Tuesday, May 19, 2015

नेपाल - डायरीक एकटा पन्ना

अर्मला गाओं आ आमा समूह
अजुका साप्ताहिक छुट्टीक दिन हमरा लोकनि पोखराक लगेक  'अर्मला' गाओंमे  हेल्थ-पोस्टकेर उद्घाटनले आयल छी. आरंभ में करीब 5-7 किलोमीटर धरि पक्की सड़कक बाट  छैक. तकर आगू कच्ची सड़क, उबड़-खाबड़ बाट. बाटमे एकटा सुखायल धार सेहो अबैत छैक. एखन तं, बस-जीप-मोटर-साइकिल, सब किछु सहजतासं धार पार केलक अछि. लगइए, बरसातक दिनमे नदी अवश्य दुर्गम भ जाइत हेतैक. तें नदीपर झूला पुल सेहो छैक. नेपालकें  भौगोलिकरूपें तीन भाग मे बाँटल जाइछ : हिमाल ,पहाड़ , आ मधेस . सबठाम नदी-नाला, खोला-झोरा , पहाड़-डारा, पोखरि-ताल खूबे भेटत. मुदा, नीक सड़क सबठाम नहिं भेटत. सरकारक हाथ सिकस्त छैक.  सरकारी बजटक आवंटन  आ विदेशी सहायताकें सरकार प्राथमिकताक आधारपर बंटइत अछि. तें यदा-कदा नागरिकलोकनि बेहरी आ श्रमदानसं सड़क बनबैत छथि, पुलक निर्माण करैत छथि , सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र स्थापित करैत छथि . गाओंधरिक कच्ची सड़क आ झूला(पुल) सामुदायिक सहयोग आ श्रमदानक  फल थिक . सहयोगी लोकनिक नाम पुलक पाया पर अंकित केने  छथि . मुदा, गाओंक आवश्यकता एकेटा रहैक तखन ने. गौआं लोकनि पसेना बहौलनि तं  गाम धरिक  कच्ची  सड़क बनल . टाका जमा कयल गेल तं  पुल बनल . मुदा रोग-व्याधि, आंग-स्वांग, चोट-पटकले हेल्थ पोस्ट -डिस्पेंसरी तं चाही. हेल्थ पोस्टक उद्घाटनक  आयोजन जर्मन एन जी ओ सं सम्पोषित 'मेडी  हिमाल' नामक संस्था केने अछि . मुदा एहि  प्रयासक केंद्र-विन्दुमे छथि 'लक्ष्मी नारायण आमा समूह'. आमा माने, मां, माता, माय . 'लक्ष्मी नारायण आमा समूह' हिनके लोकनिक स्वयंसेवी दल थिक जे 'मेडी  हिमाल' संस्थाकें एहि गाम मे हेल्थ-पोस्ट खोलबाले प्रेरित केने छनि.
आमा लोकनि हमर पत्नीकें, खानगी में कहलखिन, ' हमरा लोकनि घरे-घर गीत-संगीत , भजन कीर्तन क कय रुपैया, दू रुपैया, दस रुपैया संचय करैत छी. एही टाका सं हेल्थ पोस्ट ले, टिनक छतवाला ई एक कोठलिक मकान बनौने छी.' हमर पत्नी सहजता सं ठेंठ नेपाली बजैत छथि.  तें हमर पत्नीकें आमा लोकनिक खानगी गप्प सुनबाक अवसर भेलनि. ओतय हम सद्यः देखलियैक, भाषा कोना  देश आ वर्ग-भेदक आरिकें  सहजहिं ध्वस्त क दैत छैक.
अद्भुत ई लागल, जे लोक समस्याक समाधान ले सरकारदिस मुंहतक्की में समय नष्ट नहिं करैछ.  आश्चर्यनक जे समस्याक समाधानक नेतृत्वक भारा  जवान-जहान नहिं, आमा लोकनि अपने उठौने छथि. ई निर्विवाद प्रेरक थिक. मुदा ताहू  सं रोचक ई जे आमा लोकनि अंतर्राष्ट्रीय एन जी ओ धरिकें अपनासंग जोड़बामें सफल भेल छथि. आमालोकनिक एहि नेतृत्वक पाछां कोन प्रेरणा छैक ? किछु कारण  तं प्रत्यक्षे छैक. जेना ,नेपालक पहाड़क  युवकलोकनि यत्र-तत्र, गाओंसं बाहर रोजगारमें लागल छथि .किछु भारतीय सेना, नेपाली सेना मे . किछु गोटे दुबई , दोहा, कतार आ कोरियामे. किछु गोटे तं शुद्धककय  भारतमे मजदूरीमें लागल छथि . तखन गाओंमे रहल के ? पेंशन-भोगी बृद्ध , माउगि-मेहरि, आमा-बुहारी (सासु-पुतहु), आ नेना -भुटका . तें, जखन बूढ़े-बुढ़ानुस,आ आमा-बुआ गामक सुख-दुःख सं मुहां-मुंही छथितं गामक समस्याले आओर के लडत !                                                                         तथापि, आमालोकनिक नेतृत्व एकटा आओर प्रश्न ठाढ़ केलक : मिथिलांचलक गाओं आ नेपालक अर्मला गाओंक बीच तुलना. एखनि, मोटा-मोटी मिथिलांचलहुक गामहुक हाल तं नीक नहिए छैक. मुदा हमरा लोकनिक गाओंमें लोक किएक चुपचाप कष्ट सहैत रहि जाइए ? अपन समस्याक समाधान ले नागरिक लोकनि अपने किएक ने ठाढ़ होइत छथि ? हमर अपन गाओं दरभंगा शहरी लोकसभा क्षेत्र में पड़ैत अछि . बीजेपीक सांसद श्री कीर्ति आज़ाद कतेक वर्षसं  एहि क्षेत्रक प्रतिनिधित्व करैत छथि . ततबे नहिं, हमर गाम, अवाम, दरभंगाक अंतिम महाराज स्व.डाक्टर सर कामेश्वर सिंहक मात्रिक हेबाक कारणे सेहो पहिनहुसं  सुपरिचित अछि. भूतपूर्व मंत्री स्व. डाक्टर नागेन्द्र झा सेहो आजीवन एहि क्षेत्रक प्रतिनिधित्व कयलनि. किन्तु एखनिधरि हमर गाम अवाम धरि जेबाले पक्की सड़क नहिं छै . तथापि गाओंकें सड़कसं जोड़बाक हेतु कोनो स्थानीय प्रयासतं नहिंए  भेलैके ! एहि अर्थ में अर्मला गाओंक आमा लोकनिक प्रयास निर्विवाद अनुकरणीय छनि.
आब कनेक मिथिलाक गप्प सेहो. मिथिलाक नागरिक लोकनिक अपन समस्याक समाधान ले आगू किएक नहिं अबैत छथि. हमरा जनैत नागरिक लोकनिक एहि उदासीनताक दू टा कारण छैक, दुनूक संम्बंध सामाजिक संरचना आ सोच सं छैक . पहिल, मिथिलांचलक समाजमें सामुदायिकताक बोधक अभाव, कारण भले जातिगत विभाजनक हो वा विपरीत स्वार्थक. राजनेता लोकनि एहि विभाजनकें बढ़ेबामें कोनो कसरि बांकी किएक रखताह. ' रोड ले के का करबह ? तहरा गाड़ी बा ? रोड होइ, दारोगाजी मोटर-साइकिलपर जीपपर अइहन, उलटे लेबे के देबे पड जाइ' , सन सलाह एखनधरि लोककें कहाँ बिसरलइए. दोसर गप्प , हमरा लोकनिक समाजमें सदतानिसं लोक अपन समस्याक समाधानले सरकारीए सहायतादिस अकासी दैत रहइये.  दोसर दिस नेपालमें सदातनि सं लोककें सरकारसं कम अपेक्षा रहलइये. राजा सरकार छलाह , आ नागरिक प्रजा . दुनूमें याचक आ दाताक सम्बन्ध छलैक . तें जे भेटल, से भेटल . नहिं भेटल देह लगा कय मारू . मुदा, एखनुक युगमे आमालोकनि अपन समस्याकें देहलगाकय मारबाले तैयार नहिं छथि . तथापि, हमरा जनैत,  नेपाल में सामाजिक समस्याक समाधानमें आमा लोकनिक नेतृत्वक मूल कारण  थिक पर्दा प्रथाक अभाव . नेपालमे माउगि-पुरुख, पुतहु-बेटी खेतो जोतैत छैक , खरिहानहुमे दाउन-दोगाउन सेहो करैत छैक , धानो-मडुआ कटैत छैक, एवं हाटो-बाजार करैत छैक . ओकरा घोघ कतहु तनबाक आवश्यकता नहिं होइछ; ओतुका नारि अशक्त नहिं अछि . तें नेपालक बामपंथी आन्दोलनक दौरमें महिलालोकनि खूब आगू बढ़िकय योगदान केलनि . भारतमें महिला लोकनिक सक्रियताक किछु एहने झलक उत्तरांचल स्थापनाक समर्थनमें महिला-आन्दोलन मे देखबा जोग भेल छल. किन्तु, सर्वविदित अछि, उत्तरांचलक स्थापनाक  समर्थनमें महिला लोकनिक आन्दोलनक दमन उत्तर प्रदेशक समाजवादी पार्टीक इतिहासक एकटा अति निन्दनीय अध्यायक रूपें परिगणित होयत . जे किछु .
मुदा सत्य पूछी तं, नेपाल मे पर्दा प्रथा किएक नहिं छैक, आ मिथिलांचलक नारिलोकनि किएक पर्दानशीन  छथि ? ई समाजशास्त्रीलोकनिक हेतु अध्ययनक विषय थिक. एकटा महिला कहलनि, 'हमरा जनैत, हमरालोकनिक पर्दा-प्रथा मुगलकालीन प्रथाक अवशेष थिक.'  
संयोगवश, नेपालक पहाड़ी क्षेत्र पर्दा-प्रथाक विकृतिसं बंचि गेल . प्रायः, पर्दा प्रथाक अभावे नेपालक महिला-सशक्तीकरण मूल श्रोत थिक .

Saturday, May 16, 2015

ओझा-गुणी-भगता-योगी आ भाव




अशिक्षा आ विपन्नता अन्धविश्वासक उर्बर भूमि थिकैक. मिथिलांचलमें बीसम शताब्दीक पूर्वार्धमें जेहने अशिक्षा रहैक, तेहने विपन्नता. तें,ओझा-गुणी, भगता -भाव , नाम उचाड़ब , बाटी चलायब सं ल कय सांप-बीछ्क बिक्ख झाड़बासं ल कय भूत-पिसाच-चुड़ैनितककें बसमे करबाक खूब प्रचार रहै. आब शिक्षाक प्रसार, चिकित्सा सेवाक सुलभता, आ वैकल्पिक व्यवसाय सबहक कारणें ई सब लुप्त प्राय भ गेल छैक से प्रसन्नताक विषय थिक. तथापि, कहियोकाल कतहु एकर सबहक अवशेष भेटि जाय से असम्भव नहिं. हमरा ई सब देखल कम अछि, माय-पितियाइनिक मुहें सुनल बेसी अछि.  हमर अपन पित्ती स्व. घूरन झा स्वयं किछु गौआंकें संगोर क कय तन्त्र-विद्या सिखय कामरूप-कामख्या(असम) गेल छलाह. ओहि युगमें ओझा-गुणी-भगता-योगीक प्रचारक कारणों रहैक. समाज गरीब छलैक, बेसी लोक विपन्न आ रोग-व्याधिसं बेकल रहै छल. संक्रामकरोग-प्रतिरोधी टीकाकरण आरम्भ भेल रहैक. मुदा, संग-संग पचनिया लोकनिक दल सेहो ढोल-झालि-मृदंग लकय गामें गाम घूमथि, 'शीतला-माता'क कीर्तन करथि आ धिया-पुता कें स्माल-पौक्सक पाच देथिन, टीकाकरण करथिन. डाक्टर लोकनि कमे ठाम छलाह; प्रसूति-नेना, पुरुष-नारि सबहक स्वास्थ्य आ जीवन भगवानेक  भारा. जतय डाक्टरलोकनि छलाहो तं लोक कें डाक्टर-बैदक नामहिं सुनि आतंक पैसि जाइत छलैक. कतेक रोगिक परिवारक मुंहें सुनने हेबइ, लहेरियासराय (मेडिकल कॉलेज) अस्पताल इलाजले  ल जेबैक से हम सकबै, सुसकहिं हेतइ ? माने, आधुनिक चिकित्सा पद्धतिक इलाज महग छैक से धारणा समाजक निम्न आ निर्धन वर्गमें तहियो रहैक, आइयो छैक. अशिक्षित समाजमें डाक्टरी इलाजक प्रति सन्देहक  कारण सामाजिक मान्यता आ  शुद्ध-अशुद्धक विचार सेहो रहैक. डाक्टरी औषध कोना आ कथी सं बनैत छलैक ताहि विषयमें अनेक भ्रान्ति रहैक. लोक धर्मभ्रष्ट हेबासं डेराइत छल. हमर टोलक, वयसाहु,  शकुंती, जकरा बड़कालोटाक आकारक घेघ रहैक, कलकत्ता रिटर्न छलि . जखन मौका लगैक लोककें कलकत्ताक अपन अनुभव सुनेबामें शकुंती गौरवक बोध करय. शकुंतीकें कतेक बेर कहैत सुनने हेबैक, बौआसिन, कलकत्ता में देखलियै. गीध-डोकहर सबहक गूह जमा करैत छलैक. कि तं औखद आ गोटी बनओतैक. मारे मुंह.....' माने, डाक्टर-बैद सुलभ नहिं . डाक्टर उपलब्ध छथि तं धर्म भ्रष्ट हेबाक भय आ सामाजिक मान्यताक आरि-धूर. ततबे नहिं ओहि युगमें पानि-बाढ़िक कारण सांप-कीड़ाक कोन कमी. इंटाक घर आ कोठा बिरले रहैक . तखन सांप-बीछ सं बचाव कोना हो ! तें, योगी-गुणी-भगताकेर खूब प्रधानता रहनि. झंझारपुर स्टेशन लग नवटोल नामक गाओं छैक . नवटोलक दुर्गास्थानक पुजेगरी भगतजी जखन भोरूपहर पूजापर  बैसथितं हुनका चारूकात कारनी (रोगी/पीड़ित) लोकनि चरूकात घोदामाली भ कय बैसथि . कारनी लोकनि अपन-अपन  विभवक अनुकूल अरबा चाउर, कैंचा-पैसा ल कय जाथि . भगतजी कारनीक आगूमें एकटा ताम्बाक सराइ राखि देथिन आ कहथिन, ' एहि सराइमें अपना हाथें एक मुट्ठी चाउर राखि दियउ .' भगतजी भूमि पड़ पड़ल सराइ आ ओहि महक चाउरपर अपन दृष्टि केन्द्रित करथि आ कहय लगथिन: ' अहाँक बेटा पच्छिमदिस भागल छथि. मास दिनक पछाति अओताह; अहाँक बेटीक रोग अपने परिवारक लोकक कयल अछि; केओ कटहरक को खेबाले देने रहथिन ?....आदि, आदि . एहि सब प्रकारक वक्तव्यक सत्यता वा असत्यताक हमरा कोनो अनुभव नहिं अछि . मुदा, एहि सबसँ अनेको बेर घर-परिवारमें कलहकेर बीजक बपन  भ जाइक आ परिवारक शान्ति भंग भ जाइक. एक आओरो प्रकारक गुणी, बाटी चलौनिहार,क नाम सुनल अछि. बाटी चलयबाक उपयोग हडायल वस्तुके तकबाले होइत छलैक. बाटी चलाओनिहार एकटा बाटी कें भूमिपर राखि, ओकरा  पकडिकय रखैत छलाह आ मन्त्र पढ़इत बाटीपर किछु अन्न छिटइत रहथि . मान्यता छलैक, चोरायल  वस्तुकें ल कय  चोर जाहि बाटें गेल छल, बाटी ओही दिस ससरैत बढ़त. माने, बाटीकें चोरक अनुगमन करबाक हिस्सक होइक ! छै ई विश्वासक गप्प ? मुदा, लोक ,बाटी चलबबैत तं छल. हँ , एहि सब सं कतेकबेर अशोभनीय स्थिति उत्पन्न भ जाइ. सुनल अछि ,एकबेर  हमर एकटा पित्तीक दरबज्जापरसं बिछाओन चोरि भ गेलनि . ओ बाटी चलबौलनि . बाटी चलैत-चलैत गामक पछबरिया बाधकें पार कय दोसर गाममें ककरो द्वारि पर जा कय अंटकलैक. बिछाओन  किएक भेटतनि. मुदा,  निश्चिते घरबैयाकें बड अपमानक बोध भेलैक. फलतः , स्थिति लाठी लठओवलि धरि पहुंचि गेलैक ! जादू-टोनाक एकटा आओर विधि हमर माय हमरा कहने छलीह. चिडियाडी -चाउर खोआकय चोरक पहचान करब . विधि एना होइक. मुग़ल बादशाहक जमानाक एकटा कोनो सिक्का चिड़ियाडी  सिक्का कहल जाइक. जं चोरायल वस्तुक चोरिक संदेह कोनो व्यक्ति वा व्यक्ति-समूहपर हो तं संदिग्ध व्यक्तिलोकनिकें एकठाम  जमा कयल जाय . पानिमें भिजाओल चाउर आनल जाय . चिड़ियाडी सिक्कासं निकती पर तौलि, भिजाओल चाउरक थोड़-थोड़ मात्रा संदिग्ध व्यक्तिलोकनिकें खेबाले  देल जाइनि. संदिग्ध व्यक्तिलोकनि चाउरके आधा चिबाकय भूमिपर उगलथि . जकरा मुंहसं  सोनितायल चाउर बहरायल, वएह चोर साबित भेल. छलैक ई घोर अन्याय, मुदा, होइत तं छलैक. हमरा लगइए ओहि युग में मुंहक घाव, आ दांतक पायोरिया रोग आम छल हेतैक. जे मुंहक रोगी भेल, से निर्दोषहु, अनेरे सामाजिक प्रताड़ना आ जुर्मानाक भागी होइत छल .प्रसन्नताक विषय जे पछिला पचास साल में मिथिलांचलमें एहन अन्धविश्वास कतहु देखबामें नहिं आयल अछि . मुदा देवताक कोपक भयतं एखनहु देखिते छी. देवी-देवताक कोप आ  कोपक शमनले लोक की-की ने करैत छल, आ करैत अछि. पिछड़ावर्गमें गोसाउनिक घर में आ  दलित-वर्ग दुसाध लोकनिमें, राजा सलहेसक स्थान में भाव करयबाक प्रथा एखनहु छैक. शिक्षाक प्रसार, बढ़इत सुख-समृद्धि, आवागमनक सुविधा,  आ डाक्टर वैद्यक उपलब्धताक कारण, कतेको पुरातन विधि आब ध्वस्त भ चुकल अछि, अकाल मृत्यु कम भेलैये, लोकक आयु बढ़लइए; आब गाम- घर में 80 वर्ष पार आ नब्बेक धक्कामें पहुँचल वृद्ध रहरहां भेटि जयताह, से प्रसन्नता विषय थिक. ततबे नहिं, शहरी संस्कृतिक प्रभाव ओहि पुरातन परंपरा सबहक जडिपर आघात अवश्य केलकैक अछि मुदा सब किछु निर्मूल हेबामें समयतं लगिते छैक. सुनैत छी, छठि परमेसरीक भयसं  बिहार-उत्तरप्रदेशमें छठिक पर्वक आस-पास चोरि आ डाका अपने-आप  बन्न भ जाइत छैक. कि तं,  छठि-परमेसरी बड तमसाहि छथि, अनिष्ट क देतीह. काश, चोर-छिनार-डकैत-व्यभिचारी-घुसखोरसबकें, अपना  कोपक बलें, छठि-परमेसरी सालोभरि अपना नियंत्रण में रखितथि !

Friday, May 15, 2015

मिथिलांचलक रामलीला : साठिक दसकमें

 
साठिक दसकमें मिथिलांचलमें रामलीला शब्द सुपरिचित रहै. रामलीलाक मंडली वा नाटक-कम्पनी जहिया कोनो गाम अबै सब ठाम ओकरे गप्प. गाम में पेपर-अखबार तं अबैत नहिं छलैक. समाचार आ खबरि सबटा गमैया होइछ छलैक . कमाऊ, कलकतिया-श्रमिकलोकनि जखन गाम आबथि तं संगे  ' कैलकत्ता 'क खबरि आनथि. मुदा, से तं पाबनिए-तिहार ; दसमी-दुर्गापूजा, छठि-चौरचन में ने . अनदिना तं लोककें  अपने एक-दोसराक चाडि रहैत छलै.  लोक पोखरि-इनार,खेत-खरिहानमें गामहिंक गप्प करैत छल - मुंगियाक गाय बिअयलैइये; पुरनी पोखरि में मछहर भेलैये ; अमुक टोलमें राति में डकैती भेलै ,परसू फलांक  पुतहु ट्रेन में कटिकय मरि गेलैक. इएस सब गप्प तं लोक दलानपर , घूड़ लग , पोखरिक मोहार पर , कीर्तन-मंडलीक मंडप पर , स्कूलपर करैत छल . मुदा, जखन रामलीलाक कम्पनी अबैत छलैक तं सब गप्प तर पडि जाइत छलैक. तखन माउगि-मेहर, धिया-पुता, हरबाह- चरबाहसब रामलीलाएक गप्प करैत - 'एह, हरियरका नुआवाली (नर्तकीक रोले में पुरुष-पात्र) जे नचइये ! गे दाई, केहन छै, मेंथरा( मंथरा), कुटनी बुढ़िया; आगिलगाओन ! कहै छियनि, दाइ, एखनो तं झगड़लगाओन लोक होइते छै. जखन भागमाने के नहिं छोड़लकनि, तखन .....'  महिसपर बैसल-बैसल  महिसबारसब कहितैक, 'हलुमानजी जे छरपइत छै. मर बहिं, राम-लछुमन दुनू भाइकें एकेसंग कान्हपर बैसाकय जे कुदै छौ ! आदि , आदि .
रामायणक कथानकक क्रमबद्ध अभिनयमे नाटक कंपनी कें मास दिन सं बेसी लागि जाइक . रामायणक कथा-क्रमक समाप्तिक पछाति गौआं लोकनिक आग्रहपर नाटक कंपनी दू-चारिटा लोकप्रिय नाटक वा फ़िल्मक नाट्य  रूपान्तर सेहो प्रस्तुत करैत छल . नाटक सब में बहुधा  तहियाक प्रचलित नाटक जेना, सत्य हरिश्चंद , वनदेवी , सुल्ताना डाकूक नाटकक मंचन होइत छलैक . मोन अछि, एकबेर हमर गाममें लोकप्रिय पारिवारिक  फिल्म 'धूल का फूल'क मंचन  सेहो भेल छल .  रामलीलाक कम्पनी तीस-चालीस गोटेक. कम्पनी में अभिनेता विदूषक सं ल कय गबैया-तबलची, भनसिया-खबास सब रहैत छलाह. एहि सब ग्रुपमें स्पेशलाइजेशन ( विशेषज्ञता ) सं बेसी मल्टीटास्किंग ( बहुधन्धी वृत्ति ) क प्रथा छलैक . सब गोटे मिलिकय दिनभरि भोजन-भात, हिसाब-किताब, आराम-विश्रामक व्यवस्था करैत छलाह आ रातिमें मेक-अप, लाइटिंगसं ल कय गाना-बजाना, नृत्य-नाटक  आ हँसी-विनोदधरि पार लगबैत छलाह. नाटक-मंडलीमें  खेतिहर-किसान आ कलाकार सब रहथि . किछु गोटे रोपनी-कटनीक मासमें अपन खेत-खरिहान देखथि, शुद्ध-बाधक समय सर-कुटुमैती करथि आ रुख-सुखमें नाटक खेलाथि, रामलीला करथि. नाटकक ग्रुपमें एक व्यक्तिक  नित्तह, एके भूमिकाक कारण, गाममें कलाकार लोकनिकें  लोकसब रामायणक पात्रहिं नामसं चिन्हनि, जेना, रामचन्द्रजी , लछुमनजी, हनुमानजी. असली नाम बुझबाक ककरो जिज्ञासाओ नहिं होइक. किछु व्यक्ति जे बहुधा विदूषक केर रोलमें उतरथि से अपन नाटकीय  छविक अनुरूपे अपन नाम राखथि. एकबेरुक दल में विदूषक छलाह, सुपाड़ीलाल ! नटुआ, गीतकार, गायक , बजनिया आ विदूषक दृश्य परिवर्तनक बीच-बीच, मंच-सज्जा बदलबाक समयमें, 'फिलर्स'सं लोकक मनोविनोद करैत छलाह आ आइ-माइ, भाइ बन्धुक प्रशंसाक पात्र बनैत छलाह . रामलीला कम्पनी सब बहुधा अगहनीक पछाति- प्रायः स्व. 'किरणजी'क प्रिय ऋतु हेमंतमें- गाम सब में अबैक. लोग धनकटनी दाउन-दोगाउन सं निश्चिंत रहैत छल . ऋतु अनुकूल. ने जाड़, ने 'रौद-घटा पुरिबा-ठनका' *. अगहनीक पछाति घरमें खयबाक जोग अन्न होइते छलै. तें  नाटक कम्पनीक प्रतिदिनक बुतादक जोगाड़ गौआं लोकनि सुलभ होइत छलैक. नाटक कम्पनीक प्रतिदिन बुताद (राशन-पानीक) व्यवस्था कोना होइत छलै से रोचक गप्प छै कनेक सेहो गप्प भइये जाय. राशन-पानिले गौआंसं, जकरा जे जुरैक, से योगदानकय गौरवक बोध करैत छल. जकरा नहिं जुरैक से अपन भाग्यकें दोख दैत यथासाध्य गौआंसबहक सम्मिलित प्रयासमें जोर लगाबय.   मुदा, ई प्रकरण विस्तारसं पछाति.   रामायणक सम्पूर्णक कथाक मंचनमें मास दिन सं बेसी समय लागि जाइत छलैक . कथानकक मुख्य-मुख्य प्रसंग कें एक-एक राति में, तीन-चारि घंटाक एपिसोडमें, मंचित कयल जाइत  छलैक . मुदा प्रसंग कोनो होइ, रामायणक कथा-नायक रामचंद्र, प्रतिदिन कोनो-ने-कोनो रूपमें : 'ठुमुकि चलत रामचंद्र, बाजत पैजनियाँ '  वा विश्वामित्रक आश्रममें शिष्यजकां , अथवा धनुर्धर योद्धा जकां, मंच पर अबिते छलाह . एकर अतिरिक्त, प्रत्येक राति एकबेर सुसज्जित राम-लक्ष्मणकें, समारोहपूर्वक मंचपर बैसाओले जाइत छलनि.  ओहि समय में नेपथ्यमें तं मंच-सज्जाक आन  ओरियाओनतं  चलैत रहै छलै, मुदा, मंचक आगां दर्शकमें एकटा अद्भुत रहस्य आ अनिश्चयक वातावरण व्याप्त रहैत छलैक. कि, तं, आइ देखीतं,  माला के उठाओत ! अर्थात ओहि राति , मंचपर, दोसर दिस राखल माला उठाकय जे व्यक्ति वा समूह रामचन्द्रजीक गरदनिमें माला पहिरओतनि ओएह अगिला दिन, नाटक-कम्पनीक भोजन-सांजनक भार उठाओत. माला उठलाक पछाति , मालाउठोनिहारक नाम नाटक-कम्पनीक मेनेजर मंचपरसं प्रसारित करथि. श्रोतागण ओहि गौरवशाली व्यक्तिक आ हुनकर परिवारक जय-जयकार करथि आ मनसं आशीर्वाद देथि.  मुदा माला उठबामें दर्शकक जिज्ञासाक दू कारण होइत छलैक. एक,तं, जे माला उठओताह से सामाजिक गौरवक पात्र हेताह ; दोसर, जे लोकनि माला उठेबामें अक्षम होथि - ओहि युगमें गरीबक  संख्या बेसी रहै - से अपन भाग्यकें दोष दैत हाहि कटताह, आ  माला उठाओनिहारक परिपोख खिधांस ककय मनक भड़ास निकालताह . माउगि-मेहर लोकनिक गप्प तं  फूटे. गप्प किछु एना होइ: 'सेह देखियौ, हिम्मत त केलकैक ;  'भगवान देने छथिन तें,ने' नहिं तं हमरो  लोकनिने माला उठबितहु ; 'हे दाइ, सेहो भाग सबकें होइ छै '; 'तः, छथिहे तं दू भाइ हमरो , तखन.....' . सर दिस आओरो गप्प होइतैक - 'देखियौ, आइ दछिनबारि टोलक अमाते सब हिम्मत केलक .' 'मर बहिं, कहिते तं छै, कलियुगमें राडे सब धर्म करत. कलकत्ता कमाइ जाइए . नहिं तं, देखनहिं तं रहियैक, बाप धडिया पहिरने रहैत छलै .' आदि...आदि....   आब जे माला उठौलनि, से अगिला चौबीस घंटाले नाटक-मंडलीक भोजन-भात, तेल-मशाला, नून-तेल-चाउर-दालि-तर-तरकारीक संगोर कय सब किछु नाटक-मंडलीक भंडारी धरि पहुँचा अओताह, जाहिसं 30-40 गोटेक नाटक-मंडली क चारि साँझक भोजन  थैहर-थैहर भ जाइनि. एकर अतिरिक्त जकरा जे जुरैक, केओ चारि टा सजमनि, एक घौड केरा, कुम्हड़-कदीमा, मूर-भांटा सेहो नाटक-कम्पनीकें पहुँचा अबैनि .                                                               नेना-भुटका, सासु-ससुर,  घर -परिवारक दायित्व कारण महिला लोकनि प्रतिदिनतं खेल देखबाले कोना जेतीह. उपरसं चोरहोक चिंता आ नाना प्रकारक झंझटि. पुरुख-पात्रकें पलखति आ रुचिक समस्या. माउगि आ पुरुखकें एकसंग जेबाक रिवाजतं रहैक नहिं. तथापि जकरा जहिया समय भेटै देखि आबय. तथापि रामलीलाक भिन्न-भिन्न प्रसंगक प्रति गामसब मान्यताक कारण, संयोगे, जं केओ वनवासक यात्रा-प्रकरण देखलनि तं रामक राज्याभिषेक अबस्से देखबाक प्रयास करथि .
प्रतिदिन रामायणक खेला समयपर आरम्भ करक हेतु कलाकार लोकनि झलफल होइते भोजन-भातसं निश्चिंत भ साज-श्रृंगारमें तत्पर भ जाथि . मंच-सज्जाक इन्चार्ज पेट्रोमैक्स इत्यादिक जोगाड़ कय इजोत करथि आ सेट लगाबथि . गबैया- बजनियाँ लोकनि अपन-अपन तबला-डुग्गी-हारमोनियम ल कय सांझे राति सं आलाप आरम्भ करथि . बीच-बीचमे लाउडस्पीकर पर गौआं लोकनिक आवाहन सेहो होनि: अबैत जाऊ . आइ  शीघ्रे अहिरावणवधक खेला आरम्भ हयत ... आदि... आदि . फेर गीत-नादक दौर . जागल धिया-पुता लाउडस्पीकरक आवाज सुनि लौल करब शुरू करय- ' आइ हम नहिं मानबै, हमहू जेबे टा करबै.' मुदा अंगना जाधरि सब व्यवस्थासं चैन हेतैक, कतेको नेना सूति जाथि आ रामलीला नहिं देखि पयबाक कचोट दोसर दिन भोर भेनहिं मोन पड़नि !  प्रतिष्ठित परिवारमें, खासकय नवकनियाले , रातियोकय अंगना सं बहरयबाक परम्परा नहिं रहैक. तें ओ लोकनि मनेटा  मसोसिकय संतोष करथि . जनिका ले बहरायब वर्जित नहिं छलनि , से पलखति पाबि एक-आध राति रामलीला देखि आबथि . छओड़ा-मांडर , जकरा संगबेले अनकर आस वा कठोर अनुशासनक भय नहिं रहैक, जेना, हरबाह-चरबाह, श्रमिक-वर्ग, वा  छेटगर विद्यार्थीसब, से सबदिना, दर्शक-मंडलीमें हाजिर होइत छल. प्रतिदिन जखन ई सबदिना दर्शक-मंडली हाजिर होइत छलैक  तखने , सियाबर रामचंद्र की जय , पवनसुत हनुमान की जय , लखनलाल की जय सं खेल आरम्भ होइ. खेलक बीच-बीचमें नटुआक नाच, गीत-संगीत, विपटा-विदूषक केर उतरा-चौरी आ हँसी-ठट्ठा होइ. मुदा, जोर रहै ओहि रातुक मूल कथाक मंचनपर. मुदा गौआंक बुलेटिनक मुख्य आकर्षण रहैक रामायणक कथाक  निर्णायक मोड़ सब . जेना, सीता-स्वयंवर, वनवास , सीता-हरण , लक्ष्मणक शक्तिबाण लागब , रावण-वध , रामक राज्याभिषेक जकरा ग्रामीण भाषा में लोक राजगद्दी कहैक. दर्शकसब एहिसब प्रकरण देखबाले दिन गनैत  रहैत छलाह. ततबे नहिं , वन-गमन दिन मंथरा कें लोक कोसैत छल आ रामक विपत्तिपर आँखिसं नोर बहबैत छल; लंका-दहन पर थोपड़ी पाडइत छल, आ राज्याभिषेक दिन हर्ष सं गद्गद होइत छल . मुदा प्रत्येक प्रकरणक बीच  एकाध टा एहन स्थल अबस्से अबैत छलैक जखन लोक कें राम-लक्ष्मणक पयरपर अठन्नी-चौअन्नी चढ़ेबाक अवसर भेटैत छलैक . मुदा नाटक कम्पनीले टाका उगाहबाक असली अवसर अबैत छलैक रामलीलाक इतिश्री, राज्यभिषेकक खेलाक पछाति. राज्याभिषेकक पछाति  सम्पूर्ण नाटक-मंडली, राम-लक्ष्मण सीता आ हनुमानकसंग द्वारिए- द्वारि भरि गाम बूलैत छलाह. आइ-माइसं ल कय खर-खबासिन धरि, जकरा जतेक विभव होइक, लोक 'भगवान'कें टाका-पैसा चढ़बइत छलनि, भक्ति पूर्वक पूजा-अर्चना करैत छलनि . पछाति जं गौआं लोकनिक आग्रह भेलनि तं नाटक-मंडली आओर किछु दिन गाममें रहि  सामाजिक नाटक सभक मंचन करथि , जकर चर्चा पहिनहु केने छी. खासकय राजा हरिश्चंद नाटकमे आँचर पसारि, भीख मंगइत  सैव्याक दृश्य देखि लोक जतबे द्रवित होइत छल, भीखमें ततबे बेसी पैसा चढ़इक आ तें बिलखइत सेवयाक ओहि दृश्यकें  ततबे लम्बा कयल जाइक जाहिसं भीखले आँचर ओड़ने, सैव्याक आँचर कैंचासं लत भ जाइनि .कोनो-कोनो नाटकमें गौआं युवक लोकनि कें सेहो अभिनय करबाक अवसर भेटनि .मुदा खिसा ओत्तहि नहिं खतम होइक. जखन नाटक कम्पनी गामसँ चल जाइक तखन कतेको मासधरि स्कूलक  चटियासब टिफ़िन ब्रेकमें रामायणक पात्र बनय आ अपन-अपन ग्रुपमें नाटक करय . ताहिमे राम-लक्ष्मण-हनुमान बनबाले सब तैयार. मुदा, राक्षस के बनत !कोन बहिन अपन भाइकें मृत्युक अभिनय करय देतैक !! नेना लोकनिपर नाटकक असरिक एकटा कारण रहैक : बेसी काल नाटक-कम्पनीक पड़ाव स्कूलक लगक फील्डमें , पीपरक गाछ तर, वा फुलबारिक बीचहिमें होइक. एहन ठाम नाटककार लोकनि कें अरण्य वा अशोक वाटिका बनेबाले गाछ-वृक्षक ताकय नहिं पड़नि. हनुमानजी सहजतासं मंचपर सं गाछ सबहक डारिपर वा नवगछुलीक फेंडसबपर छरपथि आ नेना-भुटकाक कौतुहलक पात्र बनथि. लक्ष्मणकें पाताल ल जयबाले, सुरंग बनयबालक हेतु  अहिरावणकें लगेमें हल्लुक माटि भेटि जाइनि. संगहिं, इजोरिया रातिमें लोककें लगहिंक मंदिरक चबूतरापर बैसि रामलीला देखब सुलभ भ जाइक.          

Wednesday, May 13, 2015

सिन्धुसं सागरधरि, असम सं ओखाधारि




 ई संस्मरण किएक 


संस्मरण की थिक ? किछु इतिहास आ किछु लेखा जोखा . मनुक्ख सं समाज बनैछ . आ समाजक इतिहास, देश-दुनियाक इतिहास होइछ. तें मनुक्खक इतिहास,  वृहत इतिहासक आधारशिला होइछ. मनुक्ख के छलाह . ओ समाजले की-की केलनि, ई  सब प्रश्न व्यक्तिक जीवन कें सामाजिक सार्थकता प्रदान करैछै. मुदा जं कोनो मनुख्यक जीवन सार्वजनिक हितक नहिंओ होइक तथापि 'मानुस जनम अनूप' तं थिकैक. तें अदनो मनुक्खक जीवन समाजक निरंतर गतिमान धाराक जल तं थिकैके. भले एक बुन्न जल, वा एकटा जिनगी क कोनो अपन स्वतंत्र अस्तित्व नहिं होइक. मुदा, बूंदे- बूंदे सं समुद्र तं बनैछ . अस्तु, हम अपन अनुभवकें मोन पाड़बामें प्रवृत भेलहुँ-ए.
हमरा लोकनिक जन्म, सद्यः प्राप्त स्वतन्त्रताक आलोक में भेल छल . देशमें नव स्फूर्ति आ आशा जागल छलैक. क्रमशः की भेलैक से सर्वविदित अछि. फलतः, आब स्वतंत्रताक 68 वर्षक पछाति, लोकक मन में निराशा आ अविश्वास जडि जमा चुकल छैक . एतबे दिन में आशा निराशा में कोना बदलि गेलैक ? मनुष्यमें एहन कोन परिवर्तन भेलैये जे लोकके समाज आ संविधान पर सं विश्वास उठि गेलैये. एहि  देशकर ओहि  वर्ग, जकरा पर पहिने ककरो अविश्वास नहिं छलैक ओकर विरुद्ध  अविश्वासक बीआ रोपबाक प्रयास भ रहल अछि. एहि सब अभियान सं समाजपर कोन केहन  असरि पड़तैक से सोचबाक विषय थिक . तथापि, हम भारतेंदु हरिश्चंदकेर ओहि उक्ति सं सहमत नहिं छी जाहिमे शताब्दी पूर्व ओ कहने रहथिन:
सब भांति देव प्रतिकूल एहि नाशा, 
 अब तजहु वीरवर भारत की सब आशा
हमरा लोकनि सफल हयब. एखनहु पूर्ण आशा अछि. हमर अपन जीवन यात्रा मिथिलाक विशुद्ध देहात सं आरम्भ भेल छल . पढ़लहुं चिकित्सा शाश्त्र आ अंततः सेना चिकित्सा कोर केर सेवाक प्रसादें चरितार्थ भेल भेल, 'अग्रतः सकलं शाश्त्रं, पृष्ठतः सशरं धनुः'. फलतः, भारतीय  सेनाक नौकरी आ असैनिक सेवाक प्रतापें  सम्पूर्ण देशकें लगसं देखबाक अवसर भेटल. अनुभव कहैत अछि , किछु-किछु तं  सम्पूर्ण भारतमें एके रंग छैक मुदा किछु-किछु सर्वथा भिन्न . भाषा सब ठाम भिन्न-भिन्न छै , मुदा, गरीब-गुरुबाक  स्वरुप एकेरंग . आधारभूत संरचना आ प्रशासन में भिन्नता छैक, मुदा राजनेता आ भ्रष्टाचारक  एकेरंग. हवा -पानि में भिन्नता छै , मुदा देवी देवताक स्वरुप आ धर्मभीरुता एकेरंग . मुदा एकटा रोग सब ठाम एकेरंग पसरि  रहलइये : सार्वजानिक चिकित्सा व्यवस्था में सरकारक घटैत भागीदारी आ प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाक प्रसारक संग बढ़इत बेईमानी . ई परिवर्तन आम आदमीक जीवन कें दुस्कर तं बनाइये रहलैके, लोक कें आब वकीले- मुख़्तार जकां डाक्टर सं भय होमय लगलइये. मुदा करत की ? थिकाह तं  'वैद्यो नारायणो हरिः' ! मुदा, लगैत अछि, कनिएक दिन में वैद्य आ बनियाँ एके पांती में बैसाओल जयताह से असम्भव नहिं . पहिनहु  तं केओ कहनहिं  छथिन:
यमः हरति प्राणाः , वैद्यो प्राणाः धनानि च !
अस्तु,  वैद्यकें अहाँ यम बूझी  वा हरि, आब हमरासन सैनिक-वैद्यक  जीवनक अनुभव सुनू . हमर अनुभव जतय अहाँक अनुभवक संग पूरैत अछि , ओ समाजक सामान्य अनुभव भेल . जतय हमर आ अहाँक अनुभव फूट -फूट बाट धेने आगू बढ़इत अछि, कहबाले हमरालग किछु नव अवश्य अछि. सएह थिक एहि संस्मरणक सार्थकता. विश्वास राखू प्रत्येक अंकमें किछु रोचक अवश्य भेटत
     

Monday, May 11, 2015

पत्रकारिताक लक्ष्मणरेखा:अति सर्वत्र वर्जयेत

हम पत्रकार नहिं , मुदा ओहि पीढ़ीक नागरिक अवश्य छी जहिया पत्र-पत्रिका सूचना आ मनोरंजनक एकमात्र श्रोत छलैक . तहिया, ने इन्टरनेट छलैक, ने फेसबुक आ ने Whatsapp. फलतः, लोक सड़क पर माथ ऊपर उठाकय चलैत छल, आ पत्र-पत्रिका सामान्य-ज्ञान बढ़ेबाले आ नीक भाषा सिखबाले पढ़इत  छल . आब टीवीक प्रचार , चौबीस घंटा चैनेलक अष्टयाम आ इन्टरनेटक प्रतापें ने युवक वर्ग समाचारपत्र पढ़इत छथि  आ ने समाचार पत्रक भाषा अनुकरणीय रहि  गेलैये . उपर सं , समाचारक परिभाषा सेहो बदलि  गेलैये . अब प्राइम टाइम न्यूज़ केर विषय होइछ ,टीवी प्रोग्राम 'नच बलिये' में के जीतल, IPL मैच ले कोन खेलाड़ी कतेक में बिकयलाह ,  सासु-पुतहु टीवी सीरियल में ककर विवाह ककरा सं हेतैक वा ककरा सं के तलाक लेलक . पटनाक गंगापुल ध्वस्त भ जाऊ , कमला कातक लोक दहा जाओ . मुदा, प्रतिष्ठित अंग्रेजी चैनल पर चिकरा-चिकरी हयत IPL केर चेयरमैनशिप केर राजनीतिपर . कतेक बेर तं अंग्रेजीक चारिटा प्रतिष्ठित  टीवी चैनलकें बदलि लियअ, अहाँकें भले घुरमा लागि जाय, मुदा, सब ठाम एके विषय पर वाद-विवाद .  जेना , समाचारक अकाल पडि गेल होइ ! आखिर एकटा शहर दिल्ली . ओतय बैसल-बैसल कतेक समाचार भेटत ! ताहि पर उपरौंज , TRP आ ब्रेकिंग न्यूज़ ! गडकरी कहलखिन, ओ अपन फुलबारी अपने मूत्र सं  पटबैत छथि . पटबथु ! मुदा, अद्भुत गप्प जे इहो ब्रेकिंग न्यूज़ भ सकैत अछि ! जखनो पत्रकार, पीड़ित आ शोक संतप्त परिवार  सं पूछैत छलैक , 'आप का लड़का इस हादसे में मारा गया है आपको कैसा लगता है ' हमरा बड अनसोहांत लगैत छल.
पत्रकारक अभिप्राय, जे उत्तर भेटतनि- ' हमको भांगड़ा करने का मन होता है !'
हृदयहीनताक एहन उदाहरण हमरा लोकनि प्रतिदिन  दिन देखैत छलहु आ दुखी होइत रही . मुदा, suited-booted रोबोटनुमा पत्रकार लोकनि किएक सीख  लेताह . संयोगसं, नेपाल में विगत हफ्ताक भयानक भूकंपक पछाति सब पत्रकार लोकनि काठमांडू जुटलाह.  मुदा, बहुतो पत्रकारकें ई बुझबामें नहिं अयलनि जे इ भूकंप एकटा भयंकर मानवीय त्रासदी छल. ततबे नहिं, नेपाल एकटा सार्वभौम देश थिक आ  नेपाली नागरिक अपन देशक स्वतंत्रताक प्रति  अत्यंत संवेदनशील छथि . फलतः,  जखन भूकंप पीड़ित, शोक-संतप्त नागरिक सबसं sound-bite लेबाक आ breaking न्यूज़ फाइल करबाक जोश में पत्रकार लोकनि आदतन लक्ष्मण रेखा पार करय  लगलाह तं नेपालक नागरिक हिनका सब कें नेपालक सीमापार वापस  हेबाले बाध्य क देलकनि . पत्रकार लोकनिक अशोभनीय व्यवहारसं  भारतक प्रतिष्ठाके सेहो धक्का लगलैक. मुदा आब तकर की उपाय ?   तथापि ई दुःखद प्रकरण  भारतीय पत्रकारिता आ Visual Media क नेता लोकनिले  आत्ममंथनक विषय  थिक !

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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