Friday, October 27, 2023

आदर्श वा नीक चिकित्सक ककरा कही

 

आदर्श  वा नीक चिकित्सक ककरा कही

रोग सबसँ बड़का दुःख थिक. आरोग्य सबसँ बड़का सुख.1 किन्तु, रोग ततबे स्वाभाविक थिक जतेक जीवन. बहुतो रोग स्वयं दूर भए जाइछ. बहुतो रोग चिकित्साक पर्यन्तहु शरीरकें घर बना लैछ. किन्तु, रोगक उचित चिकित्सा कोना हो ताहि पर चरक संहिताक उक्ति ततेक सटीक छैक जे तिरुवल्लुवर धरि ओकरा यथावत् दोहरा देलनि:

रोगी वैद्य सेवक उपचार

चारि खाम्ह पर रोग-विचार

कुरल, 950

उपरोक्त स्पष्ट उक्तिक टीका अनावश्यक थिक. किन्तु, एहि चारू स्तंभमे सबसँ प्रधान भिषक् अर्थात् वैद्य थिकाह, से चरक संहिता स्पष्ट कहैछ. तेँ चिकित्सक ‘नीक’ होथि तकर अपेक्षा सबकें होइछ. चरक संहितामे वैद्यकेर गुण तं निर्दिष्ट छैके 2, ओहिमे तं एतेक धरि कहल गेल छैक जे ‘ मूढ़ वैद्य चिकित्सा करथि ताहिसँ नीक जे आत्महत्या कए ली. कारण, आन्हर जेना हाथसँ टोईया-टापर कए भयभीत भए चलैछ, जेना वायुक वेगसँ दहाइत नाओ कतहुसँ कतहु चल जाइछ, तहिना मूढ़ वैद्य चिकित्सा-कर्ममे प्रवृत्त होइत छथि.3

अस्तु, आदर्श चिकित्सकक ककरा कही एतय एही विन्दु पर विचार करैत छी. मुदा, एहि विन्दु पर विचार करबासँ पूर्व देखिऐक जे चिकित्सकसँ रोगीकें की अपेक्षा होइछ. ताहिसँ उत्तर स्वयं स्पष्ट भए जायत.  

मृदुभाषी, प्रसन्नचित्त, आ रोगीक गप्प सुननिहार ओ चिकित्सक जे मनोनुकूल चिकित्सा करथि- जे रोगीकें भावय, से वैद फरमाबय- तेहन चिकित्सक सब तकैछ. तथापि, शास्त्र-सम्मत चिकित्सासँ जे चिकित्सक शीघ्र आरोग्य सुनिश्चित करथि, से आदर्श चिकित्सक थिकाह. एहिमे  दू मत नहि हेबाक चाही. अस्तु, एही सब विन्दु पर कनेक विस्तारसँ चर्चा हो.

रोगीसँ संवाद आ समुचित व्यवहार

पीड़ाग्रस्त रोगी आर्त होइछ. रोग आ रोगीक प्रकृति रोगीक मानसिक परिस्थितिकें कमोबेश प्रभावित करिते छैक. से बिसरबाक नहि थिक. तथापि, एखन धरि भारतमे मेडिकल ग्रेजुएटक एम.बी.बी.एस.क पाठ्यक्रममे रोगीक मनोविज्ञान, रोगीसँ संवाद आ व्यवहारक विधिक  समावेश नहि छैक. पढ़ाई आ प्रशिक्षणक अवधिमे अनौपचारिक रूपें रोगीक संग समुचित व्यवहारकें बेर-बेर रेखांकित अवश्य कयल जाइछ. अस्तु, चिकित्सकसँ सहृदयता आ नम्रताक अपेक्षा अवश्य कयल जाइछ. एहि सबकें देखैत, जं रोगी चिकित्सकक व्यवहारसँ  संतुष्ट भए आपस भेलाह, तं चिकित्सक ‘रोगीक संग व्यवहार’क दृष्टिसँ सफल भेलाह’; सफलताक श्रेणी उतंम, मध्यम वा साधारण भए सकैछ. चिकित्सकक व्यवहारसँ अप्रसन्न रोगी चिकित्सककें व्यवहारक दृष्टिसँ असफल घोषित केलनि. रोगी आ चिकित्सकक बीच समुचित व्यवहारक रीतिक इएह निकती/ तराजू थिक.

रोगीक असंतोषक कारण

रोग-समन आ रोग-निवारणमे असफलता तथा समुचित व्यवहारक अभाव चिकित्सकसँ रोगीक असंतोषक दू प्रमुख कारण थिक. किन्तु, सफल चिकित्सा आ नीक व्यवहारक अतिरिक्त रोगीक असंतोषक आओरो अनेक कारण होइछ. एहिमे ‘डाक्टर गप्प नहि सुनैत छथिन’, ‘बड्ड जाँच करबैत छथिन’, ‘ बहुत दवाई लिखैत छथिन’ आम शिकाइत थिक. यद्यपि, ‘डाक्टर  दवाईए नहि लिखैत छथिन’ तेहनो शिकाइत कखनो काल सुनबामे अबैछ. मुदा, ‘बिगड़ैत छथिन’ ई शिकाइतक अति थिक. एहन व्यवहार अवांछनीय थिक.

चिकित्साक प्रत्येक विकल्पक विषयमे सूचनाक अभाव रोगीक हेतु चिकित्साक सुलभ आ सस्त विकल्प चुनबामे बड़का बाधा थिक. ई चिकित्सकक कर्तव्य आ रोगीक अधिकार थिकनि जे रोगक प्रकृति, जाँच-पड़ताल, आ चिकित्साक प्रत्येक विकल्प रोगीकें बुझाओल जाय, जाहिसँ रोगी आ परिचारक रोगीक हितमे सुलभ आ कारगर चिकित्साक विकल्प चुनि सकथि. अजुका चिकित्सा प्रणालीक ई कमजोरी थिक जे बहुधा रोगीकें सम्पूर्ण सूचना नहि भेटैत छैक, वा आधा-छिधा सूचना भेटैत छैक. एकरा पाठक लोकनि, उचिते, 'अन्हरजाली' कहैत छथि. जुनि बिसरि जे चिकित्सा व्यवस्था उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 क अधीन अछि.4 फलतः, अधिनियम अंतर्गत उपभोक्ता संरक्षणक कानूनक अनुपालन नीक चिकित्सक आ उत्तम स्वास्थ्य संस्थाक कर्त्तव्य थिक; नियमक उल्लंघन दण्डनीय थिक.     

आब उपरोक्त प्रत्येक विन्दु पर विस्तारसँ  विचार करी.

‘डाक्टर गप्प नहि सुनैत छथिन’

रोग निदानक लेल रोगक इतिहास, आ चिकित्साक  इतिहास बूझब आवश्यक होइछ. तें, चिकित्सा विज्ञानक पढ़ाईक पहिल चरणमे शरीर-संरचना (Anatomy), शरीर-क्रिया (Physiology) आ जीव-रसायन (Biochemistry)क आधारभूत शिक्षाक पछाति, दोसर चरणमे, रोगक चिकित्साक इतिहासक संकलन (history-taking) आ शरीर-परीक्षाक कला (Art of Physical Examination) पढ़ाओल जाइछ. यद्यपि, अनुभवी चिकित्सककें, आम बीमारीक रोगीकें देखि, रोगीक स्वरुप आ शरीर पर रोगक प्रभावक कारण, रोगक निदान (diagnosis) करब कठिन नहि, तथापि चिकित्साक सलाह देबासँ पूर्व रोगक इतिहास पुछब आ शरीर परीक्षाक प्रक्रिया अनिवार्य थिक. किन्तु, से जं नहि भेल, तं रोगीकें हताशा होइत छैक, उचितो छैक. गप्प सुनबाक सीमा एतबे धरि सीमित नहि छैक. जेना ऊपर कहल गेले, रोग, जांच एवं चिकित्साक प्रत्येक बिंदुकें बूझक रोगीक अधिकार थिकैक. रोगीकें सब बातकें बूझि अपन हितमे निर्णय करबाक स्वतंत्रता छैक. हुनका ई अवसर भेटब अनिवार्य थिक.

उपरोक्त रोगक इतिहास आ शरीर परीक्षाक अतिरिक्त, आवश्यक भेने, लेबोरेटरी जाँच-पड़ताल आ स्कैनिंग-इमेजिंग (scan and imaging) सामान्य थिक. ओना विगत किछु वर्षमे चिकित्साक पारंपरिक रीतिमे अनेक परिवर्तन भेलैए. मेडिकल निदान संबंधी उपकरण (Medical diagnostic equipment) आ  जाँच-पड़ताल विज्ञानक अभूतपूर्व विकास बहुत सीमा धरि रोगक इतिहासक अनुसन्धान आ शरीर-परीक्षाकें गौण केने जा रहल अछि. एतेक धरि जे आब  कतेक चिकित्सकक सलाह-कक्ष (consultation room) मे रोगीक जाँच करबाक-बिछाओन ( examination couch) सेहो नहि भेटत. अल्ट्रासाउंड आ ह्रदयक इकोग्राफी (ultrasound and echocardiography) machine क उपलब्धताक कारण, डाक्टरक पहिचान, stethoscope, सेहो लगभग अनावश्यक आभूषणक रूप धेने जा रहल अछि.

रोगक निदानक विधिमे परिवर्तन आ ओकर कारणकें एक उदाहरणसँ स्पष्ट कयल जा सकैछ. पेटक दर्द/ पीड़ा अति सामान्य रोग थिक. एकरे उदहारण ली. पेटक दर्दक कारणक निदान हेतु पहिने रोगक इतिहासक विस्तृत पूछताछ आ सघन शरीर परीक्षा ( detailed physical examination) आवश्यक होइत रहैक. आइ अनेक प्रश्नक उत्तर लगभग पेटक अल्ट्रासाउंड (Ultrasound scan)सँ भेटि जाइछ. तखन मौखिक अनुसंधान आ शरीर-परीक्षा कोन आवश्यकता?  किन्तु, ओतबासँ ओहि रोगीकें कोना संतोष हेतैक, जकर नव अनुभव अपन पुरान अनुभवसँ मेल नहि खाइत छैक. ऊपरसँ आवश्यकता भेने  CT-scan, MRI-scan, PET-scan, प्रयोगशाला विज्ञान (laboratory science)क विभिन्न प्रकारक आटोमेटिक उपकरण (autoanalyzer) चिकित्सककें रोग संबंधी एहन सब सूचना उपलब्ध करा दैछ, जे सूचना आन सामान्य जाँच-पड़तालसँ  नहि भेटि पबैछ.  ततबे नहि, जाँच-पड़तालक नव-नव विधिसँ रोगक निदानक अतिरिक्त, आगू चलि कए  रोग पर चिकित्साक प्रभावक संग-संग  रोगमे सुधार वा वृद्धिक प्रमाण सेहो भेटि जाइछ. एहि सबसँ केवल निदाने (diagnosis) टा नहि सुलभ भेलैए, बल्कि समयक बचतसँ  चिकित्सा-व्यवस्थामे दक्षता (efficiency) आ उत्पादकता (productivity) सेहो बढ़लैए. हं, जाँच-पड़तालमे आधुनिक उपकरणक अत्यधिक उपयोगसँ  चिकित्साक खर्च बढ़लैए. बढ़ैत खर्चक मारिसँ  बहुतो रोगी चिकित्सा नहि करा पबैछ. अस्तु, रोग-निदानक पांपरिक पद्धति आ अत्यावश्यक आधुनिक जांच-पड़तालसँ सर्वसाधारण धरि चिकित्सा सुविधा कोना पहुँचाओल जाय, आइ से एकटा चुनौती थिक. किन्तु से एतय विवेचनाक विषय नहि. तथापि, आधुनिक प्रगति चिकित्सा-विज्ञान, चिकित्सा पद्धति आ ताहिमे चिकित्सकक भूमिका कोना प्रभावित करत तकर परिणाम आब विकसित समाजमे देखबामे आबि रहल अछि. अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धतिक प्रभाव भारतहुमे देखल जा सकैछ.5 मोबाइल फ़ोन, इन्टरनेटक माध्यमसँ डाक्टरी सलाह आ चिकित्सा आ गूगलक माध्यमसँ रोगक स्वयं निदान एकर उदाहरण थिक. Covid-19 क महामारीक समय दूर-दूर धरि इन्टरनेट केर माध्यमसँ चिकित्सा-सुविधाक प्रसार एकर उदारण थिक. अस्तु, ई व्यवस्था आब आनो रोगक चिकित्साक हेतु कारगर अस्त्र बनि प्रमाणित भए रहल अछि.     

आब एकटा दोसर विषय: चिकित्सा पर बढ़ैत व्यय. एहिमे कोनो दू मत नहि जे आधुनिकतम उपकरणक आ चिकित्सासँ  अनेको कॉर्पोरेट स्वास्थ्य संस्थानक आय आ मुनाफामे निरंतर वृद्धि होइछ. चिकित्सा सेवामे बढ़ैत खर्चसँ जं एक दिस मध्यम वर्ग मेडिकल इंश्योरेंसक ऊपर जेबसँ टाका खर्च वहन करैछ,  तं दोसर दिस, असंख्य निर्धन रोगी आधुनिक चिकित्साक  सुविधा नहि उठा पबैत छथि.  व्यवसायमे वृद्धि (growth) बाजारक मांग थिक. मुदा, बढ़ैत मेडिकल खर्चसँ केओ नहि बचैछ. एहन वातावरणमे जनसामान्यक शिकाइत- ‘ डाक्टर गप्प नहि सुनैत छथिन’, ‘ बड्ड जाँच करबैत छथिन’, ‘ बहुत दवाई लिखैत छथिन’ - अनर्गल नहि. एकर समाधानक हेतु समाज आ सरकार तथा निजी चिकित्सा व्यवस्था कोनो मध्यम मार्ग ताकए, से वांछनीय थिक. प्राथमिक, रेफरल आ उच्चस्तरीय चिकित्साक सरकारी व्यवस्थाक लाभ सब धरि पहुँचय, से तं सरकार सुनिश्चित कइए सकैछ. ई आवश्यको थिक. मुदा, देशक प्रत्येक भागमे एहि दिशामे एक रंग सफलताक प्रमाण नहि भेटैछ.

चिकित्सा प्रक्रियाक प्रति रोगीक धारणा आ संतुष्टि

चिकित्सकक संपर्कमे अबैत प्रत्येक ‘रोगी’क  हेतु औषधि आवश्यक नहि होइछ. किन्तु ई सबकें बुझायब संभव नहि. व्यक्तिक रोग, व्यक्तित्व, धारणा, शिक्षा,  व्यक्तिक विचार आ व्यवहारकें प्रभावित करैछ.  सर्व विदित थिक, परहेज आ जीवन-पद्धतिमे परिवर्तन (life-style modification) सँ बहुतो रोगमे सुधार एवं  निराकरण संभव छैक.  किन्तु, एहू हेतु  सबकें सहमत करब संभव नहि, विशेषतः एहन रोगीकें जनिका प्रत्येक लक्षण- जेना, पेट दर्द, गैस, जलन, अतिसार- कब्जी, मन्दाग्नि वा अत्यधिक भूख, मथदुक्खी, चक्कर, इत्यादिक- लेल एक-एक टा फूट-फूट औषधिक अपेक्षा होइत छनि. एहन रोगीकें थोड़ औषधि वा औषधिक बिना संतुष्ट करब कठिन. चिकित्सा सेवामें हमर अपन दीर्घ अनुभव कहैछ, कतेकोकें व्यक्तिकें अस्पतालसँ  बिनु औषधिक आपस आयब, मंदिरसँ बिनु प्रसादहि घूरि आयब सन प्रतीत होइत छनि! अस्तु, चिकित्सकक कहब जे ‘रोग नहि, तं औषधि किएक?’ क प्रश्न वा सुझाव निरर्थक होइछ. यद्यपि, न्यूनतम आ केवल आवश्यक औषधि देब रोगीक हित थिक.            

दोसर दिस, मधुमेह, अधिक रक्तचाप-सन रोग, आरंभमे जकर कोनो लक्षणे  नहि होइछ, तकर चिकित्सा लेल रोगीकें सहमत करब आ चिकित्सामे निरंतरता रखबा लेल प्रेरित करब कतेको बेर बड़का चुनौती प्रमाणित होइछ. जीवन पद्धतिमे परिवर्तन (life-style modification) सँ रोगकें सुधारबाक सुझावसँ रोगीकें सहमत करब आओर बड़का चुनौती थिक. मधुमेह (Diabetes), हृदयक धमनीक रोग (Coronary Artery Disease), मोटापा (obesity), रक्तमे वसा केर अधिकता (hyperlipidemia) प्रभृतिक रोग एहन रोग सब थिक जकरा हेतु जीवन पद्धतिमे परिवर्तन- थोड़ भोजन आ भोजनक अवयवमे परिवर्तन, भोजनमे नोनक मात्र घटायब, टहलब आ व्यायाम, धूम्रपानक त्याग- इत्यादि अनिवार्य  बूझल जाइछ. किन्तु, एहनो रोग सबहक सब रोगीकें सहमत करब आ चिकित्साक लक्ष्य प्राप्त करब सुलभ नहि. एहि सबहक हेतु शिक्षा, समाजिक हस्तक्षेप, आ चिकित्सकक निरंतर प्रेरणा सहायक भए सकैछ. विगत किछु वर्षमे योगाशन एवं व्यायामक प्रति समाजमें जागरूकता बढ़लैए. ई परिवर्तन उत्साहवर्धक थिक. तथापि, बिना औषधिक चिकित्सा वा जीवन पद्धतिमे परिवर्तनक सुझाव जं रोगीकें नहि रुचलनि तं संभव अछि चिकित्सकक ऊपर ‘बेकार डाक्टर’क लेबुल साटल जाइनि, वा रोगी चिकित्सक बदलि लेथि.

ततबे नहि, अनेक सामजिक-सांस्कृतिक धारणाक विपरीत चिकित्सकीय सलाह सेहो रोगीकें सोझे ग्राह्य नहि होइछ. तहिना, कतेक बेर मेडिकल प्रैक्टिसनर लोकनि द्वारा पसारल भ्रान्ति सेहो तेहन बद्धमूल धारणा बनि जाइछ, जकरा उखाड़ब बाँसक ओधि उखाड़बा जकाँ कठिन थिक. एंटीबायोटिकक प्रत्येक कोर्सक संग ‘विटामिन’क गोलीक प्रयोग एहने एक गोट अवैज्ञानिक धारणा थिक, जकर बीजारोपण औषधि-उत्पादक लोकनि चिकित्सक समुदायकक सहायतासँ दीर्घ काल धरि करैत आयल छथि. आब एहन धारण कतेक ठाम बद्धमूल भए गेल अछि. समाजमे एहन आओर अनेक अवैज्ञानिक धारणा प्रचलित अछि. तथापि, जाहि पारंपरिक जीवन पद्धतिसँ केओ दीर्घायु, जीवन भरि निरोग रहल होथि, कोनो विशेष परिस्थितिमें तनिक जीवन पद्धतिमे परिवर्तन प्रथम दृष्टया भले शास्त्र-सम्मत बूझि पड़य, किन्तु, अनावश्यक थिक.

सारांश

सफल लोकप्रिय चिकित्सकक हेतु जतबे आवश्यक अधीतशास्त्र-शास्त्रमे निपुण- हएब थिक, ओतबे आवश्यक थिक व्यवहार कुशल हएब. जुनि बिसरी, रोगीक गप्प सुनब सेहो चिकित्सा थिकैक. शास्त्र-संगत सुपथ चिकित्सा कयनिहार, व्यवहार कुशल चिकित्सक, आदर्श चिकित्सक थिकाह. व्यवहार कुशल हएब आवश्यक तं थिके, ई शास्त्रमे निपुण चिकित्सकक हेतु सोना पर सोहागा थिक. जखन शास्त्र- सम्मत चिकित्सा, चिकित्सकक सहृदयता आ कुशल व्यवहार, तथा रोगीक अपेक्षा चिकित्साक तराजूक दुनू पलड़ाकें संतुलित करैछ, तखन आदर्श चिकित्साक लक्ष्य स्वतः पूर्ण भए जाइछ. कारण, रोगमुक्त संतुष्ट रोगी  चिकित्सकक हेतु सबसँ बड़का तगमा थिक. आब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सा-व्यवस्थाक बदलैत स्वरुप आ रोगीक आकांक्षा भविष्यमे कोन स्वरुप लेत भविष्ये कहत. भारतमे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोगक निरंतर हस्तक्षेपक परिणाम सेहो भविष्येक गर्भमे अछि. हं, ई जुनि बिसरी जे डाक्टर-वैद्य रोगक विश्वकोश नहि थिकाह.6

सन्दर्भ

1. चरक संहिता, भाग-1(1948) कविराज अत्रिदेव गुप्त, भार्गव पुस्तकालय, बनारस. अध्याय 9, श्लोक,4

2.श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टिकर्मता ।

 दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्  ।।

 चरक संहिता, भाग 1, अध्याय 9, श्लोक 6 ;

3. सति पादत्रये ज्ञाज्ञौ भिषजावत्रकारणम् ।

वरमात्मा हतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता।।

चरक संहिता, भाग 1, अध्याय 9, श्लोक 15    

4. https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/15256/1/a2019-35.pdf accessed 28 Oct 2023 

5 . Eric Topol. The patient will see you now (The future of medicine is in your hands. New York: New York 2015.

6 . https://kirtinath.blogspot.com/2018/12/blog-post.html accessed 27 Oct 2023.

               

     

  

Monday, September 25, 2023

पाठकीय प्रतिक्रिया : मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक

पाठकीय प्रतिक्रिया

मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब  आवश्यक 

'मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब  आवश्यक ' नामक हमर ब्लॉग पर  प्रसिद्ध वैज्ञानिक आ काँच उद्योगक विश्वप्रसिद्ध नेता डाक्टर मनोज कुमार चौधरी, ओहायो राज्य अमेरिकासँ,  अपन सम्मति  एक लेख केर  रूपमें पठओ लनि. ई प्रतिक्रिया,  मैथिलीमे वैज्ञानिक लेख कोना लिखल जाय ताहि विषय पर  एक  विचारोत्तेजक लेख थिक. संपूर्ण लेखकें पाठकीय प्रतिक्रियाक रूपमे प्रकाशित करब संभव नहि भेल अस्तु डाक्टर मनोज    कुमार चौधरीक लेख एतय यथावत् प्रस्तुत अछि:

Reflections on Scientific Writing in Maithili and Musings on Miscellany 

Dr. Manoj K. Choudhary

This brief article is a response to a request from my esteemed friend Dr. Kirtinath Jha to provide comments on his thought-provoking blog titled “मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक ("The Necessity of Expanding the Mono-limbed Maithili Literary Tree"). In his customary erudite style, Dr. Jha eloquently argues for transformation of the mono-limbed (एकफेंड़ा) tree that is the contemporary body of Maithli writings into a thriving and expansive banyan tree. Indeed, Dr. Kirtinath Jha's choice of imagery, comparing the body of Maithili writings to an "एकफेंड़ा गाछ" (mono-limbed tree), is both vivid and highly appropriate. 

This response will focus primarily on two pivotal themes: the promotion of Maithili as a proficient medium for scientific and technical education and the imperative development of scientific and technical literature in Maithili. I have chosen to write in English as it allows me to articulate my thoughts on these subjects more fluently and naturally. However, I will also touch upon other aspects related to Maithili.

In my experience, even in languages that have historically served as the medium of instruction, such as Bengali, the creation of scientific and technical texts can be a formidable challenge. The debate on whether using English as a medium of instruction (EMI) for science is detrimental to the development of scientific knowledge among non-English speakers remains inconclusive, at least to my knowledge. The quality of students' learning outcomes is profoundly influenced by numerous variables, including teacher competency, the quality of pedagogical tools and techniques, the learning environment at school and at home, and, importantly, students' motivation and diligence. Nevertheless, it intuitively appears that, all else being equal, learning in one's native language should offer certain advantages. While I won't delve into specific research findings on EMI for science, drawing from my own experiences of being exposed to both Hindi and English as mediums of instruction for high school-level science, I would like to share the following observations.

 

·         Start with general scientific writing, say, for up to the middle school level. One cannot (and should not attempt to) build a durable superstructure on a weak foundation.

·         Use bilingual terms even for items that have well established counterparts in Maithili/Sanskrit.  Some examples are: Molecule (अणु),  Atom (परमाणु), Gravitation (गुरुत्वाकर्षण), Momentum (संवेग), acceleration (त्वरण),  Hypotenuse (कर्ण), Pollen (पराग), Double Helix (दोहरी कुंडली),  Matter (पदार्थ), Perpendicular (लंब), Circumference (परिधि), Refraction (अपवर्तन), Cell (कोष), Electricity (विद्युत) etc. This will ensure that students learning science in Maithili are not put at a disadvantage later in their educational pursuits.

·         It is best not to create artificial Maithili terminology for scientific terms that are well established.  So, use terms like radioactive, spinal cord, isotope, longitudinal wave, transverse wave, nervous system, nucleus, and plate tectonics, artificial intelligence, as they are.

·          Science books for children should never be just a compilation of facts and a collection of terms to be memorized.  They should arouse curiosity, and encourage discovery.  They should contain eye catching illustrations.

 

When it comes to creating scientific content in Maithili for the purpose of popularizing science (rather than for instructional purposes), a critical requirement is to present and explain concepts at a high level while avoiding unnecessary complexities and technical details. In essence, this involves providing a view of the forest without delving into the specific details of individual trees. Achieving this balance demands that the writer possesses a dual expertise: a deep understanding of science (or the specific scientific topic they are addressing) and a mastery of the Maithili language. Furthermore, the writer should have refined literary sensibilities.

 

Finding individuals who possess this unique combination of attributes may be challenging, but those who do can play a pivotal role in making science more accessible to the general public. A good example of a well-executed book on science meant for a broad audience is J. V. Narlikar's "The Lighter Side of Gravity." This demonstrates how effective communication of scientific concepts can engage and educate the public about the wonders of science.

No matter how simplified the contents of popular books on science are made, understanding them, nevertheless, demands at least a first year college (or advanced high school) level of scientific training and sophistication on the part of a reader. Such a reader could easily avail of numerous books of this type in English. So why would he/she search for popular science books in Maithili? It would be because of his/her love for and commitment to the mother tongue.   And, that is the main challenge our community needs to face and address. For a community so proud (justifiably) of its heritage of learning and scholarship, and which gets so passionate and incensed about any  attacks and insults, real or imagined, against Maithili, we, regrettably, are not forthcoming in support of our mother tongue in a manner that matters most, namely, to put it bluntly, by not putting “money where our mouth is”.   

I do not find many Maithil households of even educated and well-to-do people containing stacks of Maithili books.  It may be my own limited experience and perhaps reality is different. If so, I would very much appreciate to be corrected. It is a peculiar and not particularly healthy feature of our community that the passion for writing literature does not seem to be matched by the passion for reading literary creations on the part of a broad section of the community! No language can prosper under such conditions. If this is the situation with the so called popular writing (short story, poetry, novel, essay, etc.), one can readily imagine how daunting it would be for a prospective author to even contemplate writing a book on scientific / technical topics, or for that matter a book on economics or psychology or myriad other specialized branches of knowledge.   

     I hope my comments are taken in the proper spirit. They emanate from a person deeply connected with and committed to his mother tongue.


Sunday, September 10, 2023

मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक

 

मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछकें चारू दिस चतरब आवश्यक छैक

ऐतिहासिक युगमे जहिया अधिकतर लोक निरक्षर छल तहियो विभिन्न विधामे लेखन होइत छल. से नहि होइतैक तं संस्कृतहिमे गद्य, पद्य, महाकाव्यक अतिरिक्त आ ज्योतिष, चिकित्सा-विज्ञान (चरक आ सुश्रुत संहिता), कामसूत्र, योगसूत्र, नाट्यशास्त्र कोना लिखल जाइत.

मैथिलिओमे किछु गोटे लेखक विधामे विविधताक प्रयास अवश्य कयलनि. मुदा, अधिकतर लेखन कथा, कविता, नाटक मूलतः, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत अंशतः, आ आलोचना तथा आध्यात्म किछु-किछु, धरि सीमित रहि गेल. फल ई भेल जे एखन मैथिली लेखन चतरल बड़क गाछक विपरीत एकफेंड़ा  गाछ-जकाँ  सुरुंग भेल ऊपर मुँहे जा रहल अछि. तें आइ जं कोनो एहन व्यक्ति होथि जे मैथिलीए टा पढ़ैत होथि – ई कनेक असंभव अवश्य अछि- हुनका प्रौद्योगिकी, प्रशासन, आ चिकित्सा-विज्ञान तं दूर समसामयिक विषय, इतिहास, भूगोल, सामान्य विज्ञान, जलवायु धरिक कोनो प्रमाणिक लेखन मैथिली मे प्रायः नहि भेटतनि. एतय हम मैथिली लेखनमे विविधताक अभाव पर विचार करय चाहैत छी. यद्यपि एहि विषयपर करब बिढ़नीक छत्तामे हाथ देब थिक.

इन्टरनेटक एहि युगमे लिखब आ छपाएब कतेक सुलभ अछि, से कहबाक काज नहि. ऊपरसँ ChatGPT-सन ऑनलाइन कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence)क सहायतासँ जखन कथा-कविताक कोन कथा, न्यूज़ पेपर लेखसँ ल’ कए थीसिस आ पोथी धरि लिखल जा रहल अछि, तखनो मैथिली लेखनमे विविधताक अभाव ककरा नहि खटकटैक. अस्तु, संक्षेपमे एतय किछु संबंधित विन्दुकें रखैत छी, जाहिसँ  एहि विषयपर वाद-विवादकें बल भेटैक, समुचित समाधानक खोज हो, आ वांछित परिणाम आगाँ आबय.

मिथिलांचलमे मैथिली शिक्षाक माध्यम नहि थिक. ई लेखनमे विविधताक अभावक सबसँ बड़का कारण थिक. मैथिली शिक्षाक माध्यम नहि थिक तें एखनुक पीढ़ी जे केवल हिन्दी वा अंग्रेजीक माध्यमसँ पढ़ैत छथि ओ मैथिली पढ़बामे असमर्थ छथि. तें, इच्छा रहितो छात्र आ युवा लोकनि मैथिलीमे उपलब्ध साहित्य नहि पढ़ि पबैत छथि.

एक उदाहरणसँ हमर तर्क स्वतः स्पष्ट भए जायत. डाक्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी सरल मैथिलीमे लोकोपयोगी, आ प्रमाणिक वैज्ञानिक लेख लिखबामे सुपरिचित छथि. हिनक लेख सब ‘विज्ञानक बतकही’ नामक पोथीक दू  खण्डमे प्रकाशित छनि. हमरा लग दुनू खण्ड उपहार स्वरुप आयल छल. हम गाम गेलहुँ तं हाई स्कूलक एक विद्यार्थीकें एहि पोथीक दुनू खण्ड दए आबि गेलहुँ. अगिला बेर जखन गाम गेलहुँ, तं पुछलियनि, ‘ बाऊ, पोथी कहन लागल ?’

हुनकर उत्तर हमरा आश्चर्यजनक नहि लागल. कहलनि, ‘बाबा हमरा लोकनिकें ओ पोथी पढ़ल नहि भेल !’

विद्यार्थीक गप्प सुनि हमरा डाक्टर वियोगी जीक ‘ बिनु जड़िक गाछ’ स्मरण भए आयल. एहि लेखमे वियोगीजी  विस्तारसँ मैथिलीक पढ़ब आ प्रसारपर विस्तारसँ विचार कयने छथि.       

इन्टरनेटक एहि युगमे सूचनाक प्रसार बिजुलीक गतिसँ होइछ. तें, जे भाषा सबसँ पहिने सूचना उपलब्ध करबैछ, ओ बाजि मारि लैछ, बाँकी लटैत-बुडैत पिछड़ि जाइछ. तथापि, अपन भाषामे विषय वस्तु पढ़निहार नहि भेटताह से नहि. सब तं भोरे-भोरे सब किछु इंटरनेट पर नहि पढ़ैत छथि.

दोसर विषय: सोशल मीडिया साहित्यक सहयोगी आ गरदनिकट्ट प्रतियोगी दुनू थिक. बहुतो व्यक्ति जे पहिने खाली समयमे पोथी पढ़ैत छलाह, आइ-काल्हि Whatsapp (व्हाट्सएप्प) यूनिवर्सिटीक बाढ़िमे भरि दिन भासि कए अबैत कूड़ा- कचरा पढ़बामे समय बिता दैत छथि. हम अपन एक मित्र, जे भारतीय सेनाक सेवानिवृत्त अफसर थिकाह, कें कहलियनि, ‘अहाँकें  पढ़बा लेले हम अपन लिखल किछु पठाबी ?’

  हमर वाक्य पूरा हेबासँ पहिनहि हाथ जोड़ि लेलनि: ‘ नहि, नहि. हम अनेको व्हाट्सएप्प ग्रुपक सदस्य छी. दिन भरि एतेक अग्रसारित ‘सामग्री’ अबैत अछि, जे ओएह सब पढ़बामे दिन बीति जाइछ !’

हमर मुँहक गप्प मुँहे रहि गेल.

तेसर गप्प: मैथिली भाषाक सबसँ प्रतिष्ठित पुरस्कार,साहित्य अकादेमी पुरस्कार, मोटा-मोटी सर्जनात्मक साहित्य धरि सीमित अछि. अंग्रेजीमे आत्मकथा, इतिहास, आलेख-संचयन, जीवनीक अतिरिक्त साहित्यिक समालोचना पर सेहो साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेलैक अछि. मुदा, मैथिलीमे प्रायः से अपवादे हएत. अस्तु, प्रतिष्ठा(?) आ पुरस्कारक लोभ बहुतो लेखककें लेखनक विधाक ओहि संकीर्ण बाट दिस ठेलि दैत छनि जेम्हर पुरस्कारक  प्रबल संभावना छैक.

तथापि, एहिमें कोनो दू मत नहि जे भाषा-साहित्यक लेखन लेखककेर रुचि, आ पाठकक आवश्यकता आ मांग पर निर्भर छैक. उदाहरणक हेतु, हेबनिमे मेडिकल कालेजमे पढ़ाईक हेतु हिन्दीओकें माध्यमक रूप मे स्वीकृति भेटलैए. फलतः,अनेक राज्य सरकार मेडिकल कालेजमे हिन्दीमे पढ़ाई आरम्भ करबाक निर्णय केलक-ए. फलतः, भले हिन्दी माध्यमसँ मेडिकल शिक्षा ओतेक लोकप्रिय नहि होउक, भले सरकारहुक सहायतासँ, हिन्दीमे चिकित्सा विज्ञानक पोथी तं अवश्य छपत. तें एतय सरकारी नीतिक भाषा लेखनक विविधता पर धनात्मक प्रभाव हेतैक.

एकर अतिरिक्त, लेखकलोकनि रुचिक अनुकूल विषयक चुनाव करैत छथि. ताहिमे विविधताक नितांत अभाव देखबामे अबैछ. मैथिलीमे जतबो दू चारि टा पत्रिका छपैछ, उलटा कए देखि लिऔक. विषय कथा, कविता, आलोचना, विद्यापति, आ बहुत- तं- बहुत जय श्री रामसँ आगू नहि बढ़ैछ. समाजमे नारि पर अत्याचार, वर्त्तमान समाजिक-राजनैतिक परिदृश्यक चुनौती, कामकाजी महिलाक समस्या, शहरमे संघर्षरत श्रमिकक समस्या मैथिली लेखककें किएक नहि उद्वेलित करैत छनि? सरकार मैथिलीक जड़िपर नित्य कुड़हरि बजारैछ. ककरो बोल किएक नहि, फुटैत छनि? दिन-दहाड़े  नागरिकक खयबाक-पीबाक स्वतंत्रता, आ धार्मिक आस्था पर आघात होइछ, किओ किएक नहि बजैछ? मैथिलीमे दोसर यात्री आ किरण किएक नहि भेलाह ? आत्म-मंथन करू.

मुदा, ई सब कात जाओ. साहित्यहुक भिन्न-भिन्न विधामे मौलिक लेखन नहिओ होउक, तथापि, भाषा-साहित्यकें समृद्ध करबाक अओरो बाट छैक. हम एकटा प्रश्न पुछैत छी: हमरा लोकनिक पीढ़ीक अधिकतर पाठक हिन्दी मैथिलीसँ बेसी बांग्ला साहित्य पढ़ने छी. मैथिली वा हिन्दीक सहायताक बिना बौद्ध, जैन साहित्य, आ शास्त्र-पुराण सेहो पढ़ैत छी. कोना ? केवल हिन्दी वा अंग्रेजीक माध्यमसँ. आइ चुआँगचुआन वा फाहियानक वृत्तांत जकर मूल चीनी आ कोरियन भाषामे अछि, हमरा लोकनि कोना पढ़ल ? केवल हिन्दी वा अंग्रेजीक माध्यमसँ कि ने. अर्थात् आन भाषाक जे ग्रन्थ उपयोगी बूझि पड़य, मैथिलीमे तकर धुर्झार अनुवाद हो.

मुदा, पढ़त के ? हमरा जनैत ई समस्या थिक आ नहिओ थिक.

जं समस्या थिक, तं ओकर समाधान ताकय पड़त. पचास आ साठिक दशकमे मैथिली प्रचारक अभियानी लोकनि, पैदल, साईकिलपर आ ट्रेनसँ दूर-दूर जाथि. विद्यापति पर्व मनाबथि, गोष्ठी करथि.  आजुक तुलनामे तहिया यातायातक सुविधा नगण्य रहैक. साधनक अभाव छलैक. आ साक्षरता अत्यंत थोड़ छलैक. अभियानीलोकनि नोकरिहा रहथि, गिरहस्थी करथि, गरीबी आ रोगसँ सेहो लड़थि. मुदा, हारि नहि मानथि. आइ जखन हमरा लोकनि सक्षम छी. आर्थिक स्थिति सुधरल अछि, भुखमरी आ रोग थोड़ भेलैए, यातायातक उत्कृष्ट सुविधा छैक, आ हमरा लोकनिकें साधनोक अभाव नहि अछि, तं साहित्यक प्रचार अवश्ये अनेक गुणा सुलभ छैक. तखन प्रयास किएक नहि हो.

साहित्यकें लोकप्रिय बनयबा लेल आ पोथी बेचबा लेल, अमेरिका आ यूरोप-सन समृद्ध समाज धरिमे लेखक लोकनि अनेक मंचसँ पाठकक समक्ष  अपन साहित्य पढ़ैत छथि, पोथीक दोकानमे बैसि ग्राहकसँ संबंध स्थापित करैत छथि आ  पोथीक प्रचार करैत छथि. एहिसँ जनतामे पढ़बाक हिस्सक पनुगैत छैक. अनेक वर्ष पूर्व  सुश्री ओपरा विनफ्रे-सन लोकप्रिय हॉलीवुड-स्टार पाठकक बीच पोथी पढ़बाक अपन मुहिमसँ ई साबित कयने छथि जे लेखक आ पाठकक बीच सोझ संपर्कसँ पाठकमे पढ़बाक रुचिकें पुनर्जीवित करब संभव छैक. तखन मैथिल लेखकलोकनि पाठकक विभिन्न वर्ग, वयस आ समाजमे अपन साहित्यकें ल’ कए किएक नहि जाथि ?

‘सगर राति दीप जरय’ , कवि गोष्ठी, साहित्यक एकल पाठ एही दिशाक अभियान थिक. किन्तु, लेखनकें बहुआयामी बनयबाक आवश्यकता छैक. मैथिलीमें जाहि विधाक साहित्यक अभाव छैक, अनुवादसँ ओहि खाधिकें भरबाक आवश्यकता छैक. लेखक आ पाठक बीच सोझ संपर्कक आधारकें पैघ करबाक आवश्यकता छैक, जाहिसँ मैथिली लेखनक एकफेंड़ा गाछ चारु दिशामे चतरय आ मैथिली लेखक लोकनि समाजमे ओही प्रतिष्ठा आ आर्थिक लाभक भागी होथि जेना समृद्ध भाषा साहित्यक लेखक आइ छथि.

हँ, एतय एकटा गप्प आओर. कृत्रिम बुद्धिक (AI) माध्यमसँ अनुवाद कतेक सुलभ भए गेल छैक से सर्वविदित अछि. Google Translate केर कैमरा खोलू, कैमराकें श्रोत पुस्तकक कोनो पृष्ठ पर फोकस करू, कोन भाषामे अनुवाद चाही से निर्देश दिऔक, आ अनुवाद सामने अछि. एखन एहि प्रकारक अनुवादमे किछु समस्या नहि छैक, से नहि. मुदा, अनुवाद निश्चय निरंतर सुलभ होइत जेतैक. तें, अनेक विधाक लेखक लोकनि, कमसँ कम प्रयोगहुक रूपें, एके संगे अपन पोथीक मैथिली अनुवादक डिजिटल कॉपी प्रकाशित करबाक हेतु प्रकाशककें प्रेरित कइए सकैत छथिन. ई प्रयोग मैथिलीक गाछकें चारू कात चतरबामे सहायक भए सकैछ. एतय उदाहरण स्वरुप एक अंग्रेजी पोथीक पन्नाकें Google Translate माध्यमसँ कयल मैथिली अनुवादक नमूना नीचा देल अछि. 

पोथीक पृष्ठ मूल अंग्रेजी मे

Google translate द्वारा मैथिली अनुवाद 

      

Sunday, July 16, 2023

साधारण लोग, असाधारण विचार-२

 साधारण लोग, असाधारण विचार-२

साधारण लोगों की जीवनी नहीं लिखी जाती है. किन्तु, अनेक साधारण व्यक्ति की साधारण छवि के किसी फलक में अचानक कोई असाधारण चमक दिख जाना आश्चर्यजनक नही. एक शाम लाल काका में मुझे वही चमक दिखी थी. मुझे लगता है, जैसे सोने के किसी बहुमूल्य  आभूषण में उसका रंग, उसकी चमक, उस में जड़ा हुआ पत्थर और उसकी आकृति, सब कुछ मिलकर उसे नायाब बनाता है, उसी तरह अलग-अलग साधारण मनुष्य के चरित्र की छोटी-छोटी चमक का एकत्र संयोग किसी व्यक्ति को असाधारण की संज्ञा देता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न बनाता है.   

लाल काका के मरे हुए तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं. उनमे ऐसा कौन सा गुण कि समाज उन्हें याद रखे. उन्हें संतानों की कमी नहीं थी. इसलिए उन्होंने न कुआँ खुदबाया था, न सड़कें बनबायी थी. उनके जो दोस्त थे, गुजर चुके है. उनके अपने बच्चे बूढ़े हो चुके हैं. उनकी डीह पर घर है, पर जनशून्य, जैसा आज गाँव में  कई लोगों के घर सूने पड़े हैं. खैर, उसे रहने दीजिए. अभी लाल काका पर आयें.

चलिए, उनके नाम को क्यों छिपायें. लाल काका, माने घुरन झा. उनको जो जानते थे उन्हें तान्त्रिक जी बुलाते थे. इतना तक कि उनके बड़े भाई भी जबतक उनसे नाराज न हों, उन्हें तान्त्रिक जी ही बुलाते थे. इसका भी एक इतिहास था. वह अपनी जवानी के दिनों, जब ब्रह्मपुत्र नदी पर एक भी पुल नहीं था, गाँव के अपने अन्य दो साथियों के साथ तन्त्र सीखने के लिए कामरूप( कामाख्या) गये थे. उनके भाल पर त्रिपुण्ड चन्दन के नीचे, भौंह के बीचोबीच बड़ा सा सिन्दूर का टीका, और त्रिकाल भांग के सेवन की आदत उन्ही की देन थी. साक्षर थे; कठिनाई से गीता का हिन्दी अनुवाद पढ़ लेते थे. किन्तु, दिनचर्या में इसके लिये वक्त निकालना उनके लिये आसान नहीं था. आप पूछेंगे, खेती-बारी व्यवसाय में मसरूफ रहते होंगे. अजी साहब, छोड़िये. स्नान-ध्यान पूजा, दस बजे भोजन, भोजन के  बाद थोड़ा  ‘लोट-पोट’ से अगर समय बचा तो ठीक, नहीं तो फिर शाम के भांग की तैयारी के अलावे समय निकालना लाल काका के लिए  कठिन ही था. हाँ, अपनी थोड़ी पुस्तैनी जमीन थी. कोसी इलाके के बड़े खेतिहर के भलमानुस दामाद थे. लेकिन, अपने हाथों खेती करना तो दूर, हाथ बटाना भी उन दिनों भलमानुसों के इज्ज़त के खिलाफ था. पर बुताद, रोग-बीमारी, सर-कुटुम्ब और शादी-ब्याह मे कभी कोई बाधा नहीं हुई. अगर कभी कट्ठा दो कट्ठा ज़मीन इधर-उधर हो भी गया तो फ़िक्र की कौन सी बात थी. यही राय उन लोगों की भी थी जो उनके यहाँ भांग-भुर्रा के लिये जुटते थे.

खैर, फिलहाल मुद्दे पर आयें. तीन लडकियाँ, एक लड़का. बड़ी लड़की की शादी कब की हो चुकी थी हमें कहाँ मालूम. हम तो पैदा भी नहीं हुए थी. दूसरी बेचारी  एक दुर्घटना में बेमौत गुजर गयी थी. पर फिलहाल हम उनकी आखिरी सन्तान, लड़के की शादी की बात करें. सबसे छोटे सन्तान, पुत्र की शादी आते-आते लाल काका की माली हालत ऐसी हो चुकी थी कि वह कुछ भी खर्च करने के हालत में नहीं थे. पर अपने ही एक ग्रामीण सज्जन का दवाब था. वह परिचित थे. प्रतिष्ठित और सज्जन भी थे. उनकी कुआंरी कन्या की शादी का सवाल था. लाल काका इच्छुक थे. पर हाथ खाली था. बहरहाल, शादी कए कई महीने पहले कन्यागत पन्द्रह सौ रुपये सहयोग का वादा कर लाल काका की सहमति और वचन लेने में सफल हो गये.

वक्त बीतता गया. शादी का दिन नजदीक होता गया, पर कन्यागत वादा पूरा न कर सके. अंततः शादी का दिन आ गया. आब क्या हो ? लाल काका कर्ज-उधार कर लड़के को शादी के लिये ले जाने को तैयार थे. अभी तक उन्होंने एक भरोसेमंद ग्रामीण पर आस नहीं छोड़ी थी. इसलिए, इंतज़ार में बैठे रहे. शादी का दिन. शाम हो गयी. कन्यागत का कोई नामोनिशान नहीं. आखिरकार जब गाँव में दिये जलने शुरू हुए, किसी ने कहा फलाँ मिश्र सामने के आम के बगीचे में आप का इंतज़ार कर रहे हैं. शादी का दिन, वह भी इस विवशता में उनका दरवाजे पर आना संभव नहीं था. लाल काका कुछ लोगों के साथ बगीचे में गये. बेचारे मिश्र महाशय की स्थिति देखनेवाली  थी. लाल काका कुछ नहीं बोले. लाल काका के साथ गये वहां उपस्थित  कुछ युवक उत्तेजित थे. युवक लोगों ने लाल काका को अलग ले जा कर कहा: फलाँ मिश्र ठकहारा हैं. बारात मत ले जाइये.

लाल काका धीरे बोलते थे. शान्त स्वभाव के थे. उन्होंने ने युवकों की ओर नज़र उठाई. और शान्त भाव से बोले: 'मैंने वचन दे दिया था. लड़की की शादी है'.

उसी शाम थोड़ी ही देर बाद लाल काका अपने एकमात्र पुत्र की बारात लेकर मिश्र महोदय के दरवाजे पर पहुँच गये!    

Saturday, June 17, 2023

पुस्तक समीक्षा: उद्देश्य,प्रक्रिया आ गुणवत्ता

 

पुस्तक समीक्षा: उद्देश्य,प्रक्रिया आ गुणवत्ता

पुस्तक समीक्षा रचनात्मक गतिविधि थिक. प्रतिष्ठित पत्रिकामे प्रकाशित समीक्षासँ जं एक दिस कृतिक प्रतिष्ठा होइछ, कृतिक बिक्री बढ़ैछ, तं दोसर दिस पाठक ओहि दिस आकर्षित होइत छथि, हुनका लोकनिकें अपन रुचिक उत्कृष्ट पोथीक चुनावमे सहायता भेटैत छनि. अस्तु, आवश्यक अछि समीक्षा उत्तम हो. एकरे ध्यान रखैत, एहि संक्षिप्त लेखमे पुस्तक-समीक्षाक उद्देश्य, प्रक्रिया, उपादेयता, आ गुणवत्ताक निर्वाह पर विचार करब हमर अभीष्ट अछि.

ISBN आँकड़ा पर आधारित, विकिपीडियाक एक रिपोर्टक1 अनुसार  वर्ष २०१३ मे भारतमे विभिन्न भाषाक नब्बे हज़ार पोथी प्रकाशित भेल छल. स्पष्ट छैक, ने सब पोथी बिकाइछ, ने पढ़ल जाइछ. सब पोथीक समीक्षाओ किएक छपतैक. समीक्षाक दृष्टिए अंतर्राष्ट्रीय भाषाक स्थिति सेहो बहुत भिन्न नहि छैक. एक पुरान, विश्वस्त आँकड़ाक अनुसार वर्ष २००१ मे अमेरिका मे लगभग चालीस हज़ार पोथी छपल छल.2 ओहि वर्ष दैनिक न्यू यॉर्क टाइम्समे एहिमे केवल चारि सौ पोथीक समीक्षा छपल! अर्थात् न्यू यॉर्क टाइम्स कुल प्रकाशित पुस्तकक केवल १% पुस्तकक समीक्षा प्रकाशित केलक. ओकर बाइस वर्ष बाद आइ इन्टरनेट पर मुफ्त उपलब्ध पढ़बाक सामग्रीक कारण पत्र-पत्रिकाक लोकप्रियता आ बिक्री घटलैक-ए. फलतः, अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अनेको दैनिक स्वतंत्र बुक-सेक्शनक प्रकाशन करीब दस वर्ष पूर्वहि बंद भए चुकल अछि. अर्थात्  पहिने जतबो समीक्षा छपैत छल, आइ ओतबो नहि छपैत अछि. एहन स्थितिमे आम पाठक अपन रुचिक पोथीक चुनाव कोना करथि ? तें, आवश्यक अछि, प्रकाशित समीक्षा सामान्य पाठकक आ विद्वानक अपेक्षा पर खरा उतरय. ई अत्यंत कठिन अछि.

समीक्षाक उपादेयता                                                                                                                         

शुद्धताक प्रमाणक ठप्पा ( hallmark) जेवर किननिहार ग्राहककें धातुक शुद्धताक गारंटीक विश्वास दिअबैछ. पोथीकें जं सोना बुझिऐक तं ओकरा कसौटी पर जांचहि पड़त. वस्तुतः, निष्पक्ष समीक्षासँ  पाठककें पोथीक चुनावमें ओहिना सहायता होइछ जेना हॉलमार्कसँ   सोनाक आभूषणक चुनावमे. अर्थात् उच्च कोटिक समीक्षा प्रकाशक आ पाठक दुनूकें पोथीक गुणवत्ताक विश्वास दिअएबैत छनि. समीक्षा लेखकक प्रतिष्ठा, आ पुस्तक तथा लेखक भविष्य बना वा बिगाड़ि सकैछ. कारण, प्रतिष्ठित प्रकाशन प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशनक हेतु पुस्तकक चुनाव, वा संस्था सब द्वारा पुरस्कारक हेतु पुस्तकक चयन, मूलतः एकाधिक समीक्षा पर निर्भर करैछ. तें, समीक्षाक उपादेयता स्वयंसिद्ध अछि.    

पुस्तक समीक्षाक प्रक्रिया

पुस्तक समीक्षा कोनो रिसर्च पेपर, रिसर्च वा थीसिस केर प्रस्ताव, रिसर्च ग्रांट केर आवेदन वा थीसिस केर मूल्यांकनसँ भिन्न नहि. रिसर्च पेपर, रिसर्च वा थीसिस केर प्रस्ताव, रिसर्च ग्रांट केर आवेदन वा थीसिसक प्रस्तावमे विषयक पृष्ठभूमि, मौलिकता, (प्रस्तावित विषयक) अध्ययनक औचित्य, उपलब्ध सामग्रीक सिंहावलोकन, अनुसंधानक विधि, परिणाम आ ओकर उपादेयता मूल्यांकनक मुख्य-मुख्य विन्दु थिक. किएक तं सर्जनात्मक कृतिक उद्देश्य आ स्वरुप रिसर्च पेपर, रिसर्च वा थीसिस केर प्रस्ताव, रिसर्च ग्रांट केर आवेदनक स्वरुपसँ भिन्न होइछ, तें ओहि सबहक समीक्षा आ सर्जनात्मक साहित्यक समीक्षामे मौलिक अंतर छैक. ततबे नहि, समीक्षा आ समालोचनामे सेहो भिन्न-भिन्न विधा थिक, यद्यपि, समीक्षामे समालोचनाक किछु बिंदुक समावेश अवश्य होइछ. वस्तुतः, समालोचना कलाक विस्तृत नीर-क्षीर विवेचना थिक. पुस्तक-समीक्षा पुस्तकक परिचयक संग ओकर गुण-दोष पर समीक्षकक अपेक्षाकृत संक्षिप्त विचार थिक, जे मूलतः आम पाठक पर केन्द्रित होइछ. समालोचना विशेषज्ञ पाठक पर केन्द्रित होइछ. समीक्षामे विषय वस्तुक प्रतिपादन, भाषा, आ कृतिक पठनीयता समीक्षाक अहम बिंदु थिक. एहि सब विचारणीय बिंदु पर सम्यक विचार प्रस्तुत करबाक हेतु ई आवश्यक थिक जे समीक्षक विषय वस्तुसँ नीक जकाँ परिचित होथि, कृतिकें मनोयोगपूर्वक पढ़थि, आ कृतिक प्रत्येक फलक पर निरपेक्षता आ गंभीरतासँ विचार कए स्पष्ट शब्दमे ओकर गुण-दोषकें पाठकक समक्ष राखथि. समीक्षकक स्पष्ट विचार आ गुणक अतिरिक्त पोथीक दोषक चर्चा उत्तम कोटिक समीक्षाक अनिवार्य अवयव थिक.

एकर अतिरिक्त पोथी मनोरंजक छैक वा नहि ताहिमे पाठकक रुचि स्वाभाविक थिक. जं कविता, उपन्यास, वृत्तांत, नाटकक पोथीकें एक बैसाड़मे समाप्त कयल जा सकैछ, तं मनोरंजन आ पठनीयताक स्केल पर ओ पोथी १०/१० अवश्य भेल. पठनीयतामे भाषाक सरलताक आ कथाभूमिक रोचकताक योगदान मूलभूत थिक. समीक्षामे एहि सब विन्दुक समावेश आवश्यक थिक. एकटा गप आओर. जेना बिना मनोयोग आ परिश्रमक नीक पकवान नहि बनैत छैक, तहिना दक्ष संपादनक विना त्रुटिविहीन पोथी प्रकाशन असंभव छैक. अर्थात् सरल भाषामे लिखल रोचक पोथीओमे मुद्रणक दोष, सुस्वादु पकवानमे आँकड़ पाथर जकाँ प्रतीत होइछ.  अस्तु, सजग समीक्षकक दृष्टि ओम्हरो जायब आवश्यक.

समीक्षा आ समीक्षक

Perspective on History नामक पत्रमे  The  Art of  Reviewing  लेखक ब्रूस मजलिश लिखैत छथि, ‘समीक्षक जतबे पोथीक समीक्षा करैत छथि, समीक्षा सेहो समीक्षकक ओतबे समीक्षा करैछ.’ 2 अर्थात् समीक्षाक गुणवत्ता स्वयं समीक्षकक अवगति आ दक्षताक प्रमाण थिक. निष्पक्ष आ संतुलित समीक्षा समीक्षकक प्रतिष्ठा बढ़बैछ; पक्षपातपूर्ण प्रशंसा वा निंदासँ पाठक तं सहमत नहिए होइत छथि, ओहन समीक्षासँ कदाचित्  समीक्षकक प्रतिष्ठाक हानिए होइत छनि. ततबे नहि, त्रुटिपूर्ण समीक्षासँ लेखक, पाठक वा समीक्षक ककरो लाभ नहि. तहिना, अनोन (lukewarm) समीक्षा जाहिमे समीक्षक अहम बिंदु पर स्पष्ट विचार देबासँ बचैत छथि, ओहूसँ ककरो लाभ नहि. एहन समीक्षा पक्षपातपूर्ण समीक्षा जकाँ अकार्यक थिक.

उत्तम समीक्षाक आवश्यक शर्त

- समीक्षासँ पूर्व समीक्षक विषयक अधययन करथि. अपरिचित विषयक पोथीक समीक्षासँ बचल जाय. विषयसँ अपरिचय वा अध्ययनक अभावमे समीक्षा करब घातक थिक.

- पोथीककें बिनु पढ़ने, केवल भूमिका, ब्लर्ब(blurb) वा अनकर समीक्षा पढ़ि कए समीक्षा नहि लिखल जाय. विद्वान लोकनि एहन आग्रहसँ बचैत छथि. एहि विषय पर एकटा रोचक कथा सुनल अछि. ई कथा एकटा लेखक आ राजनेता- आर. आर. दिवाकर आ भारतक विभूति स्वर्गीय डॉ अमरनाथ झासँ संबंधित अछि. ई कथा हम स्वयं एक प्रत्यक्षदर्शी प्रतिष्ठित विद्वानक मुँहे  सुनने छी. एहि घटनाक विवरण पर अविश्वासक कोनो कारण नहि बूझि पड़ैछ, तें, एतय ओकर चर्चा करबाक विचार भेल. घटना निम्नवत् अछि: एक दिन बिहारक तत्कालीन राज्यपाल आर. आर. दिवाकर अपन कोनो पोथीक भूमिका लिखयबा लेल डॉ अमरनाथ झाक पटना आवास पर उपस्थित भेलाह. मुदा, डॉ अमरनाथ झा केवल ई कहि जे ‘मैं बिना पुस्तक पढ़े सम्मति नहीं लिखता’ राज्यपाल आर. आर. दिवाकरकें विदा कए देलखिन!

-जाहि पुस्तक वा लेखमे समीक्षकक आर्थिक वा अन्य रूपें सहभागिता होइनि, ओ ओहि पुस्तकक समीक्षासँ बचथि. पक्षपातक आरोपसँ बचावक हेतु ई अनिवार्य थिक.

सारांशमे समीक्षा प्रबुद्ध पाठकक अध्ययनक रचनात्मक परिणाम थिक. ई श्रमसाध्य काज अध्ययन,प्रतिबद्धता, मनोयोग आ निष्पक्षताक सार्थक फल थिक जाहिसँ लेखक पाठक आ साहित्य लाभान्वित होइछ.

सन्दर्भ:

1.      Wikipedia: Books published per country per year

https://en.wikipedia.org/wiki/Books_published_per_country_per_year. Accessed 17 June 2023.

2.      Bruce Mazlish. The Art of Reviewing. Perspectives on History Feb 1, 2001 https://www.historians.org/research-and-publications/perspectives-on-history/february-2001/the-art-of-reviewing accessed 17 June 2023.

Sunday, June 11, 2023

बांकी सब ठीक छैक बाबा

 यात्री जयंती पर विशेष: 

बांकी सब ठीक छैक बाबा

बांकी सब ठीक छैक बाबा

मुदा, कनिए टा गप्प :

चारू छथि कात लेखक-कवि

आ बहराइत छनि नहि बकार

खाइत छथि मलाई आ करैत छथि ढकार.

मैथिलीए नहि

होइत अछि दिन दहाड़े कपालक्रिया संविधानक

मुदा निपत्ता छथि  बुद्धिजीवी महंथानक

बांकी सब ठीक छैक बाबा

आइओ चढ़ओलनि अहाँकें फूल

मुदा,

अनताह कतएसँ ओ आगि

ओहन शब्द जाहि सबसँ

अहाँ देलियनि प्रधानमंत्रीओकें दागि !

बांकी सब ठीक छैक बाबा

मधुवाता ऋतायते !

मधुवाता  ऋतायते

सरकारी चरौत में

चरि रहल अछि गाय, गोरु, साँढ़  

सरकारी रखौत में !!

बांकी सब ठीक छैक बाबा

मुदा, लिखै छी

कनिए टा गप्प !

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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