Tuesday, September 10, 2024

संस्मरणक सार्थकता

 

संस्मरणक सार्थकता

संस्मरण की थिक ? किछु इतिहास आ किछु लेखा जोखा . मनुक्खसँ  समाज बनैछ. समाजक इतिहास, देश-दुनियाक इतिहास होइछ. तें मनुक्खक इतिहास, वृहत् इतिहासक आधारशिला होइछ. मनुक्ख के छलाह, ओ समाजले की-की केलनि, ई  सब प्रश्न व्यक्तिक जीवनकें सामाजिक सार्थकता प्रदान करैत छैक . मुदा जं कोनो मनुख्यक जीवन सार्वजनिक हितक नहिओ होइक , सार्वजानिक जीवनक हिस्सा नहिओ होइक, तथापि 'मानुस जनम अनूप' तं थिकैक. तें अदनो मनुक्खक जीवन समाजक निरंतर गतिमान धाराक जल तं थिके. भले एक बुन्न जल, वा एकटा जिनगी क कोनो अपन स्वतंत्र अस्तित्व नहि होइक. मुदा, बूंदे- बूंदेसँ  तं समुद्र बनैछ .अस्तु, हमर संस्मरण भले समुद्रक बून्दे थिक, आइ हम अपन अनुभवकें मोन पाड़बामे प्रवृत भेलहुँ-ए.

भारतक स्वतन्त्रता प्राप्तिक किछुए वर्ष पछाति हमरा लोकनिक जन्म भेल छल . देशमे नव स्फूर्ति आ आशा जागल छलैक. क्रमशः की भेलैक आ भ’ रहल छैक से सर्वविदित अछि. फलतः, आब स्वतंत्रताक ७७  वर्षक पछाति, लोकक मनमे आशाक संग निराशा आ अविश्वास सेहो जड़ि जमा चुकल छैक . एतबे दिनमे आशाक संग निराशा मिज्झर भए गेलैक ? मनुष्यमे एहन कोन परिवर्तन भेलैये जे लोकके समाज आ संविधान परसँ  विश्वास उठि गेलैये. एहि  देशकेर ओहि  वर्ग, जकरा पर पहिने ककरो अविश्वास नहि छलैक ओकर विरुद्ध  अविश्वासक बीआ रोपबाक प्रयास भ’ रहल अछि. एहि सब अभियानसँ  समाजपर कोन आ केहन  असरि पड़तैक से सोचबाक विषय थिक . तथापि, हम भारतेंदु हरिश्चंदकेर ओहि उक्तिसँ  सहमत नहि छी जाहिमे शताब्दी पूर्व ओ कहने रहथिन:

सब भांति देव प्रतिकूल एहि नाशा, 

अब तजहु वीरवर भारत की सब आशा

एखनहु पूर्ण आशा अछि. हमरालोकनि निरंतर प्रगतिक दिस अग्रसर छी; हमरा लोकनि सफल हयब.                     हमर अपन जीवन यात्रा मिथिलाक विशुद्ध देहातसँ  आरम्भ भेल छल . पढ़लहुँ  चिकित्सा शाश्त्र आ अंततः सेना चिकित्सा कोर केर सेवाक प्रसादें चरितार्थ भेल भेल, 'अग्रतः सकलं शास्त्रं, पृष्ठतः सशरं धनुः'. भारतीय  सेनाक नौकरी, आ पछाति असैनिक सेवाक प्रतापें  सम्पूर्ण देशकें लगसँ  देखबाक अवसर भेटल. अनुभव कहैत अछि , किछु-किछु तं  सम्पूर्ण भारतमे एके रंग छैक मुदा किछु-किछु सर्वथा भिन्न . भाषा सब ठाम भिन्न-भिन्न छै , मुदा, गरीब-गुरुबाक  स्वरुप एके रंग . आधारभूत संरचना आ प्रशासनमे भिन्नता छैक, मुदा, राजनेता आ भ्रष्टाचार  एके रंग. हवा -पानिमे भिन्नता छै, देवी देवताक स्वरुप भिन्न-भिन्न छनि, मुदा, विश्वास आ  धर्मभीरुता एके रंग . मुदा एकटा रोग सब ठाम एके रंग पसरि  रहलैए : सार्वजानिक चिकित्सा व्यवस्थामे सरकारक घटैत भागीदारी आ प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाक प्रसारक संग बढ़ैत बेईमानी . ई परिवर्तन आम आदमीक जीवनकें दुस्कर तं बनाइये रहलैके, लोककें आब वकीले- मुख़्तार-जकाँ डाक्टरसँ  भय होमय लगलैए. मुदा करत की ? थिकाह तं  'वैद्यो नारायणो हरिः' ! मुदा, लगैत अछि, कनिएक दिनमे वैद्य आ बनियाँ, डाक्टर आ डकैत एके पांतीमे बैसाओल जयताह, से असम्भव नहि . पहिनहुँ   तं केओ कहनहि  छथिन:


वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर ।

यमः हरति प्राणाः , वैद्यो प्राणाः धनानि च !

अस्तु,  अहाँ वैद्यकें बूझी नारायण-हरि वा यम,  आब हमर (सैनिक-वैद्यक) जीवनक अनुभवक प्रतीक्षा करू. हमर अनुभव जतय अहाँक अनुभवक संग पूरैत अछि , ओ समाजक सामान्य अनुभव भेल . जतय हमर आ अहाँक अनुभव फूट -फूट बाट धेने आगू बढ़इत अछि, कहबाले हमरा लग किछु नव अवश्य अछि. आ सएह थिक एहि संस्मरणक नवीनता वा सार्थकता.

डायरीक एक पन्ना : पांडिचेरीसँ बंगलोर

 

पांडिचेरीसँ बंगलोर

2007 में भारतीय सेनासँ ऐच्छिक सेवानिवृत्ति सोचल विचारल निर्णय छल. ओकर आगाँ पोखरा, नेपालक  साढ़े पांच वर्षक प्रवास वरदान-जकाँ छल ; अन्नपूर्णा पर्वतमालाक सोझाँ सेती नदीक कछेर पर पोखराक मृदु आ स्वास्थ्यवर्धक जलवायुमे वास. किन्तु, 2012 मे पोखरासँ पांडिचेरी जयबाक नेयारक निर्णय स्वाभाविके छल – स्वदेश वापसी आ आर्थिक लाभ दुनू. मुदा, एहि बेर पांडिचेरीसँ बंगलोरक यात्रा पोखरासँ  पांडिचेरीक यात्रासँ भिन्न छल. मेडिकल फील्डमें लगातार करीब एकतालीस  वर्षक सेवाक पछाति पहिल बेर हम स्वेच्छासँ त्यागपत्र दए, पूर्णतः सेवानिवृत्त-जकाँ बंगलोर बिदा भेल रही. किन्तु, एहि लेल हमरा ने कोनो पश्चाताप छल, आ ने कोनो दुःख. चिकित्सकक रूप में लम्बा अवधि धरि सेना आ सेनासँ बाहर सम्पूर्ण देश आ विदेशमें सेवा कयल. सबठाम लोकक आदर आ प्रेम भेटल, चाहे लद्दाख हो वा लखनऊ. मेडिकल कालेजमे सेहो लगातार तेरह वर्षसँ  अधिक प्रोफेसरक पद पर काज कयल आ   नेत्र-चिकित्सा पढ़यबाक मनोरथ सेहो पूर भए गेल छल.

सत्यतः, जं सेनासँ ऐच्छिक सेवानिवृत्तिकें सेहो जोड़ि दी, तं, महात्मा गाँधी मेडिकल कालेज, पांडिचेरी लगा कय ई हमर तेसर त्यागपत्र थिक. किन्तु, एहि बेरुक त्यागपत्रक परिस्थिति आ मनोभाव आन बेरसँ सर्वथा भिन्न छल; विगत एक वर्षक कोरोना-कालमे प्राण तं बंचि गेल, किन्तु, परिवारजनक ह्रदयमे कोरोनाक  निरंतर भय अवघात नहि केलक से कोना कहब. यद्यपि, कोरोना कालमे सत्यतः हमरा अपना कहिओ प्राणक भय नहि भेल.    जे किछु.पांडिचेरी छोड़बाक निर्णय भेलैक. पांडिचेरीसँ बंगलोर जयबाक हमर ई निर्णय हमर सहकर्मी लोकनिकें अचानक-जकाँ बूझि पड़लनि. आ महात्मा गांधी मेडिकल  कालेजमे हमर ई  निर्णय सत्यतः,सबकें चकित केलकनि. विभागाध्यक्ष तं कहलनि, ‘ I am shocked !’ किन्तु, हमर त्यागपत्र अचानक छल नहि. हं, पांडिचेर कें त्यागि, बंगलोर अयबाक निर्णय 9/07/2020 क राति, एक विपरीत परिस्थितिमे, अचानक अवश्य भेल छल. तथापि, निर्णयक आकस्मिकतासँ ने हम क्षुब्ध रही, आ ने चकित. एहि निर्णय ले हमरा कोनो पश्चाताप सेहो, ने तहिया छल, आ ने आइ अछि. कतेको आकस्मिक घटनामे अनेक नीक अवसर नुकायल रहैत छैक, से के नहि मानत. ताहि परसँ हमर निरंतर आशावादी प्रवृत्ति हमर कल्पनाकें हठे कोनो आसन्न विप्पत्तिक दिस किन्नहु नहि जाय दैत अछि. हमर इएह सोच हमर संजीवनी थिक !   सर्वविदित अछि, कोरोना कालमे जखन अनायास करोड़ों लोकक जीविका चल गेलैये, तखन स्वेच्छासँ जीविका छोड़ब विरोधाभास-सन  प्रतीत होइछ. किन्तु, उचित-अनुचित केर कोनो एकटा मापदंड नहि. प्रत्येक निर्णय आ विचारकें परिस्थितिक परिप्रेक्ष्यमें देखबाक थिक. किन्तु, से आन कोना देखत. तथापि, हमर सहकर्मी, अस्पतालक मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट, आ विश्वविद्यालयक उच्चतम प्रशासनिक अधिकारी लोकनि हमरा निर्णय बदलबाक हेतु आग्रह अवश्य केलनि. विशेषतः एहि हेतु जे हमरा मेडिकल टीचिंगमे एखनो पांच वर्षक अवधि बांकी अछि. कतेक गोटे तं सत्तरि पार भेलहुँ  पर आमदनी व अनमना लेल कालेज नहि छोड़य चाहैत छथि. हमर अपन सबसँ आप्त सहकर्मी लोकनि तं अंत धरि कहैत रहि गेलीह, ‘ हमरा सबकें होइत छल, अंतहुमें कोनो चमत्कार हेतैक आ अहाँ एतहि रहि जायब’. हम कहलियनि, ‘ आब तकर सम्भावना नहि.  हमरा मन में पहिनहुसँ  कोनो दुविधा नहि छल. हम कृतसंकल्प रही. तें, हुनका लोकनिक आशाक कारण, केवल हमर प्रति हुनका लोकनिक स्नेह आ श्रद्धा छलनि. हुनका लोकनिक स्नेह आ श्रद्धासँ हमरा बल अवश्य भेटैत छल. हम शरीरें स्वस्थ छी, पढ़ायब आ चिकित्सा करब हमर चुनल आ प्रिय अनमना थिक.  किन्तु, सहकर्मी लोकनिक स्नेह आ श्रद्धाकें हम सदा निरपेक्ष भाव सँ देखैत रहलहहुँ  आ ओहिसँ अपन निर्णयकें कहियो प्रभावित नहि होमय देलिऐक.

बामासँ दाहिना: प्रो.राजलक्ष्मी, लेखक, विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीकान्त, प्रो. स्वाति  

कहैत छैक, सेना मनुष्यकें बदलि दैत छैक. से कोनो बेजाय नहि. हमर निनानबे प्रतिशत व्यवहार, हमरा,अपन  सैनिक जीवनक अनुशासनसँ प्रेरित बूझि पड़ैत  अछि. तें, अनुशासनक प्रति हमर दृढ़ताक कारण  कखनो काल हमर छात्र लोकनिक, हमरा प्रति अप्रसन्नताक आशा सेहो रहैत छल. कतेको छात्रकें हम, शर्ट केर खूजल बटन, हवाई चप्पल, बिनु काटल दाढ़ी, वा बिनु पॉलिश कयल जूता लेल टोकने हेबनि. बिलम्बसँ क्लास वा काज पर अयबाक तं प्रश्ने नहि. तथापि, जखन हमर अयबाक बेर भेल तं छात्र आ सहकर्मीक आदर-स्नेह हमर धारणाकें निर्मूल तं कइए देलक, बल्कि, हमर बिदाईक भोज आ सहकर्मी आ छात्र लोकनिक आदर-सत्कार हमरा अभिभूत कय देलक. सत्यतः, पोखरा, नेपालमे मणिपाल मेडिकल कालेजसँ  सेहो जखन निवृत्त भेल रही, विदाई ओतहु उत्तम भेल छल. आ किएक नहि ; हमरा सबतरि छात्र आ सहकर्मी लोकनिक आदर आ स्नेह-सम्मान भेटल. मुदा, पांडिचेरीक विदाई अविस्मरणीय छल. एहि विदाई विशेषता ई छलैक, जे विभागमे रहितो सहकर्मी लोकनि हमरा विदाईक  तैयारीक किछुओ अनुमान नहि होबय देलनि. विभागाध्यक्ष एहि सबहक सूत्रधार तं छलाहे, बांकी शिक्षक लोकनि, स्नातकोत्तर छात्रलोकनि, एहि विदाईक पूरा भार अपना उपर उठौने रहथि. सब स्तरक स्टाफ लोकनिक सहभागिता सेहो रहैक. संयोग एहन रहैक जे हम अपन कार्यावधिक अंतिम पन्द्रह दिनमे किछु छुट्टी नेने रही, आ किछु दिनक छुट्टीओ रहैक. तें, हमर बिदाईक  सब तैयारी प्रायः हमर अनुपस्थितिएमे भेलैक.  आ हमर छुट्टीएक अवधिमे विभागाध्यक्ष डाक्टर श्रीकान्त, डाक्टर राजलक्ष्मी आ डाक्टर स्वाति हमर डेरा आबि कय 27 मार्च, शनि दिनक दुपहरियाक भोजनक नोत देलनि. प्रोफ़ेसर राजलक्ष्मी तं पछिला आठ वर्षसँ हमरे यूनिटमें छलीह, जतय ओ सहायक प्रोफेसरसँ  प्रोफेसर धरिक पद धरि पहुँचलीह. प्रोफेसर स्वाति सेहो एखन हमरे यूनिटमें छलीह. हमरा लोकनिकें ई सौजन्य नीक लागल. मुदा, ई सौजन्यक आरम्भ छल. नोतक दिन, शनि, अस्पतालमें छुट्टी रहैक. हम अपने भोजमे  जयबाक तैयारीमे रही. किन्तु, राजलक्ष्मी आ स्वाति स्वयं आबि हमरा आ हमर पत्नीकें  होटल धरि लए गेलीह. ओतय विभागाध्यक्षक संग डिपार्टमेंटक सम्पूर्ण छात्र, स्टाफ, नेत्र-विभागक वार्ड सबहक सिस्टर लोकनि, ऑपरेशन थिएटरक सिस्टर लोकनि, सब मौजूद रहथि. दिव्य भोजन, हार्दिक सौजन्यक अतिरिक्त विद्यार्थी लोकनि मनोरंजनक किछु आइटम सब सेहो तैयार केने रहथि. एकटा बंगाली स्नातकोत्तर छात्र, डाक्टर अनुजीत पाल वायलिन पर रवीन्द्र संगीत बजओलनि. ई अद्भुत अनुभव छल. स्नातकोत्तर छात्रा लोकनि समवेत स्वरमे हिन्दीक अनेक ह्रदयस्पर्शी गीत गओलनि. पछाति,  स्नातकोत्तर वर्गक प्रत्येक वर्षक छात्र-छात्रा सँ प्रतिनिधि-जकां भिन्न-भिन्न विद्यार्थी लोकनि हमर प्रशस्तिमें संक्षिप्त भाषण सेहो देलनि ; सबमें हमर जयबाक कारण हुनका लोकनिक दुःख, आ हमर प्रशंसा रहैक. स्टाफ-सिस्टर-क्लर्क लोकनि ततेक भाव विह्वल भय जाइत गेलीह जे कतेककें किछु कहैत-कहैत कोंढ़ फाटय लगलनि. विदाईक रूप में विभाग दिससँ हमर आठ वर्षसँ बेसीक लगभग प्रत्येक स्मरणीय गतिविधिक फोटो सबहक फ्रेम्ड कोलाज भेंट कयल गेल. भेंटमे फोटो सबहक प्रिंटेड कॉपीक एकटा अलबम सेहो छल. डिपार्टमेंटक टेक्निकल असिस्टेंट कार्तिक हमर एकटा पैघ पोर्ट्रेट भेंट केलनि. ऑपरेशन थिएटरक नर्स लोकनि स्वामी रामकृष्ण परमहंसक जीवनी आ स्वामी परमहंस योगानंदक आत्मकथाक तमिल अनुवाद भेंट केर रूपमें देलनि. ओतय सबकें बूझल छलैक जे हम तमिल पढ़ैत  छी; विभागाध्यक्ष डाक्टर श्रीकांतक कुर्सीक पाछाँ तं हमर  ‘कुरल मैथिली भावानुवाद’क प्रति पिछला तीन वर्षसँ तेना रखने छथि जे हुनक कमरामे प्रवेश करिते सबहक दृष्टि ओहि पर पड़ैत छैक  अछि. एकर अतिरिक्त, वार्ड केर सिस्टर लोकनि हमरा ले अलगसँ  उपहार अनने छलीह. ई अभूतपूर्व छल. एतेक सौजन्यसँ  हमरा लोकनिक अभिभूत हएब उचिते छल. हमरा नहि बूझल छल जे  विभागमें सब गोटे हमरा एतेक मानैत छल !

अंतमें हम संक्षेप भाषणमें सबकें धन्यवाद देलिअनि. हमरा मोन छल महात्मा गाँधी मेडिकल कालेजमें योगदानक हफ्ता भरिक भीतरे हमरा डेंगू ज्वर भय गेल छल. ओहि वर्ष 2012 मे तमिलनाडुक केवल मदुरै शहरमें डेंगू सँ करीब दू सौ व्यक्तिक जान गेल रहैक. तखन हमरा विभागमे लोक नीक-जकाँ जनितो नहि छल. तथापि, वर्त्तमान विभागाध्यक्ष डाक्टर श्रीकान्त, हमराले सिद्ध चिकित्साक प्रणालीक, डेंगूक हेतु गुणकारी औषधि-‘ नीलबेम्बू कुडिनीर’- नामक ( चिरैताक ) काढ़ाक एक बोतल, अपने मोने हमरा लेल कीनि कय अनने रहथि. हुनक ई गुण हम से कोना बिसरितियनि. ‘हुनक एहि सौजन्यसँ  हमरा तहिया भान भेल छल जे हम अपन परिवारक बीचे आबि गेलहुँ-ए’. हमर एहि स्मरणक चर्चासँ डाक्टर श्रीकांतक आँखिमसँ  नोर खसय  लगलनि, आ ओ आँखि पोछय लागल रहथि, से पछाति हमर पत्नी कहलनि. हम जखन छात्र लोकनिकें संबोधित करैत ई कहलिऐक जे शिक्षक वस्तुतः कहिओ मरैत नहि छथि. ओ लोकनि सर्वदा छात्र लोकनिक भीतर वर्तमान रहैत छथि, तं, कतेको छात्र लोकनिक आँखि नोरा गेलनि, से हम अपनो देखलिऐक.

पछाति, डाक्टर राजलक्ष्मी आ स्वाति हमरा डेरा धरि पहुँचा  गेलीह. सामानक बान्ह-छानक कारण अस्त-व्यस्त घरहुमे ओ लोकनि हमरा सबहक संगे किछु काल छलीह. वयसें तं ई लोकनि हमर कन्याक वयसक छथि आ हिनका लोकनिसँ लम्बा अवधिक संग अछि. हमरा आँखिक सोझाँमें शिक्षकक विभिन्न स्तरकें पार करैत ई लोकनि आब प्रोफेसर छथि. मुदा, हमरा संग हिनका लोकनिक भाव परस्पर आदरक छनि, आ हम हिनका लोकनिक योग्यता आ अनुभवक सदा आदर करैत छियनि. ई लोकनि छथियो दक्ष आ कार्य कुशल. हमर दिन-प्रतिदिनक काजकें  ई लोकनि निरंतर बल दैत छलीह. ताहिसँ हम प्रसन्न रहैत छलहुँ  आ हम आश्वस्त सेहो रहैत छलहुँ , जे ई लोकनि कोनो प्रकारक समस्याकें सम्हारि लेतीह. विभागाध्यक्ष संगे हिनका लोकनिक तादात्म दोसर छलनि. फलतः, ई लोकनि हमरा लग आबि अपन अनेक समस्या कहैत छलीह. आब हमरा गेने तकर कमीक अनुभव हेतनि, से हमरा प्रतीत होइछ. कहैत गेलीह, ‘ अहाँक गेला उत्तर सेहो हमरा लोकनि गाहे-बगाहे अहाँकें फोन करबे करब’. हम भविष्यहुमे सम्पर्क-सहयोग आ मार्गदर्शनक हेतु आश्वस्त केलिअनि.  किन्तु, जीवनमे की स्थायी होइत छैक ! अन्ततः, लोककें माता-पिताक छाया सेहो उठिए जाइछ. सएह गप्प. हमरो हेतु हिनका लोकनिक साहचर्य एक सुखद अनुभव छल. कोरोना कालमे एवं ओहिसँ पहिनहु ई लोकनि एतबा खयाल रखैत छलीह जे हमरा पर काजक बेसी भार नहि पड़य. हम सेहो हिनका लोकनिके प्रोफेशनल स्वतंत्रता, आ प्रचुर अवसर दैत रहलिअनि. अस्तु, हम हिनका लोकनिक व्यक्तिगत आ प्रोफेशनल दक्षता तरासबामे जतबो किछु योगदान विगत आठ वर्षमे केलिअनि से जीवन पर्यन्त हिनका लोकनिक संग रहतनि. संगहि, पांडिचेरी जं किछु तमिल सिखल तं ताहिमें हमर एतुका सहकर्मी लोकनिक योगदान अवश्य छनि. राजलक्ष्मीकें तं कतेक बेर हम तमिल भाषाक ‘फॉर्मल टीचिंग’ देबा ले सेहो कहियनि . आइ काल्हि तमिल भाषीओ लोकनिक बीच तमिलमें दक्ष व्यक्ति भेटब सुलभ नहि. राजलक्ष्मी ओहि दृष्टिऍ अपवाद छथि. ताहिसँ हम निरंतर लाभ उठाओल. श्रीकान्त सेहो यदा-कदा सहायता करैत छलाह. हम अपन रुचिए एतय रहैत प्रसिद्द तमिल ग्रन्थ  ‘कुरल’क भावानुवाद प्रकाशित कयल सेहो एकटा संयोगे छल; ओना ई पोथी तं पन्द्रह वर्ष धरि हमरा संग कतय-कतय ने घूमल. ‘कुरल’क भावानुवादक कारण एतय हम ओहुना बहुतो गोटेक श्रद्धाक पात्र भए गेल रही. हमरा अछैत, हमर आप्त सहकर्मी  लोकनिकें सेहो मिथिला आ मैथिलीक किछु अनुभव भेलनि. एहि स्मरणकें स्थायित्व देबा ले हम डाक्टर श्रीकांत, राजलक्ष्मी, स्वाति आ एक आओर भूतपूर्व सहकर्मी डाक्टर अशोककें ‘मधुबनी पेंटिंग’क नामसँ  प्रसिद्ध मिथिला चित्रकलाक एक-एक प्रति उपहार स्वरुप देलिअनि जाहिसँ  ओ लोकनि अपन घर सजाबथि, आ मिथिला-मैथिलीक संग हमरो नहि बिसरथि.

हँ, संयोगसँ  पेंटिंगक गप्प भेलैक तं हमरा एम. एस. नेत्र चिकित्साक अंतिम वर्षक हमर छात्रा डाक्टर स्टेफनी सेबेस्टियनकें बिसरब असंभव. ई मृदुभाषी, मेधावी, मलयाली छात्रा जेहने पढ़बामें नीक छथि, तेहने गुणवती; अमेज़न इंडिया पर हिनक अंग्रेजी उपन्यास ‘ Love to Death’ स्वतः आकृष्ट करत. मुदा, गप्प से नहि. ई छात्रा महात्मा गाँधी अस्पतालमे हमर काजक अंतिम दिन फाइनल इयर केर आन छात्र-छात्रा लोकनिक संग हमरा लग अयलीह आ फाइनल इयरक छात्र लोकनिक दिससँ, अपन हाथें कागज पर पेंसिलसँ बनाओल हमर स्केचकें फ्रेम करा हमरा ले उपहारमें देने गेलीह. 


नेत्र-चिकित्सक डा.स्टेफनी सेबस्टियनक बनाओल हमर रेखाचित्र  

एहि चित्र केर नीचा हिंदी कवितामें हमर प्रशंसाक तीन पाँतिक अतिरिक्त अंग्रेजीमें हमर प्रति कृतज्ञता
 सेहो छल. लिखल पाँतिक नीचा फाइनल इयरक पांचो डाक्टर- श्राव्या, जूही, कौशिक, महालक्ष्मी आ स्टेफनीक नाम लिखल छैक. हमरा एखन धरि ई नहि बूझल छल जे ई डाक्टर-लेखिका-उदीयमान नेत्र चिकित्सक  एतेक नीक चित्रकार सेहो छथि. वस्तुतः हमरा सहित अधिकांश  शिक्षक मेडिकल कालेजक छात्रक व्यवसायिक दक्षताक अतिरिक्त छात्र लोकनिक व्यक्तित्वक आन पक्षकें कदचिते देखि पबैत छथिन. तकर कारणो छैक; हमरा लोकनिकें छात्र लोकनि सबसँ सामाजिक स्तर पर मेलजोलक अवसर कदाचिते भेटैछ. पेंसिल स्केच केर अतिरिक्त डाक्टर स्टेफनी हमरा ले फूटसँ अपना हाथें लिखल एक पेजक एकटा चिट्ठी सेहो अनने छलि जकरा पढ़िकय आइओ हमर आँखि नोरा गेले. हमरा लगैत अछि, शिक्षकक रूपें ई चिट्ठी हमरा हेतु एकटा तगमा थिक !

आब बंगलोर अयना करीब तीन हफ्तासँ  बेसी भए गेल. कोरोनाक संकट छोड़ि ककरो चेतनामे एखन आओर किछु नहि अबैत छैक. किन्तु, जं-जं दिन बिततैक हमरा नहि लगैत अछि, पांडिचेरीक प्रवास आ ओतुका, छात्र आ सहकर्मी लोकनि हमरा कहियो बिसरताह. हुनका लोकनिकें हमहूँ  कोना बिसरबनि.

हमर नाम डा. स्टेफनी सेबेस्टियनक पत्र 

Monday, September 9, 2024

तरल ह्रदय आ ऊसर डीह

 

तरल ह्रदय आ ऊसर डीह

मालिक कका, कनियाँ काकी (काकी-मौसी), आ हरितालिका पूजा

डीह पर भांगक जंगल. अंगनामे घास. बाड़ीमे पहिनहि-जकाँ आम, जामुनक गाछ. जहिना तहिया रहनि. केवल ओ धात्रीक गाछ, जकर छाहरिमे कतेक बेर नोत खयने हएब, नदारद. ई सब देखि अकस्मात् मालिक कका, कनियाँ काकी (काकी मौसी) परिवार आँखिक आगाँ जीवंत भए उठल.
मालिक कका-बालगोविंद बाबू- आ कनियाँ काकी रहथि, निःसंतान. मुदा, सर-समाजक कोनो धिया-पुताकें अपन संतानसँ कम कहाँ बुझथिन ओलोकनि. सुनैत छी, हुनक मस्तमौला, शाहखर्ची स्वभावक कारण हुनक केओ बालसखा एकबेर जे हुनका ‘मालिक’ कहब शुरू केलखिन, से ओ सब दिन आ सबहक लेल ‘मालिक’ भए रहि गेलाह: मालिक बौआ, मालिक काका, आ पछाति, मालिक बाबा.

 मुदा, आइ आधा शताब्दीसँ बेसी अवधिक पछाति, एक भिन्न कारणसँ मालिक कका आ कनियाँ काकीक स्मरण भए आयल अछि.  भरि गाममे ‘हरिताली’क उपास बहुतो महिलालोकनि करथि, मुदा, हरितालिका पूजा केवल मालिक कका आ कनियाँ काकीए अंगनामे होइनि. जाहि आँगनमे कहियो कोनो मुंडन-उपनयन-विवाहक अवसर नहि अयलैक, ओ आँगन हरितालिका पूजाक अवसर पर हठात् जीवंत भए उठैत छल. अंगना-बहरी/ दरबज्जा धियापुता, माउगि-पुरुखसँ भरि जाइत छल. लोक अबैत छल श्रद्धा-पूर्वक पूजा-अर्चना करैत छल आ एहि वार्षिक उत्सवमे सहभागी होइत छल.
कदमे छोट, मध्यम बान्ह आ पिण्डश्याम रंगक, मालिक कका स्वभावसँ मखौलिया रहथि. बात-बातमे ककरो हँसा देब हुनका हेतु सुलभ रहनि. दियाद-बाद आ सर-समाजक नेना-भुटकाकें चेष्टा आ स्वभावक अनुकूल, भतखोखारि, गुड़गुड़ी लाल सदृश तेहन नामकरण कए देथिन, जे चेतन आ वयस्क तं हँसबे करथि, अपन नाम सुनि धियापुताकें अपनहुँ हँसी लागि जाइक.
मालिक ककाकें पहिने तं काज जोकर मरौसी भूमि रहनि. मुदा, जीवन-यापनक पद्धतिक विपरीत, उद्यमक अभावसँ निःसंतान रहितो, क्रमशः निर्भूमि भए गेल रहथि. सुनैत छी, अपन जवानीमे हुनका ओतय, किरासन तेलक इजोतमे राति क’ नाचक आयोजन होइत छल. कमलाक मारल निर्धन गाँवमे जहिया मनोरंजनक साधनक नितांत अभाव रहैक, रामलीला-कीर्तन-पूजा-नाच- भाओ- भूतक झाड़ब- गुदरियाक सारंगी वादने जनसामान्यक हेतु मनोरंजनक साधन रहैक.  स्वभाव आ सहमिलू-सहृदय रहनि. जाति-पाँतिक आरि-धूरक बहुत परबाहि नहि करथिन. तें, मालिक कका सबहक बीच लोकप्रिय रहथि.  

गहुँआ रंग, मध्यम बान्ह, नमतीमे औसतसँ बेसी, स्वभावें मृदु आ सहृदय, मालिक ककाक पत्नी, कनियाँ काकी/ काकी-मौसी अद्भुत शिल्पकार रहथि. मुरुत गढ़ब, मड़बा-कोबर- देहरि आ देवाल पर चित्रकलाक, जकरा आइ-काल्हि मिथिला वा मधुबनी चित्रकला कहैत छैक, अद्भुत दक्षता रहनि. अवाम गाममे हुनकासँ नीक सामा-चकेबा प्रायः केओ नहि बनबथि. तें, हुनकर बनाओल सामा-चकेबा देखबाक हेतु जेर बान्हि सखी-बहिनपालोकनि हुनकर अंगना जाथि. एहि सबसँ ऊपर प्रति वर्ष हरितालिका पूजाक हेतु  हुनका हाथें बनाओल बसहा बड़द पर सवार शिव-पार्वतीक मूर्तिक निर्माण कनियाँ काकीक शिल्पकलाक उत्कृष्टताक नमूना होइत छल. तहिया गाममे ककरो लग कैमरा तं रहैक नहि, तखन केवल स्मरण ओकर प्रमाण थिक. 

 हरितालिका ( गौआँक शब्दे ‘हरिताली’) पूजाक हेतु तैयारी पूजाक दिनसँ बहुत पहिने आरंभ होइत रहैक. मुदा, ओ शिव-पार्वतीक मूर्तिक निर्माण पूजासँ कतेक दिन पहिने आरंभ करथिन, से स्मरण नहि अछि. पहिने सब किछुक आरंभ नीके दिन ताकि होइत छलैक. मुदा, एतबा अवश्य जे बसहा बड़द आ शिव-पार्वतीक माटिक मूर्तिक निर्माण एकटा जटिल प्रक्रिया रहैक. साफ़ चिक्कनि माटिक चुनाव. बाँसक कमचीक आ खढ़क बनाओल आकृतिक ऊपर परत-दर-परत माटिक लेप. सब किछुकें सुखायब, चुनेटब, रंगब आ  सजावट, सेहो बरखा-बुन्नीक मासमे अवश्य श्रमसाध्य छल हेतैक.

साठि वर्षक धक्कामे आबि, पारिवारिक परंपराकें तोड़ैत मालिक काका अपनहि घरमे छोट-मोट दोकान सेहो खोललनि. मुदा, दोकान कतेक दिन चलओलनि से कहब मुश्किल.

अवामक सामाजिक काजमे मालिक ककाक एकटा आओर योगदान छनि; 1978 वर्ष मे मालिक कका एवं नुनू भाई (अभयनाथ झा प्रसिद्ध भरत जी) क अगुआईमे अवाम गाममे पहिल बेर (शारदीय ) दुर्गापूजाक आयोजन भेल रहैक, जे आब बहुत पैघ स्तर पर मनाओल जाइछ। अवाम गामक सामाजिक-सांस्कृतिक  क्षेत्रमे हिनकालोकनिक ई कालजयी योगदान थिक।

मालिक ककाकें अंतिम बेर हम दरभंगा मेडिकल कालेजक मेडिकल वार्डमें देखने रहियनि. तहिया हम पढ़िते रही. मालिक काका कोनो जटिल बीमारीक चिकित्सा लेल अस्पतालमें भर्ती रहथि. ओ हमरा देखिते विह्वल भए गेल रहथि. सहजहि. हमर जन्म हुनका आँखिक सोझाँ भेल छल. आयब-जायब- खायब पीयबक व्यवहार छल. सहृदय तं छलाहे. हमर छात्रजीवनमे आन गौआँ जकाँ हमरा उत्साहितो करथि. से  ओहि दिन हम डाक्टर-जकाँ हुनका बेडक लग, पौथानमे ठाढ़ रही.  अस्तु, विपत्तिमे अपन लोककें देखि जे हुबा हेबाक चाही, से भेल हेतनि, से असंभव नहि. तथापि, मालिक कका कहिया मरि गेलाह, स्मरण नहि अछि. कनियाँ काकीकें मालिक ककाक मृत्युक पछाति अनेक बेर देखबाक अवसर भेल. एकाकी जीवनक कारण विक्षिप्तता आ ओही कारण अनेक रोग. हुनको मृत्यु कहिया भेलनि, स्मरण नहि अछि. मुदा, कनियाँ काकी आ बालगोविंद (झा) बाबू / मालिक कका हमरा कोना बिसरताह. हुनक हास परिहास जे सुनने छथि, तनिका ओ कोना बिसरथिन.   
हँ, एतबा अवश्य, हुनकालोकनिक मृत्युक पछाति अवाममे आन कोनो परिवार मे ओहन हरितालिका व्रत-पूजाक आयोजन आन केओ केलनि से हमरा सुनल नहि अछि.
नोट: हरितालिका व्रत-पूजाक महात्म्यक विस्तृत वर्णन हमरा निम्नलिखित ब्लॉग पर भेटल.[1]

सन्दर्भ :                                                                                                                           
1. https://sanskritbhasi.blogspot.com/2018/09/blog-post_12.html#google_vignette
सारांश:
 पं. जगदानन्द झाक उपरोक्त ब्लॉग पर स्कन्द पुराणमे वर्णित हरितालिका पूजाक इतिहास, महात्म्य एवं          विधान भेटत.[1] सारांश ई जे नारद मुनिक प्रस्ताव पर पार्वतीक पिता हिमवान, पार्वतीक सहमतिक           विना हुनक विवाह विष्णु भगवानसँ करयबाक सहमति दए देलखिन ई पार्वतीक इच्छाक विरुद्ध छल. सखी   लोकनिक सुझाव आ सहयोगें पार्वती सखी लोकनिक संग एक सुदूर पर्वतीय गुफामे जा शिवक        पूजा-अर्चनाक      हेतु चलि गेलीह. माए-बापकें किछु बूझल नहि भेलनि.अर्थात् पार्वती सखी (ताली) द्वारा हरण कए गेल     रहथि:    (हरिता तालिभिः या सा हरितालिका अर्थात् पार्वती ). ओही दिन भाद्र मासक तृतीयाक दिन       हस्त नक्षत्रमे बालुक शिवलिंगक स्थापना कए शिवक पूजा-अर्चना कयलनि (आ शिवकें पतिक           रूपमे प्राप्त             केलनि). पछाति, स्वयं शिव ओहि पूजाक महत्व पार्वतीकें कहलखिन. इएह हरितालिका पूजाक आदि थिक.


Thursday, September 5, 2024

Reflections on Primary Education in India

 Teachers’ Day 2024

Reflections on Primary Education in India


Long colonial rule played havoc with literacy and education in India.[1] Today, seventy-seven years after Independence, the quality of  primary education is far from satisfactory. 

Facts given below substantiate the statement above. Suggestions on improving the learning outcome in government primary schools are also offered in this brief note.

Annual Status of Education Report (ASER) on the cognitive skills of adolescents, and a report on the quality of teachers by the Tata Institute of Social Sciences on India’s school education landscape paint a disturbing picture.[2] The first report, ‘Beyond Basics’ reveals that 25%  per cent pupils in the 14-18 age group cannot read Class II level text fluently even in their mother tongue. Also, more than half the children in rural India have difficulty with basic mathematics. These findings based on a large and varied sample cast a shadow of doubt over India’s literacy rate of 77.7 percent that NFHS-5 (2019-21) revealed. In other words, the pupils lack the three elementary skills: reading, writing, and arithmetic.

The above reports give insight into the problem at National Level.

At state level, situation in Bihar are rather revealing.As per a report published by Jan Jagran Shakti Sanghathan (JJSS) in January-February 2023 on a survey of eighty-one government primary and upper-primary schools in Katihar and Araria districts of Bihar, ‘none of the surveyed schools met the norms of the Right to Education (RtE) Act.’[2] The problems include poor pupil attendance (20), high student/ teacher ratio, and absence of teachers from schools. According to this report, Direct Benefits Transfer for textbooks and uniform has also adversely impacted education since the parents in poor families prioritize their own needs over textbooks and uniform.[3] 

The report also found an increasing prevalence of cheap and dingy tuition centers threatening to displace government schools. They prove a barrier to quality education and pose risks to children’s health as well. Thus success in achieving the goals of the Right to Education(RtE), 2009  and the Sarv Shiksha Abhiyan( SSA) remain a pipe dream particularly among the students from impoverished families and marginalized communities.

Apart from the above,one major challenge facing quality education for children in rural areas is the non- availability of trained and qualified teachers, particularly in urban poor, and rural areas. [4] 

According to a study by the National Institute of Educational Planning and Administration (NIEPA), only 53% of teachers in rural areas have received any form of teacher training, compared to 86% of teachers in urban areas.[5]

Therefore, to summarize the current situation in primary education is far from ideal. To improve the situation following suggestions targeted at major problems are offered:

  1. Poor student attendance:  

  1. Involvement of social workers, teachers and religious teachers to impress upon parents to ensure attendance of their children and wards.

  2. Strict enforcement of Prevention of Child Labour 

  3. Direct Benefit Transfer be linked with defined month-on- month percentage of pupil attendance.


       2. Improving the quality of teachers and teachers’ attendance

           require both short- and  long-term  measures. 

                  a. Interventions for improvement in higher education and  

                   training of teachers in pedagogy requires action by the 

                   state governments. 

                  b. Ensuring attendance of teachers also falls under the

                     administrative domain.

        3. Improvement in Learning outcome

  1. Everyone must acquire writing, reading and arithmatic skills during first 5 years of schooling.

  2. Defined metrics for learning outcome be employed for continuous and periodic assessment of students along with separate performance metrics for teachers and the institutions.

  3. Performance-based grants to schools, and increments to teachers.

  4. Strict ban on private tuition by teachers employed in Govt. Schools.

         4. Improvement in School Infrastructure

Conclusion

Status of primary education in India has improved in the last half a century. Yet, it remains far from ideal. To achieve the goals of Sarva Shiksha Abhiyan and Right to Education, interventions both at social and administrative levels are imperative. Involvement of society as a whole shall help achieve the goal sooner than later.


References:

1. Dharampal.The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century.


2. Editorial. Poor teenage learning levels, a national crisis, Business  Line Jan 21, 2024

https://www.thehindubusinessline.com/opinion/editorial/poor-teenage-learning-levels-a-national-crisis/article67762298.ece. published Jan 21, 2024.


3. Frontlline News desk https://frontline.thehindu.com/news/bihar-schooling-crisis-survey-report/article67157898.ece. published Aug 04, 2023.


4. Kumar Ashwini. Current education reforms and policies in India for primary (elementary) school children.https://www.linkedin.com/pulse/current-education-reforms-policies-india-primary-elementary-kumar. Published Dec 16, 2022.


5. National Institute of Educational Planning and Administration (NIEPA: Teachers in Indian Education System.NRRPS/001/2016.

http://www.niepa.ac.in/download/Research/Teachers_in_the_Indian_Education_System.pdf

Tuesday, August 27, 2024

Rape and Murder in Kolkata

 

Rape and Murder of a Doctor in Kolkata


Rule-based society takes cognizance of crime as a routine; swift punishment proves deterrent. Crime against women, children, and marginalized deserve not only swift action but also exemplary punishment. These fall in the realm of ideal.

Lethargy of law enforcement agencies is legendry in India. Add to that political interference, and you have lawless state where criminals run amok. Recent rape and murder of a young doctor in Kolkata jolted the medical community and shook the conscience of the Nation. Although the nature of crime left no one in doubt everyone was not on the same page. The Supreme Court of India had to step in suo moto to insure justice.

Medical Professional have to work in a demanding environment. Nature of job, and commitment to duties often force them to neglect their own safety and comfort that, ironically, remain the last thing on the mind of administrators and the governments. Regulatory bodies do not go beyond the documentary compliance as for as the facilities in the hospitals and colleges go. Thus the crimes against medical professionals continue and enforcement agencies are never held accountable in spite of the customary hue and cry in which the political parties take stand based on their own sectarian agenda. The state Governments defend the police and the institutions where crimes occur. This hasn't served the government of the day in the instant case; the government is accountable. To make matters worse the ruling party workers stepped in . They went so as far as vandalizing peaceful demonstrations by doctors. It was shameful to say the least.

We as a society we need to reflect. Crimes against women reflect societal attitude. Rape of a minor in ‘illegal NCC Camp’ in Tamil Nadu, gang-rape of a women by the crews of a State Road Transport Corporation-run bus Dehradun-bound bus, and rape and murder of a minor Dalit girl in a far-off village in Muzaffarpur, Bihar are some examples.

Attitude of the society toward women needs to change. Romanticizing eve-teasing, like in the movies, need to stop. Mothers need to stops provoking their sons to ‘take care’ of sisters who marry outside the cast. Mother-in-laws have to stand by daughter-in-laws when they rightfully question the authority of their husbands. Employers need to stop gender-based profiling of workers, and need to ensure safe working environment for women. Law enforcement agencies have their work cut-out too. They need to enforce law without fear or favour in a time-bound manner whenever laws are violated.       

     

Tuesday, August 20, 2024

डिजिटल संस्करण आ डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्मक सहायतासँ पोथीक पहुँच बढ़ाबी

 

डिजिटल संस्करण आ डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्मक सहायतासँ पोथीक पहुँच बढ़ाबी 

एहि बीच हमर रुचिक अनेक मैथिली पोथी छपल. हम किनबाक नेआरो करैत रही. मुदा, डिजिटल प्लेटफार्म पर पोथीक अनुपलब्धता वा प्लैटफॉर्म पर डिजिटल संस्करणक अभावक कारण ‘दूर रहैत’ पोथी किनि नहि सकलहुँ. अस्तु, एहि संक्षिप्त लेखमे हम मैथिली पोथीक  डिजिटल संस्करणक अभाव एवं  डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म ओकर अभावक विषय पर विचार करय चाहैत छी.

सर्वविदित अछि, इन्टरनेट आविष्कार आ मोबाइल फ़ोन टेक्नोलॉजीक सहायतासँ पढ़ब आ लिखब दुनू सुलभ भेलैए. के नहि जनैछ, विश्वभरिक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय आ अनेक अन्य संस्थाक पुस्तकालयक द्वारि घर बैसल, ओहि सब पाठकक हेतु खूजल छनि, जे इन्टरनेटक प्रयोग करब जनैत छथि. ई वरदान थिक. एहि सब ‘वेब साइट’ पर पोथी, पाण्डुलिपि, इंटरव्यू, फिल्म, सब किछु भेटत. संयोगवश, एहि किछु ‘वेब साइट’ पर मैथिलिओक किछु पोथी उपलब्ध अछि. मुदा, बहुत नहि. श्री गजेन्द्र ठाकुर ‘विदेह ई पाक्षिकक’ पत्रिकाक माध्यमसँ मैथिलीक अनेक पुस्तक आ छात्रोपयोगी सामग्री http://www.videha.co.in/archive.htm पर पाठकक हेतु संकलित कयने छथि. किछु लेखक लोकनि सेहो यदा-कदा https://archive.org/ एवं अन्य साइट पर अपन पोथी देने छथिन. तथापि, हमरा जनैत, संम्पूर्ण मैथिली साहित्यिक सम्पदाकें ध्यानमे रखैत ई पर्याप्त नहि. आ नव पोथी मुफ्त बिलहबाक तं प्रश्ने नहि उठैछ.
तथापि, एक दिस जं मैथिलीमे पोथी नहि बिकयबाक समस्या छैक, तं दोसर दिस पोथी-पत्रिकाक पाठक धरि नहि पहुँचबाक समस्या सेहो छैक.  एहि विषयक चर्चा  हम आइसँ करीब पाँच वर्ष पूर्व पहिने अपन ब्लॉग (‘
बेचबाले पोथीकें किनबा जोग बनाउ, पाठक धरि पहुँचाउ’) (https://kirtinath.blogspot.com/2019/08/blog-post.html) मे कयने रही, जे आइओ प्रासंगिक अछि. कारण, आइओ पुस्तक वितरण आ विपणनमे बहुत परिवर्तन नहि भेलैए. फलतः, ‘पोथी नहि बिकाइए’क चिंता जहिना तहिया रहैक, तहिना आइओ छैक.
एहि अवधिमे नव पीढ़ीक रचनाकारक नीक संख्या सोझाँ आयल छथि. स्थापित रचनाकार तं छथिए. तथापि, ग्रामीण क्षेत्रमे एवं डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म पर सब नव-पुरान पोथी भेटबो नहि करत. भेटबो करत तं पोथीक  इलेक्ट्रॉनिक संस्करण (
kindle edition) भेटत कि नहि, कहब असंभव.
अस्तु, आइ मैथिलीमे जे कोनो पोथी छपैत अछि, सबहक डिजिटल एडिशन बनाबी आ सबहक डिजिटल वर्शन डिजिटल मार्केटिंग प्लैटफॉर्म पर पाठकक हेतु किनबा लेल उपलब्ध हो. जाहि सबसँ पाठक कतहु होथि पोथी किनि सकथि. जे ‘हार्ड कॉपी किनय चाहथि, ओ तं किनिए सकैत छथि.

एतय ई कहब अतिशयोक्ति नहि हएत जे, कारण, एखनि पोथीक प्रकाशनमे कंप्यूटरक प्रयोग अनिवार्य अछि, आ पोथीक डिजिटल संस्करणमे ततेक थोड़ श्रम लगैछ जे एकरा ‘दालि-भातक कओर’ बूझि सकैत छी. अस्तु, मुद्रक-प्रकाशकक संग पोथी आ पत्रिकाक प्रकाशनक करारमे पोथी-पत्रिकाक डिजिटल कॉपीक प्रकाशन आ डिजिटल प्लैटफॉर्म पर मार्केटिंगक हेतु लिस्ट करबाक करार सेहो अवश्य सम्मिलित कराबी. एहिसँ पोथी-पत्रिका आ मैथिली साहित्यक पहुँच संपूर्ण विश्व धरि तं पसरिए जायत, हमरालोकनिकें दूर देशमे बैसल मैथिलीक पाठकक सहयोग सेहो अनायास भेटत. मातृभाषा-पिपासु पाठक लोकनिक संतुष्टिक तं गपे नहि हो.      

Wednesday, July 3, 2024

गामक डायरी : गाछ पर आम लुबुधल अछि, मुदा तोड़त के !

 

गाछ पर आम लुबुधकल अछि, मुदा तोड़त के !

बंगलोर रहितो हम गाम अबैत रहैत छी; एही बेर तँ छौ मासमे तीन बेर आबि गेलहुँ. प्रत्येक बेर किछु परिवर्तन देखबामे अबैछ. एहि लेखमे एहि बेरुका अनुभव कहब.

जूनक अंत. एखन आमक मास छैक. आम फड़लो छैक. मुदा, दू गोट बड़का समस्या: बानरक उपद्रव आ गछचढ़ाक अभाव. फल ई जे जँ जकरा आम बेचबा योग्य गाछी-कलम छनि, से जँ गाछ पर लागल आम बेच नहि लेलनि तँ तोड़ि कए घर आनब असंभव. युवक सब गामसँ  बाहर अछि. गाछ पर चढ़त के? व्यापारी अपन आम तोड़िए लैछ. मुदा, अहाँ की करब. बानरक उपद्रव दोसर समस्या थिक, जे सब गाममे नहि छैक, मुदा, जतय छैक ओतय लोक परेशान अछि. बानर चिडैक विपरीत खाइत कम छैक, बर्बाद बेसी करैत छैक.
तथापि, गाममे खयबा योग्य उत्तम आम खूब भेटैत छैक. किन्तु, कार्बाइडक पाउडर दए आम पकेबाक रोग गामहु धरि पसरि गेले, तकर कोन उपाय? देखबामे ललितगर सपेता किनल. मुदा, खयबामे पनिसोह.

गर्मी असाध्य छैक. उमस खूब. बरखाक अभाव.  लगैतए एहि गर्मीमे ओसरा पर काँच अल्हुआ राखि देबैक तँ  अपनहि उसिनल भए जायत ! तैओ हिम्मत कए आइ टहलबा लेल बहरयलहुँए. चारि बजे फरिच्छ भए जाइछ. एखन साढ़े चारि बजैत छैक. तीन-चारि वर्ष पहिने माघ मासक अहल भोरे, सड़क पर टहलनिहार लोकनिक बड़का जुटान देखने रहिऐक. महिला, पुरुष सब. मुदा, एहि दू बेरसँ टहलनिहारक संख्या कम. हमरा जे केओ भेटैत अछि, हम टोकि दैत छियैक. केओ चिन्हियो जाइछ, ककरो परिचयो देबय पड़ैछ. हम टहलानमें बदलैत गामक नाड़ी परीक्षा सेहो करैत छी.

करीब बीस मिनट टहलैत, हम पड़ोसी गाम पोखरिभिंडा धरि चल आयल छी. सूर्योदयक समय बीति चुकल छैक. क्षितिज धरि दृष्टिक कोनो अवरोध नहि. मुदा, अलासयल सूर्य एखनो मेघक पातर आवरणक पाछाँ पड़ल छथि. नीके. सोझाँ अओताह, तँ ओहने प्रचण्ड. तें, नुकायले रहथु, यावत् धरि हम गाम पर पहुँचि ने जाइ.

एही बीच हम एक ग्रामीणकें बाटक कातसँ एकटा भाँटि/ भटवासक गाछ उखाड़ैत देखैत छियनि, दतमनि लेल.

                                                लक्ष्मीजी दतमनि लेल भाँटिक गाछ उखाड़ने 

दतमनि लेल कोन गाछ वा गाछक ठारिक उपयोग करी, ताहि लेल गाम घरक कहबी हमरा मन पड़ैछ:                  

                                                उत्तम चिरचिरी मध्यम भाँटि

                                                किछु-किछु साहड़ आओर सब झाँटि

 [ दतमनि ले प्रयुक्त भैषज्य : चिरचिरी: Achyranthes aspera भाँटि: Cleodendron infortunatum साहड़ Ficus virens]

चिरचिरी  आ भाँटि तँ सड़कक कातमे सबठाम भेटत. मुदा, गाम घरमे आब साहड़ अभावृत्तिए भेटय. हम ग्रामीण, लक्ष्मीजी,क हाथक भाँटिक गाछक फोटो लैत छी. बाटक कातमे भांग, अरिकोंछ, नेबोक गाछ, झिंगुनीक लत्ती, दनूफ़क फूल देखबामे अबैछ. हम सब किछुक फोटो घिचैत छी. आब शहरी लोकनिकें ई सब देखबाक संयोग कतय भेटतनि. दनूफक फूलक चर्चा तमिल महाकाव्य शिलापत्तिकारम् मे सेहो अभरल छल. उत्तरापथक अभियानमे विजयी भए  चेर सम्राट् सेंगुट्टवन जखन अपन राजधानी आपस होइत छथि तँ हुनक गलामे दनूफ़क फूलक माला छनि, तकर वर्णन छैक. ओना विष्णुक पूजामे मिथिलामे दनूफ़क फूल विशिष्ट मानल जाइछ.

                                                दनूफ़क फूल (Leucas aspera)

किछु आगू एलहुँ तँ सड़कक पूब युवक पीपरक गाछ भेटलाह. भेटैत तँ छथि ई बहुत दिनसँ. मुदा, एहि बेर हिनक स्वरूप दोसर रंग देखल; केओ गौआँ हिनक डांडमे गुलाबी रंगक कपड़ा लपेटि देलकनि. केओ थोड़ेक लाल-पियर ताग. जड़िक चारू कात सीमेंटसँ इंटा जोड़ि चबूतराक आकार सेहो देखलिऐक. माने, देखिते-देखित ई युवक अस्वत्थ वृक्षसँ  देवता बनि गेलाह. गीतामे भगवान कृष्ण तँ अपन पर्याय बनाइए देने छथिन (अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां,श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १०/२६).   आब ई कोनो पुजगिरीक गुजर-बसर केर सहारा सेहो बन लाहे. वृक्षसँ हालहिमे देव बनल एहि गौआँ अस्वत्थकें बधाई देलियनि, हुनक फोटो झिकल. आगू बढ़लहुँ तँ टेलीफ़ोनक तार पर बैसलि दू गोट कोइली भेटलीह. अंग्रेजीमे कहैत छैक: two for joy! तें हुनको फोटो झिकल. किछु आओर बटोही. केओ पैदल, केओ साईकिल पर, आ बेसी मोटर साईकिल पर. एक गोटे माथ परहक बोझा नीचा राखि ओहि पर बैसल रहथि. हमरा भेल. रोगी ने होथि. ओ हमरा आश्वस्त केलनि. भोरुका बसातमे टहलान देनिहार तँ सहजहि. एक दढ़ियल मौलवी साहेब पूब मुँहे योगक व्यायाम करैत रहथि.

दू गामक बीचक बाधसँ होइत जाइत ई सड़क गौआँ लोकनिक टहलबाक सुपरिचित आ प्रिय बाट थिक. खूब साफ़, चिक्कन आ नयनाभिराम.

आगू अयला पर धनखेतीमे एसगर बैसल कडांकुल (Greater Adjutant ) देखलिऐक.

                                                     कडांकुल (Greater Adjutant)

कनिए दूर पर ओकर जोड़ा रहैक. हम फोटो झिकल. पछाति कडांकुलकें भेलैक, मनुख थिक, कोन ठेकान जाने ने लए लिअय: चिडै-चुनमुनीक बीच हमरा लोकनिक एहने छवि भए गेले, उचिते. नहि जानि सुखायल धानक खेतमे एहि कडांकुलकें कोन भोजन भेटितैक. ई खाइत तं ओएह सब किछु अछि जे गिद्ध खाइछ. कतहु आन ठामसँ भोजन कएने हएत आ एतय भोरुका प्रकाशमे किछु आराम करैत हो, से संभव. मुदा, दुनू फोटो झिकओलक आ दुनू उड़ि गेल. हमरा सबहक बाल्यकालमे प्रतिवर्ष चौर आ नासीमे किछु दिन लेल कडांकुल आबि कए बैसिते छल. मुदा, आब एकर संख्या बहुत कम भेलैए.

विकिपीडिया कहैत अछिपहिने कडांकुल (Greater Adjutant ) पक्षीक पैघ समुदाय एशियामे रहैत छल. एकर मिलिटरी सैनिक जकाँ तनिकए, सोझे टांग उठा-उठा चलबाक कारण एकर नाम Adjutant stork राखल गेल छलैक.१९म शताब्दीमे कलकत्तामे एकर संख्या ततेक रहैक जे एक समयमे ई कलकत्ता शहरक निशानी छल आ कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशनकेर चिह्नमे एकर चित्र रहैक. मुदा, वर्ष २००८ मे  एहि प्रजातिक कुल संख्या हज़ारक करीब गनल गेल छल. कारणों छैक: एकर प्रजननक तिनिए टा स्थान- भागलपुर, असम आ कम्बोडिया- बचल छैक. भोजनक अभाव आ पर्यावरणक परिवर्तन आने पक्षी-जकाँ कडांकुलकें सेहो प्रभावित केलक अछि.

            चलैत-चलैत हम ग्राम देवता लक्ष्मीनारायणक मन्दिर लग पहुँचैत छी. मन्दिर दिस जाइत कच्चा बाटक बामा कात कनैल इत्यादि फूल गाछ आ दाहिना कात विशाल पीपरक गाछ, जकर छायामे हमरा लोकनिक बालवर्गक क्लास लगैत छल.

फूलक एक गाछसँ एकटा कन्या नान्हि-नान्हि उज्जर फूल तोड़ैत छथि. एक वृद्ध कनैलक गाछसँ फूल तोड़ि फुलडाली मे रखने जाइत छथि. हम नाम पुछैत छियनि तँ उलटे ओएह पूछि बैसैत छथि . ‘मोहनजी यौ ? हम कहैत छियनि, ‘बाबाजी ?’ माने हमरालोकनि एक दोसराक बाल सखा थिकहुँ से दुनू गोटेकें बुझबामे आबि गेल. हमरा भेल, एहि फूल तोड़निहारि कन्या आ वृद्ध-सन लगैत, लगभग हमरे वयसक बाबाजी, पीपरक गाछक अतिरिक्त आओर अनेक परिचित वृक्ष एतय अछि जे हमरा चिन्हैत अछि. मने, ओ सब कहि रहल अछि, हम तँ अहाँकें तहिएसँ चिन्हैत छी जहिया अहाँ सात-आठ वर्षक रही. हम सहमति व्यक्त करैत छी, तँ हमर आँखि नोराए लगैए. हम बिनु बिलमने लक्ष्मीनारायण मन्दिरक चबूतरा लग पहुँचि जूता खोलि, मन्दिरक बरामदा पर चढ़ैत छी. लक्ष्मीनारायणकें प्रणाम करैत छी, आ ओतय जे पाँच-सात गोटे तुलसीकृत रामायणक एक पदक सस्वर पाठ कए रहल छथि, हुनका लोकनिक संग, लक्ष्मीनारायण गर्भगृहक बाहर लक्ष्मीनारायणक सोझाँ ठाढ़ भए जाइत छी. कनिए कालमे ओतय ठाढ़ पुजगिरी हमरा ओतयसँ घुसकि जयबाक इशारा करैत छथि. कोनो भीड़ नहि. तथापि, हुनक सुझाव पर हम कनेक कात भए गेलहुँ. मुदा, ओ संतुष्ट नहि भेलाह. हमरा पुनः इशारा कयलनि. लगैत अछि, आइ काल्हि लक्ष्मीनारायणक सोझाँ पूब दिशामे ठाढ़ हएब वर्जित छैक. यद्यपि, संभव जे जहियासँ लक्ष्मीनारायण हमरा लोकनिक परिवारक सदस्य छथि, तहिया एहि पुजगिरीक पिताओक जन्म सेहो नहि भेल होइनि.

                                        अवामक विष्णुभुवन परिसर जतय हम घूरि-घूरि अबैत छी 

हमरा तमिल संत माता अव्वईक कथन मन पड़ैछ. किंवदंति छैक, एक दिन अव्वई कोनो मन्दिरमे पयर पसारने बैसल रहथि. केओ भक्त आबि हुनका कहलनि,’ अहाँकें लाज नहि होइछ, जे भगवान दिस टांग पसारने बैसल छी!’
अव्वई जनिक कविता तमिल साहित्यक मणि थिक, कहलखिन: ‘सरकार, कने हमरा बुझा दियअ, भगवान कोम्हर नहि छथिन, हम ओम्हरे पयर कए लेब !’
प्रायः, लक्ष्मीनारायणक सोझाँ ठाढ़ हेबासँ हमरा मना करबाक पुजगिरीक उद्देश्य सेहो एहिना किछु रहल हेतनि. मुदा, हम बिना कोनो तर्क-वितर्क केने, मूर्तिकें प्रणाम कयल आ बाट धेलहुँ.

बाटक कातमे आमक गाछ सब आमसँ लदल. ओतय बाटक कातहिमे एक गोटे कुर्सी पर बैसल रहथि. लगमे एकटा कुर्सी आओर राखल. हम बाटक पूब दिसक गाछ दिस लक्ष्य कए पुछलियनि,’ ई आम किनकर थिकनि ?’

                                                     आम अवाम गामक परिचय थिक 
‘मोदाइ मालिकक’
‘आ ई ?’ हम बाटक पछबारि कात, ओहि व्यक्ति लगक नव गछुली, जे आमक झाबा सबसँ लुधकल रहैक लक्ष्य करैत पुछलियनि.
‘नै मालिक. हम तँ किछु नहि छी. बुझू हम तँ सुगरक गूह थिकहुँ.’
ग्रामीणक एहन उक्ति पर हमर मोन विरक्त भए गेल. हम कहलिअनि,’एना जुनि कहिऔक’.
‘ ठीके कहल-ए.’
हम हुनका लग राखल कुर्सी पर बैसि गेलहुँ. कनेक काल परिचय पात भेल. नाम जाति दूर रहओ. हम पुछलियनि. ‘घर कोन ठाम अछि?’
ओ आंगुरसँ कनिएक दूर पर निर्माणाधीन पक्का मकान दिस संकेत केलनि.
हम कहलिअनि,’ अपन घर अछि. गुजर अपने करैत छी. तखन एना किएक कहैत छियैक ?’
जवाबमे ओ अनेक गप कहलनि. जाहिमे ग्रामीण जीवनमे होइत अनेक परिवर्तन जेना, ध्वस्त होइत पुरान, ऊँच घर-परिवारक धन संपत्तिक ह्रास आ ओही संपत्तिक बलें  नव स्वामी सबहक उदय, सरकारी सुविधाक सत्य आ माता-पिताक प्रति, शहर दिस जीविका लेल जाइत अनेक युवक लोकनिक उदासीनताक अनेक झलक भेटल.
आब भोरक करीब साढ़े पाँच बजैत छैक. हमरा गामक नाड़ीक स्पन्दनक अनुमान भए रहल अछि. अस्तु, अपना टोल दिस विदा भेलहुँ. आश्चर्य जे एतेक भोरे टहलान लेल बहरयहुँ, मुदा, शीबू भाई कतहु नहि भेटलाह. हुनकर घर बाटक कातहि छनि. ओतय पहुँचि जिज्ञासा कयल तँ सब किछु स्पष्ट भए गेल: ओ दरभंगामे एक प्राइवेट अस्पतालमे भर्ती छथि. पेटक ऑपरेशन भेल छनि. ठीक छथि. हम आश्वस्त भए गाम पर घुरैत छी, आ गरम ग्रीन-टी क एक कप लए बरामदा पर बैसि जाइत छी.                         

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