Wednesday, February 2, 2022

एक अविस्मरणीय घटना

 

                                                            एक अविस्मरणीय घटना

भारतीय सेना में यह कहावत आम है: ‘जब खाने का मौका मिले खा लो, जब मौका मिले सो लो. क्या पता परिस्थिति कब एकाएक बदल जाए. इसके अतिरिक्त, नौकरी के कई और गुर लोग धीरे-धीरे नौकरी के दौरान सीखते थे. इस में से एक यह भी था कि जब छुट्टी मिले, भाग लो. क्योंकि सेना में यह कहावत आम था कि छुट्टी एक सुविधा है, अधिकार नहीं. इसलिए, सुविधा मिली तो भोग लो ! और उन दिनों इस सुविधा को भोगने के लिए फौजी हर जहमत उठाने को तैयार होते हैं. कारण, छुट्टी मिल भी गई तो क्या ? जरूरत होने पर घर से वापस भी बुलाया जा सकता है, और बुलाया जाता है. पर मैं जिस छुट्टी की बात कर रहा हूँ वह यादगार छुट्टी थी ! क्यों ? वही तो इस वाकये के अविस्मरणीय  होने का कारण है !

जून या जुलाई का महीना, 1984 ई. मैं उस समय आसाम के एक दूरस्थ इलाके में, दूमदूमा टाउन नामक स्थान में पदस्थापित था. निर्धारित ‘लीव-प्लान’ के  मुताबिक मैं दो महीने की वार्षिक छुट्टी पर जाने को तैयार था. वैसे भी घर जाने के लिए कौन सी तैयारी चाहिए ! केवल, डाक्टर का ‘रिलीफ’- यानी मेरी जगह पर दूसरे मेडिकल ऑफिसर- को समय से पहुँचना आवश्यक था. और मेरे ‘रिलीफ’ मेरी छुट्टी के दो महीनों के लिए वहाँ पहुँच चुके थे.

 परन्तु, मेरी छुट्टी आरम्भ होने के ठीक पहले एकाएक ब्रह्मपुत्र में भीषण बाढ़ आ गयी. बाढ़ ऐसी थी कि गुवाहाटी और न्यू बोगाइगाँव के बीच सैकड़ों किलोमीटर दूर तक रेल लाइन बह गयी थी. फिर भी, दूमदूमा टाउन और गुवाहाटी के बीच रेल यातायात जारी था. सो मैं चल पड़ा और गुवाहाटी तक पहुंचा. उन दिनों दूमदूमा से दरभंगा पहुँचने में तीन रात,तीन दिन लगते थे ! गुवाहाटी के आगे रेल यातायात बंद था. बहरहाल, ब्रह्मपुत्र पार करने के लिए करीब डेढ़ सौ किलोमीटर की सड़क यात्रा के बाद नाव से नदी पार करने विकल्प था. ब्रह्मपुत्र पार कर आगे फिर न्यू बोगाइगाँव तक पचास-पचपन किलोमीटर की सड़क यात्रा, और फिर पटना की रेल यात्रा.

आम अनुभव  है, जब भी कोई आफत आसमानी आती है, प्रभावित लोग उससे जूझते हैं. किन्तु, अवसर की ताक में बैठे लोग उस प्रतिकूल अवसर में भी अपने लिए लाभ का अवसर ढूंढ लेते है; किसे याद नहीं होगा बिहार के बदला घाट की रेल दुर्घटना. उस दुर्घटना में करीब आठ सौ यात्री के साथ सवारी गाड़ी बागमती में गिर गयी थी. किन्तु, ऐसी आकस्मिक त्रासदी में भी जिन्दा बचे यात्रियों के साथ लूटपाट की घटना हुई थी. बहरहाल, मैं गुवाहाटी से गोआलपारा की यात्रा के लिए गुवाहाटी में बस में सीट लूटनेवाले रंगदार को दस रुपये दिए और खिड़की के पास की  एक सीट को अपने लिए रिज़र्व कर सीट पर बैठ गया.

चित्र 1 : ब्रह्मपुत्र  तिब्बत से बांगला देश तक 

             अब हम असम राज्य के  नक़्शे पर नजर घुमाएँ. [ चित्र 1 ] आप देखेंगे कि तिब्बत से आती हुई ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करने के पहले अरुणाचल पहाड़ों के ऊपर से गुजरती है. फिर, पहाड़ की उचांई से सियांग और दिहांग नदी के नाम से उतरने के बाद, इसमें दिबांग और लोहित नदियाँ मिलतीं हैं. लोहित नदी के मिलने के बाद असम के सदिया नामक स्थान से इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है. सदिया से बंगाल की खाड़ी तक की ब्रह्मपुत्र की करीब नौ सौ मील लम्बी यात्रा में हिमालय से उतरती हुई आधा दर्ज़न से अधिक नदियाँ इसमें मिलती जातीं है. फलतः, पूरे असम में पूरब से पश्चिम तक बहती  ब्रह्मपुत्र, राज्य को लगभग बीचोबीच उत्तर एवं दक्षिणी भागों में विभक्त कर देती है.  पूरे राज्य से होकर बहती इतनी लम्बी नदी को पार करने के लिए उन दिनों एकमात्र रेल-पुल गौहाटी में पांडुघाट और अमीनगाँव के बीच था ! बाढ़ के कारण उस समय उस इलाके से रेल यातायात बंद था.

चित्र 2 : ब्रह्मपुत्र असम से बंगाल तक 

अस्तु, हमलोग बस से सीधा करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गोआलपारा को चले. गोआलपारा में नाव से ब्रह्मपुत्र पार कर बड़े रेल जंक्शन न्यू बोंगाईगाँव पहुँचकर ट्रेन पकड़ना था. इसलिए, पहले गोआलपारा और न्यू बोंगाईगाँव के बीच की पचास किलोमीटर से दूर की यात्रा हमने ट्रक पर तय की. न्यू बोंगाईगाँव के आगे बंगाल और बिहार में रेल यातायात चालू था.

उस दिन जब हम न्यू बोंगाईगाँव रेलवे स्टेशन पहुंचे, शाम का कोई चार बज रहा होगा. खुशी की बात थी कि दिल्ली की ओर जानेवाली तिनसुकिया मेल न्यू बोंगाईगाँव रेलवे स्टेशन पर आगे जाने को तैयार खड़ी थी. अर्थात् जो तिनसुकिया मेल गौहाटी से दिल्ली के लिए चलती, अब बाढ़ के कारण न्यू बोंगाईगाँव से चल रही थी. बाढ़ हमारे पीछे छूट चुकी थी. किन्तु, रेल यातायात तब भी बिलकुल अस्तव्यस्त था. बाढ़ से पहले का टाइम-टेबुल अभी बेकार था.  सो, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी थी. पर कब चलेगी, हमने इसकी कोई परवाह नहीं की. ट्रेन का मिलना काफी था. फलतः मैंने फर्स्ट क्लास की एक बोगी में अपना सूटकेस रखा, बर्थ पर अधिकार जमाया और खुश हो गए. अब टिकट की ज़रुरत थी. टिकट के लिए मुझे मिलिटरी वारंट दे कर टिकट लेना होगा. अस्तु, मैंने सहयात्री के जिम्मे सूटकेस को छोड़कर रेल ओवरब्रिज के उस पार मिलिटरी के एम सी ओ (Movement Control Officer ) के ऑफिस की ओर चल पड़ा. किसी कारणवश मुझे टिकट नहीं मिल सका और मुझे ट्रेन की तरफ आने लेने में कुछ वक्त लगा. पर जब मैं वापस प्लैटफॉर्म पर पहुँचा तो देखा कि गाड़ी जा रही थी ! मैंने किसी से पूछा, ‘ तिनसुकिया मेल ?’

उन्होंने जवाब दिया, ‘वो जा रही है !’ मेरी परिस्थिति कैसी हुई उसका अनुमान लगाना कठिन नहीं. दौड़ कर ट्रेन पकड़ना असंभव था.

उस समय सूर्यास्त हो चुका था. अँधेरा होने ही वाला था. मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था. मेरे पास रेलवे वारंट था. कुछ, सौ-दो सौ रुपये थे. पीने का पानी भरने के लिए  हाथ में प्लास्टिक का एक बोतल था. मैंने सोचा था, वापसी में पानी भर लूँगा.खाना तो साथ ही था. उन दिनों रेलवे स्टेशनों पर बोतल-बंद पीने का पानी बिकना शुरू नहीं हुआ था.

फिलहाल, इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए मैं तुरत स्टेशन मास्टर के पास जाकर अपनी समस्या सुनायी. उन्होंने कहा ‘ अगला स्टेशन कोकराझाड़ में तिनसुकिया मेल का केवल दो मिनट का स्टॉपेज है. अँधेरा हो चुका है. अभी कुछ करना असंभव है.’

मेरे पास अनेक समस्याएँ थी. उसमे घर तक जाना सब से छोटी समस्या थी. असली समस्या थी कि मैंने उस यात्रा में वह गलती की थी जिसके विरुद्ध फौजियों को हज़ार हिदायतें दी जाती हैं : अर्थात् अपना पहचान-पत्र हमेशा अपने साथ रखें ! पहचान-पत्र कभी भी सूटकेस और सामान में तो बिलकुल नहीं रखें. किन्तु, फौजियों के लिए पहचान-पत्र की सुरक्षा सर्वोपरि होती है. इसलिए, कई बार कानून का उल्लंघन हो जाता है.  और मैंने भी इसका उल्लंघन किया था. जाहिर है, पहचान-पत्र खोना दण्डनीय अपराध है. और जितना बड़ा ओहदा, दण्ड उतना ही सख्त. अर्थात् अफसर के मामले में कम से कम छौ महीने की वरीयता तो जायेगी ही ! यह सबसे बड़ा भय और अप्रतिष्ठा की बात थी. इससे अफसर, जो दूसरों के लिए उदहारण माना जाता है, लापरवाह सिद्ध होता है ! किन्तु, अभी कोई उपाय नहीं था.

बहरहाल, मैं अगली उपलब्ध गाड़ी से दरभंगा चल पड़ा और घर पहुंचा. नौकरी की शुरुआत के छौ महीने के भीतर ही पहचान-पत्र खोने की बात से माहौल मातमी हो गया था. सूटकेस में जो उपहार लेकर चला था, सब खो चुका था. मेरे सामान में वो खिलौने भी थे जो मैंने अपनी छोटी-सी बच्ची के लिए खरीदे थे. उसके अलावे सूटकेस में  पैक्ड डिनर, करीब हज़ार रुपये, अपने उपयोग के कपड़े, एक-दो बोतल व्हिस्की, मेरी डायरी, सब कुछ थे. किन्तु, मुझे चिंता केवल पहचान-पत्र की थी. वह सरकारी संपत्ति थी. सेना-सेवा की अवधि में प्रति माह उसकी विधिवत जांच होती है, और उसका रिकॉर्ड रखा जाता है. अभी सरकारी संपत्ति मेरे हाथों गम हो गयी थी. अतः, मैंने पुलिस स्टेशन जाकर एफ आई आर लिखबाया. उसकी प्रतिलिपि ली और डरते-डरते असम स्थित अपने यूनिट के कमान अधिकारी को चिट्ठी लिख डाली. वहाँ से जवाब आया; छुट्टी समाप्त होने के बाद वापस आयें.’ किन्तु, उससे मेरा भय समाप्त नहीं हुआ. यूनिट पहुँचने पर कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी और आगे की फजीहत होनी ही थी. तथापि, तनाव में छुट्टी के तीन-चार दिन दरभंगा में गुजारने के बाद मैं अपने गाँव चला गया.

तीन-चार दिनों के बाद जब मैं गाँव से दरभंगा वापस आया तो मुझे देखते ही सभी मुस्कराने लगे. मैं तो अभी भी अवसाद में था. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. बाद में बातें खुली. मेरा सूटकेस जो न्यू बोंगाईगाँव स्टेशन में तिनसुकिया मेल में छूट गया था वह, मय सामान, दरभंगा पहुँच चुका था !

यह अविश्वसनीय था !

हुआ ऐसा था कि मैंने किसी सहयात्री को बताया था कि मुझे पटना जाना था. मेरे सूटकेस पर लगे टैग से मेरा नाम और फौजी परिचय भी स्पष्ट था. अस्तु, पटना उतरनेवाले किसी मेहरबान सहयात्री ने मेरा सामान यह सोच कर उतार लिया था कि शायद वह पटना में ‘इस कैप्टेन के एन झा’ का कोई अता-पता लगा सकेंगे. हुआ भी ऐसा ही. पटना में उस व्यक्ति ने किसी कैप्टेन झा के गुमशुदा सामान की चर्चा हमारी पत्नी के चाचा जी से की. चाचा जी उस समय पटना में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी थे. उन्होंने जब समान अपने पास मंगबाया तो सब कुछ आईने के तरह साफ़ हो गया; कैप्टेन झा साहब दामाद निकले ! उन्होंने ही हमारा सामान हमारे पास दरभंगा भेज दिया था ! जय हो !

मेरा सामान सुरक्षित मुझ तक पहुँचने से मनुष्य के स्वभाव के मूलभूत गुणों में मेरी आस्था दृढ़ हुई. मैं आज भी मनाता हूँ, दुनिया में बुरे के बनिस्बत अच्छे लोगों की संख्या ज्यादा है.

यह घटना अविस्मरणीय है. हाँ, इस वाकये के बाद मेरे अनेक बारमेरे  गुमशुदा सामान मेरे पास वापस आते रहे हैं ! पर वे बातें, फिर कभी !!

हाँ, उस दिन मेरे सामान आने की सबसे ज्यादा खुशी शायद मेरी बेटी सुष्मिता को हुई थी, कारण सूटकेस खुलने के बाद सबसे पहले उसमे से उसका लियो-टॉय का रंगीन ‘गन’ निकला था ! और उसे पुनः विश्वास हो गया कि  ‘दादू’ के पास ‘गन’ (जिसे वह उस समय ‘दन’ कहती थी) होता है !         

 

Monday, January 24, 2022

मैथिली साहित्यक विरल विभूति : लिली रे

 

मैथिली साहित्यक विरल विभूति : लिली रे *

श्रीमती लिली रे मैथिली भाषाक विरल विभूति छथि. ई बीसम शताब्दीक मध्यहिंसँ  अपन कथा, आ पछाति उपन्याससँ, मैथिलीक भंडार भरलनि. मुदा, विडंबना एहन जे मैथिली साहित्यक दृष्टि हिनका पर बिलम्बसँ  पड़लैक. परिचित होइतो ई बहुत दिन धरि अपरिचिते-जकाँ रहलीह. 1981 में मैथिली अकादमी, पटना जखन लिली रे क उपन्यास ‘मरीचिका’ प्रकाशित कयलक तं मैथिली अकादेमीक तत्कालीन सचिव, श्रीकान्त ठाकुर एहि बातकें स्वीकार करैत प्रकाशकीय में लिखैत छथि:                                                                                                  

‘श्रीमती लिली रे मैथिली जगत में बहुत दिन धरि अज्ञात जकाँ रहलीह, मुदा आब के नहिं जनैत छनि.’ 1      

1982 में लिखल ओहि प्रकाशकीय केर करीब चारि दशकक पछातिओ आइ जं Google पर ‘Lily Ray, the Maithili writer ’ ताकी तं साहित्य अकादेमीसँ मैथिली पुरस्कृत लेखक लोकनिक सूची में नामक अतिरिक्त लिली रे क संबंध में आओर किछु नहिं भेटत. एहना स्थिति में आवश्यक थिक, मैथिलीक नव पीढ़ी हुनक रचना-संसारसँ  परिचित होअए, लिली रे क रचना-संसारक सम्यक एवं निरपेक्ष मूल्यांकन हो. 

प्रश्न उठैछ, श्रीमती लिली रे सन विभूतिक उपस्थितिकें अकानबा में मैथिली साहित्य बिलम्ब किएक केलक ? मैथिली साहित्यक एहन  विभूति  एतेक दिन धरि साहित्यकार लोकनिक ‘ blind-spot’ पर किएक रहलीह ? जाहि वर्जित सामाजिक मुद्दाकें लेखनक केंद्र विन्दु में अनबाक कारण मैथिलीक किछु साहित्यकारलोकनि  क्रांतिकारी मानल गेलाह, ओहने प्रश्न जखन ‘एक नारी लेखक’ द्वारा उठाओल गेल, तं, ओकर ताक-हेर  किएक नहिं भेल ? यदयपि, ओहि समयक चर्चित हस्ती लोकनि हिनक ओहि  ‘चर्चित कथा’क  स्वागत केने रहथिन. तें, उपरोक्त प्रश्नक उत्तर देब आवश्यक तं अछिए, पछाति, इहो देखल जयबाक चाही जे लिली रे एतेक दिन मैथिली साहित्यक मुख्यधारासँ बाहर किएक रहलीह, ‘मरीचिका’ प्रकाशनक चालीस वर्ष पछातियो मैथिली साहित्य हिनक दृष्टिकें नव प्रयोगक सूत्रधारक  रूप में किएक नहिं रेखांकित करैछ ? तें आवश्यकता अछि, जे एहि संक्षिप्त लेखमें हम एही सब विन्दु पर विचार करैत छी. संगहि, लिली रे क रचना-संसार पर विहंगम दृष्टि दैत, मैथिलीक हेतु हुनक महत्व कें रेखांकितक करबाक प्रयास करैत छी.

लिली रे क जड़ि मिथिला में छनि, किन्तु, लिली रे सदा मिथिलासँ दूर रहलीह. तें, की मिथिलाक ‘पंचकोसी’सँ हुनक दूरी हुनका मैथिली साहित्यक मुख्य धारासँ दूर रखबाक कारण सिद्ध भेल ? श्रीमती लिली रे क  मैथिली साहित्य-समाजसँ  सोझ सम्पर्कक अभावक एक रोचक कथा श्री भीमनाथ झा कहलनि. गप्प वर्ष 1982 क थिकैक. ओहि वर्ष श्रीमती लिली रे कें ‘मरीचिका’ नामक उपन्यास पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटल रहनि. संयोगसँ ओहि वर्ष जाहि दिन दिल्ली में साहित्य अकादेमीक पुरस्कार वितरण समारोह रहैक ओहिसँ ठीक एक दिन पूर्व बिहारक मैथिली अकादेमी, पटना में श्रीमती लिली रे कें  सम्मानित करबाक आयोजन केने छल. मुदा, पटनाक आयोजनक दिन धरि लिली रे कें  साहित्य अकादेमी, दिल्लीक  पुरस्कार वितरण समारोह दए बूझल नहिं रहनि. जखन मैथिली अकादेमी, पटनाक समारोह में भीमनाथ झा अपन वक्तव्य में कहलखिन जे, ‘ ई कतेक गौरवक विषय थिक जे काल्हि श्रीमती लिली रे साहित्य अकादेमीसँ  पुरस्कार ग्रहण करतीह आ आइ ई हमरा लोकनि बीच छथि’ तं श्रीमती लिली रे स्वयं चकित भए गेलीह. पछाति, ओही सूचनाक आधार पर ओ पुरस्कार ग्रहण करबाक हेतु अगिला दिन दिल्ली पहुँचलीह !

श्री भीमनाथ कहैत छथि, जे लिली रे क बहुचर्चित कथा ‘ रंगीन परदा’ क चर्चा मैथिली में पहिनहुँ  खूब भेल रहैक’. मुदा, छद्मनामक लेखिका ‘कल्पना शरण’क कारण तेना भ’ कए ओ चिन्हार नहिं भए सकलीह. ओ आगू कहैत छथि, जे जखन 1979 में ‘मिथिला मिहिर’ में लिली रे क उपन्यास ‘ पटाक्षेप’क धारावाहिक प्रकाशन भेल तं सर्वप्रथम ई ‘प्रकाश में आयल ’ भेल जे ‘कल्पना शरण’ वस्तुतः लिली रे थिकीह !

मैथिल समाज सनातनी आ परिवर्तनक प्रति उदासीन अछि, से सर्वविदित अछि. परिवर्तनक स्वर मिथिलामें बड्ड  बिलम्बसँ  प्रतिध्वनित होइछ. संगहि, ‘उच्च जमींदार परिवार आ  प्राचीन सनातन परम्परा’क प्रतिनिधि होइतो लिली रे केर  जीवनधारा ‘अधुनातन’ छनि, आचार विचार ‘उदारतम’ छनि एवं ओ ‘विप्लवी युगधर्मक प्रत्यक्ष दर्शन-स्पर्शनसँ बनल एक अनुपम व्यक्तित्व’ थिकी.2. अर्थात्, मैथिल- समाजक उपज, लिली रे अपन जीवन पद्धति आ मानसिकता में समकालीन मैथिल समाजसँ किछु अर्थ में समानता रखितो, जीवन पद्धति आ विचार में ओहिसँ सर्वथा भिन्न छथि. कल्पना शरणक छद्मनामसँ ‘वैदेही’ में 1956 में प्रकाशित हुनक मैथिली  कथा ‘रंगीन परदा’, एकर प्रमाण थिक. विचार में ई कथा लीकसँ प्रायः ओतबे हंटल छल, जतबा ‘यात्री’क पारो रहनि, वा आन परम्परा-भंजक चर्चित  लेखन सब छल. तथापि, किएक ‘पारो’  वा आन समकालीन ‘पुरुष’ लेखक लोकनिक लेखन क्रांतिकारी मानल गेल आ ‘रंगीन परदा’क लेखककें तेना भ’ कए तकबाक प्रायः कोनो प्रयासो नहिं भेल ? की ई नव स्वर, नव धाराक प्रति मैथिली साहित्यक उदासीनताक लक्षण थिक ? वा, ई साहित्यमें लिंग-भेदक उदहारण थिक जखन कि ‘रंगीन परदा’कें स्व. ललित ‘ मैथिली कथाक माइलस्टोन’ क संज्ञा देने रहथिन.

 

साहित्य में लिंग-भेद  आ मैथिली

साहित्य में लिंग-भेद पर प्रकाश दैत लीसल गेकर नामक लेखिका लिखैत छथि, ‘1900 सँ 2008 धरिक प्रकाशित  पैंतीस लाख अंग्रेजी पुस्तक सबहक एकटा विश्लेषण एहि धारणा कें पुष्ट करैत अछि जे साहित्य में लिंग भेदक जड़ि दूर धरि छैक !’2  वर्ष 2018 में ‘स्क्रॉल’ नामक पत्रिका में लिखैत जेनी भट्ट नामक लेखिका कहैत छथि, ‘ यद्यपि, भारतीय भाषा में  लिंग-भेद पर आंकड़ाक अभाव छैक, तथापि, एहि में दू मत नहिं जे प्रकाशन-उद्योग पुरुष लोकनिकें केवल प्रधानताए टा नहिं दैछ , प्रत्युत, पुरुष लोकनिक विचारधाराक समर्थनो करैछ.4   तें, की एहि धारणाक कोनो आधार अछि जे मैथिली साहित्यो में आन नारी लेखक सबहक संग लिली रे सन साहित्यकार सेहो लिंग-भेद  शिकार छथि ?  मैथिलीक वरिष्ठ कथाकार नीरजा रेणुक कहैत छथि, ‘मैथिली में महिला साहित्यकार लोकनिकें दोयम दर्जाक साहित्यकार जकाँ  बूझल जाइत छनि, आ सभा-सम्मलेन में ओ  लोकनि ‘ अवांछित तत्व’ जकाँ बूझल जाइत छथि.’ मुदा, ओ मानैत छथि, ‘परिस्थिति बदलि रहलैए’. श्रीमती लिली रे क संबंध में हुनक कहब छनि जे ‘लिली रे  क ‘रचना पाठकक हाथ में देरी अएलैक’.

प्रतिष्ठित साहित्यकार केदार कानन साहित्यमें लिंग-भेदसँ  सहमति व्यक्त करैत कहैत छथि, ‘ई 80 % सत्य थिक जे मैथिली मुख्यधारा नारी लेखनक प्रति उदासीन अछि’. ओ इहो कहैत छथि जे, ‘ई मैथिली साहित्यक विसंगति थिक जे लिली रे क मैथिली में जाहि प्रकारक योगदान छनि हुनका ततबा श्रेय नहिं भेटलनि.’ नारि-लेखनक प्रति ‘मैथिली साहित्यक मुख्यधारा उदासीन अछि’ से कथाकार-कवि सुस्मिता पाठक सेहो मानैत छथि. हुनकर कहब छनि जे हुनकर लेखन पर ‘कदाचिते कोनो प्रतिक्रिया अबैत छनि. आ अबितो छनि तं सोझ नहिं, हुनक पतिक माध्यमसँ !’

लिली रे क रचना

लिली रे छोटे वयससँ कथा लिखय लागल रहथि; हिंदी आ मैथिली दुनू में. ‘रोगिणी’ नामक कथा मैथिली में प्रायः हिनक पहिल प्रकाशित कथा थिकनि. एकर प्रकाशन वर्ष 1955 थिक. ई कथा एकटा मरणासन्न बाल विधवा, एक टा डाक्टर, आ एकटा बरख दसेक बालकक चरित्र पर आधारित छोट-सन कथा थिक. एहि में निर्धन बाल-विधवाक जीवन आ विवशताक चित्रणक संग  एकटा पैघ सामाजिक सत्य सेहो सन्निहित छैक. तहिया ई कथा पाठककें आकृष्ट केलकनि कि नहिं से कहब कठिन. मुदा, कथाक शैली सधल छैक, कथ्य सोझ छैक. ई कथा पढ़ि हमरा हमरा लेखिका एम. एम. केय केर प्रसिद्ध उपन्यास The Far Pavilions क एकटा संदर्भ मन पड़ैछ. ओहि पोथीमे एकटा नारि पात्र कथा-नायकसँ  कहैत छथिन:

                                    “.... पुरुष जाति बीजक प्रति लापरवाह होइछ. हुनकालोकनि कें वेश्या वा दुश्चरित्र नारि संग सम्भोग में कोनो दुविधा नहिं होइत छनि. (मुदा) कहियो ई नहिं फुरैत छनि, जे एहि संयोगक की परिणाम हेतैक..... ततबे नहिं, पुरुषलोकनि अपन इच्छाक अनुकूल संतानकें चुनबाक अधिकारकें सुरक्षित रखैत छथि. मुदा, जं हम अहाँक संग अजुका सहवाससँ गर्भवती भ’ जाइ तं हमरा तकर भान पछातियो होइत रहत. लम्बा अवधि धरि हम ओकरा (भ्रूणकें ) अपन शरीर में राखब, ओकर कष्ट सहब, अपन जान पर जोखिम उठायब, आ  ओहि नेनाकें जन्म  देबाक हेतु पीड़ा सहब.” 4

लिली रे नारिक जीवनक एहि यथार्थकें एक छोट कथा में आइसँ पैसठि वर्ष पूर्व ठांहिं-पठांहिं रखने छलीह, जहिया मैथिली साहित्य में ई चर्चाक विषय नहिं छल. ई अद्भुत छल.

 ‘रंगीन परदा’ नामक कथा लिली रे बहुचर्चित कथा थिक, जकर चर्चा उपरो भेल अछि. ई कथा 1956 में ‘वैदेही’क कथा-अंक में छपल छल. ‘रंगीन परदा’क कथाक केंद्र में छथि, पहिनेसँ एक दोसरासँ  परिचित कुमरजी (मोहनजी) आ मालती. जहिया मालती कुमारिए मे अपन पिउसिक ओतय गेल रहथि, कुमरजी (मोहनजी)क  संग अनायास भेंट मे दुनूक बीच परिचय आ आकर्षण भेल रहनि. संयोगसँ, वएह कुमर जी पछाति मालतीक जमाए बनि जाइत छथिन. कतेक वर्ष पछातिक भेंट, मालती आ कुमरजी संबंधकें शारीरिको बना  दैत अछि, आ ओकर ‘रंगीन परदा’ सेहो बनि जाइछ. मुदा, जखन मालतीक पति, आ कुमरजीक श्वसुर महाकान्त, एकाएक हुनका लोकनिकें बतर ‘रंगल हाथ’ पकड़ि लैत छथिन, तं कुमर जी श्वसुरक (महाकान्तक) हत्याकए , साँपक काटब कें अपन श्वसुरक मृत्युक कारण घोषित कए, बेदाग़ बंचि जाइत छथि. मुदा, कुमरजीक पत्नी आ  मालती-महाकान्तक बेटी मरैत-मरैत माएकें ‘पतित’ घोषित तं कए दैत छथिन. तथापि, समाजक नजरि में  ‘परदा’ यथावत् बंचल रहि जाइछ. एहि कथाक चर्चित होइतो तहिया लिली रे तहिया ओतेक प्रसिद्ध नहिं भेलीह, जकर ई हकदार छलीह. किएक ? से सोचबाक थिक.

साहित्यसँ लम्बा अनुपस्थितिक पछाति ई जे रचना ल कए पुनः अएलीह, ओहि दीर्घ कथाक  नामहु छल, ‘अंतराल’.  पछाति उपन्यास ‘ पटाक्षेप’ धारावाहिक रूपें 1979 में ‘मिथिला मिहिर’ में प्रकाशित भेल. ई लोककें आकृष्ट केलकैक.  ‘पटाक्षेप’ उपन्यासक पृष्ठभूमि थिक सत्तरिक दशकमें नक्सलबाड़ी आन्दोलन. शहरी सुशिक्षित अभिजात्य युवक आ सर्वहारा, सब एहिसँ जुड़ल छल. लिली रे के शब्द में ‘आधुनिक युगमे वामपंथी विचारधाराबलाकें बुद्धिजीवीक दर्ज़ा भेटैत छैक.’ 5 संयोगसँ,  नक्सलबाड़ी आन्दोलन लेखकक जीवनकें ‘बड्ड लगसँ स्पर्श कयने रहनि. विषय नव रहैक. लोककें नीक लगलैक. मैथिली नारी लेखन में वर्ग-संघर्ष ताधरि आयलो नहिं छल. फलतः, ‘पटाक्षेप’क कथ्यक नवीनताक कारणें लिली रे अकस्मात् पुनः चर्चित भए गेलीह.

सर्वविदित अछि, पछाति अनेक सामाजिक आ तात्कालिक राजनैतिक परिस्थितिक कारण नक्सलबाड़ी आन्दोलनसँ आन्दोलनकारी लोकनिक मोहभंग  भए गेलनि आ आन्दोलन अन्ततः विफल भेल. ताधरि किछु क्रांतिकारी मारलो गेल छलाह. किछु घरो वापस भेलाह. ओहि घर वापस नक्सली लोकनिमें श्रीमती लिली रे क पुत्र सेहो रहथिन ! अस्तु,’ पटाक्षेप’  व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित ओहि युगक यथार्थ सामाजिक दस्तावेज थिक.

‘पटाक्षेप’क पीठे पर ‘मरीचिका’ आयल. वृहत्  कैनवास पर चित्रित दू खण्ड में विभाजित ‘मरीचिका’ लिली रे क’ magnum opus’ थिक; ई हुनक सबसँ पैघ, सबसँ चर्चित कृति, आ लेखकक रूपमें हुनक दक्षताक प्रमाण थिक.

सत्यतः, ‘मरीचिका’ एक टा  युगीन उपन्यास थिक, जकर एक खण्ड एक राजपरिवार आन्तरिक जीवनकें  चित्रित  केने अछि, तं, दोसर खण्ड, राजाक परश्रयसँ स्वतंत्र, दूर चल गेलि एक  नारिक संघर्ष आ सफलताक गाथा. लिली रे क आनो रचना जकाँ, ‘मरीचिका’ में स्त्री पात्र लोकनि कथाक केंद्र-विन्दु में छथि. पुरुष-पात्र लोकनि अबैत छथि आ चल जाइत छथि. ‘मरीचिका’क पूर्वार्द्धक पारिवारिक ताना-बाना में जं नारि लोकनि परम्परा द्वारा निर्धारित सीमा रेखासँ बन्हलो छथि, तं  ओहू मे आरम्भहिंसँ  नारिक बदलैत आकांक्षाक स्वर सेहो सुनबामें अवश्य अबैछ जखन ओहि उपन्यासक केन्द्रीय पात्र, हीरा, पूछैत छथिन, ‘ विज्ञान नारि कें पुरुष बना सकैछ ?’ रोचक थिक, जमींदारक परिवारक भीतर, नारि समाजक अत्यंत पारम्परिक वातावरण में पलल बढ़ल, दरबारक  हिसाब-किताब रखनिहारि, हीरा, अवसर अयला पर सामंतक सोझाँ सोझी अपन स्वतंत्रताक अभिव्यक्ति करैत छथि आ अपन बाट अपनहिं चुनैत, स्वतंत्र उद्यमी बनि  सफल होइत छथि ! तें, हीराक उद्यम पितृ सत्तात्मक व्यवस्था पर चोटे टा नहिं, नारिक स्वतंत्रताक उद्घोष आ नारि सशक्तीकरणक उदात्त उदहारण थिक. एकरा नारीवाद बूझी तं कोनो अनर्गल नहिं. ई सबटा श्रीमती लिली रे सुगम सरल भाषा में कहि जाइत छथि. एहि हेतु ने ओ संस्कृतनिष्ठ कठिन भाषाक प्रयोग करैत छथि, आ ने वर्तनीक विवादसँ प्रभावित होइत छथि. तखन, कतहु हुनक लेखन मे कदाचित्  एहनो शब्द भेटत जे, हुनकहिं शब्द में कहैत छी: ‘शब्दकोषहु में नहिं भेटत’.6

‘मरीचिका’ अंग्रेजक शासन कालसँ ल कय, द्वितीय विश्वयुद्ध, स्वतंत्रता संग्राम आ स्वातंत्र्योत्तर कालखण्डहु  कें स्पर्श करैत अछि. किन्तु, जखन देश स्वतंत्र भए जाइछ तखनो गाओं में अस्पताल आ उद्यम ज़मींदारहिं परिवार खोलैत छथि. ई सामाजिक सत्य वा लेखकीय दृष्टि दुनू भए सकैछ. संयोगवशात् ‘मरीचिका’क अन्त नाटकीय नहियो होइत, नाटकीय भए जाइछ, जखन हीराक डाक्टर पुत्रक विवाह ओही राजाक बेटीक संग भए जाइत छनि जे राजा लोकलज्जाक भयसँ  एक युग पहिने हीराकें पत्नी बनयबासँ पयर पाछू कए नेने छलाह. मुदा, ई सब तखन संभव भेल, जखन पुरान पीढ़ीक रोष आ पूर्वाग्रहक आगि मिझा कए छाउर भए गेल रहैक छैक आ सन्तति लोकनिक नव पीढ़ी समानताक धरातल पर नव संबंध बनओलक.

 लिली रे क कथा

दीर्घ रचनाकालक अछैतो लिली रे कुल संकलित कथाक संख्या पचाससँ कम ( कथा: 43 ; बाल कथा:6 ) छनि.  डाक्टर रमानन्द झा ‘रमण’ अनेक ठाम छिड़ियायल एहि रचना सबहक संकलन-संपादन-समीक्षा कयलनिए.  सरिसब-पाहीक ‘साहित्यिकी’ संस्था 2014 सँ 2017 क बीच  लिली रे क आत्मकथा सहित हिनक कुल संकलित रचनाकें सात खण्ड में- रंगीन परदा, लाली गुराँस (दुनू कथा संग्रह), पटाक्षेप (उपन्यास), विशाखन (कथा-संग्रह), समयकें धङैत (आत्मकथा), उपसंहार एवं एकटा बड्ड पुरान गप्प (उपन्यास), आ नीक लोक (दीर्घकथा) -  प्रकाशित कयलक अछि. एहि संकलनक प्रकाशनसँ  अध्येता कें लिली रे क सम्पूर्ण साहित्य सुलभ भए गेलनिए; ई महत्वपूर्ण काज थिक.

लिली रे अनेक कथा, जेना, ‘अंतराल’ आ ‘विशाखन’ आकार मे पैघ अछि. अधिकतर कथाक केंद्र में नारिए छथि; कतहु निर्धन- बालविधवा, कतहु ग्रामीण समाज मे रमल-बसल माए, कतहु आधुनिक शहरी आप्रवासी दम्पति, वा नौकरी-पेशा नारि. हुनका लोकनिक चिन्ता हुनक मानसिकता आ रणनीति निर्धारित करैत अछि. एहि सबहक बीच समयक बदलैत स्वर सब ठाम सुनबा में अबैछ. ‘विशाखन’ नामक दीर्घ कथामें  दू परिवेश आ दू पीढ़ीक नारिलोकनिक दुविधाक चित्रण बड़ नीक-जकाँ भेल अछि. एक दिस, अमितक माता सीमित साधन, आ समाजक बलें, गामक जिनगी मे संतुष्ट छथि. तं, दोसर दिस, अमित आ हुनक पत्नी, मधु, उच्च पद, आ मध्यवर्गीय साधनक अछैतो परिवारिकें छिन्न-भिन्न हयबासँ नहिं बंचा पबैत छथि !  ‘अंतराल’ में  बाल-विधवा ‘कृष्णा’ कें बहिन बेर-कुबेर में काज ले बजा लैत छथिन. मुदा, कृष्णाकें ककरोसँ किछु अपेक्षा नहिं छनि. जीवन साध्वी-जकाँ छनि. तथापि, सत्यकें बूझितो ओ रोष-मुक्त छथि. एहि सबहक एकेटा संकेत आ संदेश थिक ; परिस्थिति केहनो होइक नारि अपनाकें परिस्थितिक अनुकूल ढारि लैत छथि. कतहु लीक पर चलि कए, कतहु नदीक धारक संग बहैत. मुदा, लिली रे क नारि लोकनि उद्यम करैत छथि, परिस्थितिसँ लड़ैत छथि. ओ ने साहस छोड़ैत छथि, ने भाग्य के दोष दैत छथि. मुदा,परिस्थिति केहनो हो ओ लोकनि( मालती: रंगीन परदा,रेनू: रोगिणी, हीरा: मरीचिका, अपर्णा: उपसंहार, अमितक माए: विशाखन, वा ललिता: एकटा बड्ड पुरान गप्प ) अपन आत्म-सम्मानकें कतहु ठेस नहिं लागय दैत छथिन. 

लिली रे  नेना-भुटकाक हेतु सेहो किछु कथा लिखने छथि. बाल-कथा सब अनेक ‘कथा-संग्रह’क अंत में संकलित अछि. केदार कानन कहैत छथि, ‘ हुनक नामक लिली रे क चिठ्ठी सब में कोनो-कोनो में बिलाड़ि, आ चिड़ै, इत्यादिक चित्र सेहो रहैत छलनि. ईहो साहित्यकार लिली रे व्यक्तित्वक एक पक्ष थिक. हमर नामे लिली रे किछु चिट्ठी हमरो लग अछि, मुदा, ओहि में चित्र नहिं छैक.

शैलीक दृष्टिसँ  लिली रे क साहित्यकें यथार्थवादी कहब उचित हयत. जे जेना छैक, तकर चित्र ओहने भेटत. ओहि में कल्पनाक योग छैक, मुदा, ओहि में कोनो वाद वा सैद्धान्तिक धाराक अनुगमन नहिं छैक. कोनो परिस्थितिमें समाज जेहन होइछ, ओहन परिस्थिति में समाजक जाहि वर्गक प्रतिक्रिया जेहन होइत छैक, चित्रण तेहने भेटत. जेना पहिने चर्चा भेल अछि, एहिमें नारि सब ठाम केंद्र में छथि. मुदा, तें, ई पुरुष पात्र पर आधारित कथा नहिं लिखने छथि, से नहिं. ‘बिल टेलर केर डायरी’ नामक कथा एकर केवल एकटा उदाहरण थिक. हँ, हिनक नारि पात्र- ‘मरीचिका’क हीरा होथु, लाली-गुराँसक चुनी, ‘विशाखन’ केर अमितक माय, वा ‘अंतराल’क कृष्णा-  सब नारि अपन विधाता अपनहिं छथि, सम्मानक संग,  समयक संग डेग मिलबैत चलैत छथि. तें, हिनक अनेक नारि पात्र स्वतंत्र ( यथा,ललिता: एकटा गप्प बड्ड पुरान गप्प), आ  परिवर्तनक  सूत्रधार (यथा,गीता: एकटा गप्प बड्ड पुरान गप्प) प्रतीत होइत छथि. ई लेखकक दृष्टि आ जीवन-दर्शनक विशेषता थिकनि. एकर श्रेय प्रोफ़ेसर शंकर कुमार झा  हिनक लालन पालनक परिवेश, आ पाश्चात्य मिसनरी शिक्षाक  प्रभावक फल मानैत छथि.7  एकटा गप्प आओर: लिली रे क  कथाक परिधि मिथिलाए धरि सीमित नहिं अछि ; विषय-वस्तुओ में पर्याप्त विविधता भेटत. अस्तु, विस्तृत भौगोलिक परिधि आ जीवनक विविध फलक केर समावेश हिनक साहित्यक वैशिष्ट्य थिक.

रचनाकारक रूप मे लिली रे

आब लिली रे क रचना कर्मक चर्चा. लिली रे क अनुभवक परिधि विस्तृत छनि. पिता, आ पतिक नौकरी-पेशा हयबाक कारण श्रीमती लिली रे के अनेक स्थान पर रहबाक अवसर भेलनि. विभिन्न ठामक प्रवासमें  भिन्न-भिन्न परिस्थिति मे हुनका मनुखक जीवनक भिन्न-भिन्न फलक देखबाक अवसर भेटलनि. तें, हुनक अनुभव में सामन्त, नौकरशाह-डाक्टर, निर्धन-नारि-पुरुष-सर्वहारा, आ ग्रामीण-नगरीय, सबहक जीवनक समावेश छनि. मुदा, दृष्टि सब ठाम अपन छनि; प्रगतिशील, उदारवादी, स्वतंत्र, समयसँ आगाँ. लिली रे क  व्यक्तित्व पर प्रोफेसर शंकर कुमार झाक परिचयात्मक लेख हिनक व्यक्तित्वक संतुलित विवेचना थिक.7  

लिली रे अपन रचना प्रक्रियाक संबंध में कहैत छथि, जे  ‘ओ  जे देखथि ‘ओकरे प्लाट बना लेथि.... मुदा लिखैत काल अल्ल-बल्ल हींगसँ हरदि तक जे फुरैत अछि, हम लिखैत रहैत छी. ई हमर बसमे नहिं अछि.’ 8 से वर्णननक  विस्तार बहुतो ठाम (  यथा:‘मरीचिका’, एकटा बड्ड पुरान गप्प) प्रतीत होइछ.

पारिवारिक ओझरौठक एक टा दीर्घ कालखण्ड ( 1960-78 ई. ) में प्रायः लिली रे क कोनो रचना प्रकाशित नहिं भेलनि. मुदा, एहि अंतरालक बाद जखन पुनः ओ मैथिली साहित्यक क्षितिज पर अएलीह, तं, ई साबित भए गेल जे ओ लोकक आँखिसँ दूर अवश्य रहथि, किन्तु, हुनकर रचनाकार पूर्ववत जीवित रहनि.    

श्रीमती लिली रे अपन ‘लिखबाक कारण-श्रोत अपन दुनू बेटा कें मानैत’ छथि.8 ओहि में ओ  परिस्थितिवश ‘अनिद्रा’क योगकें सेहो स्वीकारैत छथि.8 ओना सबसँ रोचक ई लगैत अछि जखन ओ लिखैत छथि, ‘ एक तरहसँ ‘रंगीन परदा’ लिखबाक ‘प्रेरणाश्रोत चारि टा जिनियाक पौधा आ ताहि मे फुलायल-सुखायल फूल सब छल’.     ‘जिनिया फूलक थिरकबाक दृश्यकें लिखलाक बाद तकरा कोनो कथामे रखबाक इच्छा बलवती होअए लागल. हम सोचय लगलहुँ. बहुत पहिने मुकुल( छोटि बहिन)क वियाहमे जे लोकक जुटान भेल छल, ताहिमे एक सासु आ जमायकें लएकें काफी चर्चा छल. सासुक वयस जमायक वयससँ कम छलनि. सासु जमायसँ बजैत छली. से समाजमें प्रचलित नहिं छलै.  .......सम्भावनाक अंत नहिं छल. ..... खिस्सा लिखा गेल.’ 8 

हमरा जनैत, लेखकक जीवन मे प्रेरणा अबिते रहैत छैक, आवश्यकता होइछ ओकरा पकड़बाक. अस्तु, हुनका जखन जे प्रेरणा एलनि ओकरे ल’ कए हुनक  लेखनी, स्वाभाविक आ निर्बाध रूपें चलल. ओ एहि  व्यसनक उपयोग पूर्ण मनोयोगसँ कयनि. हुनक भाषाक सहजता, लेखनक प्रवाह आ हुनक लेखन मे छोटसँ छोट विषयक सूक्ष्मसँ सूक्ष्म वर्णन एकर प्रमाण थिक. एहन सूक्ष्म वर्णनक हेतु परिवेशकें देखबाले जेहने गहन दृष्टि चाही तेहने शब्द सामर्थ्य, लिखबाक धैर्य, आ शिल्प. एक माटिसँ प्रत्येक कुम्हार एके रंगक कमनीय मूर्ति नहिं गढ़ि सकैछ. ओहि हेतु कला-कौशल, तन्मयता आ दृष्टिक सूक्ष्मता, सब किछु चाहियैक. से, दृष्टि, भाषा, आ शिल्प लिली रे क ‘हॉल मार्क ( hall-mark)’- सुच्चा हेबाक निशानी- थिकनि. किन्तु, सर्वोपरि, सत्यकें यथावत् आ निर्भीक भए प्रस्तुत करबाक हुनक शैली, हुनका साहित्यकार लोकनिक बीच विरल विभूति संज्ञाक अधिकारी बनबैत अछि. एतबा भारतीय साहित्यमें लिली रे क स्थान सुरक्षित करबा ले पर्याप्त थिक. मैथिली कथा-साहित्य में सृजनक जे बाट ओ बनओलनि से नव बाट मैथिली लेखनक नव धाराक संवाहक नहिं बनि सकल ताहि में दोष लिली रे क नहिं.  

संदर्भ:

1. श्रीकान्त ठाकुर. प्रकाशकीय: मरीचिका उपन्यास (प्रथम खण्ड), लेखक, लिली रे, पटना: मैथिली अकादमी, , प्रथम संस्करण, 1981.

2. Goecker L. According to 3.5 Million Books, Women are beautiful and men are rational: The Swaddle; Sep 9, 2019.

3. Bhatt J. MeToo: How can literature (and publishers) respond to the problems of gender and power? : Scroll.in; Nov 25, 2018.

4. Kaye MM: The Far Pavilions. Toronto, NewYork, London: Bantam Books,1978. pp 435-36.

5. लिली रे: पटाक्षेप. सरिसब-पाही; साहित्यिकी प्रकाशन 2015pp 78 

6. लिली रे: उपसंहार एवं एकटा बड्ड पुरान गप्प. सरिसब-पाही; साहित्यिकी प्रकाशन, 2017pp106

7. शंकर कुमार झा: लिली रे. रंगीन परदा (कथा-संग्रह); सरिसब-पाही; साहित्यिकी प्रकाशन, 2014

8. लिली रे: समयकें धङैत (आत्मकथा). सरिसब-पाही; साहित्यिकी प्रकाशन, 2015. pp 28 एवं 42

आभार:

1. प्रोफ़ेसर भीमनाथ झा, श्रीमती नीरजा रेणु, श्री केदार कानन, श्रीमती सुस्मिता पाठक

2. श्रीमती रूपम झा, जनिक critical inputs एहि लेखकें परिमार्जित करबा में सहायक भेल.

 

 

Glossary:

Blind-spot: आँखिक परदा, रेटिना, क बीच ओ इलाका, जाहि बाटें आँखिक स्नायु( optic nerve ) मस्तिष्क दिस जयबा ले आँखिक डिम्हासँ बहराइछ. एहि बिंदु पर पड़ल प्रतिबिम्ब मनुष्यक चेतना धरि नहिं पहुँचैछ, मनुष्यकें बुझबा में नहिं अबैछ.

Hall-mark: आभूषण पर सोनाक गुणवत्ता प्रमाणक ठप्पा.

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*मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2021 क फेस्टिवल बुक ‘ अरिपन’ में प्रकाशित  

 

Monday, January 17, 2022

मेरा गाँव और ‘सेंट बोरिस’ एकेडेमी

 

यादों का सिलसिला: मेरा गाँव और ‘सेंट बोरिस’ एकेडेमी

हमारे अभावग्रस्त बचपन में भी एक अनोखा ऐश्वर्य था. अभाव ने जो सीमा रेखाएँ खींची थी, उसके बाहर जाने की भी अनेक स्वतंत्रताएँ थी. आज के एकल सन्तान और दोहरे आमदनी में वह स्वतंत्रता और ऐश्वर्य का अनुभव शायद आज के शहरी  जीवन में संभव नहीं.

कितने बच्चों ने लगा पायेंगे आम की डाली पर झूले. कितने बच्चे आम के बगीचों में पके आम चुन पायेंगे. गांवों में बगीचे तो हैं ही. केवल बच्चे नदारद है !! कितनो ने गांवों के कमलदह में लगायी होगी डुबकी. कितनों ने चुने होंगे कुमुदिनी के फूल, खाए होंगें ताजे सिंघाड़े. कितनी लड़कियों ने हरसिंगार के फूल की सूखी डंटी में रंगी होंगी चोलियाँ. कितने ने खेले होंगे झिलहर सेमल की लकड़ी की नाव में.

हमारे घर के परिसर में कौन से फल नहीं थे: आम, अमरुद, नींबू, जामुन, फालसे, शीताफल, शरीफा, फालसा, शहतूत, बड़हड़, आंवला, टाभ नींबू( grape fruit); सभी का भरमार था.

 लगे हाथ आज मैं ग्राम्य जीवन की कुछ सखी, कुछ सखा, कुछ गलियाँ, कुछ तालाब, और नदियों को याद करता हूँ. पर, पहले कुछ स्वतंत्रता की बातें : पीपल के नीचे का स्कूल. मैं उसे बोधि-वृक्ष कहता हूँ. चारों तरफ अनेक प्रकार के फूलों के ऐसे पेड़ लगे थे जो साल भर और सालों-साल खिलते हैं, जैसे, उड़हुल, पीला कनेर,करबीर, गुलेंच, जूही, बेली, कटहरिया, टगड़, रात की रानी, और हरसिंगार. स्कूल के नजदीक ही दो पोखर थे. एक कुआँ था. भुतही होने के कारण एक पोखर में बच्चे नहीं जाते थे. दूसरे में मखाने की खेती के कारण घाट के आगे जाना मुश्किल था. इस सब के आगे. परिसर के तीन तरफ आम के बगीचे थे. और बगीचों के बाहर दूर-दूर तक फैले धान के खेत. न जाने कमला-कोसी के इस इलाके में सालों भर किस-किस प्रकार के पक्षी आते थे.

लहराता आँचल  

हमारा बोधि-वृक्ष

 

स्कूल के पास ही लक्ष्मीनारायण का मन्दिर था. या यूं कहिए मन्दिर के परिसर के जिस चबूतरे पर विशाल पीपल का पेड़ था, उसी की छाया का क्षेत्र स्कूल था. नजदीक ही संस्कृत पाठशाला था. मास्टर साहब बेंच पर बैठते थे और चटिया माने छात्र, जमीन, बोरी और चटाई पर. ऐसा स्कूल जिसमे बच्चे बोरी पर बैठें, सुनते हैं उसे ही ‘सेंट बोरिस’ एकेडेमी कहा जाता है, ऐसा विलायत में बसे किसी विद्वान् ने कहा था. इसलिए, हम लोग सेंट बोरिस के ‘अलुमनस’ हैं ! इसी सेंट बोरिस के परिसर में सालों-साल रामलीला भी हुआ करती थी. इसलिए, राम-लक्ष्मण-हनुमान के साथ सीता और मंथरा से भी हमारा करीबी रिश्ता था.

हमारे स्कूल में सौ से कम ही बच्चे थे, जिसमे कोई पन्द्रह-बीस मौलवी साहब- मोहम्मद युनुस- के शागिर्द भी थे. वे उर्दू पढ़नेवाले बच्चे वहां पढ़ते थे जरूर, हमारी पहचान थी, पर हमारे साथ उनका मेल-जोल, खेलना बिलकुल ही नहीं होता था. पर, उन्हें इससे कोई कमी कभी महशूस हुई होगी, ऐसा लगता नहीं था. वे सभी नजदीक के एक ही गांव से आते थे, एक साथ खेलते थे, और एक साथ वापस जाते थे. पर मौलवी साहब हमारा खयाल जरूर रखते थे. उनका दबदबा, और गाँव में इज्जत भी थी. गाँव में 1961 की मर्दुमसुमारी- जनगणना- उन्होंने ने ही की थी.

अब अपनों की कुछ बातें . सबसे पहले मेरे-अपने: मेरी बड़ी (लाल) बहन, स्व. शीला देवी. वह मेरी बहन, सहपाठी और स्कूल के भीतर मेरी गार्जियन भी थीं. उस जमाने में जब सहोदरों की संख्या सीमित नहीं थी, भाइयों के उपनाम कुछ इस तरह होते थे- बड़का भाई, छोटका भाई, लाल भाई, नुनू भाई, पढ़ुआ भाई, आदि. चाचा भी ऐसे ही होते थे, करिया काका, लाल काका, नित्तो काका और खलीफ़ा काका, पंडित काका, आदि. लाल बहिन मेरे से कोई तीन साल बड़ी होंगी, पर, दुर्भाग्यवश, आज से चौवालीस साल पहले आग में ऐसी जलीं कि चौबीस घंटे के भीतर मिट्टी में मिल गयी. उन दिनों लडकियों की ससुराल में आग लगने की बीमारी आम थी. पर, वह गुज़री भले तब हों, पर वह मेरे साथ तो आजन्म रहेंगी. सपने में अभी भी आती है, बातें कह  जातीं हैं. वह मेरे साथ की निरंतर गार्जियन थीं. ‘माय के कहि देबैक’ केवल उनका ऐसा कहना मुझे तुरत रास्ते पर ले आता था ! पर सपने में जब उनका मुरझाया चेहरा देखता हूँ तो आज भी मेरी आँखें गीली हो जातीं हैं ! कब तक सुकुमार लड़कियाँ आग में इस तरह जलती रहेंगी !

लाल बहिन की सखियाँ मेरी भी सखियाँ थी. हम दोनों एक क्लास में जो थे. राम दाई, ठकनी (प्रभा कुमारी),मिथिलेश, बुलबुल,माधुरी, रेणु के नाम अभी भी स्मृति पटल पर वर्तमान हैं. जो जीवित होंगी अब वे भी बूढ़ी दादी-नानी हो चुकी होंगी. आज भी जब मैं अपने गाँव जाता हूँ, उनसे मिलने का मन होता है, पर मिलेंगी कहाँ ? लड़कियाँ परायी जो होतीं हैं ! हमारा गाँव केरल में होता तो शायद वो अपने जन्म के गाँव में होती ! और शायद मैं ही दूसरे गाँव चला गया होता !!

हाँ, तो मेरी लाल बहन- शीला. वह बड़ी-छोटी छः बहनों में स्कूल जानेवाली पहली और अंतिम थी. यदयपि, मेरे पिता के अपने और चचेरे आठ भाइयों के परिवार में लगभग सभी महिलायें साक्षर थी.

अब गाँव के अद्भुत अनुभव की बातें करें: तो बताइए, उन दिनों हम में से किसी के गाँव में हवाई जहाज उतरा था ? नहीं न ! मेरे गाँव के नजदीक पोखरभिंडा के फुटबौल फिल्ड में उन दिनों एक हवाई जहाज उतरा था ! साल शायद सन 1961 या 62 ई.  पता नहीं, बेचारा पायलट रास्ता खो बैठा, या जहाज बीमार हो गया था. या उसकी टंकी में तेल ख़त्म हो गया था. पर उतरा तो, गाँववालों ने हवाई जहाज नजदीक से देखा तो. हाँ, उस दिन बारिस जरूर हो रही थी. इसलिए, स्कूल में पढ़ना लिखना भी मुश्किल ही था. सो मास्टर साहब ने किसी को पोखरभिंडा जाने से रोका नहीं, और हम सबों ने केवल हवाई जहाज को देखा नहीं, हवाई जहाज को छुआ भी था ! हवाई जहाज के चलाने वाले आस पास ही खड़े थे. उन्हें क्या कहते थे, उन दिनों मुझे तो पता नहीं था. आज किसी सेंट-कान्वेंट का कोई बच्चा बताए तो, क्या वह स्कूल की चाहर दीवारी के बाहर जा सकता है ? गांव में हवाई जहाज छू सकता है ! यही थी वहाँ की स्वतंत्रता और वहां के अभाव के जीवन का ऐश्वर्य.    

 

   

Sunday, December 26, 2021

पुस्तक-समीक्षा : प्रसंगवश (कविता-संग्रह)

 

पुस्तक-समीक्षा

प्रसंगवश (कविता-संग्रह)

मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल,2021, दरभंगा मे एकटा युवक हाथें-हाथ एकटा पोथी बिलहैत रहथि. हमरो देलनि। पोथीक नाम छलैक ‘प्रसंगवश’. कवि थिकाह संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) निवासी डाक्टर मनोज कुमार कुमार चौधरी.

पोथी हमरा हेतु श्रेष्ठतम उपहार छी. पान खेनिहारक सामने केओ पनबट्टी खोलि कए राखि देथिन आ ओ पानक खिल्ली नहिं उठओताह से असंभव. तहिना हमरा हाथ में पोथी आयल तं हम तुरत पन्ना उनटाओल. कविता सबहक सहजता आ भाषा आकृष्ट केलक. लग में प्रोफेसर भीमनाथ झा बैसल रहथि. हम कहलियनि, ‘कवि सिद्धहस्त छथि. कविता सब नीक छैक.’ पछाति जखन पटना आपस अयलहुँ तं एकहिं बैसार कुल तीसो कविता पढ़लहुँ. हमर आरंभिक धारणा दृढ़ भेल.

आजुक युग में जखन मैथिलीक अस्तित्वे पर प्रश्न-चिन्ह ठाढ़ अछि, ‘प्रसंगवश’ एकटा शुभ संकेत थिक. कारण, मैथिली विश्व भरि में पसरल मैथिली भाषीक ह्रदय में ओहिना जोगाओल राखल अछि जेना माटि में बीआ सब जोगाओल रहैत अछि जे अनुकूल समय पर स्वतः अंकुरित भए जाइछ. डाक्टर चौधरीक ‘प्रसंगवश’ तकरे प्रमाण थिक. कवि स्वयं सेहो से स्वीकार करैत कहैत छथि. पोथीक निवेदन मे ओ कहैत छथि:

‘हमर व्यक्तित्व मे जे किछु सरस अछि, कोमल अछि, ताहि सभसँ पोअरियामे अपन पितामह (स्वर्गीय कुशेश्वर चौधरी) संग बितैल समय मूलभूत रूपे जुड़ल अछि. संभवतः ओकर श्रोत अछि. छव दशकसँ ऊपर बीति गेल. मुदा, मोन अछि ओ ‘कचहरी’ ( माटिक देबाल आ खरक छप्पर वला एकटा रसोई घर, ताहिसँ सटल एकचारी) आ तकर सम्मुख ओ विशाल वट वृक्ष, ओकर सघन छाहरि मे असगर खेलाइत स्वयं-अविष्कृत खेल-कूद, मुक्त कल्पनाक उड़ान, इनारक जलसँ बनल भातक लालपन, बबूरक लस्सासँ विविध आ विचित्र रूप रचना, गर्मीमे बड़कल अलकतरासँ बनल गोली, दरभंगा बागमतीसँ निकसल पार्श्व धारक पारदर्शी पानि आ ओहिमे झलकैत माछ, बथनिआ सभक महिसक टटका दूहल फेन भरल दूध आ ओहिमे फुलैल चूड़ा जे बिना गूड़ोके लगैत छलैक मीठ .’

अर्थात् , कविक मन मे नेनपनसँ  जोगओल संवेदनाक बीआ विदेशहुँ मे अनुकूल अवसर पाबि, जे किछु कविताक रूप में समय-समय पर अंकुराइत रहल तकरे संकलन थिक, ‘प्रसंगवश’. तें, स्पष्ट अछि, सुदूर भूतहु में जोगाओल मैथिलीक बीआ, विदेशहुँक जलवायुक संयोगे कखन, कतय, कोन रूप मे प्रष्फुटित हयत, के कहत !                 

किन्तु, एहि पोथीक भाषा सुच्चा ग्रामीण मैथिली अछि. शब्द-विधान कविक अप्पन छनि आ बिंब चमत्कृत करैछ. किछु देखल जाय:

 ...मंत्रमुग्ध आइ हीलइत अछि

हिकरी, एश आ ओक

कोनों मधुर ताल पर डोलइत अछि

आइ हरियर पाइनक नोक।

एतय जं भाव-बोध कविक छनि तं गाछ-वृक्ष अमेरिकाक स्थानीय थिक ; ई व्यक्तिगत अनुभूति आ स्थानीय परिद्र्श्यक अद्भुत संश्लेषण थिक. मुदा, सब किछु कविक हृदयक सोझ-साझ उदगार थिक. से कवि कहितो छथि:   

‘.......आइ अछि अहाँके अर्पण

हमर छोट छीन उपहार ।

टूटल भांगल शब्दमे

हृदयक सोझ साझ उद्गार।..’

हमरा जनैत ई  पाँती पोथीक सार थिक.

एहि सबहक संग, आन कविता सब मे कविक दुविधा (बरु नीके केलें), विदेश में रंगभेदक भय (ननमुहीं टाड़ी), पाछू छूटल गामक प्रति मोह आ उद्वेग, प्रकृतिक  प्रेम, आ पॉलिटिक्स (लेडी बर्ड जॉनसन) सब अछि। मुदा, हमरा जनैत, 'जाड़कालाक सुर्ज' एहि संकलनक सबसँ उत्कृष्ट कविता थिक. महाकवि 'यात्री' मन पड़लाह. देखल जाय:

‘कारी केथड़ी कनपट्टी तक घिंचने

कतेक काल तक एना कुलबुलाइत रहब

अहाँ हे विवस्वान् ?

कनेक कनखियो त’ दिऔक .

देखू, कोना कठुआइल अछि

कांतिहीन गाछ सभक

कजरी पोतल कारी ठाढ़ि

कतेक निराश अछि परिवेश

कोना लागैत निष्प्राण ?

जुनि अगड़ाउ, जुनि अलसाउ

आब छोडू अपन भाभट

अहाँ हे  विवस्वान् .’

ई सब किछु केवल बानगी थिक. पोथीक आस्वाद ले पोथीक परायण करी. अनुमान अछि, किननिहार कें पोथी पुस्तक-भण्डार सब मे उपलब्ध हेतनि. यद्यपि, पोथी में विक्रेता वा लेखकक पता नहिं भेटल.

सारांश मे, भावक विविधता, कहबाक सरल-पारदर्शी शैली, सुच्चा ग्रामीण शब्दक प्रयोग आ साधल शिल्पक कारण डाक्टर मनोज कुमार चौधरीक ‘प्रसंगवश’ केर स्वागत हयबाक चाही. हमरा विश्वास अछि, पाठक लोकनिक बीच एहि पोथीक स्वागत हएत. हिनक आन कृतिक प्रतीक्षा रहत.

 

पोथीक नाम: प्रसंगवश (कविता-संग्रह)

कवि: डाक्टर मनोज कुमार चौधरी, Reynoldsburg,Ohio,USA.

        ग्राम: पनिचोभ, जिला- दरभंगा.

        ( मुख्यतः अमेरिका आवाससँ पूर्व मुख्यतः कोलकाता निवासी )

संस्करण: प्रथम, अक्टूबर 2021

पृष्ठ संख्या: 63

प्रकाशक :         -

Saturday, December 18, 2021

बेटी

 

बेटी

1

रामदाई जखन ककरो मुँहे सुनथिन, ‘ कुमारि बेटी मरय तं सात कुलक पाप टरय तं बड्ड दुःख होइनि. होइनि जे लोक एना किएक कहैत छैक ?’ इहो सोचथि, ‘माए तं एना कहियो नहिं बजैत छैक. तें, राम दाई कें माए ले जतबे आदर होइनि, ततबे चिन्ता. सोचथि, बूढ़ भेलीह. बेटा लोकनि बाहर रहैत छथिन. रुपैया टाका सब गोटे पठा दैत छथिन. मुदा, माए गाम में एसगरे रहैत अछि. माए लग आबि कए के रहतनि ? संतोषक गप्प जे दाई कें  समांग छनि, आ ओ जेना छथि खुशी छथि. मुदा, तैयो दाई बेसी काल कहथिन, ‘अइ, जखने बूढ़ भेलहुँ, तखने दूरि गेलहुँ. सब कें होइत छनि, दाई ऐना नहिं करैत, ओना नहिं करैत छथि, बदलय नहिं चाहैत छथि.’ मुदा, दाई सब टा सुनैत रहथि आ सुनिओ कए अनठबैत रहथि. सोचैत रहथि, ‘बूढ़ कुकुर कतहु फाँस बझए ! आब हम की बदलब. जेना छी, कहुना निमहि जाए.’  अधिक काल कहथिन, ‘अधलाह नहिं सुनी, अधलाह नहिं देखी, अधलाह नहिं बाजी.  ई गप्प बड्ड पुरान गप्प थिकैक. ई बुढ़ारी में बड्ड काज अबैत छैक. तें, बुढ़ारी में आँखि स्वयं कमजोर भए जाइत छैक. कान कम सुनैत छैक. भगवान जानिए कए एना करैत छथिन. अप्रिय नहिं देखब, नहिं सुनब, तं किछु अनटोटल बजलो नहिं जायत. कम बाजब नीक छिऐक से तं लोक सब दिनसँ कहि एलैए ! तखन ककरा कथिक शिकाइत हेतैक?’ मुदा, शिकाइत हयबा ले कारण थोड़े चाहियैक. मुदा, दाई गप्प नहिं बुझथिन, से नहिं. पचासी वर्षक वयसक. अपन सब काज अपनहिं करथि. कखनो कए जं कोनो गप्प पर  तामसो होइनि तं बेटी-पुतहु लोकनि कें कहथिन, ‘अइ, अहाँलोकनि कें भगवान जिनगी समांग देथु. अहूँ लोकनि दाई हेबे करब.’

पछिला वर्ष अकस्मात् कोरोना आयल. एहन रोग ने सुनल, ने देखल. ई तेहन काल छल जे ककरा ने लहायब केलक; की बच्चा, की समर्थ, आ की बूढ़-ठेढ़. ताहू पर ई अगड़ाही मनुखेसँ दोसर मनुख धरि पसरैत छल. तें, जे जतहि छल, ओत्तहि रहि गेल. ककरो आंग-स्वांग होइ, केओ मरि जाय, कोनो उपाय नहिं. टेन बन्न, प्लेन बन्न. कठियारी तक जेबा ले  मनुख नहिं भेटैक. दूरस्थ में फँसल  धिया-पुता कानि कए रहि गेल, माए-बाप कें आगि धरि देबा ले नहिं आबि सकल. एखन धरि कहियो एहन अवसर नहिं आयल रहैक जखन मनुष्यकें मनुष्येसँ एतेक भय भेल रहैक. मुदा, उपाय की ? तथापि, जखन बसाते माहुर भए गेले, तखन लोक बचत कोना !

दाई नान्हिए टा में खीसा सुनने रहथि. कहाँदन वायुदेव हज़ारों वर्ष धरि शिवक कठिन तपस्या कयलनि. तपस्यासँ प्रसन्न भए आशुतोष शिव प्रकट भेलाह आ वायु कें कहलथिन, ‘अहाँ चंचल छी. तथापि एहन कठिन तपस्या कयल. हम प्रसन्न छी. तीन टा वर मांगू.’ वायु कहथिन, हे, महादेव हम सब ठाम रही. सब प्राणीमें वास करी, इत्यादि, इत्यादि....’ शिव, ‘तथास्तु’ कहि, अन्तर्धान भए गेलाह.

दाई आइ सोचैत छथि, तहिया  जं वायु शिवसँ तेसर वरदानक हेतु निरंतर अपन पवित्रताक वरदान मंगने रहितथि, तं आइ मनुखक ई हाल नहिं होइतैक. दाई-सन धर्मप्राणकें लगैत छनि, वायुदेव-मरुत-क अहंकार लोक-कल्याण पर भारी पड़ि गेल. तें, मनुख, विख भेल बसातक पराभव भोगि रहल अछि.

2

जखन एकाएक कोरोना-कोविड महामारी आयल तं पहिने एकर रूप लोक कें बुझबा में नहिं अयलैक. कारण, पहिने दूरस्थ में एक्का-दुक्का लोककें कोरोनाक रोग भेलैक. गाओं घर में तेना भए कए केओ बुझबो नहिं केलकैक. मुदा, जखन शहर सब में अजस्र लोक मरय लागल, तं,  डर सबठाम पसरए लागल. आइ कोन परिवारक लोक बेद बाहर नहिं रहैत छैक. जेना पहिने लोक दरभंगा-दिल्ली जाइत छल, आइ दुबई-क़तर-बिलेंत-अमेरिका जाइत अछि. ताहि परसँ, की गरीब, की धनिक, कोरोना-कोविड ककरो नहिं छोड़लक. सब एके रंग भए गेल, सब एके रंग डरायल.

दाई सावधान छलीह. लोकक एक दोसराक घर आंगन आयब-जायब बन्ने छलैक. किन्तु, जखन एक दिन अचानक दाईक नाकसँ पानि बहब शुरू भेलनि, तं ओ सबसँ पहिने ठंढा पानिसँ नहायब बन्न केलनि. श्याम-तुलसीक काढ़ा सेहो पिबय लगलीह. तथापि, दोसरे दिन ज्वर भए गेलनि. करीब हफ्ता भरि गामक डाक्टर आ देसी इलाज करबैत रहलीह. मुदा, एक दिन अचानक जखन श्वास लेबा मे कष्ट होबय लगलनि तं बुढ़ा एसगरे उठा-पुठा कए अस्पताल लए गेलखिन. जेकरे डर रहनि, सएह भेलनि. बूढ़ देह आ कोरोना सन काल ! जवान जहान सब तं कीड़ा-मकोड़ा जकाँ छटबा-पटबा भए रहल छल, बूढ़-ठेढ़क कोन कथा. बेटी सुनलखिन तं हुनका कोंढ फाटि गेलनि. ओ आव देखलनि ने ताव सोझे फारबिसगंज जिला अस्पताल पहुँचि गेलीह.

राम दाई फारबिसगंज गेलीह कि घर में महाभारत मचि गेल. सासु हनहन-पटपट करय लगलखिन. कहथिन, ‘कनियाँ कोन ज्ञाने माए लग उठि कए विदा भए गेलीह. माय बूढ़ छथिन. अस्सी वर्षक. कतेक दिन जिथिन. आ जं कनियाँ कें किछु भए गेलनि, हमर घर में कोरोना आबि गेल तं हम की भए क रहब ! हमरा एके टा बेटा आ एके टा पोता अछि !’

                                                                       

3

राम दाई फारबिसगंज पहुँचलीह तं माए कें ज्वर-उकासी आ श्वास लेबामें कष्ट रहनि. मुदा, होश में रहथिन. ऑक्सीजन लागल रहनि. परिवार कें रोगी लग बाहर भीतर जायब मना रहैक. मुदा, ताबत बुढ़ीकें फोन पर गप्प करबा जोकर रहथि. तें, राम दाईसँ गप्प भेलनि. राम दाईक बोली सुनि कए बुढ़ी कें बड्ड हुबा भेलनि. कहलखिन, ‘बाउ, इलाज तं भइए रहल अछि. बूढ़ छी. मुदा, अहाँ किए अएलहुँ. सुनैत छी, एहि रोगक लसेढ़ बड्ड खराब. अहाँ कें नेना छोट छथि, परिवार अछि. अहाँ हमरा देखि लेलहुँ. आब जाउ.’ माएक गप्प सुनि  राम दाई कें  आँखिसँ ढब-ढब नोर खसए लगलनि. कहलखिन, ‘ अहाँ ठीक भए जाएब. हम तं बाहरे छी. मुदा, हमरा तं गोटी भेल छल.सुनैत छिऐक ओहूसँ बड्ड लोक मरैत रहैक.  अहीँ कहैत छी, अहाँ हमरा छत्तीस दिन पर पथ्य  देने रही. हम कुमारिए रही. मुदा, अहाँ हमरा कहाँ छोड़ि  मरए देलहुँ.’ माए तखन चुप्प भए बेटीक गप्प सुनि लेलखिन. हुनका बजबामें आयास होइत रहनि. तथापि, हाथसँ आपस चल जेबा ले इशारा केलथिन, से अस्पतालक सीसा लागल खिड़की बाटें देखलखिन. मुदा, राम दाई कें माए कें छोड़ि कए आबि नहिं भेलनि.

दिन-रातिक इलाज. सूई, ऑक्सीजन, सेवा-सुश्रुषा. अस्पतालक डाक्टर-नर्स किछु उठा नहिं रखलकनि. मुदा, दाईक स्थिति बदसँ बदतर होइत चल गेलनि. अंततः, दाई कें डाक्टर लोकनि साधारण वार्डसँ आइ सी यू में लए गेलखिन. हुनक श्वास-नली में छेद धरि करए पड़लनि. डाक्टर निरंतर आबि कए राम दाई आ बुढ़ा कें दाईक परिस्थिति कहि जाथिन. राम दाई डाक्टरलोकनिक  व्यवहारसँ पूर्ण सन्तुष्ट रहथि. पन्द्रह दिन धरि निरंतर इलाज चलैत रहलनि. मुदा, दाईक परिस्थिति में सुधारक नाम नहिं.

एक दिन डाक्टर आबि राम दाई कें कहलथिन, ‘जे सब उपचार-प्रतिकार आवश्यक आ संभव छल, भए रहल छनि. मुदा, रक्त में ऑक्सीजन पर्याप्त नहिं होइत छनि. फेफड़ाक में बड्ड नोकसान भए गेल छनि. परिस्थिति बड्ड कठिन छैक.’ कहि डाक्टर चुप्प भए गेलाह.

मुदा, फेफड़ाक नोकसान आ दाईक ऊपर खतराक राम दाईक मन में नव समाधानक उदय भेलनि. ओ डाक्टरक चुप्पी तोड़ैत कहथिन, ‘डाक्टर साहेब, हम बेटी छियनि. सुनैत छियैक, जकर किडनी खराब भए जाइत छैक, अनकर नव किडनी लगओलासँ जान बचि जाइत छैक. सुनैत, छियैक आइ काल्हि लोकक फेफड़ा सेहो बदली होइत छैक. हम जवान-जहान छी. हम अपन एकटा फेफड़ा- अपन आधा ऑक्सीजन माए कें दए देबैक. एकटा फेफड़ा- आधा ऑक्सीजनसँ  हमर काज चलि जायत. हम बेटी छियैक, डाक्टर साहेब ! हमर माएक जान बचा लियौक.’

डाक्टर साहेब गुम्म भए गेलाह. तखने डाक्टर कें भीतरसँ बजाहटि भेलनि. कहलखिन, थम्हू. हम अबैत छी.

दाई ओही दिन आँखि मुनि लेलनि. दाई चलि गेलीह से एक संताप. मुदा, राम दाई सोचैत छथि आब गृह कलहक समाधान कोना हएत. घर कोना आपस जायब !

            

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