Tuesday, November 24, 2015

जखन बड दुखी होइ

दू दुनिया : दू मनुखक मनोभाव , एके स्वभाव 

                                                                            1
किछु दिन पूर्व सुतली रातिमें मन व्याकुल भ गेल छल . सोचल व्याकुलताक प्रहार सं बचाव कोना करी जे निन्न भ जाय  . सोचल,किछु नीक सोची, तं, निम्नवत कविता/ गद्य क सृजन  भेल

मन जखन बड दुखी होअय 
मोन पाडू  सिनुरिया आम,
अप्पन गाम,
 कमलाक धार
 नासीक भेंटक फूल
अप्पन सबसँ पहिलुका इस्कूल
चढ़ि जाऊ  लतामक गाछ, आमक डारि
छरपू  डारिए डारि !
चढ़ि जाऊ फुनगी,
 मोन नहिं हो तं जुनि ने उतरी !!
फुनगीपर सं देखिते  आकाश ,
सबतरि प्रकाश,
उधिया जाइछ सन्तापक करिया मेघ,
चमकै छथि भोरुका सुरुज, होइछ विहान,
लगइए जनमि कय एखने भेलहु ठाढ़
आ एहन पावन बेला में कथी केर सन्ताप !!!!

कविताक सुधि सं निन्न भ गेल.


                                                                                   2 
परसू राति  'साउंड ऑफ़ म्यूजिक' नामक पुरान सिनेमा देखय लगलहु,  तं, एकटा प्रिय गीत मोन पड़ल

                                      Raindrops on roses and whiskers on kittens
                                      Bright copper kettles and warm woollen mittens
                                      Brown paper packages tied up with strings
                                      These are a few of my favorite things
                                               ................................................
                                       When the dog bites, when the bee stings
                                       When I'm feeling sad
                                       I simply remember my favorite things
                                       And then I don't feel so bad.

                                              Courtesy Lyrics by : OSCAR HAMMERSTEIN LIL RICHARD RODGERS

                                                                                                         Film: sound of Music
पूव आ पश्चिम केर कतेक दूरी आ सोच में कतेक साम्य ! आखिर मनुक्ख मोन तं प्रायः सबतरि  एकेरंग होइत छैक !
                                   
           



Sunday, August 23, 2015

युद्ध


युद्ध

युद्ध वर्चस्व स्थापित करबाक सामूहिक अभियान थिक ; मनुष्यक मनुष्यपर , मनुष्यक राज्यपर; आ राष्ट्रक राष्ट्रपर वर्चस्व . सबठाम आग्रह एके - वर्चस्व .मुदा, युद्ध सत्यक रक्षाले होइक वा अधिकार पयबाले, हारि मनुष्येक होइछ . ततबे नहिं, सत्य समय सापेक्ष होइछ आ अधिकार शक्ति सापेक्ष . संगहिं,  सत्य विश्वासक विषय थिक आ विश्वास धारणाक. मुदा युद्धकेर असली सत्य होइछ , सबलकेर विजय आ दुर्बलक पराजय . विजय पराजयकें शक्तिसं सम्बन्ध  छैक, सत्य सं नहिं. तें,  विजय ककरो होइक पराजय तं मानवतेक होइछ. सेनापति पयर पुजबैत  छथि : प्राणतं  अदना मनुक्खे गमबैत अछि, अकालमें वएह काल कवलित होइछ . इएह थिकैक युद्धकेर सार आओर अंतिम सत्य .  

Sunday, June 21, 2015

गुरुवर जीव नारायण दास केर पुण्य-स्मृति मे

                                                             गुरुवर स्व. जीव नारायण दास       
सनातन काल सं गुरूक महिमामें बहुत किछु कहल गेल छैक . सारांश जे मनुष्यकें आँखि स्वतः भेटैत छैक , किन्तु दृष्टि गुरु दैत छथिन . हमरा लोकनिक बाल्यकालमें जखन शिक्षा बेच-बिकिनक वस्तु नहिं रहैक , समाजमे कुशल गुरुक बड सम्मान होइनि . हमरा लोकनिक दलानपर कोनो शिक्षकक डेरा नहिं रहनि  आ ट्यूशन पढ़बाक ने उपाय छल आ ने ट्यूशन पढ़बके नीक बूझल जाइत छलैक . तें हमरा लोकनि पूर्णतया स्कूलक शिक्षकपर निर्भर रहैत छलहु . तें , जे किछु सीखल , जे किछु गुनल सबटा गुरुएक देन थिक . स्कूली शिक्षाक एगारह वर्षमें कतेको शिक्षक भेटलाह . सबसं किछु ने किछु सिखलहु . किन्तु , कांच वयस आ जिज्ञासु मनःस्थिति में जे शिक्षक विद्यार्थीमें  जिज्ञासा जगेबामें सफल होइत छथि छथि आ विद्यार्थिक जिज्ञासाक समाधान  करैत  छथि ओएह शिक्षक छात्रक आदरक पात्र होइत छथि. एहन शिक्षककें  छात्र कोना बिसरि सकत . गुरुवर जीव नारायण दास एकटा एहने व्यक्तित्व छलाह .
१९६७ ईसवीमें जहिया हम महादेव-पूरण टिबरेवाल उच्च माध्यमिक विद्यालय , झंझारपुरमें आठवां वर्गमें नाम लिखओने रही, सिमरा निवासी   स्व . जीव नारायण दास ओतय प्रधानाध्यापक रहथि .कद आ बान्हमें मध्यम ,रंगमें पिण्डश्याम,व्यवहारमें अनुशासित आ मृदुभाषी;  हेड-मास्टर साहेब सबहक प्रिय रहथि .विद्यार्थी सबकें नेना जकां बुझथिन आ पढ़यबामें सबहक सुधि रहनि . अंग्रेजी साहित्यक गहन अध्ययन रहनि आ मैथिली लिखबाक रूचि रहनि . रामनारायण शास्त्रीकेर लिखल पुस्तक 'भक्त आओर भगवान' केर  .हुनकर (जीव नारायण दासक ) मैथिल अनुवाद हमरा लग एखनहु अछि. पछाति आओर किछु प्रकाशित भेलनि कि नहिं, से बूझल नहिं. मुदा, हेड-मास्टर साहेब  हमरा लोकनि कें अंग्रेजी आ मैथिली साहित्य पढ़ाबथि . साहित्य पढ़बैत -पढ़बैत ओ अनायास  बाइबिल आ शेक्सपियरक  धरि पहुंचि जाथि . देहातक स्कूल में तहिया कुशल शिक्षक भेटब कठिन रहैक . मुदा हमरा लोकनिक स्कूल ओहि मामलामे भाग्यशाली छल . जीव नारायण दासक संग पंडित बनखंडी मिश्र , मदनेश्वर  ठाकुर आ महेश्वर सिंह सन कुशल शिक्षक लोकनि रहथि . हुनके लोकनिक छत्र-छायामें टिबरेवाल स्कूल शिक्षाक क्षेत्रमें सम्पूर्ण इलाकामे सुपरिचित छल .
मुदा, हमरा जीव नारायण दास किएक मन पड़ैत छथि ? हमरा जनैत ओकर एके टा कारण छैक : मास्टर -साहेबक जीवने हमरा लोकनि ले आदर्श जीवन पद्धति उदहारण छल . जे सिखाबथि , सेह करथि . कहब आ करबमें कनेको भेद नहिं . मास्टर साहेबक इएह गुण स्कूल छोडलाक चौवालीस वर्ष बाद हमर स्मृति  मास्टर साहेबकें अमर बनौने छनि. हाल में हमर एकटा कश्मीरी सहकर्मी एकटा दोहा सुनौलनि :
                              गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है , गड़-गद  काढ़े खोट ,
                              अंतर हाथ सहार दे , बाहर बाहे चोट .
हमर हेडमास्टर साहेब, गुरुवर जीव नारायण दासजी, एहने कुम्हार छलाह . सादर नमन .   
  

Tuesday, May 26, 2015

एहि बेरुक पटना यात्रा : दू टा विन्दु , दू टा विचार



1

‘पेपरक छपाइ एतेक मेंही होइत छैक जे वृद्धले पढ़ब असम्भव ' - पंडित गोविन्द झा ’

पटना जाइत छी तं सुप्रसिद्ध साहित्यकार  पंडित  गोविन्द झाकें यदा-कदा भेंट करैत छियनि. एहि बेर हुनका सं भेंट करय गेलहु, तं, हुनका लाठी हाथें चलैत देखलियनि. हुनकहिं शब्द में , ‘ आँखि झलफल, हाथ थर-थर , पयर लट-पट .... ‘. सब किछु वृद्धावस्थाक दोष . तथापि गोविन्दबाबूक स्मरण ओहिना स्पष्ट छनि, तर्क-शक्तिक धार एखनहु नव पिजाओल चक्कू सं तेज छनि, आ वाणी सुस्पष्ट छनि. हम अपना संग अपन लिखल किछु कथा सब ल गेल रही. हमरा गौरव अछि , गोविन्द बाबू हमर कथा संग्रह ‘ किछु नव गप्प, किछु पुरान  गप्प‘ केर समीक्षा लिखने रहथि आ ओहि संग्रहक कथा ‘ किछु नव गप्प, किछु पुरान  गप्प‘ केर विशेषतः प्रशंसा केने रहथि . एहू बेर कथाक पांडुलिपि हमरा संगमे छल. पुछलियनि, अपने कही तं ई ( पाण्डुलिपि ) अपने लग छोड़ने जाइ .’ गोविन्द बाबू कहलनि, झलफल आँखिक दुआरे पढ़ब कम भ गेले. इन्टरनेट पर पढ़ि लैत छी . हम कथाक पाण्डुलिपिक सॉफ्ट-कॉपी हुनकर लैप-टॉपमें लोड क देलियनि. गोविन्द बाबू गप्पक क्रममे कहलनि, ‘दुनू आँखिकमें बाम आँखि कनेक बेसी ख़राब अछि, दाहिना सं काज चलैत अछि. एखनधरि मोतियाविन्दुक ऑपरेशन नहिं  भेले. डाक्टर कहैत छथि, एखन जतबा सूझैत अछि , ऑपरेशन सं ताहि सं बेसी नहीं सूझत. पहिने पेपर – समाचारपत्र में समय बीति जाइत  छल . मुदा, पेपरक छपाइ एतेक मेंही होइत छैक जे पढ़ब असम्भव. यद्यपि, पेपर–समाचारपत्र पढ़निहारमें बेसी संख्या  बूढ़-बूढ़ानुसेक  छनि तथापि पेपर छपाइकाल  पेपर –समाचारपत्रक प्रकाशक पेपर पढ़निहारक एहि पैघ वर्गकें बिसरि जाइत छथि.’
सत्ये. अमेरिकामें देखने रहियैक, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ पत्रिका मोट छपाइबाला संस्करण सेहो प्रकाशित करैत अछि . कमजोर आँखिक लोककें ताहि सं पढ़बामे सुविधा होइत छैक . मुदा, हमरा लोकनि  वृद्ध लोकनिक प्रति  किएक उदासीन छी ! जीवनक अवधि बढ़तैक तं देखब–सुनब कम हयब स्वाभाविक छैक. समाजकें ई नहिं  बिसरबाक थिक . सोचैत छी, बच्चा, बूढ़, वयस्क , नारि , विकलांग केर खियाल जं  अपन समाज नहिं रखतैक तं अओर कोन उपाय छैक .  

2
‘नहीं भी लिखने आता है, सर सबको पास कर देते हैं ’

कतबो कानून बनौ समाजमे परिवर्तन तखने औतैक जं समाज परिवर्तनले दृढ़संकल्प हो. अन्यथा, कानून, कानूनक किताबे धरि सीमित रहत. एहने किछु अनुभव हमरा एहि बेरुक पटना यात्रा में भेल. प्रसन्नताक विषय थिक,एखनुक युग में  सर्वशिक्षाक अभियान जोर पकड़ने छैक. मुदा, ई अभियान लक्ष्य  प्राप्तिमें कतेक धरि सफल भ रहल अछि से बड़का प्रश्न थिक . राज्य सरकारलोकनि  बढ़ि-चढ़िकय अपन-अपन उपलब्धिक गाल बजेबा में तत्पर छथि . मुदा  चुनावक समयक  बड़का-बड़का पोस्टर, सरकारी आंकड़ा आ समाजक उपलब्धिक बीचक खाधिकें पाटि नहिं  पबैछ . सरकारी प्रचार आ पोस्टरक खर्चा तं  जनता  बहन करिते  अछि. सरकारकें आंकड़ाले बेसी किछु करय नहिं पड़ैत छैक. स्कूलक एडमिशन, पढ़ाइ, परीक्षा, आ सरकारक उपलब्धिक आंकड़ा  सबटा कागजहिं पर बनैत छैक. जहां-तहां ई गप्प सुनैत तं छियैक . मुदा, पटनाक हालक यात्रामें सरकारी दाबाकें पुनः ध्वस्त होइत देखलहुं . पटनामें घरमें काज केनिहारि खबासनी प्रतिदिन अपन बेटीकें संगे आनि काजमे लगा दैत छलैक, से देखियैक . हमरा बड कोनादन लागय . हम कतेक बेर कहलियैक , एना बच्चाक पढ़ाइ कोना चलतैक, एकरा स्कूल जाय दियौक . मुदा, ओ किएक सुनतिह . खबासनीके बेटीसं जेठ अओर बेटालोकनि  छथिन.  मुदा, झाड़ू-बुहारू काज बेचारी बेटिये करथु . जे किछु . एक दिन ओही बच्चाकें, सीता-गीता-कमला-विमला, नाम जे किछु होउक, हम अपना लग सोर  केलियैक .  कहलियैक, चिट्ठी लिखय अबैत छह ? छौडी मुसिकी देबय लागल . हम कहलियैक, बैसह . छौडी लगमे बैसि गेल . हम रुलदार कागजकेर एकटा पन्ना आ पेन्सिल अनलहु आ बच्चाकें दैत कहलियैक, ‘तोहरा कापी किनबाले पचास टाकाक काज छह . मायक नामे चिट्ठी लिखह , पचास रुपैया कापी किनबा ले चाही .’बच्चा तुरत एक पांती में चिट्ठी समाप्तकय हमरा हाथमे पकड़ा देलक ; सारांश में लिखल छलइ ,
      ‘ममी , कापी खरीदने के लिए पचास रुपया दो ‘
हिज्जेक अशुद्धि तं छोडिए  दियअ . हम पुछलियैक चिट्ठी नहिं लिखय अबैत छह ? बच्चा फेर हंसय लागलि . हम बच्चा कें लग में बैसा चिट्ठी लिखबय लगलहु. पत्रकेर डिक्टेशन  सात-सं-दस पंक्तिमें समाप्त भ गेलैक . मुदा, अनगनित अशुद्धि. सतमा वर्गक छात्रा. पत्र धरि लिखय नहिं अबैत छैक. हम हताश भ गेलहुं . हमरा लोकनिकें पांचम वर्गमें आचार्य रामलोचन शरणकेर ‘पत्र-चन्द्रिका’क  माध्यमे चिट्ठी लिखब सिखाओल गेल छल . ओहि युग में प्राथमिक विद्यालय में सातवां पास- ‘ मिडिल ट्रेंड’- शिक्षक लोकनि रहथि . ओ लोकनि कम-सं –कम भाषा आ गणित में अवश्ये दक्ष होथि. आइ धरि बी ए , एम ए- शिक्षा-मित्र सं ल कय स्थायी शिक्षक धरि – मडुआक दोबड उपलब्ध छथि .  मुदा, ई सातम वर्गक कन्या अपन मायक नामे पत्र धरि नहिं  लिखि सकल. स्वाइत सबतरि सब सर्टिफिकेट आ परिचय पत्र अशुद्ध छपैत छैक.  हम बच्चाकें पुछलियैक, ‘पढ़ैत नहिं छहक ? सातम वर्ग में छह !’ छौडी फेर हंसय लागलि, लजाइत बाजलि ,नहीं भी लिखने आता है न , सर सबको पास कर देते हैं !’
हमरा सरकारक आंकड़ा आ  सर्वशिक्षा अभियानक सफलता,  दुनूक, सत्यता बुझबा योग्य भ गेल . नहिं  जानि 100 प्रतिशत  स्कूल एनरोलमेंट आ शत-प्रतिशत साक्षरताक आंकड़ा कहिया धरि शत-प्रतिशत शिक्षित नागरिकक लक्ष पूर्ण कय सकत .       

Sunday, May 24, 2015

भारतीय सैनिक यूनिटक सर्वधर्म पूजा-स्थल: यूनिट मन्दिर



यूनिट-मन्दिर सैनिक लोकनिक पूजा-स्थल थिक. यूनिट (सैनिक इकाई) छोट हो वा पैघ, बहुसंख्यक सैनिकलोकनि  हिन्दू , मुसलमान,सिख, इसाई  वा बौद्ध होथि समुचित पूजास्थल अवश्ये भेटत. हँ, यूनिटमे मन्दिर, गुरुद्वारा, मस्जिद वा गिरिजा, कि बौद्ध मन्दिर -गोम्पा हेतैक , से बहुसंख्यक सैनिकलोकनिक धार्मिक आस्थापर निर्भर होइछ. पंडित-पादरी-लामा-मौलवीक बहालीसेहो पूजा-स्थलेक अनुकूल हेतैक ने. एकरा एना बुझू, परिवार छोट हो वा पैघ गोसाउनिक घरक बिना कोना निमहता हयत ? सैनिक यूनिटक देवी-देवता सेहो कुलदेवी वा कुल देवता थिकाह. एहि पूजास्थलसबमें अपन घरे-अंगना जकां, एकेठाम अनेक देवी-देवताक समावेश होइछ, जाहि सं विभिन्न मताबलंबी अपन आस्थाक अनुकूल " प्रभु मूरति "क दर्शन करथि . तें युद्ध हो वा शान्ति, पड़ाव स्थायी हो वा निरंतर गतिमान, सर्वदा, सबतरि  कुलदेवी-कुलदेवता संग रहबे करताह ; सौभाग्य वा दुर्भाग्यमें, युद्ध आ शान्तिमें  देवी-देवता आ धर्मगुरुक उपस्थिति सैनिकक आत्मबलकें सुदृढ़ करैत छैक.
सियाचिन बेस  कैम्पक लगक सर्वधर्म मन्दिर

सियाचिन बेस  कैम्पक लगक सर्वधर्म मन्दिर


केहन होइत छनि  सैनिकलोकनिक पूजा स्थल ? कोना होइत छैक दैनिक पूजा ? धर्मगुरु लोकनि बहाली कोना होइत छनि? युद्ध आ शान्तिमें, जन्म-मरण आ धार्मिक अनुष्ठानक  समय धर्मगुरुलोकनि अपन दायित्वक निर्बाह कोना करैत छथि ? विभिन्न धार्मिक मताबलम्बी नगरिक्क एहि  देशक सैनिकक बीच  कोना होइछ धर्मनिरपेक्षताक निर्बाह ? ई सब किछु  जनसामान्यले कौतुहलक विषय भ सकैत अछि. तें एहि लेखमें सैनिक यूनिट-पूजाक स्थल, सैनिक पण्डित-पुजेगरीक बहाली आ कार्यकलापक संग सैनिक मन्दिर आ आन  पूजास्थलसभक    दैनिक गतिविधिक संक्षिप्त झलक भेटत. एहि सबहक विवरण हमर  सैनिक जीवनक अनुभवक  माध्यम सं सुनू .

1983 इसवी . जनवरीक मास . जाड़काला . दरभंगा सं दानापुर गेल रही . सैनिक अस्पताल, दानापुर में योगदान केलहुं . ई अस्पताल अपन स्थापनाक दिन सं आइ धरि ओत्तहि अछि. अर्थात स्टैटिक यूनिट थिक. 1983 क  जनवरी सं अप्रैलक आरम्भ धरि ओतय रही . सैनिक अस्पताल दानापुरमे यूनिट मन्दिर रहैक किन्तु, एहि अवधिमें कोनो सार्वजनिक पूजा-पाठक अवसर आयल रहैक तेना किछु मोन नहिं अछि . मुदा एतबा अवश्य मोन अछि जे अस्पतालक सूबेदार धर्मगुरु आ निकटस्थ बिहार रेजिमेंटल सेन्टरकेर धर्मगुरु लोकनि यदा-कदा दुपहरिया वा सांझकय वार्डसबमे आबथि आ रोगी सैनिक लोकनिक हाल -चाल पुछथिन, सांत्वना देथिन. तहिये बुझलियैक, दुःखसुखमें सैनिक लोकनिक मनोबलकें अक्षुण राखब सेहो धर्मगुरुए  लोकनि काज थिकनि .

किछुए दिनक पछाति हमरा लोकनि, नव बहाल अफसर लोकनि , (अफसर ट्रेनिंग स्कूल) लखनउ गेल रही. अफसर ट्रेनिंग स्कूल आ सेना चिकित्सा सेवा कोर केर स्कूल सेनाक बड पैघ इकाई थिकैक . विभिन्न धर्माबलंबी, हजारों सैनिक आ सैकड़ो अफसरक संस्था . ओतय पंडित , पादरी , ग्रंथी आ मौलवी सब रहथि. हमरा लोकनिक ट्रेनिंग करीब दस हप्ता चलल छल . ट्रेनिंगकेर पछाति हमरा लोकनि भारत आ भूटानमें भिन्न-भिन्न स्थानपर, नव-नव यूनिट में योगदान केने रही . मुदा ट्रेनिंग समाप्त हेबासं पूर्वक शपथ-ग्रहण कोना बिसरत. एकदिन निर्धारित समय हमरा लोकनिसब गोटे क्लासमें एकत्र भेल रही . पंडित , पादरी , ग्रंथी आ मौलवी सब गोटे अपन-अपन धार्मिक-ग्रन्थ ल कय आयल रहथि. धर्मगुरु लोकनि आ हमरा लोकनि बेर-बेरी पवित्र धर्म-ग्रन्थ सबपर हाथ रखा हमरालोकनिक शपथ-ग्रहण करौने छलाह. पछाति ट्रेनिंग समाप्त हेबासं पूर्व रंगरूटक , कसम-परेडसेहो ओत्तहि देखलियैक.                                                              

लखनऊ सं हम चकराता गेल रही . ओतुका सैनिक लोकनि बहुधा बौद्ध रहथि . पूजास्थल गोम्पा कहबैत छलैक . धर्मगुरु लामा कहबैत छलाह . सैनिक लोकनिमें हिन्दू-मुसलमान-सिख-इसाई-बौद्ध सब रहथि . मुदा, रवि दिनक' हमरालोकनि नियमतः सामूहिक पूजामें सम्मिलित होइ. बुझबाक थिक, सामूहिक पूजामे  उपस्थिति सैनिक जीवनक रीति आ सबहक हेतु  अनिवार्यता थिक . वैयक्तिक पूजा-अर्चना वैयक्तिक थिक, जेना मोन हो करू, नहिं करू. केओ नहिं पूछत. इएह थिकैक सैनिकक जीवनक अनुशासन.                                                                                                                                                                           चकरातासं हम सोझे असम गेल रही. आगामी तीन वर्षक अवधिमे हमरा अरुणाचल प्रदेशमे विस्तृत भ्रमणक अवसर भेटल छल. मुदा मधुर अनुभव सबदिन  मधुर कहाँ रहि पबैत छैक. मोन अछि, हमरा लोकनिक तैराकी-प्रशिक्षक अरुणाचलक सियांग नदीमें डूबिकय मूइल छलाह. एहि दुःखद अवसरपर पाहिले बेर देखलियैक, सैनिक जीवनक  सम्बन्ध-बन्ध कहन दृढ़ होइत छैक; ओहि प्रशिक्षकक मुखाग्नि कमांडिंग ऑफिसर स्वयं देने रहथिन आ अन्त्येष्टिक कर्मकाण्ड यूनिट लामा द्वारा  सम्पन्न भेल रहै . एहि अभूतपूर्व अनुभवक चर्चा हम अपन कथा 'येनास्य पितरो याता' * में सेहो केने छी . कहैत छैक, उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे , राजद्वारे श्मसाने च यस्तिष्ठति सः वान्धवः ( उत्सव, व्यसन, अकाल,श्मसान जे  सबतरि, सर्वदा संग दियअ सेह वन्धु-वान्धव  थिकाह !)  आरंभिक तीन वर्षक नौकरीक पछाति हमर पोस्टिंग हरियाणाक चंडीमंदिर नामक स्थानमे भेल छल . चंडीमंदिर गेलाक किछुए दिनक पछाति कृष्ण-जन्माष्टमीक पर्व आयल रहैक . सर्वविदित अछि, कृष्ण-जन्माष्टमीक पूजा मध्यरात्रि धरि चलैत छैक . हमरा लोकनि सब गोटे पूजामें सम्मिलित भेल रही . मुदा वर्कशॉपकेर प्रभारी अफसर  मेजर अल्ताफ़ हुसैन सेहो नवजात कृष्णकेर झूला झुलौने रहथि. हमराले ई अनुभव तहिया आश्चर्यजनक छल आ आब अविस्मरणीय अछि ! धार्मिक मतभेदक  वातावरणमें निस्संदेह भारतीय सेना  धार्मिक सहिष्णुताक बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुतकरैछ. सैनिक जीवनक साम्प्रदायिक एकटा  धर्मिक उदाहरण हमर राष्ट्रीय एकताकें सुदृढ़ करैत अछि , एहि तथ्यक प्रचार हेबाक चाही.

वर्ष 1986-87 भारतीय सेनाक वृहत्तर युद्ध-अभ्यास' ब्रास-टैक्स प्रायोजित भेल रहैक. तहिया हम चंडीमंदिरमे एकटा फील्ड यूनिटमें पदस्थापित रही. किछुए वर्ष पूर्व दानापुरमें एहि यूनिट स्थापना भेल रहैक. दानापुरमे नियत तीन वर्षक कार्यकालक पछाति ई यूनिट हालहिंमे चंडीमन्दिर आयल छल . ओत्तहिं सं हमरा लोकनि युद्ध-अभ्यास 'ब्रास-टैक्स' में हिस्सा लेबाले हरियाणा-पंजाब होइत राजस्थान गेल रही. सौ-दू सौ टेन्ट-तम्बू, माल-असबाब, गोटेक हज़ार सैनिक,सौ-डेढ़-सौ ट्रक , गोटेक सौ जीप, ओतबे वायु-रक्षक तोप आ गोला बारूद, यूनिट वर्कशॉप, आ अनगणित विविधा. हमरा लोकनि सब किछु ल कय, चंडीमन्दिरसं एके संग विदा भेल छल. चलैत-रुकैत, पड़ाव आ युद्ध-अभ्यासमें तीन मास सं बेसी अवधि लागि गेल रहैक. जखन कतहु  पड़ाव होइछ, सैनिक लोकनि एकेठाम सैकड़ों तम्बू खसाबथि  तं राता-राती मरुभूमि जीवंत भ उठैक . फेर कूच होइछ तं सब किछु हठात उसरि जाइक . एहि अति वृहत अभियानमें   सब किछुक बीच हमर मेडिकल डिस्पेंसरीक गाड़ी ( रेड-क्रॉस पताका वाला ) आ मंदिरक गाड़ी ( लाल-पताका वाला ) सबठाम संगहिं-संग  चलैक ; मंदिरक गाड़ी आगू-आगू, आ डिस्पेंसरी सबसं पाछू, कदाचित ककरो आंग-स्वांग भेलैक तं तकर देख-भाल तं चाही. प्रतिदिनक यात्रा सं पूर्व सैनिक, जे सी ओ, आ अफसर, अहलभोरे, पड़ावस्थलमें मन्दिरक गाड़ीक निकट सब एकत्र होथि.  कमांडिंग अफसर पूजा करथि, आ यूनिटक पंडितजीक आरती करथि. गर्मा-गरम प्रसादक वितरण होइ आ माता शेरंवालिक जयजयकार सं हमरा लोकनि कूच करी . राजस्थानमे, युद्ध-अभ्यासहिं में देखलियैक, यूनिट जतहिं रहैक  मन्दिर, मस्जिद -गुरुद्वाराक समावेश ओतहिं होइ. जेना  सम्पूर्ण यूनिटक समावेश टेन्ट आ तम्बूमे होइक,तहिना मन्दिरक देवी-देवता लोकनि सेहो  टेन्टहिंमे बैसाओल जाथि. इएह थिक यूनिट मन्दिरक रीति. छोट यूनिटमें सरकारी व्यवस्थाक अनुकूल , नियमिकी पंडितक पोस्टिंग नहिं होइछ. किन्तु, सैनिक लोकनि बेर-बेरी, अपन रुचिक अनुकूल, मन्दिरमे पूजा-अर्चना आ दैनिक सेवाक भार  उठबैत छथि . एहिसबमे सैनिक लोकनिके मोने लगैत छैक , आपत्ति किएक हेतैक.

कदाचित, कहियो जं सियाचिन ग्लेशियरक मुहाना वा बेस-कैंप में जयबाक मौका लागय, हनुमाजी आ तिरुपति बालाजी , गुरुनानक देव आ शिव , काबाक छवि आ ईशा कें एके पतियानीमे बैसल देखबनि. ने कोनो विरोध , ने कोनो भतबरी . एकेसंग सबहक पूजा होइत छनि, सबकें  एके संग माला चढ़ाओल जाइत छनि. राम-रहीम-ईशा-आ मूसा, सबहक सम्मिलित उपस्थिति सैनिक सबकें सब देवी-देवताक संचित बलक बोध  छनि . आ ओएह संचित शक्ति देशक सीमाकें अभेद्य बनबैत अछि आ अपरिचित सैनिककें देशक सर्वमान्य नागरिकक ओहदा प्रदान करैछ. तें, तं, युद्ध हो वा शान्ति , बाढ़ि हो वा भूकंप सबहक ठोर पर एके गप्प, सेना कें बजाउ !
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* कीर्तिनाथ झाक कथा-संग्रह ' किछु नव गप्प, किछु पुरान गप्प ' प्रकाशन  वर्ष 2005
 

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