां खाइत-पिबैत छथि. किन्तु, दोसर पीढ़ी जाइत-जाइत मैथिली भाषा आ व्यवहार विलुप्त भ’ जाइछ. एकर कतेको कारण छैक. पहिल तं सामान्य जीवनमें भाषा आ व्यवहारक अभाव. दोसर, विवाह-दानक हेतु समाजक परिधि जेना-जेना पैघ भ रहल छैक, परिवारसँ मैथिली कतियाअल जा रहल अछि. भारतहु में बसैत मैथिल परिवारहुक स्थिति एहने अछि. तें, जाहि परिवारमें पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी नहिं छथि, ओहि परिवार में नेना-भुटकाकें मैथिली सुनबाक अवसर कदाचिते भेटैत छैक. अस्तु, ओतय मैथिली बिलाय लगैछ. मुदा, जं पति-पत्नी दुनू मैथिली भाषी छथि, तं, बच्चाकें लोक भले मैथिलीमें नहिं टोकौक, बच्चा माय-बापक बीचक गुप्प सुनिओकय किछु मैथिली अवश्य सीखि लैछ, से हम अनुभवसं कहैत छी. किन्तु, जं अहाँ पूछब, प्रवासी लोकनिक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि, तं, हम एतबे कहब, जे भारतहिंमें मिथिलासं दूर बसैत मैथिलक जीवनमें मैथिलीक स्थान केहन छनि ! उत्तर सूनि हताशा हयब सम्भव, किन्तु, ई सत्य थिकैक. प्रवासी लोकनिमें कें जे मैथिलीकें जिया कय रखने छथि, ओ केवल अपन ममत्वसं, आवश्यकतासं नहिं. ततबे नहिं, जहिना भारतमें रहितो बहुतो मैथिल, मैथिली पढ़ब नहिं जनैत छथि, तहिना प्रवासी मैथिल म सं बहुतो मैथिली ने पढ़इत छथि, ने पढ़ि सकैत छथि. किन्तु, समस्या ई छैक जे  प्रवासी मैथिली पढ़हु चाहैत छथि, तं अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म सब पर मैथिलीक पोथीक अभावक कारण मैथिलीक पोथी हुनका सबहक लग पहुंचि नहिं पबैछ. अतः, मैथिलीक प्रति ममत्व रहितो ओ लोकनि मैथिलीसं दूर भ’ जाइत छथि. तें, अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग प्लेटफार्म पर मैथिलीक उपस्थितिक आवश्यक. कारण, हमरा जनैत, विदेशमें मैथिलीक मांग सेहो छैक. तकर एकटा प्रमाण मैथिली भाषाक हमर अपन ब्लॉग ‘ कीर्तिनाथक आत्मालाप’ थिक. पिछला दस वर्षमें पाठक लोकनि हमर एहि ब्लॉगक पेजकें आइ धरि करीब 88834  उलटौलनि-ए, से analytics कहैत अछि . आश्चर्यक गप्प ई, जे एहि म सं अधिकांश पाठक समुद्र पारेक छथि ! माने, समुद्र पारहु सं लोक मैथिली तकैत तं अवश्य छथि !                                           

अंतमें, वर्तमान मिथिलाक समाजक हेतु प्रवासी मैथिल लोकनिक योगदानक गप्प करी. सफल पूत सदायसँ अपन समाजक उत्थानमें योगदान करैत एलैये.  आ तकर आशा उचितो. किन्तु, अपन समाजक उत्थानक हेतु प्रवासी लोकनिक योगदान ले ककरो तं डेग उठबहि पड़तैक. हम पूर्णतः विश्वासक संग ई नहिं कहि सकैत छी, जे प्रवासी मैथिल लोकनि सामूहिक रूपें पैघ स्तरपर मिथिलामें शिक्षा, समाज-सुधार, वा आधारभूत संरचनाक सुधारक कोनो अभियानक सहयोगी छथि वा नहिं. किन्तु, व्यक्तिगत स्तर पर कतेको गोटे मिथिलाक छोट-छोट स्थानीय अभियानमें सहयोग करैत छथि तकर एक-दू टा सूचना हमरा लग अवश्य अछि. हमर अनुमान अछि, विदेश गेल बहुतो सफल मैथिल, गाम-घरक लेल आरम्भ कयल  इमानदार आ सार्थक स्थानीय पहलमें कम वा बेसी सहयोग अवश्य करताह. किन्तु, एहि हेतु पहिल डेग तं केओ उठाबथि. ई डेग वा पहल मिथिलहुसं आरम्भ भ सकैछ. 

( 'तीरभुक्ति' नामक पत्रिका में प्रकाशित )                                   

Thursday, July 8, 2021

मुस्कराहट का अकाल

 

मैंने उनको कभी साथ बैठकर हँसते-मुस्कराते नहीं देखा. देखता भी कैसे ? एक, उन्हें बैठने की फुरसत कहाँ थी ! दूसरी, मुस्कराने की न कोई सूरत थी और न वजह. कमला नदी माता तो थी, पर मनमौज. खेती थी, तो कमर तोड़. साल भर का अनाज खेत में पैदा हो गये तो ठीक. नहीं तो, आधा गाँव रात को भूखा ही सोता था. पर किसी को शिकायत नहीं थी ; सब की हालत एक जैसी जो थी. छप्पर पर फूस हो और बारिस में घर न चूता हो, भर पेट अन्न हो, पर्व-त्यौहार निबट जाए, और सामाजिक दायित्व पूरा होता रहे तो लोग सुखी समझे जाते थे. अगर इतना कुछ हो तो घरों में झगड़ों की वजह ही क्या है ! मगर ऐसा सुख कितनों को मयस्सर था गावों में उन दिनों. पर, परिवारों को टूटना लोगों ने सुना नहीं था, भले पति-पत्नी साथ बैठ कर हँसते-मुस्कराते नहीं हों. शायद ऐसा विकल्प उन दिनों तक उस समाज में लोग-बाग़ सोचते भी नहीं थे.

एक बार की बात है. एक ही  बरसात में कमला की बार-बार की बाढ़ ने लगे हुए धान को बर-बार डुबा-गला दिया था. और खेप की रोपनी का न समय बंचा था, न बीहन. फाकाकसी की नौबत थी. उस साल दूर किसी गाँव के किसी बड़े खेतिहर ने दीनानाथ को धान कटबाने का काम दिया. दीनानाथ ने सोचा कि चलो अगर दस मन भी धान मिल जाए तो साल निकल जाएगा. पर खुराक का धान क्या निकला, एक नयी आफत आ गयी. वहीं दूर के गाँव में  दीनानाथ बहुत जोर बीमार पड़े. आँखें पीली हो गयीं थी. गोरे चमड़े का रंग पीला हो गया था. लोगों ने कहा कमला बीमारी है. पर फ़िक्र की बात नहीं थी. उस गाँव में उस साल बहुतों को कमला रोग हुआ था, पर किसी की मौत हुई ऐसा किसी ने सुना नहीं था . परेशानी थी तो बस एक : दीनानाथ बेहद कमजोर हो गये थे, और उन्हें भूख बिलकुल नहीं लगती थी. उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं. खुद ही सुना था, पुनर्नवा से पीलिया/ कमला ठीक हो जाता है. तो फिर क्या था. तालाब के भीड़ पर पुनर्नवा की क्या कमी थी. उनका टहलू, रामेश्वर, रोज एक मुट्ठी पुनर्नवा नोच कर दीनानाथ के लिए लाता था, सिलबट्टा पर पीसता था और दीनानाथ उसे पानी में घोलकर ‘ जय धन्वन्तरि’ के साथ पी जाते थे. करीब दो महीने बाद जब पीलिया कम हो गया और धान की दौनी पूरी हो गयी तो दीनानाथ गाँव वापस चले. फिर भी, जब दीनानाथ बैलगाड़ी पर धान की बोरियां लेकर घर वापस लौटे तो उनकी हालत पैदल चलने की नहीं थी. बस, ख़ुशी इतनी थी कि जब तक गेंहूं का फसल घर न आये, भुखमरी तो नहीं होगी. लेकिन, घर का मरम्मत, स्कूल का फीस, नमक-तेल-मशाले का खर्च तो चाहिये था.घर के मरम्मत के लिए कमला के किनारे से कास के चंद बोझ मिल गये. बाँस तो अपनी ही  बंसबिट्टी से काट लिया.  संयोग से, पाचू पासवान के पास उनकी एक बछिया पोसिया लगी थी. उसे दोनों मिलकर जटमलपुर के मेले में बेच आए, तो हिस्से में कोई सौ रूपये आने से नकदी की आफियत हुई थी. यह सभी दीनानाथ को याद है. उन्हें यह भी याद है कि एकबार उनके पढ़ने की ऐनक गुम हो गयी. हर जगह ढूंढा. कहीं नहीं मिला. अचानक उनके मन में एक बात आयी. हो न हो, ऐनक कहीं कुंए में तो नहीं गिर गयी. चमड़े की खोल में रखी  ऐनक अक्सर कुर्ते के  ऊपरी जेब में होती थी. क्या पता, कुंए से डोल से पानी खींचते वक्त, खोल सहित चश्मा फिसल कर कुंए में तो नहीं गिर गया ! बस क्या था, दीनानाथ ने चश्मे को ढूंढ निकालने की ठान ली. आस  पास के लड़के-जवान कुंआ के पास हरिदास के आँगन से बाँस की सीढ़ी और रस्सा ले आये. और ऐनक को पानी से निकालने, रस्से और सीढ़ी के सहारे दीनानाथ कुंए में उतर गये. बाद में उनकी ऐनक सन्दूक पर पड़े एक बक्से के पीछे मिली यह और बात थी. पर दीनानाथ किसी पर नाराज नहीं हुए. बच्चों की पिटाई नहीं हुई. ऐनक मिल जो गया. अब दरभंगा जाने का खर्च, परेशानी और जहमत से जो बंच गये थे.

उन बातों को अरसा बीत गया. दीनानाथ आज कल मुंबई में हैं. छोटे बेटे  और बहू के आग्रह पर कुछ दिन के लिए मिज़ाजपुर्शी के लिए मुंबई आए हैं. वैसे तो दीनानाथ की नजर में  इस महानगर में असुविधा ज्यादा और सुविधा कम है, लेकिन उनकी जरूरतें इतनी कम है कि उन्हें असुविधा क्यों कर होने लगी. उनके तरह के गाँव में रहनेवालों के शब्दकोष में असुविधा की जगह नहीं है !  पढ़ने को हिन्दी समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाएं और किताबें मोहल्ले के कोने पर मिल जातीं हैं. पान-सुपाड़ी-तमाखू की कभी आदत डाली नहीं. मिथिलाकें गांवों में उनके जवानी के  ज़माने भांग खूब चलता था. पर दीनानाथ को इस घास ने कभी आकर्षित नहीं किया. कहते थे, इस गाँव में जिनके पास अपने खेत और पेड़ नहीं हैं उन्हें भी खाने के लिए आम-जामुन-अमरुद- गन्ना की कमी नहीं होती. गर्मियों में ताड़कून खाईये, अगहन में सिंघाड़ा खाईए. यहाँ खाने की चीज की कमी है क्या, जो लोग मवेशी के तरह घास खाय, चिमनी के तरह धुआँ छोड़े. और ताड़ी ? ताड़ी तो आदमी को ताड़ पर चढ़ा कर सीधा नीचे गिरा देता है; अपनी और बांकी सबों की नजर में.

लेकिन, मुबई आकर दीनानाथ चकित हैं . अभी तक उन्होंने अपने बेटे  और बहू को साथ हँसते मुस्कराते नहीं  देखा है .  सोचते हैं, वक्त को क्या हो गया है ! लोग बातें करते हैं तो सिर्फ काम की, या दाम की. मुँह खोलते हैं तो बातें निरी बातें होतीं हैं. सुबह बारह बजे होता. तब तक अट्टालिकाओं के बीच सूरज कहीं दीखता नहीं, धूप भले हर जगह हो. ना आफिस जाने की ज़ल्दी ना बच्चे को स्कूल भेजने की तरद्दुद. यहाँ तो बच्चा है ही नहीं. जहां बच्चे हैं , बेचारे बच्चे भी दोस्तों की कमी के कारण बिलबिलाते रहते हैं. पर वह दीगर बात है. दीनानाथ जिस इमारत में हैं, उस पन्द्रह मंजिली ईमारत में दर्ज़नों परिवार और सैकड़ों लोग हैं. लेकिन न कोई किसी का पड़ोसी है, और न अपने घर के बाहर किसी का कोई चाचा-भतीजा, भाई-बहन, और ना कोई दादाजी-दादी. सभी कबूतरखानों में बंद, अपने ही काम में ज़ब्द हैं, अपने तनाव में कैद हैं. ऐसा क्या है इस वक्त में, इस शहर में कि मुस्कराहट नदारद है ! सब केवल भाग रहें हैं, जिंदगी गुज़र रही है, वक्त कट रहा है.

दीनानाथ अपने घर में  देखते हैं, शाम होते ही बेटा-बहू काम में लग जाते हैं. कहतें हैं, उन्हें भारत के दिन-रात से नहीं, अमेरिका के सूर्योदय-सूर्यास्त को देखकर उठना और सोना होता है . दीनानाथ सोचते है, ये बच्चे पैसे भरपूर कमाते हैं. मुंबई में जहां लाखों लोग फुटपाथ पर सोते हैं उनके बेटे-बहू के पास चार कमरे है. कारें हैं. घर में वह सब कुछ है जो दीनानाथ ने कभी सिनेमा में समृद्ध लोगों के घर में देखा था. पर एक ही चीज नहीं है, खुशियाँ. दीनानाथ अचम्भे में हैं ; सारी समृद्धि हैं, पर खुशियाँ नदारद ! मुस्कराहट की कमी दीनानाथ को नहीं खलती हैं, लेकिन, सोचते है, अगर घर में सुख-शान्ति और आराम का माहौल न हो तो लोग आफियत की सांस कहाँ लेंगे ? आदमी थक कर आराम कहाँ करेगा ? प्यार से जो मिजाज़पुर्शी होती है, वह कहाँ से आयेगा ? बच्चे कहाँ पनपेंगे, कहाँ पलेंगें. बच्चों के लिए घर तो ऐसा अभयारण्य है जहाँ चारों और शान्ति होनी चाहिये. और अगर यह सब होगा ही नहीं तो बसेरा और घोंसला किस काम के लिए है ? दीनानाथ की उम्र में आसमान में तूफ़ान के संकेत और परिवार में पनपता तनाव को सूंघने में वक्त नहीं लगता. उन्हें बेटे-बहू से कभी पूछने का मन करता है, बच्चे इस शहर में मुस्कराहट कहाँ बिकता है ? मैं अपने बंचे-खुचे पैसे से थोड़े मुस्कराहट खरीद कर ले आता हूँ. तुम लोग कुछ दिन उसे शरबत में मिला कर पियो, सेहत सुधार जायेगी ! मगर, दीनानाथ गंवई हैं, गंवार नहीं. वृद्ध है, बेवक़ूफ़ नहीं !! बरसों से सुनते आये हैं, सांई-बहू का झगड़ा, पंच बने लबड़ा ! यानी, सांई-बहू के  झगड़ा में जो बीच में  पड़ा वह या तो लबड़ा है, या वह आखिरकार लबड़ा कहलायगा !! इसलिए, चुपचाप अपना समय बिताते हैं. पर अब दीनानाथ को अब समय भारी लगने लगा है.

इसलिए,आखिरकार एक दिन दीनानाथ ने कहा, बेटे मेरा टिकट कटबा दो. बेटा और बहू दोनों उनकी ओर देखने लगे. इससे पहले कि बेटा और बहू पूछें, ‘बाबूजी जी कोई दिक्कत हुई क्या ? ’, दीनानाथ ने उनके सवाल का जवाब खुद ही दे दिया: बेटे मुझे गाँव के चौक के पास के उलुवा पाकड़ पेड़ के नीचे बैठे बहुत दिन हो गये. वहाँ के ठहाके थकन की गांठें खोल देते है, पाचन बढ़ा देती है. मुझे उलुवा पाकड़ की याद आ रही है !

दीनानाथ की बातें सुनकर बहू-बेटे हंसने लगे; याद और पाकड़ के पेड़ की ! बेटा, जयवीर ने कहा, बाबूजी कुछ दिन और रह कर शरीर को आराम दे दीजिये. आप गाँव में बैठने से तो रहे. यहाँ आराम से सेहत सुधर जायगी.

दीनानाथ मुस्कराने लगे. बोले, बेटे इस शहर में सब कुछ है, मुस्कराहटें नहीं हैं. इस शहर में मुस्कराहटों का अकाल है. मुस्कराहटों में अजीब की तासीर होती है, मुझे अपने लोगों के साथ खुलकर हँसे बहुत दिन हो गये. और दीनानाथ अगले हफ्ते ही कर्णपुर लौट आये .              

Wednesday, July 7, 2021

लघु लघु कथा : तितलियाँ

  

मनु के आने से लगा कि एकाएक हमारा घर रौशन हो गया है. जहाँ हमलोग घरके अलग-अलग कोने में बैठ किताबें पढ़ते थे, कहानियाँ लिखते थे, या टीवी देखते थे, वहीं आज हमारा घर एकाएक खुशनुमा बगीचे में तब्दील हो गया था.काल्पनिक ही सही; कहीं नायब फूल खिल रहे थे, कहीं चिड़ियाँ चहक रही थीं, तो कहीं हरी घास पर बच्चे लोट रहे थे. और तितलियाँ ? तितलियाँ तो बेशुमार थीं: काले, पीले, बैगनी, मटमैले, नारंगी . लग रहा था पूरे बैठकखाने में हवा में चारों तरफ तितलियाँ हीं तितलियाँ तैर रहीं थीं. इर्द गिर्द बैठ लोग अपने काम में मसरूफ थे, और मैं मनु को देख रहा था.  मैंने कहा, ‘मुझे भी एक तितली चाहिये !’ और मनु दौड़ता हुआ मेरे पास आया और एक छोटा सा तितली मेरे नाक पर चिपका कर जाने लगा तो मैंने उसके गाल चूम लिए. पर सूरज की रोशनी को मुट्ठी में पकड़ना आसन है क्या ! मनु पल झपकते मेरी पकड़ से बाहर निकल कर बैठकखाने के दूसरे कोने की ओर भाग गया. वहाँ उसके पास तरह-तरह के खिलौने थे , जिसमे उसकी जान बसती थी: खिलौने बच्चों के लिए, खिलौने नहीं सचमुच के सजीव प्राणी होते हैं, जिन्हें भूख लगती है, प्यास लगती है, जो रूठते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, सोते हैं,  और प्यार भी करते हैं.

मैंने कहा, मनु मुझे और तितलियाँ चाहिए ! मनु ने मुझे देखा, मुस्कराया, और एक साथ कई तितलियाँ मेरी कुर्सी के हत्थे, उसके पैर, और उसके बगल में चिपका गया. मैंने कहा, ‘ वाह ! तुम कितने प्यारे हो. और ये तितलियाँ कितनी अच्छी हैं.’ उस दिन को गुजरे अरसा हो गया. मैं भी तितलियाँ भूल गया था, मनु के जाने के बाद से तितलियाँ मेरे घर का रास्ता जो भूल गयीं थीं !

आज अचानक तितलियाँ फिर मेरी चेतना में वापस आ गयी हैं. दीवाली में फर्नीचर की रंगाई-पुताई हो रही है. और कुर्सियों पर चिपके प्लास्टिक के  तितिलीयों को दिखाकर पेन्टर  ने पूछा, ‘ कुर्सी में रंग लगाने के पहले इन स्टिकर को हंटाना पड़ेगा.’

- कौन सा स्टिकर ? मैंने पूछा.

-प्लास्टिक की तितलियाँ.

मैंने कहा हरगिज नहीं ! यही तितलियाँ तो रोज मेरे बैठकखाने में रंग बिखेरतीं हैं, इन्ही तितलियों से तो गाहे-बगाहे मेरे जेहन में रौनक आती है  ! तितलियाँ जहां हैं, वहीं रहेंगी !! और अगले साल मनु जब वापस आएगा तो उसको, मुझे इन तितलियों की हिसाब जो देनी है . मैं तो रोज ये तितलियाँ उसे विडियो-काल पर दिखाता जो  हूँ !

Saturday, June 12, 2021

गुलाब पलास भए गेल, मुदा, एखनो बिकाइए

 

रूप यौवन संपन्ना विशालकुलसंभवा

विद्याहीनां न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः

किशुंक वा पलासक फूलक चर्चा  सब ठाम   गुणविहीन सौन्दर्यक प्रतीकक रूप में होइत आयल अछि. संस्कृत साहित्य हो वा आन केओ होथि, ई उपमा जहिना छल, तहिना अछि. किशुंक तहियो उपहासक लक्ष्य छल आ आइओ अछि. तहिना, गुलाब सुगंधिसँ पूर्ण रूप-गुण प्रतीक पहिनो छल, एखनो अछि. फलतः, मांग आ आपूर्तिक नियम केर पालन करैत गुलाबक एक-एक टा कली बाज़ार में पांचसँ पचास टाका में बिकाइत अछि. मुदा, कोनो मित्रकें जन्मदिन पर उपहार में देबा ले वा अपन प्रेमिका/ संगिनी कें वैलेंटाइन डे, जन्मदिन, वा कोनो आन अवसर पर उपहारक रूप में देबा ले हाल-साल में गुलाबक फूल किनलहुँ–ए? हम किनलहुँ–ए. जंगली गुलाबक विपरीत बाज़ारमें उपलब्ध गुलाब में आब कोनो सुगंधि नहिं. मुदा, हमरा अहाँकें से बुझबा में आयल ? आ जं से बुझबा में अयबो कयल, तं, की अहाँ गंधहीन गुलाब किनब छोड़ि देल. नहिं. किन्तु, किएक ? एतय हम एहि विन्दु पर विचार करैत छी.

आब एतय एहि विषयकें कनेक फड़िछाबी. तें, एहि विषय पर विचारक हेतु हमरा लोकनि ई सोची जे लोक गुलाब किएक तोड़इत अछि, किएक किनैत अछि. जं विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसँ  देखी तं गुलाब आ पलास केर गुण धर्म में कोनो समानता नहिं. गुलाब गुणक खान थिक, तं पलास गुणविहीन सौन्दर्यक उदाहरण. गुलाबक उपयोग गुलाब-जल, इत्र, गुलकंद आ अनेक प्रकारक भोजन आ पेय बनयबा में होइछ. दक्षिण भारतमें  पलासक फूल कतहु-कतहु शिवकें पूजामें चढ़इत छनि. कतहु अग्निहोत्र में पलासक काठक  प्रयोग होइछ. किन्तु, गुलाबसँ हमरा लोकनिक परिचय  केवल सुगंधिसँ अछि. जखन सुगंधिए नहिं तं गुलाब की. किन्तु, एखन जे गुलाब ‘उत्तम’ गुलाबक नामसँ बाज़ार में बिकाइछ लोक ओहि में खरीददार सुगंधिक मांग किएक नहिं करैछ ? अथवा जं गुलाब गंधहीन होइछ तं लोक किनैत किएक अछि ? की गंधहीन गुलाबक प्रति शिकाइतक अभाव लोकक बदलैत सौन्दर्यबोधक प्रतीक थिक ? वा, की बाज़ार ग्राहककें केओ, किछुओ, कोनो दाम पर बेचि सकैत अछि ? प्रायः उत्तर अछि,  हं. एकर उदाहरण एखन समाजक आनो क्षेत्रमें अबैत रहल अछि.

राजनीति वा समाज-सेवाक क्षेत्रमें पहिने गुणवान लोक अबैत छलाह. तखन किछु त्यागी आ किछु अपराधी लोकनि अयलाह. आब राजनीति में अपराधी आ भ्रष्ट लोकक बाहुल्य अछि. किन्तु, प्रत्येक पांच वर्ष पर ओएह लोकनि चुनावी मैदान में उतरैत छथि, जितैत छथि, आ हमरा लोकनि पर राज करैत छथि. हमरा लोकनि प्रसन्न छी. बाज़ार जे उपलब्ध करबैत अछि धड़ल्ले बिका रहल अछि.

शिक्षाक क्षेत्र सेहो एहि प्रकारक उदाहरणसँ भरल पड़ल अछि. पछिला शताब्दीक छठम दशकमें शिक्षाक जे अवनति आरम्भ भेल तकर असली असरि आब देखबामें आबि रहल अछि. पढ़ल लिखल लोककें  जीविकाक पात्रता नहिं छनि. डाक्टर-इंजिनियर लोकनि में दक्षताक अभाव प्रत्यक्ष अछि. किन्तु, गंधहीन गुलाब-जकाँ सब बिका रहल अछि.

तें हम सोचैत छी, कि गंधहीन गुलाबक बिकायब हमरालोकनिक उदासीनताक कारण थिक ? कि बाज़ारबाद हमरालोकनिक उपर तेहन सवारी कसने अछि जे प्रतियोगिता क अछैतो हमरा लोकनिकें अक्क-बक्क नहिं सुझैत अछि आ हमरा लोकनिक आगू जे किछु राखल जाइछ हमरा लोकनि किनि लैत छी. उदारीकरण आ भूमण्डलीकरणसँ  तं ई अपेक्षा नहिं छल !          

 

Tuesday, June 8, 2021

कोरोना की दूसरी लहर : कुछ विचारणीय विन्दु

 

2020 में COVID 19 की लहर खतम हो जाने के बाद,  सितम्बर से दिसंबर 2020 तक करीब तीन महीने लोगों ने चैन की सांस लेनी शुरू की थी. लोग-बाग़ बाज़ार जाने लगे थे. होटलों में बैठ कर खाने की इजाज़त शुरू हो गयी थी. दिन-प्रतिदिन अस्पताल में संक्रमण का डर तो था, लेकिन, लोग थोड़ा लापरवाह होने लगे थे. जनवरी से मार्च 21 के बीच तो अस्पताल में फ्लू क्लिनिक और COVID वार्ड बंद हो गया था. सचमुच, स्वास्थ्यकर्मी भी थक चुके थे. फलतः, साल भर के सख्ती के बाद  थोड़ी ढील से हमें आफ़ियत महशूस होनी लगी थी. लेकिन, मार्च 21 के अंत तक एकाएक सूरत बदलने लगी. अप्रैल की एक तारीख से महाराष्ट्र से कर्नाटक में दाखिल होने के लिए कोरोना मुक्त होने का प्रमाण-पत्र माँगा जाने लगा. ऐसी ही परिस्थिति  में 31 मार्च को हम पांडिचेरी से बंगलोर आए.

नया शहर, नई कोलोनी. हम अपरिचित थे. दो चार परिचित आगे आये, खैरमकदम भी किया. पर नए लोगों से दोस्ती करना तो दूर, पुराने परिचित को पहचानना मुश्किल था. सभी के चेहरे पर मास्क. बीस साल के परिचित युवक अब सिनियर सिटिज़न हो चुके थे. बहुतो कें सर पर घने बाल की जगह चमकदार चमड़ी या सन-से सफ़ेद बाल ले चुके थे; मैं भी तो बदल गया हूँ. 2 गज की दूरी के कारण किसी के नजदीक फटक नहीं सकते, यह भी नहीं पूछ सकते कि आप वो तो नहीं. एक दिन मैं ने हिम्मत की. एक फौजी-से लगते सरदार जी को अभिवादन करते उनकी और मुड़े तो महानुभाव और दो मीटर पीछे हंट गये.हम तो पहले ही दो मीटर पर थे, अब तो चिल्ला कर बात करने के आलावा और कोई चारा न था. खैर, परिचय की औपचारिकता पूरी की. पता चला कि सज्जन मेरे पुराने परिचित नहीं थे . इस वाकये के बाद मैंने फिर कभी किसी के नज़दीक फटकने की कोशिश न की. करता भी कैसे. यहाँ के एक सज्जन ने यहाँ के बासिंदों की whatsapp जमात पर अपनी खासी नाराजगी जाहिर की थी. महोदय की शिकायत थी कि टहलते वक्त लोग-बाग़ उनके सामने आ जाते हैं. यह अनुचित था. श्रीमान् सेवानिवृत्त फौज़ी अफ़सर है. इसलिये उन्होंने धमकी दी थी कि सड़क पर चलते अब  वह अपने हैट के आगे छौ फीट का लम्बा डंडा लगबा लेंगे जिससे लोग उनके सामने न आ सकें. मुझे नहीं  मालूम नहीं, उन्होंने किस प्रकार के हैट का अविष्कार किया है ! लेकिन, यह सब, आगे जो होता गया उसके सामने, केवल मसखरी-जैसी थी.

लगा, एकाएक शहर की हवा भोपाल-जैसी हो गयी है.  भला बच्चे कहाँ समझे ऐसी बात. हर दिन छौ से सात साल की  तीन-चार लडकियाँ और एक-दो लड़के गार्ड की मनाही की परवाह किये बिना हमारे सामने के मण्डप पर रोज आ जाते थे. लेकिन, आखिरकार उन्हें भी गार्ड ने खदेड़ डाला. बच्चों के जान पर आफत जो थी ! फिर कोलोनी एकाएक सूनसान हो चला. लोगों ने सुबह शाम की सैर बंद कर  दी. साफ़-सफाई कर्मचारी भी आधे हो गये. इलाका कन्टेनमेंट जोन में तब्दील हो गया. साग-सब्जी के दूकान के पास बंदिशे शुरू हो गयी. राज्य और शहर से आती खबर तो दिल दहला देने वाली थी. एक दिन में पैतालीस-पचास हज़ार नए रोगी. दिन भर में 500 से 700 मौतें. नए-नए श्मशान भूमि के बन जाने के बाद भी अपने परिजन के दाह-संस्कार के लिए  हमारे एक मित्र को प्रतीक्षामें सुबह से रात को दस बज गये. तब कभी जाकर नम्बर आया. समाचार पत्र और टीवी में श्मशान भूमि में एक साथ खुले तंदूर-जैसे एक साथ पचासों चिताएं अगर दहला देनेवाली थीं, तो बाद में जो खबर आयी उससे विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है. दैनिक ‘हिन्दू’ समाचार पत्र में एक साथ साढ़े आठ सौ अस्थिकलश की तस्वीर छपी थी. इन कलशों को जिस सम्मान के साथ पंक्तिबद्ध और मालाओं के साथ रखा गया था जीवन काल में शायद उन नागरिकों को ऐसा आदर-सम्मान नसीब नहीं हुआ होगा.  समाचार था, कि मृतकों के परिवारजन अस्थि-संचय के लिए नहीं आए. सरकार ने  अस्थियों का सामूहिक विसर्जन किया. सचमें, लोग आते भी कैसे ! शहर में लॉक-डाउन. गाड़ियाँ चलतीं नहीं. चिताएं लगातार जलती थीं. जलती चिता से अस्थि कौन चुने. और चुने भी तो तब जब चिताएं बुझे. यहाँ तो इस विश्वव्यापी  विपत्ति में चिताएं अहोरोत्र जल रहीं थी. किसी माँ  को केवल बेटे-बेटियों और पति ने कंधा दिया, तो कहीं किसी को कंधा देनेवाला अपना मिला ही नहीं. परिवार उजड़ गये, बच्चे अनाथ हो गये. अगर शुमार मौतों के मृतक के मृत्यु प्रमाण-पत्र में कारण के तौर पर कोरोना का संकेत हुआ, तो सरकार की अनुग्र राशि मिलने की संभावना जीवित है. अन्यथा, वो भी नहीं. हजारों लावारिश  लाशें गंगा माँ की गोद में इस राज्य से उस राज्य में बह गयीं. न मरनेवालों में उनकी शुमार हुयीं ,न उनके परिजनों को अनुग्रह राशि मिलेगी. जो हजारों लाश गंगा के किनारे रेत में दफन किये गये, लोगों ने उनकी कफन तक को नहीं छोड़ा. इस पर जो भी बंचा था, और जिस किसी ने भी जुवान खोली, सरकार ने उसे भी उसकी जर-जमीन कुर्क करने की धमकी दे डाली. संवेदनहीनता का ऐसा मिशाल इतिहास में शायद ही मिले. मगर, कहते हैं

                        इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां

-       स्व. दुष्यंत कुमार

इतना ही नहीं, इस महामारी के वक्त लोगों की मानसिकता और व्यवहार में भी आमूल परिवर्तन आ गया है ; यहाँ मैं चिन्ता और अवसाद जैसे मनोरोग की बात नहीं कर रहा. बहरहाल, सावधानी और भय जैसे कुछ परिवर्तन को तो समझा जा सकता है, किन्तु, लोगों का लोगों से भय समझ के बाहर हैं. लोग-बाग पड़ोसी को फोन करने से कतराते हैं, एक दूसरे का हाल-चल पूछना तो दूर. पता नहीं कौन किस सहायता की मांग कर दे. वैसे इस लॉक-डाउन में कौन किस की, क्या सहायता कर सकता है. पर मैं देखता हूँ, कोलोनी के भीतर सब्जी की दूकान के आसपास बातचीत तो दूर, लोग एक दूसरे को अभिवादन भी नहीं करते ! आखिर, क्या पता, लोग डरते हों, कहीं हमारी श्वास ही दूषित न हो जाय, और बात करने से ही कोरोना का संक्रमण हो जाये !!

रोगी के परिजनों द्वारा चिकित्साकर्मियों पर आक्रमण इस राष्ट्रीय विपदा का दूसरा काला चेहरा है. यह बीमारी नयी नहीं है. लेकिन, समाज को सोचना होगा, इसका निराकरण क्या है. स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा का भार सरकार पर तो है ही, पर समाज में एक दूसरे की सुरक्षा, नागरिकों का एक दूसरे के प्रति सद्भाव पर टिका है. 

दूसरी ओर, प्रति दिन टीकाकरण की नई-नई सूचना आ रही है. किन्तु, टीकाकृत नागरिकों की संख्या भारत की कुल संख्या का छोटा हिस्सा है. राष्ट्रीय पोलियो अभियान में सरकार का नारा था, ‘एक भी बच्चा छूटने न पाए’. रेल स्टेशन, बस स्टैंड, एअरपोर्ट पर बच्चों को पोलियो की बूँदें पिलाकर हमने पोलियो को हराया था. हम कोरोना जैसे जानलेवा रोग के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते थे ! इस प्रश्न का जवाब हमें ढूढ़ना पड़ेगा. सभी के लिए टीका खरीदने का केन्द्र सरकार का निर्णय स्वागत-योग्य है. किन्तु, सरकारें महामारी अधिनियम या राष्ट्रद्रोह अधिनियम जैसे कानून नागरिकों के प्रश्न पूछने के अधिकार नहीं छीन सकते ! किन्तु, अभी हमारी प्राथमिकता जान बंचाने की है ! और वह भी एक ही बीमारी से नहीं . अब एक और दूसरी महामारी- मुकोरमायकोसिस (mucormycosis)- से भी जान बंचाना है.

मेरा मानना है कि, अन्य कारणों के अलावा कोर्टिकोस्टेरॉयड (Corticosteroid) के अंधाधुंध प्रयोग से मुकोरमायकोसिस का  रोग एकाएक फैला है . विकसित देशों में चिकित्सा पद्धति के विपरीत, भारत में हम लोग  रोगों के नियमबद्ध चिकित्सा प्रक्रिया के आदी नहीं हैं. हर चिकित्सक रोगों की चिकित्सा अपने तरीके और ‘अनुभव’ के अनुसार करते हैं. कोरोना के बारे में चिकित्सा समुदाय का अनुभव तो अवश्य सीमित है.  फलतः, दुष्परिणाम समय-समय पर सामने आता है. अगर यह भी माना जाय कि मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) त्रुटिपूर्ण चिकित्सा के कारण नहीं हुआ है, तब भी मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) के रोगियों के चिकित्सा रिकॉर्ड के निष्पक्ष जांच से इस रोग की एकाएक वृद्धि के कारणों का पता लगाया जा सकता है. संभव है, शीघ्र ही वैज्ञानिक भारत में मुकोरमायकोसिस (mucormycosis) की संख्या में अचानक वृद्धि के कारण की जड़ तक पहुंचें. यह आवश्यक है.

   

 

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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