Wednesday, July 6, 2022

अग्निवीर योजना आ असंतोष

 

अग्निवीर योजना आ असंतोष

अग्निवीर योजना आ युवकक असंतोष एखन किछु दिन पूर्व समाचार मे छल. पहिल कारण युवा असंतोष, आ दोसर कारण असंतोषक कारण भड़कल हिंसा. ई दुनू बेरोजगारीक रोगक लक्षण मात्र छल, जे अप्रत्याशित घोषणाक कारण एकाएक बढ़ि गेल. एकर पृष्ठभूमि मे एकटा आओर कारण रहैक: कोविड-१९ महामारी.

कोविड-१९ महामारी जेहने आकस्मिक छल तेहने संहारक. जेकर जान नहि गेलैक, जीविका चल गेलैक. जकरा जीविका नहि रहैक आ जीविका तकैत छल, तकर जीविकाक बाट बन्न भए गेलैक. सड़कक कात जे चाह-पकौड़ी वा इडली बेचि गुजर करैत छल तकर घरसँ बहरायब बन्न भए गेलैक. जे घरसँ बहरा सकैत छल, ओकर जेब खाली छलैक. नौकरीक एहन उम्मीदवार जे सेना वा पुलिस मे भर्ती हेबाक ले चुनल गेल छलाह, हुनक भर्ती स्थगित की भेलनि. दू वर्षक बाद हुनका लोकनिकें बुझबा मे  अयलनि जे पुरनका भर्तीक प्रक्रिया निरस्त भए गेल ! सब श्रम बेकार भए गेल. तखन कतेको गोटे मुँहे भरे खसलाह. कारण, सेना-पुलिसक भर्ती तं भारतीय प्रशासनिक सेवाक नियुक्ति नहि थिकैक, जकर पात्रता पैंतीस वर्ष धरि बचल रहत. तै परसँ पहिलुका कयल-धयल सब आब बेकार छल.

मार्च २०२० आ जून २०२२. सवा दू वर्षक अंतराल पर जखन सशस्त्र सेना मे बहालीक सूरसार आरम्भ भेलैक तं सब किछु नव. वयस-सीमा, सेवा-शर्त आ सुविधा, किछुओ पहिने जकाँ नहि. सेना मे भर्ती हयब ओहुना कठिन छैक. अनेक स्तर मे विभाजित चुनाव प्रक्रिया मे शारीरिक क्षमताक परीक्षा सबसँ पहिल थिक. अनेक वर्षक तैयारी चाही. शारिरिक दक्षताक परीक्षा पास हएब ततेक कठिन छैक जे दिल्लीक एकटा युवक नित्य दिल्ली-आगरा हाईवे पर घर आ नौकरीक स्थान धरि दौड़ि कए अबैत-जाइत छलाह. ई बहुतो गोटे देखलनि. हुनक विडियो जखन समाचार मे आयल तं सेना भर्ती हेबाक युवक लोकनिक आतुरता समाजक दृष्टि पर एलैक.  एहि धावक युवकक छवि एखन धरि बहुतोकें बिसरल नहि हेतनि. मुदा, ई युवक एहन परिश्रम कयनिहार पहिल आ अंतिम नहि छलाह.

सेना मे भर्तीक प्रक्रिया जटिल छैक. सबसँ पहिने शारीरिक क्षमताक प्रतियोगिता में सफलता. तकर पछाति मेडिकल जांच होइत छैक. मेडिकल जांच मे निर्धारित वजन, ऊंचाई, आ छातीक चौड़ाई चाही. एकर अतिरिक्त हाथ-पयर, आँखि, नाक-कान-गला, हृदय, फेफड़ा, पाचन-प्रणाली, मानसिक विकास, चमड़ा आ दांत धरिक जांच होइत छैक. जांच प्रक्रिया मे मूलतः छटनीक कारण ताकल जाइछ. तकर कारणों  छैक. सेना मे कहावत रहैक, जखन एक टा पद ले एक हज़ार उम्मीदवार छैक, तखन ताजा सेव केर पथिया म सँ  छोट, हरियर, दगल, सड़ल, घोकचल फल किएक लेब ! गप्प एकदम ठीक. कारण, साधारण योद्धा सैनिक (combatant)क काज दिल्ली आ देहरादून मे एयरकंडिशन्ड ऑफिस मे कलम चलायब नहि छैक. दिन-प्रतिदिनक काज श्रमसाध्य होइछ. अत्यंत गर्म रेगिस्तान, जान लेबा ठंडा पहाड़, आ ऊँच पर्वतीय प्रदेश मे जतय बिना वजनहु चलला पर श्वास फूलैछ, ओतय ओजन उठबय पड़ैत छैक,अस्त्र-शस्त्रसँ ल कए गेंती-बेलचा धरि चलबय पड़ैत छैक.  तें, शरीरक ओ साधारण समस्या जे स्वास्थ्यकर स्थान मे बुझबो मे नहि अबैत छैक, से अत्यंत विपरीत जलवायु, जनशून्य स्थान, जानलेबा भूमि मे अनेरे उपकि जाइछ. एहन अशक्तता शत्रुकें पराजित करबाक प्रयास मे अपना अतिरिक्त अनको हेतु घातक साबित भए सकैछ. तें, सेनाकें शारीरिक रूपें सक्षम, दक्ष, ऊँच मनोबल युक्त एहन सैनिक चाही जे अपन बलिदानक भावना आ प्रत्युत्पन्नमतित्वसँ शत्रुकें पराजित कए धधकैत आगि बाटें सोना जकाँ चमैक बहार होअय !

अस्तु, कठिन शारीरिक क्षमताक परीक्षा आ मेडिकल जांचक पछाति लिखित परीक्षा होइत छैक. शारीरिक दक्षता, आ लिखित परीक्षाक परिणामक योग्यता सूची म सँ चुनावक पछाति पुलिस जाँच होइछ. तखन, रिक्तिक आधार पर उम्मीदवारक नियुक्ति होइत छैक.

सेना मे कहावत छैक, भारतीय सेना स्वैच्छिक सेवा थिक. अर्थात् जे उम्मीदवार स्वेच्छासँ ई बाट चुनैत छथि, सएह सैनिक बनैत छथि. इसरायल वा चीन जकाँ भारत मे सैनिक सेवा नागरिकक हेतु अनिवार्य वा बाध्यता नहि छैक. मुदा, समाज मे सेनाक प्रति दृढ़ विश्वास छैक. बाढ़ि अबौक, आतंकवादी हमला हो, कश्मीर वा भारतक उत्तरपूर्व मे उपद्रव होइक, पुलिसक ओ काज जे पुलिस बुते नहि सम्हरैछ, से काज सेना करैछ. तथापि, प्रशासनक दृष्टि मे सैनिक ओहने वेतनभोगी कर्मचारी थिक, जेहन दिल्लीक सचिवालयक वेतनभोगी कर्मचारी, वा सुविधाक दृष्टिएं ओहूसँ कम ! तथापि, जतय असैनिक कर्मचारीक संख्या, वेतन आ सुविधा, समाचार पत्र वा टेलीविज़न डिबेट मे कहिओ नहि अबैछ, सेनाक वेतन आ पेंशनक खर्च पर निरंतर बहस चलैत रहैछ. सारांश ई, जे एतेक व्यय सरकारक साधनकें तेना सोखि लैछ जे सरकार लग सेनाक आधुनिकीकरणक हेतु बहुत थोड़ साधन बचैछ. तें, सेनाक वेतन आ पेंशन पर व्यय घटय. उचिते. एहि व्ययकें थोड़ करबाक अनेक उपाय छैक: सेनाक संख्या घटय. सैनिकक सुविधा घटाओल जाय. सैनिकक सेवा अवधि सीमित हो. सैनिकक पेंशन थोड़ हो, वा ग्रैच्युटी एवं पेंशन नहि देबय पड़य. सैनिकक सेवानिवृत्तिक पछाति ओकरा पर स्वास्थ्य सेवा सुविधाक व्यय नहि हो. ततबे नहि, जखन सैनिक सेवा मुक्त होथि, तखन सैनिकक हेतु सरकारकें थोड़ एकमुश्त राशि देबय पड़ैक. अग्निपथ स्कीम आ अग्निवीर सैनिकक भर्ती सरकारक एहि सब लक्ष्य-प्राप्तिक एक उपाय थिक.

प्रशासनिक निर्णय सरकारक अधिकार थिक ! एहि मे दू मत नहि. किन्तु, समाधानक विषय मे सब एक मत होथि से आवश्यक नहि. ततबे नहि, लोकतंत्र मे सरकार बदलैत रहैछ. तें, सरकारक दायित्व थिक जे सरकार अपन निर्णय मे विपक्षहुक  विचारक समावेश करय, खास कय तखन, जखन निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षासँ संबंधित होइक. मुदा, ई आदर्श भेल. व्यवहार मे आदर्श अपवादे बूझल जाइछ. अस्तु, अग्निपथ आ अग्निवीर योजनाक घोषणाक जे तात्कालिक परिणाम भेल जे आँखिक सोझाँ अछि. ओकर दूरगामी परिणाम भविष्य कहत. किन्तु, एतय आब हम एक दोसर विन्दु पर विचार करब जकरा राजनीति वा राष्ट्रीय सुरक्षा विषयक विशेषज्ञक विचारसँ कोनो मतलब नहि. मुदा, एकर संबंध  सेना, सैनिकक जीवन आ भारतीय समाज दुनूसँ छैक.

पहिने, सेनाक गप्प. प्रगति जीवन थिक. भारतीय सेनाकें सेहो समयक संग चलबाक चाही. हमरा लोकनिक सेना अंग्रेजक द्वारा एवं योरोपीय प्रणाली पर आधारित अछि. एतबे नहि, टेक्नोलॉजीक विकासक संग युद्ध केर परिभाषा, ओकर आयाम आ विधि बदलि रहल छैक. अमेरिका सन टेक्नोलॉजी हो तं बिना भूमि पर पयर रखनहि इरान सन देशकें परास्त कए सकैत छी. तथापि, जखन भूमि पर प्रतिस्पर्द्धा हेतैक तं सेना एक दोसरासँ हाथसँ लड़ैत मरत आ मारत, जकर उदहारण ताकब असंभव नहि. तथापि, समयक संग आधुनिकीकरण चाही. आ सरकार से करत, से समाज मानि कए चलैछ, आ सरकार पर विश्वास रखैछ.

आब, समाजक गप्प. सैनिक समुदायक अधिकांश भाग एखनो एहन देहाती निम्न वर्गसँ अबैछ. शहरी मध्यवर्ग, नौकरशाह आ राजनेताक सन्तान सिपाही भर्ती नहि होइत छथि. शहरी आ उच्च वर्ग समाज मे परिवर्तन होइतो, ग्रामीण समाज कतेक अर्थ मे जड़ अछि. बहुतो दिनसँ चल अबैत, ग्रामीण समाजक अपरिवर्तित संरचना, वर्तमान  सैनिकक जीवनकें प्रभावित करैछ. देहाती निम्न वर्गक सिपाही पर ओकर सम्पूर्ण परिवार- माता-पिता, भाई- बहिन- आश्रित रहैछ. तें, जखन कोनो बेरोजगार सैनिकक नौकरी पाबि जाइछ तं परिवार मे सब एक स्वर मे उत्सव मनबैछ; ‘नत्था सिंह/ बंता सिंह / गुलाब सिंह/ किताब सिंह/ राम भरोसे/ पेरूमल/ सेबेस्टियन को नौकरी मिल गई’. माने, आब परिवारकें गुजर करबाक एकटा सुदृढ़ आधार भेटि गेलैक. मुदा, जखन ई खबरि अबैछ जे  ‘नत्था सिंह/ बंता सिंह / गुलाब सिंह/ किताब सिंह/ राम भरोसे/ पेरूमल/ सेबेस्टियन मर गया, या डिस्चार्ज हो कर घर वापस आ रहा है’ तं उचिते घर-परिवारक पयर तरसँ धरती घिसकि  जाइछ. अग्निवीर योजनाक इएह अवगुण भारतीय युवकक असंतोषक मूल कारण थिक ! अग्निपथ योजना मे अग्निवीरकें साधारण सिपाहीसँ अनेक अर्थ मे  सुविधा सेहो बहुत कम छैक. नौकरीक स्थायित्व आ घर घुरलाक पछाति जीविकाक आश्वासनक सत्य की छैक, से ओहि भूतपूर्व सैनिक सबसँ पुछियौक जे पन्द्रह वर्ष ‘कलर सेवा’ बाद पेंशन ल कए घर घुरैत अछि. ओहि वयस में जखन कतेक नौकरशाह लोकनि नौकरी आरंभ नहि कयने रहैत छथि, सैनिक रिटायर भए जाइछ. ओहि समय मे ओकर जीवनक कोनो दायित्व, जेना धिया-पुताक पढ़ाई, घर बान्हब इत्यादि भेलो नहि रहैत छैक.

तैओ, नौकरी ले मुँह बओने बेरोजगार सबटा देह लगा कए मारैत, जं नौकरीक स्थायित्वक भरोस रहितैक. किन्तु, एहि योजना मे स्थायित्व कतय पाबी. तें, अग्निवीर योजना किछु अर्थ मे  नौकरी स्थायित्वक भरोसक प्रति भयानक कुठारघात थिक ! ओकर बाँकी गुण-अवगुण पर तं निरंतर सेवारत आ सेवा निवृत्त सुरक्षा विशेषज्ञ मंथन कइए रहल छथि, जे सबठाम छपि रहल अछि. तें, एतय ओहि पर आओर बेसी किछु कहब आवश्यक नहि.

 

         

Tuesday, July 5, 2022

कन्नगी-कोवलनक कथा

 

 नारी विद्रोहक एक पुरान कथा ±

देवीपूजा भारतीय परम्पराक अंग थिक. किन्तु, नारीक प्रति समाजक व्यवहार एहि परम्परासँ  निरपेक्ष रहैत आयल अछि. फलतः, समाजसँ बहुतो नारीक अपेक्षा पूर नहि भेलनि. अहिल्या, सीता, कुन्ती-कन्नगी, मादवि-मणिमेखलै, वा आम्रपाली, सब अपन संकल्पक अपनहि पूर कयलनि. एहि नारि लोकनि म सँ अहल्या, सीता, कुन्ती, आ आम्रपाली सुपरिचित छथि. मुदा, कन्नगी-मादविक उत्तर भारत मे  अपरिचित छथि. तें, मैथिली मे समकालीन दृष्टिऐ कन्नगी-मादविक कथाक  कहबाक विचार भेल. तमिल महाकाव्य ‘शिलापत्तिकारम्’क एहि कथाक आधार थिक. ई ग्रन्थ ‘तमिल संगम’ युगक अनुपम उपहार थिक. एहि ग्रंथक प्रणेता चेर राजकुमार जैन संत इलांगो थिकाह. कथा तमिलनाडुक पुबरिया कछेर पर बसल पुहर-पुम्पुहार-कावेरिपत्तिनम् , तथा मदुरै नगरक, एक  ऐतिहासिक घटना थिक जकर प्रमुख केन्द्रीय पात्र कन्नगी आ हुनक पति कोवलन थिकाह. मुदा, कथाक घटनाक्रम मे कन्नगीक एहन विद्रोही स्वरुप समाजक समक्ष अबैछ  जे अन्यायक विरुद्ध एसगरिए ठाढ़ भए पांडियन सम्राट्कें पराजित कय देलकनि. ई असाधारण थिक. अतः, अपन दृढ़ता आ गुणक कारण कन्नगी सम्पूर्ण समाज मे दूर-दूर धरि पत्नी देवीक नामे  प्रतिष्ठित भेलीह. तें, कन्नगीक उदात्त चरित्र आइओ प्रेरक अछि. इएह हुनक कथाक पुनरावृत्तिक औचित्य थिक.

किन्तु, जखन समाज कोनो मनुष्यकें देवता बना दैत छैक, तखन कालक्रमे ओहि व्यक्तिक चारू कात अनायास अनेक कथा, उपकथा, रहस्य-रोमांच जुड़ैत चल जाइत छैक. कन्नगीओक कथा एकर अपवाद नहि. अस्तु, मूल कथा सोझ होइतो ‘शिलापत्तिकारम्’क कथा अनेक शाखा-उपशाखा दिशा दिस पसरल अछि. ई रचना कालक युगधर्म वा महाकाव्यक बाध्यता थिक. तथापि, शिलापत्तिकारम् प्राचीन तमिल समाजक ऐतिहासिक दस्तावेज सेहो थिक. तें, एहि मे राजा लोकनिक शौर्य-पराक्रमक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनक अतिरिक्त पौराणिक कथा-उपकथा सेहो अछि. सब किछुक बीच यद्यपि, सत्य, अहिंसा,तप, पूर्व जन्मक कर्मक फल तथा सांसारिक ऐश्वर्यक अनश्वरताक संदेश एहि कथा मे मूल चिंतनक रूप मे सोझाँ अबैछ, तथापि, कन्नगी-कोवलनक कथा तहियाक समाज मे प्रचलित अनेक समानांतर आस्थाक शान्तिपूर्ण धार्मिक सहअस्तित्वकें सेहो रेखांकित करैछ. ई बढ़ैत धार्मिक असहिष्णुताक अजुका युग मे प्रासंगिक अछि.

हिन्दी मे ‘शिलापत्तिकारम्’ क अनुवाद भेल छैक. अमृतलाल नागरक हिन्दी उपन्यास ‘सुहाग के नूपुर’ कन्नगीएक कथा पर आधारित अछि. मैथिली मे प्रायः शिलापत्तिकारम् केर अनुवाद नहि भेल अछि. तें, हम शिलापत्तिकारम् क अनुवादक नहि, सोझ आ सरल भाषा मे एकर कथा कहबाक विचार कयल. मुदा, एतय प्रस्तुत कथा, किछु अर्थ मे मूल कथाक  हमर अपन बोधक परिणाम थिक.

शिलापत्तिकारम् पुरान तमिल ग्रन्थ थिक. तें, साधारण तमिल पाठकक हेतु शिलापत्तिकारम् पढ़ब संभव नहि. स्कूल-कालेजक पाठ्यक्रम मे कन्नगीक कथा छैक. संग्रहालय मे आ  समुद्रक कछेर पर चेन्नई आ पुहर मे कन्नगीक मूर्तिओ देखबनि. मुदा, गीत-संगीत,वाद्ययंत्र आ नाट्यकला सूक्ष्मतासँ वर्णन ‘शिलापत्तिकारम्’क दोसर प्रमुख आयाम थिक. ‘शिलापत्तिकारम्’ संगम कालक गीत-संगीत, वादन, आ नाट्यकलाक श्रोत ग्रंथ जकाँ अछि. किन्तु, ग्रन्थ मे प्रतिपादित गीत-संगीत, नृत्य, नाट्यकलाक आ वाद्य यंत्रक एतेक सूक्ष्म वर्णन जनसामान्यक रुचिसँ  बाहर तं अछिए, ओकरा बूझब विशेषज्ञक हेतु सेहो कठिन अछि. तें, एहि मैथिली कथा मे शिलापत्तिकारम् मे संग्रहित गीत, संगीत, नृत्यकला आ वाद्य-यंत्रक वर्णन  नहि भेटत.

प्राचीन तमिल साहित्य मे तमिल क्षेत्र भौगोलिक दृष्टिए पाँच प्रकार मे विभक्त कयल जाइत छल: कुरिञ्जी (पर्वत प्रदेश), मुल्लै (वन्य प्रदेश),मरुदम् (समतल कृषि क्षेत्र), नेयडल (समुद्र तटवर्ती प्रदेश), आओर पालै (शुष्क मरुभूमि वा पाथरसन भूमि). पृथक्-पृथक् भूभागक निवासी, वृक्ष, फूल, संगीत, वाद्य आ ओतुका देवी देवता भिन्न-भिन्न रहथि. ‘शिलापत्तिकारम्’ मे ओकर सबहक यथास्थान वर्णन छैक. ताहू कारण शिलापत्तिकारम् कें समन्वयवादी साहित्य कहि सकैत छियैक.  मुदा, एहि मैथिली पोथी मे जे गीत सब अछि ओकर पृष्ठभूमि आ प्रेरणा कथाक समीपस्थ घटनाक्रम आ भूगोल सँ होइतो, ओ सब मूल ग्रंथक कोनो गीत-विशेषक अनुवाद नहि थिक. तथापि, कन्नगी-कोवलनक कथा पढ़ि जं किछुओ पाठककें तमिल साहित्यक प्रति रुचि जगलनि तं हमर उद्देश्य अंशतः पूर्ण भए जाएत. हमर प्रयाससँ जं अओरो तमिल ग्रन्थ सबहक मैथिली अनुवाद आ पुनर्पाठकें बल भेटलैक तं हमर उद्देश्य पूर्ण भए जायत.        

± शीघ्र प्रकाश्य कन्नगी-कोवलन कथा उपन्यासक भूमिका )

Wednesday, June 8, 2022

महादेव पूरण टिबरेवाल इंगलिश उच्च (MPTHE) विद्यालय, झंझारपुर : हमर उदारवादी गुरुकुल

 

महादेव पूरण टिबरेवाल इंगलिश उच्च (MPTHE) विद्यालय, झंझारपुर

( वर्ष १९६७-७१ )

भारतक स्वतंत्र भेलाक पछाति शिक्षित वर्गमे धिया-पुताकें पढ़यबाक प्रवृत्ति जोर पकड़लकैक. किन्तु, मिथिलांचलमे स्कूल आ ताहूमे हाई स्कूल अत्यंत अभाव रहैक. अधिकतर हाई स्कूल सब निजी दान आ दाताक उदारतासँ  स्थापित भेल रहैक. तहिया शिक्षा उद्योग नहि बनल छल. स्कूलक दूरी, यातायातक असुविधा आ अर्थक अभावक कारण बहुतो विद्यार्थी ले हाई स्कूलमे पढ़ब कठिन रहैक. पुरान दरभंगा जिलामे गनल-गुथल हाई स्कूल रहैक. महादेव पूरण टिबरेवाल उच्च विद्यालय, झंझारपुर हमर गामसँ सबसँ लग छल. हमर नाम ओतहि लिखाओल गेल. ओहि समयमे हमरालोकनि, अपन गामक करीब पन्द्रह-सोलह विद्यार्थी, प्रतिदिन पाँव-पैदल झंझारपुर जाइ. छात्रक दलमे आठवाँसँ   कए एगारहवाँ धरिक छात्र रहथि. एहिमे कमलाक पछबरिया तटबंधक पश्चिमक  अवाम, रतौल, मदनपुर, रहीटोल धरिक विद्यार्थी रहथि. किछु विद्यार्थी पोखरिभिंडा आ उजानसँसेहो आबथि. अवामक विद्यार्थी सब कमलाक पश्चिमी बान्हपर संग होइत छलहुँ आ ओहिसँ आगू धबौली बाध होइत कमलाक काते-कात झंझारपुर चल जाइत छलहुँ. साईकिल ककरो लग नहिं रहैक. ककरो पयरमे जूता-चप्पल नहि. छात्र लोकनिकमे एकोटा कन्या नहि रहथि. अधिकतर कन्याक विवाह प्राथमिक शिक्षासँ पहिनहि वा ओकर तुरत बाद भए जाइनि. कन्या लोकनि शिक्षाक प्राथमिकताक सूचीमे सबसँ नीचा रहथि. तें, हाई स्कूलमे छात्रा लोकनिक संख्या नगण्य छल. जे केओ स्कूल आबथि ताहि म सँ एक दू टा स्थानीय माड़वारी व्यापारी लोकनिक परिवारसँ वा स्थानीय सरकारी अधिकारी लोकनिक कन्या रहथिन. तें, सहशिक्षाक वातावरणमे बालक आ कन्या लोकनिक एक दोसरासँ  परिचयक कारण किशोरक जे मनोवैज्ञानिक विकास होइत छैक, ताहि वातावरणक अभाव रहैक.

महादेव आ  पूरण  टिबरेवाल उच्च विद्यालय, झंझारपुरक स्थापना, वर्ष 1952 मे भेल छल. महादेव आ  पूरणमल  टिबरेवाल नामक दू टा स्थानीय माड़वारी व्यापारी एहि विद्यालयक स्थापना कयने रहथि. एहि इलाकाक दू टा पुरान स्कूल- केजरीवाल स्कूल आ  मधेपुर हाई स्कूल- कोस भरि दूर झंझारपुर बाज़ार आ दू कोस दूर पूब रहैक. प्रायः तें एतुका व्यापारी लोकनि हाई स्कूलक आवश्यकता अनुभव कएलनि आ एतहि नव स्कूलक स्थापना केलनि.

महादेव आ  पूरण  टिबरेवाल हाई स्कूल झंझारपुर रेलवे जंक्शन ( तहियाक स्टेशन) क ठीक उत्तर, पूबे-पच्छिमे जाइत रेलवे लाइनक दोसर उत्तर अछि. हमरा सबहक समयमे स्कूल, दक्षिण मुँहक फूसक भवनमे रहैक. छात्रावास खपरैल भवन पश्चिम मुँहे छल. विद्यालयक दुनू भवनक दुनू अंग मिला कए L-आकारक रहैक. स्कूलक आगू पैघ फील्ड रहैक जकर पूर्व-दक्षिण कोन पर हैण्ड पम्प आ दक्षिण-पश्चिम कोन पर एकमात्र सर्विस टॉयलेट रहैक. फील्डक पश्चिम पोखरि रहैक. स्टेशनसँ उत्तर गेनिहार यात्री लोकनि स्कूलक फील्ड होइत जाइत रहथि. फील्डमे खेल-कूदक कोनो व्यवस्था नहिं.

एहि स्कूलमे  विज्ञान, कला एवं वाणिज्य, पढ़ाईक तीनू विकल्प उपलब्ध रहैक. स्कूलक नीक पढ़ाई रहैक. विद्यार्थी लोकनि जिज्ञासु रहथि आ शिक्षक लोकनि विद्यार्थीक जिज्ञासा शान्त करबामे तत्पर रहथि. शिक्षक लोकनि योग्य आ अनुभवी रहथि. किछु गोटे सामूहिक आ प्राइवेट ट्यूशन सेहो दैत रहथिन. हेडमास्टर स्व. जीव नारायण दास तं एहि स्कूलमे अयबासँ पूर्व बेलाही हाई स्कूलमे उपप्रधानाध्यापकक रूपमे सेहो काज केने रहथि. दू गोट उद्धरण जे ओ बेसी काल कहथिन. कहथि, हौ बाइबिल में कहने छैक” ‘Man is the cream of creation.’  Napoleon Bonaparte क कथन  Impossible is the word found only in the dictionary of fools.’ सेहो ओ यदा-कदा कहथिन.

स्कूलमे विज्ञान, कला आ वाणिज्य तीनू विकल्पक पढ़ाई होइत रहैक. जीव विज्ञान पढ़यबाक व्यवस्था नहिं रहैक. पदाथ विज्ञान आ रसायन विज्ञानक हेतु प्रयोगशालाक व्यवस्था रहैक. छात्रकें प्रयोग करबाक अवसर भेटैक. कोर्स-वर्कक अतिरिक्त कहिओ काल वाद-विवाद प्रतियोगिता होइक, पुरस्कार भेटैक. मेरिट टेस्ट नामक भिन्न-भिन्न विषयक घंटा भरिसँ कम अवधिक मासिक परीक्षा हमरा लोकनिक हेतु विशेष आकर्षण रहय. मेरिट टेस्टमे सबसँ अधिक नम्बर अननिहार एकाधिक विद्यार्थीकें पुरस्कार-स्वरुप किताब, कापी,कलम सन छात्रोपयोगी उपकरण भेटैक.तहिया तकर बड्ड महत्व रहैक.   

एहि स्कूलमे मुसलमान छोड़ि समाजक सब वर्गक छात्र रहथि. हमरा लगैत अछि, ओहि समयमे एहि इलाकाक  मुसलमान समुदायक छात्र प्राथमिक स्कूलसँ कदाचिते आगू पढ़ि पबैत रहथि. मुसलमान छात्रक अभावक अनुमानित कारण इएह थिक. शिक्षकहुमे केओ मुसलमान नहि छलाह. स्कूलक वातावरण उदारवादी रहैक. शारीरिक दण्ड पूर्ण रूपें संपत नहिं भेल रहैक. मुदा, ताहि में शिक्षक ई नहिं देखथिन जे विद्यार्थी संस्थापकक परिवारक थिकाह, कि आन केओ.

तहिया देश स्वतंत्रताक बेसी दिन नहिं भेल रहैक. ओहि समयमे आदर्शवादी विचारधारा क निंदा नहि आरंभ भेल रहैक. गाँधी तहिया पूज्य छलाह. यद्यपि, वादविवाद मे राजनेता वा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आलोचनासँ परे नहिं रहथि.   

विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन अपन संस्मरण ‘Home in the World’ में लिखैत छथि, ‘संस्मरणक स्मृति-चर्वणमे अनका रूचि होइक से आवश्यक नहिं. किन्तु, की भेलैक आ अनकर अनुभव आ विचारक की अर्थ निकाली ताहिमे अनका रूचि संभव छैक.’ तें, हम ओहि समय मे महादेव पूरण टिबरेवाल इंग्लिश उच्च  (MPTHE) विद्यालय, झंझारपुर मे केहन वातावरण रहैक तकर किछु उदाहरण दैत छी.

स्कूलक दैनिक कार्यक आरम्भ जयशंकर प्रसादक कविता ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से’ कविताक गान होइक, कोनो देवी-देवताक स्तुति नहि. पाठकक हेतु ओहि कविताकें एतय उद्धृत करैत छी :

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाडवाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

प्रतिदिनक प्रातः कालीन असेंबलीमे एहि कविता पाठक नेतृत्व पण्डित बनखंडी मिश्र करैत रहथि. पण्डित जी संस्कृतक विद्वान रहथि. किन्तु, विचार उदारवादी रहनि. स्वतंत्रता संग्राम आ द्वितीय विश्वयुद्धक गप्प यदा-कदा सुनबिथिन. राजनितिक गतिविधि पर हुनक नजरि रहनि. भाषा शुद्ध लिखल जाय तकर आग्रही रहथि. आनो शिक्षक लोकनि शुद्ध भाषा लिखबा पर  जोर देथिन.

जं कहियो पण्डित जीक अनुपस्थिति मे भोरुका सामूहिक ‘प्रार्थना’क भार शिक्षक महावीर पोद्दार पर पड़नि तं ओ ‘ दयाकर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना’ क प्रार्थना कराबथि. ओहि दिन’ हिमाद्रि तुंग शृंग से’क गान नहि होइक. मुदा, से अभावृत्तिए.  स्कूल में NCC/ ACC सन संस्थाक प्रवेश नहि रहैक. योग आ व्यायामक प्रचार नहिं रहैक. मुदा, पदार्थ-विज्ञान (Physics)क शिक्षक महावीर पोद्दार हमरा सत्यानन्द सरस्वतीक योगासनक एकटा पुस्तक देने रहथि. हम प्रायः आठमे वर्ग मे ओहि पोथीक सहायतासँ बहुत योगासन सीखि नेने रही जे आइओ बिना ककरो सहायता आ निर्देशके करैत छी.

स्कूलमे पढ़ाई नीक रहैक रहैक. शिक्षकमे विशेषतः प्रधानाध्यापक जीबनारायण दासक अतिरिक्त, महेश्वर सिंह, महावीर पोद्दार, कीर्त्यानन्द मिश्र, मदनेश्वर मिश्र, पं. बनखंडी मिश्र आ कपिलेश्वर महतो मन पड़ैत छथि. ई लोकनि क्रमशः रसायन शास्त्र, पदार्थ विज्ञान, गणित, समाज अध्ययन, संस्कृत-हिन्दी, एवं हिन्दी पढ़ाबथि  प्रधानाध्यापक जीबनारायण दास मैथिलीमे लिखितो रहथि. ओ अंग्रेजी आ मैथिली पढ़बथिन. गीता प्रेसक एक पोथीक हुनक मैथिली अनुवाद ‘भक्त आओर भगवान’ एखनो हमरा लग अछि.

ई सब शिक्षक पढ़यबाक अतिरिक्त हमरा सबकें परिश्रम करबाक हेतु,  आ आगू बढ़बाक हेतु प्रेरितो करथि. प्रेरक व्यक्तित्व मे प्रधानाध्यापक जीव नारायण दासक अतिरिक्त हमरा स्व. मदनेश्वर मिश्र एवं महेश्वर सिंह विशेषतः मन पड़ैत छथि.

स्कूलमे साहित्य, आ कलाक क्षेत्रमे रटि कए लिखलासँ उत्तर नीक मानल जाइक. तें, समाज अध्ययन, हिन्दी, मैथिली आ संस्कृतमे हमरो लोकनि शिक्षकक लिखाओल उत्तरकें कंठस्थ कए ली. ओहिसँ नम्बरो आबय आ शिक्षक सेहो संतुष्ट होथि. पढ़बाक ओहि विधिसँ समाज अध्ययनक विद्वान् सबहक उद्धरण रटब काज आबय. भाषाक उत्तर शुद्ध होइक. किन्तु, साधारण विद्यार्थीक रचनात्मकता अवश्य दुर्बल होइक, प्रायः. तथापि, ओहि शिक्षक लोकनिक प्रति हमरा मनमे असीम आदर आ आस्थाक अतिरिक्त आओर किछु नहिं. हमरा नहिं लगैछ, ओहि कोटिक शिक्षक आब एहि इलाकाक कोनो स्कूलमे भेटताह. कारण बूझब कठिन नहि.

हाई स्कूलक अवधिमे हमर ध्यान योगासन आ स्वास्थ्य दिस गेल. किछु दिन गामक अखाड़ा पर सेहो गेलहुँ. अखाड़ा पर गामक पिछड़ा वर्गक युवक सब बेसी जाथि. कहबी रहैक:

            घोखन्त  विद्या लपटन्त जोर

            नहिं किछु तं थोड़बो थोड़

 किन्तु, हम जखन पढ़ाई दिस बेसी व्यस्त भेलहुँ तं अखाड़ा छुटैत गेल, किन्तु, स्वास्थ्यक प्रति जागरूकताक जे बीज गाममे मन मस्तिष्कमे पड़ल छल से जिनगी भरि संग रहल.  पछाति, जखन सेना सेवामे अयलहुँ तं ओतहु नियमित जीवन पद्धति आ स्वास्थ्य पर जोर रहैक. किन्तु, अपन अनुशासनक बलें  जतय कतहु गेलहुँ विपरीत जलवायु  आ कठिन जीवन पद्धतिओसँ कहियो स्वास्थ्य प्रभावित नहिं भेल. हमरा लगैत अछि, छात्र जीवनमे स्वास्थ्यक प्रति जागरूकताक जे बीआ हमरा मनमे रोपल गेल छल तकर लाभ हमरा जीवन भरि होइत रहल.

१९७१ ई मे महादेव पूरण टिबरेवाल इंगलिश उच्च (MPTHE) विद्यालय, झंझारपुरसँ हम मैट्रिक पास भेलहुँ. जहिया एहि स्कूलमे हमर नाम लिखल गेल छल, हमर गौआं लोकनि कहथि जे स्कूलक सम्मान सारिणी ( Roll of Honour ) पर अहाँक नाम अयबाक चाही. हम ओकर अधिकारी तं अवश्य भेलहुँ, किन्तु, समान सारिणी पर नाम लिखल गेल गेल वा नहि से देखबाक अवसर फेर कहियो नहि भेटल. एतबा अवश्य जे मैट्रिक परीक्षाक प्राप्तांक आधार पर हम राष्ट्रीय छात्रवृत्ति अधिकारी भेलहुँ. ई छात्रवृत्ति हमरा फाइनल एम बी बी एस धरि पार लगा देलक. तखन हम अपन स्कूल आ ओतुका गुरु लोकनिकें कोना बिसरि सकैत छियनि.

कहितो छैक:  अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: ||

गुरुलोकनि आ गुरुकुलकें नमन.

 

Tuesday, June 7, 2022

उजान मिड्ल स्कूलक अनुभव : वर्ष १९६५-६६

 

उजान मिड्ल स्कूलक  अनुभव : वर्ष १९६५-६६

प्राथमिक विद्यालयसँ पांचमा पाससँ भए  मिड्ल स्कूलमे जयबाक अनुभव अनेक अर्थमे स्मरणीय छल; मिड्ल स्कूलमे छठम आ सातम वर्गक पढ़ाई होइत रहैक. पहिल, गामक स्कूलसँ बहराइते जेठि बहिन, शीला दाईक संग छूटि गेल. शीला दाई स्कूल जा कए पढ़निहारि हमरा सबहक परिवारक पहिल कन्या रहथि. उजान आन गाम भेल. ओतय हमरालोकनिक अनेक कुटमैती छल. ओहुना, ताधरि अवामक केओ कन्या गामसँ बाहर जा कए नहिं पढ़ैत रहथि. जायब-आयब सेहो पयरे रहैक, पर्दा प्रथाक असरि समाप्त नहिं भेल रहैक. तें, अपना गाममे मिड्ल स्कूल नहि हेबाक सबसँ पहिल हानि हमर बहिनेकें भेलनि, आ ओ पाँचसँ  आगू नहि पढ़ि सकलीह. ऊपरसँ ताधरि विवाहक योग्य सेहो भए गेल रहथि; तेरह वर्ष होइत-होइत तहिया कन्या अजग्ग मान जाथि ! स्कूलमे पढ़ैत हुनक सब संगतुरिआक - जाहिमे केवल ब्राह्मण आ कायस्थक कन्या लोकनि रहथिन- विवाह पहिनहि भए चुकल रहनि. ओहुना कन्या लोकनिकें चिट्ठी-पत्री लिखब-पढ़ब आबि गेलनि, रामायण-महाभारत, खीसा-पिहानी पढ़ि लेतीह, तहिया सएह पर्याप्त छलैक.

उजान मिड्ल स्कूल हमरा घरसँ करीब आध कोस (१ माइल) पच्छिम छल. चटिया (विद्यार्थी) सब पयरे स्कूल जाथि. अवामक पछवारि टोल आ उजान स्कूलक बीच एकटा बाध पड़ैत रहैक. बाटमे गाछी-कलम, नासी (नदीक छाड़न) आ बाँध( बैलगाड़ी जयबा योग्य कच्ची सड़क) सेहो रहैक. मुदा, खेतक आरि पर देने  आ खुरबटिया बाटें गेला पर दूरी कम भए जाइक. तें, हमरा लोकनि छोट बाट धए जाइ-आबी.  

खेतक कोला(भूखण्ड) सबहक बीचक आरि-धूर पर निरंतर अवर्यातक कारण बाट देखार रहैक आ ककरो सोझ बाट तकबामे मोसकिल नहिं होइक. ओ खेत सब एखनो ओहिना अछि, मुदा, ओ बाट कतय पाबी. प्रगतिसँ लोक खुरबटिया बिसरि चुकल अछि आ मनुखक पयर आ भूमिक बीचक संबंध समाप्त भए गेलैक. वाहनक तेज गतिक कारण गाम-घरक बाध-बोनक सौन्दर्य आब लोकक दृष्टिपथ पर अबैत छैक, ओकर क्षणिक छवि आँखि पर जहिना अबैत छैक, तहिना बिला जाइत छैक. ओहि सौन्दर्यक अनुभूति चेतना धरि नहि भिजैत छैक. लोक प्रकृति देखबाले  टाका खर्च कए दूर-दूर जाइत अछि, किन्तु, हड़बड़ीमे किछुओ कहाँ भेटैत छैक.

आइ-काल्हि जखन हम गाम जाइत छी, अपन परिचित खुरबटियाकें तकबाक प्रयास करैत छी. तखन लगैत अछि, ओ सब प्रायः एहन स्वप्न छल जकरा अजुका यथार्थसँ  कोनो संबंध नहिं. किन्तु, एहिमे कोनो दुःख नहिं. मानव सभ्यताक विकास सबठाम इतिहासकें नीपैत चलैछ, आ नीपल सपाट भूमि पर वर्तमानक भव्य-भवनक निर्माण होइछ. ओ भव्य भवनमे ककरा केहन लगैत छनि ताहिमे भिन्नता छैक. हं, जखन लोकके भूमि पर इतिहास नहिं भेटैत छैक तं पातालसँ इतिहासकें खोधि निकालबामे बसल नगर आ शहरके सेहो मटियामेट कए दैछ. 

आब पुनः उजान स्कूलक बाट पर आबी. तहिया बाधमे ऋतुक अनुकूल धान-गहूम-बदाम (चना)-तीसी-खेसारी आ कुसियारक खेती होइत छलैक;  पहिने मिथिला कुसियार आ चीनीक मिल ले प्रसिद्द छल. स्कूलसँ आपसीमे भुखाएल विद्यार्थीकें मन भेलैक तं कहियो दू बुट्टी बदाम उखाड़ि लेलक आ छिम्मड़ि सोहि कए खेलक. केओ नहिं देखलकैक तं बेस. केओ देखि लेलकैक, आ मास्टरकें शिकाइत भेलनि, तं विद्यार्थी लठिआओल गेलाह. मुदा, से तं सोहाग-भाग भेलैक. लोकक खेतसँ बदाम उजाड़बै, कुसियारक छर तोड़बैक तं ओ शिकाइत नहिं करत ! आ शिकाइत करत तं दण्ड नहिं लागत !! लगतैक तं, लगतैक !!! देखल जयतैक ! एतेक आगू सोचि सोचि पबितहुँ तं विद्यार्थी नहि, गार्जियने रहितहुँ.

हमरा ई सब प्रवृत्ति नहिं छल. चोरि अधलाह थिकैक. हमर शिकाइत हयत, आ मास्टर हमरा दण्ड देताह! किन्नहु नहिं. हमही गामक सबसँ नीक विद्यार्थी छी. हमर अग्रज, ऊधोजी( स्व. उदयनाथ झा ) क नाम तहियो गाममे चर्चित छलनि.  आह ! ऊधोजी सन विद्यार्थी होअए ! सबतरि फस्ट ! माए कहथि: मोनसँ पढ़ह. देखैत छहुन माम लोकनिकें, विद्यहिंसँ सब उपार्जन केलनि-हें. परिवारक कमजोर आर्थिक स्थिति आ माएक निरंतर प्रेरणा मनमे सबसँ नीक बनबाक धुनिसँ भरि देअय. गाममे सब प्रशंसा करैत छल. आ हमर मन सिक्का चढ़ि जाइत छल.

उजान मिड्ल स्कूलमे वातावरण एकदम ग्रामीण रहैक. शिक्षक आ छात्र लोकनि आसे पासक गाँओक रहथि. शक्तिनाथ ठाकुर उर्फ हरिबाबू (सर्वसीमा), बलभद्र झा (कनकपुर),पं. बुद्धिनाथ मिश्र(उजान), रामबहादुर मिश्र(नडुआर), कुल चारि गोटे शिक्षक रहथि. अनुशासन सख्त रहैक. शिक्षक लोकनि  दक्ष रहथि. स्व. शक्तिनाथ ठाकुर अंग्रेजी व्याकरण पढ़बैत छलाह. अंग्रेजीक पढ़ाई मातृभाषा, राष्ट्रभाषा आ संस्कृतक अतिरिक्त चारिम भाषाक रूपमे हिन्दीक माध्यमसँ- माने, हिज्जेक संग – होइत रहैक. तें, शहरी परिवेशमे सुपरिचित, किन्तु ग्रामीण परिवेशमे अनभोआर कतेक सामान्य प्रयोगक वस्तु- जेना कप-सौसर – केर अर्थ सेहो विद्यार्थी शब्दकोषमे ताकथि. वाक्यक संरचना प्रयोगसँ  नहि, व्याकरणक माध्यमसँ  सिखाओल जाइत छलैक. ततबे नहिं, पोथीमे पढ़ल पाठकें सामान्य जीवनमे प्रयोगक ने प्रेरणा देल जाइक, ने उदहारण. विज्ञानक पोथीमे स्वास्थ्य शिक्षाक स्थान पर मानव शरीरक रचना आ फूल-पत्तीक वर्णन रहैक. सफाई आ स्वास्थ्यक गप्प स्कूलमे नहिं होइक.

हमरा लोकनि वर्ग छौ आ सातमे हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञानक अतिरिक्त इतिहास-भूगोल आ मैथिली सेहो पढ़ने रही. हाई स्कूलमे विज्ञान-शाखामे गेलाक बाद, पाठ्यक्रममे इतिहास आ भूगोल  पढ़बाक अवसर हमरा पुनः कहियो नहिं भेल. कारण, तहिया बिहारमे बिहार बोर्डक कोर्स चलैत रहैक. हमरा लोकनि CBSE शब्द सुननहु नहि रहियैक.   

स्कूलमे सब तरहक छात्र रहथि. मुदा, समाजक सब वर्गक नहि. छात्र सबमे सबसँ बेसी संख्या ब्राह्मण लोकनिक. किछु बनिया, कायस्थ, किओट-धानुक-अमात. मुदा, अनुसूचित जाति आ मुसलमानसँ एकोटा नहि. आइ ई आश्चर्यजनक लगैछ. मुदा, तहिया तं ओ समाजक रीति रहैक. कारण, उजान आ लगक गाम सबमे मुसलमानक टोल रहबे करैक, अनुसूचित जातिक लोक तं रहबे करथि. परिवार आ समुदायक भीतर वा राजनीतिक दल दिससँ बच्चाकें पढ़यबाक कोनो मुहिम केर अभाव एकर प्रमुख कारण छल. मिथिलांचल में सार्वजानिक शिक्षाक अभावमे  छुआछूतक योगदान सेहो रहैक. ओना के नहिं जनैत अछि, गरीब समुदायमे सबसँ बड़का प्राथमिकता भूखसँ लड़ैत प्राण बचयबाक रहैत छैक. तहिया सर्व शिक्षा (अभियान)क तं लोक नामो नहि सुनने छल. एतय कहैत चली जे, रूसमे निरक्षरता उन्मूलनक अभियान वर्ष 1920 मे आरम्भ भेल छल. ओहि अभियानमे ‘स्थानीयकरण’ वा मातृभाषाक प्रयोग पर बल रहैक. किन्तु, जे स्वतंत्र भारत विकासक अनेक प्रेरणा सोवियत रूससँ नेने छल, ओ स्वतंत्रताक आरंभिक दशकमे साक्षरता आ साक्षरता अभियानमे मातृभाषाक प्रयोग पर कनेको ध्यान नहि देलक. कारण केवल आर्थिक छलैक कि नहिं, ताहि पर मतभेद संभव. हमरा जनैत, साक्षरता तहियाक सरकारक प्राथमिकता नहि रहैक. असलमे हमरो लोकनिक प्राइवेट मिड्ल आ हाई स्कूलमे पढ़लहुँ.  शिक्षकक वेतन छात्रक फीसेसँ  अबनि. मिड्ल स्कूलक भूमिमे उपजल अन्न सेहो शिक्षक लोकनि अपना में पारिश्रमिक जकाँ बाँट-बखरा करथि ! हमरा जनैत स्वतंत्र भारतक ई पहिल बड़का चूक छल.

उजान मिड्ल स्कूलक अधिकतर छात्र अपन परिवारक पहिले पढ़ुआ रहथि. तें, घर परिवारमे पढ़ओनिहारक अभाव रहैक. गामहुमे शिक्षितक अभाव रहैक. पिछड़ा वर्गमे कदाचिते केओ साक्षर भेटिते. तें, गाम पर बहुत कमे विद्यार्थीके पढ़बयबला भेटनि. गाम पर शिक्षकक अभाव, ताहू पर गणित पढ़ओनिहारक अभावक अनुभव हमरो होइत छल.

अनुशासनक नाम पर स्कूलमे भयक वातावरण रहैक. क्लासमे विद्यार्थीकें भरि मुँह बाजल नहि होइक. शिक्षकसँ शंका-समाधानक वा पूछताछक साहस नहि होइक. फलतः, कमजोर विद्यार्थी आओर कमजोर होइत जाइत छल. ताहि पर आर्थिक विपन्नता. फीस नहिं जुरैक. तें जे छात्र फेल भेल, स्कूल छोड़ि दैत छल.

मास्टर लोकनिमे बलभद्र झा आ पण्डित बुद्धिनाथ मिश्र स्वभावसँ सहृदय रहथि. ओ लोकनि विद्यार्थीक शंका सुनबो करथिन.कने मने गप्पो कए लेथिन. हमरा लोकनि हुनकासँ  किछु समाधान पाबि ली. मुदा, कमजोर विद्यार्थीकें भय होइक; जं किछु पुछलिऐक आ उलटे जवाब देबय पड़ल तं परम पहपटि ! हेडमास्टर शक्तिनाथ ठाकुर (हरिबाबू) दण्ड देबामे इलाकामे नामी रहथि.यद्यपि, ओ ओतेक दण्ड देथिन नहि जतेक हुनक दण्डसँ  छात्रकें भय होइक. हं, अनुशासनमे ओ सख्त अवश्य रहथिन. हुनकासँ ककरो किछु पुछबाक साहस कदाचिते होइक. मुदा, हुनकर पढ़ाईसँ अंग्रेजीक वाक्यमे कर्ता आ कालक अनुसार क्रियाक दोषरहित प्रयोग तं हम सीखिए गेलहुँ. किन्तु, अधिकतर विद्यार्थी जेना-तेना अपन शंका अपनहि दूर करय आ अपने भरोसे आगू बढ़ैत छल.

पछिला पचास वर्षमे शिक्षा व्यवस्थामे निरंतर सरकारी ‘प्रयोग’  बहुतो ले पैघ अभिशाप सिद्ध भेलैक. 1965 ई.मे जखन हम छठम वर्गमे पहुँचहुँ बिहार सरकार सातवाँ वर्गमे बोर्ड परीक्षा आरंभ केलक. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति एहि परीक्षाक आयोजन करैत छल. स्कूल सब बोर्ड परीक्षाक पूर्व टेस्ट परीक्षा लैत रहैक. अधिकतर कमजोर विद्यार्थी टेस्ट परीक्षामे फेल भए जाइत छल. टेस्ट परीक्षामे फेल भेलहुँ तं बोर्ड परीक्षामे सम्मिलित हेबाक प्रश्ने नहि. तें मिड्ल बोर्ड परीक्षाक पूर्वक टेस्ट परीक्षा बहुतो विद्यार्थीक हेतु ई स्कूली शिक्षाक अंत साबित भेल. कारण, बूझब कठिन नहिं. बहुतो परिवार ले स्कूल फीस भारी छलैक. तखन जे फेल भेल ओकरा आगू के पढ़ाओत ! मुदा, जं ई विद्यार्थी लोकनि टेस्ट-परीक्षाक परिणामक आधार पर नहि रोकल जैतथि तं अवश्ये बहुतो हाई स्कूल धरि पहुँचिए जैतथि. कारण, बोर्ड परीक्षामे तहियो चोरि होइते रहैक.

पछाति, जे  विद्यार्थी बोर्ड परीक्षामे फेल भेलाह ओहो लोकनि पढ़ाई छोड़ि खेती-किसानी, पारिवारिक धंधा वा मज़दूरीमे लागि गेलाह. अस्तु, मिड्ल स्कूलक बोर्ड परीक्षा छात्रक भविष्यमे बड़का रोड़ा साबित भेल. हमरा नहि लगैए हमर सातवाँ क्लासक गोड़ पचासेक छात्र म सँ दसटासँ बेसी विद्यार्थी हाई स्कूल पहुँचल हेताह.

उजान स्कूल एकटा बैरकनुमा भवनमे रहैक. स्कूलक आगू छोट-सन अंगनै. खेलयबाक फील्ड नहि. मास्टर लोकनि टिफिन ब्रेकमे स्टाफ रूम- ऑफिसक कोठलीकें भीतरसँ बन्द कए ताश खेलाइत रहथि. विद्यार्थी सब जहिं-तंहि टॉआइत रहैत छलाह. स्कूलमे बाथरूम-टॉयलेट नहि रहैक. निवृत्ति हेबा ले विद्यार्थी आ शिक्षक ‘नदी दिस’ , ‘पोखरि दिस’ जाइत रहथि. स्कूलक पछुआड़ोमे पोखरि रहैक.  प्रत्येक वर्गमे कुल दू-तीन टा छात्रा छलीह. आब अनुभव होइए, कन्या सबकें कतेक असुविधा होइत छल हेतनि. मुदा, एतबा अवश्य जे जन्मसँ ‘नदी दिस’ , ‘पोखरि दिस’ जयबाक परंपराक कारणें ककरो ई कदाचिते अनुभव होइत रहैक जे जहिं-तंहि लघी-नदीसँ वातावरण आ जनस्वास्थ्य कतेक अहित होइत छलैक. आश्चर्य होइछ, इंग्लॅण्डमे शिक्षित, वकील-डाक्टर-इन्जिनीयर राजनेता लोकनि आ स्वतंत्र भारतक निर्माता लोकनि अनिवार्य शिक्षा आ जनस्वास्थ्यक सरल सुलभ आ सस्त तरीका तकबालए कोनो अनुसन्धानक प्रेरक किएक नहि बनलाह. जनताक उन्नतिक लेल आवश्यक एहि आधारभूत आवश्यकताके ओ लोकनि सामाजिक उन्नतिक लेल प्रस्थान भूमि किएक नहि बनओलनि.

आइओ जखन समाजमे रोग, हिंसा, गरीबी, धार्मिक असहिष्णुता, जनसंख्याक असीमित प्रसार देखैत छियैक तं सभक जड़िमे एकेटा विकृति-अशिक्षा-देखि पबैत छी; समाधान गुणात्मक शिक्षाक प्रसारे बूझि पड़ैछ. किन्तु, से सुलभ कहाँ !             

 

Saturday, May 7, 2022

गुणी लोकनिक कथा

 

व्यंग

गुणी लोकनिक कथा

उचित बाजब अप्रिय होइत छैक, तें तं मैथिली मे कहावत छैक, उचित कहैत घर झगड़ा. एहि प्रकारक उक्ति संस्कृत सहित अनेक भाषा मे भेटत. ततबे नहिं,उचित बजलाक कारण  दण्डित हेबाक उदाहरणक कोनो कमी नहि. बहुतो विद्वान, राजनेता, आ संत उचित बजबाक फल भोगने छथि आ भोगि रहल छथि. ई सदासँ होइत आबि रहल अछि. सत्य बजने दण्डित हेबाक उदाहरण महाभारत काल  आ गैलिलियोक युग धरिमे भेटत. फलतः, बहुतो कतेको गोटे भले अनुचितक समर्थन नहिं करथि, मुदा, उचित बजितो नहि छथि. किन्तु, सब ठाम परिस्थिति एक रंग नहि. कखनो घटना व्यक्तिक जीवन होइछ आ कखनो सामाजिक वा  सार्वलौकिक.

अपन अहित होइत देखि मौन रहब व्यक्तिगत निर्णय थिक. तात्कालिक भय वा  भविष्यक चिंताक एकर कारण भए सकैछ. किन्तु, कोनोक समूहक प्रतिनिधित्वक भार लेला उत्तर अपन समूहक हितक चिंता नहि करब अनुचित थिक. अनुचित होइत देखि उचित नहि, बाजब अनुचितक समर्थन थिक.

सत्यतः, कोनो सत्य परम सत्य  नहिं होइछ. केवल जीवन आ मरण  एकर एकर अपवाद थिक. अन्यथा, सत्य, देश, काल, नीति आ  व्यवस्था-सापेक्ष होइछ ? तथापि, व्यावहारिक जीवन मे सत्य आ असत्य बीच भेद करबाक हेतु एतेक दूर जयबाक काज नहिं.

एतय प्रश्न अछि, सत्यक अवहेलनासँ स्वयं प्रभावित होइतो  लोक किएक चुप लगा जाइछ? एहन कोन बाध्यता होइछ.

की एहि प्रकारक बाध्यताक कारण राजाक नवका पोशाक (https://en.wikipedia.org/wiki/The_Emperor%27s_New_Clothes) नामक लोक कथा लिखल गेल छल. ई कथा प्रायः निरंतर असत्य बजबा में अभ्यस्त दरबारी लोकनिकें देखार करबाक हेतु लिखल गेल छल. मुदा, एहि कथाक प्रासंगिकता एखनो छैक.

कथाकें दोहरायब आवश्यक नहिं. तथापि, कहिए दी.

‘राजाक नवका पोशाक’ नामक ई कथा ओहि राजाक थिक जे अपन राज-काजक स्थान पर अपन पहिरना-ओढ़नाकें बेसी महत्व दैत रहथिन. एक दिन ठक लोकनिक एक दल, जोलहा बनि हुनका ओतय आयल आ कहलकनि जे हमरा लोकनि एहन वस्त्र बिनि सकैत छी जे विशिष्ट होइतो लोककें देखबा मे नहिं अओतैक.  राजाकें विश्वास भए गेलनि. किछु दिनक पछाति एक दिन ओ जोलहा लोकनि राजाकें नव वस्त्र पहिरयबा ले' उपस्थित भेल आ हुनका संग वस्त्र पहिरयबाक प्रपंच कयलक. राजाकें विश्वास भए गेलनि जे सत्ये अत्यंत निपुण (ठक) जोलहाक दल हुनका  नव (अदृश्य) पोशाक पहिरएबामे सफल भेल अछि. राजा ओहि चमत्कारिक परिधानकें देखयबाक लोभें अपन दरबार मे तं ओहिना बैसबे केलाह, अपन ओही (नग्न) स्वरुपमे नगर भ्रमण ले सेहो बहरा गेलाह. राजाकें नग्न देखितो  सभासद आ मंत्रीगण राजाक अप्रसन्न हेबाक भयसँ किछु नहि बजलाह. किन्तु, ओहि समूह मे उपस्थित एकटा नेना कें सब किछु आश्चर्यजंक लगलैक. ओ नेना कहि देलकनि: जा ! राजा तं नंगटे छथिन ! 

कथाक दोसर स्वरुपमे केओ निर्भीक वा सोझमतिआ नागरिक राजाकें पूछि देलकनि: ‘सरकार, की अपने दिगंबर जैन बनि गेलिएक-ए ?’

तखन अकस्मात् राजाकें  बुझबा में अयलनि जे ओ ठकल गेल छथि !

ओना मैथिलीमे एकटा आओर कहबी आओर छैक: अपन हारल बहुक मारल कतहु बाजए  !

बहुक मारलमे भले लोकलाजक भय होइक, किन्तु, जं सार्वजनिक प्रतियोगितामे बैमानीसँ अहाँ हरा देल गेल होइ, तं बजबामे कोन हानि ? सेहो जखन प्रतियोगिता सबहक सामने खुला मैदानमे भेल होइक ! एहि गप्प पर हमरा एकटा घटना मोन पड़ैत अछि. प्रायः एहुना होइत होइक आ लोक हारि मानि लिअय. तखन तं ठीके सत्य कें खिहारबाक कोन काज. जे भेल देह लगा कए मारू !  मुदा बाट तेहन  नहिं होइक तखन ?

चलू आब खीसा सुनू:

कोनो गाममे अनेक गुणी रहथि. ओतय गुणी सबहक समूहमे किछु गोटे एहनो रहथि जनिका गुणी हेबाक दाबी रहनि, मुदा, रहथि मूढ़, किन्तु, दबंग. 

मुदा, एतेक गोटेमे सबसँ बेसी गुणी  के ? एकर निर्णय करब असंभव छलैक. अनेक दिन धरि सब गोटे अपनामें खूब घोंघाउज-घमर्थनि केलनि. कोनो परिणाम नहि बहराएल. अंततः, सब गोटे सहमत भेलाह जे हमरा लोकनि अपने गामक पंडित लोकनिसँ ई  निर्णय कराबी. बड्ड बेस. 

आब भेल जे निर्णय कहिया हो. ई बड़का समस्या छल. किछु गोटे कहलखिन, पंडित लोकनिसँ  पुछैत छियनि. ओ लोकनि जखन कहताह, जायब. किन्तु, ओहि म सँ दबंग लोकनि अड़ि गेलाह. कहलखिन  आइए निर्णय करए पड़त. असलमे सब युवके छलाह आ सौराठ सभाक दिन लगिचायल रहैक. अंततः, सब गोटे हकासल पियासल एके संग गामक संस्कृत पाठशाला पर पहुँचि, पण्डित लोकनिक समक्ष उपस्थित भेलाह आ पण्डित  लोकनिकें अपना लोकनिक बीचक  समस्या कहलखिन.

पंडित लोकनि ओहि दिन बड्ड जल्दीमे रहथि. हुनका लोकनि सब गोटे संग-संग कतहु नोत खयबा ले विदा भेल रहथि. ओ लोकनि कहलखिन,  देखू काज कठिन छैक. एहन काजमे जल्दी नीक नहि. नीचेनसँ निर्णय हो से उचित. मुदा, बहुमत छलैक, जे आइए दूधक दूध आ पानिक पानि भए जाए. अंततः, जखन गामक गुणी  लोकनि पण्डित लोकनिक सबहक समक्ष कोनो विकल्प नहि छोड़लखिन तं पण्डित लोकनि एक दोसराक मुँह ताकए लगलाह. बुझलनि जे आइ कोनो उपाय नहि. अस्तु, ओ लोकनि तुरत अपना मे इशारहिसँ किछु मन्त्रणा केलनि. फलतः, पण्डित लोकनिमे सबसँ तेजस्वी पण्डितक विचार सब गोटे मानि लेलखिन. सोचलनि, विपत्तिमे कोनो बाट तं खूजल.

पण्डित लोकनिक प्रतिनिधि बाजब आरंभ केलनि: ‘बेस ! निर्णय एखने भ’ जायत. मुदा, एकटा शर्त पर.

युवक लोकनि साकांक्ष भेलाह.

वरिष्ठ पण्डित मुसुकी छोड़ैत कहलखिन, ‘ हं. निर्णय हएत. मुदा, हमरा लोकनि जे निर्णय एक बेर कए देल सबकें मानय पड़त ! मंजूर अछि ?’

गुणी लोकनि एक दोसराक मुँह ताकए लगलाह. जे लोकनि वस्तुतः गुणी रहथि, सोचलनि, चिंता कोन !  निर्णायकमे एक सँ एक पण्डित छथि. प्रतिष्ठित छथि. प्रतिष्ठित पण्डित लोकनि अपर अविश्वास करबो पापे थिक ! जे बकलेल रहथि, हुनको चिंता नहिं. सोचलनि: भाग्यं फलति सर्वत्रः, न विद्या न च पौरुषम् ! 

अस्तु, सब एक स्वरमे कहलखिन, ‘ अवश्य ! एवमस्तु .’

वरिष्ठ पण्डित सब प्रतियोगीकें एकटा वृत्त बना  विद्यालयक अंगनैमे भूमि पर  बैसय कहलखिन. दसो प्रतियोगी ठामहि पलथा मारि बैसि गेलाह. पण्डित लोकनि सेहो चतुस्पाटी पर बैसलाह. पण्डितक प्रतिनिधि अपन दहिना हाथक तर्जनीसँ प्रतियोगी लोकनिक दिस निर्देश दैत आरंभ केलनि:

औका, बौका, तीन तलौका  

लौआ लाठी, चानन काठी !

एवं क्रमे ई मंत्रोच्चार चलैत गेल. गुणी  लोकनि अवाक् देखैत रहि गेलाह. तेसर चक्कर चलैत-चलैत पण्डित जी निर्णय करैत विजेताक कान्ह पर हाथ धए हुनका उठा ठाढ़ केलनि आ विजेता घोषित केलनि !

बलेल बाबू सबसँ बकलेल होइतो विजेता गुणी घोषित भेलाह. बाँकी सब गोटे मुँह बिधुऔने घर घूरि गेलाह. किन्तु, प्रतियोगी तं छोड़ू परोपट्टामे कहियो केओ नहि बाजल जे ई अनुचित भेल.

अगिला साल हुरा-हरीक उत्सवक अवसर पर गौआ लोकनि विजेता गुणी कें माला पहिरओलनि.

ई गप्प बहुतोकें अनसोहांत लगलनि.

फलतः, गाम दिस घुरबाकाल एक गोटे सत्यतः गुणी, मुदा, पराजित प्रतियोगीक प्रति सहानुभूति देखबैत हुनका पुछलखिन, ‘अंय यौ, एहनो अन्याय भेलैए ! मुदा, अहाँ बजलिऐक किएक ने ?

प्रतियोगी दांत  निपोड़ैत कहलखिन, ‘ बताह भेलौं-ए ! हम अहीं जकाँ नेना छी. एके माघमे जाड़ नहिं जाइत छैक ! हुरा-हरी अगिलो साल हेतैक ने !!

गुणीक मित्र कें दांती लागि गेलनि. आ प्रश्न कयनिहार ठामहि भूमि पर खसि पड़लाह !    

Saturday, March 26, 2022

हर घर नल का जल : योजना आ यथार्थ

 

हर घर नल का जल : योजना आ यथार्थ 

अवाम, 21 मार्च 2022 

कोरोनाक भय गाम में एकदम नहिं छैक. अर्थात् आब लोक सामूहिक रूपें सब प्रकारक सामाजिक उत्सव मना रहल अछि. हमरा ओहि ठाम मातमी माहौल छैक. ‘ब्राह्मणस्य ब्राह्मणों गतिः’ क अनुकूल ब्राह्मणकें पयर पुजबैत देखलियनि. ई पयर पूजा हम स्वयं सिमरिया घाट में 1975 में कए चुकल छी. ओहि वर्ष हमर जेठ भाई ऊधोजी अकस्मात् चलि बसल रहथि. मुदा, हमरा अपना, ने तहिया आ ने आइ एहि सब में विश्वास रहल. देखि रहल छी, तीस हज़ार रुपैया में बच्छा तरे दू टा गाए अइलीहे. मुदा, दान होइते पात्र ओकरा पाँच हज़ार डिस्काउंट पर घाटहिं पर बेचलनि. मने मन सोचैत छी, ई पात्र जं स्वयं गाए बेचबाक व्यवसाय करितथि तं यजमान कें आफियत होइतैक.

युगक अनुकूल दानक लिस्ट समकालीन भेल जा रहल छैक. सात वर्ष पूर्व हमर स्वशुरक काज भेल रहनि. ओहि में मोबाइल फोन सेहो दान भेल रहैक ! एखनो टॉर्च, रेचार्जेबुल लालटेन लिस्ट में शामिल अछि. चौकी-खाट-पलंग तं हेबेक चाही. मच्छड़ स्वर्गहु में छैक. तें, मच्छरदानी सेहो.

हमर जेठ भाई भरत जीक बालक, सरोज कुमार एखन एहि कर्मकांडक कर्त्ता थिकाह. सब किछु एही परिवार में भए रहल छैक. किन्तु, हमर भाई भरत जी सब किछु कें एक वाक्य में समेटि कए कहलनि, ‘ एहि सबहक एके टा उद्देश्य; समाज में जकर खा आयल छिऐक, तकर बदला चुका रहल छी. बाँकी के देखलकैए !’ हमरा नहिं लगैत अछि, कोनो दार्शनिक एहि विषय कें एहिसँ बेसी नीक जकाँ बुझा सकैत छथि. किन्तु, लोक खर्च करैत अछि.

नवकी पोखरिक मोहार पर जाहि ठाम भौजीक काज भए रहल छनि, ओकर लगहिं एकटा नव पानिक टंकी देखैत छियैक. बिहार सरकारक नारा ‘ हर घर नल का जल’ पानी टंकीक गुमटी में लिखल छैक. एहि परियोजना में 12,59,000 टाका खर्च भेलैए, से गुमटीक देवाल पर लिखल छैक. मुखिया लोकनिक नाम सेहो लिखल रहनि. मुदा, केओ उकाठी पद छोड़ि, केवल नाम कें पाथरसँ मेटा देने छनि. सेहो नीके. कारण, टोल पर गेला पर घरे-घर पानिक टैप लागल देखलिऐक. मुदा, सुखायल. पानि नदारद. पता लागल जे पानि ने टंकी में छैक, आ ने नल में. एहन परिस्थिति में एहि परियोजनाक समापनक वाहवाही के लेत !

सोचए लगलहुँ, गाम में इनार सब पहिनहिं भत्थन भए चुकल अछि. जं लोक एहि नल जल पर हैण्डपंप कें उखाड़ब आरंभ कए देलक तं ओ दिन दूर नहिं जे एतहु चेन्नई आ बंगलोर जकाँ, एतहु लोक प्रतिदिन पानि किनब आरंभ कए देत. ओना किछु गोटे कहलनि, गाम में बोतल बंद पानि बिका रहल अछि. ततबे नहिं कमला कात हमर गाम में भूमिगत जलक स्तर तीन सौ फीट धरि पहुँचि गेल छैक ! शुकुर अछि, हमरा अंगना में ज़मीनक 120 फीट नीचा धरि गाड़ल कल में एखनो ओहने निर्मल शीतल मधुर पानि आबि रहल अछि जेहन 1979 में कल गड़यबाक समय अबैत छल ! हमरा अंगनाक ई कल हमर पिताक निसानी थिक. मुदा, कहिया धरि रहत, कहब असंभव.

एहि बेर पुनः किछु गौआं / टोलबैया लोकनि हमरा लोकनिक ओतय जमा छथि. दुर्गामन्दिरक परिसर में गेट लगयबा ले सहायता चाहियनि. एहि गाम में आइ धरि कहियो केओ सड़कक मरम्मत वा स्कूल में पढ़ाईक समस्याक चर्चा धरि नहिं केलनिए. केओ अस्पताल वा हेल्थ सब सेंटर खोलबाक गप्प नहिं करैत छथि. मुदा, ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित, सब गोटे मन्दिरक नाम पर एकमत छथि. ताहू में पिछड़ा वर्गक लोक मन्दिर निर्माण में अगुआ छथि. हमरा आश्चर्य नहिं होइछ, किन्तु, गामक प्राथमिकता बदलितैक से मनोरथ तं होइते अछि. मुदा, गामक लोकक अनपढ़ होइतो हिनक लोकनि कें गार्जियनक आवश्यकता नहिं. केवल हिनका लोकनिक योजनाक कार्यान्वयन ले अर्थ चाहियनि. ततबे.

गामक पूब कमलाक तटबंध पर हाईवे बनत से सुनलहुँ. मिथिला में सड़कक जाल बिछाओल जा रहल अछि. किन्तु, कोनो उद्योग आरंभ हएत वा कल-कारखाना लागत तकर कोनो लक्षण नहिं. माने, बिहार अगिलो समय में पंजाबसँ ल कए केरल धरिक हेतु दिहाड़ी मज़दूर आपूर्तिक हेतु झारखंड आ उड़ीसाक संग मुख्य श्रोत  रहत. बिहारक विद्यार्थी इंजीनियरिंग पढ़बाले कर्णाटक, तमिलनाडु वा महाराष्ट्रे जेताह. पढ़ल इंजीनियर नौकरी ले  बंगलोर, गुडगाँव, चेन्नई, हैदराबादे जेताह !

नहिं जानि कहिया बिहारक प्रतिभा आ परिश्रम बिहार में बिकायत. बिहारक उत्पादन में योगदान करत.

अवाम गामक भोरुकबासँ भेंट

 

अवाम गामक भोरुकबासँ भेंट

अवाम, 20 मार्च 2022

अहल भोरे टहलबा ले विदा भेलहुँ तं बहुत दिनक बाद अवामक भोरुकबासँ भेंट भेल.

हम सन 1971 मे गाम छोड़ल. मुदा, गाम आयब नहिं छोड़ने छी. मुदा, अवामक ई बिसरल भोरुकबा बहुत दिन बाद भेटलाहे. आइ बहुतो गप्प मोन पड़ैत अछि. वर्ष 1971 सँ पूर्व सूर्योदयसँ दू तीन घंटा पहिनहिं उठि कए पढ़ब आरंभ करी. कोनिया ओसाराक एक कात चौकी पर दादा सूतथि. दोसर कातक चौकी पर जीतन सूतथि. हमर चौकी बीच में रहैत छल. हमरा उठयबा ले हिनका दुनूक अतिरिक्त हमर माता सेहो तत्पर रहथि. दादा कें सूर्योदयक बाद उठैत हम कहियो नहिं देखलियनि. ओहि युग में परिवारक मुखिया लोकनिक इएह नियम रहनि. जीतनक हेतु भोर हेबाक सूचना भोरुकबे दैत रहनि. कहियो काल हमरा अलसाइत देखि कहथि, ‘बौआ उठू, ओएह भोरुकबा उगि गेलैक !’

गाम में भोरुकबाक देखब भोर हेबाक एलार्म रहैक. महिसबार सब ओहिसँ पहिनहिं पसर चरबै ले महिस के लए  कए निकलि जाइत छल.

आइ अपन दरबज्जा परसँ  निकलि पहिने शीबू भाई कें संग करी. शीबू भाई समयक पक्का छथि. बिलंब भेल तं निकलि जेताह. हमरो लोकनि तं तेहने अनुशासन में पलल छी. अजुका नेयार 5 बजे भोरक छैक. माने हम शीबू भाईक ओतय 5 सँ  पाँच मिनट पहिने पहुँची. तखने ने पाँच बजे टहलान ले विदा हयब. अन्यथा On time is late ! माने, निर्धारित समय पर तं नेयारल काज आरंभ भए जेबाक चाही !! भारतीय सेना में सएह अनुशासन छैक. हम अपन पन्द्रह वर्ष लंबा अध्यापनक अवधि में छात्र लोकनि कें इएह सिखौलियनि. एहिना करैत रहलहुँ. हमरा लोकनिक शिक्षक स्व. डाक्टर हरिनन्दन द्विवेदी दुपहरियाक दू बजेक लेक्चर ले क्लास में पौने दू बजे आबि बैसि जाथि. मुदा, आब अनुशासन बदलि गेलैए. अपना ओतय समयक पाबंदी प्राथमिकताक सूची में सबसँ नीचा. पांडिचेरी में जखन हम एकबेर तत्कालीन डीन डाक्टर कृष्णन कें विद्यार्थीक क्लास में बिलंबसँ अयबाक शिकायत केलियनि तं ओ कहलनि, ‘ पन्द्रह मिनट धरिक छूट दिऔक.’ हम कहलियनि,’ असंभव!’ विद्यार्थी कें समय पालन सिखाएब हमरा लोकनिक काज थिक!’ आ सत्यतः  हमरा संग सदा विद्यार्थी सब सहयोग करैत रहल.

आइ शीबू भाई संग भेलाह आ हमरा लोकनि विदा भेलहुँ. टोल परक कुकुर सब अलसायल भोरुका निन्न मारि रहल छल. बनिया टोल पर कोनो कुकुर कें अपरिचित गंध लगलैक. एक दू बेर भूकल. मुदा, हमरा लोकनि आगू बढ़ि गेलहुँ. आइ हमर जयबा काल बेसी गौआं लोकनि सुतले छथि. ग्राम देवता लक्ष्मीनारायण सेहो शेषनाग पर निभेर निन्न छथि. पुजारी कें हुनका उठयबा में एखन बिलंब छनि. हं, लक्ष्मीनारायणक दक्षिण भारतीय प्रतिनिधि, वेंकटेशक स्तुति तं कतेक काल पहिने आरंभ भए गेल हेतनि. अमृतसरक स्वर्णमन्दिर में सेहो भक्त लोकनिक पतियानी लागल हएत. अवामक लक्ष्मीनारायण गौआं लोकनिक परिवारक सदस्य थिकाह. वा पुरान युगक आदर्श राजा थिकाह जनिका समक्ष केओ, कखनो फ़रियाद लए सोझे उपस्थित भए सकैछ.ने कोनो पतिआनी, ने कोनो प्रतीक्षा.

तें, एखन हमरो लोकनि लक्ष्मीनारायण के सूतले छोड़ि सोझे (अवाम आ पोखरभिंडा गामक बीचक) बाध में आबि गेलहुँ. एतय अबिते भोरुकबा आ पूर्ण चन्द्रमा दुनू मुहांमुही ठाढ़ भेटलाह. भोरुकबा पुबरिया आकाश में आ चन्द्रमा पश्चिम दिस. आकाश एखन साफ़ अछि. वातावरण निर्वात, किन्तु सुखद. जेना, हेमंत ऋतु होइक. भोरुका झलफल में खेतक जजात तं नीक जकाँ नहिं देखबा में नहिं अबैछ, किन्तु, एखन रब्बी-राईक समय छैक.

क्रमशः पौ फाटि गेलैए. बाध दिस लोक आब भेटब शुरू भेले. एतय सड़कक एक कात पत्रहीन पीपर ठाढ़ छथि आ दोसर दिस आमक कलम आ गाछी में मज्जरसँ भरल आमक गाछक समूह. लगैत अछि, एहि बेर खूब आम फड़तैक. किन्तु, आमक मज्जर आ आमक फसलक बीच अनेक संभावना छैक. अगिला किछु मास में मौसम केर मिजाज़ सबसँ बड़का निर्णायक थिक.

किछु आओर आगू बढ़ला पर किछु परिचित गौआं लोकनि अभरलाह आ हमरा लोकनिक संग भए गेलाह. सड़कक कातक खेत में मसुरी उखाड़ि कए गोलियाओल छैक. एकटा ग्रामीण कहैत छथि, ‘ पहिनेक समय रहितैक तं उखाड़ल मसुरी कहिया ने पार भए गेल रहितैक ! आब पन्द्रहो दिन एतय रहतैक तं केओ छूबो नहिं करतैक.’ ई सूनि नीक लागल.

हमरा लोकनि पोखरिभिंडा गाम धरि गेलहुँ. आपस होइत रही तं पूर्वक क्षितिज पर सूर्यक लाल चक्का सेहो उपस्थित भेलाह. महानगर सब में चान-सूर्य-तारा देखबाक सेहन्ता होइछ. गाम घर में एखन धरि ई लोकनि नागा नहिं करैत छथि. धूल-धुआं, धोन, आ मेघ तं सबठाम स्पर्धा करैछ.

आपसी में लक्ष्मीनारायण केन सेहो सुगबुगाइत देखलियनि. हुनक मन्दिरक सामनेक विशाल पीपरक गाछ, हमर बोधि-वृक्ष, एखनहु एहि परिसर कें छाया दैत ठाढ़ छथि. संयोगसँ हिनका शरीर पर पातक आभाव नहिं, ई पत्रहीन नहिं छथि. नहिं जानि, सड़कक पुबारि कातक पीपरक देह एखन नांगट किएक छनि. छथि तं ओएह पोखरिक बेसी लग. मुदा, मोन बिखिन्न छनि. हुनका जड़ि में प्रायः फूल-बेलपात नहिं चढ़ैत छनि. श्मसानक लग छथि. कदाचित भयभीत होथि! चिता सबहक धाहसँ काया कवलित भेल होइनि.  

ई सब सोचिते रही कि, तावते हमर गौआं, विनोद, भजन गबैत बाटे-बाट जाइत भेटलाह. हम प्रत्येक बेर हुनका अपना घर में पितामहक अमल केर कबीरपंथी साहित्यक खोज पुछारि करैत छियनि. मुदा, लोकक रूचि केवल बाप-पितामहक छोड़ल संपत्ति-सोना-बास डीह आ गाछी कलम में होइत छैक. घरक सफाई में सबसँ पहिने पोथीए-पतरा बाहर फेकल जाइछ. दिबाड़ सेहो पहिने पोथीएक संहार करैछ. तखन बाबाक युगक किताब कतय भेटत !  

संयोगसँ एहि बेर गाम में भोरे पढ़ैत केओ नेना देखबा में नहिं आयल. लगैए, कोरोना कालक प्रभाव एखनो छैक. मुदा, गाम में एखन कोरोनाक भए देखबा में नहिं आयल.भरि गाम में एको गोटे मास्क लगौने नहिं भेटल. अंततः हम अपनों मास्क उतारि बैग में राखल.

एहि बेर हम भौजीक निधनक कारण गाम आयल छी. आइ आ काल्हि बहुत गोटे भेटताह. तखन गाम में आओरो  बहुत किछु देखबा में आओत.                            

मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान

कीर्तिनाथक आत्मालापक पटल पर 100 म  लेख   मैथिलीकें जियाकय कोना राखब: समस्या आ समाधान  कीर्तिनाथ झा वैश्वीकरण आ इन्टर...

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